Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

झूठ नहीं बोलूँगा


झूठ नहीं बोलूँगा
संस्कृत भाषा का एक प्रसिद्ध ग्रंथ है-: ‘मृच्छ कटिकम्-| इस ग्रंथ में चारुदत ब्राहमण के उत्तम शील की चर्चा की है
चारुदत एक सच्चा ब्राहमण था, उसकी सच्चाई और सद्व्यवहार पर सब विश्वास करते थे और उसके पास अपनी धरोहर रखे जाते थे| एक बार कोई उसके पास अपनी बहुमूल्य रत्न धरोहर के रुप में रख गया| संयोग से ब्राहमण चारुदत के घर चोरी हो गई| इस चोरी में उसके पास रखे धरोहर के रत्न भी चोरी हो गए| चारुदत को अपनी चोरी का उतना दुःख न था, जितना दूसरे के द्वारा धरोहर में रखे रत्नों की चोरी का| यह सूचना चारुदत के मित्र को जब मिली, तब उसने पूछा- “क्या कोई रत्नों की धरोहर रखने का साक्षी (गवाह) था?”

चारुदत ने कहा- “उस समय तो साक्षी कोई नहीं था|”

मित्र बोला- “गवाह नहीं था तो डरते क्यों हो? वह रत्न लौटाने के लिए कहे तो कह देना कि मेरे पास रखे ही नहीं गए थे|”

चारुदत ने उत्तर में कहा-

भैक्ष्येणाथर्जयिष्यामि पुनर्न्यासप्रतिक्रियाम्|

अनृतं नाभिधास्यामि चारित्रभ्रंश- कारणम्||

-चाहे भीख माँगू, पर धरोहर के रत्नों का धन उत्पन्न करके मैं उसे लौटा ही दूँगा, किसी भी अवस्था में चरित्र को कलंकित करने वाले असत्य का प्रयोग नहीं करूँगा, मैं झूठ कभी नहीं बोलूँगा| यह बात सत्य है कि झूठ बोलने से व्यक्ति का चरित्र कलंकित होता है|

Posted in रामायण - Ramayan

कौन थी शबरी


कौन थी शबरी
शबरी की कहानी रामायण के अरण्य काण्ड मैं आती है. वह भीलराज की अकेली पुत्री थी. जाति प्रथा के आधार पर वह एक निम्न जाति मैं पैदा हुई थी. विवाह मैं उनके होने वाले पति ने अनेक जानवरों को मारने के लिए मंगवाया. इससे दुखी होकर उन्होंने विवाह से इनकार कर दिया. फिर वह अपने पिता का घर त्यागकर जंगल मैं चली गई और वहाँ ऋषि मतंग के आश्रम मैं शरण ली. ऋषि मतंग ने उन्हें अपनी शिष्या स्वीकार कर लिया. इसका भारी विरोध हुआ. दूसरे ऋषि इस बात के लिए तैयार नहीं थे कि किसी निम्न जाति की स्त्री को कोई ऋषि अपनी शिष्या बनाये. ऋषि मतंग ने इस विरोध की परवाह नहीं की. ऋषि समाज ने उनका वहिष्कार कर दिया और ऋषि मतंग ने उसे सहर्ष स्वीकार कर लिया.
ऋषि मतंग जब परम धाम को जाने लगे तब उन्होंने शबरी को उपदेश किया कि वह परमात्मा मैं अपना ध्यान और विश्वास बनाये रखें. उन्होंने कहा कि परमात्मा सबसे प्रेम करते हैं. उनके लिए कोई इंसान उच्च या निम्न जाति का नहीं है. उनके लिए सब समान हैं. फिर उन्होंने शबरी को बताया कि एक दिन प्रभु राम उनके द्वार पर आयेंगे.

ऋषि मतंग के स्वर्गवास के बाद शबरी ईश्वर भजन मैं लगी रही और प्रभु राम के आने की प्रतीक्षा करती रहीं. लोग उन्हें भला बुरा कहते, उनकी हँसी उड़ाते पर वह परवाह नहीं करती. उनकी आंखें बस प्रभु राम का ही रास्ता देखती रहतीं. और एक दिन प्रभु राम उनके दरवाजे पर आ गए.

शबरी धन्य हो गयीं. उनका ध्यान और विश्वास उनके इष्टदेव को उनके द्वार तक खींच लाया. भगवान् भक्त के वश मैं हैं यह उन्होंने साबित कर दिखाया. उन्होंने प्रभु राम को अपने झूठे फल खिलाये और दयामय प्रभु ने उन्हें स्वाद लेकर खाया. फ़िर वह प्रभु के आदेशानुसार प्रभुधाम को चली गयीं.

