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रूपये का इतिहास


रूपये का इतिहास
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जरूर पढे
प्राचीन भारतीय मुद्रा प्रणाली*
फूटी कौड़ी (Phootie Cowrie) से कौड़ी,
कौड़ी से दमड़ी (Damri),
दमड़ी से धेला (Dhela),
धेला से पाई (Pie),
पाई से पैसा (Paisa),
पैसा से आना (Aana),
आना से रुपया (Rupya) बना।
256 दमड़ी = 192 पाई = 128 धेला = 64 पैसा (old) = 16 आना = 1 रुपया

1) 3 फूटी कौड़ी – 1 कौड़ी
2) 10 कौड़ी – 1 दमड़ी
3) 2 दमड़ी – 1 धेला
4) 1.5 पाई – 1 धेला
5) 3 पाई – 1 पैसा ( पुराना)
6) 4 पैसा – 1 आना
7) 16 आना – 1 रुपया

प्राचीन मुद्रा की इन्हीं इकाइयों ने हमारी बोल-चाल की भाषा को कई कहावतें दी हैं, जो पहले की तरह अब भी प्रचलित हैं। देखिए :
●एक ‘फूटी कौड़ी’ भी नहीं दूंगा।
●’धेले’ का काम नहीं करती हमारी बहू !
●चमड़ी जाये पर ‘दमड़ी’ न जाये।
●’पाई-पाई’ का हिसाब रखना।
●सोलह ‘आने’ सच

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शरद पूर्णिमा ( कोजागिरी) : Atri Pathak


शरद पूर्णिमा ( कोजागिरी) :

Atri Pathak

 
*15 अक्टूबर 2016 – शरद पूनम की रात दिलाये- आत्मशांति, स्वास्थ्यलाभ।*

आश्विन पूर्णिमा को ‘शरद पूर्णिमा’ या कोजागिरी भी बोलते हैं । इस दिन रास-उत्सव और कोजागर व्रत किया जाता है । गोपियों को शरद पूर्णिमा की रात्रि में भगवान श्रीकृष्ण ने बंसी बजाकर अपने पास बुलाया और ईश्वरीय अमृत का पान कराया था । अतः शरद पूर्णिमा की रात्रि का विशेष महत्त्व है । इस रात को चन्द्रमा अपनी पूर्ण कलाओं के साथ पृथ्वी पर शीतलता, पोषक शक्ति एवं शांतिरूपी अमृतवर्षा करता है ।

*शरद पूनम की रात को क्या करें, क्या न करें ?*

दशहरे से शरद पूनम तक चन्द्रमा की चाँदनी में विशेष हितकारी रस, हितकारी किरणें होती हैं । इन दिनों चन्द्रमा की चाँदनी का लाभ उठाना, जिससे वर्षभर आप स्वस्थ और प्रसन्न रहें । नेत्रज्योति बढ़ाने के लिए दशहरे से शरद पूर्णिमा तक प्रतिदिन रात्रि में 15 से 20 मिनट तक चन्द्रमा के ऊपर त्राटक करें ।

अश्विनी कुमार देवताओं के वैद्य हैं । जो भी इन्द्रियाँ शिथिल हो गयी हों, उनको पुष्ट करने के लिए चन्द्रमा की चाँदनी में खीर रखना और भगवान को भोग लगाकर अश्विनी कुमारों से प्रार्थना करना कि ‘हमारी इन्द्रियों का बल-ओज बढ़ायें ।’ फिर वह खीर खा लेना ।

*इस रात सूई में धागा पिरोने का अभ्यास करने से भी नेत्रज्योति बढ़ती है ।*

*शरद पूनम दमे की बीमारीवालों के लिए वरदान का दिन है।*

छोटी इलाईची को, चन्द्रमा की चाँदनी में रखी हुई खीर में मिलाकर खा लेना और रात को सोना नहीं । दमे का दम निकल जायेगा ।

चन्द्रमा की चाँदनी गर्भवती महिला की नाभि पर पड़े तो गर्भ पुष्ट होता है । शरद पूनम की चाँदनी का अपना महत्त्व है लेकिन बारहों महीने चन्द्रमा की चाँदनी गर्भ को और औषधियों को पुष्ट करती है।

अमावस्या और पूर्णिमा को चन्द्रमा के विशेष प्रभाव से समुद्र में ज्वार-भाटा आता है । जब चन्द्रमा इतने बड़े दिगम्बर समुद्र में उथल-पुथल कर विशेष कम्पायमान कर देता है तो हमारे शरीर में जो जलीय अंश है, सप्तधातुएँ हैं, सप्त रंग हैं, उन पर भी चन्द्रमा का प्रभाव पड़ता है । इन दिनों में अगर काम-विकार भोगा तो विकलांग संतान अथवा जानलेवा बीमारी हो जाती है और यदि उपवास, व्रत तथा सत्संग किया तो तन तंदुरुस्त, मन प्रसन्न और बुद्धि में नयापन आता है।

*खीर को बनायें अमृतमय प्रसाद*

खीर को रसराज कहते हैं । सीताजी को अशोक वाटिका में रखा गया था । रावण के घर का क्या खायेंगी सीताजी ! तो इन्द्रदेव उन्हें खीर भेजते थे।

खीर बनाते समय घर में चाँदी का गिलास आदि जो बर्तन हो, आजकल जो मेटल (धातु) का बनाकर चाँदी के नाम से देते हैं वह नहीं, असली चाँदी के बर्तन अथवा असली सोना धो-धा के खीर में डाल दो तो उसमें रजतक्षार या सुवर्णक्षार आयेंगे । लोहे की कड़ाही अथवा पतीली में खीर बनाओ तो लौह तत्त्व भी उसमें आ जायेगा।

