Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

​मूर्ती पूजा का रहस्य जरूर पढ़े :-


​मूर्ती पूजा का रहस्य जरूर पढ़े :-
कोई कहे की हिन्दू मूर्ती पूजा क्यों

करते हैं  :
स्वामी विवेकानंद को एक राजा ने

अपने भवन में बुलाया और बोला,
“तुम हिन्दू लोग मूर्ती की पूजा करते हो!
मिट्टी, पीतल, पत्थर की मूर्ती का.!

पर मैं ये सब नही मानता।
ये तो केवल एक पदार्थ है।”
उस राजा के सिंहासन के पीछे

किसी आदमी की तस्वीर लगी थी।
विवेकानंद जी कि नजर उस

तस्वीर पर पड़ी।
विवेकानंद जी ने राजा से पूछा,

“राजा जी, ये तस्वीर किसकी है?”

राजा बोला, “मेरे पिताजी की।”

स्वामी जी बोले, “उस तस्वीर को अपने हाथ में लीजिये।”
राज तस्वीर को हाथ मे ले लेता है।

स्वामी जी राजा से : “अब आप उस

तस्वीर पर थूकिए!”
राजा : “ये आप क्या बोल रहे हैं

स्वामी जी.?
“स्वामी जी : “मैंने कहा उस

तस्वीर पर थूकिए..!”
राजा (क्रोध से) : “स्वामी जी, आप होश मे तो हैं ना? मैं ये काम नही कर सकता।”
स्वामी जी बोले, “क्यों? ये तस्वीर तो केवल एक कागज का टुकड़ा है,

और जिस पर कूछ रंग लगा है।

इसमे ना तो जान है,
ना आवाज,

ना तो ये सुन सकता है,

और ना ही कूछ बोल सकता है।”

और स्वामी जी बोलते गए,
“इसमें ना ही हड्डी है और ना प्राण।

फिर भी आप इस पर कभी थूक

नही सकते।
क्योंकि आप इसमे अपने

पिता का स्वरूप देखते हो।
और आप इस तस्वीर का अनादर

करना अपने पिता का अनादर करना

ही समझते हो।”
थोड़े मौन के बाद स्वामी जी आगे कहाँ,
“वैसे ही, हम हिंदू भी उन पत्थर, मिट्टी,
या धातु की पूजा भगवान का स्वरूप मान

कर करते हैं।
भगवान तो कण-कण मे है, पर

एक आधार मानने के लिए और

मन को एकाग्र करने के

लिए हम मूर्ती पूजा करते हैं।”
स्वामी जी की बात सुनकर राजा ने

स्वामी जी के चरणों में गिर कर

क्षमा माँगी।
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Posted in भारतीय शिक्षा पद्धति

भाषा हत्या, किसान हत्या, जवान हत्या, गरीबी से आम नागरिकों की 


​राष्ट्र… ह्त्या की ओर – भाषा हत्या, किसान हत्या, जवान हत्या, गरीबी से आम नागरिकों की आत्महत्या (हत्या), नवजात शीशुओ की इलाज न होने से हत्या , संस्कारो की ह्त्या…..???????, 
UPSC परीक्षाओं में अंग्रेजी क्यों..,

अभी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ब्रिक देशों में हिन्दी भाषा के वार्ता से से एक सम्मानित सख्श से जाने गए…, व देश के स्वाभिमान से दुनिया के देशों को सन्देश दिया 
ये सब विदेशी भोगवादी भाषा के तलवारों से, हम बर्बाद हो रहे है… , हिग्लीश को हिरण मानकर , धन तृष्णा से युवक, राष्ट्र की राह भटक गया है, अग्रेज़ी, दुनिया के सिर्फ 11 देशों मे प्रमुखता से बोली जाती है , स्वभाषा से चीन , जापान , जर्मनी फ्रांस व अन्य छोटे देश जो नक्शे मे भी दिखाई नही देते है वे शीर्ष देशों मे सुमार है….,
याद रहें चीन में विश्व के भव्यतम ओलंपिक के समापन समारोह के बाद ,चीनी सरकारअंग्रेजी को दूसरी भाषा के रूप में थोपने के प्रयास में चीनी जनता ने सडकों पर उतर कर विरोध किया,तब चीनी सरकार ने एक अध्यादेश लाकर घोषणा कि , चीनी भाषा में कोई अंग्रेजी शब्द उपयोग में नहीं लाया जाएगा, 

