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श्वेत दाग अर्थात ल्यूकोडर्मा


त दाग का उपचार | Shwet Daag
अजय अवस्थी

सफेद दाग
*श्वेत दाग अर्थात ल्यूकोडर्मा. ल्यूकोडर्मा शब्द डॉक्टरी भाषा में प्रयोग किया जाता है.  हमारी त्वचा में मेलोनिन तत्व मौजूद होता है. जब हमारी त्वचा के हिस्से में से यह तत्व नष्ट हो जाता है तब हमारी त्वचा का वह हिस्सा श्वेत (सफेद) पड़ जाता है. इन धब्बों का सम्बन्ध हमारी त्वचा के रंग पर निर्भर करता सांवली रंग की त्वचा में मेलोनिन तत्व अधिक मात्रा में होता है जिसके कारण अपेक्षाकृत धब्बे अधिक होते है. श्वेत दागों का होना कोई छूत का रोग नहीं है और न ही यह कोई वंशानुगत रोग है. यह बीमारी सरीर में किसी प्रकार का कष्ट नहीं देती बल्कि केवल मानसिक पीड़ा ही देता है. यह रोग पिगमेंट मेलानिन तत्व की कमी के कारण होता है जो बॉडी की त्वचा को नेचुरल कलर देता है *

श्वेत दागों को से छुटकारा पाने के लिए डॉक्टर दाग के चारों ओर कार्बोलिक एसिड का घोल लगाने का परामर्श देते है. इसके अलावा आप आयुर्वेदिक उपायों का इस्तेमाल करके भी श्वेत दाग को दूर कर सकते है. आयुर्वेद में बावर्ची के तेल से मालिश करने का सुझाव दिया जाता है. इसके नियमित मालिश के फलस्वरूप कई बार दाग-दार त्वचा धीरे-धीरे सामान्य त्वचा का रूप लेने लगती है. बावर्ची के तेल से मालिश एक कारगर उपाय है. इसके अलावा प्राक्रतिक चिकित्सा द्वारा भी श्वेत दागों को दूर कर सकती है परन्तु प्राक्रतिक चिकित्सा अपेक्षाकृत महंगी होती है

चिकित्सा के अलावा आप श्रृंगार द्वारा भी इन धब्बों को अस्थाई रूप से छिपाया जा सकता है. इसके लिए सबसे पहले त्वचा को भली प्रकार स्वच्छ कर लें. इसके बाद फाउंडेशन का प्रयोग करें, परन्तु इस बात का ध्यान अवश्य रखे कि फाउंडेशन का रंग आपकी त्वचा के रंग से थोडा गहरा हो. तत्पश्चात फेस पाउडर लगाकर रुज कर लें. इसके अलावा रात्रि में सोने से पहले श्रृंगार को पूरी तरह से साफ़ करके कैलामाइन लोशन लगाने से विशेष लाभ होगा

आयुर्वेदिक और घरेलु नुस्खे

1 . १/२ किलोग्राम हल्दी को को ६ लीटर पानी में उबाले, जब पानी आधा रह जाये तो इसको ठंडा कर ले और १/२ KG सरसों का तेल मिलाकर इसको दोबारा से गर्म करे , जब केवल तेल रह जाये तब इस  तैयार तैलीय मिश्रण को एक शीशी में बंद करके रख ले  और सफेद दाग पर लगाये, ऐसा करने से 4 से 5 माह में सफ़ेद दाग खत्म हो जायेगा

2 . बाबची के बीज को २ दिन तक पानी में भिगोकर रखे , फिर बाद में इसके छिलके को उतार कर छाया में सुखाकर इसका चूर्ण बना ले , इस पाउडर को स्वेत दाग पर भी लगा सकते है और १ ग्राम की मात्रा को एक गिलास दूध के साथ प्रतिदिन लेने से रोगी को लाभ मिलेगा

3 . थोड़ी सी लाल मिटटी लेकर इसमें अदरक का रस मिलाकर इसका लेप बना ले और पीड़ित त्वचा पर लगाये , इससे भी रोगी को नार्मल और सामान्य त्वचा मिलने में आसानी होगी

4 . ताम्बे के गिलास में रखा पानी प्रतिदिन सुबह उठकर पीये, ऐसा करने से आपको बहुत लाभ मिलेगा, कब्ज न होने दे

नोट
लेकिन कोई भी दवा लेने से पहले अपने नजदीकी चिकित्सक से जरूर सलाह करे , चिकित्सक से सलाह करने से आपको अपने सरीर की जरुरत के अनुसार ही दवा लेनी चाहिए

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चंद्रगुप्त


​सम्राट चंद्रगुप्त ने एक दिन अपने प्रतिभाशाली मंत्री चाणक्य से कहा- 

“कितना अच्छा होता कि तुम अगर रूपवान भी होते।“ 

चाणक्य ने उत्तर दिया, 

“महाराज रूप तो मृगतृष्णा है। आदमी की पहचान तो गुण और बुद्धि से ही होती है, रूप से नहीं।“
“क्या कोई ऐसा उदाहरण है जहाँ गुण के सामने रूप फींका दिखे। चंद्रगुप्त ने पूछा।

