Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

ईश्वर का घर


*ईश्वर का घर*

एक बार भगवान दुविधा में पड़ गए, लोगों की बढ़ती साधना वृत्ति से वह प्रसन्न तो थे पर इससे उन्हें व्यवहारिक मुश्किलें आ रही थीं । कोई भी मनुष्य जब मुसीबत में पड़ता, तो भगवान के पास भागा-भागा आता और उन्हें अपनी परेशानियां बताता । उनसे कुछ न कुछ मांगने लगता । भगवान इससे दु:खी हो गए थे ।

अंतत: उन्होंने इस समस्या के निराकरण के लिए देवताओं की बैठक बुलाई और बोले – “देवताओं, मैं मनुष्य की रचना करके कष्ट में पड़ गया हूं । कोई न कोई मनुष्य हर समय शिकायत ही करता रहता हैं, जिससे न तो मैं कहीं शांति पूर्वक रह सकता हूं, न ही तपस्या कर सकता हूं । आप लोग मुझे कृपया ऐसा स्थान बताएं, जहां मनुष्य नाम का प्राणी कदापि न पहुंच सके ।“

प्रभू के विचारों का आदर करते हुए देवताओं ने अपने-अपने विचार प्रकट किए ।

*गणेश जी* बोले – “आप हिमालय पर्वत की चोटी पर चले जाएं ।“

*भगवान ने कहा* – “यह स्थान तो मनुष्य की पहुंच में हैं । उसे वहां पहुंचने में अधिक समय नहीं लगेगा ।“

*इंद्रदेव* ने सलाह दी कि “वह किसी महासागर में चले जाएं ।

*वरुण देव* बोले -“आप अंतरिक्ष में चले जाइए ।“

*भगवान ने कहा* – “एक दिन मनुष्यवहां भी अवश्य पहुंच जाएगा ।“ भगवान निराश होने लगे थे । वह मन ही मन सोचने लगे- “क्या मेरे लिए
कोई भी ऐसा गुप्त स्थान नहीं हैं, जहां मैं शांतिपूर्वक रह सकूं ।“

अंत में *सूर्य देव* बोले- “ प्रभू ! आप ऐसा करें कि मनुष्य के हृदय में बैठ जाएं । मनुष्य अनेक स्थान पर आपको ढूंढने में सदा उलझा रहेगा, पर वह यहाँ आपको कदापि न तलाश करेगा ।“

*ईश्वर को सूर्य देव की बात पसंद आ गई* । उन्होंने ऐसा ही किया और वह मनुष्य के हृदय में जाकर बैठ गए ।

उस दिन से मनुष्य अपना दुख व्यक्त करने के लिए *ईश्वर* को *ऊपर, नीचे, दाएं, बाएं, आकाश, पाताल में ढूंढ रहा है पर वह मिल नहीं रहें* ।

मनुष्य अपने भीतर बैठे हुए ईश्वर को नहीं देख पा रहा हैं

2.

(((( बाँके बिहारी जी का प्रेम ))))
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एक बार मैं ट्रेन से आ रहा था मेरी साथ वाली सीट पे एक वृद्ध औरत बैठी थी जो लगातार रो रही थी…
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मैंने बार बार पूछा मईया क्या हुआ, मईया क्या हुआ …
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बड़ी मिनतो के बाद मईया ने एक लिफाफा मेरे हाथ मे रख दिया…
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मैंने लिफाफा खोल कर देखा उसमे चार पेड़े, 200 रूपये और इत्र से सनी एक कपड़े की कातर थी …
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मैंने मईया से पूछा, मईया ये क्या है…
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मईया बोली मैं वृंदावन बिहारी जी के मंदिर गई थी, मैंने गुलक में 200 रूपये डाले और दर्शन के लिऐ आगे बिहारी जी के पास चली गई …
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वहाँ गोस्वामी जी ने मेरे हाथ मे एक पेड़ा रख दिया, मेने गोस्वामी जी को कहा मुझे दो पेड़े दे दो पर गोस्वामी जी ने मना कर दिया..
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मैंने उससे गुस्से मे कहा मैंने 200 रूपये डाले है मुझे पेड़े भी दो चाहिए पर गोस्वामी जी नहीं माने …
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मैंने गुस्से मे वो एक पेड़ा भी उन्हे वापिस दे दिया और बिहारी जी को कोसते हुए बाहर आ कर बैठ गई …
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मैं जैसे ही बाहर आई तभी एक बालक मेरे पास आया और बोला मईया मेरा प्रसाद पकड़ लो मेने जूते पहनने है…
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वो मुझे प्रसाद पकड़ा कर खुद जूते पहनने लगा और फिर हाथ धोने चला गया …
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फिर वो नही आया .. मै पागलो की तरह उसका इंतजार करती रही …
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काफी देर के बाद मैंने उस लिफाफे को खोल कर देखा …
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उसमें 200 रूपये, चार पेड़े और एक कागज़ पर लिख रखा था ( मईया अपने लाला से नाराज ना होया करो ) ये ही वो लिफाफा है …

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