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एक दोहे का चमत्कार 


​‬: एक दोहे का चमत्कार

Laxmi kant
प्रेरणादायक कहानी
एक राजा था जिसे राज भोगते काफी समय हो गया था बाल भी सफ़ेद होने लगे थे । एक दिन उसने अपने दरबार मे उत्सव रखा ।

उत्सव मे मुजरा करने वाली और अपने गुरु को बुलाया । दूर देश के राजाओं को भी ।

राजा ने कुछ मुद्राए अपने गुरु को दी जो बात मुजरा करने वाली की अच्छी लगेगी वह मुद्रा गुरु देगा।
सारी रात मुजरा चलता रहा । सुबह होने वाली थीं, मुज़रा करने वाली ने देखा मेरा तबले वाला ऊँघ रहा है उसको जगाने के लियें मुज़रा करने वाली ने एक दोहा पढ़ा ,
” बहु बीती, थोड़ी रही, पल पल गयी बिहाई ।

एक पलक के कारने, ना कलंक लग जाए। ”
अब इस दोहे का अलग अलग व्यक्तियों ने अलग अलग अपने अपने अनुरूप अर्थ निकाला ।
* तबले वाला सतर्क हो  बजाने लगा ।

* जब ये बात गुरु ने सुनी,  गुरु ने सारी मोहरे उस मुज़रा करने वाली को दे दी
* वही दोहा उसने फिर पढ़ा तो राजा के लड़की ने अपना नवलखा हार दे दिया ।
* उसने फिर वही दोहा दोहराया तो राजा के लड़के ने अपना मुकट उतारकर दे दिया ।
* वही दोहा दोहराने लगी राजा ने कहा बस कर एक दोहे से तुमने वेश्या होकर सबको लूट लिया है ।
# जब ये बात राजा के गुरु ने सुनी गुरु के नेत्रो मे जल आ गया और कहने लगा, ”  राजा इसको तू वेश्या न कह, ये मेरी गुरू है  । इसने मुझें मत दी है कि मै सारी उम्र जंगलो मे भक्ति करता रहा और आखरी समय मे मुज़रा देखने आ गया हूँ  ।

भाई मै तो चला।
# राजा की लड़की ने कहा, ” आप मेरी शादी नहीं कर रहे थे,  आज मैंने आपके महावत के साथ भागकर अपना जीवन बर्बाद कर लेना था । इसनें मुझे सुमति दी है कि कभी तो तेरी शादी होगी । क्यों अपने पिता को कलंकित करती है ? ”
# राजा के लड़के ने कहा, ” आप मुझे राज नहीं दे रहे थे । मैंने आपके सिपाहियो से मिलकर आपका क़त्ल करवा देना था । इसने समझाया है कि आखिर राज तो तुम्हे ही मिलना है । क्यों अपने पिता के खून का इलज़ाम अपने सर लेते हो?
# जब ये बातें राजा ने सुनी तो राजा ने सोचा क्यों न मै अभी राजतिलक कर दूँ , गुरु भी मौजूद है ।

उसी समय राजतिलक कर दिया और लड़की से कहा बेटा, ” मैं आपकी शादी जल्दी कर दूँगा। ”
# मुज़रा करने वाली कहती है , ” मेरे एक दोहे से इतने लोग सुधर गए, मै तो ना सुधरी। आज से मै अपना धंधा बंद करती हूँ।

हे प्रभु ! आज से मै भी तेरा नाम सुमिरन करुँगी ।
श्री राम जय जय राम जय जय राम ।

श्री राम जय जय राम जय जय राम ।

श्री राम जय जय राम जय जय राम

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बॉलीवुड


​आखिर बॉलीवुड ने दिया क्या है ?