“ऐसे तो कई उदाहरण हैं महाराज, चाणक्य ने कहा, “पहले आप पानी पीकर मन को हल्का करें बाद में बात करेंगे।”

फिर उन्होंने दो पानी के गिलास बारी बारी से राजा की ओर बढ़ा दिये।
“महाराज पहले गिलास का पानी इस सोने के घड़े का था और दूसरे गिलास का पानी काली मिट्टी की उस मटकी का था। अब आप बताएँ, किस गिलास का पानी आपको मीठा और स्वादिष्ट लगा।” 

सम्राट ने जवाब दिया- “मटकी से भरे गिलास का पानी शीतल और स्वदिष्ट लगा एवं उससे तृप्ति भी मिली।” 
वहाँ उपस्थित महारानी ने मुस्कुराकर कहा, “महाराज हमारे प्रधानमंत्री ने बुद्धिचातुर्य से प्रश्न का उत्तर दे दिया। भला यह सोने का खूबसूरत घड़ा किस काम का जिसका पानी बेस्वाद लगता है। दूसरी ओर काली मिट्टी से बनी यह मटकी, जो कुरूप तो लगती है लेकिन उसमें गुण छिपे हैं। उसका शीतल सुस्वादु पानी पीकर मन तृप्त हो जाता है। आब आप ही बतला दें कि रूप बड़ा है अथवा गुण एवं बुद्धि?”

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ज्योतिष व शास्त्रो के अनुसार नौ आदते आपके जीवन में अवशय होनी चाईए – पढ़े और सभी को बताए


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वो पाँच छह साल का मासूम सा बच्चा


वो पाँच छह साल का मासूम सा बच्चा
अपनी छोटी बहन को लेकर मंदिर के
एक कोने में बैठा हाथ जोडकर भगवान
से न जाने क्या मांग रहा था….
कपड़े में मैल लगा हुआ था मगर
निहायत साफ,उसके नन्हे नन्हे से गाल आँसूओं से भीग चुके थे…
बहुत लोग उसकी तरफ आकर्षित थे
और वह बिल्कुल अनजान अपने भगवान से बातों में लगा हुआ था
जैसे ही वह उठा एक अजनबी ने
बढ़ के उसका नन्हा सा हाथ पकड़ा
और पूछा- “क्या मांगा भगवान से ?
उसने कहा-“मेरे पापा मर गए हैं
उनके लिए स्वर्ग, मेरी माँ रोती रहती है
उनके लिए सब्र,
मेरी बहन माँ से कपडे सामान मांगती है
उसके लिए पैसे”
“तुम स्कूल जाते हो”
अजनबी का सवाल स्वाभाविक सा
सवाल था
“हां जाता हूं” उसने कहा
“किस क्लास में पढ़ते हो ?”
अजनबी ने पूछा”
नहीं अंकल पढ़ने नहीं जाता,
मां चने बना देती है
वह स्कूल के बच्चों को बेचता हूँ,
बहुत सारे बच्चे मुझसे चने खरीदते हैं,
हमारा यही काम धंधा है”
बच्चे का एक एक शब्द मेरी रूह में उतर रहा था
“तुम्हारा कोई रिश्तेदार” न चाहते हुए
भी अजनबी बच्चे से पूछ बैठा
“पता नहीं, माँ कहती है
गरीब का कोई रिश्तेदार नहीं होता,
माँ झूठ नहीं बोलती,
पर अंकल,मुझे लगता है
मेरी माँ कभी कभी झूठ बोलती है,
जब हम खाना खाते हैं
हमें देखती रहती है,जब कहता हूँ
माँ तुम भी खाओ, तो कहती है
मैंने खा लिया , उस समय लगता है
झूठ बोलती है ”
“बेटा अगर तुम्हारे घर का खर्च मिल
जाए तो पढाई करोगे ?
“बिल्कुलु नहीं”
“क्यों”
“पढ़ाई करने वाले गरीबों से नफरत करते हैं अंकल,
हमें किसी पढ़े हुए ने कभी नहीं पूछा –
पास से गुजर जाते हैं
“अजनबी हैरान भी था और शर्मिंदा भी
फिर उसने कहा”
हर दिन इसी इस मंदिर में आता हूँ,
कभी किसी ने नहीं पूछा –
यहां सब आने वाले मेरे पिताजी को
जानते थे मगर हमें कोई नहीं जानता
“बच्चा जोर-जोर से रोने लगा”
अंकल जब बाप मर जाता है
तो सब अजनबी क्यों हो जाते हैं ?
“मेरे पास इसका कोई जवाब नही था
और ना ही मेरे पास बच्चे के सवाल का जवाब था क्या आपके पास है जवाब ?

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महाराजा भोज


—महाराजा भोज –
एक विश्ववंदनीय शासक एवं माँ सरस्वती के वरदपुत्र !!

