Posted in भारतीय मंदिर - Bharatiya Mandir

Saraswati


Jain Saraswati: Displayed in British Museum.
*** In Jainism Saraswati recognized as Supreme Deity of Knowledge and Wisdom.
*** The various Jain texts mentioned about the different name of Saraswati such as Shruta-Devata, Bharati Sarada ect.
*** As Shruta-Devata, She Presides over the Shruta or Preaching of Tirthankara.
*** The antiquity of the worship of Saraswati among Jain community was very popular from very ancient times and it can be established from literary as well as archaeological evidence.
*** Mathura, Bharat is the place from where the earliest of Jain Saraswati was discovered.
*** The earliest extant image of Sarasvati, dated 132 C.E. also belongs to Jaina tradition is now housed in the State museum of Lakhnau (Lucknow), U.P. Bharat.
*** Rajasthan is one of the most important places of Jainism where it spread from very early times. Among the two sect of Jain community Shwetambara section has more popularity in this region. A good number of Jain art and architecture are observed in this state. Saraswati the learning goddess of Jainism were also acceptable in this region and Her sculpture are there in different temple in discard form.
*** Image Details: A Marble Image of Sarswati, is Probably from Southwest Rajasthan at Present Displayed in the British Museum.

Jigna Shah's photo.
Posted in यत्र ना्यरस्तुपूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:

स्त्री को भी सृजन के मार्गों पर जाना पड़ेगा


★★★● भविष्य की सभ्यता के निर्माण में…. ●★★★

★★★● ….नारी को खुलकर सामने आने होगा ●★★★


स्त्री को भी सृजन के मार्गों पर जाना पड़ेगा। उसे भी निर्माण की दिशाएं खोजनी पड़ेंगी। जीवन को ज्यादा सुंदर और सुखद बनाने के लिए उसे भी अनुदान करना पड़ेगा; तभी स्त्री का मान, स्त्री का सम्मान, उसकी प्रतिष्ठा है। स्त्री को एक और तरह की ‍’शिक्षा’ चाहिए, जो उसे संगीतपूर्ण व्यक्तित्व दे, जो उसे नृत्यपूर्ण व्यक्तित्व दे, जो उसे प्रतीक्षा की अनंत क्षमता दे, जो उसे मौन की, चुप होने की, अनाक्रामक होने की, प्रेमी की और करुणा की गहरी शिक्षा दे। यह शिक्षा अनिवार्य रूपेण ‘ध्यान’ है।

स्त्री को पहले दफा यह सोचना है क्या स्त्री भी एक नई संस्कृति को जन्म देने के आधार रख सकती है? कोई संस्कृति जहां युद्ध और हिंसा नहीं। कोई संस्कृति जहां प्रेम, सहानुभूति और दया हो। कोई संस्कृति जो विजय के लिए आतुर न हो — जीने के लिए आतुर हो। जीवन को जीने की कला और जीवन को शान्ति से जीने की आस्था और निष्ठा पर खड़ी हो – यह संस्कृति — स्त्री जन्म दे सकती है – स्त्री जरूर जन्म दे सकती है।

अगर सारी दुनिया की स्त्रियां एक बार तय कर लें — युद्ध नहीं होगा; दुनिया पर कोई राजनैतिक युद्ध में कभी किसी को नही घसीट सकता। सिर्फ स्त्रियां तय कर लें; युद्ध अभी नहीं होगा- तो नहीं हो सकता। क्योंकि कौन जाएगा युद्ध पर? कोई बेटा जाता है, कोई पति जाता है, कोई बाप जाता है।

लेकिन स्त्रियां पागल हैं। युद्ध होता है तो टीका करती हैं कि जाओ युद्ध पर। पाकिस्तानी मां, पाकिस्तानी बेटे के माथे पर टीका करती है, हिन्दुस्तानी मां, हिन्दुस्तानी बेटे के माथे पर टीका करती है कि जाओ बेटे; युद्ध पर जाओ। चाहे पाकिस्तानी बेटा मरता हो, चाहे हिन्दुस्तानी; किसी मां का बेटा मरता है।

अगर सारी दुनिया की स्‍ित्रयों को एक ख्याल पैदा हो जाए कि आज हमें अपने पति को, बेटे को, अपने बाप को युद्ध पर नहीं भेजना है, तो फिर पुरुष की लाख कोशिश पर राजनैतिकों की हर कोशिशें व्यर्थ हो सकती हैं, युद्ध नहीं हो सकता है।

यह स्त्री की इतनी बड़ी शक्ति है, वह उसके ऊपर सोचती है कभी? उसने कभी कोई आवाज नहीं की। उसने कभी कोई फिक्र नहीं की। उस आदमी ने – पुरुष ने – जो रेखाएं खींची हैं राष्ट्रों की, उनको वह मान लेती है।

प्रेम कोई रेखाएं नहीं मान सकता। हिंसा रेखाएं मानती है, क्योंकि जहां प्रेम है, वहां सीमा नहीं होती। सारी दुनिया की स्‍ित्रयों को एक तो बुनियादी यह खयाल जाग जाना चाहिए कि हम एक नई संस्कृति को, एक नए समाज को, एक नई सभ्यता को जन्म दे सकती हैं। जो पुरुष का आधार है उसके ठीक विपरीत आधार रखकर…

यह स्त्री कर सकती है। और स्त्री सजग हो, कॉन्शियस हो, जागे तो कोई भी कठिनाई नहीं। एक क्रांति — बड़ी से बड़ी क्रांति दुनिया में स्त्री को लानी है।

वह यह ‘एक प्रेम पर आधारित’ देने वाली संस्कृति, जो मांगती नहीं, इकट्ठा नहीं करती, देती है, ऐसी एक संस्कृति, निर्मित करनी है। उस सबसे बड़ा धर्म स्त्री के सामने आज कोई और नहीं। यह पुरुष के संसार को बदल देना है आमूल।

शायद पुरानी पीढ़ी नहीं कर सकेगी। नई पीढ़ी की लड़कियां कुछ अगर हिम्मत जुटाएंगी और फिर पुरुष होने की नकल और बेवकूफी में नहीं पड़ेंगी तो यह क्रांति निश्चित हो सकती है।

~ ओशो ~

(नारी और क्रान्ति पुस्तक से उद्घृत)

