Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

एक 6 साल का बच्चा अपनी 4 साल की बहन का हाथ पकड़ कर


एक 6 साल का बच्चा अपनी 4 साल की बहन का हाथ पकड़ कर एक जिम्मेदार बड़े भाई की तरह सड़क के किनारे किनारे जा रहा था ! #बड़प्पन का भाव उसके मासूम चहरे पर साफ टपक रहा था !
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कुछ दूर साथ चलने के बाद बहन ने अपना हाथ छुड़ा लिया औरअपने छोटे कदमो के साथ भाई के साथ साथ चलने लगी ! कुछ दूर चलने के बाद भाई ने देखा की उसकी बहन कुछ पीछे रह गई है !उसने पीछे मुड कर देखा की उसकी बहन एक चमचमाती दुकान के सामने खड़ी है और बड़े ही बाल सुलभ और मोहक एवं ख़ुशी के अंदाज के साथ कुछ देख रही है !
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बच्चा उसके पास आया और बोल “क्या बात है तुझे कुछ चाहिए”बच्ची ने प्रसन्नता के साथ अपनी उंगली से एक गुड़िया की तरफ इशारा किया !बच्चे ने गुड़िया की और देखा और पूछा “क्या ये गुड़िया चाहिए ?बच्ची ने मुस्कुराते हुए अपनी गर्दन हां में घुमाई ! वहां पर बैठा दुकानदार बड़े ही प्रेम से दोनों बच्चों की हरकतों को निहार रहा था ! वो एक बेहद शालीन और सह्रदय इंसान दिखाई दे रहा था !उसे उस 6 साल के बच्चे की अपने आप को बड़ा समझने की बाल मानसिकता पर बड़ा आनंद आ रहा था !बच्चा दुकानदार के पास गया और अपनी तोतली जुबान से पूछा
“ये दॉल (डॉल) तितने की है ?
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दुकानदार ने मुस्कुरा कर कहा तुम कितने दे सकते हो? बच्चे ने अपनी शर्ट की एक जेब में हाथ डाला और उसमे से कुछ रंग बिरंगी सीपियाँ,जो उसने कुछ ही देर पहले समुन्द्र के किनारे से एकत्रित की थी , को दुकानदार के सामने मेज पर फेला दी !
फिर अपनी शर्ट की दूसरी जेब से भी सीपियाँ निकल कर रख दी ! फिर अपनी पेंट की दोनों जेबों में से भी कई छोटी बड़ी रंग बिरंगी सीपिया निकाल कर दुकानदार के सामने काउंटर पर रख दी! और कहा ये लीजिए दॉल (डॉल) की तीमत !
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दुकानदार ने उन सीपियों को गिनना चालू किया और ऐसे दर्शाया मानो वो रुपये गिन रहा हो !गिनने के बाद दुकानदार चुप हो गया !बच्चे ने चिंतित स्वर में पूछा “क्या कम है ?
दुकानदार ने मुस्कुराते हुए कहा “नहीं ये तो डॉल की कीमत से कुछ अधिक है “और उसने उन सीपियों में से कुछ सीपियां वापस बच्चे को देते हुए कहा “अब ठीक है और डॉल उस बच्चे को देदी !
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बच्चे के चहरे पर मुस्कान तैर गई उसने वो सीपियां वापस अपनी जेब में रख ली जैसे की एक जिम्मेदार वयस्क अपनी जेब में रुपये रखता है और ख़ुशी के साथ वो डॉल ले कर अपने छोटे छोटे हाथो से अपनी उस छोटी मासूम सी बहन के हाथ में पकड़ा दी !
बच्ची ने डॉल को एक हाथ से कस कर पकड़ कर अपने सीने से उसे लगाया और दूसरे हाथ से अपने भाई का हाथ पकड़ कर मुस्कुराते हुए दुकान से बाहर निकाल गई !दुकानदार मुस्कुराते हुए उन्हें जाते हुए देखता रहा !
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दुकान में काम कर रहे एक कर्मचारी ने पूछा “आप ने इतनी महंगी डॉल इन बेकार की सीपियों में उस बच्चे को दे दी ? दुकानदार ने कहा “हो सकता है ये सीपिया तुम्हारी और मेरी नज़रों में बेकार हो पर उस बच्चे की नजर में तो ये बेशकीमती है ! आज वो बच्चा रुपयों और इन सीपियों में फर्क नहीं समझता पर उसे अपनी जिम्मेदारी का तो अहसास है कल वो बड़ा होगा फिर वो भी दूसरों की तरह रुपयों का महत्त्व समझने लगेगा और जब उसे याद आएगा की उसने अपनी बहिन के लिए कैसे बचपन में सीपियों से एक डॉल खरीदी थी तो क्या वो मुझे याद नहीं करेगा ?मेने बच्चे के मन की इसी सकारात्मक प्रवृति की बढ़ाने का एक छोटा सा प्रयास मात्र किया है जिसके सामने लाखों रुपयों की कीमत भी कुछ नहीं है ! जब की वो तो एक छोटी सी डॉल मात्र थी !
दोस्तों हो सके तो आप लोग भी धन दौलत दान में देने के साथ साथ लोगो में सकत्मकता को बढ़ने की भी कोशिश करे..!!!
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अल्टीमेट बकलोली