–माँ सरस्वती के वरदपुत्र ‘महाराजा भोज’

परमार वंश के सबसे महान अधिपति महाराजा भोज ने
धार में १००० ईसवीं से १०५५ ईसवीं तक शासन किया,
जिससे कि यहाँ की कीर्ति दूर-दूर तक पहुँची।

विश्ववंदनीय महाराजा भोज माँ सरस्वती के वरदपुत्र थे!
उनकी तपोभूमि धारा नगरी में उनकी तपस्या और साधना
से प्रसन्न हो कर माँ सरस्वती ने स्वयं प्रकट हो कर दर्शन दिए।

माँ से साक्षात्कार के पश्चात उसी दिव्य स्वरूप को माँ
वाग्देवी की प्रतिमा के रूप में अवतरित कर भोजशाला
में स्थापित करवाया।
राजा भोज ने धार,माण्डव तथा उज्जैन में सरस्वतीकण्ठ
भरण नामक भवन बनवाये थे।
भोज के समय ही मनोहर वाग्देवी की प्रतिमा संवत् १०९१
(ई. सन् १०३४) में बनवाई गई थी।

गुलामी के दिनों में इस मूर्ति को अंग्रेज शासक लंदन ले गए।
यह आज भी वहां के संग्रहालय में बंदी है।

–महान शासक

महाराजा भोज मुंज के छोटे भाई सिंधुराज का पुत्र थे।
रोहक उनके प्रधान मंत्री और भुवनपाल मंत्री थे।
कुलचंद्र, साढ़ तथा तरादित्य इनके सेनापति थे जिनकी
सहायता से भोज ने राज्यसंचालन सुचारु रूप से किया।

अपने चाचा मुंज की ही भाँति वे भी पश्चिमी भारत में एक
साम्राज्य स्थापित करना चाहता थे और इस इच्छा की
पूर्ति के लिये इसे अपने पड़ोसी राज्यों से हर दिशा में
युद्ध करना पड़ा।

उन्होंने दाहल के कलबुरी गांगेयदेव तथा तंजौर (तंच्यावूर)
के राजेंद्रचोल से संधि की ओर साथ ही साथ दक्षिण पर
आक्रमण भी कर दिया, परंतु तत्कालीन राजा चालुक्य
जयसिंह द्वितीय ने बहादुरी से सामना किया और
अपना राज्य बचा लिया।

सन् १०४४ ई. के कुछ समय बाद जयसिंह के पुत्र सोमेश्वर
द्वितीय ने परमारों से फिर शत्रुता कर ली और मालव राज्य
पर आक्रमण कर भोज को भागने के लिये बाध्य कर दिया।

धारानगरी पर अधिकार कर लेने के बाद उसने आग लगा
दी,परंतु कुछ ही दिनों बाद सोमेश्वर ने मालव छोड़ दिया
और भोज ने राजधानी में लोटकर फिर सत्ताधिकार
प्राप्त कर लिया।

सन् १०१८ ई. के कुछ ही पहले भोज ने इंद्ररथ नामक एक
व्यक्ति को, हराया था जो संभवत: कलिंगके गांग राजाओं
का सामंत था।

जयसिंह द्वितीय तथा इंद्ररथ के साथ युद्ध समाप्त कर लेने
पर भोज ने अपनी सेना भारत की पश्चिमी सीमा से लगे हुए
देशों की ओर बढ़ाई और पहले लाट नामक राज्य पर,
जिसका विस्तार दक्षिण में बंबई राज्य के अंतर्गत सूरत तक
था,आक्रमण कर दिया।

वहाँ के राजा चालुक्य कीर्तिराज ने आत्मसमर्पण कर दिया
और भोज ने कुछ समय तक उसपर अधिकार रखा।
इसके बाद लगभग सन् १०२० ई. में भोज ने लाट के दक्षिण
में स्थित तथा थाना जिले से लेकर मालागार समुद्रतट तक
विस्तृत कोंकण पर आक्रमण किया और शिलाहारों के
अरिकेशरी नामक राजा को हराया।
कोंकण को परमारों के राज्य में मिला लिया गया।

महाराजा भोज के प्रराक्रम के कारण ही मेहमूद गजनवी ने
कभी महराजा भोज के राज्य पर आक्रमण नहीं किया! तथा
सोमनाथ विजय के पश्चात तलवार के बल पर बनाये गए
मुसलमानों को पुन: हिन्दू धर्म में वापस ला कर महान
काम किया!

भोज ने एक बार दाहल के कलचुरी गांगेयदेव के विरुद्ध भी,
जिसने दक्षिण पर आक्रमण करने के समय उसका साथ दिया था,
चढ़ाई कर दी।
गांगेयदेव हार गया परंतु उसे आत्मसमर्पण नहीं करना पड़ा।
सन् १०५५ ई. के कुछ ही पहले गांगेय के पुत्र कर्ण ने गुजरात के
चौलुक्य भीम प्रथम के साथ एक संधि कर ली और मालव पर
पूर्व तथा पश्चिम की ओर से आक्रमण कर दिया।

भोज अपना राज्य बचाने का प्रबंध कर ही रहे थे कि बीमारी
से उसकी आकस्मिक मृत्यु हो गई और राज्य सुगमता से
आक्रमणकारियों के अधिकार में चला गया।

–अनोखा काव्यरसिक – महाराजा भोज

माँ सरस्वती की कृपा से महाराजा भोज ने ६४ प्रकार की सिद्ध्या
प्राप्त की तथा अपने यूग के सभी ज्ञात विषयो पर ८४ ग्रन्थ लिखे
जिसमे धर्म,ज्योतिष्य आयुर्वेद,व्याकरण,वास्तुशिल्प,विज्ञान,कला,
नाट्यशास्त्र,संगीत,योगशास्त्र,दर्शन,राजनीतीशास्त्र आदि प्रमुख है!