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

जिसकी निर्बलता गयी, वही राम हो गया


★★ जिसकी निर्बलता गयी, वही राम हो गया ★★

मैंने सुना है, चीन में एक बहुत बड़ा फकीर था। उसकी बड़ी दूर – दूर तक ख्याति थी कि वह अभय को उपलब्ध हो गया है। यह सबसे बड़ी उपलब्धि है। क्योंकि जो आदमी अभय को उपलब्ध हो जायेगा वह ताजा, जवान चित्त पा लेता है। और ताजा, जवान चित्त फौरन परमात्मा को, सत्य को जान लेता है।

एक युवक संन्यासी उस फकीर की खोज में गया घने जंगल में, जहां बहुत भय था, वह फकीर वहां रहता था। जहां शेर दहाड़ करते थे, जहां पागल हाथी वृक्षों को उखाड़ देते थे, उनके ही बीच, चट्टानों पर ही, वह फकीर पड़ा रहता था। युवक संन्यासी उसके पास गया। उसी चट्टान के पास बैठ गया। उससे बात करने लगा, तभी एक पागल हाथी दौड़ता हुआ निकला पास से। उसकी चोटों से पत्थर हिल गये। वृक्ष नीचे गिर गये। वह युवक कंपने लगा खड़े होकर। उस बूढ़े संन्यासी के पीछे छिप गया।

वह बूढ़ा संन्यासी खूब हंसने लगा और उसने कहा, तुम अभी डरते हो ? तो संन्यासी कैसे हुए ? क्योंकि जो डरता है, उसका संन्यास से क्या संबंध ? हालांकि अधिकतर संन्यासी डरकर ही संन्यासी हो जाते हैं।

वह युवक कंप रहा है। उसने कहा, मुझे बहुत डर लग गया। अभी संन्यास वगैरह का कुछ खयाल नहीं आता। थोड़ा पानी मिल सकेगा, मेरे तो ओंठ सूख गये।

बूढ़ा उठा, वृक्ष के नीचे, जहां उसका पानी रखा था, पानी लेकर गया। जब तक बूढ़ा लौटा, उस युवक संन्‍यासी ने एक पत्थर उठाकर उस चट्टान पर जिस पर बूढ़ा बैठा था, लेटता था, बुद्ध का नाम लिख दिया – नमो बुद्धा। बूढा लौटा, चट्टान पर पैर रखने को था, नीचे दिखायी पड़ा नमो बुद्धा। पैर कंप गया, चट्टान से नीचे उतर गया!

वह युवक खूब हंसने लगा। उसने कहा, डरते आप भी हैं। डर में कोई फर्क नहीं है। और मैं तो एक हाथी से डरा, जो बहुत वास्तविक था। और एक लकीर से मैंने लिख दिया, नमो बुद्धा:, तो पैर रखने में डर लगता कि भगवान के नाम पर पैर न पड़ जाये!

किसका डर ज्यादा है ? वह युवा पूछने लगा। उस युवक ने कहा, डरते आप भी हैं। डर में कोई फर्क नहीं पड़ा। और ध्यान रहे, हाथी से डर जाना – बुद्धिमत्ता भी हो सकती है। लेकिन भगवान के नाम पर पैर रखने से डर जाना तो बुद्धिमानी नहीं कही जा सकती है। पहला डर, बहुत स्वाभाविक हो सकता है। दूसरा डर, बहुत साइकोलॉजिकल, बहुत मानसिक और बहुत भीतरी है।

हम सब डरे हुए हैं। बहुत भीतरी डर है, सब तरफ से मन को पकड़े हुए है।

हम गाते हैं न कि निर्बल के बल राम ! गा रहे हैं सुबह से बैठकर कि हे भगवान, निर्बल के बल तुम्हीं हो ! किसी निर्बल का कोई बल राम नहीं है।

【जिसकी निर्बलता गयी, वह राम हो जाता है】

~ ओशो ~

Posted in भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas

पेशवा बाजीराव प्रथम


आपने जूलियस सीज़र से लेकर सिकंदर तक और नेपोलियन से औरंगज़ेब तक न जाने कितने सम्राटों, सेनापतियों और योद्धाओं के बारे में पढ़ा होगा। लेकिन क्या आप मुझे उस सेनापति का नाम बता सकते हैं, जो अपने जीवन में एक भी लड़ाई न हारा हो? क्या आप मुझे उस कुशल प्रशासक का नाम बता सकते हैं, जिसने ग्वालियर के सिंधिया, इंदौर के होलकर और बडौदा के गायकवाड़ जैसे राजघरानों की नींव रखी? क्या आपने कभी उस महान भारतीय योद्धा का नाम भी सुना है?
अविश्वसनीय पराक्रम का प्रदर्शन करने वाले उस अजेय अपराजित योद्धा का नाम है – पेशवा बाजीराव प्रथम! छत्रपति शिवाजी महाराज ने मराठा साम्राज्य के कुशल व सक्षम प्रशासन के लिए “पेशवा” (प्रधानमंत्री) का पद निर्माण किया था। पेशवाई की यह महान परंपरा सन 1674 में शिवाजी के राज्याभिषेक से प्रारंभ हुई, जो सन 1818 तक जारी रही। पेशवा बाजीराव प्रथम इसी महान परंपरा के कुशल वाहक थे।
18 अगस्त 1700 को जन्मे बाजीराव केवल 20 वर्ष की आयु में सन 1720 में “पेशवा” (मराठा साम्राज्य के प्रधानमंत्री) पद पर नियुक्त हुए। 28 अप्रैल 1740 को उनकी मृत्यु हो गई। लेकिन मराठा साम्राज्य के सेनापति के रूप में केवल 20 वर्षों के अपने संक्षिप्त कार्यकाल में उन्होंने इतनी महान उपलब्धियां प्राप्त की हैं, जिनके लिए उनका नाम इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखे जाने योग्य है।

पुणे स्थित शनिवारवाडा में बाजीराव की प्रतिमा
20 वर्षों के अपने कार्यकाल में बाजीराव ने 41 से अधिक निर्णायक युद्ध लड़े और वे सभी में विजयी रहे। इनमें मालवा, धार, पालखेड, बुंदेलखंड, दिल्ली और भोपाल के युद्ध प्रमुख हैं। पेशवा पद के सूत्र संभालते ही बाजीराव ने सर्वप्रथम दक्खन के निजाम को परास्त किया और उसे संधि करने पर मजबूर कर दिया। सन 1728 में बाजीराव की सेना ने मालवा पर आक्रमण किया और मुगलों के चंगुल से मालवा को स्वतंत्रता दिलाई।

