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गुड़ी पड़वा


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विकास खुराना t

चैत्र मास की शुक्ल प्रतिपदा को
गुड़ी पड़वा या वर्ष प्रतिपदा या उगादि (युगादि) कहा जाता है। इस दिन हिन्दु नववर्ष का आरम्भ होता है। ‘गुड़ी’ का अर्थ ‘विजय पताका’ होता है। कहते हैं शालिवाहन नामक एक कुम्हार-पुत्र ने मिट्टी के सैनिकों की सेना से प्रभावी शत्रुओं का पराभव किया। इस विजय के प्रतीक रूप में शालिवाहन शक का प्रारंभ इसी दिन से होता है। ‘युग‘ और ‘आदि‘ शब्दों की संधि से बना है ‘युगादि‘।
आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में ‘उगादि‘ और महाराष्ट्र में यह पर्व ‘ग़ुड़ी पड़वा’ के रूप में मनाया जाता है।
परिचय
कहा जाता है कि इसी दिन ब्रह्माजी ने सृष्टि का निर्माण किया था। इसमें मुख्यतया ब्रह्माजी और उनके द्वारा निर्मित सृष्टि के प्रमुख देवी-देवताओं, यक्ष-राक्षस, गंधवारें, ऋषि-मुनियों, नदियों, पर्वतों, पशु-पक्षियों और कीट-पतंगों का ही नहीं, रोगों और उनके उपचारों तक का भी पूजन किया जाता है। इसी दिन से नया संवत्सर शुंरू होता है। अत इस तिथि को ‘नवसंवत्सर‘ भी कहते हैं। चैत्र ही एक ऐसा महीना है, जिसमें वृक्ष तथा लताएं पल्लवित व पुष्पित होती हैं। शुक्ल प्रतिपदा का दिन चंद्रमा की कला का प्रथम दिवस माना जाता है। जीवन का मुख्य आधार वनस्पतियों को सोमरस चंद्रमा ही प्रदान करता है। इसे औषधियों और वनस्पतियों का राजा कहा गया है। इसीलिए इस दिन को वर्षारंभ माना जाता है।
आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और महाराष्ट्र में सारे घरों को आम के पेड़ की पित्तयों के बंदनवार से सजाया जाता है। सुखद जीवन की अभिलाषा के साथ-साथ यह बंदनवार समृद्धि, व अच्छी फसल के भी परिचायक हैं। ‘उगादि‘ के दिन ही पंचांग तैयार होता है। महान गणितज्ञ भास्कराचार्य ने इसी दिन से सूर्योदय से सूर्यास्त तक दिन, महीना और वर्ष की गणना करते हुए ‘पंचांग ‘ की रचना की। चैत्र मास की शुक्ल प्रतिपदा को महाराष्ट्र में गुड़ीपड़वा कहा जाता है। वर्ष के साढ़े तीन मुहूतारें में गुड़ीपड़वा की गिनती होती है। शालिवाहन शक का प्रारंभ इसी दिन से होता है।
कहा जाता है कि शालिवाहन नामक एक कुम्हार के लड़के ने मिट्टी के सैनिकों की सेना बनाई और उस पर पानी छिड़ककर उनमें प्राण फूँक दिए और इस सेना की मदद से शिक्तशाली शत्रुओं को पराजित किया। इस विजय के प्रतीक के रूप में शालिवाहन शक का प्रारंभ हुआ। कई लोगों की मान्यता है कि इसी दिन भगवान राम ने बाली के अत्याचारी शासन से दक्षिण की प्रजा को मुक्ति दिलाई। बाली के त्रास से मुक्त हुई प्रजा ने घर-घर में उत्सव मनाकर ध्वज (ग़ुड़ियां) फहराए। आज भी घर के आंगन में ग़ुड़ी खड़ी करने की प्रथा महाराष्ट्र में प्रचलित है। इसीलिए इस दिन को गुड़ीपडवा नाम दिया गया।
इस अवसर पर आंध्र प्रदेश में घरों में ‘पच्चड़ी/प्रसादम‘ तीर्थ के रूप में बांटा जाता है। कहा जाता है कि इसका निराहार सेवन करने से मानव निरोगी बना रहता है। चर्म रोग भी दूर होता है। इस पेय में मिली वस्तुएं स्वादिष्ट होने के साथ-साथ आरोग्यप्रद होती हैं। महाराष्ट्र में पूरन पोली या मीठी रोटी बनाई जाती है। इसमें जो चीजें मिलाई जाती हैं वे हैं– गुड़ , नमक , नीम के फूल,
इमली और कच्चा आम। गुड़ मिठास के लिए, नीम के फूल कड़वाहट मिटाने के लिए और इमली व आम जीवन के खट्टे-मीठे स्वाद चखने का प्रतीक होती हैं। यूँ तो आजकल आम बाजार में मौसम से पहले ही आ जाता है, किन्तु आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और महाराष्ट्र में इसी दिन से खाया जाता है। नौ दिन तक मनाया जाने वाला यह त्यौहार दुर्गापूजा के साथ-साथ,
रामनवमी को राम और सीता के विवाह के साथ सम्पन्न होता है।
इतिहास में वर्ष प्रतिपदा
1. ब्रह्मा द्वारा सृष्टि का सृजन
2. मर्यादा पुरूषोत्तम श्रीराम का राज्याभिषेक
3. माँ दुर्गा की उपासना की