इलायची, खजूर या छुहारा डाल सकते हो लेकिन बादाम, काजू, पिस्ता, चारोली ये रात को पचने में भारी पड़ेंगे ।

रात्रि 8 बजे महीन कपड़े से ढँककर चन्द्रमा की चाँदनी में रखी हुई खीर 11 बजे के आसपास भगवान को भोग लगा के प्रसादरूप में खा लेनी चाहिए । लेकिन देर रात को खाते हैं इसलिए थोड़ी कम खाना और खाने से पहले एकाध चम्मच ईश्वर के हवाले भी कर देना । मुँह अपना खोलना और भाव करना : ‘लो प्रभु ! आप भी लगाओ भोग ।’ और थोड़ी बच जाय तो फ्रिज में रख देना । सुबह गर्म करके खा सकते हो ।
(खीर दूध, चावल, मिश्री, चाँदी, चन्द्रमा की चाँदनी – इन पंचश्वेतों से युक्त होती है, अतः सुबह बासी नहीं मानी जाती ।)

*शरद पूनम का आत्मकल्याणकारी संदेश*

रासलीला इन्द्रियों और मन में विचरण करनेवालों के लिए अत्यंत उपयोगी है लेकिन राग, ताल, भजन का फल है भगवान में विश्रांति । रासलीला के बाद गोपियों को भी भगवान ने विश्रांति में पहुँचाया था । श्रीकृष्ण भी इसी विश्रांति में तृप्त रहने की कला जानते थे । संतुष्टि और तृप्ति सभीकी माँग है । चन्द्रमा की चाँदनी में खीर पड़ी-पड़ी पुष्ट हो और आप परमात्म-चाँदनी में विश्रांति पाओ ।
चन्द्रमा के दर्शन करते जाना और भावना करना कि ‘चन्द्रमा के रूप में साक्षात् परब्रह्म-परमात्मा की रसमय, पुष्टिदायक रश्मियाँ आ रही हैं । हम उसमें विश्रांति पा रहे हैं । पावन हो रहा है मन, पुष्ट हो रहा है तन, ॐ शांति… ॐ आनंद…’ पहले होंठों से, फिर हृदय से जप और शांति… निःसंकल्प ईश्वर में विश्रांति पाते जाना । परमात्म-विश्रांति, परमात्म-ज्ञान के बिना भौतिक सुख-सुविधाएँ कितनी भी मिल जायें लेकिन जीवात्मा की प्यास नहीं बुझेगी, तपन नहीं मिटेगी ।
देखें बिनु रघुनाथ पद जिय कै जरनि न जाइ । (रामायण)

श्रीकृष्ण गोपियों से कहते हैं कि ‘‘तुम प्रेम करते-करते बाहर-ही-बाहर रुक न जाओ बल्कि भीतरी विश्रांति द्वारा मुझ अपने अंतरात्मा प्रेमास्पद को भी मिलो, जहाँ तुम्हारी और हमारी दूरी खत्म हो जाती है । मैं ईश्वर नहीं, तुम जीव नहीं, हम सब ब्रह्म हैं – वह अवस्था आ जाय ।’’ श्रीकृष्ण जो कहते हैं, उसको कुछ अंश में समझकर हम स्वीकार कर लें, बस हो गया ।

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परी जैसी पुत्री प्राप्ति के लिए महत्वपूर्ण नियम


परी जैसी पुत्री प्राप्ति के लिए महत्वपूर्ण नियम :-

हमारे पुराने आयुर्वेद ग्रंथों में पुत्री प्राप्ति हेतु दिन-रात, शुक्ल पक्ष-कृष्ण पक्ष तथा माहवारी के दिन से सोलहवें दिन तक का महत्व बताया गया है। धर्म ग्रंथों में भी इस बारे में जानकारी मिलती है।

यदि आप पुत्री प्राप्त करना चाहते हैं और वह भी गुणवान, तो हम यहाँ माहवारी (Periods) के बाद की विभिन्न रात्रियों की महत्वपूर्ण जानकारी दे रहे हैं। यह गणना पीरियड्स खत्म होने के बाद स्नान करने के बाद से शुरू होती है।

* चौथी रात्रि के गर्भ से पैदा पुत्र अल्पायु और दरिद्र होता है।
* पाँचवीं रात्रि के गर्भ से जन्मी कन्या भविष्य में सिर्फ लड़की पैदा करेगी।
* छठवीं रात्रि के गर्भ से मध्यम आयु वाला पुत्र जन्म लेगा।
* सातवीं रात्रि के गर्भ से पैदा होने वाली कन्या बांझ होगी।
* आठवीं रात्रि के गर्भ से पैदा पुत्र ऐश्वर्यशाली होता है।
* नौवीं रात्रि के गर्भ से ऐश्वर्यशालिनी पुत्री पैदा होती है।
* दसवीं रात्रि के गर्भ से चतुर पुत्र का जन्म होता है।
* ग्यारहवीं रात्रि के गर्भ से चरित्रहीन पुत्री पैदा होती है।
* बारहवीं रात्रि के गर्भ से पुरुषोत्तम पुत्र जन्म लेता है।
* तेरहवीं रात्रि के गर्म से वर्णसंकर पुत्री जन्म लेती है।
* चौदहवीं रात्रि के गर्भ से उत्तम पुत्र का जन्म होता है।
* पंद्रहवीं रात्रि के गर्भ से सौभाग्यवती पुत्री पैदा होती है।
* सोलहवीं रात्रि के गर्भ से सर्वगुण संपन्न, पुत्र पैदा होता है।