सन 1727 में मुगल सेना ने मुहम्मद खान बंगश के नेतृत्व में बुंदेलखंड पर आक्रमण कर दिया था। महाराजा छत्रसाल ने पूरी वीरता के साथ मुगल सेना का सामना किया, लेकिन आख़िरकार जैतपुर की लड़ाई के दौरान वे घायल हो गए और मुगल सेना ने उन्हें बंदी बना लिया। सन 1729 में बाजीराव अपनी सेना लेकर उनकी सहायता के लिए पहुँचे और उन्होंने न सिर्फ छत्रसाल को मुक्त कराया, बल्कि मुगल सेना को भी युद्ध के मैदान में धूल चटा दी। इस सहायता के बदले महाराजा छत्रसाल ने अपने साम्राज्य का एक-तिहाई भाग बाजीराव को सौंप दिया, जिसमें सागर, बांदा और झांसी का प्रदेश शामिल था।
मुग़ल सम्राट के आदेश पर सरबुलंद खान गुजरात पर नियंत्रण हासिल करने के इरादे से आया था। सन 1730 में पेशवा की सेनाओं ने उसे परास्त किया और एक संधि के द्वारा बाजीराव को गुजरात में चौथ वसूली व सरदेशमुखी के अधिकार प्राप्त हुए।
सन 1735 तक पूरे गुजरात व मालवा प्रदेश पर मराठा सेनाओं का अधिकार हो चुका था। हालांकि कुछ स्थानीय मुगल अधिकारियों व ज़मींदारों ने मराठों का आधिपत्य स्वीकार नहीं किया। मुग़ल सम्राट मुहम्मद शाह के द्वारा भी मराठों को चौथ व सरदेशमुखी के अधिकार देने में आनाकानी की जा रही थी। आखिरकार बाजीराव ने मुगल सल्तनत को सबक सिखाने का निश्चय किया। दिसंबर 1737 में स्वयं बाजीराव ने मराठों की एक बड़ी सेना लेकर दिल्ली की ओर कूच कर दिया। मुग़ल सेना को चकमा देकर बाजीराव के सैनिक दस दिनों की यात्रा केवल अड़तालीस घंटों में पूरी करके 28 मार्च 1737 को दिल्ली आ पहुँचे। मुगल बादशाह मराठा सेनाओं से डरकर लाल किले में छिप गया। मीर हसन कोका के नेतृत्व में आठ हज़ार मुगल सैनिकों ने बाजीराव की मराठा सेना को रोकने का असफल प्रयास किया। मुग़ल सेना को धूल चटाकर मराठा सेना वापस पुणे की ओर लौट आई।
अब मुगल सम्राट ने मराठों से बदला लेने के लिए निज़ाम उल मुल्क को सत्तर हज़ार सैनिकों की विशाल सेना के साथ भेजा। मराठों से हिसाब चुकाने के उद्देश्य से यह सेना भोपाल पहुँची। लेकिन मराठे तो पहले ही तैयार बैठे थे। बाजीराव के नेतृत्व वाली मराठा सेना ने मुगलों को चारों तरफ से घेरकर उनकी रसद बंद कर दी। आख़िरकार हारकर मुगलों को संधि करनी पड़ी। 7 जनवरी 1738 को हुई इस संधि में मुगलों ने मालवा प्रदेश पर मराठों का आधिपत्य स्वीकार कर लिया और साथ ही युद्ध के हर्जाने के तौर पर मराठों को 50 लाख रूपये भी दिए।
28 अप्रैल 1740 को अचानक उनकी मृत्यु हो गई। ऐसा माना जाता है कि मृत्यु का कारण बुखार या हृदयाघात था। उस समय बाजीराव एक लाख की विशाल सेना लेकर दिल्ली की ओर बढ़ रहे थे और उनका पड़ाव वर्तमान मध्यप्रदेश में इंदौर के पास खरगोन जिले में था। 28 अप्रैल 1740 को ही नर्मदा के किनारे रावेरखेड़ी नामक स्थान पर उनका अंतिम संस्कार किया गया। उनकी समाधि आज भी यहाँ मौजूद है।

खरगोन (मप्र) जिले के रावेरखेड़ी में बाजीराव की समाधि
पेशवा बाजीराव प्रथम निसंदेह भारतीय इतिहास के महान नायकों में से एक थे। किन्तु दुःख की बात है कि आज भी इनके बारे में हम बहुत कम ही जानते हैं। अफ़सोस है कि अधिकांश लोग बाजीराव को केवल एक मराठा सेनापति के तौर पर ही पहचानते हैं, जबकि वास्तव में उनका कार्यक्षेत्र महाराष्ट्र से लेकर वर्तमान मप्र, उप्र, गुजरात और दिल्ली तक फैला हुआ था। इसके ज़िम्मेदार चाहे मुगल हों या अंग्रेज़ अथवा स्वतंत्रता के बाद वाले वामपंथी इतिहास-लेखक या राजनेता, लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं है कि पेशवा बाजीराव प्रथम को अभी तक इतिहास में उचित स्थान नहीं मिला है। कल 28 अप्रैल को उनकी पुण्यतिथि थी, लेकिन शायद ही किसी को यह बात याद रही हो।

कहा जाता है कि जो अपने स्वर्णिम इतिहास को भूल जाते हैं, वे कभी उज्ज्वल भविष्य का निर्माण नहीं कर सकते। अब ये हमें सोचना है कि हम अपने इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठों पर जमी धूल हटाकर सत्य सामने लाना चाहते हैं या भावी पीढ़ियों को भी आत्म-विस्मृति के गर्त में ही धकेलना चाहते हैं।
पेशवा बाजीराव जैसे नायक किसी एक समुदाय अथवा एक क्षेत्र के नहीं, बल्कि संपूर्ण राष्ट्र के नायक हैं। आइये उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें नमन करें!