‘समरांगण सूत्रधार’,’सरस्वती कंठाभरण’,’सिद्वान्त संग्रह’,
‘राजकार्तड’, ‘योग्यसूत्रवृत्ति’,’विद्या विनोद’,’युक्ति कल्पतरु’,
‘चारु चर्चा’,’आदित्य प्रताप सिद्धान्त’,’आयुर्वेद सर्वस्व श्रृंगार
प्रकाश’,’प्राकृत व्याकरण’,’कूर्मशतक’,’श्रृंगार मंजरी’,’भोजचम्पू’,
‘कृत्यकल्पतरु’,’तत्वप्रकाश’,’शब्दानुशासन’,’राज्मृडाड’ आदि
की रचना की।
“भोज प्रबंधनम्” उनकी आत्मकथा है।

हनुमान जी द्वारा रचित राम कथा के शिलालेख समुन्द्र से
निकलवा कर धारा नगरी में उनकी पुनर्रचना करवाई जो
हनुमान्नाटक के रूप में विश्वविख्यात है!
तत्पश्चात उन्होंने चम्पू रामायण की रचना की जो अपने
गद्यकाव्य के लिए विख्यात है!

चम्पू रामायण महर्षि वाल्मीकि के द्वारा रचित रामायण के
बाद सबसे तथ्य परख महाग्रंथ है!

महाराजा भोज वास्तु शास्त्र के जनक माने जाते है!
समरान्गंसुत्रधार ग्रन्थ वास्तु शास्त्र का सबसे प्रथम ज्ञात
ग्रन्थ है!
वे अत्यंत ज्ञानी, भाषाविद् , कवि और कलापारखी भी थे।
उनके समय में कवियों को राज्य से आश्रय मिला था।

सरस्वतीकंठाभरण उनकी प्रसिद्ध रचना है।
इसके अलावा अनेक संस्कृत ग्रंथों, नाटकों, काव्यों और लोक
कथाओं में राजा भोज का अमिट स्थान है।
ऐसे महान थे राजा भोज कि उनके शासन काल में धारानगरी
कलाओं और ज्ञान के लिए सारे विश्व में प्रसिद्ध हो गई थी।

महाराजा भोज की काव्यात्मक ललित अभिरुचि, सूक्ष्म व
वैज्ञानिक दृष्टि उन्हें दूरदर्शी और लोकप्रिय बनाता रहा।

मालवमण्डन,मालवाधीश,मालवचक्रवर्ती,सार्वभौम,
अवन्तिनायक,धारेश्वर,त्रिभुवननारायण,रणरंगमल्ल,
लोकनारायण,विदर्भराज,अहिरराज या अहीन्द्र,अभिनवार्जुन,
कृष्ण आदि कितने विरूदों से भोज विभूषित थे।

–विश्वविख्यात विद्वान

आइने-ए-अकबरी में प्राप्त उल्लेखों के अनुसार भोज की
राजसभा में पांच सौ विद्वान थे।
इन विद्वानों में नौ (नौरत्न) का नाम विशेष रूप से
उल्लेखनीय है।

महाराजा भोज ने अपने ग्रंथो में विमान बनाने की विधि का
विस्तृत वर्णन किया है।

चित्रो के माध्यम से उन्होंने पूरी विधि बताई है! इसी तरह
उन्होंने नाव एवं बड़े जहाज बनाने की विधि विस्तारपूर्वक
बताई है।
किस तरह खिलो को जंगरोधी किया जाये जिससे नाव को
पानी में सुरक्षित रखा जा सकता था! इसके अत्रिरिक्त उन्होंने
रोबोटिक्स पर भी काम किया था!
उन्होंने धारा नगरी के तालाबो में यन्त्र चालित पुतलियो का
निर्माण करवाया था जो तालाब में नृत्य करती थी!

विश्व के अनेक महाविद्यालयो में महाराज भोज के किये गए
कार्यो पर शोध कार्य हो रहा है!
उनके लिए यह आश्चर्य का विषय है,ki उस समय उन्होंने किस
तरह विमान, रोबोटिक्स और वास्तुशास्त्र जेसे जटिल विषयों
पर महारत हासिल की थी!

