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एक राजमहल में कामवाली और उसका बेटा काम करते थे!


**एक राजमहल में कामवाली और उसका बेटा काम करते थे!*

*एक दिन राजमहल में कामवाली के बेटे को हीरा मिलता है।*

*वो माँ को बताता है….*

*कामवाली होशियारी से वो हीरा बाहर फेककर कहती है ये कांच है हीरा नहीं…..*

*कामवाली घर जाते वक्त चुपके से वो हीरा उठाके ले जाती है।*

*वह सुनार के पास जाती है…*
*सुनार समझ जाता है इसको कही मिला होगा,*
*ये असली या नकली पता नही इसलिए पुछने आ गई.*
*सुनार भी होशियारीसें वो हीरा बाहर फेंक कर कहता है!! ये कांच है हीरा नहीं।*
*कामवाली लौट जाती है। सुनार वो हीरा चुपके सेे उठाकर जौहरी के पास ले जाता है,*

*जौहरी हीरा पहचान लेता है।*
*अनमोल हीरा देखकर उसकी नियत बदल जाती है।*
*वो भी हीरा बाहर फेंक कर* *कहता है ये कांच है हीरा नहीं।*
*जैसे ही जौहरी हीरा बाहर फेंकता है…*

*उसके टुकडे टुकडे हो जाते है…*

*यह सब एक राहगीर निहार रहा था…*
*वह हीरे के पास जाकर पूछता है…*
*कामवाली और सुनार ने दो बार तुम्हे फेंका…*
*तब तो तूम नही टूटे…*
*फिर अब कैसे टूटे?*

*हीरा बोला….*
*कामवाली और सुनार ने दो बार मुझे फेंका*

*क्योंकि…*
*वो मेरी असलियत से अनजान थे।*

*लेकिन….*
*जौहरी तो मेरी असलियत जानता था…*

*तब भी उसने मुझे बाहर फेंक दिया…*
*यह दुःख मै सहन न कर सका…*
*इसलिए मै टूट गया …..*

*ऐसा ही…*
*हम मनुष्यों के साथ भी होता है !!!*

*जो लोग आपको जानते है,*
*उसके बावजुत भी आपका दिल दुःखाते है*
*तब यह बात आप सहन नही कर पाते….!😢*

*इसलिए….*
*कभी भी अपने स्वार्थ के लिए करीबियों का दिल ना तोड़ें…!!*

*हमारे आसपास भी… बहुत से लोग… हीरे जैसे होते है !*
*उनकी दिल और भावनाओं को .. कभी भी मत दुखाएं…*
*और ना ही… उनके अच्छे गुणों के टुकड़े करिये…!!*

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जब इतिहास की सबसे खूबसूरत महिला को मिली “वेश्या बनने की सजा”


