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एक शेरनी गर्भवती थी


एक शेरनी गर्भवती थी. गर्भ पूरा हो चुका था. शिकारियों से भागने के लिए छलांग लगा रही थी कि छलांग के बीच में ही उसको बच्चा हो गया. शेरनी छलांग लगाकर एक टीले से दूसरे टीले पर तो पहुंच गई लेकिन बच्चा नीचे गिर गया……
नीचे भेड़ों की एक कतार गुजरती थी. वह बच्चा उस झुंड में पहुंच गया. था तो शेर का बच्चा लेकिन फिर भी भेड़ों को दया आ गई और उसे अपने झुंड में मिला लिया…..
भेड़ों ने उसे दूध पिलाया, पाला पोसा. शेर अब जवान हो गया. शेर का बच्चा था तो शरीर से सिंह ही हुआ लेकिन भेड़ों के साथ रहकर वह खुद को भेड़ मानकर ही जीने लगा…….
एक दिन उसके झुंड पर एक शेर ने धावा बोला. उसको देखकर भेड़ें भांगने लगीं. शेर की नजर भेड़ों के बीच चलते शेर पर पड़ी. दोनों एक दूसरे को आश्चर्य से देखते रहे……
सारी भेंड़े भाग गईं शेर अकेला रह गया. दूसरे शेर ने इस शेर को पकड़ लिया. यह शेर होकर भी रोने लगा. मिमियाया, गिड़गिड़ाया कि छोड़ दो मुझे. मुझे जाने दो. मेरे सब संगी साथी जा रहे हैं. मेरे परिवार से मुझे अलग न करो…..
दूसरे शेर ने फटकारा- अरे मूर्ख! ये तेरे संगी साथी नहीं हैं. तेरा दिमाग फिर गया है. तू पागल हो गया है. परन्तु वह नहीं माना. वह तो स्वयं को भेंड मानकर भेलचाल में चलता था…..
बड़ा शेर उसे घसीटता गया नदी के किनारे ले गया. दोनों ने नदी में झांका. बूढ़ा सिंह बोला- नदी के पानी में अपना चेहरा देख और पहचान. उसने देखा तो पाया कि जिससे जीवन की भीख मांग रहा है वह तो उसके ही जैसा है…….
उसे बोध हुआ कि मैं तो मैं भेड़ नहीं हूं. मैं तो इस सिंह से भी ज्यादा बलशाली और तगड़ा हूं. उसका आत्म अभिमान जागा. आत्मबल से भऱकर उसने भीषण गर्जना की……
सिंहनाद था वह. ऐसी गर्जना उठी उसके भीतर से कि उससे पहाड़ कांप गए. बूढ़ा सिंह भी कांप गया. उसने कहा- अरे! इतने जोर से दहाड़ता है? युवा शेर बोला- उसने जन्म से कभी दहाड़ा ही नहीं. बड़ी कृपा तुम्हारी जो मुझे जगा दिया…..
इसी दहाड़ के साथ उसका जीवन रूपांतरित हो गया….
यही बात मनुष्य के संबंध में भी हैं. अगर मनुष्य यह देख ले कि जो कृष्ण और श्रीराम में हैं वह उसमें भी है.
फिर हमारे भीतर से भी वह गर्जना फूटेगी- अहं ब्रह्मास्मि. मैं ब्रह्मा हूँ. गूंज उठेंगे पहाड़. कांप जाएंगे मन के भीतर घर बनाए सारे विकार और महसूस होगा अपने भीतर आनंद ही आनंद….
क्षत्रिय भी मैं हूँ..
ब्राहमण भी मैं हूँ..
जाट भी में हु…
राजपुत और मराठा भी मैं हुँ..
हिला कर रख दे
जो दुष्टोँ की हस्ती..तूफान ओर ज्वारभाटा भी मैँ हूँ…!!!!
बाल्मीकि भी मैं हूँ…..
विदुर नीति भी मैं हुँ..
दुष्ट सिकन्दर को हराने वाला
पौरूष भी मैं हुँ…
सर्वश्रैष्ठ गुरू चाणक्य
भी मैं हुँ..
महावीर कर्ण भी में हूँ
परशुराम भी मैं हूँ…
मुरलीधर मनोहर श्याम भी मैं हूँ..
एक वचन की खातिर वनवासी बननेवाला मर्यादा पुरूषोतम
श्रीराम भी मैं हूँ..!!!
शिवाजी और प्रताप भी मैं हुँ..
धधकती है जो जुल्म देखकर
‘हिन्दुत्व” नाम की आग भी मैं हुँ.. हाँ मैं हिन्दू हूँ…
जात पात मैं ना बाँटो मुझको…
मैं दुनिया का केन्द्र बिन्दु हुँ…
हाँ मैं हिन्दू हूँ….

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चश्मा साफ़ करते हुए उस बुज़ुर्ग ने


चश्मा साफ़ करते हुए उस बुज़ुर्ग ने
अपनी पत्नी से कहा : हमारे ज़माने में
मोबाइल नहीं थे..