(स्त्रोत: http://en.wikipedia.org/wiki/Baji_Rao_I,http://chellsie12.blogspot.in/2012/08/shaniwar-wada.html,http://archeolognewsaround.blogspot.in/…/to-save-baji-rao-p…)

Pradipsinh Zala's photo.
Pradipsinh Zala's photo.
Posted in Netaji Subhash Chandra Bose

नेताजी सुभाषचंद्र बोस


नेताजी सुभाषचंद्र बोस भारत के महान नेता थे। उन्होंने भारत की स्वतंत्रता के लिए आजाद हिंद फौज(भारत की आर्मी) की स्थापना की थी, जिसके भय से ब्रिटिश हुकुमत भारत को छोड़ने के अपने दिन गिनने लगी थी। नेताजी प्रखर वक्ता भी थे, उनके भाषण उस समय भी युवाओं का जोश भरते थे और आज भी हमारे लिए प्रेरणा का महान स्रोत हैं। जानिए कौन सा भाषण था नेताजी का जो ऐतिहासक माना जाता है।।

सन् 1941 में कोलकाता से नेताजी सुभाष चन्द्र बोस अपनी नजरबंदी से भागकर ठोस स्थल मार्ग से जर्मनी पहुंचे, जहां उन्होंने भारत सेना का गठन किया। जर्मनी में कुछ कठिनाइयां सामने आने पर जुलाई 1943 में वे पनडुब्बी के जरिए सिंगापुर पहुंचे। सिंगापुर में उन्होंने आजाद हिंद सरकार (जिसे नौ धुरी राष्ट्रों ने मान्यता प्रदान की) और इंडियन नेशनल आर्मी का गठन किया। मार्च एवं जून 1944 के बीच इस सेना ने जापानी सेना के साथ भारत-भूमि पर ब्रिटिश सेनाओं का मुकाबला किया। यह अभियान अंत में विफल रहा, परंतु बोस ने आशा का दामन नहीं छोड़ा। जैसा कि यह भाषण उद्घाटित करता है, उनका विश्वास था कि ब्रिटिश युद्ध में पीछे हट रहे थे और भारतीयों के लिए आजादी हासिल करने का यही एक सुनहरा अवसर था। यह शायद बोस का सबसे प्रसिद्ध भाषण है। इंडियन नेशनल आर्मी के सैनिकों को प्रेरित करने के लिए आयोजित सभा में यह भाषण दिया गया, जो अपने अंतिम शक्तिशाली कथन “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा” के लिए प्रसिद्ध है।

दोस्तों! बारह महीने पहले पूर्वी एशिया में भारतीयों के सामने ‘संपूर्ण सैन्य संगठन’ या ‘अधिकतम बलिदान’ का कार्यक्रम पेश किया गया था। आज मैं आपको पिछले साल की हमारी उपलब्धियों का ब्योरा दूंगा तथा आने वाले साल की हमारी मांगें आपके सामने रखूंगा। परंतु ऐसा करने से पहले मैं आपको एक बार फिर यह एहसास कराना चाहता हूं कि हमारे पास आजादी हासिल करने का कितना सुनहरा अवसर है। अंग्रेज एक विश्वव्यापी संघर्ष में उलझे हुए हैं और इस संघर्ष के दौरान उन्होंने कई मोर्चो पर मात खाई है। इस तरह शत्रु के काफी कमजोर हो जाने से आजादी के लिए हमारी लड़ाई उससे बहुत आसान हो गई है, जितनी वह पांच वर्ष पहले थी। इस तरह का अनूठा और ईश्वर-प्रदत्त अवसर सौ वर्षो में एक बार आता है। इसीलिए अपनी मातृभूमि को ब्रिटिश दासता से छुड़ाने के लिए हमने इस अवसर का पूरा लाभ उठाने की कसम खाई है।

हमारे संघर्ष की सफलता के लिए मैं इतना अधिक आशावान हूं, क्योंकि मैं केवल पूर्व एशिया के 30 लाख भारतीयों के प्रयासों पर निर्भर नहीं हूं। भारत के अंदर एक विराट आंदोलन चल रहा है तथा हमारे लाखों देशवासी आजादी हासिल करने के लिए अधिकतम दु:ख सहने और बलिदान देने के लिए तैयार हैं। दुर्भाग्यवश, सन् 1857 के महान् संघर्ष के बाद से हमारे देशवासी निहत्थे हैं, जबकि दुश्मन हथियारों से लदा हुआ है। आज के इस आधुनिक युग में निहत्थे लोगों के लिए हथियारों और एक आधुनिक सेना के बिना आजादी हासिल करना नामुमकिन है। ईश्वर की कृपा और उदार नियम की सहायता से पूर्वी एशिया के भारतीयों के लिए यह संभव हो गया है कि एक आधुनिक सेना के निर्माण के लिए हथियार हासिल कर सकें।

इसके अतिरिक्त, आजादी हासिल करने के प्रयासों में पूर्वी एशिया के भारतीय एकसूत्र में बंधे हुए हैं तथा धार्मिक और अन्य भिन्नताओं का, जिन्हें ब्रिटिश सरकार ने भारत के अंदर हवा देने की कोशिश की, यहां पूर्वी एशिया में नामोनिशान नहीं है। इसी के परिणामस्वरूप आज परिस्थितियों का ऐसा आदर्श संयोजन हमारे पास है, जो हमारे संघर्ष की सफलता के पक्ष में है – अब जरूरत सिर्फ इस बात की है कि अपनी आजादी की कीमत चुकाने के लिए भारती स्वयं आगे आएं। ‘संपूर्ण सैन्य संगठन’ के कार्यक्रम के अनुसार मैंने आपसे जवानों, धन और सामग्री की मांग की थी। जहां तक जवानों का संबंध है, मुझे आपको बताने में खुशी हो रही है कि हमें पर्याप्त संख्या में रंगरूट मिल गए हैं। हमारे पास पूर्वी एशिया के हर कोने से रंगरूट आए हैं – चीन, जापान, इंडोचीन, फिलीपींस, जावा, बोर्नियो, सेलेबस, सुमात्रा, मलाया, थाईलैंड और बर्मा से।

