Posted in कविता - Kavita - કવિતા

उठ जाता हूं..भोर से पहले..सपने सुहाने नही आते


*उठ जाता हूं..भोर से पहले..सपने सुहाने नही आते..*_
_*अब मुझे स्कूल न जाने वाले..बहाने बनाने नही आते..*_

_*कभी पा लेते थे..घर से निकलते ही..मंजिल को..*_
_*अब मीलों सफर करके भी…ठिकाने नही आते..*_

_*मुंह चिढाती है..खाली जेब..महीने के आखिर में..*_
_*अब बचपन की तरह..गुल्लक में पैसे बचाने नही आते..*_

_*यूं तो रखते हैं..बहुत से लोग..पलको पर मुझे..*_
_*मगर बेमतलब बचपन की तरह गोदी उठाने नही आते..*_

_*माना कि..जिम्मेदारियों की..बेड़ियों में जकड़ा हूं..*_
_*क्यूं बचपन की तरह छुड़वाने..वो दोस्त पुराने नही आते..*_

_*बहला रहा हूं बस दिल को बच्चों की तरह..*_
_*मैं जानता हूं..फिर वापस बीते हुए जमाने नही आते..*

Author:

Buy, sell, exchange old books

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s