आज, हम विश्व गुरू हिंदुस्थान का तमगा लेकर दुनिया में ढोल पीट रहें है.., 
लेकिन आज देश…, विदेशी संस्कार, विचार, शिक्षा प्रणाली से कठपुतली बनकर विदेशी देशों की अंगलियों पर नाच रहा है , डॉलर , रूपये को डोल रहा है , 
देशवासियों विदेशी नशा छोड़ो , हिन्दुस्थानियों अपने देश को पहचानों, जागो…जागो…जागो… अभी भी समय है… विदेशी इशारों से डूबते देश को बचाओ 

साभार:

www. meradeshdoooba डॉट com (a mirror of india) स्थापना २६ दिसम्बर २०११ कृपया वेबसाइट की ५७०  प्रवाष्ठियों की यात्रा करें व E MAIL द्वारा नई पोस्ट के लिए SUBSCRIBE करें – 

भ्रष्टाचारीयों के महाकुंभ की महान-डायरी

Posted in संस्कृत साहित्य

श्राद्ध


​पितृ पक्ष श्राद्ध 2016के बारे में आवश्यक जानकारी:-

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हिन्दू धर्म में मृत्यु के बाद श्राद्ध करना बेहद जरूरी माना जाता है। मान्यतानुसार अगर किसी मनुष्य का विधिपूर्वक श्राद्ध और तर्पण ना किया जाए तो उसे इस लोक से मुक्ति नहीं मिलती और वह भूत के रूप में इस संसार में ही रह जाता है। 

पितृ पक्ष का महत्त्व –

ब्रह्म वैवर्त पुराण के अनुसार देवताओं को प्रसन्न करने से पहले मनुष्य को अपने पितरों यानि पूर्वजों को प्रसन्न करना चाहिए। हिन्दू ज्योतिष के अनुसार भी पितृ दोष को सबसे जटिल कुंडली दोषों में से एक माना जाता है। पितरों की शांति के लिए हर वर्ष भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा से आश्विन कृष्ण अमावस्या तक के काल को पितृ पक्ष श्राद्ध होते हैं। मान्यता है कि इस दौरान कुछ समय के लिए यमराज पितरों को आजाद कर देते हैं ताकि वह अपने परिजनों से श्राद्ध ग्रहण कर सकें।  

पितृ पक्ष श्राद्ध 2016 –

वर्ष 2016 में पितृ पक्ष श्राद्ध की तिथियां निम्न हैं: 
तारीख            दिन         श्राद्ध तिथियाँ

16 सितंबर     शुक्रवार    पूर्णिमा श्राद्ध

17 सितंबर     शनिवार    प्रतिपदा 

18 सितंबर     रविवार     द्वितीया तिथि 

19 सितंबर     सोमवार    तृतीया – चतुर्थी (एक साथ)

20 सितंबर      मंगलवार     पंचमी तिथि

21 सितंबर      बुधवार       षष्ठी तिथि 

22 सितंबर      गुरुवार       सप्तमी तिथि 

23 सितंबर      शुक्रवार     अष्टमी तिथि 

24 सितंबर      शनिवार     नवमी तिथि

25 सितंबर      रविवार      दशमी तिथि 

26 सितंबर      सोमवार     एकादशी तिथि

27 सितंबर      मंगलवार   द्वादशी तिथि 

28 सितंबर      बुधवार      त्रयोदशी तिथि 

29 सितंबर      गुरुवार      अमावस्या व सर्वपितृ श्राद्ध
श्राद्ध क्या है? 