व्यास मुनि ने इन्हीं सूत्रों के आधार पर पर अम्बिका, अम्बालिका तथा दासी के नियोग (समागम) किया, जिससे धृतराष्ट्र, पाण्डु तथा विदुर का जन्म हुआ। महर्षि मनु तथा व्यास मुनि के उपरोक्त सूत्रों की पुष्टि स्वामी दयानंद सरस्वती ने अपनी पुस्तक ‘संस्कार विधि’ में स्पष्ट रूप से कर दी है। प्राचीनकाल के महान चिकित्सक वाग्भट तथा भावमिश्र ने महर्षि मनु के उपरोक्त कथन की पुष्टि पूर्णरूप से की है।

* दो हजार वर्ष पूर्व के प्रसिद्ध चिकित्सक एवं सर्जन सुश्रुत ने अपनी पुस्तक सुश्रुत संहिता में स्पष्ट लिखा है कि मासिक स्राव के बाद 4, 6, 8, 10, 12, 14 एवं 16वीं रात्रि के गर्भाधान से पुत्र तथा 5, 7, 9, 11, 13 एवं 15वीं रात्रि के गर्भाधान से कन्या जन्म लेती है।

* 2500 वर्ष पूर्व लिखित चरक संहिता में लिखा हुआ है कि भगवान अत्रिकुमार के कथनानुसार स्त्री में रज की सबलता से पुत्री तथा पुरुष में वीर्य की सबलता से पुत्र पैदा होता है।

* प्राचीन संस्कृत पुस्तक ‘सर्वोदय’ में लिखा है कि गर्भाधान के समय स्त्री का दाहिना श्वास चले तो पुत्री तथा बायां श्वास चले तो पुत्र होगा।

* यूनान के प्रसिद्ध चिकित्सक तथा महान दार्शनिक अरस्तु का कथन है कि पुरुष और स्त्री दोनों के दाहिने अंडकोष से लड़का तथा बाएं से लड़की का जन्म होता है।

* चन्द्रावती ऋषि का कथन है कि लड़का-लड़की का जन्म गर्भाधान के समय स्त्री-पुरुष के दायां-बायां श्वास क्रिया, पिंगला-तूड़ा नाड़ी, सूर्यस्वर तथा चन्द्रस्वर की स्थिति पर निर्भर करता है।

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ऋण विमोचन नरसिंह स्तोत्रं


*ऋण विमोचन नरसिंह स्तोत्रं*
🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩
देवता कार्य सिद्धर्थं सभास्तंभ समुद्भवं
श्रीनृसिंह महावीरं नमामि ऋण मुक्तये |१|

लक्ष्म्यांकित वामनांग भक्तानाम वरदायकं
श्रीनृसिंह महावीरं नमामि ऋण मुक्तये |२|

अंतरमालाधरं शंखचक्र ब्ज्यायुध धारीणं
श्रीनृसिंह महावीरं नमामि ऋण मुक्तये |३|

स्मरणात सर्व पापघ्नं खद्रूज सर्व विष नाशनं
श्रीनृसिंह महावीरं नमामि ऋण मुक्तये |४|

सिंहनाथेन महता दिग्दंती भयनाशनं
श्रीनृसिंह महावीरं नमामि ऋण मुक्तये |५|

प्रल्हाद वरदं श्रीसं, दत्यैश्वर विदारीणं
श्रीनृसिंह महावीरं नमामि ऋण मुक्तये |६|

वेद वेदातं यज्ञेशं ब्रंम्ह रुद्रादी वंदितं
श्रीनृसिंह महावीरं नमामि ऋण मुक्तये |७|

क्रूरग्रह पीडितां भक्तानाम अभय प्रदं
श्रीनृसिंह महावीरं नमामि ऋण मुक्तये |८|

य ईंदं पढते नित्यं ऋण मोचन संहितं
अण्रुनी जायते सध्यय धनं शिध्रमाप्नुयात |९|

ॐ, श्री लक्ष्मिनृसिंह स्वामी कृपा कटाक्ष पुर्वार्थं
श्री ——— यजमान शिघ्रमेव ऋण विमोचन प्राप्तीर सिद्धीरस्तू |१०|

ॐ उग्रं वीरं महाविष्णूं ज्वलंतं सर्वतोमुखं
नृसिंह भिषणं भद्रं मृत्यू मृत्यूं नमाम्यगं |११|

*|| ॐ ||*

*टीपः*

*१. ज्या भाविकांना कर्जाचा त्रास* *आहे अश्यांनी ८, १८, ३२ अथवा १०८ वेळा दररोज पाठ केल्यास*

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शास्त्रीय वशीकरण उपाय से ,अब आप किसी को भी वश में कर सकते हैं


शास्त्रीय वशीकरण उपाय से ,अब आप किसी को भी वश में कर सकते हैं :

परमेश्वर ने अपने प्रकृति स्वरूप में लिंग भेद कर स्त्री व पुरुष की उत्पत्ति करी ताकि संसार में प्रणय के आधार पर सृजन व प्रजनन हो पाए. परमेश्वर ने स्त्री-पुरुष को एक-दूसरे का पूरक बनाया है, जिसके चलते उनके बीच आत्मिक, मानसिक व शारीरिक आकर्षण विकसित होता है. वैज्ञानिक आधार पर भी विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण उत्पन्न होना स्वाभाविक है. विज्ञान के अंतर्गत आकर्षण के सिद्धांत को (Law Of Attraction) कहा गया है. आकर्षण का सिद्धांत नया नहीं है. आदिकाल से आकर्षण के सिद्धांत को हमारे ऋषि-मुनियों ने समझाया है. ज्योतिषशास्त्र के अनुसार ग्रह-नक्षत्रों के चुम्बकीय प्रभाव ही विचारों की आवृति को बदलते हैं क्योंकि हम सभी जीव प्रकृति के ही अंश हैं. हमारे अंदर भी प्रकृति के कई खनिज मौजूद हैं.