बॉलीवुड ने भारत को इतना सब कुछ दिया है, तभी तो आज देश यहाँ है …

1. बलात्कार गैंग रेप करने के तरीके।

2. विवाह किये बिना लड़का लड़की का शारीरिक सम्बन्ध बनाना।

3. विवाह के दौरान लड़की को मंडप से भगाना

4. चोरी डकैती करने के तरीके।

5. भारतीय संस्कारो का उपहास उठाना।

6. लड़कियो को छोटे कपडे पहने की सीख देना…. जिसे फैशन का नाम देना।

7. दारू सिगरेट चरस गांजा कैसे पिया और लाया जाये।

8. गुंडागर्दी कर के हफ्ता वसूली करना।

9. भगवान का मजाक बनाना और अपमानित करना।

10. पूजा पाठ यज्ञ करना पाखण्ड है व नमाज पढ़ना ईश्वर की सच्ची पूजा है।

11. भारतीयों को अंग्रेज बनाना।

12. भारतीय संस्कृति को मूर्खता पूर्ण बताना और पश्चिमी संस्कृति को श्रेष्ठ बताना।

13. माँ बाप को वृध्दाश्रम छोड़ के आना।

14. गाय पालन को मज़ाक बनाना और कुत्तों को उनसे श्रेष्ठ बताना और पालना सिखाना।

15. रोटी हरी सब्ज़ी खाना गलत बल्कि रेस्टोरेंट में पिज़्ज़ा बर्गर कोल्ड ड्रिंक और नॉन वेज खाना श्रेष्ठ है।

16. चोटी रखना या यज्ञोपवित्र पहनना मूर्खता और मजाकीय है मगर बालो के अजीबो गरीब स्टाइल (गजनी) रखना व क्रॉस पहनना श्रेष्ठ है उससे आप सभ्य लगते है।

17. शुद्ध हिन्दी या संस्कृत बोलना हास्य वाली बात है। और अंग्रेजी बोलना सभ्य पढ़ा-लिखा और अमीरी वाली बात…

हमारे देश की युवा पीढ़ी बॉलीवुड को और उसके अभिनेता और अभिनेत्रियों का अपना आदर्श मानती है…..अगर यही बॉलीवुड देश की संस्कृति सभ्यता दिखाए ..तो यकीन मानिये हमारी युवा पीड़ी अपने रास्ते से कभी नही भटकेगी…समझिये..जानिए औए आगे बढिए…

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​वैदिक ऋषियों की ब्रह्माण्ड परिकल्पना और उसकी वैज्ञानिकता


​वैदिक ऋषियों की ब्रह्माण्ड परिकल्पना और  उसकी वैज्ञानिकता ।

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सृष्टि की उत्पति का कारण क्या है ? विभिन्न सृष्टियां किस उपादान के कारणों से प्रकट हुई? 

 देवगण भी इन सृष्टियों के पश्चात उत्पन्न हुए हैं, तब कौन जान सकता है कि यह सृष्टि कहां से उत्पन्न हुई? 

      सृष्टि रचना से पूर्व सब कुछ अज्ञात था । सब ओर जल ही जल था और वायु से शून्य । और आत्मा के अवलम्ब के श्वांस वाले ब्रह्मा ही थें । इन सृष्टियों के जो स्वामी हैं वह दिव्य धाम में निवास करते हैं । (ऋग्वेद सूक्त १२९) 

  इन सूक्तों के ऋषियों की जो परिकल्पनाएं हैं वह शुद्ध रुप से वैज्ञानिक चिन्तन है । इन ऋषियों ने सृष्टि रचना में जो अपनी जिज्ञासा प्रकट की है वह अन्वेषनीय है । ऋषियों का सृष्टि मूलक प्रश्न में उसका उत्तर भी साथ साथ ही है । 

    चूकिं ऋषि यह स्वीकारतें हैं कि “उस समय जल था और उस जल में वायु से शून्य और आत्मा के अवलम्ब के श्वास वाले ब्रह्म ही थे ।”

  ऋषि एक कदम और आगे बढकर कहते हैं कि “सृष्टि के रचयिता दिव्यधाम में निवास करते हैं।” लेकिन इसमें यह प्रश्न उठाना भी वैज्ञानिक पद्धति से सही है कि उस समय जल था तो उसका निर्माण कहाँ और कैसे हुआ ? वह ब्रह्म कौन था ? उसका क्या रुप था ? तथा सृष्टि के रचियता किस दिव्य धाम में रहते थें या रहते हैं ? 