जब इतिहास की सबसे खूबसूरत महिला को मिली “वेश्या बनने की सजा”
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भारत का इतिहास विविधताओं से भरा पड़ा है। कदम-कदम पर यहां एक ऐसी कहानी या हकीकत से सामना होता है जो एक बारगी अचरज तो पैदा करती है लेकिन अगर वो सच है तो उसे अपनाने के अलावा और कोई विकल्प भी नहीं होता। निश्चित तौर पर भारत में कुछ विषय शुरुआत से ही चर्चित रहे हैं, जिनमें जादू-टोने, भूत-प्रेत, राजनीति के अलावा महिलाओं की स्थिति शामिल हैं। वेश्यावृत्ति को तो भारत के सबसे पुराने पेशे के तौर भी जाना जाना जाता है। वर्तमान दौर में वेश्याओं को समाज की हीनभावना का शिकार होना पड़ता है लेकिन शुरुआत से ऐसा कभी नहीं था, क्योंकि भारत में वेश्याओं का इतिहास बेहद दिलचस्प और शान-शौकत से भरा रहा है।
×
यह कहानी है भारतीय इतिहास की सबसे खूबसूरत महिला के नाम से विख्यात ‘आम्रपाली’ की, जिसे
अपनी खूबसूरती की कीमत वेश्या बनकर चुकानी
पड़ी। वह किसी की पत्नी तो नहीं बन सकी लेकिन
संपूर्ण नगर की नगरवधू जरूर बन गई। आम्रपाली ने
अपने लिए ये जीवन स्वयं नहीं चुना था, बल्कि
वैशाली में शांति बनाए रखने, गणराज्य की अखंडता
बरकरार रखने के लिए उसे किसी एक की पत्नी ना बनाकर नगर को सौंप दिया गया। उसने सालो तक
वैशाली के धनवान लोगों का मनोरंजन किया लेकिन
जब वह तथागत बुद्ध के संपर्क में आई तो सबकुछ
छोड़कर बौद्ध भिक्षुणी बन गई।
×
आम्रपाली के जैविक माता-पिता का तो पता नहीं लेकिन जिन लोगों ने उसका पालन किया उन्हें वह एक आम के पेड़ के नीचे मिली थी, जिसकी वजह से उसका नाम आम्रपाली रखा गया। वह बहुत खूबसूरत थी, उसकी आंखें बड़ी-बड़ी और काया बेहद आकर्षक थी। जो भी उसे देखता था वह अपनी नजरें उस पर से हटा नहीं पाता था। लेकिन उसकी यही खूबसूरती, उसका यही आकर्षण उसके लिए श्राप बन गया। एक आम लड़की की तरह वो भी खुशी-खुशी अपना जीवन जीना चाहती थी लेकिन ऐसा हो नहीं सका। वह अपने दर्द को कभी बयां नहीं कर पाई और अंत में वही हुआ जो उसकी नियति ने उससे करवाया। आम्रपाली जैसे-जैसे बड़ी हुई उसका सौंदर्य चरम पर पहुंचता गया जिसकी वजह से वैशाली का हर पुरुष उसे अपनी दुल्हन बनाने के लिए बेताब रहने लगा। लोगों में आम्रपाली की दीवानगी इस हद तक थी की वो उसको पाने के लिए किसी भी हद तक जा सकते थे। यही सबसे बड़ी समस्या थी। आम्रपाली के माता-पिता जानते थे की आम्रपाली को जिसको भी सौपा गया तो बाकी के लोग उनके दुश्मन बन जाएंगे और वैशाली में खून की नदिया बह जाएंगी। इसीलिए वह किसी भी नतीजे पर नहीं पहुंच पा रहे थे।
×
इसी समस्या का हल खोजने के लिए एक दिन वैशाली में सभा का आयोजन हुआ। इस सभा में मौजूद सभी पुरुष आम्रपाली से विवाह करना चाहते थे जिसकी वजह से कोई निर्णय लिया जाना मुश्किल हो गया था। इस समस्या के समाधान हेतु अलग-अलग विचार प्रस्तुत किए गए लेकिन कोई इस समस्या को सुलझा नहीं पाया। खूबसूरत नैन-नक्श वाली आम्रपाली को हर कोई अपनी जीवन संगिनी बनाना चाहता था, लेकिन वह किसकी अर्धांगिनी बनेगी इस बात पर नगर में शीत युद्ध सा माहौल पैदा हो गया था। अगर वह किसी एक का हाथ थामती तो अन्य लोग आक्रोश में आ जाते, इसलिए उसके भाग्य में कुछ ऐसा लिख दिया गया जिसकी कल्पना तक उसने नहीं की होगी। वह वैशाली की नगरवधू बन गई, जिसके आगे अमीर से अमीर व्यक्ति, हर नामचीन हस्ती अपना सिर झुकाती थी और उसकी सोहबत के लिए तरसती थी। यह भी कहा जाता है कि आलीशान महल और सभी सुख-सुविधाओं से लैस जीवन व्यतीत करने वाली आम्रपाली के पास इतनी धन-दौलत थी कि वह राजा को भी पैसे उधार दिया करती थी। आम्रपाली अकेली ऐसी शख्सियत नहीं थी वरन् इतिहास ऐसी स्त्रियों की कहानियों से भरा हुआ है। फर्क बस यही है कि पहले हर स्त्री इनकी शान, खूबसूरती और लोकप्रियता से जलन करती थी और खुद अपने लिए ऐसा ही भविष्य मांगती थी वहीं जब से उन्हें ‘कोठेवाली’ की संज्ञा दी जाने लगी तबसे उनकी छवि खराब होने लगी। मुगल काल के शासक वेश्याओं की बुद्धिमानी और उनकी सुंदरता, दोनों के ही कायल थे। वह उन्हें अपने जीवन में खास महत्व देते थे। आज के दौर में भले ही मजबूरी की वजह से महिलाएं वेश्यावृत्ति को चुनती हों लेकिन पहले यह एक गर्व और गुमान करने वाली बात होती थी।
×
लेकिन आम्रपाली की कहानी यही समाप्त नहीं होती है। आम्रपाली नगरवधू बनकर सालो तक वैशाली के लोगों का मनोरंजन करती है लेकिन जब एक दिन वो भगवान बुद्ध के संपर्क में आती है तो सबकुछ छोड़कर एक बौद्ध भिक्षुणी बन जाती है। आइये आम्रपाली के भिक्षुणी बनने की कहानी भी जान लेते हैं :-
×
आम्रपाली और बुद्ध :
बुद्ध अपने एक प्रवास में वैशाली आये। कहते हैं कि उनके साथ सैकड़ों शिष्य भी हमेशा साथ रहते थे। सभी शिष्य प्रतिदिन वैशाली की गलियों में भिक्षा मांगने जाते थे। वैशाली में ही आम्रपाली का महल भी था। वह वैशाली की सबसे सुन्दर स्त्री और नगरवधू थी। वह वैशाली के राजा, राजकुमारों, और सबसे धनी और शक्तिशाली व्यक्तियों का मनोरंजन करती थी। एक दिन उसके द्वार पर भी एक भिक्षुक भिक्षा मांगने के लिए आया। उस भिक्षुक को देखते ही वह उसके प्रेम में पड़ गयी। वह प्रतिदिन ही राजा और राजकुमारों को देखती थी पर मात्र एक भिक्षापात्र लिए हुए उस भिक्षुक में उसे अनुपम गरिमा और सौंदर्य दिखाई दिया। वह अपने परकोटे से भागी आई और भिक्षुक से बोली – “आइये, कृपया मेरा दान ग्रहण करें” ।
×
उस भिक्षुक के पीछे और भी कई भिक्षुक थे। उन सभी को अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हुआ। जब युवक भिक्षु आम्रपाली की भवन में भिक्षा लेने के लिए गया तो वे ईर्ष्या और क्रोध से जल उठे। भिक्षा देने के बाद आम्रपाली ने युवक भिक्षु से कहा – “तीन दिनों के बाद वर्षाकाल प्रारंभ होने वाला है, मैं चाहती हूँ कि आप उस अवधि में मेरे महल में ही रहें.”
युवक भिक्षु ने कहा – “मुझे इसके लिए अपने स्वामी तथागत बुद्ध से अनुमति लेनी होगी। यदि वे अनुमति देंगे तो मैं यहाँ रुक जाऊँगा।”
उसके बाहर निकलने पर अन्य भिक्षुओं ने उससे बात की। उसने आम्रपाली के निवेदन के बारे में बताया। यह सुनकर सभी भिक्षु बड़े क्रोधित हो गए। वे तो एक दिन के लिए ही इतने ईर्ष्यालु हो गए थे और यहाँ तो पूरे चार महीनों की योजना बन रही थी! युवक भिक्षु के बुद्ध के पास पहुँचने से पहले ही कई भिक्षु वहां पहुँच गए और उन्होंने इस वृत्तांत को बढ़ा-चढ़ाकर सुनाया – “वह स्त्री वैश्या है और एक भिक्षु वहां पूरे चार महीनों तक कैसे रह सकता है!?”
बुद्ध ने कहा – “शांत रहो, उसे आने दो। अभी उसने रुकने का निश्चय नहीं किया है, वह वहां तभी रुकेगा जब मैं उसे अनुमति दूंगा।”
×
युवक भिक्षु आया और उसने बुद्ध के चरण छूकर सारी बात बताई – “आम्रपाली यहाँ की नगरवधू है।
उसने मुझे चातुर्मास में अपने महल में रहने के लिए
कहा है। सारे भिक्षु किसी-न-किसी के घर में रहेंगे।
मैंने उसे कहा है कि आपकी अनुमति मिलने के बाद ही
मैं वहां रह सकता हूँ।”
बुद्ध ने उसकी आँखों में देखा और कहा – “तुम वहां
रह सकते हो।”
यह सुनकर कई भिक्षुओं को बहुत बड़ा आघात पहुंचा। वे सभी इसपर विश्वास नहीं कर पा रहे थे कि
बुद्ध ने एक युवक शिष्य को एक वैश्या के घर में
चार मास तक रहने के लिए अनुमति दे दी। तीन दिनों
के बाद युवक भिक्षु आम्रपाली के महल में रहने के
लिए चला गया। अन्य भिक्षु नगर में चल रही बातें
बुद्ध को सुनाने लगे – “सारे नगर में एक ही चर्चा हो
रही है कि एक युवक भिक्षु आम्रपाली के महल में
चार महीनों तक रहेगा!”
बुद्ध ने कहा – “तुम सब अपनी चर्या का पालन
करो। मुझे अपने शिष्य पर विश्वास है। मैंने उसकी
आँखों में देखा है कि उसके मन में अब कोई इच्छाएं
नहीं हैं। यदि मैं उसे अनुमति न भी देता तो भी उसे
बुरा नहीं लगता। मैंने उसे अनुमति दी और वह चला
गया। मुझे उसके ध्यान और संयम पर विश्वास है।
तुम सभी इतने व्यग्र और चिंतित क्यों हो रहे हो?
यदि उसका धम्म अटल है तो आम्रपाली भी उससे
प्रभावित हुए बिना नहीं रहेगी। और यदि उसका धम्म
निर्बल है तो वह आम्रपाली के सामने समर्पण कर
देगा। यह तो भिक्षु के लिए परीक्षण का समय है।
बस चार महीनों तक प्रतीक्षा कर लो, मुझे उसपर
पूर्ण विश्वास है। वह मेरे विश्वास पर खरा
उतरेगा।”
उनमें से कई भिक्षुओं को बुद्ध की बात पर विश्वास
नहीं हुआ। उन्होंने सोचा – “वे उसपर नाहक ही इतना
भरोसा करते हैं। भिक्षु अभी युवक है और आम्रपाली
बहुत सुन्दर है। वे भिक्षु संघ की प्रतिष्ठा को खतरे
में डाल रहे हैं।” – लेकिन वे कुछ कर भी नहीं सकते
थे।
×
चार महीनों के बाद युवक भिक्षु विहार लौट आया
और उसके पीछे-पीछे आम्रपाली भी बुद्ध के पास
आई। आम्रपाली ने बुद्ध से भिक्षुणी संघ में प्रवेश
देने की आज्ञा माँगी। उसने कहा – “मैंने आपके
भिक्षु को अपनी ओर खींचने के हर संभव प्रयास
किये पर मैं हार गयी। उसके आचरण ने मुझे यह
मानने पर विवश कर दिया कि आपके चरणों में ही
सत्य और मुक्ति का मार्ग है। मैं अपनी समस्त
सम्पदा भिक्षु संघ के लिए दान में देती हूँ। ”
आम्रपाली के महल और उपवनों को चातुर्मास में
सभी भिक्षुओं के रहने के लिए उपयोग में लिया जाने
लगा। आगे चलकर वह बुद्ध के संघ में सबसे प्रतिष्ठित भिक्षुणियों में से एक बनी।
×
आम्रपाली के जीवन पर आचार्य चतुरसेन शास्त्री द्वारा लिखा गया प्रसिद्ध उपन्यास “वैशाली की नगरवधू” भी आप में से बहुतों ने पढ़ा होगा।