ब्रह्म पुराण के अनुसार जो भी वस्तु उचित काल या स्थान पर पितरों के नाम उचित विधि द्वारा ब्राह्मणों को श्रद्धापूर्वक दिया जाए वह श्राद्ध कहलाता है। श्राद्ध के माध्यम से पितरों को तृप्ति के लिए भोजन पहुंचाया जाता है। पिण्ड रूप में पितरों को दिया गया भोजन श्राद्ध का अहम हिस्सा होता है।

क्यों जरूरी है श्राद्ध देना?

मान्यता है कि अगर पितर रुष्ट हो जाए तो मनुष्य को जीवन में कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है। पितरों की अशांति के कारण धन हानि और संतान पक्ष से समस्याओं का भी सामना करना पड़ता है। संतान-हीनता के मामलों में ज्योतिषी पितृ दोष को अवश्य देखते हैं। ऐसे लोगों को पितृ पक्ष के दौरान श्राद्ध अवश्य करना चाहिए। 

क्या दिया जाता है श्राद्ध में? 

श्राद्ध में तिल, चावल, जौ आदि को अधिक महत्त्व दिया जाता है। साथ ही पुराणों में इस बात का भी जिक्र है कि श्राद्ध का अधिकार केवल योग्य ब्राह्मणों को है। श्राद्ध में तिल और कुशा का सर्वाधिक महत्त्व होता है। श्राद्ध में पितरों को अर्पित किए जाने वाले भोज्य पदार्थ को पिंडी रूप में अर्पित करना चाहिए। श्राद्ध का अधिकार पुत्र, भाई, पौत्र, प्रपौत्र समेत महिलाओं को भी होता है। 

श्राद्ध में कौओं का महत्त्व 

कौए को पितरों का रूप माना जाता है। मान्यता है कि श्राद्ध ग्रहण करने के लिए हमारे पितर कौए का रूप धारण कर नियत तिथि पर दोपहर के समय हमारे घर आते हैं। अगर उन्हें श्राद्ध नहीं मिलता तो वह रुष्ट हो जाते हैं। इस कारण श्राद्ध का प्रथम अंश कौओं को दिया जाता है। 

किस तारीख में करना चाहिए श्राद्ध? 

सरल शब्दों में समझा जाए तो श्राद्ध दिवंगत परिजनों को उनकी मृत्यु की तिथि पर श्रद्धापूर्वक याद किया जाना है। अगर किसी परिजन की मृत्यु प्रतिपदा को हुई हो तो उनका श्राद्ध प्रतिपदा के दिन ही किया जाता है। इसी प्रकार अन्य दिनों में भी ऐसा ही किया जाता है। इस विषय में कुछ विशेष मान्यता भी है जो निम्न हैं: 

 पिता का श्राद्ध अष्टमी के दिन और माता का नवमी के दिन किया जाता है। 

जिन परिजनों की अकाल मृत्यु हुई जो यानि किसी दुर्घटना या आत्महत्या के कारण हुई हो उनका श्राद्ध चतुर्दशी के दिन किया जाता है।

साधु और संन्यासियों का श्राद्ध द्वाद्वशी के दिन किया जाता है। 

 जिन पितरों के मरने की तिथि याद नहीं है, उनका श्राद्ध अमावस्या के दिन किया जाता है।  इस दिन को सर्व पितृ श्राद्ध कहा जाता है।

#बन्ना

Posted in भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas

रेलवे लाइन बिछाने के लिए इस राजा ने दिया था अंग्रेजो को 1 करोड़ कर्ज, इंजन को खींचकर लाए थे हाथी.


रेलवे लाइन बिछाने के लिए इस राजा ने दिया था अंग्रेजो को 1 करोड़ कर्ज, इंजन को खींचकर लाए थे हाथी.