तंत्र शास्त्र में आकर्षण के अनेक प्रयोग बताए गए हैं. आकर्षण के प्रयोग मानव की मनोवैज्ञानिक स्थितियों को ध्यान में रखकर बनाये गए थे. तंत्र शास्त्र में वर्णित आकर्षण के प्रयोग सफल विवाहित जीवन की नींव भी साबित होते है. आकाश में बिखरी हुई अच्छी और बुरी शक्तियों को एकत्रित कर उस बढ़ी हुई शक्ति से किसी व्यक्ति को प्रभावित करने की कला वशीकरण कहलाता है, यह कोई बुरा कार्य नहीं है परन्तु इसे बुरी नजर से देखा जाता है, क्योंकि इसका नाम तंत्र से जुड़ा है. किसी भी स्त्री या पुरुष के मन और शरीर को अपने वश में करने की अदभुद शक्ति वशीकरण कहलाती है. वशीकरण एक असामान्य तंत्र के साथ-साथ एक विज्ञान है. वशीकरण तंत्र को पाना मुश्किल है परंतु असंभव नहीं है.

जीवन की कठिन से कठिन समास्याओं का तुरंत समाधान वशीकरण द्वारा संभव व आसन है जैसे प्यार, प्रेम विवाह, जीवन उदाहरण के रूप में कठिन समस्या के लिए, ग्रहक्लेश, पति-पत्नि अनबन, दुश्मन से छुटकारा, पति-पत्नी का रिश्ता, अदालत के मामले, प्रेम विवाह, नि:संतान के रूप में समस्या, शारीरिक समस्या, परिवार में समस्या, विवाह में रुकावट, ऋण होना, प्रेम में असफलता के लिए वशीकरण का प्रयोग किया जाता है. इस लेख के माध्यम से हम अपने पाठकों को बता रहे हैं की जीवन में सकारात्मकता हेतु किसी को अपने वश में कैसे किया जाए. इस उद्देश हेतु आपको शास्त्रीय उपाय बताने जा रहे हैं, जिससे आप अपने इर्द-गिर्द के लोगों को विशिष्ट सामाग्री गुंजा (चिरमी बीज) के प्रयोग से अपने प्रति आकर्षित कर सकते हैं.

गुंजा एक प्रकार की लता का बीज है जिसका प्रयोग तांत्रिक क्रियाओं हेतु होता है. यह लाल व काले रंग का मिलता है. काले रंग की गुंजा बहुत खास मानी गई है. जिस भी व्यक्ति के पास यह गुंजा होती है, अगर उस पर कोई मुसीबत आने वाली होती है तो इसका रंग स्वत: ही बदल जाता है. जीवनसाथी को आकर्षित करने हेतु उनका नाम नाम स्मरण करते हुए, मिट्टी के एक दीपक में शहद डालकर उसमें गुंजा के पांच दाने डालकर रख दें। आप जिस भी व्यक्ति को वशीभूत करना चाहते हैं उसके कपड़ों में गुंजा के दाने अभिमंत्रित करके रख दें. जब तक वे दाने उस व्यक्ति के कपड़े से बंधे रहेंगे वह वशीकरण के प्रभाव में रहेगा. सामूहिक वशीकरण के लिए गुंजा की माला धारण करनी चाहिए. यह दूसरों पर अच्छा प्रभाव डालता है.

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मृतसञ्जीवन स्तोत्रम्


मृतसञ्जीवन स्तोत्रम् ╭დ

एवमारध्य गौरीशं देवं मृत्युञ्जयमेश्वरं |
मृतसञ्जीवनं नाम्ना कवचं प्रजपेत् सदा ||

सारात् सारतरं पुण्यं गुह्याद्गुह्यतरं शुभं |
महादेवस्य कवचं मृतसञ्जीवनामकं ||

समाहितमना भूत्वा शृणुष्व कवचं शुभं |
शृत्वैतद्दिव्य कवचं रहस्यं कुरु सर्वदा ||

वराभयकरो यज्वा सर्वदेवनिषेवितः |
मृत्युञ्जयो महादेवः प्राच्यां मां पातु सर्वदा ||

दधाअनः शक्तिमभयां त्रिमुखं षड्भुजः प्रभुः |
सदाशिवोऽग्निरूपी मामाग्नेय्यां पातु सर्वदा ||

अष्टदसभुजोपेतो दण्डाभयकरो विभुः |
यमरूपि महादेवो दक्षिणस्यां सदावतु ||

खड्गाभयकरो धीरो रक्षोगणनिषेवितः |
रक्षोरूपी महेशो मां नैरृत्यां सर्वदावतु ||

पाशाभयभुजः सर्वरत्नाकरनिषेवितः |
वरुणात्मा महादेवः पश्चिमे मां सदावतु ||

गदाभयकरः प्राणनायकः सर्वदागतिः |
वायव्यां मारुतात्मा मां शङ्करः पातु सर्वदा ||

शङ्खाभयकरस्थो मां नायकः परमेश्वरः |
सर्वात्मान्तरदिग्भागे पातु मां शङ्करः प्रभुः ||

