Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

जिसकी निर्बलता गयी, वही राम हो गया


★★ जिसकी निर्बलता गयी, वही राम हो गया ★★

मैंने सुना है, चीन में एक बहुत बड़ा फकीर था। उसकी बड़ी दूर – दूर तक ख्याति थी कि वह अभय को उपलब्ध हो गया है। यह सबसे बड़ी उपलब्धि है। क्योंकि जो आदमी अभय को उपलब्ध हो जायेगा वह ताजा, जवान चित्त पा लेता है। और ताजा, जवान चित्त फौरन परमात्मा को, सत्य को जान लेता है।

एक युवक संन्यासी उस फकीर की खोज में गया घने जंगल में, जहां बहुत भय था, वह फकीर वहां रहता था। जहां शेर दहाड़ करते थे, जहां पागल हाथी वृक्षों को उखाड़ देते थे, उनके ही बीच, चट्टानों पर ही, वह फकीर पड़ा रहता था। युवक संन्यासी उसके पास गया। उसी चट्टान के पास बैठ गया। उससे बात करने लगा, तभी एक पागल हाथी दौड़ता हुआ निकला पास से। उसकी चोटों से पत्थर हिल गये। वृक्ष नीचे गिर गये। वह युवक कंपने लगा खड़े होकर। उस बूढ़े संन्यासी के पीछे छिप गया।

वह बूढ़ा संन्यासी खूब हंसने लगा और उसने कहा, तुम अभी डरते हो ? तो संन्यासी कैसे हुए ? क्योंकि जो डरता है, उसका संन्यास से क्या संबंध ? हालांकि अधिकतर संन्यासी डरकर ही संन्यासी हो जाते हैं।

वह युवक कंप रहा है। उसने कहा, मुझे बहुत डर लग गया। अभी संन्यास वगैरह का कुछ खयाल नहीं आता। थोड़ा पानी मिल सकेगा, मेरे तो ओंठ सूख गये।

बूढ़ा उठा, वृक्ष के नीचे, जहां उसका पानी रखा था, पानी लेकर गया। जब तक बूढ़ा लौटा, उस युवक संन्‍यासी ने एक पत्थर उठाकर उस चट्टान पर जिस पर बूढ़ा बैठा था, लेटता था, बुद्ध का नाम लिख दिया – नमो बुद्धा। बूढा लौटा, चट्टान पर पैर रखने को था, नीचे दिखायी पड़ा नमो बुद्धा। पैर कंप गया, चट्टान से नीचे उतर गया!

वह युवक खूब हंसने लगा। उसने कहा, डरते आप भी हैं। डर में कोई फर्क नहीं है। और मैं तो एक हाथी से डरा, जो बहुत वास्तविक था। और एक लकीर से मैंने लिख दिया, नमो बुद्धा:, तो पैर रखने में डर लगता कि भगवान के नाम पर पैर न पड़ जाये!

किसका डर ज्यादा है ? वह युवा पूछने लगा। उस युवक ने कहा, डरते आप भी हैं। डर में कोई फर्क नहीं पड़ा। और ध्यान रहे, हाथी से डर जाना – बुद्धिमत्ता भी हो सकती है। लेकिन भगवान के नाम पर पैर रखने से डर जाना तो बुद्धिमानी नहीं कही जा सकती है। पहला डर, बहुत स्वाभाविक हो सकता है। दूसरा डर, बहुत साइकोलॉजिकल, बहुत मानसिक और बहुत भीतरी है।

हम सब डरे हुए हैं। बहुत भीतरी डर है, सब तरफ से मन को पकड़े हुए है।

हम गाते हैं न कि निर्बल के बल राम ! गा रहे हैं सुबह से बैठकर कि हे भगवान, निर्बल के बल तुम्हीं हो ! किसी निर्बल का कोई बल राम नहीं है।

【जिसकी निर्बलता गयी, वह राम हो जाता है】

~ ओशो ~

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