Posted in भारतीय मंदिर - Bharatiya Mandir

Saraswati


Jain Saraswati: Displayed in British Museum.
*** In Jainism Saraswati recognized as Supreme Deity of Knowledge and Wisdom.
*** The various Jain texts mentioned about the different name of Saraswati such as Shruta-Devata, Bharati Sarada ect.
*** As Shruta-Devata, She Presides over the Shruta or Preaching of Tirthankara.
*** The antiquity of the worship of Saraswati among Jain community was very popular from very ancient times and it can be established from literary as well as archaeological evidence.
*** Mathura, Bharat is the place from where the earliest of Jain Saraswati was discovered.
*** The earliest extant image of Sarasvati, dated 132 C.E. also belongs to Jaina tradition is now housed in the State museum of Lakhnau (Lucknow), U.P. Bharat.
*** Rajasthan is one of the most important places of Jainism where it spread from very early times. Among the two sect of Jain community Shwetambara section has more popularity in this region. A good number of Jain art and architecture are observed in this state. Saraswati the learning goddess of Jainism were also acceptable in this region and Her sculpture are there in different temple in discard form.
*** Image Details: A Marble Image of Sarswati, is Probably from Southwest Rajasthan at Present Displayed in the British Museum.

Jigna Shah's photo.
Posted in यत्र ना्यरस्तुपूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:

स्त्री को भी सृजन के मार्गों पर जाना पड़ेगा


★★★● भविष्य की सभ्यता के निर्माण में…. ●★★★

★★★● ….नारी को खुलकर सामने आने होगा ●★★★


स्त्री को भी सृजन के मार्गों पर जाना पड़ेगा। उसे भी निर्माण की दिशाएं खोजनी पड़ेंगी। जीवन को ज्यादा सुंदर और सुखद बनाने के लिए उसे भी अनुदान करना पड़ेगा; तभी स्त्री का मान, स्त्री का सम्मान, उसकी प्रतिष्ठा है। स्त्री को एक और तरह की ‍’शिक्षा’ चाहिए, जो उसे संगीतपूर्ण व्यक्तित्व दे, जो उसे नृत्यपूर्ण व्यक्तित्व दे, जो उसे प्रतीक्षा की अनंत क्षमता दे, जो उसे मौन की, चुप होने की, अनाक्रामक होने की, प्रेमी की और करुणा की गहरी शिक्षा दे। यह शिक्षा अनिवार्य रूपेण ‘ध्यान’ है।

स्त्री को पहले दफा यह सोचना है क्या स्त्री भी एक नई संस्कृति को जन्म देने के आधार रख सकती है? कोई संस्कृति जहां युद्ध और हिंसा नहीं। कोई संस्कृति जहां प्रेम, सहानुभूति और दया हो। कोई संस्कृति जो विजय के लिए आतुर न हो — जीने के लिए आतुर हो। जीवन को जीने की कला और जीवन को शान्ति से जीने की आस्था और निष्ठा पर खड़ी हो – यह संस्कृति — स्त्री जन्म दे सकती है – स्त्री जरूर जन्म दे सकती है।

अगर सारी दुनिया की स्त्रियां एक बार तय कर लें — युद्ध नहीं होगा; दुनिया पर कोई राजनैतिक युद्ध में कभी किसी को नही घसीट सकता। सिर्फ स्त्रियां तय कर लें; युद्ध अभी नहीं होगा- तो नहीं हो सकता। क्योंकि कौन जाएगा युद्ध पर? कोई बेटा जाता है, कोई पति जाता है, कोई बाप जाता है।

लेकिन स्त्रियां पागल हैं। युद्ध होता है तो टीका करती हैं कि जाओ युद्ध पर। पाकिस्तानी मां, पाकिस्तानी बेटे के माथे पर टीका करती है, हिन्दुस्तानी मां, हिन्दुस्तानी बेटे के माथे पर टीका करती है कि जाओ बेटे; युद्ध पर जाओ। चाहे पाकिस्तानी बेटा मरता हो, चाहे हिन्दुस्तानी; किसी मां का बेटा मरता है।

अगर सारी दुनिया की स्‍ित्रयों को एक ख्याल पैदा हो जाए कि आज हमें अपने पति को, बेटे को, अपने बाप को युद्ध पर नहीं भेजना है, तो फिर पुरुष की लाख कोशिश पर राजनैतिकों की हर कोशिशें व्यर्थ हो सकती हैं, युद्ध नहीं हो सकता है।

यह स्त्री की इतनी बड़ी शक्ति है, वह उसके ऊपर सोचती है कभी? उसने कभी कोई आवाज नहीं की। उसने कभी कोई फिक्र नहीं की। उस आदमी ने – पुरुष ने – जो रेखाएं खींची हैं राष्ट्रों की, उनको वह मान लेती है।

