Posted in भारतीय शिक्षा पद्धति

जैसी शिक्षा दी जाती है, समाज वैसा ही हो जाता है।


जैसी शिक्षा दी जाती है, समाज वैसा ही हो जाता है। भारतीय शास्त्रों में जो भी लिखा है, उसका ठीक उलटा अंग्रेजों ने पढ़ाया। इन्द्र पूर्व दिशा के लोकपाल हैं, पूर्व भारत में पूर्वी वायु से वर्षा होती है अतः कुएं को भी इन्द्र (इनार) कहते हैं। पर पढ़ाया गया कि आर्य पश्चिम एसिया से आये थे जिनका मुख्य देवता इन्द्र था। हेरोडोटस, मेगास्थनीज आदि सभी लेखकों ने लिखा कि उनके १५००० वर्ष पूर्व से भारत में कोई बाहर से नहीं आया अतः जनमेजय द्वारा श्मशान बनाये गये दो नगरों (मोइन्-जो-दरो = मुर्दों का स्थान, हड़प्पा = हड्डियों का ढेर) में खुदाई कर उसका मनमाना अर्थ अभी तक निकाल रहे हैं। पिछले ५००० वर्षों से भागवत प्रवचन का आरम्भ होता है कि ज्ञान और वैराग्य का आरम्भ द्रविड़ से हुआ वृद्धि कर्णाटक में हुयी और विस्तार महाराष्ट्र तक हुआ (इसीलिये इन क्षेत्रों के ये नाम हैं), अतः उलटा पढ़ाते हैं कि उत्तर के आर्यों ने द्रविड़ों पर वैदिक सभ्यता थोप दी। इसी प्रकार १६००० ई.पू. में समुद्र मन्थन में सहयोग के लिये असुर आये थे, जिसका समन्वय वासुकि (देवघर के पास वासुकिनाथ) ने किया था। उसी असुर क्षेत्र के लोग बाद में ग्रीस में बसे इसलिये आज भी उनकी उपाधि वही है जो ग्रीक भाषा में इन खनिजों के नाम हैं-ओराम (औरम = सोना, खालको = चालकोपाइराईट = ताम्बा, टोप्पो = टोपाज, सिंकू = स्टैनिक = टिन, हेम्ब्रम = पारा आदि)। पर इनको मूलनिवासी कह कर बाकी को आक्रमणकारी कहते हैं। विदेशी आक्रमण के कारण कई जातियों का व्यवसाय नष्ट होने से वे दलित हो गये, पर उसका दोष सवर्णों पर डालकर बाकी के लियॆ आरक्षण किया जाता है। उन लोगों के लिये भी आरक्षण किया गया जो पिछले ५००० वर्षों से शासक रहे हैं और सबसे शक्तिशाली और धनी हैं-जाट, यादव, पटेल आदि।
अतः समाज, आर्य-द्रविड़, मूल निवासी-बाहरी आर्य, सवर्ण-पिछड़ा में बंटा हुआ है। बड़े अपराध डकैती, अपहरण आदि को बहादुरी मानते हैं क्योंकि विदेशी आक्रमणकारियों की प्रशंसा की जाती है जिन्होंने १२०० वर्षों तक केवल हत्या, लूट और बलात्कार किया। ओड़िशा में स्वाधीनता के बाद उत्कल विश्वविद्यालय में प्रायः ६० शोधपत्रों का निष्कर्ष है कि वीर ओडिया जाति को कायर बनाने के लिये चैतन्य ने धर्म प्रचार किया था। सभी आधुनिक विचारक तुलसीदास को पथभ्रष्टक तथा कबीर को सुधारक मानते हैं जबकि दोनों रामानन्द सम्प्रदाय के थे। अतः चोर और भ्रष्ट लोगों को चतुर तथा अपहरण हत्याकारियों को बहादुर मान कर उनको वोट देते हैं। कृत्रिम भेद के कारण केवल जाति समीकरण पर राजनीति चल रही है।

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