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एक बार एक कवि हलवाई की दुकान पहुँ


एक बार एक कवि हलवाई की दुकान पहुँचे, जलेबी दही ली और वहीं खाने बैठ गये। इतने में एक कौआ कहीं से आया और दही की परात में चोंच मारकर उड़ चला। पर हलवाई से देखा न गया उसने कोयले का एक टुकड़ा उठाया और कौए को दे मारा। कौए की किस्मत ख़राब, कोयले का टुकड़ा उसे जा लगा और वो मर गया। कवि महोदय ये घटना देख रहे थे । कवि हृदय जगा। जब वो जलेबी दही खाने के बाद पानी पीने पहुँचे तो वहां एक पंक्ति लिख दी।
कवि ने लिखा – ” काग दही पर जान गँवायो ”
तभी वहाँ एक रिश्वतखोर कर्मचारी महोदय जो कागजों में हेराफेरी की वजह से नौकरी से बर्खास्त हो गये थे, पानी पीने पहुँचे। कवि की लिखी पंक्तियों पर जब उनकी नजर पड़ी तो अनायास ही उनके मुँह से निकल पड़ा , मुझ पर कितनी सही बात लिखी है ! क्योंकि उन्होने उसे कुछ इस तरह पढ़ा-
” कागद ही पर जान गँवायो ”
तभी एक मजनू टाइप हंसमुखी आदमी भी पिटा पिटाया सा वहाँ पानी पीने पहुँचा । उसे भी लगा कितनी सच्ची और सही बात लिखी है ! काश उसे ये पहले पता होती, क्योंकि उसने उसे कुछ यूँ पढ़ा था –
“का गदही पर जान गँवायो ”
आज समझ गए न ! तुलसीदास जी की लाइनें कितनी सही हैं –
” जाकी रही भावना जैसी
प्रभु मूरत देखी तिन तैसी ”
अर्थात
जिसकी जैसी दृष्टि (भावना) होती है, उसे वैसी ही मूरत नज़र आती है.