 

KULDEEP SAXENA

एक बिजनेसमैन सुबह जल्दी में अपने घर से बाहर आकर अपनी कार का दरवाजा खोलता है। तभी पास बैठे एक आवारा कुत्ते पर उसका पैर पड़ जाता है, कुत्ता उसपर झपटता है और उसके पैर में दाँत गड़ा देता है।

गुस्से में वो 10-12 पत्थर उठाकर कुत्ते को मारता है लेकिन एक पत्थर भी कुत्ते को नहीं लगता और कुत्ता भाग जाता है।😜

अपने ऑफिस में पहुँचकर वो ऑफिस के सभी पदाधिकारियों की मीटिंग बुलाता है और कुत्ते का गुस्सा उनपर उतारता है।😁

अपने बॉस का जबरन का गुस्सा झेलकर अधिकारी भी परेशान हो जाते हैं।😔

सारे अधिकारी अपना गुस्सा अपने से नीचे स्तर के कर्मचारियों पर उतारते हैं और इस प्रकार गुस्से का ये दमनचक्र सबसे निचले स्तर के कर्मचारी ऑफिस बॉय और चपरासी तक पहुँचता है।😙😣

अब चपरासी के नीचे तो कोई नहीं। इसलिए अपना गुस्सा वो दारू पर उतरता है और घर जाता है।🍻

बीवी दरवाजा खोलती है और शिकायती लहजे में बोलती है—” इतनी देर से आए ?? “🙆
चपरासी, बीवी को एक झापड़ लगा देता है 👋 और बोलता है—” मैं ऑफिस में कंचे खेल रहा था क्या ???😱 काम था मुझे ऑफिस में, अब भेजा मत खा और खाना लगा। “😁

अब बीवी भुनभुनाती है कि, बिना कारण चाँटा खाया।😩

वो अपना गुस्सा बच्चे पर उतारती है और उसकी पिटाई कर देती है।🙇

अब बच्चा क्या करे ??
वो गुस्से में घर से बाहर चला जाता है।🚶🚶🏃😭
और…….

और……..

और………

बच्चा, एक पत्थर उठाता है और सामने से गुजरते एक कुत्ते को मारता है, पत्थर लगते ही कुत्ता बिलबिलाता, काऊँ काऊँ करता भागता है।
मित्रों, ये सुबह वाला ही कुत्ता था !!!😃😃😃😃
उसे पत्थर लगना ही था, सिर्फ बिजनेसमैन वाला नहीं लगा, बच्चे वाला लगा। उसका सर्कल कम्पलीट हुआ।
इसलिए आप कभी भी चिंता ना करें।
अगर किसी ने आपको परेशान किया है तो, उसे पत्थर लगेगा……..अवश्य लगेगा……बराबर लगेगा।।
इस कारण आप निश्चिन्त रहो।
आपका बुरा करने वाले का,
बुरा अवश्य ही होगा।
ये सृष्टि का नियम है……..

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अकबर और बीरबल


KULDEEP SAXENA

अकबर और बीरबल

अकबर और बीरबल शाम को पैदल ही हवाखोरी के लिये चले जा रहे थे। चलते-चलते बीरबल ने एक पौधे के सामने हाथ जोड़ कर प्रणाम किया।अकबर ने पूछा कि “बीरबल तुमने इस पौधे को प्रणाम क्यों किया”।

बीरबल ने उत्तर दिया “हुजूर, हम हिन्दू इसे तुलसी माता कहते हैं। यह बहुत ही परमपवित्र, पूजनीय और गुणकारी है।

अकबर ने आव देखा, ना ताव और तुलसी मैंया को उखाड़ फेंका तथा बीरबल का मजाक बनाते हुये कहा कि -“लो बीरबल! मैंनें तुम्हारी माँ को उखाड़ कर फेंक दिया। अब कहो।”

बीरबल चुपचाप आगे बढ लिये। घूमते-घूमते दोनों बस्ती से दूर काफी आगे खेतों की ओर निकल आये। तुलसी को तो मात्र हाथ जोड़ कर प्रणाम ही किया था, लेकिन खेतों में एक बड़े से पौधे को देख कर बीरबल ने कुछ दूरी से ही दण्डवत् प्रणाम किया और चलने का उपक्रम किया। (इस पौधे को छूने और शरीर के किसी भी अंग पर लगाने से बुरी तरह से खुजली शुरू हो जाती है)।