पत्नी : पर ठीक पाँच बजकर पचपन
मिनट पर मैं पानी का ग्लास लेकर
दरवाज़े पे आती और आप आ पहुँचते..

पति : हाँ मैंने तीस साल नौकरी की
पर आज तक मैं ये नहीं समझ
पाया कि मैं आता इसलिए तुम
पानी लाती थी या तुम पानी लेकर
आती थी इसलिये मैं आता था..

पत्नी : हाँ.. और याद है.. तुम्हारे
रिटायर होने से पहले जब तुम्हें
डायबीटीज़ नहीं थी और मैं तुम्हारी
मनपसन्द खीर बनाती तब तुम कहते
कि आज दोपहर में ही ख़याल आया
कि खीर खाने को मिल जाए तो मज़ा
आ जाए..

पति : हाँ.. सच में.. ऑफ़िस से
निकलते वक़्त जो भी सोचता, घर पर
आकर देखता कि तुमने वही बनाया है..

पत्नी : और तुम्हें याद है जब पहली
डिलीवरी के वक़्त मैं मैके गई थी और
जब दर्द शुरु हुआ मुझे लगा काश..
तुम मेरे पास होते.. और घंटे भर में तो
जैसे कोई ख़्वाब हो, तुम मेरे पास थे..

पति : हाँ.. उस दिन यूँ ही ख़याल
आया कि ज़रा देख लूँ तुम्हें !!

पत्नी : और जब तुम मेरी आँखों में
आँखें डाल कर कविता की दो लाइनें बोलते..

पति : हाँ और तुम शर्मा के पलकें झुका
देती और मैं उसे कविता की ‘लाइक’ समझता !!

पत्नी : और हाँ जब दोपहर को चाय
बनाते वक़्त मैं थोड़ा जल गई थी और
उसी शाम तुम बर्नोल की ट्यूब अपनी
ज़ेब से निकाल कर बोले, इसे अलमारी
में रख दो..

पति : हाँ.. पिछले दिन ही मैंने देखा था
कि ट्यूब ख़त्म हो गई है,पता नहीं कब
ज़रूरत पड़ जाए, यही सोच कर मैं
ट्यूब ले आया था !!

पत्नी : तुम कहते आज ऑफ़िस के
बाद तुम वहीं आ जाना सिनेमा देखेंगे
और खाना भी बाहर खा लेंगे..

पति : और जब तुम आती तो जो
मैंने सोच रखा हो तुम वही साड़ी
पहन कर आती..

फिर नज़दीक जा कर उसका हाथ
थाम कर कहा : हाँ हमारे ज़माने में
मोबाइल नहीं थे..

पर..

“हम दोनों थे !!”

पत्नी : आज बेटा और उसकी बहू
साथ तो होते हैं पर..
बातें नहीं व्हाट्सएप होता है..
लगाव नहीं टैग होता है..
केमिस्ट्री नहीं कमेन्ट होता है..
लव नहीं लाइक होता है..
मीठी नोकझोंक नहीं अनफ़्रेन्ड होता है..

उन्हें बच्चे नहीं कैन्डीक्रश सागा,
टैम्पल रन और सबवे सर्फ़र्स चाहिए..

पति : छोड़ो ये सब बातें..
हम अब वायब्रंट मोड पे हैं
हमारी बैटरी भी 1 लाइन पे है..

अरे..!! कहाँ चली..?

पत्नी : चाय बनाने..

पति : अरे मैं कहने ही वाला था
कि चाय बना दो ना..

पत्नी : पता है.. मैं अभी भी कवरेज
में हूँ और मैसेज भी आते हैं..

दोनों हँस पड़े..

पति : हाँ हमारे ज़माने में
मोबाइल नहीं थे..!!

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*वृक्षारोपण ही उजड़ती प्रकृति के श्रृंगार का आधार*