शूलाभयकरः सर्वविद्यानमधिनायकः |
ईशानात्मा तथैशान्यां पातु मां परमेश्वरः ||

ऊर्ध्वभागे ब्रःमरूपी विश्वात्माऽधः सदावतु |
शिरो मे शङ्करः पातु ललाटं चन्द्रशेखरः ||

भूमध्यं सर्वलोकेशस्त्रिणेत्रो लोचनेऽवतु |
भ्रूयुग्मं गिरिशः पातु कर्णौ पातु महेश्वरः ||

नासिकां मे महादेव ओष्ठौ पातु वृषध्वजः |
जिह्वां मे दक्षिणामूर्तिर्दन्तान्मे गिरिशोऽवतु ||

मृतुय्ञ्जयो मुखं पातु कण्ठं मे नागभूषणः |
पिनाकि मत्करौ पातु त्रिशूलि हृदयं मम ||

पञ्चवक्त्रः स्तनौ पातु उदरं जगदीश्वरः |
नाभिं पातु विरूपाक्षः पार्श्वौ मे पार्वतीपतिः ||

कटद्वयं गिरीशौ मे पृष्ठं मे प्रमथाधिपः |
गुह्यं महेश्वरः पातु ममोरू पातु भैरवः ||

जानुनी मे जगद्दर्ता जङ्घे मे जगदम्बिका |
पादौ मे सततं पातु लोकवन्द्यः सदाशिवः ||

गिरिशः पातु मे भार्यां भवः पातु सुतान्मम |
मृत्युञ्जयो ममायुष्यं चित्तं मे गणनायकः ||

सर्वाङ्गं मे सदा पातु कालकालः सदाशिवः |
एतत्ते कवचं पुण्यं देवतानां च दुर्लभम् ||

मृतसञ्जीवनं नाम्ना महादेवेन कीर्तितम् |
सह्स्रावर्तनं चास्य पुरश्चरणमीरितम् ||

यः पठेच्छृणुयान्नित्यं श्रावयेत्सु समाहितः |
सकालमृत्युं निर्जित्य सदायुष्यं समश्नुते ||

हस्तेन वा यदा स्पृष्ट्वा मृतं सञ्जीवयत्यसौ |
आधयोव्याध्यस्तस्य न भवन्ति कदाचन ||

कालमृयुमपि प्राप्तमसौ जयति सर्वदा |
अणिमादिगुणैश्वर्यं लभते मानवोत्तमः ||

युद्दारम्भे पठित्वेदमष्टाविशतिवारकं |
युद्दमध्ये स्थितः शत्रुः सद्यः सर्वैर्न दृश्यते ||

न ब्रह्मादीनि चास्त्राणि क्षयं कुर्वन्ति तस्य वै |
विजयं लभते देवयुद्दमध्येऽपि सर्वदा ||

प्रातरूत्थाय सततं यः पठेत्कवचं शुभं |
अक्षय्यं लभते सौख्यमिह लोके परत्र च ||

सर्वव्याधिविनिर्मृक्तः सर्वरोगविवर्जितः |
अजरामरणो भूत्वा सदा षोडशवार्षिकः ||

विचरव्यखिलान् लोकान् प्राप्य भोगांश्च दुर्लभान् |
तस्मादिदं महागोप्यं कवचम् समुदाहृतम् ||

मृतसञ्जीवनं नाम्ना देवतैरपि दुर्लभम् ||

|| इति वसिष्ठ कृत मृतसञ्जीवन स्तोत्रम् ||

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શા માટે રાખવામાં આવે છે ચોટલી, શું તમે જાણો છો? – Vadajkar-Atri Pathak


Vadajkar-Atri Pathak

 