अकबर ने पहले की भांति सोचकर उस पौधे को भी तुलसी की तरह उखाड़ना चाहा लेकिन जड़े गहराई तक होने के कारण उखाड़ नहीं पाये।

अब अकबर ने उस पौधे से लिपट कर और खूब जोर लगा कर उखाड़ फेंका तथा एक विजयी मुस्कान बीरबल की तरफ फेंकी। बदले में बराम ल ने भी एक व्यंग्यात्मक मुस्कान के साथ अकबर की ओर देखा और वापस लौट चलें।

अब अकबर को खुजली होनी शुरू हुई और शरीर में जहां-जहां भी हाथ लगाये, भयंकर खुजली शुरू हो जाये। परेशान होकर बीरबल से कहा – “ये तुम्हारी दूसरी माँ कौन थी और कैसी है?”

बीरबल ने उत्तर दिया: “हुजूर हमारी तुलसी मैंया तो बड़ी सीधी-सादी व सरल है। वो तो किसी को कुछ नही कहती। उसका कोई बुरा भी करें तो भी वो उसका भला ही करती हैं, लेकिन ये तो तो हमारा बाप है। बहुत ही कड़ियल और जिद्दी है, ये बदला लिये बगैर कभी नहीं छोड़ता”।

अकबर ने परेशान होकर कहा: “अपने इस बाप से मेरा पीछा छुड़वाओं। मैं तौबा करता हूॅ कि हिन्दुओं के माँ-बाप से कभी पंगा नहीं लूंगा”।

बीरबल ने कहा – “हुजूर! हम हिन्दुओं की एक माता और है, गौमाता। वो आपको इस मुसीबत से छुटकारा दिला सकती है।” अकबर ने कहा- “जल्दी करो, जो कुछ करना है करो, मगर अपने इस बाप से मेरा पिंड छुड़वाओ।

बीरबल ने बताया – “बादशाह सलामत आपको अपने पूरे बदन पर गऊमाता का गोबर लगाकर कई प्रहर तक बैठना होगा, तभी आपको राहत मिल सकती है, अन्यथा दूसरा कोई उपाय नही है”।

अकबर ने अपने पूरे शरीर पर गोबर पुतवाया और कई घण्टे की यातना के बाद कष्ट से मुक्ति पाई। सनातन धर्म के सभी रीति-रिवाज और जीवन शैली पूरी तरह से विज्ञान पर आधारित है, जिसे आधुनिक विज्ञान एवं शोध एक-एक करके प्रमाणित करते जा रहे हैं।

सनातन धर्म की जय हो। विश्व का कल्याण हो।

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एक बार की बात है एक भिखारी कबीर साहब के पास आया


KULDEEP SAXENA

एक बार की बात है एक भिखारी कबीर साहब के पास आया और कुछ खाने के लिए मांगा । भिखारी काफी दिन से भूखा था । तब कबीर जी कपडे बुन रहे थे । कबीर जी ने भिखारी से कहा कि मेरे पास इस समय खाने के लिए कुछ भी नही है । और ना ही पैसे है । फिर कबीर जी ने उस भिखारी को पशम (ऊन ) के धागे का गोला देते हुए कहा कि इस समय मेरे पास यही है । इसे बेचकर कुछ खा लेना । बह भिखारी चला गया । रास्ते मे एक तलाब आया, तलाब मे मछलियाँ बहुत थी। भिखारी ने उस धागे का जाल बनाकर मछली को पकडने के लिए तलाब मे फेंका । क्योकि वह धागा कमाई वाले संत कबीर जी का था । इस लिए उस जाल मे काफी मछलियाँ आई । वह भिखारी सारा दिन मछलियाँ पकडता रहा । शाम को उसने सारी मछलियाँ बेच दी । वह भिखारी रोज ऐसे ही करता । उसने धीरे धीरे कई जाल पा लिए । और कुछ ही सालो मे वह बहुत अमीर आदमी बन गया । एक दिन उस भिखारी ने सोचा कि क्यो ना उस संत के दर्शन किए जाए ।
भिखारी संत कबीर जी के पास सोना चांदी और अच्छे कपडे ले के गया । कबीर जी ने पहले तो उसे पहचाना नही । पर जब उस भिखारी ने सारी बात बताई । तो कबीर जी बहुत पछताए और उस भिखारी को कहा कि तुमने जितनी भी मछलियो को मारा है ।उन सब का आधा पाप मुझे लगेगा । क्योंकि मै तुमही वो धागा नही देता तो तुम कभी मछलियाँ नही पकडते । कबीर जी उसका सब सामान लोटा दिया और आगे से अच्छे काम करने का उपदेश दिया ।
हमे भी सोच समझकर दान करना चाहिए क्योंकि अगर हमारा किया हुआ दान किसी गलत काम मे लगेगा तो उसका फल हमे भी भोगना पडेगा..