*वृक्षारोपण ही उजड़ती प्रकृति के श्रृंगार का आधार*

*प्रकृति*– इस धरती पर उपस्थित जल, वायु, मिट्टी पत्थर ,जीव जंतु ,वनस्पतियां ,पेड़ पौधे , और वायुमंडल सब का संयुक्त रूप प्रकृति कहलाता है ।
इस प्रकृति में सबसे बुद्धिमान प्राणी ,विकासशील प्राणी है मानव ।जो संपूर्ण प्रकृति का दोहन /नाश करता आ रहा है ,प्रकृति ने सबको जीवन दिया है ,जीने के संसाधन दिए हैं ,सभी को अपनी अपनी आवश्यकता पूर्ति के लिये स्वयं को समर्पित कर दिया है ,लेकिन प्रकृति को सतत् चूस चूस कर अपना विकास करने वाला मानव भूल गया कि यदि हम प्रकृति से जितना ले रहे हैं उतना उसे वापस नहीं करेंगे तो यह प्रकृति नष्ट हो जाएगी ,और नष्ट होते होते संपूर्ण जीवन को पृथ्वी से समाप्त कर देगी ।
विकास और आधुनिकता के दौर में मानव सतत् जंगलों की कटाई करता रहा ,पेड़ नहीं लगाया ।धरती को खोदकर खनिज निकलता रहा ,पत्थर खुदाई करता रहा ,भू- क्षरण होता रहा ,वनों का विनाश होता रहा ,मानव तरक्की करता रहा ।
आज शनैः शनैः पूरी प्रकृति की संतुलन व्यवस्था चरमरा गई है ।वायुमंडल में विषैली गैसों की प्रचुरता हो गई है ,ग्लोबल वार्मिंग से हिमशैल/ग्लेशियर पिघलने लगे समुद्र नदियाँ सब अपना आक्रामक रूप दिखाने लगी ,जलवायु का संतुलन बिगड़ गया ,सूखा ,बाढ़ ,भूस्खलन ,ठंड ,गर्मी ,अतिवृष्टि ,गैस त्रासदी ,ज्वालामुखी का फटना आदि प्रकृति के होने वाले विनाश का संकेत हैं ।
जो पेड़ वायुमंडल की कार्बनडाइआक्साईड जैसी गैस को अपने भोजन के रूप में उपयोग करके जीवनदायिनी आक्सीजन गैस देते थे ,वो पेड़ निरंतर कटते जा रहे हैं ।मानव प्रकृति का उपहास करता चला आ रहा है ,ओजोन छिद्र विषैली कारेबनमोनोआक्साईड गैस के कारण बढ़ता जा रहा है ,जो हमारे वायुमंडल में ओजोन परत (जीवन रक्षक परत ) थी उसमें भी छेद हो गया है ,जो सूर्य से आने वाली हानिकारक पराबैंगनी किरणों को अवशोषित करती थी ,अब छिद्र के कारण पराबैंगनी किरणें पृथ्वी पर आने लगी हैं ,त्वचा कैंसर जैसी बीमारी इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है ,और वैज्ञानिकों का शोध इसकी पुष्टि करता है ।
हानिकारक प्लास्टिक से हमारी पृथ्वी बंजर हो रही है ,अधिक उत्पादन प्राप्त करने के लिये विभिन्न रसायनों का उपयोग हमारी जमीन को ,हमारे ,उत्पादन को हानि पहुंचा रहा है ,हम प्रकृति से उतना ही लें जितना प्रकृति स्वत: दे रही है ,यदि हम प्रकृति के साथ जबरदस्ती करेंगे तो प्रकृति हमें क्षमा नहीं करने वाली है ।
हमें प्रकृति के बिगड़े हुए रूप को सुधारने का प्रयत्न करना चाहिए ,हमें प्लास्टिक के प्रयोग से बचना चाहिए ,पॉलिथीन का उपयोग बंद करना चाहिए ,रसायनों का प्रयोग बंद करके प्राकृतिक खाद ,का गोबर खाद का उपयोग करना चाहिए ,और सबसे अहम भूमिका के रूप में *वृक्षारोपण* करना चाहिए ।वृक्षारोपण करने से हमारी प्रकृति हो सकता है हमे माफ कर दे ।
हमारे वृक्षारोपण से ही प्रकृति का संतुलन बनेगा ।प्रकृति में हो रही ये प्राकृतिक आपदाओं से हमें निजात मिलेगी ।हमने ही प्रकृति को बिगाड़ा है ,इसे हमें ही बनाना होगा ।
यदि हम प्रकृति को नहीं सजाएंगे तो वो दिन दूर नहीं जब प्रकृति हमें ही उजाड़ कर रख देगी ।इसीलिए प्रत्येक व्यक्ति से आग्रह है कि प्रकृति को सजाने के लिए वृक्षारोपण का कार्य प्रारंभ करें
लेखन —– आशीष पाण्डेय जिद्दी
दिनांक —11-09-2016 09826278837

Posted in यत्र ना्यरस्तुपूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:

​“ मैंने दहेज़ नहीं माँगा ”


😞 “ मैंने दहेज़ नहीं माँगा ” 😞

साहब मैं थाने नहीं आउंगा,

अपने इस घर से कहीं नहीं जाउंगा,

माना पत्नी से थोडा मन मुटाव था,

सोच में अन्तर और विचारों में खिंचाव था,

पर यकीन मानिए साहब ,
“ मैंने दहेज़ नहीं माँगा ”

मानता हूँ कानून आज पत्नी के पास है,

महिलाओं का समाज में हो रहा विकास है।

चाहत मेरी भी बस ये थी कि माँ बाप का सम्मान हो,

उन्हें भी समझे माता पिता, न कभी उनका अपमान हो।

पर अब क्या फायदा, जब टूट ही गया हर रिश्ते का धागा,

यकीन मानिए साहब,
“ मैंने दहेज़ नहीं माँगा ”
परिवार के साथ रहना इसे पसंन्द नहीं,

कहती यहाँ कोई रस, कोई आनन्द नही,

मुझे ले चलो इस घर से दूर, किसी किराए के आशियाने में,

कुछ नहीं रखा माँ बाप पर प्यार बरसाने में,

हाँ छोड़ दो, छोड़ दो इस माँ बाप के प्यार को,

नहीं मांने तो याद रखोगे मेरी मार को,

बस बूढ़े माता पिता का ही मोह, न छोड़ पाया मैं अभागा,

यकींन मानिए साहब,
“ मैंने दहेज़ नहीं माँगा ”