प्रेम कोई रेखाएं नहीं मान सकता। हिंसा रेखाएं मानती है, क्योंकि जहां प्रेम है, वहां सीमा नहीं होती। सारी दुनिया की स्‍ित्रयों को एक तो बुनियादी यह खयाल जाग जाना चाहिए कि हम एक नई संस्कृति को, एक नए समाज को, एक नई सभ्यता को जन्म दे सकती हैं। जो पुरुष का आधार है उसके ठीक विपरीत आधार रखकर…

यह स्त्री कर सकती है। और स्त्री सजग हो, कॉन्शियस हो, जागे तो कोई भी कठिनाई नहीं। एक क्रांति — बड़ी से बड़ी क्रांति दुनिया में स्त्री को लानी है।

वह यह ‘एक प्रेम पर आधारित’ देने वाली संस्कृति, जो मांगती नहीं, इकट्ठा नहीं करती, देती है, ऐसी एक संस्कृति, निर्मित करनी है। उस सबसे बड़ा धर्म स्त्री के सामने आज कोई और नहीं। यह पुरुष के संसार को बदल देना है आमूल।

शायद पुरानी पीढ़ी नहीं कर सकेगी। नई पीढ़ी की लड़कियां कुछ अगर हिम्मत जुटाएंगी और फिर पुरुष होने की नकल और बेवकूफी में नहीं पड़ेंगी तो यह क्रांति निश्चित हो सकती है।

~ ओशो ~

(नारी और क्रान्ति पुस्तक से उद्घृत)

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

जिसकी निर्बलता गयी, वही राम हो गया


★★ जिसकी निर्बलता गयी, वही राम हो गया ★★

मैंने सुना है, चीन में एक बहुत बड़ा फकीर था। उसकी बड़ी दूर – दूर तक ख्याति थी कि वह अभय को उपलब्ध हो गया है। यह सबसे बड़ी उपलब्धि है। क्योंकि जो आदमी अभय को उपलब्ध हो जायेगा वह ताजा, जवान चित्त पा लेता है। और ताजा, जवान चित्त फौरन परमात्मा को, सत्य को जान लेता है।

एक युवक संन्यासी उस फकीर की खोज में गया घने जंगल में, जहां बहुत भय था, वह फकीर वहां रहता था। जहां शेर दहाड़ करते थे, जहां पागल हाथी वृक्षों को उखाड़ देते थे, उनके ही बीच, चट्टानों पर ही, वह फकीर पड़ा रहता था। युवक संन्यासी उसके पास गया। उसी चट्टान के पास बैठ गया। उससे बात करने लगा, तभी एक पागल हाथी दौड़ता हुआ निकला पास से। उसकी चोटों से पत्थर हिल गये। वृक्ष नीचे गिर गये। वह युवक कंपने लगा खड़े होकर। उस बूढ़े संन्यासी के पीछे छिप गया।

वह बूढ़ा संन्यासी खूब हंसने लगा और उसने कहा, तुम अभी डरते हो ? तो संन्यासी कैसे हुए ? क्योंकि जो डरता है, उसका संन्यास से क्या संबंध ? हालांकि अधिकतर संन्यासी डरकर ही संन्यासी हो जाते हैं।

वह युवक कंप रहा है। उसने कहा, मुझे बहुत डर लग गया। अभी संन्यास वगैरह का कुछ खयाल नहीं आता। थोड़ा पानी मिल सकेगा, मेरे तो ओंठ सूख गये।

बूढ़ा उठा, वृक्ष के नीचे, जहां उसका पानी रखा था, पानी लेकर गया। जब तक बूढ़ा लौटा, उस युवक संन्‍यासी ने एक पत्थर उठाकर उस चट्टान पर जिस पर बूढ़ा बैठा था, लेटता था, बुद्ध का नाम लिख दिया – नमो बुद्धा। बूढा लौटा, चट्टान पर पैर रखने को था, नीचे दिखायी पड़ा नमो बुद्धा। पैर कंप गया, चट्टान से नीचे उतर गया!

वह युवक खूब हंसने लगा। उसने कहा, डरते आप भी हैं। डर में कोई फर्क नहीं है। और मैं तो एक हाथी से डरा, जो बहुत वास्तविक था। और एक लकीर से मैंने लिख दिया, नमो बुद्धा:, तो पैर रखने में डर लगता कि भगवान के नाम पर पैर न पड़ जाये!