શા માટે રાખવામાં આવે છે ચોટલી, શું તમે જાણો છો?
……..
સામાન્ય રીતે આપણે જોતા હોઈએ છીએ કે સાધુઓને કાં
તો જટા હોય છે કાં તો મૂંડનમાં ચોટી હોય છે.
…………
આ ઉપરાંત મોટાભાગે કર્મકાંડ કરાવતા બ્રાહ્મણો કે જ્યોતિષીઓ ચોટલી રાખતા હોય છે. ત્યારે આપણને પ્રશ્ન થાય કે આ ચોટલી શા માટે રાખવામાં આવતી હોય છે? તો આજે મેળવીએ આ પરંપરાનો પ્રશ્નનો જવાબ…. ચોટલીને સંસ્કૃતમાં શિખા કહેવામાં આવે છે. શિખા રાખવાના, શિખા પર ગાંઠબાંધવા માટેના, તેને છોડવાના વિશિષ્ટ નિયમો અને સમય હોય છે.
પ્રાચીન કાલથી હમણાં સુધી મોટાભાગના લોકો આ
નિયમો પાળતા હતા. ધીરે ધીરે ચોટલી જ મૃતઃપ્રાય થઈ
ચુકી છે છતાં કેવા નિયમો હતા એક સમયે તે વિશે જાણીએ.
જ્યારે યજ્ઞોપવિત એટલે કે જનોઈ વિધિ કરવામાં આવે છે ત્યારે બાળકના
માથા પર મૂંડન કરવામાં આવે છે અને તે મૂંડન વખતે માથાની બરોબર
વચ્ચેના ભાગમાં શિખા રાખવામાં આવે છે. આ શિખા રાખ્યા પછી શિખાને માતા-
પિતાએ પ્રથમ વાર ઘી લગાડીને તેનો મંત્ર બોલવો ત્યાર
બાદ ગુરુ શિષ્યને તે મંત્રની દીક્ષા આપે છે અને શિખા પર ગાંઠ
બાંધી આપે છે. આવી એક યજ્ઞોપવિત વિધિ વખતની
ક્રિયા છે.
– મંત્ર પ્રયોગાદિ બધા કર્મ શિખા બાંઘીને કરવા જોઈએ.
શાસ્ત્રકારોને પણ શિખા (ચોટી)નું મહત્વ કહ્યું છે.
શાસ્ત્રકારોએ શિખા એટલે કે ચોટી ન હોય તો કુશની
બનાવવાનું કહ્યું છે પણ કર્મકાંડ વખતે તેનું મહત્વ ઘણું છે. તેને
ઈન્દ્રયોનિ પણ કહે છે. તેમાં ત્રણ દેવોઃ બ્રહ્મા, વિષ્ણુ, મહેશ આ
ત્રણ દેવોનો તેમાં વાસ છે અને તેને ગાંઠ વાળવામાં આવે છે તેને
બ્રહ્મની ગાંઠ કહેવામાં આવે છે.
યોગી લોકો તેને સુષુમ્ણાનું મૂળ સ્થાન કહે છે. આપણા
શરીરમાં ત્રણ મુખ્ય નાડીઓ આવેલી છે ઈડા, પિંગલા અને
સુષુમ્ણા. ઈડા અને પિંગલામાં લોહીનું પરિભ્રમણ થતું હોય છે પણ
સુષુમ્ણાનું દ્વાર ગુદાથી બંદ હોય છે. જો આ દ્વાર ખૂલી જાય
તો આ નાડમાં પરિભ્રમણ ચાલુ થઈ જાય છે અને અનેક શક્તિઓ પ્રાપ્ત
થાય છે. અને તે સુષુમ્ણાનું જ્યાં મૂળ છે તેને બ્રહ્મરંધ્ર કહે છે આ
બ્રહ્મરંધ્રના બહારના ભાગ પર શિખા રાખવામાં આવે છે જેતી તેનું રક્ષણ
થાય છે અને તે માનવશરીરના ગુપ્ત સ્થાનનું શિખા દ્વારા રક્ષણ કરી
શકાય છે.
આયુર્વેદમાં શિખાનું મહત્વ
યોગમાં શિખાનું મહત્વ
આયુર્વેદ શિખા સ્થાનને મસ્તિષ્ક સ્થાન કહે છે. આયુર્વેદ કહે છે કે જે
વ્યક્તિ આ સ્થાનને હવા, ગરમી, ઠંડી, લાગવા કે ભટકાવવાથી
બચાવી લે છે તે જીવનના આરોગ્યની અડધી જંગ
જીતી જાય છે. કારણ કે તે ભાગ જેટલો કઠોર છે તેટલો
અસર કારક અને મુલાયમ પણ છે.
– મંત્ર વગર ક્યારેય શિખા બાંધવી ન જોઈએ. શિખા બાંધવાનો મંત્ર
છે –
ॐ चिद्रूपिणि महामाये, दिव्यतेजः समन्विते ।। तिष्ठ देवि शिखामध्ये,
तजोवृद्धिं कुरुष्व मे ॥
જો આપ કોઈ મંત્રની સાધના કરતા હોય કે પછી
યંત્રની કે તંત્રની પૂજા વિધિ કરતા રહેતા હોય તો શિખા બંધન
ખાસ જરૂરી છે.
શિખા ક્યારે બાંધવીને ક્યારે છોડવી તે જાણો
-દાન, જપ, હોમ, સંધ્યા, દેવપૂજા વગેરે કાર્ય શિખા બાંધીને કરવા
જોઈએ…
-સૂતી વખતે, સ્ત્રી સંગ કરી રહ્યા હોય ત્યારે, ભોજન
સમયે દાંતણ કરતા હોય ત્યારે શિખા ખુલી રાખવી જોઈએ.
-શિખા એટલે કે ચોટલી વિશેના હિન્દુ ધર્મશાસ્ત્રોમાંથી આવા
ઉલ્લેખો મળી આવે છે.

Posted in भारतीय उत्सव - Bhartiya Utsav

करवाचौथ


करवाचौथ

सुहागिनें हर साल अपने पति की लंबी उम्र की कामना में करवाचौथ का व्रत रखती हैं.

आइए सबसे पहले आपको बताते हैं कि कौन से योग इस करवाचौथ को दिव्य और चमत्कारी बना रहे हैं….
– करवा चौथ का त्यौहार इस बार बुधवार को मनाया जा रहा है.
– बुधवार को शुभ कार्तिक मास का रोहिणी नक्षत्र है.
– इस दिन चन्द्रमा अपने रोहिणी नक्षत्र में रहेंगे.
– इस दिन बुध अपनी कन्या राशि में रहेंगे.
– इसी दिन गणेश चतुर्थी और कृष्ण जी की रोहिणी नक्षत्र भी है.
– बुधवार गणेश जी और कृष्ण जी दोनों का दिन है.
– ये अद्भुत संयोग करवाचौथ के व्रत को और भी शुभ फलदायी बना रहा है.
– इस दिन पति की लंबी उम्र के साथ संतान सुख भी मिल सकता है.

करवाचौथ क्यों है इतना खास
कहते हैं जब पांडव वन-वन भटक रहे थे तो भगवान श्री कृष्ण ने द्रौपदी को इस दिव्य व्रत के बारे बताया था. इसी व्रत के प्रताप से द्रौपदी ने अपने सुहाग की लंबी उम्र का वरदान पाया था.