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छोटी मनु ने गुल्लक से सब सिक्के निकाले और


छोटी मनु ने गुल्लक से सब सिक्के निकाले और
उनको बटोर कर जेब में रख लिया, निकल पड़ी घर से –
पास ही केमिस्ट की दुकान थी उसके जीने धीरे धीरे चढ़ गयी | वो काउंटर के सामने खड़े होकर बोल रही थी पर छोटी सी मनु किसी को नज़र नहीं आ रही थी, ना ही उसकी आवाज़ पर कोई गौर कर रहा था, सब व्यस्त थे |
दुकान मालिक का कोई दोस्त बाहर देश से आया था वो भी उससे बात करने में व्यस्त था | तभी उसने जेब से एक सिक्का निकाल कर काउंटर पर फेका सिक्के की आवाज़ से सबका ध्यान उसकी ओर गया, उसकी तरकीब काम आ गयी |
दुकानदार उसकी ओर आया और उससे प्यार से पूछा क्या चाहिए बेटा ?
उसने जेब से सब सिक्के निकाल कर अपनी छोटी सी हथेली पर रखे और बोली मुझे “चमत्कार” चाहिए,
दुकानदार समझ नहीं पाया उसने फिर से पूछा, वो फिर से बोली मुझे “चमत्कार” चाहिए | दुकानदार हैरान होकर बोला – बेटा यहाँ चमत्कार नहीं मिलता |
वो फिर बोली अगर दवाई मिलती है तो चमत्कार भी आपके यहाँ ही मिलेगा |
दुकानदार बोला – बेटा आप से यह किसने कहा ?
अब उसने विस्तार से बताना शुरु किया – अपनी तोतली जबान से – मेरे भैया के सर में टुमर (ट्यूमर) हो गया है,
पापा ने मम्मी को बताया है की डॉक्टर 4 लाख रुपये बता रहे थे –
अगर समय पर इलाज़ न हुआ तो कोई चमत्कार ही इसे बचा सकता है और कोई संभावना नहीं है, वो रोते हुए माँ से कह रहे थे अपने पास कुछ बेचने को भी नहीं है, न कोई जमीन जायदाद है न ही गहने –
सब इलाज़ में पहले ही खर्च हो गए है,
दवा के पैसे बड़ी मुश्किल से जुटा पा रहा हूँ |
वो मालिक का दोस्त उसके पास आकर बैठ गया और
प्यार से बोला अच्छा ! कितने पैसे लाई हो तुम चमत्कार खरीदने को,
उसने अपनी मुट्टी से सब रुपये उसके हाथो में रख दिए, उसने वो रुपये गिने 21 रुपये 50 पैसे थे |
वो व्यक्ति हँसा और मनु से बोला तुमने चमत्कार खरीद लिया,
चलो मुझे अपने भाई के पास ले चलो |
वो व्यक्ति जो उस केमिस्ट का दोस्त था अपनी छुट्टी बिताने भारत आया था और
न्यूयार्क का एक प्रसिद्द न्यूरो सर्जन था |
उसने उस बच्चे का इलाज 21 रुपये 50 पैसे में किया और वो बच्चा सही हो गया |
प्रभु ने मनु को चमत्कार बेच दिया –
वो बच्ची बड़ी श्रद्धा से
उसको खरीदने चली थी वो उसको मिल गया |
प्रभु सबके पालनहार है –
उनकी मदद ऐसे ही चमत्कार के रूप में मिलती रहती है,

बस आवश्यकता है सच्ची श्रद्धा की |
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यह एक सत्य घटना पर आधारित कहानी है…

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एक साधू किसी नदी के पनघट पर गया


🙏🙏🙏
एक साधू किसी नदी के पनघट पर गया और पानी पीकर पत्थर पर सिर रखकर सो गया।
पनघट पर पनिहारिन आती-जाती रहती हैं तो तीन-चार पनिहारिनें पानी के लिए आईं तो एक पनिहारिन ने कहा- “आहा! साधु हो गया, फिर भी तकिए का मोह नहीं गया। पत्थर का ही सही, लेकिन रखा तो है।”

पनिहारिन की बात साधु ने सुन ली। उसने तुरंत पत्थर फेंक दिया।
दूसरी बोली,” साधु हुआ, लेकिन खीज नहीं गई। अभी रोष नहीं गया, तकिया फेंक दिया।”

तब साधु सोचने लगा, अब वह क्या करें?