किसका डर ज्यादा है ? वह युवा पूछने लगा। उस युवक ने कहा, डरते आप भी हैं। डर में कोई फर्क नहीं पड़ा। और ध्यान रहे, हाथी से डर जाना – बुद्धिमत्ता भी हो सकती है। लेकिन भगवान के नाम पर पैर रखने से डर जाना तो बुद्धिमानी नहीं कही जा सकती है। पहला डर, बहुत स्वाभाविक हो सकता है। दूसरा डर, बहुत साइकोलॉजिकल, बहुत मानसिक और बहुत भीतरी है।

हम सब डरे हुए हैं। बहुत भीतरी डर है, सब तरफ से मन को पकड़े हुए है।

हम गाते हैं न कि निर्बल के बल राम ! गा रहे हैं सुबह से बैठकर कि हे भगवान, निर्बल के बल तुम्हीं हो ! किसी निर्बल का कोई बल राम नहीं है।

【जिसकी निर्बलता गयी, वह राम हो जाता है】

~ ओशो ~

Posted in भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas

पेशवा बाजीराव प्रथम


आपने जूलियस सीज़र से लेकर सिकंदर तक और नेपोलियन से औरंगज़ेब तक न जाने कितने सम्राटों, सेनापतियों और योद्धाओं के बारे में पढ़ा होगा। लेकिन क्या आप मुझे उस सेनापति का नाम बता सकते हैं, जो अपने जीवन में एक भी लड़ाई न हारा हो? क्या आप मुझे उस कुशल प्रशासक का नाम बता सकते हैं, जिसने ग्वालियर के सिंधिया, इंदौर के होलकर और बडौदा के गायकवाड़ जैसे राजघरानों की नींव रखी? क्या आपने कभी उस महान भारतीय योद्धा का नाम भी सुना है?
अविश्वसनीय पराक्रम का प्रदर्शन करने वाले उस अजेय अपराजित योद्धा का नाम है – पेशवा बाजीराव प्रथम! छत्रपति शिवाजी महाराज ने मराठा साम्राज्य के कुशल व सक्षम प्रशासन के लिए “पेशवा” (प्रधानमंत्री) का पद निर्माण किया था। पेशवाई की यह महान परंपरा सन 1674 में शिवाजी के राज्याभिषेक से प्रारंभ हुई, जो सन 1818 तक जारी रही। पेशवा बाजीराव प्रथम इसी महान परंपरा के कुशल वाहक थे।
18 अगस्त 1700 को जन्मे बाजीराव केवल 20 वर्ष की आयु में सन 1720 में “पेशवा” (मराठा साम्राज्य के प्रधानमंत्री) पद पर नियुक्त हुए। 28 अप्रैल 1740 को उनकी मृत्यु हो गई। लेकिन मराठा साम्राज्य के सेनापति के रूप में केवल 20 वर्षों के अपने संक्षिप्त कार्यकाल में उन्होंने इतनी महान उपलब्धियां प्राप्त की हैं, जिनके लिए उनका नाम इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखे जाने योग्य है।

पुणे स्थित शनिवारवाडा में बाजीराव की प्रतिमा
20 वर्षों के अपने कार्यकाल में बाजीराव ने 41 से अधिक निर्णायक युद्ध लड़े और वे सभी में विजयी रहे। इनमें मालवा, धार, पालखेड, बुंदेलखंड, दिल्ली और भोपाल के युद्ध प्रमुख हैं। पेशवा पद के सूत्र संभालते ही बाजीराव ने सर्वप्रथम दक्खन के निजाम को परास्त किया और उसे संधि करने पर मजबूर कर दिया। सन 1728 में बाजीराव की सेना ने मालवा पर आक्रमण किया और मुगलों के चंगुल से मालवा को स्वतंत्रता दिलाई।

