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एक बार भगवान राम और लक्ष्मण एक सरोवर में स्नान के लिए उतरे


एक बार भगवान राम और लक्ष्मण एक सरोवर में स्नान के लिए उतरे। उतरते समय उन्होंने अपने-अपने धनुष बाहर
तट पर गाड़ दिए जब वे स्नान करके
बाहर निकले तो लक्ष्मण ने देखा की
उनकी धनुष की नोक पर रक्त लगा
हुआ था!
उन्होंने भगवान राम से कहा –
” भ्राता ! लगता है कि अनजाने में कोई हिंसा हो गई ।” दोनों ने मिट्टी हटाकर देखा तो पता चला कि वहां एक मेढ़क मरणासन्न पड़ा है
भगवान राम ने करुणावश मेंढक से
कहा- “तुमने आवाज क्यों नहीं दी ?
कुछ हलचल, छटपटाहट तो करनी
थी। हम लोग तुम्हें बचा लेते जब सांप पकड़ता है तब तुम खूब आवाज लगाते हो। धनुष लगा तो क्यों नहीं बोले ?
मेंढक बोला – प्रभु! जब सांप पकड़ता है तब मैं ‘राम- राम’ चिल्लाता हूं एक आशा और विश्वास रहता है, प्रभु अवश्य पुकार सुनेंगे। पर आज देखा कि साक्षात भगवान श्री राम स्वयं धनुष लगा रहे है तो किसे पुकारता? आपके सिवा किसी का नाम याद नहीं आया बस इसे अपना सौभाग्य मानकर चुपचाप सहता रहा..!!

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कभी सोचा है की प्रभु श्री राम के दादा परदादा का नाम क्या था?


जानकारी——
कभी सोचा है की प्रभु श्री राम के दादा परदादा का नाम क्या था?
नहीं तो जानिये-
1 – ब्रह्मा जी से मरीचि हुए,
2 – मरीचि के पुत्र कश्यप हुए,
3 – कश्यप के पुत्र विवस्वान थे,
4 – विवस्वान के वैवस्वत मनु हुए.वैवस्वत मनु के समय जल प्रलय हुआ था,
5 – वैवस्वतमनु के दस पुत्रों में से एक का नाम इक्ष्वाकु था, इक्ष्वाकु ने अयोध्या को अपनी राजधानी बनाया और इस प्रकार इक्ष्वाकु कुलकी स्थापना की |
6 – इक्ष्वाकु के पुत्र कुक्षि हुए,
7 – कुक्षि के पुत्र का नाम विकुक्षि था,
8 – विकुक्षि के पुत्र बाण हुए,
9 – बाण के पुत्र अनरण्य हुए,
10- अनरण्य से पृथु हुए,
11- पृथु से त्रिशंकु का जन्म हुआ,
12- त्रिशंकु के पुत्र धुंधुमार हुए,
13- धुन्धुमार के पुत्र का नाम युवनाश्व था,
14- युवनाश्व के पुत्र मान्धाता हुए,
15- मान्धाता से सुसन्धि का जन्म हुआ,
16- सुसन्धि के दो पुत्र हुए- ध्रुवसन्धि एवं प्रसेनजित,
17- ध्रुवसन्धि के पुत्र भरत हुए,
18- भरत के पुत्र असित हुए,
19- असित के पुत्र सगर हुए,
20- सगर के पुत्र का नाम असमंज था,
21- असमंज के पुत्र अंशुमान हुए,
22- अंशुमान के पुत्र दिलीप हुए,
23- दिलीप के पुत्र भगीरथ हुए, भागीरथ ने ही गंगा को पृथ्वी पर उतारा था.भागीरथ के पुत्र ककुत्स्थ थे |
24- ककुत्स्थ के पुत्र रघु हुए, रघु के अत्यंत तेजस्वी और पराक्रमी नरेश होने के कारण उनके बाद इस वंश का नाम रघुवंश हो गया, तब से श्री राम के कुल को रघु कुल भी कहा जाता है |
25- रघु के पुत्र प्रवृद्ध हुए,
26- प्रवृद्ध के पुत्र शंखण थे,
27- शंखण के पुत्र सुदर्शन हुए,
28- सुदर्शन के पुत्र का नाम अग्निवर्ण था,
29- अग्निवर्ण के पुत्र शीघ्रग हुए,
30- शीघ्रग के पुत्र मरु हुए,
31- मरु के पुत्र प्रशुश्रुक थे,
32- प्रशुश्रुक के पुत्र अम्बरीष हुए,
33- अम्बरीष के पुत्र का नाम नहुष था,
34- नहुष के पुत्र ययाति हुए,
35- ययाति के पुत्र नाभाग हुए,
36- नाभाग के पुत्र का नाम अज था,
37- अज के पुत्र दशरथ हुए,
38- दशरथ के चार पुत्र राम, भरत, लक्ष्मण तथा शत्रुघ्न हुए |
इस प्रकार ब्रह्मा की उन्चालिसवी (39) पीढ़ी में श्रीराम का जन्म हुआ | शेयर करे ताकि हर हिंदू इस जानकारी को जाने..