नवरात्र व्रत का प्रारम्भ
4. युगाब्द (युधिष्ठिर संवत्) का आरम्भ
5. उज्जयिनी सम्राट-
विक्रामादित्य द्वारा विक्रमी संवत् प्रारम्भ
6. शालिवाहन शक संवत् ( भारत सरकार का राष्ट्रीय पंचांग )
7. महर्षि दयानन्द द्वारा आर्य समाज की स्थापना
8. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक केशव बलिराम हेडगेवार का जन्मदिन
नव वर्ष का प्रारंभ प्रतिपदा से ही क्यों?
भारतीय नववर्ष का प्रारंभ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से ही माना जाता है और इसी दिन से ग्रहों, वारों, मासों और संवत्सरों का प्रारंभ गणितीय और खगोल शास्त्रीय संगणना के अनुसार माना जाता है। आज भी जनमानस से जुड़ी हुई यही शास्त्रसम्मत कालगणना व्यावहारिकता की कसौटी पर खरी उतरी है। इसे राष्ट्रीय गौरवशाली परंपरा का प्रतीक माना जाता है। विक्रमी संवत किसी संकुचित विचारधारा या पंथाश्रित नहीं है। हम इसको पंथ निरपेक्ष रूप में देखते हैं। यह संवत्सर किसी देवी, देवता या महान पुरुष के जन्म पर आधारित नहीं, ईस्वी या हिजरी सन की तरह किसी जाति अथवा संप्रदाय विशेष का नहीं है। हमारी गौरवशाली परंपरा विशुद्ध अर्थो में प्रकृति के खगोलशास्त्रीय सिद्धातों पर आधारित है और भारतीय कालगणना का आधार पूर्णतया पंथ निरपेक्ष है। प्रतिपदा का यह शुभ दिन भारत राष्ट्र की गौरवशाली परंपरा का प्रतीक है। ब्रह्म पुराण के अनुसार चैत्रमास के प्रथम दिन ही ब्रह्मा ने सृष्टि संरचना प्रारंभ की। यह भारतीयों की मान्यता है, इसीलिए हम चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से नववर्षारंभ मानते हैं।
आज भी हमारे देश में प्रकृति, शिक्षा तथा राजकीय कोष आदि के चालन-संचालन में मार्च, अप्रैल के रूप में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को ही देखते हैं। यह समय दो ऋतुओं का संधिकाल है। इसमें रातें छोटी और दिन बड़े होने लगते हैं। प्रकृति नया रूप धर लेती है। प्रतीत होता है कि प्रकृति नवपल्लव धारण कर नव संरचना के लिए ऊर्जस्वित होती है। मानव, पशु-पक्षी, यहां तक कि जड़-चेतन प्रकृति भी प्रमाद और आलस्य को त्याग सचेतन हो जाती है। वसंतोत्सव का भी यही आधार है। इसी समय बर्फ पिघलने लगती है। आमों पर बौर आने लगता है। प्रकृति की हरीतिमा नवजीवन का प्रतीक बनकर हमारे जीवन से जुड़ जाती है।
इसी प्रतिपदा के दिन आज से 2054 वर्ष पूर्व उज्जयनी नरेश महाराज विक्रमादित्य ने विदेशी आक्रांत शकों से भारत-भू का रक्षण किया और इसी दिन से काल गणना प्रारंभ की। उपकृत राष्ट्र ने भी उन्हीं महाराज के नाम से विक्रमी संवत कह कर पुकारा। महाराज विक्रमादित्य ने आज से 2054 वर्ष पूर्व राष्ट्र को सुसंगठित कर शकों की शक्ति का उन्मूलन कर देश से भगा दिया और उनके ही मूल स्थान अरब में विजयश्री प्राप्त की। साथ ही यवन, हूण, तुषार, पारसिक तथा कंबोज देशों पर अपनी विजय ध्वजा फहराई। उसी के स्मृति स्वरूप यह प्रतिपदा संवत्सर के रूप में मनाई जाती थी और यह क्रम पृथ्वीराज चौहान के समय तक चला। महाराजा विक्रमादित्य ने भारत की ही नहीं, अपितु समस्त विश्व की सृष्टि की। सबसे प्राचीन कालगणना के आधार पर ही प्रतिपदा के दिन को विक्रमी संवत के रूप में अभिषिक्त किया। इसी दिन मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान रामचंद्र के राज्याभिषेक अथवा रोहण के रूप में मनाया गया। यह दिन ही वास्तव में असत्य पर सत्य की विजय दिलाने वाला है। इसी दिन महाराज युधिष्टिर का भी राज्याभिषेक हुआ और महाराजा विक्रमादित्य ने भी शकों पर विजय के उत्सव के रूप में मनाया। आज भी यह दिन हमारे सामाजिक और धाíमक कार्यों के अनुष्ठान की धुरी के रूप में तिथि बनाकर मान्यता प्राप्त कर चुका है। यह राष्ट्रीय स्वाभिमान और सांस्कृतिक धरोहर को बचाने वाला पुण्य दिवस है। हम प्रतिपदा से प्रारंभ कर नौ दिन में छह मास के लिए शक्ति संचय करते हैं, फिर अश्विन मास की नवरात्रि में शेष छह मास के लिए शक्ति संचय करते हैं