फिर शुरू हुआ वाद विवाद माँ बाप से अलग होने का,

शायद समय आ गया था, चैन और सुकून खोने का,

एक दिन साफ़ मैंने पत्नी को मना कर दिया,

न रहुगा माँ बाप के बिना ये उसके दिमाग में भर दिया।

बस मुझसे लड़ कर मोहतरमा मायके जा पहुंची,

2 दिन बाद ही पत्नी के घर से मुझे धमकी आ पहुंची,

माँ बाप से हो जा अलग, नहीं सबक सीखा देगे,

क्या होता है दहेज़ कानून तुझे इसका असर दिखा देगें।

परिणाम जानते हुए भी हर धमकी को गले में टांगा,

यकींन माँनिये साहब ,
“ मैंने दहेज़ नहीं माँगा ”

जो कहा था बीवी ने, आखिरकार वो कर दिखाया,

झगड़ा किसी और बात पर था, पर उसने दहेज़ का नाटक रचाया।

बस पुलिस थाने से एक दिन मुझे फ़ोन आया,

क्यों बे, पत्नी से दहेज़ मांगता है, ये कह के मुझे धमकाया।

माता पिता भाई बहिन जीजा सभी के रिपोर्ट में नाम थे,

घर में सब हैरान, सब परेशान थे,

अब अकेले बैठ कर सोचता हूँ, वो क्यों ज़िन्दगी में आई थी,

मैंने भी तो उसके प्रति हर ज़िम्मेदारी निभाई थी।

आखिरकार तमका मिला हमे दहेज़ लोभी होने का,

कोई फायदा न हुआ मीठे मीठे सपने सजोने का।

बुलाने पर थाने आया हूँ, छूप कर कहीं नहीं भागा,

लेकिन यकींन मानिए साहब ,
“ मैंने दहेज़ नहीं माँगा ”

😪 झूठे दहेज के मुकदमों के कारण ,
पुरुष के दर्द से ओतप्रोत एक मार्मिक कृति… 🙏🏻

दहेज की ये कविता कई घरो की हकीकत है

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रिपोर्टर: आपका प्रकोप दिनो-दिन बढ़ता ही जा रहा है, क्यों?


रिपोर्टर: आपका प्रकोप दिनो-दिन बढ़ता ही जा रहा है, क्यों?
मच्छर: सही शब्द इस्तेमाल कीजिये, इसे प्रकोप नहीं फलना-फूलना कहते हैं. पर तुम इंसान लोग तो दूसरों को फलते-फूलते देख ही नहीं सकते न, आदत से मजबूर जो ठहरे।

रिपोर्टर: हमें आपके फलने-फूलने से कोई ऐतराज़ नहीं है पर आपके काटने से लोग जान गँवा रहे हैं, जनता में भय व्याप्त हो गया है।
मच्छर: हम सिर्फ अपना काम कर रहे हैं. श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है कि ‘कर्म ही पूजा है’। अब विधाता ने तो हमें काटने के लिए ही बनाया है, हल में जोतने के लिए नहीं ! जहाँ तक लोगों के जान गँवाने का प्रश्न है तो आपको मालूम होना चाहिए कि `हानि-लाभ, जीवन-मरण, यश-अपयश विधि हाथ’।

रिपोर्टर: लोगों की जान पर बनी हुई है और आप हमें दार्शनिकता का पाठ पढ़ा रहे हैं।
मच्छर: आप तस्वीर का सिर्फ एक पहलू देख रहे हैं। हमारी वजह से कई लोगों को लाभ भी होता है, ये शायद आपको पता नहीं ! जाइये इन दिनों किसी डॉक्टर, केमिस्ट या पैथोलॉजी लैब वाले के पास, उसे आपसे बात करने की फ़ुर्सत नहीं होगी। अरे भैया, उनके बीवी-बच्चे हमारा ‘सीजन’ आने की राह देखते हैं, ताकि उनकी साल भर से पेंडिंग पड़ी माँगे पूरी हो सकें. क्या समझे आप? हम देश की इकॉनोमी बढाने में महत्त्वपूर्ण योगदान कर रहे हैं, ये मत भूलिये।

रिपोर्टर: परन्तु मर तो गरीब रहा है न, जो इलाज करवाने में सक्षम ही नहीं है।
मच्छर: हाँ तो गरीब जी कर भी क्या करेगा? जिस गरीब को आप अपना घर तो छोडो, कॉलोनी तक में घुसने नहीं देना चाहते, उसके साथ किसी तरह का संपर्क नहीं रखना चाहते, उसके मरने पर तकलीफ होने का ढोंग करना बंद कीजिये आप लोग।