शबरी की कहानी से क्या शिक्षा मिलती है? आइये इस पर विचार करें. कोई जन्म से ऊंचा या नीचा नहीं होता. व्यक्ति के कर्म उसे ऊंचा या नीचा बनाते हैं. ब्राहमण परिवार मैं जन्मे ऋषि ईश्वर का दर्शन तक न कर सके पर निम्न जाति मैं जन्मीं शबरी के घर ईश्वर ख़ुद चलकर आए और झूठे फल खाए. हम किस परिवार मैं जन्म लेंगे इस पर हमारा कोई अधिकार नहीं हैं पर हम क्या कर्म करें इस पर हमारा पूरा अधिकार है. जिस काम पर हमारा कोई अधिकार ही नहीं हैं वह हमारी जाति का कारण कैसे हो सकता है. व्यक्ति की जाति उसके कर्म से ही तय होती है, ऐसा भगवान् ख़ुद कहते हैं.

कहे रघुपति सुन भामिनी बाता,
मानहु एक भगति कर नाता.

प्रभु राम ने शबरी को भामिनी कह कर संबोधित किया. भामिनी शब्द एक अत्यन्त आदरणीय नारी के लिए प्रयोग किया जाता है. प्रभु राम ने कहा की हे भामिनी सुनो मैं केवल प्रेम के रिश्ते को मानता हूँ. तुम कौन हो, तुम किस परिवार मैं पैदा हुईं, तुम्हारी जाति क्या है, यह सब मेरे लिए कोई मायने नहीं रखता. तुम्हारा मेरे प्रति प्रेम ही मुझे तम्हारे द्वार पर लेकर आया है.

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झालावाड़ जिले में स्थित गागरोन के किले को जलदुर्ग भी कहा जाता है


बिना नींव का है ये किला, हजारों वीरांगनाओं ने यहां दी थी जान

झालावाड़ जिले में स्थित गागरोन के किले को जलदुर्ग भी कहा जाता है। 1423 ई. में मांडू के सुल्तान होशंगशाह ने बड़ी सेना के साथ इस किले पर हमला कर दिया। राजा अचलदास को लगा कि वह अब जीत नहीं सकते तो उन्होंने राजपूत परंपरानुसार लड़ते हुए अपनी जान दे दी।

वर्ल्ड हेरिटेज में शामिल इस किले में आर्कियोलॉजी डिपार्टमेंट पर्यटकों के लिए अनेक सुविधाएं देने की तैयारी कर रहा है। गागरोन फोर्ट उत्तर भारत का एकमात्र ऐसा किला है जो तीन तरह से पानी से घिरा है। पानी से घिरा होने के कारण इस किले को जलदुर्ग भी कहा जाता है।

अचलदास खींची मालवा के इतिहास प्रसिद्ध गढ़ गागरोन के अंतिम प्रतापी नरेश थे।
मध्यकाल में गागरोन की संपन्नता एवं समृद्धि पर मालवा में बढ़ती मुस्लिम शक्ति की गिद्ध जैसी नजर हमेशा लगी रहती थी।
अपने से कई गुना बड़ी सेना तथा उन्नत अस्त्रों के सामने जब – दुश्मन से अपनी अस्मत बचने के लिए किले में मौजूद हजारों महिलाओं ने आत्मदाह कर मौत को गले लगा लिया।

जलदुर्ग भी कहते हैं इसे
गागरोन किले का निर्माण डोड राजा बीजलदेव ने बारहवीं सदी में करवाया था।
300 साल तक यहां खींची राजा रहे। यहां 14 युद्ध हुए हैं।
यह उत्तरी भारत का एकमात्र ऐसा किला है जो चारों ओर से पानी से घिरा हुआ है। इस कारण इसे जलदुर्ग के नाम से भी पुकारा जाता है।
यह एकमात्र ऐसा किला है जिसके तीन परकोटे हैं। सामान्यतया सभी किलों के दो ही परकोटे हैं।
इसके अलावा यह भारत का एकमात्र ऐसा किला है जिसे बगैर नींव के तैयार किया गया है। बुर्ज पहाडियों से मिली हुई है।

इस किले से जुड़ा एक मिथ ऐसा भी
-लोगों का मानना है कि राजा के पलंग के पास किसी के सोने और हुक्का पीने की आवाज आती रहती है। यह मान्यता है कि राजा की आत्मा आज भी किले में रात में इसी पलंग पर सोती है।

अकबर ने बनाया था यहां मुख्यालय
मध्ययुग में गागरोन को मुगल बादशाह अकबर ने जीत लिया था। अकबर ने इसे अपना मुख्यालय बनाया था। बाद में इसे अपने नवरत्नों में से एक बीकानेर के राजपुत्र पृथ्वीराज को जागीर में दे दिया