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एक औरत ने तीन संतों को अपने घर के सामने देखा। वह उन्हें जानती नहीं थी।


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एक औरत ने तीन संतों को अपने घर के सामने
देखा। वह उन्हें जानती नहीं थी।
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औरत ने कहा –
“कृपया भीतर आइये और भोजन करिए।”
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संत बोले – “क्या तुम्हारे पति घर पर हैं?”
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औरत – “नहीं, वे अभी बाहर गए हैं।”

संत –“हम तभी भीतर आयेंगे जब वह घर पर
हों।”
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शाम को उस औरत का पति घर आया और
औरत ने उसे यह सब बताया।
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पति – “जाओ और उनसे कहो कि मैं घर
आ गया हूँ और उनको आदर सहित बुलाओ।”
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औरत बाहर गई और उनको भीतर आने के
लिए कहा।
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संत बोले – “हम सब किसी भी घर में एक साथ
नहीं जाते।”
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“पर क्यों?” – औरत ने पूछा।
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उनमें से एक संत ने कहा – “मेरा नाम धन है”
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फ़िर दूसरे संतों की ओर इशारा कर के कहा –
“इन दोनों के नाम सफलता और प्रेम हैं।
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हममें से कोई एक ही भीतर आ सकता है।
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आप घर के अन्य सदस्यों से मिलकर तय कर
लें कि भीतर किसे निमंत्रित करना है।”
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औरत ने भीतर जाकर अपने पति को यह सब
बताया।
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उसका पति बहुत प्रसन्न हो गया और
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बोला –“यदि ऐसा है तो हमें धन को आमंत्रित
करना चाहिए।
हमारा घर खुशियों से भर जाएगा।”
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पत्नी – “मुझे लगता है कि हमें सफलता को
आमंत्रित करना चाहिए।”
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उनकी बेटी दूसरे कमरे से यह सब सुन रही थी।
वह उनके पास आई और बोली –
“मुझे लगता है कि हमें प्रेम को आमंत्रित करना
चाहिए। प्रेम से बढ़कर कुछ भी नहीं हैं।”
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“तुम ठीक कहती हो, हमें प्रेम
को ही बुलाना चाहिए” – उसके माता-पिता ने
कहा।
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औरत घर के बाहर गई और उसने संतों से पूछा –
“आप में से जिनका नाम प्रेम है वे कृपया घर में
प्रवेश कर भोजन गृहण करें।”
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प्रेम घर की ओर बढ़ चले।
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बाकी के दो संत भी उनके
पीछे चलने लगे।
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औरत ने आश्चर्य से उन दोनों से पूछा –
“मैंने
तो सिर्फ़ प्रेम को आमंत्रित किया था। आप लोग
भीतर क्यों जा रहे हैं?”
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उनमें से एक ने कहा – “यदि आपने धन और
सफलता में से किसी एक कोबुलाया होता
तो केवल वही भीतर जाता।
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आपने प्रेम को आमंत्रित किया है।
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प्रेम कभी अकेला नहीं जाता।
प्रेम जहाँ-जहाँ जाता है, धन और सफलता
उसके पीछे जाते हैं।
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इस कहानी को एक बार, 2 बार, 3 बार
पढ़ें ……..
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अच्छा लगे तो प्रेम के साथ रहें,
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प्रेम बाटें, प्रेम दें और प्रेम लें
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क्यों कि प्रेम ही
सफल जीवन का राज है।