भारत को सोने की चीड़िया कहा जाता था ये सभी जानते
हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं जब अंग्रेज भारत पर शासन करते थे.

उस दौरान वह यहां के राजाओं से कर्ज लेते थे. ऐसी ही एक
कहानी है इंदौर के होलकर राजवंश के महाराजा तुकोजीराव
होलकर द्वितीय की, जिन्होंने ब्रिटिश गवर्नर को उस जमाने
में एक करोड़ रुपए का कर्ज दिया था. आइए जानते हैं राजा ने ये
कर्ज क्यों दिया था.

एक करोड़ का दिया था कर्ज
महाराजा तुकोजीराव होलकर की कर्ज की कहानी को
इतिहास भी मानता है. इंदौर के आसपास रेलवे के तीन सेक्शन
को जोडऩे के लिए रेलवे लाइन बिछाने के लिए एक करोड़ रुपए
का कर्ज दिया था. यह कर्ज 101 वर्ष के लिए 4.5 प्रतिशत
वार्षिक ब्याज पर दिया गया था.

अपने राज्य में बिछाई रेलवे लाइन
तब इंदौर पहला राज्य था, जिसने अपने यहां रेलवे लाइन बिछाई.
इसके साथ ही होलकर पहला ऐसा राजघराना बना जिसने
किसी भी सरकार को कर्ज दिया था. ब्रिटिश गवर्नर ने
तुकोजीराव होलकर द्वितीय से 1869 में एक करोड़ रुपए का
कर्ज लिया था. इसके बाद 1870 में शुरू हुआ था 79 मील लंबी
इंदौर-खंडवा रेलवे लाइन पर काम.

मुफ्त में दी थी जमीन
महाराजा तुकोजीराव होलकर ने द्वितीय रेलवे की स्थापना
और उसके लाभ को समझते हुए उन्होंने अंग्रेजो को कर्ज दिया
था. हैरानी की बात तो ये है कि राजा ने न केवल एक करोड़
का कर्ज दिया था बल्कि मुफ्त में जमीन भी मुहैया कराई थी.
25 मई 1870 को शिमला में वायसरॉय और गर्वनर जनरल इन
कौंसिल ने इस समझौते पर मुहर लगाई थी.

होलकर स्टेट रेलवे के नाम से जाना जाता था
तुकोजीराव होलकर (1844-86) के कार्यकाल में खंडवा से
अजमेर तक रेलवे लाइन बिछाने की योजना 1869 में बनाई गई
थी. इस रेलवे लाइन को होलकर स्टेट रेलवे कहा गया. पूरे जिले में
रेलवे लाइन की कुल लंबाई 117.53 किमी थी. जो रेलवे के तीन
सेक्शन इंदौर-खंडवा, इंदौर-रतलाम-अजमेर और इंदौर- देवास-
उज्जैन में बंटी थी.

पहला इंजन खंडवा पटरियों पर हाथियों द्वारा खींचकर
लाया गया था
जब ब्रिटिश सरकार के साथ मिलकर राजा ने ये रेलवे लाइन
बनाने की तैयारी शुरू की उस दौरान इतनी सुविधाएं नहीं थी
कि रेलवे के भारी समाना को कही से लाया और ले जाया जा
सके. ऐसे में रेलवे इंजन हाथियों द्वारा खींचकर ट्रैक तक लाया
गया था.