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सियार की दुर्गति


सियार की दुर्गति 🙂
*****
एक था सियार। बदमाशों का सरदार। रोज़ एक किसान के झोंपड़े में घुसता, मटकी फोड़ता और मटकी में बना भात खाकर चला जाता। किसी तरह पकड़ में नहीं आता था। एक दिन किसान अपने खेत पर गया ही नहीं। वह दिन-भर एक पेड़ की आड़ में छिपा रहा। दोपहर हुई। सियार आया। उसने खपरैल आगे-पीछे किए और ऊपर से अन्दर गया। मटकी फोड़ी। भात खाया। किसान ने सब देखा और कहा, “अच्छा, तो यह इसीकी करतूत है। इसे एक बार पकड़कर इसकी अच्छी मरम्मत करूंगा।”
जैसे ही सियार बाहर जाने को निकला, किसान ने
फन्दा डाकर उसे पकड़ लिया, और पेड़ की डाल
पर औंधे मुंह लटका दिया। सियार ने औंधे मुंह के
साथ खूब झूला झल लिया। जाते-जाते किसान
अपनी घरवाली से कहता गया, “सुनती हो! आज
हमें इस सियार को पकाकर खाना है। मैं कुछ ही
देर में लौटकर आऊंगा और इसे काटूंगा।”
सियार ने सुना, तो उसके होश गायब हो गए।
लेकिन उसने हिम्मत से काम लिया। सोचा
—‘मरना तो है ही। देखूं, किसी तरकीब से
छुटकारा मिल जाए, तो अच्छा है।’
किसान की घरवाली धान कूट रही थी। बार-बार
मूसल चलाकर वह थक रही थी। मौक़ा देखकर सियार बोला, “मां, तुम नाहक इतनी मेहनत क्यों करती हो? तुम्हारा सारा धान तो मैं ही कूट दूंगा। मुझे धान कूटने की आदत है।” किसान की घरवाली सियार के कहने में आ गई। भोली जो ठहरी! उसने सियार की रस्सी खोल दी। सियार गम्भीर बनकर धान कूटने बैठा। बैठे-बैठे सोचता रहा—‘कब मौक़ा मिले, और मैं कब भागूं?’ इसी बीच घरवाली किसी काम से घर के अन्दर गई, और सियार नौ-दो ग्यारह हो गया। और दूर जंगल में बनी अपनी गुफा में जा पहुंचा।
सियार को गया देखकर किसान की घरवाली रोने
लगी, “हाय राम! अब क्या होगा? वे खेत पर से
आयंगे और कहेंगे कि ‘ला, मेरा सियार ला’ तो मैं
उनसे क्या कहूंगी?”
घर के अन्दर रहने वाले एक चूहे ने उसका रोना
सुना। वह अपने बिल में से बाहर निकला और
बोला, “मां! तुम रोती क्यों हो? सियार को तो मैं
अभी लिवा लाता हूं। तुम रोना बन्द करो।”
किसान की घरवाली बोली, “भैया! तुम उसे ला
दोगे तो मैं तुम्हारा बड़ा एहसान मानूंगी। तुम्हें
रोज़ भरपेट खाना खिलाऊंगी।”
चूहा बोला, “मां! तुम मेरी पूंछ से एक टोकनी बांध
दो, और उसमें खाने की कुछ चीज़ें रख दो।”
घरवालों ने चूहे की पूंछ से एक टोकनी बांध दी
और उसमें खाने का कुछ सामान रख दिया। अब
चूहा सियार की खोज में निकल पड़ा। जंगल में
घूम-घूमकर उसने सियार को गुफा खोज ली।
अन्दर सियार सोया पड़ा था।
सियार मारे डर के अपनी गुफा के बाहर निकला ही
नहीं। कहीं किसान उसके पीछे-पीछे चला आए और
फिर उसे पकड़कर मारने लगे तो क्या होगा?
लेकिन इस बीच सियार को ज़ोर की भूख लगी थी।
तभी टोकनी लेकर चूहा उसकी गुफा के सामने
पहुंचा। टोकनी में बढ़िया खाना रखा था। देखकर
सियार के मुंह में पानी आ गया। उसने अपनी गुफा
के बाहर झांका, तो वहां उसे चूहा दिखाई पड़ा। बोला, “ओ हो! यह तो चूहा है। चलूं, बाहर निकलूं और इससे खाना मांग लूं।‘’
सियार ने कहा, “चूहे भैया! मुझे थोड़ा खाना दोगे?
बहुत ज़ोर की भूख लगी है।”
चूहा बोला, “खाना मुफ्त में कैसे दिया जाय? तुम
मेरा एक काम कर दो, तो मैं तुमको खाना खिला
दूं।”
सियार ने काह, “बताओ, काम क्या है?”
चूहा बोला, “मुझे एक गट्ठर घास चाहिए। तुम उसे
अपनी पीठ पर रखकर मेरे घर तक पहुंचा दो।”
सियार ने काह, “मुझे मंजूर है।”
सियार की पीठ पर घास का गट्ठर रखकर चूहा
और सियार दोनों चल पड़े। आगे-आगे चूहा, पीछे-
पीदे सियार। कुछ दूर जाने के बाद चूहे ने दो
पत्थर खोज लिए और वह उन पत्थरों को आपस
में रगड़ने लगा।
सियार ने पूछा, “चूहे भैया! यह तुम क्या कर रहे
हो?”
चूहा बोला, “मैं इन्हें रगड़ रहा हूं। यह तो हमारा
रोज़ का काम है।” कुछ ही देर में दोनों पत्थरों को
रगड़ने से जो चिनगारी निकली, चूहे ने उसे घास के
गठ्ठर में डाल दिया। धास धू-धू करके जल उठी।
सियार चिल्लाया, “अरे, यह क्या कर रहे हो?”
चूहा बोला, “धूं-धूं कर रहा हूं। हम तो हमेशा ऐसा
ही किया करते रहते हैं।” घास जल गई, और
उसके साथ सियार की पीठ भी कुछ जल गई।
चीखता-चिल्लाता सियार अपनी गुफा में जा घुसा।
दूसरे दिन चूहा वैद्य बनकर निकला। गुफा के पास
पहुंचकर आवाज़ लगाने लगा:
दांत का दरद मिटा दूं….
बादी का दरद मिटा दूं….
जले परमरहम लगा दूं….
सुनकर सियार बाहर निकलां बोला, “भैया! दवा
दोगे?”
चूहे ने पूछा, “कैसी दवा चाहिए?”
सियार ने कहा, “जली चमड़ी पर लागने की दवा।”
चूहा बोला, “लो, यह मरहम, जली हुई जगह पर
ठीक से लगा लो।”
कहकर चूहे ने सियार को पिसी हुई मिच्र की एक
गोली दे दी।
सियार ने मिर्चवाला मरहम लगा लिया, फिर वह
बुरी तरह चीखने-चिल्लाने और रोने लगा, “अरे,
तुमने मुझे यह कैसा मरहम दिया?”
चूहे ने कहा, “यह तो तुम्हें जलाने वाली आग है,
आग!
सियार रोता-चिल्लाता गुफा के अन्दर चला गया।
वहीं से बोला, “अब इस गुफा में तो मैं रहूंगा ही
नहीं।”
सियार गुफ़ा छोड़कर नदी-किनारे पहुंचा। चूहा भी
उसके पीछे-पीछ गया।
चूहा वहीं बैठा-बैठा लकड़ी कुरेदने लगा।
सियार ने कहा, “चूहे भैया! कुछ खाने की चीज़
दिलाओगे?”
चूहा बोला, “हम नदी के उस पार पहुंच जायं तो
वहां कुछ मिल सकता है। इसीके लिए मैं यह नाव
बना रहा हूं।”
सियार ने कहा, “मुझे भी नाव बनान सिखा दो।”
चूहा बोला, “तुम उस घास की नाव बना लो।”
सियार ने घास की नाव बनाई और चूहे ने लकड़ी
की।
दोनों ने अपनी-अपनी नाव नदी में डाल दी। कुछ ही
दूर जाने पर घासवाली नाव डूब गई और सियार
पानी में डुबकियां खाने लगा। चूहे की नाव पानी में
तैरती रही और चूहा नाव में नाचता रहा।
इस बीच सियार अधमरा हो गया। चूहे ने उसके
गले में रस्सी डालकर उसे पकड़ लिया और
घसीटकर घर तक ले आया। फिर किसान के घर
जाकर उसकी घरवाली से बोला, “मां, मां! लो, यह
सियार हाज़िर है। अब तुम रोना मत!” B-)

Posted in लक्ष्मी प्राप्ति - Laxmi prapti

मनी प्लांट घर में धन लाता है, लेकिन तभी जब इसे सही दिशा में रखा जाए….


मनी प्लांट घर में धन लाता है, लेकिन तभी जब इसे सही दिशा में रखा जाए….