वैज्ञानिक आश्चर्य चकित है,जो रोबोटिक्स आज भी अपने
प्रारम्भिक दौर में है उस समय कैसे उस विषय पर उन्होंने
अपने प्रयोग किये और सफल रहे!
महाराजा भोज से संबंधित १०१० से १०५५ ई. तक के कई
ताम्रपत्र, शिलालेख और मूर्तिलेख प्राप्त होते हैं।
इन सबमें भोज के सांस्कृतिक चेतना का प्रमाण मिलता है।

एक ताम्रपत्र के अन्त में लिखा है –
स्वहस्तोयं श्रीभोजदेवस्य।
अर्थात् यह (ताम्रपत्र) भोजदेव ने अपने हाथों से लिखा
और दिया है।

–अप्रतिम स्थापत्य कला

राजा भोज के समय मालवा क्षेत्र में निर्माण क्रांति आ गई थी।
अनेक प्रसाद, मंदिर, तालाब और प्रतिमाएं निर्मित हुई।
मंदसौर में हिंगलाजगढ़ तो तत्कालीन अप्रतिम प्रतिमाओं का
अद्वितीय नमूना है।
राजा भोज ने शारदा सदन या सरस्वती कण्ठभरण बनवाये।
वात्स्यायन ने कामसूत्र में इस बात का उल्लेख किया है कि
प्रत्येक नगर में सरस्वती भवन होना चाहिए।
वहां गोष्ठियां, नाटक व अन्य साहित्यिक-सांस्कृतिक
गतिविधियां होते रहना चाहिए।

राजा भोज के नाम पर भोपाल के निकट भोजपुर बसा है।
आधुनिक भोपाल नगरी भोजपाल का ही अपभ्रंश है,,,

यहां का विशाल किन्तु खंडित शिवमंदिर आज भी भोज की
रचनाधर्मिता और इस्लामिक जेहाद और विध्वंस के उदाहरण
के रूप में खड़ा है।
यहीं बेतवा नदी पर एक अनोखा बांध बनवाया गया था।
इसका जलक्षेत्र २५० वर्गमील है।
इस बांध को भी होशंगशाह नामक आक्रंता ने तोड़ कर झील
खाली करवा दी थी।
यह मानवनिर्मित सबसे बड़ी झील थी जो सिंचाई के काम
आती थी।
उसके मध्य जो द्वीप था वह आज भी दीप (मंडीद्वीप)
नाम की बस्ती है।

महाराजा भोज ने जहाँ अधर्म और अन्याय से जमकर लोहा
लिया और अनाचारी क्रूर आतताइयों का मानमर्दन किया,
वहीं अपने प्रजा वात्सल्य और साहित्य-कला अनुराग से वह
पूरी मानवता के आभूषण बन गये।

मध्यप्रदेश के सांस्कृतिक गौरव के जो स्मारक हमारे पास हैं,
उनमें से अधिकांश राजा भोज की देन हैं।

चाहे विश्व प्रसिद्ध भोजपुर मंदिर हो या विश्व भर के शिव भक्तों
के श्रद्धा के केन्द्र उज्जैन स्थित महाकालेश्वर मंदिर,धार की
भोजशाला हो या भोपाल का विशाल तालाब,ये सभी राजा
भोज के सृजनशील व्यक्तित्व की देन है।

उन्होंने जहाँ भोज नगरी (वर्तमान भोपाल) की स्थापना की
वहीं धार,उज्जैन और विदिशा जैसी प्रसिद्ध नगरियों को नया
स्वरूप दिया।
उन्होंने केदारनाथ,रामेश्वरम,सोमनाथ,मुण्डीर आदि मंदिर
भी बनवाए, जो हमारी समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर है।
इन सभी मंदिरों तथा स्मारकों की स्थापत्य कला बेजोड़ है।
इसे देखकर सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि एक
हजार साल पहले हम इस क्षेत्र में कितने समुन्नत थे।

महाराजा भोज ने अपने जीवन काल में जितने अधिक विषयों
पर कार्य किया है,वो अत्यंत ही चकित करने वाला है।
इन सभी को देख कर लगता है की वो कोई देव पुरुष थे !
ये सब कम एक जीवन में करना एक सामान्य मनुष्य के
बस की बात नहीं है!

भोज अपना राज्य बचाने का प्रबंध कर ही रहे थे कि बीमारी
से उसकी आकस्मिक मृत्यु हो गई और राज्य सुगमता से
आक्रमणकारियों के अधिकार में चला गया।

मेरा भारत महान,,,,,

जयति पुण्य सनातन संस्कृति,
जयति पुण्य भूमि भारत,,

सदा सर्वदा सुमंगल,,
वंदे मातरम,,,,
जय भवानी,,
जय श्री राम,,

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*आर्य समाज का डॉ अम्बेडकर को जवाब*


*आर्य समाज का डॉ अम्बेडकर को जवाब*

_विषय:- वेद मे गाय और शुद्र_

दूध का दूध पानी का पानी !