तब तीसरी पनिहारिन बोली,”बाबा! यह तो पनघट है, यहां तो हमारी जैसी पनिहारिनें आती ही रहेंगी, बोलती ही रहेंगी, उनके कहने पर तुम बार-बार परिवर्तन करोगे तो साधना कब करोगे?”

लेकिन एक चौथी पनिहारिन ने बहुत ही सुन्दर और एक बड़ी अद्भुत बात कह दी-
“साधु, क्षमा करना, लेकिन हमको लगता है, तूमने सब कुछ छोड़ा लेकिन अपना चित्त नहीं छोड़ा है, अभी तक वहीं का वहीं बने हुए है। दुनिया पाखण्डी कहे तो कहे, तूम जैसे भी हो, हरिनाम लेते रहो।”

सच है दुनिया का तो काम ही है कहना। ऊपर देखकर चलोगे तो कहेंगे… ‘अभिमानी हो गए।‘
नीचे देखकर चलोगे तो कहेंगे… ‘बस किसी के सामने देखते ही नहीं।‘
आंखे बंद कर दोगे तो कहेंगे कि… ‘ध्यान का नाटक कर रहा है।‘
चारो ओर देखोगे तो कहेंगे कि… ‘निगाह का ठिकाना नहीं। निगाह घूमती ही रहती है।‘
और परेशान होकर आंख फोड़ लोगे तो यही दुनिया कहेगी कि… ‘किया हुआ भोगना ही पड़ता है।‘
ईश्वर को राजी करना आसान है, लेकिन संसार को राजी करना असंभव है।
दुनिया क्या कहेगी, उस पर ध्यान दोगे तो आप अपना ध्यान नहीं लगा पाओगे ….।

।।जय श्री राम ।।

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राम से बड़ा राम का नाम


एक राजा ने भगवान कृष्ण का एक मंदिर बनवाया और पूजा के लिए एक पुजारी को लगा दिया. पुजारी बड़े भाव से बिहारीजी की सेवा करने लगे. भगवान की पूजा-अर्चना और सेवा-टहल करते पुजारी की उम्र बीत गई. राजा रोज एक फूलों की माला सेवक के हाथ से भेजा करता था.पुजारी वह माला बिहारीजी को पहना देते थे.जब राजा दर्शन करने आता तो पुजारी वह माला बिहारीजी के गले से उतारकर राजा को पहना देते थे.यह रोज का नियम था. एक दिन राजा किसी वजह से मंदिर नहीं जा सका.उसने एक सेवक से कहा- माला लेकर मंदिर जाओ. पुजारी से कहना आज मैं नहीं आ पाउंगा. सेवक ने जाकर माला पुजारी को दे दी और बता दिया कि आज महाराज का इंतजार न करें. सेवक वापस आ गया. पुजारी ने माला बिहारीजी को पहना दी. फिर उन्हें विचार आया कि आज तक मैं अपने बिहारीजी की चढ़ी माला
राजा को ही पहनाता रहा. कभी ये सौभाग्य मुझे नहीं मिला.जीवन का कोई भरोसा नहीं कब रूठ जाए. आज मेरे प्रभु ने मुझ पर बड़ी कृपा की है. राजा आज आएंगे नहीं, तो क्यों न माला मैं पहन लूं. यह सोचकर पुजारी ने बिहारीजी के गले से माला उतारकर स्वयं पहन ली. इतने में सेवक आया और उसने बताया कि राजा की सवारी बस मंदिर में पहुंचने ही वाली है.यह सुनकर पुजारी कांप गए. उन्होंने सोचा अगर राजा ने माला मेरे गले में देख ली तो मुझ पर क्रोधित होंगे. इस भय से उन्होंने अपने गले से माला उतारकर बिहारीजी को फिर से पहना दी. जैसे ही राजा दर्शन को आया तो पुजारी ने नियम अुसार फिर से वह माला उतार कर राजा के गले में पहना दी. माला पहना रहे थे तभी राजा को माला में एक सफ़ेद बाल दिखा.