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“आओ मिलकर आग लगाएँ”


“आओ मिलकर आग लगाएँ”

आओ मिलकर आग लगाएँ,
नित-नित नूतन स्वांग करें!
पौरुष की नीलामी कर दें,
आरक्षण की माँग करें!!

पहले से हम बँटे हुए हैं,
और अधिक बँट जाएँ हम!
100 करोड़ हिन्दू हैं मिलकर,
इक दूजे को खाएँ हम!!

देश मरे भूखा चाहे पर,
अपना पेट भराओ जी!
शर्माओ मत…भारत माँ के,
बाल नोचने आओ जी!!

तेरा हिस्सा मेरा हिस्सा,
किस्सा बहुत पुराना है!
हिस्से की रस्साकसियों में
भूल नहीं ये जाना है!!

याद करो भूखण्डों पर हम,
आपस में टकराते थे!
गज़नी कासिम बाबर मौका,
पाते ही घुस आते थे!!

अब हम लड़ने आए हैं,
आरक्षण की रोटी पर,
जैसे कुत्ते झगड़ रहे हों,
कटी गाय की बोटी पर!!

हमने कलम किताब लगन को,
दूर बहुत ही फेंका है!
नाकारों को खीर खिलाना,
संविधान का ठेका है!!

मैं भी पिछड़ा…मैं भी पिछड़ा,
कहकर बनो भिखारी जी!
ठाकुर पंडित बनिया सब के
सब कर लो तैयारी जी!!

जब पटेल के कुनबों की,
थाली खाली हो सकती है!
कई राजपूतों के घर भी,
कंगाली हो सकती है!!

बनिए का बेटा रिक्शे की,
मज़दूरी कर सकता है!
और किसी वामन का बेटा,
भूखा भी मर सकता है!!

आओ इन्हीं बहानों को,
लेकर सड़कों पर टूट पड़ो!
अपनी अपनी बिरादरी का,
झंडा लेकर छूट पड़ो!!

शर्म करो, हिन्दू बनते हो,
नस्लें तुम पर थूकेंगी!
बँटे हुए हो जाति पंथ में,
ये ज्वालाएँ फूकेंगी!

मैं पटेल हूँ मैं गुर्जर हूँ,
लड़ते रहिए शानों से!
फिर से तुम जूते खाओगे,
गजनी की संतानो से!!

ऐसे ही हिन्दू समाज के
कतरे-कतरे कर डालो!
संविधान को छलनी कर के,
गोबर इसमें भर डालो!!

“राम-राम” करते इक दिन तुम,
“अस्सलाम” हो जाओगे!
बँटने पर ही अड़े रहे तो,
फिर गुलाम हो जाओगे…।।

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