मनी प्लांट यानि धन का पौधा। ऐसी मान्यता है कि यह पौधा जितना हरा होता है घर में धन का आगमन उसी तेजी से होता है। इसके पत्तों का मुरझाना या सफेद हो जाना अशुभ माना जाता है। भूमि पर फैलकर वृद्धि करने वाली बेल दोषकारक होती है। इसे हमेशा ऊपर की बढ़ने दें। इस प्लांट को लेकर लोगों के मन में कई तरह की धारणाएँ हैं, जैसे- इस पौधे को घर में लगाने से घर में पैसा आता है, तो कुछ का मानना है कि इस पौधे को लगाने से घरवालों की तरक्की होती है। कहते हैं जिसके घर में मनी प्लांट का पौधा लगा होता है उसके उसके घर में न केवल सुख-समृद्धि में इजाफा होता है बल्कि घर में धन का भी आगमन होता है। इसी वजह से कुछ लोग घरों में मनी प्लांट का पौधा लगाते हैं। लेकिन कई बार मनी प्लांट लगाने के बावजूद भी धनागमन में कई अंतर नहीं होता बल्कि और आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है। इसका कारण है गलत दिशा।
वास्तु शास्त्र के अनुसार हर पौधे के लिए एक दिशा निर्धारित होती है। यदि पौधे को उचित दिशा में लगाया गया तो वह सकारात्मक प्रभाव डालता है। वहीँ, यदि उसके उस पौधे का गलत स्थिति में वृक्षारोपण किया गया तो वह नकारात्मक प्रभाव डालता है जिससे फायदा होने की बजाय नुकसान होने लगता है। वास्तु के अनुसार, यदि सही दिशा और सही जगह में मनी प्लांट का पौधा नहीं लगाया गया तो धन लाभ के बजाय हानि का सामना करना पड़ता है। वास्तु शास्त्रीयों का मानना है कि मनी प्लांट के पौधे को घर में लगाने के लिए आग्नेय दिशा सबसे उचित दिशा है। इस दिशा में यह पौधा लगाने से सकारात्मक ऊर्जा मिलता है। मनी प्लांट को आग्नेय यानि दक्षिण-पूर्व दिशा में लगाने का कारण ये है इस दिशा के देवता गणेशजी हैं जबकि प्रतिनिधि शुक्र हैं। गणेश जी अमंगल का नाश करने वाले हैं जबकि शुक्र सुख-समृद्धि लाने वाले। यही नहीं बल्कि बेल और लता का कारण शुक्र को माना गया है। इसलिए मनी प्लांट को आग्नेय दिशा में लगाना उचित माना गया है।
मनी प्लांट को कभी भी ईशान यानि उत्तर-पूर्व दिशा में नहीं लगाना चाहिए, यह दिशा इसके लिए सबसे नकारात्मक मानी गई है। क्योंकि ईशान दिशा का प्रतिनिधि देवगुरू बृहस्पति को माना गया है। और शुक्र तथा बृहस्पति में शत्रुवत संबंध होता है। इसलिए शुक्र से संबंधित यह पौधा ईशान दिशा में होने पर नुकसान होता है। हालांकि इस दिशा में तुलसी का पौधा लगाया जा सकता है।
मनी प्लांट की सबसे बड़ी खासियत यह है कि घर हो या आँगन यह प्लांट कहीं भी आसानी से लग जाता है। साथ ही यह केवल पानी में भी लगाया जा सकता है और इसके रखरखाव के लिए भी ज्यादा मेहनत भी नहीं करनी पड़ती है। इसे घर के अंदर व बाहर दोनों जगह ही रखा जा सकता है। घर के अंदर इसे गमले में अथवा बोतल में पानी भरकर भी लगाया जा सकता है। पॉजिटिव एनर्जी को आकर्षित करने का यह सरल माध्यम है।

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Small Stories That Can Make Big Changes In LIfe:


Small Stories That Can Make Big Changes In LIfe:
आज मैं कुछ सच्ची कहानियां प्रस्तुत कर रहा हूँ जो हमारी जिंदगी बदल सकती हैं। यह कहानियां साबित करती हैं कि असंभव कुछ भी नहीं… Nothing is Impossible.
1. हाथी (Elephant) –
क्या आपको पता है, जब हाथी का बच्चा छोटा होता है तो उसे पतली एंव कमजोर रस्सी से बांधा जाता है| हाथी का बच्चा छोटा एंव कमजोर होने के कारण उस रस्सी को तोड़कर भाग नहीं सकता| लेकिन जब वही हाथी का बच्चा बड़ा और शक्तिशाली हो जाता है तो भी उसे पतली एंव कमजोर रस्सी से ही बाँधा जाता है, जिसे वह आसानी से तोड़ सकता है लेकिन वह उस रस्सी को तोड़ता नहीं है और बंधा रहता है| ऐसा क्यों होता है?
ऐसा इसलिए होता है क्योंकि जब हाथी का बच्चा छोटा होता है तो वह बार-बार रस्सी को छुड़ाकर भागने की कोशिश करता है, लेकिन वह कमजोर होने के कारण उस पतली रस्सी को तोड़ नहीं सकता और आखिरकर यह मान लेता है कि वह कभी भी उस रस्सी को तोड़ नहीं सकता| हाथी का बच्चा बड़ा हो जाने पर भी यही समझता है कि वह उस रस्सी को तोड़ नहीं सकता और वह कोशिश ही नहीं करता| इस प्रकार वह अपनी गलत मान्यता अथवा गलत धारणा (Wrong Beliefs) के कारण एक छोटी सी रस्सी से बंधा रहता है जबकि वह दुनिया के सबसे ताकतवर जानवरों में से एक है|
2. भौंरा (Bumblebee) –
वैज्ञानिकों के अनुसार भौंरे का शरीर बहुत भारी होता है| इसलिए विज्ञान के नियमो के अनुसार वह उड़ नहीं सकता| लेकिन भौंरे को इस बात का पता नहीं होता एंव वह यह मानता है की वह उड़ सकता है| इसलिए वह लगातार कोशिश करता जाता है और बार-बार असफल होने पर भी वह हार नहीं मानता क्योंकि वह यही सोचता है कि वह उड़ सकता है| आखिरकार भौंरा उड़ने में सफल हो ही जाता है|
3. आविष्कार/खोज (Discovery) –
दोस्तों इस जीवन में नामुनकिन कुछ भी नहीं (Nothing is impossible in life), नामुनकिन शब्द मनुष्य ने ही बनाया है| जब टेलीफोन और रेडियो आदि का आविष्कार नहीं हुआ था तो दुनिया और विज्ञान यही मानते थे कि आवाज को कुछ ही समय में सैकड़ो किलोमीटर दूर पहुँचाना नामुनकिन (Impossible) है, लेकिन आज मोबाइल हमारे जीवन का हिस्सा है| इसी तरह जब तक विमान का आविष्कार नहीं हुआ था तब तक विज्ञान जगत भी यही मानता था कि मनुष्य के लिए आकाश में उड़ना संभव नहीं लेकिन जब राइट बंधुओं ने विमान का आविष्कार किया तो यह “असंभव”, “संभव” में बदल गया। Impossible bacame Possible.
4. क्रिकेट (Cricket) –
इसी तरह क्रिकेट की बात ले लीजिये – वनडे क्रिकेट के इतने बड़े इतिहास में वर्ष 2010 तक एक भी दोहरा शतक नहीं लगा लेकिन वर्ष 2010 में सचिन तेंदुलकर के दोहरा शतक लगाने के 2-4 वर्षों में ही 4-5 और दोहरे शतक (Double Centuries) लग गए| क्या यह मात्र संयोग था? ऐसा क्यों हुआ?
ऐसा इसीलिए हुआ क्योंकि 2010 से पहले जब किसी ने दोहरा शतक नहीं लगाया था तो सभी की मानसिकता यही थी कि दोहरा शतक लगाना बहुत ही मुश्किल है| क्योंकि अभी तक इस रिकॉर्ड को किसी ने नहीं तोडा था तो यह नामुनकिन सा लगता था| लेकिन जब सचिन ने दोहरा शतक लगाया तो सभी की मानसिकता बदल गयी और यह लगने लगा कि दोहरा शतक लगाना मुश्किल है पर नामुनकिन नहीं| Impossibe Became Possible Again.