1877 में शुरू हुई रेलवे लाइन
1877 में रेलवे पूरी तरह काम करने लगी थी. इंदौर से उज्जैन तक
फैली इस रेलवे लाइन को राजपूताना-मालवा रेलवे भी कहा
जाता था

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प्रवचन का महत्व


(((((((( प्रवचन का महत्व ))))))))
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एक बार काशी के निकट के एक इलाके के नवाब ने गुरु नानक जी से पूछा, ‘आपके प्रवचन का महत्व ज्यादा है या हमारी दौलत का ?‘
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नानक जी ने कहा, ‘इसका जवाब उचित समय पर दूंगा।’
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कुछ समय बाद नानक जी ने नवाब को काशी के अस्सी घाट पर एक सौ स्वर्ण मुद्राएं लेकर आने को कहा। नानक वहां प्रवचन कर रहे थे।
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नवाब ने स्वर्ण मुद्राओं से भरा थाल नानक के पास रख दिया और पीछे बैठ कर प्रवचन सुनने लगा। वहां एक थाल पहले से रखा हुआ था।
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प्रवचन समाप्त होने के बाद नानक ने थाल से स्वर्ण मुद्राएं मुट्ठी में लेकर कई बार खनखनाया।
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भीड़ को पता चल गया कि स्वर्ण मुद्राएं नवाब की तरफ से नानक को भेंट की गई हैं।
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थोड़ी देर बाद अचानक नानक ने थाल से स्वर्ण मुद्राएं उठा कर.गंगा में फेंकना शुरू कर दिया।
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यह देख कर वहां अफरातफरी मच गई। कई लोग स्वर्ण मुदाएं लेने के लिए गंगा में कूद गए।
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भगदड़ में कई लोग घायल हो गए। मारपीट की नौबत आ गई।
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नवाब को समझ में नहीं आया कि आखिर नानक जी ने यह सब क्यों किया।
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तभी नानक जी ने जोर से कहा, ‘भाइयों, असली स्वर्ण मुद्राएं मेरे पास हैं। गंगा में फेंकी गई मुदाएं नकली हैं। आप लोग शांति से बैठ जाइए।’
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जब सब लोग बैठ गए तो नवाब ने पूछा, ‘आप ने यह तमाशा क्यों किया ? धन के लालच में तो लोग एक दूसरे की जान भी ले सकते हैं।’
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नानक ने कहा, ‘मैंने जो कुछ किया वह आपके प्रश्न का उत्तर था।
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आप ने देख लिया कि प्रवचन सुनते समय लोग सब कुछ भूल कर भक्ति में डूब जाते हैं। लेकिन माया लोगों को सर्वनाश की ओर ले जाती है।
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प्रवचन लोगों में शांति और सद्भावना का संदेश देता है मगर दौलत तो विखंडन का रास्ता है।‘
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नवाब को अपनी गलती का अहसास हो गया।
Posted in भारत गौरव - Mera Bharat Mahan

​भारत के वैदिक नाम


​भारत के वैदिक नाम-

वेद और तन्त्र के अनुसार विन्दु या इन्दु से हिन्दू हुआ है। यह मूल वैदिक  धारणा लगती है। बाद में चिन्तन कर लगा कि यह आध्यात्मिक,  आधिदैविक, आधिभौतिक सभी स्तरों पर सत्य है।

आकाश में शून्य (असत्) से सृष्टि हुई जिसका प्रतीक विन्दु है। विन्दु का प्रसार सोम या इन्दु है। यह चन्द्र विन्दु है। इसका पुरुष-प्रकृति के भेद का द्वैत विसर्ग है जिससे सृष्टि होती है। 