  ऋग्वेद म० १० अ० १० सू १२१ में इस रहस्य को खोल दिया गया है कि ” सर्वप्रथम हिरण्यगर्भ उत्पन्न हुए । आकाश और पृथ्वी सहित हिमांच्छादित पर्वत समुद्र से युक्त उत्पन्न हुए जल से अग्नि और आकाश की उत्पति हुई । ” ये खगोलशास्त्रियों के लिए अन्वेषनीय है । 

  वहीं ब्रह्मपुराण में ब्रह्मा का वचन है कि ” पृथ्वी , जल , आकाश , अग्नि -ज्योति हमारे जन्म के पूर्व विद्यमान था ।” 

 ऋग्वेद भी स्वीकारता है कि “इस कल्प (श्वेत वाराह कल्प) में सूर्य , चन्द्र, पृथ्वी, अंतरिक्ष और रात्रि -दिन उसी प्रकार बनाये , जिस प्रकार पूर्व कल्पों में बनाये थें । ” इस बात की पुष्टि योगवशिष्ठ निर्वाण प्रकरण से भी होता है । जिसमें उल्लेख है कि ” पृथ्वी पांच बार अन्तर्धान हुई । पांचवे कल्प में (एक कल्प में ४ अरब ३ करोड वर्ष ) समुद्र से कूर्मावतार में पृथ्वी अवतरित हुई । 

 महाभारत शांतिपर्व में उल्लेख है कि “सातवीं बार ब्रह्माजी कमल से पद्यकल्प में अवतरित हुए । ”  वैज्ञानिक दृष्टि से इस कल्प का उम्र २ अरब आंका गया है । यानी वर्तमान सृष्टि रचना २ अरब वर्ष पूर्व से आ रही है । 

 ब्रह्माण्ड उत्पति की खोज में वैदिक सूक्तों पौराणिक आख्यानों में जो हमें संकेत मिलते हैं , उससे यह स्पष्ट हो जाता है कि हिरण्यगर्भ अर्थात स्वर्णगर्भ युक्त हेम अंड सृष्टि के आदि में स्वंय प्रकट होने वाला वृहताकार अण्डाकार मूल तत्व है  जिससे कि ब्रह्माण्ड की रचना होती है । 

  कूर्मपुराण में कहा गया है कि ” जल के मध्य भाग से बुलबुला के रुप में एक वृहत अण्ड उत्पन्न हुआ । इसी वृहत अण्ड में परम पुरुष कहलाने वाले मूल ब्रह्मा सर्वप्रथम उत्पन्न हुए । इसी ब्रह्मा को हंसा हिरण्यगर्भ कहा जाता है । इसी मूल ब्रह्मा को वेद भी हिरण्यगर्भ , सहस्त्रशिर से संबोधित किया गया ।” 

     अब यह अन्वेषनीय है कि वह सृष्टि के आदि में उत्पन्न होनेवाला हिरण्यमय अण्ड कहाँ और कब उत्पन्न हुआ ? 

        इस रहस्य को “पद्मपुराण सृष्टिकरण प्रकरण ” में खोला गया है कि ” सृष्टि का सर्जन करने के लिए सर्वप्रथम रत्नमय महान पर्वत का सृजन ब्रह्मा जी ने किया । जो इसी पृथ्वी मंडल के मध्यभाग में स्थित है और वह मन्दार उदयाचल त्रिकूट पर्वत ही है जो विश्व की सृष्टि के आदि में उत्पन्न हुआ । ”  