इस दुनिया में नामुनकिन कुछ भी नहीं (Nothing is impossible in this world),“नामुनकिन” हमारा भ्रम या गलत मान्यता है जो आख़िरकार गलत साबित होती है| हम गलत धारणाएँ (Wrong Beliefs) बना लेते हैं और हमें इसी कारण कोई कार्य मुश्किल या असंभव लगता है| हम आज जो भी हैं वह हमारी सोच का ही परिणाम है| हम जैसा सोचते है, वैसा बन जाते है – (We become, what we think)| “असंभव” या “नामुनकिन” (Impossible) हमारी सोच का ही परिणाम है|

भौंरा विज्ञान के नियमों के अनुसार उड़ नहीं सकता लेकिन वह मानता है कि वह उड़ सकता है इसलिए वह उड़ जाता है जबकि हाथी कमजोर रस्सी को आसानी से तोड़ सकता है लेकिन वह यह मानता है कि वह उस रस्सी को तोड़ नहीं सकता, इसलिए वह रस्सी को तोड़ नहीं पाता| यह हम पर निर्भर करता है कि हमें हाथी की तरह अपनी ही सोच का गुलाम रहना है या भौरे की तरह स्वतंत्र| अगर हम मानते है और स्वंय पर यह विश्वास करते है कि हम कुछ भी कर सकते हैं। हमारे लिए नामुनकिन कुछ भी नहीं।

“हम वो सब कर सकते है जो हम सोच सकते है और हम वो सब सोच सकते है जो आज तक हमने नहीं सोचा”.

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दिवाली की रात में कहां-कहां दीपक लगाने चाहिए ? कुछ शास्त्रोक्त नियम :


दिवाली की रात में कहां-कहां दीपक लगाने चाहिए ? कुछ शास्त्रोक्त नियम :
1- पीपल के पेड़ के नीचे दीपावली की रात एक दीपक लगाकर घर लौट आएं। दीपक लगाने के बाद पीछे मुड़कर नहीं देखना चाहिए। ऐसा करने पर आपकी धन से जुड़ी समस्याएं दूर हो सकती हैं।
2- यदि संभव हो सके तो दिवाली की रात के समय किसी श्मशान में दीपक लगाएं। यदि यह संभव ना हो तो किसी सुनसान इलाके में स्थित मंदिर में दीपक लगा सकते हैं।
3- धन प्राप्ति की कामना करने वाले व्यक्ति को दीपावली की रात मुख्य दरवाजे की चौखट के दोनों ओर दीपक अवश्य लगाना चाहिए।
4- हमारे घर के आसपास वाले चौराहे पर रात के समय दीपक लगाना चाहिए। ऐसा करने पर पैसों से जुड़ी समस्याएं समाप्त हो सकती हैं।
5- घर के पूजन स्थल में दीपक लगाएं, जो पूरी रात बुझना नहीं चाहिए। ऐसा करने पर महालक्ष्मी प्रसन्न होती हैं।
6- किसी बिल्व पत्र (बेल) के पेड़ के नीचे दीपावली की शाम दीपक लगाएं। बिल्व पत्र भगवान शिव का प्रिय वृक्ष है। अत: यहां दीपक लगाने पर उनकी कृपा प्राप्त होती है।
7- घर के आसपास जो भी मंदिर हो वहां रात के समय दीपक अवश्य लगाएं। इससे सभी देवी-देवताओं की कृपा प्राप्त होती है।
8- घर के आंगन में भी दीपक लगाना चाहिए। ध्यान रखें यह दीपक भी रातभर बुझना नहीं चाहिए।
9- घर के पास कोई नदी या तालब हो तो वहां पर रात के समय दीपक अवश्य लगाएं। इस से ग्रह दोषो से मुक्ति मिलती है !
10- तुलसी और सालिग्राम के पास रात के समय दीपक अवश्य लगाएं। ऐसा करने पर महालक्ष्मी प्रसन्न होती हैं।
11- पित्रो का दीपक गया तीर्थ के नाम से घर के दक्षिण में लगाये ! इस से पितृ दोष से मुक्ति मिलती है !

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जानिये दीपावली मनाने की पौराणिक गाथाएं..


जानिये दीपावली मनाने की पौराणिक गाथाएं…
दीपावली भारतीय पर्वों में प्रमुख है और प्रत्येक युग में इसे मनाया जाता रहा है। यूं तो भारत में दीपावली के बारे में किसी को बताने की जरूरत नहीं लेकिन फिर भी आज की युवा पीढ़ी को इसके इतिहास के बारे में जानना अवश्य चाहिए कि आखिर हम क्यों दीपावली मनाते हैं ?