राजा को सारा माजरा समझ गया कि पुजारी ने माला स्वयं पहन ली थी और फिर निकालकर वापस डाल दी होगी. पुजारी ऐसाछल करता है, यह सोचकर राजा को बहुत गुस्सा आया. उसने पुजारी जी से पूछा- पुजारीजी यह सफ़ेद बाल किसका है.? पुजारी को लगा कि अगर सच बोलता हूं तो राजा दंड दे देंगे इसलिए जान छुड़ाने के लिए पुजारी ने कहा- महाराज यहसफ़ेद बाल तो बिहारीजी का है. अब तो राजा गुस्से से आग- बबूला हो गया कि ये पुजारी झूठ पर झूठ बोले जा रहा है.भला बिहारीजी के बाल भी कहीं सफ़ेद होते हैं. राजा ने कहा-पुजारी अगर यह सफेद बाल बिहारीजी का है तो सुबह शृंगार के समय मैं आउंगा और देखूंगा कि बिहारीजी के बाल सफ़ेद है या काले. अगर बिहारीजी के बाल काले निकले तो आपको फांसी हो जाएगी. राजा हुक्म सुनाकर चला गया.अब पुजारी रोकर बिहारीजी से विनती करने लगे- प्रभु मैं जानता हूं आपके
सम्मुख मैंने झूठ बोलने का अपराध किया. अपने गले में डाली माला पुनः आपको पहना दी. आपकी सेवा करते-करते वृद्ध हो गया. यह लालसा ही रही कि कभी आपको चढ़ी माला पहनने का सौभाग्य मिले. इसी लोभ में यह सब अपराध हुआ. मेरे ठाकुरजी पहली बार यह लोभ हुआ और ऐसी विपत्ति आ पड़ी है. मेरे
नाथ अब नहींहोगा ऐसा अपराध. अब आप ही बचाइए नहीं तो कल सुबह मुझे फाँसी पर चढा दिया जाएगा. पुजारी सारी रात रोते रहे. सुबह होते ही राजा मंदिर में आ गया. उसने कहा कि आज प्रभु का शृंगार वह स्वयं करेगा. इतना कहकर राजा ने जैसे ही मुकुट हटाया तो हैरान रह गया. बिहारीजी के सारे बाल सफ़ेद थे. राजा को लगा, पुजारी ने जान बचाने के लिए बिहारीजी के बाल रंग दिए होंगे. गुस्से से तमतमाते हुए उसने बाल की जांच करनी चाही. बाल असली हैं या नकली यब समझने के लिए उसने जैसे ही बिहारी जी के बाल तोडे, बिहारीजी के सिर से खून की धार बहने लगी. राजा ने प्रभु के चरण पकड़ लिए और क्षमा मांगने लगा. बिहारीजी की मूर्ति से आवाज आई- राजा तुमने आज तक मुझे केवल मूर्ति ही समझा इसलिए आज से मैं तुम्हारे लिए मूर्ति ही हूँ. पुजारीजी मुझे साक्षात भगवान् समझते हैं.उनकी श्रद्धा की लाज रखने के लिए आज मुझे अपने बाल सफेद करने पड़े व रक्त की धार भी बहानी पड़ी तुझे समझाने के लिए.
कहते हैं- समझो तो देव नहीं तो पत्थर. श्रद्धाभाव हो तो उन्हीं पत्थरों में भगवान सप्राण होकर भक्त से मिलने आ जाएंगे ।।
भाव बिना सूनी पुकारे मै कभी सुनता नही
भाव वाले भक्त का भरपूर मुझसे प्यार है
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​दानवीर कर्ण का नियम