रिपोर्टर: आपने दिल्ली में कुछ ज्यादा ही कहर बरपा रखा है।
मच्छर: देखिये हम नेता नहीं हैं जो भेदभाव करें… हम सभी जगह अपना काम पूरी मेहनत और लगन से करते हैं। दिल्ली में हमारी अच्छी परफॉरमेंस की वजह सिर्फ इतनी है कि यहाँ हमारे काम करने के लिए अनुकूल माहौल है। केंद्र और राज्य सरकार की आपसी जंग का भी हमें भरपूर फायदा मिला है।

रिपोर्टर: खैर, अब आखिर में आप ये बताइये कि आपके इस प्रकोप से बचने का उपाय क्या है?
मच्छर: उपाय तो है अगर कोई कर सके तो… लगातार सात शनिवार तक काले-सफ़ेद धब्बों वाले कुत्ते की पूँछ का बाल लेकर बबूल के पेड़ की जड़ में बकरी के दूध के साथ चढाने से हम प्रसन्न हो जायेंगे और उस व्यक्ति को नहीं काटेंगे।

रिपोर्टर: आप उपाय बता रहे हैं या अंधविश्वास फैला रहे हैं?
मच्छर: दरअसल आम हिंदुस्तानी लोग ऐसे ही उपायों के साथ आराम महसूस करते हैं। उन्हें विज्ञान से ज्यादा कृपा में यकीन होता है। वैसे सही उपाय तो साफ़-सफाई रखना है, जो रोज ही टीवी चैनलों और अखबारों के जरिये बताया जाता है, पर उसे मानता कौन है? अगर उसे मान लिया होता तो आज आपको मेरा इंटरव्यू लेने नहीं आना पड़ता।

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माँ भी जुठ बोलती है…….. ? ?


माँ भी जुठ बोलती है…….. ? ?
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एक पाँच साल का मासूम सा बच्चा अपनी छोटी बहन को लेकर मंदिर के एक तरफ कोने में बैठा हाथ जोडकर भगवान से न जाने क्या मांग रहा था….
कपड़े में मेल लगा हुआ था मगर निहायत साफ, उसके नन्हे नन्हे से गाल आँसूओं से भीग चुके थे। बहुत लोग उसकी तरफ आकर्षित थे और वह बिल्कुल अनजान अपने भगवान से बातों में लगा हुआ था।
जैसे ही वह उठा एक अजनबी ने बढ़ के उसका नन्हा सा हाथ पकड़ा और पूछा- “क्या मांगा भगवान से”
उसने कहा- “मेरे पापा मर गए हैं उनके लिए स्वर्ग, मेरी माँ रोती रहती है उनके लिए सब्र, मेरी बहन माँ से कपडे सामान मांगती है उसके लिए पैसे”।
“तुम स्कूल जाते हो” – अजनबी का सवाल स्वाभाविक सा सवाल था।
“हां जाता हूं” – उसने कहा।
“किस क्लास में पढ़ते हो ?” – अजनबी ने पूछा
“नहीं अंकल पढ़ने नहीं जाता, मां चने बना कर देती है वह स्कूल के बच्चों को बेचता हूँ, बहुत सारे बच्चे मुझसे चने खरीदते हैं, हमारा यही काम धंधा है” – बच्चे का एक एक शब्द मेरी रूह में उतर रहा था ।
“तुम्हारा कोई रिश्तेदार” – न चाहते हुए भी अजनबी बच्चे से पूछ बैठा।
“पता नहीं, माँ कहती है गरीब का कोई रिश्तेदार नहीं होता, माँ झूठ नहीं बोलती, पर अंकल, मुझे लगता है मेरी माँ कभी कभी झूठ बोलती है, जब हम खाना खाते हैं हमें देखती रहती है, जब कहता हूँ – माँ तुम भी खाओ, तो कहती है मेंने खा लिया था, उस समय लगता है वह झूठ बोलती है”
“बेटा अगर तुम्हारे घर का खर्च मिल जाय तो पढाई करोगे ?”
“बिल्कुलु नहीं” – उसने कहा
“क्यों” ? – अजनबी ने पूछा
“पढ़ाई करने वाले गरीबों से नफरत करते हैं अंकल,
हमें किसी पढ़े हुए ने कभी नहीं पूछा – पास से गुजर जाते हैं”
अजनबी हैरान भी था और शर्मिंदा भी।
फिर उसने कहा – “हर दिन इसी इस मंदिर में आता हूँ, कभी किसी ने नहीं पूछा – यहा सब आने वाले मेरे पिताजी को जानते थे – मगर हमें कोई नहीं जानता ।
“बच्चा जोर-जोर से रोने लगा” अंकल जब बाप मर जाता है तो सब अजनबी क्यों हो जाते हैं ?”
मेरे पास इसका कोई जवाब नही था और ना ही मेरे पास बच्चे के सवाल का जवाब है।
ऐसे कितने मासूम होंगे जो हसरतों से घायल हैं बस आप सब भी एक कोशिश कीजिये और अपने आसपास ऐसे ज़रूरतमंद यतिमो, बेसहाराओ को ढूंढिये और उनकी मदद किजिए… मंदिर मे सीमेंट या अन्न की बोरी देने से पहले अपने आस – पास किसी गरीब को देख लेना शायद उसको आटे की बोरी की ज्यादा जरुरत हो।
काश सभी गरीब को ऐसा एक इन्सान मिल जाये ! कही तो ऐसे बच्चो को भी अपना भगवान मिल जाए । कुछ समय के लिए एक गरीब बेसहारा कि आँख मे आँख डालकर जरूर देखना और बताना आपको क्या और कैसा महसूस होता है ?
“स्वयं में व समाज में बदलाव लाने के प्रयास जारी रखें।”