* सतयुग की दीपावली : –
सर्वप्रथम तो यह दीपावली सतयुग में ही मनाई गई। जब देवता और दानवों ने मिलकर समुद्र मंथन किया तो इस महा अभियान से ही ऐरावत, चंद्रमा, उच्चैश्रवा, परिजात, वारुणी, रंभा आदि 14 रत्नों के साथ हलाहल विष भी निकला और अमृत घट लिए धन्वंतरि भी प्रकट हुए। इसी से तो स्वास्थ्य के आदिदेव धन्वंतरि की जयंती से दीपोत्सव का महापर्व आरंभ होता है। कार्तिक कृष्ण पक्ष त्रयोदशी अर्थात धनतेरस को। तत्पश्चात इसी महामंथन से देवी महालक्ष्मी जन्मीं और सारे देवताओं द्वारा उनके स्वागत में प्रथम दीपावली मनाई गई।

* त्रेतायुग की दीपावली : –
त्रेतायुग भगवान श्रीराम के नाम से अधिक पहचाना जाता है। महाबलशाली रावण को पराजित कर 14 वर्ष वनवास में बिताकर राम के अयोध्या आगमन पर सारी नगरी दीपमालिकाओं से सजाई गई और यह पर्व अंधकार पर प्रकाश की विजय का प्रतीक दीप-पर्व बन गया।

* द्वापर युग की दीपावली : –
द्वापर श्रीकृष्ण का लीलायुग रहा और दीपावली में दो महत्वपूर्ण आयाम जुड़ गए। पहली घटना कृष्ण के बचपन की है। इंद्र पूजा का विरोध कर गोवर्धन पूजा का क्रांतिकारी निर्णय क्रियान्वित कर श्रीकृष्ण ने स्थानीय प्राकृतिक संपदा के प्रति सामाजिक चेतना का शंखनाद किया और गोवर्धन पूजा के रूप में अन्नकूट की परंपरा बनी। कूट का अर्थ है पहाड़, अन्नकूट अर्थात भोज्य पदार्थों का पहाड़ जैसा ढेर अर्थात उनकी प्रचुरता से उपलब्धता। वैसे भी कृष्ण-बलराम कृषि के देवता हैं। उनकी चलाई गई अन्नकूट परंपरा आज भी दीपावली उत्सव का अंग है। यह पर्व प्राय: दीपावली के दूसरे दिन मनाया जाता है।

* द्वापर युग की दीपावली 2 : –
दूसरी घटना कृष्ण के विवाहोपरांत की है। नरकासुर नामक राक्षस का वध एवं अपनी प्रिया सत्यभामा के लिए पारिजात वृक्ष लाने की घटना दीपोत्सव के एक दिन पूर्व अर्थात रूप चतुर्दशी से जुड़ी है। इसी से इसे नरक चतुर्दशी भी कहा जाता है। अमावस्या के तीसरे दिन भाईदूज को इन्हीं श्रीकृष्ण ने अपनी बहिन द्रौपदी के आमंत्रण पर भोजन करना स्वीकार किया और बहन ने भाई से पूछा- क्या बनाऊं? क्या जीमोगे? तो कृष्ण ने मुस्कराकर कहा- बहन कल ही अन्नकूट में ढेरों पकवान खा-खाकर पेट भारी हो चला है इसलिए आज तो मैं खाऊंगा केवल खिचड़ी। सारे संसार के स्वामी ने यही तो संदेश दिया था कि-
तृप्ति भोजन से नहीं, भावों से होती है। प्रेम पकवान से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।

* कलियुग की दीपावली :- वर्तमान कलियुग
यूँ तो आज भी हम दीपावली त्रेता और द्वापर युग की परंपरा के अनुसार मनाते आ रहे हैं पर कलियुग में भी इस पर्व के साथ कुछ अन्य कहानियां भी जुड़ी हैं। दीपावली को स्वामी रामतीर्थ और स्वामी दयानंद के निर्वाण के साथ भी जोड़ा जाता है। भारतीय ज्ञान और मनीषा के दैदीप्यमान अमरदीपों के रूप में इनके पूर्व महावीर ने भी तो इसी पर्व को चुना था अपनी आत्मज्योति के परम ज्योति से महामिलन के लिए। जिनकी दिव्य आभा आज भी संसार को आलोकित किए है प्रेम, अहिंसा और संयम के अद्भुत प्रतिमान के रूप में।

शुभ दीपावली ।।

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ये हैं देश के टॉप 5 ‘चोर बाजार’, जहां मिलते हैं जूते से लेकर कार तक :