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नीम का तेल + कपूर = (All Out) या मोर्टीन का बाप:-


नीम का तेल + कपूर = (All Out) या मोर्टीन का बाप:-
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* (All Out) की केमिकल वाली रीफिल खाली आपको आपके घर में मिल जायेगी या फिर अपने पडोसी से खाली रिफिल ले ले अब बाजार से आपको दो चीज लानी है एक तो नीम का तेल और कपूर।
* खाली रिफिल में आप नीम का तेल डाले और थोड़ा सा कपूर भी डाल दे और रिफिल को मशीन में लगा दे पूरी रात मच्छर नही आयेगे।
* जब एक प्राकृतिक तरीके से मच्छरो से छुटकारा मिल जाए तो पेस्टीसाइड का जहर अपने जिंदगी मे क्यो घोल रहे है ।
* मच्छर भगाने वाली कवायल 100 सिगरेट के बराबर नुकसान करता है तो सावधान रहिए मच्छर भगाने का सबसे सस्ता, टिकाऊ, आसान और देसी तरीका है पैसे और स्वास्थ्य दोनों की बचत है।

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एक राजा ने यह घोषणा


एक राजा ने यह घोषणा करवा दी कि कल जब मेरे महल का मुख्य दरवाज़ा खोला जायेगा..
तब जिस व्यक्ति ने जिस वस्तु को हाथ लगा दिया वह वस्तु उसकी हो जाएगी..
इस घोषणा को सुनकर सब लोग आपस में बातचीत करने लगे कि मैं अमुक वस्तु को हाथ लगाऊंगा..
कुछ लोग कहने लगे मैं तो स्वर्ण को हाथ लगाऊंगा, कुछ लोग कहने लगे कि मैं कीमती जेवरात को हाथ लगाऊंगा, कुछ लोग घोड़ों के शौक़ीन थे और कहने लगे कि मैं तो घोड़ों को हाथ लगाऊंगा, कुछ लोग हाथीयों को हाथ लगाने की बात कर रहे थे, कुछ लोग कह रहे थे कि मैं दुधारू गौओं को हाथ लगाऊंगा..
कल्पना कीजिये कैसा … अद्भुत दृश्य होगा वह !!
अगले दिन सुबह जब महल का मुख्य दरवाजा खुला तो सब लोग अपनी अपनी मनपसंद वस्तु को हाथ लगाने दौड़े..
सबको इस बात की जल्दी थी कि पहले मैं अपनी मनपसंद वस्तु को हाथ लगा दूँ ताकि वह वस्तु हमेशा के लिए मेरी हो जाएँ और सबके मन में यह डर भी था कि कहीं मुझ से पहले कोई दूसरा मेरी मनपसंद वस्तु को हाथ ना लगा दे..
राजा अपने सिंघासन पर बैठा सबको देख रहा था और अपने आस-पास हो रही भाग दौड़ को देखकर मुस्कुरा रहा था..
उसी समय उस भीड़ में से एक छोटी सी लड़की आई और राजा की तरफ बढ़ने लगी..
राजा उस लड़की को देखकर सोच में पड़ गया और फिर विचार करने लगा कि यह लड़की बहुत छोटी है शायद यह मुझसे कुछ पूछने आ रही है..
वह लड़की धीरे धीरे चलती हुई राजा के पास पहुंची और उसने अपने नन्हे हाथों से राजा को हाथ लगा दिया..
राजा को हाथ लगाते ही राजा उस लड़की का हो गया और राजा की प्रत्येक वस्तु भी उस लड़की की हो गयी..
जिस प्रकार उन लोगों को राजा ने मौका दिया था और उन लोगों ने गलती की..ठीक उसी प्रकार ईश्वर भी हमे हर रोज मौका देता है और हम हर रोज गलती करते है..
हम ईश्वर को पाने की बजाएँ ,ईश्वर की बनाई हुई संसारी वस्तुओं की कामना करते है और
उन्हें प्राप्त करने के लिए यत्न करते है
पर हम कभी इस बात पर विचार नहीं करते कि यदि ईश्वर हमारे हो गए तो उनकी बनाई हुई प्रत्येक वस्तु भी हमारी हो जाएगी..
ईश्वर “को” चाहना…
और
ईश्वर “से” चाहना….
दोनों में बहुत अंतर है..!