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एक इंसान घने जंगल में भागा जा रहा था।


एक इंसान घने जंगल में भागा जा रहा था।

शाम हो गई थी।

अंधेरे में कुआं दिखाई नहीं दिया और वह उसमें गिर गया।😁

गिरते-गिरते कुएं पर झुके पेड़ की एक डाल उसके हाथ में आ गई। जब उसने नीचे झांका, तो देखा कि कुएं में चार अजगर मुंह खोले उसे देख रहे हैं |

जिस डाल को वह पकड़े हुए था, उसे दो चूहे कुतर रहे थे।

इतने में एक हाथी आया और पेड़ को जोर-जोर से हिलाने लगा।

वह घबरा गया और सोचने लगा कि हे भगवान अब क्या होगा ?😨

उसी पेड़ पर मधुमक्खियों का छत्ता लगा था।

हाथी के पेड़ को हिलाने से मधुमक्खियां उडऩे लगीं और शहद की बूंदें टपकने लगीं।

एक बूंद उसके होठों पर आ गिरी। उसने प्यास से सूख रही जीभ को होठों पर फेरा, तो शहद की उस बूंद में गजब की मिठास थी।

कुछ पल बाद फिर शहद की एक और बूंद उसके मुंह में टपकी।

अब वह इतना मगन हो गया कि अपनी मुश्किलों को भूल गया।

तभी उस जंगल से शिव एवं पार्वती अपने वाहन से गुजरे।

पार्वती ने शिव से उसे बचने का अनुरोध किया।

भगवान शिव ने उसके पास जाकर कहा – मैं तुम्हें बचाना चाहता हूं। मेरा हाथ पकड़ लो।
उस इंसान ने कहा कि एक बूंद शहद और चाट लूं, फिर चलता हूं।

एक बूंद, फिर एक बूंद और हर एक बूंद के बाद अगली बूंद का इंतजार।

आखिर थक-हारकर शिवजी चले गए।

मित्रों..
वह जिस जंगल में जा रहा था,
वह जंगल है 👉दुनिया,
अंधेरा है 👉अज्ञान –
पेड़ की डाली है 👉आयु
दिन-रात रूपी चूहे उसे कुतर रहे हैं।

घमंड का मदमस्त हाथी पेड़ को उखाडऩे में लगा है।

शहद की बूंदें सांसारिक सुख हैं, जिनके कारण मनुष्य खतरे को भी अनदेखा कर देता है…..।

Posted in PM Narendra Modi

मंगलवार को कश्मीर के विषय पर चिंतित प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आंखे उस समय नम हो गई,


मंगलवार को कश्मीर के विषय पर चिंतित प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आंखे उस समय नम हो गई,

जब पता चला कि उनकी भतीजी की मृत्यु हो गई है…
उनकी गोद में खेलने वाली नन्ही बच्ची भगवान के पास चली गयी…
आपको बता दे कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भतीजी निकुंज बेन दिल की बीमारी लंबे समय से ग्रसित थी…
वो इस बीमारी से वर्षों से जूझ रही थीं… मंगलवार को अस्पताल में लंबी चिकित्सा के बाद डॉक्टरों ने निंकुज बेन को मृत घोषित कर दिया।

एक तरफ घर में भतीजी निकुंज बेन की मृत्यु का दुःख, दूसरी ओर कश्मीर की परिस्थितियों का गहन चिंतन…
परंतु दुःख की इन घड़ियों में भी प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी जी लाओस पहुंचे।

निकुंज बेन के पति कंप्यूटर की एक दुकान में मरम्मत का कार्य करते है हैं… निकुंज किराए के मकान में रहकर सिलाई कढाई करके अपने परिवार का पेट पालने में अपनी पति का सहयोग करती थी जबकि वो विश्व के सर्वाधिक शक्ति संपन्न प्रधानमन्त्री की सगी भतीजी थी…

हम नमन करते हैं ऐसे परिवार के सदस्यों को भी जिन्होने संबंधों की दीवार पर कभी स्वार्थ के चित्र नही टांगे…
किसी अन्य व्यक्ति में इतना सामर्थ्य है क्या..??