6 दिसंबर 1956 को माननीय डा. अंबेडकर जी का देहावसान हुआ । कानपुर के वैदिक गवेषक पंडित शिवपूजन सिंह जी का चर्चित ‘भ्रांति निवारण’ सोलह पृष्ठीय लेख ‘सार्वदेशिक ‘ मासिक के जुलाई-अगस्त 1951अंक में उनके देहावसान के पांच वर्ष तीन माह पूर्व प्रकाशित हुआ । डा. अंबेडकर जी इस मासिक से भलीभांति परिचित थे और तभी यह चर्चित अंक भी उनकी सेवा में.भिजवा दिया गया था । लेख डा. अंबेडकर के वेदादि विषयक विचारों की समीक्षा में 54 प्रामाणिक उद्धरणों के साथ लिखा गया था। इसकी प्रति विदर्भ के वाशिम जनपद के आर्य समाज कारंजा के प्राचीन ग्रंथालय में सुरक्षित है।
आशा थी कि अंबेडकर जी जैसे प्रतिभाशाली विद्वान या तो इसका उत्तर देते या फिर अपनी पुस्तकें बताये गये अकाट्य तथ्यों की रोशनी में संपादित करते। लेकिन उन्होंने ऐसा कुछ भी नहीं किया। ऐसा इसलिये कि जो जातिगत भेदभाव और अपमान उन्होंने लगातार सहा उसकी वेदना और विद्रोह ने उन्हें ऐसा करने से रोक दिया।
डा. अंबेडकर जी की दोनों पुस्तकें – अछूत कौन और कैसे तथा शूद्रों की खोज – पर लेख शंका समाधान शैली में लिखा गया था पर डा. कुशलदेव शास्त्री जी ने इसे सुविधा और सरलता हेतु संवाद शैली में रुपांतरित किया है जिसे यहां प्रस्तुत किया जा रहा है। इस लेख को स्वामी जी द्वारा लिखित ‘ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका’ के आलोक में पढ़कर सत्यासत्य का निर्णय सहर्ष लिया जा सकता है ।

1 – ‘ अछूत कौन और कैसे ‘

डा. अंबेडकर- आर्य लोग निर्विवाद रूप से दो हिस्सों और दो संस्कृतियों में विभक्त थे,जिनमें से एक ऋग्वेदीय आर्य और दूसरे यजुर्वेदीय आर्य , जिनके बीच बहुत बड़ी सांस्कृतिक खाई थी।ऋग्वेदीय आर्य यज्ञों में विश्वास करते थे,अथर्ववेदीय जादू-टोना में।

पंडित शिवपूजन सिंह- दो प्रकार के आर्यों की कल्पना केवल आपके और आप जैसे कुछ मस्तिकों की उपज है।यह केवल कपोल कल्पना या कल्पना विलास है।इसके पीछे कोई ऐसा ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है।कोई ऐतिहासिक विद्वान भी इसका समर्थन नहीं करता।अथर्ववेद में किसी प्रकार का जादू टोना नहीं है।

डा. अंबेडकर- ऋग्वेद में आर्यदेवता इंद्र का सामना उसके शत्रु अहि-वृत्र (सांप देवता) से होता है,जो कालांतर में नाग देवता के नाम से प्रसिध्द हुआ।

पं. शिवपूजन सिंह- वैदिक और लौकिक संस्कृत में आकाश पाताल का अंतर है।यहाँ इंद्र का अर्थ सूर्य और वृत्र का अर्थ मेघ है।यह संघर्ष आर्य देवता और और नाग देवता का न होकर सूर्य और मेघ के बीच में होने वाला संघर्ष है।वैदिक शब्दों के विषय में.निरुक्त का ही मत मान्य होता है।वैदिक निरूक्त प्रक्रिया से अनभिज्ञ होने के कारण ही आपको भ्रम हुआ है।

डा. अंबेडकर- महामहोपाध्याय डा. काणे का मत है कि गाय की पवित्रता के कारण ही वाजसनेही संहिता में गोमांस भक्षण की व्यवस्था की गयी है।

पं. शिवपूजन सिंह- श्री काणे जी ने वाजसनेही संहिता का कोई प्रमाण और संदर्भ नहीं दिया है और न ही आपने यजुर्वेद पढ़ने का कष्ट उठाया है।आप जब यजुर्वेद का स्वाध्याय करेंगे तब आपको स्पष्ट गोवध निषेध के प्रमाण मिलेंगे।

डा. अंबेडकर- ऋग्वेद से ही यह स्पष्ट है कि तत्कालीन आर्य गोहत्या करते थे और गोमांस खाते थे।

पं. शिवपूजन सिंह- कुछ प्राच्य और पाश्चात्य विद्वान आर्यों पर गोमांस भक्षण का दोषारोपण करते हैं , किंतु बहुत से प्राच्य विद्वानों ने इस मत का खंडन किया है।वेद में गोमांस भक्षण विरोध करने वाले 22 विद्वानों के मेरे पास स-संदर्भ प्रमाण हैं।ऋग्वेद से गोहत्या और गोमास भक्षण का आप जो विधान कह रहे हैं , वह वैदिक संस्कृत और लौकिक संस्कृत के अंतर से अनभिज्ञ होने के कारण कह रहे हैं । जैसे वेद में’उक्ष’ बलवर्धक औषधि का नाम है जबकि लौकिक संस्कृत में भले ही उसका अर्थ ‘बैल’ क्यों न हो ।

डा. अंबेडकर- बिना मांस के मधुपर्क नहीं हो सकता । मधुपर्क में मांस और विशेष रूप से गोमांस का एक आवश्यक अंश होता है ।