पृथ्वी पर सभ्यता का केन्द्र भारत था। हिम युगके चक्र से हिमालय द्वारा सुरक्षित रहने के कारण यहाँ स्थायी सनातन सभ्यता रही। हिमालय तीन विष्टप (विटप के मूल की तरह हजारों स्रोतों से जल ग्रहण) में बंटा है, अतः त्रिविष्टप (तिब्बत) कहते हैं। जिस क्षेत्र का जल सिन्धु नदी से निकलता है वह विष्णु विटप है। इस अर्थ में कश्मीर पृथ्वी का स्वर्ग है। जिस क्षेत्र का जल गंगा द्वारा समुद्र तक पहुंचता है वह शिव विटप या शिव जटा है। पूर्व भाग का जल ब्रह्मपुत्र से निकलता है,  वह ब्रह्म विटप है। ब्रह्मपुत्र के परे ब्रह्म देश (बर्मा) अब महा-अमर = म्याम्मार है। इन तीनों क्षेत्रों का केंद्र विन्दु सरोवर है जिसे मान सरोवर भी कहते हैं। कुल मिलाकर दो समुद्रों में विसर्ग होता है। सिन्धु नदी का विसर्ग स्थल सिन्धु समुद्र तथा गंगा का विसर्ग स्थल गंगा सागर है। यही ब्रह्मा का कमण्डल भी है जिसमें गंगा विलीन होती है। कर-मण्डल का संक्षेप कमण्डल है। इसका बंगला उच्चारण कोरोमण्डल है जो भारत के पूर्व समुद्र तट का नाम है।

मस्तिष्क में भी विन्दु चक्र बाहरी प्रेरणा का स्रोत है जहां चोटी रखते हैं। इसका मस्तिष्क के दाहिने और बांये भागों में विसर्ग होता है जिनको मानस के दो हंस कहा गया है। इन हंसों के आलाप से 18 प्रकार की विद्या होती है।

समुन्मीलत् संवित् कमल मकरन्दैक रसिकं,

भजे हंस द्वन्द्वं किमपि महतां मानस चरम्।

यदालापाद् अष्टादश गुणित विद्या परिणतिः,

यदादत्ते दोषादू गुणमखिलमद्भ्यः पय इव।।

(सौन्दर्य लहरी 38)

हुएनसांग ने लिखा है कि भारत तीन अर्थों में इन्दु कहा जाता था-

उत्तर से देखने पर अर्ध चन्द्राकार हिमालय इसकी सीमा है।

हिमालय चन्द्र की तरह ठण्डा है।

जैसे चन्द्रमा पूरे विश्व को प्रकाश देता है उसी प्रकार भारत विश्व को ज्ञान का प्रकाश देता है।

हुएनसांग के अनुसार ग्रीक लोग इन्दु का उच्चारण इण्डे करते थे।

पुराणों में भी लिखा है (जैसे मत्स्य,  विष्णु) कि भारत तथा जम्बू द्वीप दोनों की उतरी सीमा धनुषाकार है।

दक्षिण से देखने पर यह अधोमुख त्रिकोण है जिसे शक्ति त्रिकोण कहते हैं। भारतभारतवर्ष के 9 खण्डों में यह मुख्य होने के कारण कुमारिका है जो शक्ति का मूल रूप है।

विश्व सभ्यता के केन्द्र रूप में यह अजनाभ वर्ष है। अज = विष्णु की नाभि का कमल मणिपुर है जिसके बाद ब्रह्म देश है। भौतिक रूप से यह विष्णु के नाभि कमल से ब्रह्मा की उत्पत्ति है।

Arun Upadhyay

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​एक बार राजा के दरबार मै


​एक बार राजा के दरबार मै एक फ़कीर गाना गाने जाता है

फ़कीर बहुत अच्छा गाना गाता है।

राजा कहते हैं : इसे खूब सारा सोना दे दो।

फ़कीर और अच्छा गाता है।

राजा कहते हैं : इसे हीरे जवाहरात भी दे दो।

फकीर और अच्छा गाता है।

राजा कहते हैं : इसे असरफियाँ भी दे दो।

फ़कीर और अच्छा गाता है।

राजा कहते हैं : इसे खूब सारी ज़मीन भी दे दो।

फ़कीर गाना गा कर घर चला जाता है।

और

अपने बीबी बच्चों से कहता है: आज हमारे राजा ने गाने का खूब सारा इनाम दिया। हीरे,जवाहरात,सोना,ज़मीन, असरफियाँ बहुत कुछ दिया।

सब बहुत खुश होते हैं

कुछ दिन बीते

फ़कीर को अभी तक मिलने वाला इनाम नही पहुँचा था…

फ़कीरे दरवार में फिर पहुँचा…

कहने लगा : राजाजी आप के द्वारा दिया गया इनाम मुझे अभी तक नहीं मिला।

राजा कहते हैं ..

