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*वृक्षारोपण ही उजड़ती प्रकृति के श्रृंगार का आधार*


*वृक्षारोपण ही उजड़ती प्रकृति के श्रृंगार का आधार*

*प्रकृति*– इस धरती पर उपस्थित जल, वायु, मिट्टी पत्थर ,जीव जंतु ,वनस्पतियां ,पेड़ पौधे , और वायुमंडल सब का संयुक्त रूप प्रकृति कहलाता है ।
इस प्रकृति में सबसे बुद्धिमान प्राणी ,विकासशील प्राणी है मानव ।जो संपूर्ण प्रकृति का दोहन /नाश करता आ रहा है ,प्रकृति ने सबको जीवन दिया है ,जीने के संसाधन दिए हैं ,सभी को अपनी अपनी आवश्यकता पूर्ति के लिये स्वयं को समर्पित कर दिया है ,लेकिन प्रकृति को सतत् चूस चूस कर अपना विकास करने वाला मानव भूल गया कि यदि हम प्रकृति से जितना ले रहे हैं उतना उसे वापस नहीं करेंगे तो यह प्रकृति नष्ट हो जाएगी ,और नष्ट होते होते संपूर्ण जीवन को पृथ्वी से समाप्त कर देगी ।
विकास और आधुनिकता के दौर में मानव सतत् जंगलों की कटाई करता रहा ,पेड़ नहीं लगाया ।धरती को खोदकर खनिज निकलता रहा ,पत्थर खुदाई करता रहा ,भू- क्षरण होता रहा ,वनों का विनाश होता रहा ,मानव तरक्की करता रहा ।
आज शनैः शनैः पूरी प्रकृति की संतुलन व्यवस्था चरमरा गई है ।वायुमंडल में विषैली गैसों की प्रचुरता हो गई है ,ग्लोबल वार्मिंग से हिमशैल/ग्लेशियर पिघलने लगे समुद्र नदियाँ सब अपना आक्रामक रूप दिखाने लगी ,जलवायु का संतुलन बिगड़ गया ,सूखा ,बाढ़ ,भूस्खलन ,ठंड ,गर्मी ,अतिवृष्टि ,गैस त्रासदी ,ज्वालामुखी का फटना आदि प्रकृति के होने वाले विनाश का संकेत हैं ।
जो पेड़ वायुमंडल की कार्बनडाइआक्साईड जैसी गैस को अपने भोजन के रूप में उपयोग करके जीवनदायिनी आक्सीजन गैस देते थे ,वो पेड़ निरंतर कटते जा रहे हैं ।मानव प्रकृति का उपहास करता चला आ रहा है ,ओजोन छिद्र विषैली कारेबनमोनोआक्साईड गैस के कारण बढ़ता जा रहा है ,जो हमारे वायुमंडल में ओजोन परत (जीवन रक्षक परत ) थी उसमें भी छेद हो गया है ,जो सूर्य से आने वाली हानिकारक पराबैंगनी किरणों को अवशोषित करती थी ,अब छिद्र के कारण पराबैंगनी किरणें पृथ्वी पर आने लगी हैं ,त्वचा कैंसर जैसी बीमारी इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है ,और वैज्ञानिकों का शोध इसकी पुष्टि करता है ।
हानिकारक प्लास्टिक से हमारी पृथ्वी बंजर हो रही है ,अधिक उत्पादन प्राप्त करने के लिये विभिन्न रसायनों का उपयोग हमारी जमीन को ,हमारे ,उत्पादन को हानि पहुंचा रहा है ,हम प्रकृति से उतना ही लें जितना प्रकृति स्वत: दे रही है ,यदि हम प्रकृति के साथ जबरदस्ती करेंगे तो प्रकृति हमें क्षमा नहीं करने वाली है ।
हमें प्रकृति के बिगड़े हुए रूप को सुधारने का प्रयत्न करना चाहिए ,हमें प्लास्टिक के प्रयोग से बचना चाहिए ,पॉलिथीन का उपयोग बंद करना चाहिए ,रसायनों का प्रयोग बंद करके प्राकृतिक खाद ,का गोबर खाद का उपयोग करना चाहिए ,और सबसे अहम भूमिका के रूप में *वृक्षारोपण* करना चाहिए ।वृक्षारोपण करने से हमारी प्रकृति हो सकता है हमे माफ कर दे ।
हमारे वृक्षारोपण से ही प्रकृति का संतुलन बनेगा ।प्रकृति में हो रही ये प्राकृतिक आपदाओं से हमें निजात मिलेगी ।हमने ही प्रकृति को बिगाड़ा है ,इसे हमें ही बनाना होगा ।
यदि हम प्रकृति को नहीं सजाएंगे तो वो दिन दूर नहीं जब प्रकृति हमें ही उजाड़ कर रख देगी ।इसीलिए प्रत्येक व्यक्ति से आग्रह है कि प्रकृति को सजाने के लिए वृक्षारोपण का कार्य प्रारंभ करें
लेखन —– आशीष पाण्डेय जिद्दी
दिनांक —11-09-2016 09826278837

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