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स्वस्थ रहना है तो इन 20 बातों को अनदेखा न करें


स्वस्थ रहना है तो इन 20 बातों को अनदेखा न करें
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1. आजकल बढ़ रहे चर्म रोगों और पेट के रोगों का सबसे बड़ा कारण दूधयुक्त चाय और इसके साथ लिया जाने वाला नमकीन है.
2. कसी हुई टाई बाँधने से आँखों की रोशनी पर नकारात्मक प्रभाव होता है
3. अधिक झुक कर पढने से फेफड़े,रीढ़,और आँख की रौशनी पर बुरा असर होता है
4. अत्यधिक फ्रीज किये हुए ठन्डे पदार्थों के सेवन से बड़ी आंत सिकुड़ जाती है.
5. भोजन के पश्चात स्नान स्नान करने से पाचन शक्ति मंद हो जाती है इसी प्रकार भोजन के तुरंत बाद मैथुन, बहुत ज्यादा परिश्रम करना एवं सो जाना पाचनशक्ति को नष्ट करता है.
6. पेट बाहर निकलने का सबसे बड़ा कारण खड़े होकर या कुर्सी मेज पर बैठ कर खाना और तुरंत बाद पानी पीना है. भोजन सदैव जमीन पर बैठ कर करें. ऐसा करने से आवश्यकता से अधिक खा नहीं पाएंगे. भोजन करने के बाद पानी पीना कई गंभीर रोगों को आमंत्रण देना है.
7. भोजन के प्रारम्भ में मधुर-रस (मीठा), मध्य में अम्ल, लवण रस (खट्टा, नमकीन) तथा अन्त में कटु, तिक्त, कषाय (तीखा, चटपटा, कसेला) रस के पदार्थों का सेवन करना चाहिए
8. भोजन के बाद हाथ धोकर गीले हाथ आँखों पर लगायें. यह आँखों को गर्मी से बचाएगा.
9. नहाने के कुछ पहले एक गिलास सादा पानी पियें. यह हाई ब्लड प्रेशर की समस्या से बहुत हद तक दूर रखेगा.
10. नहाने की शुरुवात सर से करें. बाल न धोने हो तो मुह पहले धोये. पैरों पर पहले पानी डालने से गर्मी का प्रवाह ऊपर की ओर होता है और आँख मस्तिष्क आदि संवेदन शील अंगो को क्षति होती है.
11. नहाने के पहले सोने से पहले एवं भोजन कर चुकने के पश्चात मूत्र त्याग अवश्य कर्रें. यह अनावश्यक गर्मी, कब्ज और पथरी से बचा सकता है.
12. कभी भी एक बार में पूर्ण रूप से मूत्रत्याग न करें बल्कि रूक रुक कर करें. यह नियम स्त्री पुरुष दोनों के लिए है ऐसा करके प्रजनन अंगों से सम्बंधित शिथिलता से आसानी से बचा जा सकता है. (कीगल एक्सरसाइज)
13. खड़े होकर मूत्र त्याग से रीढ़ की हड्डी के रोग होने की सम्भावना रहती है. इसी प्रकार खड़े होकर पानी पीने से जोड़ों के रोग ऑर्थरिटिस आदि हो जाते हैं.
14. फल, दूध से बनी मिठाई, तैलीय पदार्थ खाने के तुरंत बाद पानी नहीं पीना चाहिए. ठंडा पानी तो कदापि नहीं.
15. अधिक रात्रि तक जागने से प्रतिरोधक क्षमता कम होने लगती है .
16. जब भी कुल्ला करें आँखों को अवश्य धोएं. अन्यथा मुह में पानी भरने पर बाहर निकलने वाली गर्मी आँखों को नुकसान पहुचायेगी.
17. सिगरेट तम्बाकू आदि नशीले पदार्थों का सेवन करने से प्रत्येक बार मस्तिष्क की हजारों कोशिकाएं नष्ट हो जाती है इनका पुनर्निर्माण कभी नहीं होता.
18. मल मूत्र शुक्र खांसी छींक अपानवायु जम्हाई वमन क्षुधा तृषा आंसू आदि कुल 13 अधारणीय वेग बताये गए हं इनको कभी भी न रोकें. इनको रोंकना गंभीर रोगों के कारण बन सकते हैं .प्रतिदिन उषापान करने कई बीमारियाँ नहीं हो पाती और डॉक्टर को दिया जाने वाला बहुत सा धन बच जाता है.उषापान दिनचर्या का अभिन्न अंग बनायें.
20. रात्रि शयन से पूर्व परमात्मा को धन्यवाद अवश्य दें. चाहे आपका दिन कैसा भी बीता हो. दिन भर जो भी कार्य किये हों उनकी समीक्षा करते हुए अगले दिन की कार्य योजना बनायें अब गहरी एवं लम्बी सहज श्वास लेकर शरीर को एवं मन को शिथिल करने का प्रयास करे. अपने सब तनाव, चिन्ता, विचार आदि परमपिता परमात्मा को सौंपकर निश्चिंत भाव से निद्रा की शरण में जाएँ.
जय श्री राधे