‪#‎प्रेम_बंसल‬

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બાળક માટે


એક બહેન પોતાના નાના બાળકને તેડીને ભાવનગર બસ-સ્ટેન્ડ ઉપર ઈન્કવાયરી ઑફિસમાં જઈને પૂછવા લાગી. ‘ભાઈ, વડોદરા જનારી બસ ક્યારે મળશે ?’
કલાર્કે કહ્યું ‘સવારે આઠ વાગે.’
‘આઠ વાગ્યા પછી કોઈ બસ જાય છે ?’
‘બીજી સાડા નવ વાગ્યાની મળશે.’
‘બપોર પછી કોઈ બસ વડોદરા જાય છે ?’
‘હા, દોઢ વાગ્યાની મળશે.’
‘સાંજની કોઈ બસ છે ?’
‘હા, સાંજે સાડા પાંચની બસ મળશે.’
‘રાતની કોઈ બસ છે ?’
‘હા, રાતની સાડા નવ વાગ્યાની બસ મળશે.’
‘સારું. ભાવનગરથી જે બસો જાય છે, તેટલી જ વડોદરાથી ભાવનગર આવતી હશે ને.’
‘હા, જેટલી અહીંથી વડોદરા જાય છે, તેટલી બસો પાછી અહીં પણ આવે છે.’
‘આમાં એક્સપ્રેસ કેટલી અને લોકલ કેટલી ?’
‘આટલી એકસપ્રેસ અને આટલી લોકલ’
‘લકઝરી કેટલી બસો ?’
‘એક જવાની અને એક આવવાની.’
‘લકઝરીને સામાન્ય બસના ભાડાના દરમાં કેટલો તફાવત છે ?’
કલાર્ક પરેશાન થઈ ગયો. તેણે કહ્યું, ‘બહેન, તમારે કઈ બસમાં જવું છે તે જ પૂછો ને. તમારી પાછળ ખાસ્સી એવી લાંબી લાઈન થઈ ગઈ છે. તમારે જે બસનું રિઝર્વેશન કરવું હોય, તે પણ કરી દઉં. બોલો કઈ બસમાં જવું છે ?’
‘મારે તો કંઈ જવું નથી.’
‘તો તમે આટલું બધું કેમ પૂછતા હતા ?’
બહેને કહ્યું ‘તમે મારી સાથે વાત કરતા હતા. જેથી કરીને મારો આ બાબો ચૂપ થઈ ગયો હતો.’

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માછલીઓનો વૃદ્ધ શિકારી !


એક વાર ખુબ વરસાદ પડી રહ્યો હતો.ઈસ્ટરનો પવિત્ર દિવસ હતો. એક આઇરિશ રેસ્ટોરંટ સામે વરસાદના પાણીથી મોટુ ખાબોચિયું ભરાઈ ગયું હતું.

 આ ખાબોચિયાની બાજુમાં એક ગરીબ જેવો લાગતો વૃદ્ધ માણસ એક લાકડીના છેડે એક દોરી બાંધીને જાણે માછલી પકડતો હોય એમ દોરીને પાણીમાં ઊંડે નાખીને ત્યાં ઉભો હતો.

રેસ્ટોરંટમાં ડ્રીંક માટે જતા એક ગ્રાહકને આ વૃદ્ધ જે કરી રહ્યો હતો એ જોઈને ખુબ આશ્ચર્ય થયું એટલે એણે એને પૂછ્યું “ ભાઈ તમે અહીં આ શું કરી રહ્યા છો ?  

પેલા વૃદ્ધે કહ્યું “હું આ પાણીમાંથી માછલીઓ પકડી રહ્યો છું.”