पं. शिवपूजन सिंह- आपका यह विधान वेदों पर नहीं अपितु गृह्यसूत्रों पर आधारित है । गृहसूत्रों के वचन वेद विरूध्द होने से माननीय नहीं हैं । वेद को स्वत: प्रमाण मानने वाले महर्षि दयानंद सरस्वती जी के अनुसार,” दही में घी या शहद मिलाना मधुपर्क कहलाता है । उसका परिमाण 12 तोले दही में चार तोले शहद या चार तोले घी का मिलाना है ।”

डा. अंबेडकर- अतिथि के लिये गोहत्या की बात इतनी सामान्य हो गयी थी कि अतिथि का नाम ही ‘गोघ्न’ , अर्थात् गौ की हत्या करना पड़ गया था ।

प. शिवपूजन सिंह- ‘गोघ्न’ का अर्थ गौ की हत्या करने वाला नहीं है । यह शब्द ‘गौ’ और ‘हन’ के योग से बना है। गौ के अनेक अर्थ हैं , यथा – वाणी , जल , सुखविशेष , नेत्र आदि। धातुपाठ में महर्षि पाणिनि ‘हन’ का अर्थ ‘गति’ और ‘हिंसा’ बतलाते हैं।गति के अर्थ हैं – ज्ञान , गमन , और प्राप्ति । प्राय: सभी सभ्य देशों में जब किसी के घर अतिथि आता है तो उसके स्वागत करने के लिये गृहपति घर से बाहर आते हुये कुछ गति करता है , चलता है,उससे मधुर वाणी में बोलता है , फिर जल से उसका सत्कार करता है और यथासंभव उसके सुख के लिये अन्यान्य सामग्रियों को प्रस्तुत करता है और यह जानने के लिये कि प्रिय अतिथि इन सत्कारों से प्रसन्न होता है नहीं , गृहपति की आंखें भी उस ओर टकटकी लगाये रहती हैं । ‘गोघ्न’ का अर्थ हुआ – ‘ गौ: प्राप्यते दीयते यस्मै: स गोघ्न: ‘ = जिसके लिये गौदान की जाती है , वह अतिथि ‘गोघ्न’ कहलाता है ।

डा. अंबेडकर- हिंदू ब्राह्मण हो या अब्राह्मण , न केवल मांसाहारी थे , किंतु गोमांसहारी भी थे ।

प. शिवपूजन सिंह- आपका कथन भ्रमपूर्ण है, वेद में गोमांस भक्षण की बात तो जाने दीजिये मांस भक्षण का भी विधान नहीं है ।

डा. अंबेडकर- मनु ने गोहत्या के विरोध में कोई कानून नहीं बनाया । उसने तो विशेष अवसरों पर ‘गो-मांसाहार’ अनिवार्य ठहराया है ।

पं. शिवपूजन सिंह- मनुस्मृति में कहीं भी मांसभक्षण का वर्णन नहीं है । जो है वो प्रक्षिप्त है । आपने भी इस बात का कोई प्रमाण नहीं दिया कि मनु जी ने कहां पर गोमांस अनिवार्य ठहराया है। मनु ( 5/51 ) के अनुसार हत्या की अनुमति देनेवाला , अंगों को काटने वाला , मारनेवाला , क्रय और विक्रय करने वाला , पकाने वाला , परोसने वाला और खानेवाला इन सबको घातक कहा गया है ।

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2- ‘ शूद्रों की खोज ‘

डा. अंबेडकर- पुरूष सूक्त ब्राह्मणों ने अपनी स्वार्थ सिध्दि के लिये प्रक्षिप्त किया है।कोल बुक का कथन है कि पुरूष सूक्त छंद और शैली में शेष ऋग्वेद से सर्वथा भिन्न है।अन्य भी अनेक विद्वानों का मत है कि पुरूष सूक्त बाद का बना हुआ है।