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कुसुमसरोवर


((( कुसुमसरोवर ))))))))))
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एक दिन श्री किशोरी जी सखियों के साथ कुसुम वन में फूल चयन कर रही थीं।
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श्री श्यामसुंदर ने माली के रूप में दूर से खड़े होकर आवाज़ लगाई,” कौन तुम फुलवा बीनन हारी ?”
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साथ की सखियां भयभीत होकर इधर-उधर भाग खड़ी हुईं।
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श्री किशोरी जी का नीलाम्बर एक झाड़ी में उलझ गया, भाग न सकीं। इस हड़बड़ाहट में एक-दो फूल भी उनके हाथ से गिर गए।
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इतने में माली का रूप छोड़ कर सामने श्री श्याम सुंदर आकर उपस्थित हुए।
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उन्होंने नीलाम्बर को झाड़ी से छुड़ा दिया।
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श्री राधा के द्वारा पृथ्वी पर गिरे फूल श्री श्यामसुंदर ने उठा लिए।
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श्री किशोरी जी ने कहा, ”प्रियतम ! पृथ्वी पर गिरे फूल पूजा के योग्य तो रहे नहीं अब क्या करोगे इनका ?”
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श्री श्यामसुंदर ने उन फूलों को सरोवर के जल से धो लिया और बोले प्राणवल्लभे ! अब ये फूल शुद्ध हो गए हैं। इतना कह कर श्री श्यामसुंदर ने वे कुसुम श्री किशोरी जी की बेनी में लगा दिए।
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श्री युगल किशोर के आनन्द की सीमा न रही।
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तभी से यह सरोवर ‘कुसुमसरोवर’ नाम से प्रसिद्ध हो गया।
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कहते हैं श्री विश्वनाथ चक्रवर्ती इस पुष्पवन मेंआकर एकान्त लीला-चिन्तन करते थे।
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प्रकट-वृन्दावन की प्रकिया भावमयी लीला के तत्त्व को न जानने वाले लोग श्री चक्रवर्ती से शास्त्रार्थ में पार न पा सकते थे।
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उनके मन में एक दिन यहां एकान्त में आकर श्री चक्रवर्ती का अनिष्ट करने की सूझी।
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चार व्यक्ति पुष्प वन में घुसे ही थे कि श्री राधा की सखियों ने प्रत्यक्ष होकर उन्हें डांटा और कहा,” तुरन्त यहां से भाग जाओ हमारी स्वामिनी श्री राधा यहां पुष्प चयन करने को आई हुई हैं श्री श्याम सुंदर के लिए।”
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इतना सुनते ही चारों व्यक्ति वहां से भाग खड़े हुए। उनके मन में पूर्ण विश्वास हो गया कि श्री गोविन्द लीलामृत में जो लीलाएं वर्णित हैं, वे अक्षरशः सत्य हैं।
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अपनी कुचेष्टा की निन्दा करते हुए लज्जित हो गए।
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उन्हें श्री किशोरी जी की सखियों के दर्शन एवं वचनामृत पान का सौभाग्य तो प्राप्त हो गया। उनका अंतः करण शुद्ध हो गया एवं प्रकट-वृन्दावन की लीला का सार जान गए कि यहां प्रकीया-भावमयी लीला है।
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(((((((((( जय जय श्री राधे ))))))))))