आपको और अधिक उत्साह एवं ऊर्जा के साथ जवानों, धन तथा सामग्री की व्यवस्था करते रहना चाहिए, विशेष रूप से आपूर्ति और परिवहन की समस्याओं का संतोषजनक समाधान होना चाहिए। हमें मुक्त किए गए क्षेत्रों के प्रशासन और पुनर्निर्माण के लिए सभी श्रेणियों के पुरुषों और महिलाओं की जरूरत होगी। हमें उस स्थिति के लिए तैयार रहना चाहिए, जिसमें शत्रु किसी विशेष क्षेत्र से पीछे हटने से पहले निर्दयता से ‘घर-फूंक नीति’ अपनाएगा तथा नागरिक आबादी को अपने शहर या गांव खाली करने के लिए मजबूर करेगा, जैसा उन्होंने बर्मा में किया था। सबसे बड़ी समस्या युद्धभूमि में जवानों और सामग्री की कुमुक पहुंचाने की है। यदि हम ऐसा नहीं करते तो हम मोर्चो पर अपनी कामयाबी को जारी रखने की आशा नहीं कर सकते, न ही हम भारत के आंतरिक भागों तक पहुंचने में कामयाब हो सकते हैं।
आपमें से उन लोगों को, जिन्हें आजादी के बाद देश के लिए काम जारी रखना है, यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि पूर्वी एशिया – विशेष रूप से बर्मा – हमारे स्वातंय संघर्ष का आधार है। यदि यह आधार मजबूत नहीं है तो हमारी लड़ाकू सेनाएं कभी विजयी नहीं होंगी। याद रखिए कि यह एक ‘संपूर्ण युद्ध है – केवल दो सेनाओं के बीच युद्ध नहीं है। इसलिए, पिछले पूरे एक वर्ष से मैंने पूर्व में ‘संपूर्ण सैन्य संगठन’ पर इतना जोर दिया है। मेरे यह कहने के पीछे कि आप घरेलू मोर्चे पर और अधिक ध्यान दें, एक और भी कारण है। आने वाले महीनों में मैं और मंत्रिमंडल की युद्ध समिति के मेरे सहयोगी युद्ध के मोरचे पर-और भारत के अंदर क्रांति लाने के लिए भी – अपना सारा ध्यान केंद्रित करना चाहते हैं।

इसीलिए हम इस बात को पूरी तरह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि आधार पर हमारा कार्य हमारी अनुपस्थिति में भी सुचारु रूप से और निर्बाध चलता रहे। साथियों एक वर्ष पहले, जब मैंने आपके सामने कुछ मांगें रखी थीं, तब मैंने कहा था कि यदि आप मुझे ‘संपूर्ण सैन्य संगठन’ दें तो मैं आपको एक ‘एक दूसरा मोरचा’ दूंगा। मैंने अपना वह वचन निभाया है। हमारे अभियान का पहला चरण पूरा हो गया है। हमारी विजयी सेनाओं ने निप्योनीज सेनाओं के साथ कंधे से कंधा मिलाकर शत्रु को पीछे धकेल दिया है और अब वे हमारी प्रिय मातृभूमि की पवित्र धरती पर बहादुरी से लड़ रही हैं।

अब जो काम हमारे सामने हैं, उन्हें पूरा करने के लिए कमर कस लें। मैंने आपसे जवानों, धन और सामग्री की व्यवस्था करने के लिए कहा था। मुझे वे सब भरपूर मात्रा में मिल गए हैं। अब मैं आपसे कुछ और चाहता हूं। जवान, धन और सामग्री अपने आप विजय या स्वतंत्रता नहीं दिला सकते। हमारे पास ऐसी प्रेरक शक्ति होनी चाहिए, जो हमें बहादुर व नायकोचित कार्यो के लिए प्रेरित करें। सिर्फ इस कारण कि अब विजय हमारी पहुंच में दिखाई देती है, आपका यह सोचना कि आप जीते-जी भारत को स्वतंत्र देख ही पाएंगे, आपके लिए एक घातक गलती होगी।

यहां मौजूद लोगों में से किसी के मन में स्वतंत्रता के मीठे फलों का आनंद लेने की इच्छा नहीं होनी चाहिए। एक लंबी लड़ाई अब भी हमारे सामने है। आज हमारी केवल एक ही इच्छा होनी चाहिए – मरने की इच्छा, ताकि भारत जी सके; एक शहीद की मौत करने की इच्छा, जिससे स्वतंत्रता की राह शहीदों के खून बनाई जा सके। साथियों, स्वतंत्रता के युद्ध में मेरे साथियो! आज मैं आपसे एक ही चीज मांगता हूं, सबसे ऊपर मैं आपसे अपना खून मांगता हूं। यह खून ही उस खून का बदला लेगा, जो शत्रु ने बहाया है। खून से ही आजादी की कीमत चुकाई जा सकती है। तुम मुझे खून दो और मैं तुम से आजादी का वादा करता हूं।

“तुम मुझे खून दो और मैं तुम्हें आजादी दूँगा।”

संजय कुमार's photo.
Posted in खान्ग्रेस

क्या आप जानते हैं राज्यसभा में सबसे पहला सवाल स्वामी ने किससे और क्या पूछा था?


करीब दो दशक बाद डा सुब्रहमनियन स्वामी संसद में एक सांसद के रूप पहुंचें। पहली बार 1974 में जनसंघ ने डा स्वामी को राज्यसभा भेजा था।

क्या आप जानते हैं राज्यसभा में सबसे पहला सवाल स्वामी ने किससे और क्या पूछा था?
डा स्वामी ने पहला सवाल प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से पूछा था और वो प्रश्न उनकी बहु सोनिया गांधी से जुड़ा था। डा स्वामी ने पूछा था कि आपकी बहु के पास इटालियन (विदेशी) नागरिकता है, फिर आपने उन्हें जनरल इंश्योरेंस कंपनी की एजेंसी कैसे दे दी? जबकि यह केवल भारतीय नागरिकों को ही मिल सकता है! यह साफ तौर पर फेरा का उल्लंघन है! स्वामी ने संसद के अंदर वो सारे दस्तावेज पेश किए, जिससे साबित होता था कि सोनिया के पास उस समय तक इटली की नागरिकता थी!

स्वामी जी के इस सवाल पर इंदिरा गांधी संसद के अंदर बौखला उठी। कांग्रेसी सांसदों ने हंगामा मचा दिया! संसद को ठप कर दिया!

इंदिरा ने इसे खुद पर व्यक्तिगत हमला बताया। लेकिन अगले दिन इंदिरा ने सच को स्वीकार किया और कहा कि मुझसे गलती हो गई। डा स्वामी द्वारा इस बारे में बताए जाने पर, सोनिया गांधी के इंश्योरेंस की एजेंसी निरस्त कर दी गई है! उस दिन पहली बार संसद के अंदर इंदिरा की स्वीकृति के कारण सोनिया गांधी बेनकाब हुई!