पं. शिवपूजन सिंह- आपने जो पुरूष सूक्त पर आक्षेप किया है वह आपकी वेद अनभिज्ञता को प्रकट करता है।आधिभौतिक दृष्टि से चारों वर्णों के पुरूषों का समुदाय – ‘संगठित समुदाय’- ‘एक पुरूष’ रूप है।इस समुदाय पुरूष या राष्ट्र पुरूष के यथार्थ परिचय के लिये पुरुष सूक्त के मुख्य मंत्र ‘ ब्राह्मणोSस्य मुखमासीत्…’ (यजुर्वेद 31/11) पर विचार करना चाहिये।
उक्त मंत्र में कहा गया है कि ब्राह्मण मुख है , क्षत्रिय भुजाएँ , वैश्य जङ्घाएँ और शूद्र पैर। केवल मुख , केवल भुजाएँ , केवल जङ्घाएँ या केवल पैर पुरुष नहीं अपितु मुख , भुजाएँ , जङ्घाएँ और पैर ‘इनका समुदाय’ पुरुष अवश्य है।वह समुदाय भी यदि असंगठित और क्रम रहित अवस्था में है तो उसे हम पुरूष नहीं कहेंगे।उस समुदाय को पुरूष तभी कहेंगे जबकि वह समुदाय एक विशेष प्रकार के क्रम में हो और एक विशेष प्रकार से संगठित हो।
राष्ट्र में मुख के स्थानापन्न ब्राह्मण हैं , भुजाओं के स्थानापन्न क्षत्रिय हैं , जङ्घाओं के स्थानापन्न वैश्य और पैरों के स्थानापन्न शूद्र हैं । राष्ट्र में चारों वर्ण जब शरीर के मुख आदि अवयवों की तरह सुव्यवस्थित हो जाते हैं तभी इनकी पुरूष संज्ञा होती है । अव्यवस्थित या छिन्न-भिन्न अवस्था में स्थित मनुष्य समुदाय को वैदिक परिभाषा में पुरुष शब्द से नहीं पुकार सकते ।
आधिभौतिक दृष्टि से यह सुव्यवस्थित तथा एकता के सूत्र में पिरोया हुआ ज्ञान , क्षात्र , व्यापार- व्यवसाय , परिश्रम-मजदूरी इनका निदर्शक जनसमुदाय ही ‘एक पुरुष’ रूप है।
चर्चित मंत्र का महर्षि दयानंद जी इसप्रकार अर्थ करते हैं-
“इस पुरूष की आज्ञा के अनुसार विद्या आदि उत्तम गुण , सत्य भाषण और सत्योपदेश आदि श्रेष्ठ कर्मों से ब्राह्मण वर्ण उत्पन्न होता है । इन मुख्य गुण और कर्मों के सहित होने से वह मनुष्यों में उत्तम कहलाता है और ईश्वर ने बल पराक्रम आदि पूर्वोक्त गुणों से युक्त क्षत्रिय वर्ण को उत्पन्न किया है।इस पुरुष के उपदेश से खेती , व्यापार और सब देशों की भाषाओं को जानना और पशुपालन आदि मध्यम गुणों से वैश्य वर्ण सिध्द होता है।जैसे पग सबसे नीचे का अंग है वैसे मूर्खता आदि गुणों से शूद्र वर्ण सिध्द होता है।”
आपका लिखना कि पुरुष सूक्त बहुत समय बाद जोड़ दिया गया सर्वथा भ्रमपूर्ण है।मैंने अपनी पुस्तक ” ऋग्वेद दशम मण्डल पर पाश्चात्य विद्वानों का कुठाराघात ” में संपूर्ण पाश्चात्य और प्राच्य विद्वानों के इस मत का खंडन किया है कि ऋग्वेद का दशम मण्डल , जिसमें पुरूष सूक्त भी विद्यमान है , बाद का बना हूआ है ।

डा. अंबेडकर- शूद्र क्षत्रियों के वंशज होने से क्षत्रिय हैं।ऋग्वेद में सुदास , तुरवाशा , तृप्सु,भरत आदि शूद्रों के नाम आये हैं।

पं. शिवपूजन सिंह- वेदों के सभी शब्द यौगिक हैं , रूढ़ि नहीं । आपने ऋग्वेद से जिन नामों को प्रदर्शित किया है वो ऐतिहासिक नाम नहीं हैं । वेद में इतिहास नहीं है क्योंकि वेद सृष्टि के आदि में दिया गया ज्ञान है ।

डा. अंबेडकर- छत्रपति शिवाजी शूद्र और राजपूत हूणों की संतान हैं (शूद्रों की खोज , दसवां अध्याय , पृष्ठ , 77-96)

पं. शिवपूजन सिंह- शिवाजी शूद्र नहीं क्षत्रिय थे।इसके लिये अनेक प्रमाण इतिहासों.में भरे पड़े हैं । राजस्थान के प्रख्यात इतिहासज्ञ महामहोपाध्याय डा. गौरीशंकर हीराचंद ओझा , डी.लिट् , लिखते हैं- ‘ मराठा जाति दक्षिणी हिंदुस्तान की रहने वाली है । उसके प्रसिद्ध राजा छत्रपति शिवाजी के वंश का मूल पुरुष मेवाड़ के सिसौदिया राजवंश से ही था।’ कविराज श्यामल दास जी लिखते है – ‘ शिवाजी महाराणा अजय सिंह के वंश में थे। ‘ यही सिध्दांत डा. बालकृष्ण जी , एम. ए. , डी.लिट् , एफ.आर.एस.एस. , का भी था।

इसी प्रकार राजपूत हूणों की संतान नहीं किंतु शुध्द क्षत्रिय हैं । श्री चिंतामणि विनामक वैद्य , एम.ए. , श्री ई. बी. कावेल , श्री शेरिंग , श्री व्हीलर , श्री हंटर , श्री क्रूक , पं. नगेन्द्रनाथ भट्टाचार्य , एम.एम.डी.एल. आदि विद्वान राजपूतों को शूद्र क्षत्रिय मानते हैं।प्रिवी कौंसिल ने भी निर्णय किया है कि जो क्षत्रिय भारत में रहते हैं और राजपूत दोनों एक ही श्रेणी के हैं ।

– ‘ आर्य समाज और डा. अंबेडकर,

डा. कुशलदेव शास्त्री

(अरुण लवानिया)