अरे फ़कीर

ये लेन देन की बात क्या करता है।

तू मेरे कानों को खुश करता रहा…

और

मैं तेरे कानों को खुश करता रहा।

😛😝😜😛😝😜😳😳😳

फकीर बेहोश😊
यही हाल हमारे देशवासिओं के भी हैं 

कमीने नेता लोगों के कारण ।

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​એક વખત સંત


​એકવખત સંત વહેલી સવારે દરિયાકાંઠે ફરવા માટે નિકળ્યા. 
દરિયા કિનારે એણે એક પુરૂષને એક સ્ત્રીના ખોળામાં માથું નાખીને સુતેલો જોયો. 
બાજુમાં જ એક દારુની ખાલી બોટલ પણ પડી હતી. સંત ખુબ દુ:ખી થયા.
 એ વિચારવા લાગ્યા કે આ માણસ પણ કેવો કામાંધ છે. 
સવારના પહોરમાં દારુ પી ને સ્ત્રીના ખોળામાં માથુ મુકીને પ્રેમાલાપ કરે છે.
થોડીવારમાં સમુદ્રમાંથી “બચાવો” “બચાવો” ની બુમો સંભળાઇ`. સંते જોયુ કે એક માણસ દરિયામાં ડુબી રહ્યો છે. 
પણ પોતાને તો તરતા આવડતું નહોતું એટલે એ જોવા સિવાય બીજુ કંઇ જ કરી શકે તમે નહોતા. 
સ્ત્રીના ખોળામાં માથુ મુકીને સુતેલો પેલો પુરૂષ ઉભો થયો અને ડુબતા માણસને બચાવવા એ સમુદ્રમાં કુદી પડ્યો.
 થોડીવારમાં તો એ પેલા માણસને બચાવીને સમુદ્રકિનારે લઇ આવ્યો.
સંત વિચારમાં પડી ગયા કે આ માણસને સારો ગણવો કે ખરાબ ? 
એ પેલા પુરૂષ પાસે ગયા અને પુછ્યુ, “ ભાઇ તું કોણ છે અને અહીંયા શું કરે છે ?”
પેલા પુરૂષે જવાબ આપ્યો કે હું એક ખારવો છુ અને માછીમારીનો ધંધો કરુ છુ. આજે ઘણા દિવસો પછી સમુદ્રની સફર કરીને વહેલી સવારે અહીંયા પહોંચ્યો છું.
 મારી “માં” મને લેવા માટે સામે આવી હતી અને સાથે ઘેર બીજુ કોઇ ખાસ વાસણ ન હોવાથી આ દારુની બોટલમાં ઘેરથી પાણી ભરીને લાવી હતી.
 ઘણા દિવસની મુસાફરીનો ખુબ થાક હતો અને સવારનું આ સુંદર વાતાવરણ હતું એટલે પાણી પી ને મારી “માં” ના ખોળામાં માથું રાખીને થાક ઉતારવા અહિંયા જ સુઇ ગયો.
સંતની આંખમાં આંસુ આવી ગયા કે હું પણ કેવો માણસ છું જે કંઇ જોયુ એ બાબતમાં કેવા ખોટા વિચારો કરવા લાગ્યો જ્યારે હકીકત કંઇક જુદી જ હતી!

કોઇપણ ઘટના માત્ર આપણને દેખાય એવી જ ન હોય એની એક બીજી બાજુ પણ હોય…….
THINK POSITIVE….
કોઈના વિશે કંઈ પણ decision લેતા પહેલા 100 વાર વીચારવુ જોઈએ…..હકારાત્મક વિચાર કેળવવા જોઈએ………