मोदी जी यदि चाहते तो अपनी भतीजी की समुचित चिकित्सा भारत के किसी भी बड़े अस्पताल में करवा सकते थे…
मगर खबरंडियों और सभी विरोधी पार्टियाँ मोदी जी के नाम सरकारी धन के दुरूपयोग का नया आरोप जड़ देते।
मोदी जी के रिश्तेदार यदि चाहते तो वो अपने रिश्ते के नाम मात्र से ही धन अर्जित कर अपने जीवन को सरल बना सकते थे…
धन्य है वो माता पिता जिसके गर्भ से मां भारती के ऐसे सपूतों ने जन्म लिया।

कुछ शर्म आये तो उन लोगों से मेरा प्रश्न है जो विरोधियों के पक्षधर है कि तुम्हारे किसी भी नेता क्या इतनी शक्ति और सहनशीलता है क्या ???
इन तमाम काग्रेसियों, बसपाईयों, सपाईयों, आपियों, वामपंथियों को तो शर्म कभी आयेगी नही…
मगर मेरा हृदय बहुत व्याकुल है…
बाकी के सभी नेताओं…
डूब मरो, यदि थोड़ी शर्म शेष है तो…

रुला दिया मोदी जी…
रुला दिया आपकी निष्ठा ने…
वर्तमान के “अपवाद” हो आप…

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आनंद का झरना:-


आनंद का झरना:-

बेल बजी तो द्वार खोला। द्वार पर शिवराम खड़ा था।

शिवराम हमारी सोसायटी के लोगों की गाड़ियाँ, बाइक्स वगैरह धोने का काम करता था।

“साहब, जरा काम था।”

“तुम्हारी पगार बाकी है क्या, मेरी तरफ ? ”

“नहीं साहब, वो तो कब की मिल गई। पेड़े देने आया था, बेटा दसवीं पास हो गया।”

“अरे वाह ! आओ अंदर आओ।”

मैंने उसे बैठने को कहा। उसने मना किया लेकिन फिर, मेरे आग्रह पर बैठा। मैं भी उसके सामने बैठा तो उसने पेड़े का पैकेट मेरे हाँथ पर रखा।

“कितने मार्क्स मिले बेटे को ?”

“बासठ प्रतिशत।”

“अरे वाह !” उसे खुश करने को मैं बोला।

आजकल तो ये हाल है कि, 90 प्रतिशत ना सुनो तो आदमी फेल हुआ जैसा मालूम होता है। लेकिन शिवराम बेहद खुश था।

“साहब, मैं बहुत खुश हूँ। मेरे खानदान में इतना पढ़ जाने वाला मेरा बेटा ही है।”

“अच्छा, इसीलिए पेड़े वगैरह !”

शिवराम को शायद मेरा ये बोलना अच्छा नहीं लगा। वो हलके से हँसा और बोला, “साहब, अगर मेरी सामर्थ्य होती तो हर साल पेड़े बाँटता। मेरा बेटा बहुत होशियार नहीं है, ये मुझे मालूम है। लेकिन वो कभी फेल नहीं हुआ और हर बार वो 2-3 प्रतिशत नंबर बढ़ाकर पास हुआ, क्या ये ख़ुशी की बात नहीं ?”

“साहब, मेरा बेटा है, इसलिए नहीं बोल रहा, लेकिन बिना सुख सुविधाओं के वो पढ़ा, अगर वो सिर्फ पास भी हो जाता, तब भी मैं पेड़े बाँटता।”

मुझे खामोश देख शिवराम बोला, “माफ करना साहब, अगर कुछ गलत बोल दिया हो तो। मेरे बाबा कहा करते थे कि, आनंद अकेले ही मत हजम करो बल्कि, सब में बाँटो।

 

ये सिर्फ पेड़े नहीं हैं साहब – ये मेरा आनंद है !”

मेरा मन भर आया। मैं उठकर भीतरी कमरे में गया और एक सुन्दर पैकेट में कुछ रुपए रखे।

भीतर से ही मैंने आवाज लगाई, “शिवराम, बेटे का नाम क्या है ?”

“विशाल।” बाहर से आवाज आई।

मैंने पैकेट पर लिखा – प्रिय विशाल, हार्दिक अभिनंदन ! अपने पिता की तरह सदा, आनंदित रहो !

“शिवराम ये लो।”

“ये किसलिए साहब ? आपने मुझसे दो मिनिट बात की, उसी में सब कुछ मिल गया।”

” ये विशाल के लिए है ! इससे उसे उसकी पसंद की पुस्तक लेकर देना।”

शिवराम बिना कुछ बोले पैकेट को देखता रहा।

“चाय वगैरह कुछ लोगे ?”