ये हैं देश के टॉप 5 ‘चोर बाजार’, जहां मिलते हैं जूते से लेकर कार तक :
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यहां चोरी के जूते, फोन, मोबाइल, गैजेट्स, ऑटो पार्ट्स से लेकर कार तक बेची जाती है। देश के इन चोर बाजार में चोरी की गाडी को मॉडिफाई करके बेचा जाता है। यहां अपनी गाड़ी या बाइक खड़ी करना खतरे से खाली नहीं हैं। गलती से आप अपनी गाड़ी पार्क कर देंगे, तो हो सकता है कि उसके स्पेयर पार्ट्स चोर बाजार की दुकानों पर नजर आएं। जानते हैं देश के ऐसे बाजारों के बारे में..
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1. मुंबई चोर बाजार
मुंबई का चोर बाजार दक्षिणी मुंबई के मटन स्ट्रीट मोहम्मद अली रोड के पास है। ये मार्केट करीब 150 साल पुराना है। ये बाजार पहले ‘शोर बाजार’ के नाम से शुरू हुआ था क्योंकि यहां दुकानदार तेज आवाज लगाकर सामान बेचते थे, तो यहां काफी शोर रहता था। लेकिन अंग्रेज लोगों के ‘शोर’ को गलत बोलने के कारण इसका नाम ‘चोर’ बाजार पड़ गया। यहां सेकंड हैंड कपड़े, ऑटोमोबाइल पार्ट्स, चुराई हुई घड़ियां और ब्रांडेड घड़ियों की रेप्लिका, चोरी के विंटेज और एंटीक सजावटी सामान मिलते हैं। इस मार्केट के लिए कहावत कही जाती है कि यहां आपके घर से चोरी हुआ सामान भी मिल जाएगा। यहां के रेस्तरां और कबाब काफी फेमस हैं। यहां जेब काटने वालों से सावधान रहें। ये मार्केट रोजाना सुबह 11 बजे से शाम के 7.30 तक खुला रहता है। यहां के बारे में एक फेमस किस्सा है कि मुंबई की यात्रा के दौरान क्वीन विक्टोरिया का सामान शिप में लोड करते समय चोरी हो गया था। यही सामान बाद में मुंबई के चोर बाजार में मिला।
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2. दिल्ली का चोर बाजार
ये देश का सबसे पुराना चोर बाजार है। पहले ये संडे माकट के तौर पर लाल किले के पीछे लगता था। अब ये दरियागंज और जामा मस्जिद के पास लगता है। ये बाजार मुंबई से अलग है। इसे कबाड़ी बाजार भी कहा जाता है। यहां कपड़े, हार्डवेयर से लेकर मोबाइल और इलेक्ट्रॉनिक सामान तक मिलते हैं। ये मार्केट जामा मस्जिद के पास संडे के दिन लगती है। यहां खरीदते समय प्रोडक्ट जांच लें क्योंकि जैसा वेंडर कहते हैं वैसा सामान नहीं निकलता। यह मार्केट प्रतिदिन सुबह-सुबह 5-8 बजे तक भी लगता है। इस समय आप काफी अच्छी चीजें काफी कम कीमत पर खरीद सकते हैं।
यहां के बारे में एक फेमस स्टोरी है कि एक आदमी ने यहां गाड़ी पार्क की थी। उसे अपनी गाड़ी के टायर वापस वहीँ एक दुकान में मिले जो उसने दुबारा से ख़रीदा। 🙂
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3. सोती गंज, मेरठ , यू.पी.
यू.पी. के मेरठ में सोती गंज मार्केट काफी फेमस है। इस मार्केट को चोरी की गाड़ियों और स्पेयर पार्ट्स का गढ़ माना जाता है। यहां सभी गाड़ियों के पार्ट्स काफी कम कीमत पर मिल जाएंगे। यहां चोरी, पुरानी और एसीडेंट में खराब हुई गाडियां आती हैं। मेरठ का सोतीगंज मार्केट एशिया का सबसे बड़ा स्क्रैप मार्केट भी है यह मार्केट मेरठ सिटी में सुबह 9 बजे से शाम को 6 बजे तक खुलती है। यहां सामान खरीदने के लिए आपको सही डीलर ढूँढना जरूरी है। सोतीगंज में 1979 के अंबेसडर का ब्रेक पिस्टन, 1960 की बनी महिंद्रा जीप क्लासिक का गेयर बॉक्स, वर्ल्ड वार II की विलीज जीप के टायर जैसी दुर्लभ चीजें भी मिल जाएंगी।
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4. चिकपेटे, बंगलूरू
दिल्ली और मुंबई के चोर बाजार के मुकाबले बंगलुरू कम फेमस है। ये मार्केट बंगलुरू में चिकपेटे नामक जगह पर संडे के दिन लगती है। यहां हर तरह के हाउसहोल्ड सेकंड हैण्ड गुड्स, ग्रामोफोन, चोरी के गैजेटस, कैमरा, एंटीक, इलेक्ट्रॉनिक आइटम और सस्ते जिम इक्विपमेंट मिलते हैं। ये मार्केट लोकल मार्केट की ही तरह है। ये मार्केट एक गांव के मार्केट (हाट बाज़ार) की तरह सन्डे के दिन बी.वी.के. अयंगर रोड पर एवेन्यू रोड के पास लगती है।
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5. पुदुपेत्ताई, चेन्नई
सेंट्रल चेन्नई में स्थित इस ‘ऑटो नगर’ में पुरानी और चोरी की कारों को मॉडिफाई करते हैं। यहां हजारों की संख्या में दुकानें हैं। ये दुकान गाड़ियों के ऑरीजनल पार्ट्स और कार को बदलने के लिए फेमस है। इन्हें इस काम में इंटरनेशनल एक्सपरटाइजमेंट है। यहां गाड़ियों के तमाम स्पेयर पार्ट्स से लेकर कार मॉडिफाई का सामान और सर्विस मिलती है। ये चोर बाजार गाड़ियों को बदलने का सबसे सस्ता जरिया है। इस मार्केट में कई बार पुलिस की रेड पड़ी है लेकिन ये कभी बंद नहीं हुई है। ये मार्केट एग्मोर स्टेशन से 1 कीलोमीटर दूर है। ये सुबह 10 बजे से शाम के 6 बजे तक खुली रहती है। यहां अपनी गाड़ी या बाइक कभी भी पार्क न करें। हो सकता है कि आपको अपनी गाड़ी के पार्ट्स मार्केट की दुकानों पर मिलें। 🙂
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एक कुत्ते और गधे का Management Lesson:


एक कुत्ते और गधे का Management Lesson:

एक रात जब पूरी दुनिया सो रही थी, तभी एक धोबी के घर में एक चोर घुस आया। धोबी गहरी नींद में सो रहा था, लेकिन उसका कुत्ता और गधा जाग रहे थे। कुत्ता अपने मालिक को सबक सिखाना चाहता था, क्योंकि वह उसका ख्याल नहीं रखता था। इसलिए वह नहीं भौंका। गधे को चिंता होने लगी और उसने कुत्ते से कहा कि अगर वह नहीं भौंका तो उसे ही कुछ करना होगा। कुत्ते ने अपना मन नहीं बदला तो गधा ही जोर-जोर से रेंकने लगा। गधे का रेंकना सुनकर चोर भाग गया। धोबी उठा और गधे को बिना वजह रेंकने के लिए पीटने लगा। कहानी से यह शिक्षा मिलती है कि दूसरे के काम में टांग अड़ाने से, दूसरे के हिस्से का काम करने से कुछ भला नहीं होने वाला। इसलिए अपने काम पर ध्यान दें और उसकी क्वालिटी में सुधार करते रहे।

चलिए अब इसी कहानी को दूसरे नजरिए से देखते हैं। धोबी एक अव्वल दर्जे का मैनेजमेंट-कॉर्पोरेट आदमी था। उसमें चीजों को अलग नजरिए से देखने और अलग सोचने की क्षमता थी। उसे यकीन था कि आधी रात को गधे के रेंकने की जरूर कोई वजह रही होगी। वह घर से थोड़ा बाहर निकला और तथ्यों की जांच-पड़ताल कर उसने पाया कि घर में चोर घुसा था और गधा सिर्फ उसे आगाह करना चाहता था। गधे की पहल और डयूटी से बढ़कर काम करने की ललक को देखते हुए धोबी ने उसे ढेर सारी घास दी और पसंदीदा पालतू जानवर बना लिया।वहीं कुत्ते की जिंदगी में ज्यादा बदलाव नहीं आए सिवाय इसके कि गधा अब और उत्साह से कुत्ते का काम भी करने लगा।
परफॉरमेंस रिव्यु के समय पर कुत्ते को 8 नंबर मिले और गधे को 9 नंबर। जल्द ही कुत्ते को अहसास हुआ कि उसकी सभी जिम्मेदारियां गधे ने संभाल ली हैं और वह अब आराम से समय काट सकता है। गधे पर अब अच्छा परफॉर्म करने का बोझ बढ़ गया। जल्द ही उस पर ढेर सारा काम आ गया और वह दबाव में रहने लगा। इससे परेशान होकर वह धोबी का घर छोड़ने की सोचने लगा।
कहानी से अब भी वही शिक्षा मिलती है कि दूसरे के काम में टांग अड़ाने से, दूसरे के हिस्से का काम करने से आपका भला नहीं होने वाला। इसलिए अपने हिस्से के काम पर ध्यान देना चाहिये।