सोचिए, इस बार तो डा स्वामी के निशाने पर सीधे सोनिया-राहुल हैं। 2 जी स्पेक्ट्रम, रामसेतु, नेशनल हेराल्ड मामले में संसद के बाहर रह कर स्वामी ने सोनिया गांधी सहित पूरे कांग्रेस के अहंकार को मसला है। अब तो वह संसद के अंदर हैं! सांसद के रूप में अपने पहले सवाल से सोनिया का बिजनस छीनने वाले डा स्वामी, इस बार क्या छीनते हैं , जस्ट वेट एंड वाच।

Sanjay Dwivedy's photo.
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India’s Economy During the British Rule


Pankaj Bagaria's photo.
Pankaj Bagaria to INDIAN HISTORY ~ REAL TRUTH

India’s Economy During the British Rule (2)

A. The Bengal Famine of 1770

“… British control of India started with a famine in Bengal in 1770 and ended in a famine – again in Bengal – in 1943. Working in the midst of the terrible 1877 famine that he estimated had cost another 10 million lives, Cornelius Walford calculated that in the 120 years of British rule there had been 34 famines in India, compared with only 17 recorded famines in the entire previous two millennia. One of factors that explained this divergence was the Company’s abandonment of the Mughal system of public regulation and investment. Not only did the Mughals use tax revenues to finance water conservation, thus boosting food production, but when famine struck they imposed ‘embargos on food exports, anti-speculative price regulation, tax relief and distribution of free food’. More brutally, if merchants were found to have short-changed peasants during famines, an equivalent weight in human flesh would be taken from them in exchange.

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अकबर एक चरित्रहीन आक्रांता के सिवाय कुछ भी नही था


विकास खुराना's photo.
विकास खुराना to हिन्दू देवी देवता ,प्राचीन कथाएँ व सुविचार

बीकानेर के संग्रहालय में लगी यह तस्वीर देश के सभी शहरों के चौराहों पर लगवाई जानी चाहिए, ताकि अकबर को महान घोषित करने वाले और समझने वालों की आँखें खुल सकें,
अकबर एक चरित्रहीन आक्रांता के सिवाय कुछ भी नही था और इस सत्यकथा में यह स्पष्ट है…
राजस्थान वीरों ओर योद्धाओं की धरती है। यहां के रेतीले धोरों का वीरता और शौर्य से बहुत पुराना रिश्ता रहा है। इतिहास आज भी ऐसे वीरों और वीरांगनाओं की कहानी कहता है जिनके त्याग और बलिदान ने इस धरा की शान बढ़ाई।
ऐसी ही कहानियों में एक वीरांगना किरण देवी का जिक्र आता है। कहते हैं कि उसने शहंशाह अकबर को झुकने के लिए मजबूर कर दिया था। अकबर ने किरण देवी से प्राणों की भीख मांगी थी।
इस घटना का संबंध नौरोज मेले से है। यह मेला अकबर आयोजित करता था। ऐसी मान्यता है कि अकबर इस मेले में वेश बदलकर आता और यहां सुंदर महिलाओं की तलाश करता था। एक दिन उसकी नजर मेले में घूम रही किरण देवी पर पड़ी।
वह किसी भी कीमत पर उसे हासिल करना चाहता था। उसने अपने गुप्तचरों से उसका पता मालूम करने को कहा। गुप्तचरों ने बताया कि वह मेवाड़ के महाराणा प्रताप सिंह के छोटे भाई शक्ति सिंह की बेटी है। उसका विवाह बीकानेर के पृथ्वीराज राठौड़ से हुआ है।
अकबर ने पृथ्वीराज को किसी युद्ध के बहाने बाहर भेज दिया और किरण देवी को एक सेविका के जरिए संदेश भेजा कि बादशाह ने आपको बुलाया है। किरण देवी ने बादशाह के हुक्म का पालन किया और वह महल में गई।
वहां जाकर उसे अकबर के इरादों का पता चला। यह देखकर किरण देवी को क्रोध आ गया। जिस कालीन पर अकबर खड़ा था, उसने वह खींचा और बादशाह धराशायी हो गया।
किरण देवी हथियार चलाने और आत्मरक्षा में भी पारंगत थी। वह अकबर की छाती पर बैठ गई और कटारी निकालकर उसकी गर्दन पर रखते हुए बोली- बोलो बादशाह, तुम्हारी आखिरी इच्छा क्या है?
बाजी इतनी जल्दी पलट जाएगी, इसका अंदाजा अकबर को भी नहीं था। वह किरण से माफी मांगने लगा, बोला- किरण, तुम यकीनन दुर्गा हो। मुझे माफ करो। अगर मैं मर गया तो देश में कई समस्याएं हो जाएंगी। मैं कसम खाकर कहता हूं कि अब कभी नौरोज मेला नहीं लगाऊंगा और न कभी किसी महिला के बारे में ऐसी सोच रखूंगा।
अकबर को काफी खरी-खोटी सुनाने के बाद किरण ने उसे माफ कर दिया और चेतावनी देकर वापस अपने महल में आ गई। कहा जाता है कि अकबर ने फिर कभी नौरोज मेला नहीं लगाया। इस घटना का चित्रण राजस्थान के कई कवियों ने किया है।

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महाराज बख्तावर सिंह जी राठोड़ अमझेरा


विष्णु अरोङा's photo.
विष्णु अरोङा

——-महाराज बख्तावर सिंह जी राठोड़ अमझेरा——–
——–वीर योद्धा 1857 की क्रांति———-

महाराज बख्तावर सिंह मध्य प्रदेश के धार जिले के अन्तर्गत अमझेरा के शासके थे। वे न केवल वीर थे अपितु वीरों का आदर भी करते थे। उनके पूर्वज मूल रूप से जोधपुर (राजस्थान) के राठौड़ वंशीय राजा थे। मुगल सम्राट जहाँगीर ने प्रसन्न होकर उनके वंशजों को अमझेरा का शासक बनाया था। पहले अमझेरा राज्य बहुत बड़ा था, जिसमें भोपावर तथा दत्तीगाँव भी सम्मिलित थे। कालान्तर में अमझेरा, भोपावर और दत्तीगाँव पृथक-पृथक राज्य हो गए। सन् 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम के समय अमझेरा के शासक थे महाराणा बख्तावरसिंह। इनके पिता का नाम राव अजीतसिंह और माता का नाम रानी इन्द्रकुँवर था। महाराणा को शिक्षा-दीक्षा एवं अस्त्रों के संचालन का अच्छा प्रशिक्षण दिया गया था। उनके धार तथा इन्दौर के शासकों के साथ अच्छे मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध थे। इनकी गतिविधियों पर नियन्त्रण रखने हेतु ही ब्रितानीयों ने यहाँ फौजी छावनी स्थापित की थी और पॉलिटिकल एजेन्ट भी नियुक्त किए थे।