​दानवीर कर्ण का नियम
बात उन दिनों की है जब महाराज युधिष्ठिर इंद्रप्रस्थ पर राज्य करते थे। राजा होने के नाते वे काफी दान-पुण्य भी करते थे। धीरे-धीरे उनकी प्रसिद्धि दानवीर के रूप में फैलने लगी और पांडवों को इसका अभिमान होने लगा। कहते हैं कि भगवान दर्पहारी होते हैं। अपने भक्तों का अभिमान, तो उन्हें बिल्कुल पसंद नहीं। एक बार श्रीकृष्ण इंद्रप्रस्थ पहुंचे। भीम व अर्जुन ने उनके सामने युधिष्ठिर की प्रशंसा शुरू की। दोनों ने बताया कि वे कितने बड़े दानी हैं।
तब कृष्ण ने उन्हें बीच में ही टोक दिया और कहा, ‘लेकिन हमने कर्ण जैसा दानवीर और नहीं सुना।’ पांडवों को यह बात पसंद नहीं आई। भीम ने पूछ ही लिया, ‘भला वो कैसे?’ कृष्ण ने कहा कि ‘समय आने पर बतलाऊंगा।’ बात आई-गई हो गई। कुछ ही दिनों में सावन शुरू हो गए व वर्षा की झड़ी लग गई। उस समय एक याचक युधिष्ठिर के पास आया और बोला, ‘महाराज! मैं आपके राज्य में रहने वाला एक ब्राह्मण हूं।
आज मेरा व्रत है और हवन किए बिना मैं कुछ भी नहीं खाता-पीता। कई दिनों से मेरे पास यज्ञ के लिए चंदन की लकड़ी नहीं है। यदि आपके पास हो तो, कृपा कर मुझे दे दें। अन्यथा मैं हवन पूरा नहीं कर पाऊंगा और भूखा-प्यासा मर जाऊंगा।’ युधिष्ठिर ने तुरंत कोषागार के कर्मचारी को बुलवाया और कोष से चंदन की लकड़ी देने का आदेश दिया।
संयोग से कोषागार में सूखी लकड़ी नहीं थी। तब महाराज ने भीम व अर्जुन को चंदन की लकड़ी का प्रबंध करने का आदेश दिया। लेकिन काफी दौड़-धूप के बाद भी सूखी लकड़ी की व्यवस्था नहीं हो पाई। तब ब्राह्मण को हताश होते देख कृष्ण ने कहा, ‘मेरे अनुमान से एक स्थान पर आपको लकड़ी मिल सकती है, आइए मेरे साथ।’ ब्राह्मण की आखों में चमक आ गई।
भगवान ने अर्जुन व भीम को भी इशारा किया, वेष बदलकर वे भी ब्राह्मण के संग हो लिए। कृष्ण सबको लेकर कर्ण के महल में गए। सभी ब्राह्मणों के वेष में थे, अत: कर्ण ने उन्हें पहचाना नहीं। याचक ब्राह्मण ने जाकर लकड़ी की अपनी वही मांग दोहराई। कर्ण ने भी अपने भंडार के मुखिया को बुलवाकर सूखी लकड़ी देने के लिए कहा, वहां भी वही उत्तर प्राप्त हुआ।
ब्राह्मण निराश हो गया। अर्जुन-भीम प्रश्न-सूचक निगाहों से भगवान को ताकने लगे। लेकिन वे अपनी चिर-परिचित मुस्कान लिए बैठे रहे। तभी कर्ण ने कहा, ‘हे देवता! आप निराश न हों, एक उपाय है मेरे पास।’ देखते ही देखते कर्ण ने अपने महल के खिड़की-दरवाज़ों में लगी चंदन की लकड़ी काट-काट कर ढेर लगा दी, फिर ब्राह्मण से कहा, ‘आपको जितनी लकड़ी चाहिए, कृपया ले जाइए।’ कर्ण ने लकड़ी पहुंचाने के लिए ब्राह्मण के साथ अपना सेवक भी भेज दिया। ब्राह्मण लकड़ी लेकर कर्ण को आशीर्वाद देता हुआ लौट गया। पांडव व श्रीकृष्ण भी लौट आए।
वापस आकर भगवान ने कहा, ‘साधारण अवस्था में दान देना कोई विशेषता नहीं है, असाधारण परिस्थिति में किसी के लिए अपने सर्वस्व को त्याग देने का ही नाम दान है। अन्यथा चंदन की लकड़ी के खिड़की-द्वार तो आपके महल में भी थे।’ इस कहानी का तात्पर्य यह है कि हमें ऐसे कार्य करने चाहिए कि हम उस स्थिति तक पहुंच जाएं जहां पर स्वाभाविक रूप से जीव भगवान की सेवा करता है।
हमें भगवान को देखने की चेष्टा नहीं करनी चाहिए, बल्कि अपने को ऐसे कार्यो में संलग्न करना चाहिए कि भगवान स्वयं हमें देखें। केवल एक गुण या एक कार्य में अगर हम पूरी निष्ठा से अपने को लगा दें, तो कोई कारण नहीं कि भगवान हम पर प्रसन्न न हों। कर्ण ने कोई विशेष कार्य नहीं किया, किंतु उसने अपना यह नियम भंग नहीं होने दिया कि उसके द्वार से कभी कोई निराश नहीं लौटेगा।
जय महाकाल जय गुरुदेव…