    “नरसिंहपुराण ” भूगोल खगोल वर्णन में भी यह कहा गया है कि ” भूमण्डल के मध्यभाग में पर्वतों का राजा मेरु है जो “हिरण्यमय “है ।  

   अत: यह स्पष्ट हो गया है कि वेद जिसे हिरण्यमय हेमअंड कहकर पुकारा है वह सृष्टि का आदि पर्वत अंगदेशान्तर्गत बिहार के बांका जिले में पडनेवाला “मंदार” और देवघर में पडनेवाला “त्रिकूट पर्वत ” ही है । साथ ही साथ उस परम पुरुष परमात्मा का दिव्यधाम भी इसी मंदार मेरु , सुमेरु, त्रिकूट को बताया गया है । 

      ” मन्दरमं चरमं चैव त्रिकूट मुदयाचलम् । अन्यांश्च पर्वातांश चैवन्विधानपि ।” 

 मत्स्यपुराण में यह स्पष्ट कर दिया गया है कि ” यह स्वर्णमय पर्वत पूर्व दिशा में फैला है  उसका दूसरा नाम उदयगिरि है । ” और विष्णुपुराण “पूर्वेणमन्दारो नाम:” कहकर समर्थन करता है । मत्स्यपुराण , विष्णुपुराण , अग्निपुराण, सहित ऋग्वेद भी स्वीकारता है कि “मन्दार ही स्वर्ग है , स्वर्गलोक व सूर्य का जन्म स्थान है ।” ऋषि नाभौनैदिष्ठ देवता विश्वदेव का कहना है कि ” मैं भी स्वर्गलोक में रहता हूं , मेरा जन्मस्थान यहीं है । ” 

(क)  ” मन्दार ……….प्रजापतिमुपादाय प्रजाभ्यो विद्यते स्वयम ” । 

(ख) “मेरोरुपरि विख्याता देवदेवस्य वेद्युस” 

(ग) ” ऊं यत्र देवा महेनाद्राद्या संस्थिता मेरु मूर्धिन ” । 

        

          जिस ब्रह्मा , विष्णु, शिव , दुर्गा सहित सरस्वती , आदित्य , सूर्य , वसु , मरुदगण , अग्निदेव और अश्विनी कुमार सदृश अदृश्य शक्तियों का गुणगान ऋग्वेद में भरा पडा है उन महाशक्तियों का निवास स्थान स्वर्गधाम दिव्यलोक “मंदार ” को ही बताया गया है ।  

    महाभारत खिलभाग हरिवंश पुराण के अनुसार भी मूल सरस्वती की उत्पति स्वर्गलोक मंदार से ही बताया गया है । इसमें कहा गया है कि ” सरस्वती मेरु पृष्ठ से मन्द गति से चलती हुई गिरिराज मंदराचल पर जा पहुंची । सरस्वती के साथ तेजस्वी आदित्य, वसु, रुद्र , रुद्रगण और अश्विनी कुमार के साथ साथ गन्धर्व , किन्नर , नाग और वरुण भी थे । ” 

   इसी तरह का वर्णन अनेक पुराण , उप पुराण , उपनिषद आदि वैदिक ग्रंथों में है । 

” ऋग्वेद ” में जल के बीच अमृत का वास बताया गया है , जल के बीच में ही सभी तरह के औषधियुक्त गुणयुक्त जल का वर्णन है । वहीं मत्स्यपुराण यह स्पष्ट कर देता है कि ” मेरु का नाम मंदार इसलिए है कि जो मंद धातु है वह जल रुप अर्थ को प्रकट करनेवाली है , जल का विदारण करके निकलने के कारण इस पर्वत को मंदार कहा गया है । ” महाभारत खिलभाग हरिवंशपुराण में नारायण का नाभिकमल मेरु मंदार को माना गया है । 

     अत: ब्रह्माण्ड की नाभि यही मेरु मंदार है जो अंगदेश में अभी भी उपेक्षित पडा हुआ है । यही वह क्षेत्र है जहां से ब्रह्माण्ड की रचना होती है ।