इन्दौर के ए. जी. जी. लेफ्टिनेन्ट एच. एम. डूरंड ने भोपावर एवं सरदारपुर में सैनिक छावनी स्थापित की थी, ताकि अमझेरा राज्य की गतिविधियों पर निगरानी रखी जा सके।

महाराज बख्तावरसिंह तथा इन्दौर के महाराजा तुकोजीराव होलकर द्वितीय के पास प्रथम स्वतन्त्रता के प्रारम्भ होने की सूचना थी। शीघ्र ही मंगल पाण्डे ने इस विद्रोह को प्रारम्भ कर दिया और इसकी आग मेरठ से दिल्ली तक जा पहुँची। देखते ही देखते इस विद्रोह की आग की लपटें देश में चारों ओर उठने लगीं।

इसी समय इन्दौर के महाराज तुकोजीराव होलकर ने रेजीडेन्सी पर आक्रमण कर दिया। अतः वहाँ का लेफ्टिनेन्ट डूंरड भागकर होशंगाबाद की ब्रिटिश छावनी में चला गया। इस अवसर का लाभ उठाकर महाराणा बख्तावरसिंह की सेना ने भी भोपावर के पॉलिटिकल एजेन्ट पर आक्रमण कर दिया, तांकि उनके जाजूसी के अड्डे को समाप्त किया जा सके। महाराणा ने अपनी सेना संदला के भवानी सिंह एवं अपने दीवान गुलाब राव के नेतृत्व में भेजी थी।

महाराज की सेना के आक्रमण करते ही भोपावर की ब्रिटिश सेना के मालव भील महाराज की सेना में आकर मिल गए। भोपावर की जनता ने भी क्रान्तिकारी सेना का साथ दिया। एजेन्सी को नष्ट-भ्रष्ट कर दिया गया। अतः वहाँ के ब्रिटिश अधिकारियों एवं सैनिकों को झाबुआ की ओर भागने के लिए विवश होना पड़ा।

महाराज ने अंग्रेज एजेन्सी पर आक्रमण करके अपने राज्य में क्रान्ति का बिगुल बजा दिया था। एक नागरिक मोहनलाल ने ब्रिटिश झण्डा उतारकर अपनी रियासत का झण्डा लगा दिया। महाराज ने अमझेरा राज्य में कम्पनी के शासन को समाप्त कर दिया।

भोपावर के पॉलिटिकल एजेन्ट कैम्पनट एचिसन झाबुआ से भी भागकर इन्दौर पहुँच गए और वहाँ पर अपनी स्थिति सुदृढ़ कर ली। जब इन्दौर में क्रान्तिकारियों को कुचल दिया गया, तो होशंगाबाद से लेप्टिनेन्ट डूरंड पुनः इन्दौर आ गए और यह निश्चित् हुआ कि कैप्टन एचिसन को फिर से भोपावर पर अधिकार करने हेतु भेजा जाए।

24 जुलाई, 1857 ई. को एक विशाल सेना के साथ कैप्टन एचिसन ने भोपावर पर आक्रमण कर पुनः अधिकार कर लिया और दीवान गुलाबराव, कामदार भवानीसिंह एवं चिमनलाल को बन्दी बनाकर जेल में डाल दिया गया। अतः महाराज बख्तावर सिंह ने पुनः भोपावर पर आक्रमण कर दिया। कैप्टन एचिसन के कुछ सैनिक महाराज की सेना में आकर मिल गए और कुछ भाग गए। भोपावर पर फिर क्रान्तिकारी सेना का अधिकार हो गया।

क्रान्तिकारी सेना ने भोपावर के बाद सरदारपुर पर आक्रमण कर दिया, जहाँ ब्रिटिश सेना ने क्रान्तिकारियों पर तोपों से गोले बरसाने शुरू कर दिए, परन्तु महाराज ने सेना की एक टुकड़ी तो वहीं रखी और दूसरी टुकड़ी ने धार व राजगढ़ के क्रान्तिकारियों के सहयोग से नदी की और से सरदारपुर पर भयंकर आक्रमण कर दिया। दोनों सेनाओं में घमासान युद्ध हुआ। अन्त में क्रान्तिकारियों की विजय हुई और उन्होंने सरदारपुर पर अधिकार कर लिया। तत्पश्चात् क्रान्तिकारी सेना ने धार की ओर प्रस्थान किया, जहाँ के शासक भीमराव भौंसले ने उनका शानदार स्वागत किया।

अब महाराज बख्तावर सिंह के नेतृत्व में क्रान्तिकारी सेना ने महु, मानपुर एवं मंडलेश्वर पर आक्रमण करने का निश्चय किया। इस पर लेफ्टिनेन्ट डूरंड ने महाराज को कहलवाया कि हम अमझेर को स्वतन्त्र राज्य मान लेंगे और अब वहाँ पर कोई पॉलिटिकल एजेन्टच नियुक्त नहीं करेंगे। उसने यह भी कहलवाया कि आप महू आकर सन्धि की विस्तृत शर्तें निश्चत् कर लें।

महाराज ब्रितानीयों की चालाकी नहीं समझ पाए और वे उनके जाल में फँस गए। वे अपने दस योद्धाओं के साथ सन्धि वार्ता के लिए महू जा पहुँचे, जहाँ डूरंड ने उनका शानदार स्वागत किया।

एक दिन महाराज अपने साथियों के साथ नदी में स्नान करने के लिए गए। उन्होंने हथियार नदी के किनारे रख दिए और स्नान के लिए नदीं में उतर गए। तब छिपे हुए ब्रिटिश सैनिकों ने उनके हथियारों पर कब्जा कर लिया और महाराज को उनके साथियों सहित बन्दी बना लिया गया।