सन 1727 में मुगल सेना ने मुहम्मद खान बंगश के नेतृत्व में बुंदेलखंड पर आक्रमण कर दिया था। महाराजा छत्रसाल ने पूरी वीरता के साथ मुगल सेना का सामना किया, लेकिन आख़िरकार जैतपुर की लड़ाई के दौरान वे घायल हो गए और मुगल सेना ने उन्हें बंदी बना लिया। सन 1729 में बाजीराव अपनी सेना लेकर उनकी सहायता के लिए पहुँचे और उन्होंने न सिर्फ छत्रसाल को मुक्त कराया, बल्कि मुगल सेना को भी युद्ध के मैदान में धूल चटा दी। इस सहायता के बदले महाराजा छत्रसाल ने अपने साम्राज्य का एक-तिहाई भाग बाजीराव को सौंप दिया, जिसमें सागर, बांदा और झांसी का प्रदेश शामिल था।
मुग़ल सम्राट के आदेश पर सरबुलंद खान गुजरात पर नियंत्रण हासिल करने के इरादे से आया था। सन 1730 में पेशवा की सेनाओं ने उसे परास्त किया और एक संधि के द्वारा बाजीराव को गुजरात में चौथ वसूली व सरदेशमुखी के अधिकार प्राप्त हुए।
सन 1735 तक पूरे गुजरात व मालवा प्रदेश पर मराठा सेनाओं का अधिकार हो चुका था। हालांकि कुछ स्थानीय मुगल अधिकारियों व ज़मींदारों ने मराठों का आधिपत्य स्वीकार नहीं किया। मुग़ल सम्राट मुहम्मद शाह के द्वारा भी मराठों को चौथ व सरदेशमुखी के अधिकार देने में आनाकानी की जा रही थी। आखिरकार बाजीराव ने मुगल सल्तनत को सबक सिखाने का निश्चय किया। दिसंबर 1737 में स्वयं बाजीराव ने मराठों की एक बड़ी सेना लेकर दिल्ली की ओर कूच कर दिया। मुग़ल सेना को चकमा देकर बाजीराव के सैनिक दस दिनों की यात्रा केवल अड़तालीस घंटों में पूरी करके 28 मार्च 1737 को दिल्ली आ पहुँचे। मुगल बादशाह मराठा सेनाओं से डरकर लाल किले में छिप गया। मीर हसन कोका के नेतृत्व में आठ हज़ार मुगल सैनिकों ने बाजीराव की मराठा सेना को रोकने का असफल प्रयास किया। मुग़ल सेना को धूल चटाकर मराठा सेना वापस पुणे की ओर लौट आई।
अब मुगल सम्राट ने मराठों से बदला लेने के लिए निज़ाम उल मुल्क को सत्तर हज़ार सैनिकों की विशाल सेना के साथ भेजा। मराठों से हिसाब चुकाने के उद्देश्य से यह सेना भोपाल पहुँची। लेकिन मराठे तो पहले ही तैयार बैठे थे। बाजीराव के नेतृत्व वाली मराठा सेना ने मुगलों को चारों तरफ से घेरकर उनकी रसद बंद कर दी। आख़िरकार हारकर मुगलों को संधि करनी पड़ी। 7 जनवरी 1738 को हुई इस संधि में मुगलों ने मालवा प्रदेश पर मराठों का आधिपत्य स्वीकार कर लिया और साथ ही युद्ध के हर्जाने के तौर पर मराठों को 50 लाख रूपये भी दिए।
28 अप्रैल 1740 को अचानक उनकी मृत्यु हो गई। ऐसा माना जाता है कि मृत्यु का कारण बुखार या हृदयाघात था। उस समय बाजीराव एक लाख की विशाल सेना लेकर दिल्ली की ओर बढ़ रहे थे और उनका पड़ाव वर्तमान मध्यप्रदेश में इंदौर के पास खरगोन जिले में था। 28 अप्रैल 1740 को ही नर्मदा के किनारे रावेरखेड़ी नामक स्थान पर उनका अंतिम संस्कार किया गया। उनकी समाधि आज भी यहाँ मौजूद है।

खरगोन (मप्र) जिले के रावेरखेड़ी में बाजीराव की समाधि
पेशवा बाजीराव प्रथम निसंदेह भारतीय इतिहास के महान नायकों में से एक थे। किन्तु दुःख की बात है कि आज भी इनके बारे में हम बहुत कम ही जानते हैं। अफ़सोस है कि अधिकांश लोग बाजीराव को केवल एक मराठा सेनापति के तौर पर ही पहचानते हैं, जबकि वास्तव में उनका कार्यक्षेत्र महाराष्ट्र से लेकर वर्तमान मप्र, उप्र, गुजरात और दिल्ली तक फैला हुआ था। इसके ज़िम्मेदार चाहे मुगल हों या अंग्रेज़ अथवा स्वतंत्रता के बाद वाले वामपंथी इतिहास-लेखक या राजनेता, लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं है कि पेशवा बाजीराव प्रथम को अभी तक इतिहास में उचित स्थान नहीं मिला है। कल 28 अप्रैल को उनकी पुण्यतिथि थी, लेकिन शायद ही किसी को यह बात याद रही हो।

कहा जाता है कि जो अपने स्वर्णिम इतिहास को भूल जाते हैं, वे कभी उज्ज्वल भविष्य का निर्माण नहीं कर सकते। अब ये हमें सोचना है कि हम अपने इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठों पर जमी धूल हटाकर सत्य सामने लाना चाहते हैं या भावी पीढ़ियों को भी आत्म-विस्मृति के गर्त में ही धकेलना चाहते हैं।
पेशवा बाजीराव जैसे नायक किसी एक समुदाय अथवा एक क्षेत्र के नहीं, बल्कि संपूर्ण राष्ट्र के नायक हैं। आइये उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें नमन करें!

(स्त्रोत: http://en.wikipedia.org/wiki/Baji_Rao_I,http://chellsie12.blogspot.in/2012/08/shaniwar-wada.html,http://archeolognewsaround.blogspot.in/…/to-save-baji-rao-p…)

Pradipsinh Zala's photo.
Pradipsinh Zala's photo.