પેલા ગ્રાહક વૃદ્ધને મનમાં થયું બિચારો ગરીબ લાગે છે .આ રીતે કેટલી માછલી પકડી શકશે,એટલે એણે એની સાથે રેસ્ટોરન્ટમાં જઇ ડ્રીન્કસ લેવા માટે એને આમંત્રણ આપ્યું.

ડ્રીંકસ લેતાં લેતાં આ ગ્રાહક વૃદ્ધે માછલી પકડનાર વૃદ્ધને પૂછ્યું “ તમે આજે અત્યાર સુધીમાં કેટલી માછલીઓ પકડી શક્યા છો?”

જવાબમાં એ વૃદ્ધે કહ્યું “ જેન્ટલમેન,તમે આઠમા છો !”  

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બહાર નીકળ


એક મોટો બંગલો હતો. એમાં એક વ્યક્તિએ પ્રવેશ કર્યો. ત્યાં સૂચનાનું એક પાટિયું માર્યું હતું. જમણા હાથ તરફ જાવ.
માણસ જમણા હાથ તરફ વળ્યો. મોટો ઓરડો હતો. ત્યાં તીર મારી બતાવવામાં આવ્યું કે ડાબા હાથ તરફ વળો. તે તે તરફ ગયો. ત્યાં બીજું પાટિયું માર્યું હતું કે આ બાજુ જાવ, એટલે તે એ બાજુ ગયો. ત્યાં લખ્યું હતું કે દીવાનખાનામાં જાવ. એટલે તે ત્યાં ગયો.

વળી, ત્યાં એક બીજું પાટિયું મારેલું. તેમાં લખ્યું હતું કે જમણા હાથે જાવ. તે ત્યાં ગયો. તો ત્યાં લખ્યું હતું કે ઉપર જાવ.

તે વ્યક્તિ સીડી ચઢીને ઉપર ગયો. ત્યાં પાછું ડાબા હાથ તરફ જાવ તેવી સૂચના સાથેનું પાટિયું હતું. તે ત્યાં ગયો. ત્યાં જમણા હાથ તરફ જવાનું પાટિયું હતું. ત્યાં નીચે ઊતરવાની સૂચના લખી હતી. તે નીચે ઊતર્યો; તો ત્યાં લખ્યું હતું કે – જ્યાં ત્યાં શું ભટકે છે ? બહાર નીકળ.

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દીકરો !


ગામમાં વાણિયો તેની પત્ની સાથે રહેતો હતો. એક દિવસે આ વાણિયાના ઘરમાં ચોર પેઠો. છાપરેથી તે સીધો તે સૂતા હતા તે પલંગ પાસે આવ્યો.

વાણિયો જાગી ગયો. તે ગભરાયો નહિ. પણ પોતાની પત્નીને ઉઠાડીને કહેવા લાગ્યો, ‘ઊઠ ઊઠ, ભગવાને આપણે ત્યાં જુવાનજોધ દીકરો મોકલી આપ્યો છે.’
આમ કહી તે ઊભો થઈને નાચવા લાગ્યો. ‘છોકરાને વહીવટ સોંપીને હવે આપણે શાંતિથી યાત્રા કરી શકીશું. આપણી ચિંતા ટળી ગઈ. આપણે દીકરાનું સ્વાગત કરવું જોઈએ. તું પાટલો લાવ. પૂજા કર અને આરતી ઉતાર.’

ચોર આ ચાલમાં લોભાઈ ગયો. એને થયું કે મફતમાં બધું મળતું હોય તો આનાથી રૂડું શું ?

પતિ-પત્ની આને શું નામ આપવું તે બાબતે હૂંસાતૂંસી અને ઘાંટાઘાંટ કરવા લાગ્યા.

પત્ની કહે, ‘કપૂરચંદ નામ આપો.’ જ્યારે પતિ કહે ‘નૂરમહંમદ નામ’
ઘાંટાઘાંટ અને બૂમો સાંભળીને પાડોશીઓ દોડી આવ્યા. તેમાં એક નૂરમહંમદ જમાદાર પણ આવ્યા. જમાદારને જોઈને વાણિયાએ કહ્યું, ‘જુઓને જમાદાર, ભગવાને અમને આટલો મોટો દીકરો આપ્યો છે.’

જમાદાર સમજી ગયા. ચોરને પકડ્યો.
વાણિયો કહે : ‘તમે સાચવજો, દીકરાને લઈ જાઓ અને તેને સારી રીતે રાખજો !’