” नहीं साहब, और शर्मिन्दा मत कीजिए। सिर्फ इस पैकेट पर क्या लिखा है, वो बता दीजिए, क्योंकि मुझे पढ़ना नहीं आता।”

“घर जाओ और पैकेट विशाल को दो, वो पढ़कर बताएगा तुम्हें।”

मैंने हँसते हुए कहा।

मेरा आभार मानता शिवराम चला गया लेकिन उसका आनंदित चेहरा मेरी नजरों के सामने से हटता नहीं था।

आज बहुत दिनों बाद एक आनंदित और संतुष्ट व्यक्ति से मिला था।

आजकल ऐंसे लोग मिलते कहाँ हैं। किसी से जरा बोलने की कोशिश करो और विवाद शुरू। मुझे उन माता पिताओं के लटके हुए चेहरे याद आए जिनके बच्चों को 90-95 प्रतिशत अंक मिले थे। अपने बेटा/बेटी को कॉलेज में एडमीशन मिलने तक उनका आनंद गायब ही रहता था।

हम उन पर क्यूँ हँसें ? आखिर हम सब भी तो वैसे ही हैं – आनंद से रूठे !

सही मायनों में तो आनंद का झरना हमारे भीतर ही बहता है, चाहे जब डुपकी मारिए।

लेकिन हम लोग झरने के किनारे खड़े होकर, पानी के टैंकर की प्रतीक्षा करते रहते हैं।

 

दूसरों से तुलना करते हुए

और पैसे,

और कपड़े,

और बड़ा घर,

और हाई पोजीशन,

और परसेंटेज…!

 

इस *और* के पीछे भागते भागते उस आनंद के झरने से कितनी दूर चले आए  हम…!!!!!!!!!!!😐😐😐

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सुखी रहने का महामन्त्र


सुखी रहने का महामन्त्र

👀👀👀👀👀👀

एक बार की बात है संत तुकाराम अपने आश्रम में बैठे हुए थे। तभी उनका एक शिष्य, जो स्वाभाव से थोड़ा क्रोधी था उनके समक्ष आया और बोला, ” गुरूजी, आप कैसे अपना व्यवहार इतना मधुर बनाये रहते हैं, ना आप किसी पे क्रोध करते हैं और ना ही किसी को कुछ भला-बुरा कहते हैं?”

कृपया अपने इस अच्छे व्यवहार का रहस्य बताइए।

संत बोले,” मुझे अपने रहस्य के बारे में तो नहीं पता, पर मैं तुम्हारा रहस्य

जानता हूँ !”

“मेरा रहस्य! वह क्या है गुरु जी?”,

शिष्य ने आश्चर्य से पूछा।

” तुम अगले एक हफ्ते में मरने वाले

हो!”, संत तुकाराम दुखी होते हुए बोले।

कोई और कहता तो शिष्य ये बात

मजाक में टाल सकता था, पर स्वयं संत तुकाराम के मुख से निकली बात को कोई कैसे काट सकता था?

शिष्य उदास हो गया और गुरु का

आशीर्वाद ले वहां से चला गया।

उस समय से शिष्य का स्वाभाव

बिलकुल बदल सा गया। वह हर किसी से प्रेम से मिलता और कभी किसी पे क्रोध न करता, अपना ज्यादातर समय ध्यान और पूजा में लगाता। वह उनके पास भी जाता जिससे उसने कभी गलत व्यवहार किया हो और उनसे माफ़ी मांगता।

देखते-देखते संत की भविष्यवाणी को

एक हफ्ते पूरे होने को आये। शिष्य ने

सोचा चलो एक आखिरी बार गुरु के

दर्शन कर आशीर्वाद ले लेते हैं।

वह उनके समक्ष पहुंचा और बोला, ”

गुरु जी, मेरा समय पूरा होने वाला है,

कृपया मुझे आशीर्वाद दीजिये!”

“मेरा आशीर्वाद हमेशा तुम्हारे साथ है

पुत्र। अच्छा, ये बताओ कि पिछले

सात दिन कैसे बीते? क्या तुम पहले की तरह ही लोगों से नाराज हुए, उन्हें

अपशब्द कहे?”, संत तुकाराम ने

प्रश्न किया।

“नहीं-नहीं, बिलकुल नहीं। मेरे पास

जीने के लिए सिर्फ सात दिन थे, मैं इसे बेकार की बातों में कैसे गँवा सकता था?

मैं तो सबसे प्रेम से मिला, और जिन लोगों का कभी दिल दुखाया था उनसे क्षमा भी मांगी”, शिष्य तत्परता से बोला।

संत तुकाराम मुस्कुराए और बोले, “बस यही तो मेरे अच्छे व्यवहार का रहस्य है।

मैं जानता हूँ कि मैं कभी भी मर

सकता हूँ, इसलिए मैं हर किसी से

प्रेमपूर्ण व्यवहार करता हूँ, और यही

मेरे अच्छे व्यवहार का रहस्य है।

 

शिष्य समझ गया कि संत तुकाराम ने उसे जीवन का यह पाठ पढ़ाने के लिए ही मृत्यु का भय दिखाया था ।

वास्तव में हमारे पास भी सात दिन ही बचें हैं :-

1रवि 2सोम 3मंगल 4बुध 5गुरु 6शुक्र और 7शनि

आठवां दिन तो बना ही नहीं है ।

आइये आज से परिवर्तन आरम्भ करें ।                    🍁नमः शिवाय 🍁