तत्पश्चात् उन पर मुकदमा चलाकर 21 दिसम्बर, 1857 ई. को मृत्यु दण्ड की सजा सुनाई गई।
10 फरवरी, 1858 ई. को इन्दौर के सियागंज स्थित छावनी के मैदान मे महाराज बख्तावर सिंह तथा उनके कुछ साथियों को फाँसी पर लटका दिया गया। स्वाधीनता के ये पुजारी हँसते-हँसते अपनी मातृभूमि के लिए जीवन का बलिदान कर गए।

शत् शत् वीरो को जिन्होने देश निर्माण के लिये सर्वस्व न्योछावर कर दिया

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दही खाने के 25 फायदे


दही खाने के 25 फायदे :-
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• दही के हज़ार गुण! – दही खाओ निरोगी रहो।

दही और छाछ गरमी को अंदर और बाहर दोनों तरह से बचाता है। दही तपती धूप का प्रकोप रोकने में भी सहायक है। ठंडे या फ्रिज में रखे दही का सेवन नहीं करना चाहिए। सदैव ताजा दही का ही सेवन करना चाहिए।

1) दही बालों के लिए एक बेहतरीन कंडीशनर है , दही बालों में जड़ से लगायें और 15-20 मिनट लगे रहने दें फिर बाल धुल लें . यह उपाय बालों की रूसी ,रूखापन दूर कर बालों को चमकदार और मुलायम बनाता है.

2) बालो में अगर रूसी ज्यादा है तो दही में काली मिर्च पाउडर मिलाकर बालों की जड़ो में लगायें ,थोड़ी देर लगे रहने के बाद धो लें.

3) दही में काली मुल्तानी मिटटी मिलाकर बालों में लगायें ,यह शैम्पू का काम करता है साथ ही बालों को झड़ने से भी रोकता है.

4) दही में बेसन, चन्दन पाउडर और थोडा सा हल्दी मिलकर उबटन चेहरे और शरीर पर लगायें ,सूखने पर छुड़ा लें. आप की त्वचा पर बेहतरीन चमक,निखार और स्निग्धता आएगी.

5) अगर आपकी त्वचा तैलीय है तो दही -शहद मिलाकर चेहरे पर लगायें, यह उपाय चेहरे के अतिरिक्त तैलीय तत्व को दूर करता है .

6) चेहरे पर होने वाले दानो और मुहांसों के उपचार के लिए खट्टी दही का लेप चेहरे पर लगायें सूखने पर धोएं, फायदा होगा .

7) आयुर्वेद के अनुसार गाय के दूध से बनने वाला दही बलवर्धक, शीतल, पौष्टिक, पाचक और कफनाशक होता है.

8) भैंस के दूध से बनने वाला दही रक्त, पित्त, बल-वीर्यवर्धक, स्निग्ध, कफकारक और भारी होता है.

9) मख्खन निकाला हुआ दही शीतल, हल्का, भूख बढानेवाला, वातकारक और दस्त रोकने वाला होता है.

10) दही में कैल्सियम सबसे ज्यादा होता है जोकि हड्डी ,दांत ,नाखून आदि का विकास और संरक्षण करता है.

11) दही में कैल्सियम के अतिरिक्त विटामिन A, B6, B12 ,प्रोटीन, राइबोफ्लेविन पोषक तत्त्व पाए जाते हैं.

12) दही शरीर में श्वेत-रक्त कणिकाओं (White Blood Corpuscles) की संख्या बढाता है जिससे रोग-प्रतिरोधक क्षमता का तेजी से विकास होता है.

13) एंटीबायोटिक दवाइयों के सेवन के दुष्प्रभाव से बचने के लिए दही सेवन की सलाह डाक्टर भी देते हैं.

14) दही पेट के लिए अमृत समान माना गया है , दही आंतों और पेट की गर्मी दूर करता है और पाचन तंत्र को सबल बनाता है.

15) ह्रदय रोग ,हाई ब्लड प्रेशर ,गुर्दे की बिमारियों में दही का प्रयोग अच्छा माना गया है.
कोलेस्ट्रोल बढ़ने से रक्त-वाहिकाओं में रक्त प्रवाह में अवरोध पैदा होता है, दही कोलेस्ट्रोल बढ़ने से रोकता है.

16) बवासीर के उपचार के लिए छाछ में अजवायन मिला कर पिए ,लाभ होगा. सर्दी, खांसी और अस्थमा के रोगियों को दही के सेवन से बचना चाहिए.

17) दही के ऊपर का पानी भी फायदेमंद माना जाता है, इससे दस्त, कब्ज, पीलिया, दमा के रोगियों को लाभ होता है.

18) मुह के छालों के उपचार के लिए दिन में 3-4 बार छालों पर दही लगायें.

19) दही के नुकसानरहित सेवन के लिए दही में काला नमक, सोंठ, पुदीना, जीरा पाउडर मिलाकर खाएं.

20) बहुत से लोगों को दूध आसानी से नहीं पचता है, वो लोग दही सेवन से दूध के सभी पोषक तत्वों को प्राप्त कर सकते हैं क्योंकि दही सुपाच्य होता है.

21) दही हमेशा ताज़ा ही खाना चाहिए. दही के सेवन से नींद भी बढ़िया आती है.

22) दही से बहुत से बेहतरीन भोज्य पदार्थ बनते है जैसे लस्सी, छाछ, रायता आदि. दही से बहुत तरह के रायता बनाये जा सकते है जैसे ककड़ी, प्याज-खीरा-टमाटर का रायता, बूंदी का रायता, अनानास का रायता आदि. इनका सेवन गर्मियों में लू और डीहाईड्रेशन से बचाता है.

23) जिन लोगों को पेट की परेशानियां जैसे- अपच, कब्ज, गैस बीमारियां घेरे रहती हैं, उनके लिए दही या उससे बनी लस्सी, मट्ठा, छाछ का उपयोग करने से आंतों की गरमी दूर हो जाती है। डाइजेशन अच्छी तरह से होने लगता है और भूख खुलकर लगती है।

24) हड्डियों के लिए –
दही में calcium की अच्छी मात्रा होती है , जो के हमारे शरीर के हड्डियों के लिए फायदेमंद होता है | बच्चों को खास कर दही खिलाना चाहिए |

25) हाई ब्लड प्रेशर के रोगियों को रोजाना दही का सेवन करना चाहिए।

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