आइए जानें, इस दिन किन देवी-देवताओं की पूजा की जाती है और इस व्रत से कौन-कौन से वरदान पाए जा सकते हैं….
– करवाचौथ के दिन श्री गणेश, मां गौरी और चंद्रमा की पूजा की जाती है.
– चंद्रमा पूजन से महिलाओं को पति की लंबी उम्र और दांपत्य सुख का वरदान मिलता है.
– विधि-विधान से ये पर्व मनाने से महिलाओं का सौंदर्य भी बढ़ता है.
– करवाचौथ की रात सौभाग्य प्राप्ति के प्रयोग का फल निश्चित ही मिलता है.

करवा चौथ के व्रत के नियम और सावधानियां
ज्योतिष के जानकारों की मानें तो इस बार करवाचौथ का ये व्रत हर सुहागिन की जिंदगी संवार सकता है, लेकिन इसके लिए इस दिव्य व्रत से जुड़े नियम और सावधानियों का ध्यान रखना बेहद जरूरी है. आइए जानते हैं कि इस अद्भुत संयोग वाले करवाचौथ के व्रत में क्या करें और क्या ना करें…
– केवल सुहागिनें या जिनका रिश्ता तय हो गया हो वही स्त्रियां ये व्रत रख सकती हैं.
– व्रत रखने वाली स्त्री को काले और सफेद कपड़े कतई नहीं पहनने चाहिए.
– करवाचौथ के दिन लाल और पीले कपड़े पहनना विशेष फलदायी होता है.
– करवाचौथ का व्रत सूर्योदय से चंद्रोदय तक रखा जाता है.
– ये व्रत निर्जल या केवल जल ग्रहण करके ही रखना चाहिए.
– इस दिन पूर्ण श्रृंगार और अच्छा भोजन करना चाहिए.
– पत्नी के अस्वस्थ होने की स्थिति में पति भी ये व्रत रख सकते हैं.

करवाचौथ व्रत की उत्तम विधि
आइए जानें, करवाचौथ के व्रत और पूजन की उत्तम विधि के बारे जिसे करने से आपको इस व्रत का 100 गुना फल मिलेगा…
– सूर्योदय से पहले स्नान कर के व्रत रखने का संकल्पत लें. – फिर मिठाई, फल, सेंवई और पूड़ी वगैरह ग्रहण करके व्रत शुरू करें.
– फिर संपूर्ण शिव परिवार और श्रीकृष्ण की स्थापना करें.
– गणेश जी को पीले फूलों की माला, लड्डू और केले चढ़ाएं.
– भगवान शिव और पार्वती को बेलपत्र और श्रृंगार की वस्तुएं अर्पित करें.
– श्री कृष्ण को माखन-मिश्री और पेड़े का भोग लगाएं.
– उनके सामने मोगरा या चन्दन की अगरबत्ती और घी का दीपक जलाएं.
– मिटटी के कर्वे पर रोली से स्वस्तिक बनाएं.
– कर्वे में दूध, जल और गुलाबजल मिलाकर रखें और रात को छलनी के प्रयोग से चंद्र दर्शन करें और चन्द्रमा को अर्घ्य दें.
– इस दिन महिलाएं सोलह श्रृंगार जरूर करें, इससे सौंदर्य बढ़ता है.
– इस दिन करवा चौथ की कथा कहनी या फिर सुननी चाहिए.
– कथा सुनने के बाद अपने घर के सभी बड़ों का चरण स्पर्श करना चाहिए.
– फिर पति के पैरों को छूते हुए उनका आर्शिवाद लें.
– पति को प्रसाद देकर भोजन कराएं और बाद में खुद भी भोजन करें.

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वास्तुशास्त्र :अमीर बनने का ख्वाब हैं तो जल्द हटा दें घर की ये चीजें


वास्तुशास्त्र :अमीर बनने का ख्वाब हैं तो जल्द हटा दें घर की ये चीजें

हो सकता है आपके घर में कुछ ऐसा हो जो आपके धन के आगमन से ज्यादा उसके व्यय का जिम्मेदार हैं। आपको शायद यह बात पता ना हो लेकिन वास्तुशास्त्र के अनुसार घर में कुछ ऐसी अनचाही चीजें आजाती हैं जिनकी वजह से परिवार को निर्धनता का सामना करना पड़ता है।

कबूतर का घोंसला :
वास्तुशास्त्र के अनुसार घर में कबूतर का घोंसला अस्थिरता के हालात पैदा करता है और साथ ही निर्धनता को भी आमंत्रण देता है। अगर आपके घर में ऐसा कुछ है तो जल्द से जल्द इसे हटाने का प्रयास करें।

मधुमक्खी का छत्ता :
शहद की मक्खी का डंक तो वैसे ही खतरनाक होता है, लेकिन घर में इसका बनाया हुआ घोंसला नकारात्मक परिणाम देता है। घर के भीतर इसकी मौजूदगी एक अशुभ संकेत है।

मकड़ी का जाल :-
घर में मकड़ी क जाल बुनना दुर्भाग्य की निशानी है। इसे जल्द से जल्द हटवाएं और आगे से ऐसा ना हो इसके लिए घर की साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखें।

टूटा शीशा :
घर में टूटा हुआ शीशा ना सिर्फ वास्तु के नियमों के विरुद्ध है बल्कि ये पूरे प्रभाव के साथ नकारात्मक ऊर्जा को प्रवेश करने के लिए रास्ता भी देता है।

चमगादड़ :
चमगादड़ का दिखना बहुत अशुभ माना जाता है। अगर घर में यह प्रवेश कर जाए तो यह दुर्भाग्य, निर्धनता के साथ-साथ बुरे स्वास्थ्य का भी परिचायक है।