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જે ખરાબ કરે છે તે તેની સાથે જ રહે છે અને જે સારુ કરે છે તે તેને પાછુ મળે છે


​એક દયાળું સ્વભાવની સ્ત્રી હતી. એને એવો નિયમ કરેલો કે રસોઇ બનાવતી વખતે પ્રથમ રોટલી તૈયાર કરીને એને બહારની શેરીમાં પડતી રસોડાની બારી પર મુકવી જેથી જરુરિયાત વાળી વ્યક્તિ એ રોટલીઓ ઉપયોગ કરી શકે.

એક વખત એક ભિખારીની નજર આ રોટલી પર પડી એટલે એ રોટલી લેવા માટે આવ્યો. રોટલી હાથમાં લઇને બોલ્યો “ જે ખરાબ કરે છે તે તેની સાથે જ રહે છે અને જે સારુ કરે છે તે તેને પાછુ મળે છે.” પેલા બહેનને આ કંઇ સમજાયુ નહી.

બીજા દિવસે ભિખારી પાછો આવ્યો. પેલી સ્ત્રી રોટલી મુકે તેની રાહ જોઇને બેઠો જેવી રોટલી મુકી કે ફટાક દઇને ઉઠાવી લીધી અને બોલ્યો “ જે ખરાબ કરે છે તે તેની સાથે જ રહે છે અને જે સારુ કરે છે તે તેને પાછુ મળે છે.” પેલી સ્ત્રી વિચારવા લાગી કે એણે મારો આભાર માનવો જોઇએ કે કૃતજ્ઞતા વ્યકત કરવી જોઇએ એને બદલે એ તો રોજ એક સરખો ઉપદેશ આપે છે.

હવે તો આ રોજનો ક્રમ બની ગયો. જેવી રોટલી બારી પર મુકાય કે ભિખારી એ ઉઠાવીને ચાલતી પકડે. પેલી સ્ત્રીને હવે ગુસ્સો આવ્યો. રોજ મારી રોટલી લઇ જાય છે પણ આભારના બે શબ્દો પણ બોલતો નથી.

એક દિવસ ગુસ્સામાં ને ગુસ્સામાં રોટલી પર ઝેર ચોપડીને બારી પાસે મુકવા ગઇ. ભિખારી ત્યાં રાહ જોઇને બેઠો જ હતો. રોટલી બારી પર મુકતા એ સ્ત્રીનો જીવ ન ચાલ્યો એણે ઝેરવાળી રોટલીને ચુલામાં નાખીને સળગાવી દીધી અને બીજી રોટલી બનાવીને બહાર મુકી જે લઇને ભિખારીએ ચાલતી પકડી.

થોડા સમય પછી કોઇએ એના ઘરનો દરવાજો ખખડાવ્યો. એણે દરવાજો ખોલ્યો તો એ ફાટી આંખે સામે ઉભેલી વ્યક્તિને જોઇ જ રહી. ઘણા સમય પહેલા ઘર છોડીને જતો રહેલો એનો યુવાન દિકરો સામે ઉભો હતો. ભિખારી કરતા પણ ખરાબ હાલત હતી. આખુ શરીર ધ્રુજતું હતું. સ્ત્રી તો પોતાના દિકરાને ભેટીને રડી જ પડી.

છોકરાએ કહ્યુ , “ હું ઘણા દિવસનો ભુખ્યો હતો. માંડ માંડ આપણા ગામના પાદર સુધી પહોંચી શક્યો. વધુ ચાલવાની મારી કોઇ જ ક્ષમતા ન હતી. હું બેભાન જેવી અવસ્થામાં પડેલો હતો. ત્યારે ત્યાંથી એક ભિખારી પસાર થયો એના હાથમાં એક રોટલી હતી. હું ટીકી ટીકીને એ રોટલી જોવા લાગ્યો. ભિખારીએ રોટલી મને આપી અને કહ્યુ , “ હું રોજ આ રોટલી ખાઉં છું પણ આજે મારા કરતા આ રોટલીની તને વધારે જરૂર છે. માટે તું ખાઇ જા.”

પેલી સ્ત્રી ત્યાં જ ફસડાઇ પડી. “ અરે મારા પ્રભુ ! આજે ગુસ્સામાં ને ગુસ્સામાં ઝેરવાળી રોટલી એ ભિખારીને આપી હોત તો ?……..હવે મને સમજાય છે એ જે બોલતો હતો તે બિલકુલ સાચુ હતુ.”

મિત્રો, કોઇપણ કામ કરવામાં આવે ત્યારે વહેલું કે મોડુ એનું પરિણામ અવશ્ય મળે છે. સદભાવથી કરેલા કાર્યનું પરિણામ સુખદ હશે અને દુર્ભાવથી કરેલા કાર્યનું પરિણામ દુ:ખદ હશે.

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‘ હું પાણીને સ્થિર રાખીશ.’


​મહાભારતના એક પ્રસંગનું

કોઈકે અદભૂત દર્શન કરાવ્યું છે.

મત્સ્યવેધની આગલી રાતે

કૃષ્ણ અને અર્જુન સંવાદ કરે છે.

કૃષ્ણ અર્જુનને અત્યંત

ધીરજપૂર્વક સમજાવે છે :

ત્રાજવા પર સંભાળીને ચઢજે,

પગ બરાબર સંતુલીત રાખજે,

ધ્યાન માછલીની આંખ પર જ

કેન્દ્રિત રાખજે, મનમાં સંપૂર્ણ

એકાગ્રતા રાખજે . . . વગેરે વગેરે.

અર્જુન પૂછે છે : 

બધું મારે જ કરવાનું ? 

તો તમે શું કરશો ?

જવાબ મળે છે : 

જે તારાથી ન થાય એ હું કરીશ.

એમ ?

એવું શું છે જે મારાથી નહીં થાય ? 

એવું તે શું કરશો ?

‘ હું પાણીને સ્થિર રાખીશ.’

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શ્રી કૃષ્ણ જન્મોત્સવ અવસરે