दीवारों पर निशान :
अगर आपके घर की दीवारों पर निशान पड़ गए हैं, उनकी पपड़ी उतरने लगी है तो जल्द से जल्द उसे ठीक करवाएं। यह दुर्भाग्य और निर्धनता को आकर्षित करते हैं।

पानी का टपकना :
अगर आपके घर के किसी भी नल्के या फिर टंकी में से पानी टपकता है तो इसका आश्य है कि आपके घर से धन का अत्याधिक व्यय हो रहा है। इन्हें हमेशा बंद रखें और टंकियों में से पानी का टपना ठीक करवाएं।

छत की सफाई :
अकसर घरों में छत का उपयोग बेकार पड़े सामान को रखने के लिए किया जाता है। लेकिन ऐसा करना धन के आगमन के लिए बाधक साबित होता है। छत हमेशा साफ रखने का प्रयत्न करना चाहिए।

सूखे फूल :-
घर की सजावट के लिए कभी सूखे फूलों का प्रयोग नहीं करना चाहिए। अगर आपको फूल पसंद हैं तो हमेशा प्राकृतिक खुशबूदार फूलों को ही घर में रखें।

बिजली का सामान :
अगर बिजली का कोई सामान कार्यरत नहीं है या खराब है तो उसे जल्द से जल्द ठीक करवाएं या घर से बाहर कर दें।

सूखी पत्तियां :
अगर आपके घर में लगे पौधों पर सूखी पत्तियां नजर आने लगी है तो उनकी कटाई करने में समय ना लगाएं। घर में लगे पौधों को हमेशा हरा-भरा रखें।

उपाय :-
ये उपाय आपके घर में धन का प्रवेश करने का मार्ग तो खोलेंगे ही साथ ही बाधाओं को भी समाप्त करेंगे।

Posted in मंत्र और स्तोत्र

अष्टलक्ष्मी स्तोत्रम्


अष्टलक्ष्मी स्तोत्रम् ..
.. आदिलक्ष्मी ..
सुमनसवन्दित सुन्दरि माधवि
चन्द्र सहोदरि हेममये .
मुनिगणमण्डित मोक्षप्रदायिनि
मञ्जुळभाषिणि वेदनुते ..
पङ्कजवासिनि देवसुपूजित
सद्गुणवर्षिणि शान्तियुते .
जयजय हे मधुसूदन कामिनि
आदिलक्ष्मि सदा पालय माम् .. १..

.. धान्यलक्ष्मी ..
अहिकलि कल्मषनाशिनि कामिनि
वैदिकरूपिणि वेदमये .
क्षीरसमुद्भव मङ्गलरूपिणि
मन्त्रनिवासिनि मन्त्रनुते ..
मङ्गलदायिनि अम्बुजवासिनि
देवगणाश्रित पादयुते .
जयजय हे मधुसूदन कामिनि
धान्यलक्ष्मि सदा पालय माम् .. २..

.. धैर्यलक्ष्मी ..
जयवरवर्णिनि वैष्णवि भार्गवि
मन्त्रस्वरूपिणि मन्त्रमये .
सुरगणपूजित शीघ्रफलप्रद
ज्ञानविकासिनि शास्त्रनुते ..
भवभयहारिणि पापविमोचनि
साधुजनाश्रित पादयुते .
जयजय हे मधुसूदन कामिनि
धैर्यलक्ष्मि सदा पालय माम् .. ३..

.. गजलक्ष्मी ..
जयजय दुर्गतिनाशिनि कामिनि
सर्वफलप्रद शास्त्रमये .
रथगज तुरगपदादि समावृत
परिजनमण्डित लोकनुते ..
हरिहर ब्रह्म सुपूजित सेवित
तापनिवारिणि पादयुते .
जयजय हे मधुसूदन कामिनि
गजलक्ष्मि रूपेण पालय माम् .. ४..

.. सन्तानलक्ष्मी ..
अहिखग वाहिनि मोहिनि चक्रिणि
रागविवर्धिनि ज्ञानमये .
गुणगणवारिधि लोकहितैषिणि
स्वरसप्त भूषित गाननुते ..
सकल सुरासुर देवमुनीश्वर
मानववन्दित पादयुते .
जयजय हे मधुसूदन कामिनि
सन्तानलक्ष्मि त्वं पालय माम् .. ५..

.. विजयलक्ष्मी ..
जय कमलासनि सद्गतिदायिनि
ज्ञानविकासिनि गानमये .
अनुदिनमर्चित कुङ्कुमधूसर-
भूषित वासित वाद्यनुते ..
कनकधरास्तुति वैभव वन्दित
शङ्कर देशिक मान्य पदे .
जयजय हे मधुसूदन कामिनि
विजयलक्ष्मि सदा पालय माम् .. ६..

.. विद्यालक्ष्मी ..
प्रणत सुरेश्वरि भारति भार्गवि
शोकविनाशिनि रत्नमये .
मणिमयभूषित कर्णविभूषण
शान्तिसमावृत हास्यमुखे ..
नवनिधिदायिनि कलिमलहारिणि
कामित फलप्रद हस्तयुते .
जयजय हे मधुसूदन कामिनि
विद्यालक्ष्मि सदा पालय माम् ..७..

.. धनलक्ष्मी ..
धिमिधिमि धिंधिमि धिंधिमि धिंधिमि
दुन्दुभि नाद सुपूर्णमये .
घुमघुम घुंघुम घुंघुम घुंघुम
शङ्खनिनाद सुवाद्यनुते ..
वेदपुराणेतिहास सुपूजित
वैदिकमार्ग प्रदर्शयुते .
जयजय हे मधुसूदन कामिनि
धनलक्ष्मि रूपेण पालय माम् .. ८..