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अफजल खानाचा कोथळा बाहेर काढल्या नंतर महाराजांची योजना होती


अफजल खानाचा कोथळा बाहेर काढल्या नंतर महाराजांची योजना होती की लगेच गडाच्या दरवाज्या कडे धाव घ्यायची.
महाराजांनी वाघनखे खुपसली, कोथला काढला. सय्यद बंडा आला, जिवा महालांनी त्याला ठार केलं. क्रुष्णाजी भास्कर आडवा आला, महाराजांनी त्याला कापला आणि प्रतापगडाच्या दरवाज्याकडे पळत सुटले.

जाता जाता सोबतचे अंगरक्षक मोजु लागले…
१,२,३,४,५,६,७,८,९
फक्त ९?
सोबत तर दहा होते…
मग कोण बाकी राहिलं राजांनी विचारलं…
कोणी तरी म्हटलं,’संभाजी कावजी नाही जी’
राजे म्हणाले,’नाही? काय झालं? मधुनच कुठे गेला?’

तेवढ्यात संभाजी कावजी धापा टाकत आला.
राजे संतापले आणि म्हणाले, ‘संभाजी कुठे होतास?’
संभाजी कावजी म्हणाला,
‘राजं तुम्ही वाघनख मारली खानाला पण म्हटलं मरत्यो की न्हाई म्हणुन मागे गेलो आणि त्याचं शीर कापुन आनलं’
आणि त्यानी कापुन आनलेलं खानाचं डोकं वर केलं राजांना दाखवायला…

राजे म्हणाले,’अरे गड्या त्या वाघनखांना विष लावलं होतं. खान कसाही करुन मरणारच होता मग तू हे वेडं धाडस का केलं.. यापुढे लक्षात ठेव जे आपल्या योजनेत नाही ते कधीही करायचं नाही..
एक वेळेस खान मेला नसता तरी चाललं असतं पण जर तुझ्या जिवाला काही बर वाईट झालं असतं तर तुझ्या आईला काय तोंड दाखवलं असतं मी. ती तर हेच म्हटली असती ना की शिवाजी ने स्वत:चा जीव वाचवण्यासाठी माझ्या पोराचा जीव घालवला. तुझ्या जागेवर एक वेळेस मी मेलो असतो तर चाललं असतं पण स्वराज्याचा एकही मावळा मरता कामा नये.’

जगाच्या पाठीवर पहिला राजा आहे जो आपल्या एका साध्या अंगरक्षासाठी सुद्धा मरायला तयार आहे. आपल्या प्रजेवर लेकरांसारखं प्रेम केलं आहे ह्या राजानी…

‘बहुत जणासी आधारू’ म्हणुन म्हणतात शिवाजी महाराजांना…

॥जय शिवराय॥

जगदंब's photo.
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काकोरी काँड के क्रांतिकारियों की शहादत को श्रद्धांजली


सुरेन्द्र यादव's photo.
सुरेन्द्र यादव

4 hrs ·

19 दिसंबर के लिए विशेष
काकोरी काँड के क्रांतिकारियों की शहादत को श्रद्धांजली

जंग-ए-आजादी की इसी कड़ी में 1925 में एक महत्वपूर्ण घटना घटी, जब नौ अगस्त को चंद्रशेखर आजाद, राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खान, राजेंद्र लाहिड़ी और रोशन सिंह सहित 10 क्रांतिकारियों ने लखनऊ से 14 मील दूर काकोरी और आलमनगर के बीच ट्रेन में ले जाए जा रहे सरकारी खजाने को लूट लिया.

इतिहासकार हरिशंकर प्रसाद के अनुसार इन जांबाजों ने जो खजाना लूटा, दरअसल वह हिन्दुस्तानियों के ही खून पसीने की कमाई थी

जिस पर अंग्रेजों का कब्जा था, लूटे गए धन का इस्तेमाल क्रांतिकारी हथियार खरीदने और जंग-ए-आजादी को जारी रखने के लिए करना चाहते थे. इतिहास में यह घटना काकोरी कांड के नाम से जानी गई.

ट्रेन से खजाना लुट जाने से ब्रितानिया हुकूमत बुरी तरह तिलमिला गई और अपनी बर्बरता तेज कर दी. आखिर इस घटना में शामिल सभी क्रांतिकारी पकड़े गए सिर्फ चंद्रशेखर आजाद हाथ नहीं आए.

हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी (एचएसआरए) के 45 सदस्यों पर मुकदमा चलाया गया जिनमें से राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खान, राजेंद्र लाहिड़ी और रोशन सिंह को फांसी की सजा सुनाई गई.

गोरी हुकूमत ने पक्षपातपूर्ण ढंग से मुकदमा चलाया जिसकी बड़े पैमाने पर निन्दा हुई. डकैती जैसे अपराध में फांसी की सजा अपने आप में एक विचित्र घटना थी. फांसी के लिए 19 दिसंबर 1927 की तारीख मुकर्रर हुई, लेकिन राजेंद्र लाहिड़ी को इससे दो दिन पहले 17 दिसंबर को ही गोंडा जेल में फांसी दे दी गई.

राम प्रसाद बिस्मिल को 19 दिसंबर 1927 को गोरखपुर जेल और अशफाक उल्ला खान को इसी दिन फैजाबाद जेल में फांसी दी गई.
रोशन सिंह को भी 19 दिसंबर को फांसी पर लटका दिया गया. क्रान्तिकारी बिस्मिल, अशफाक व रोशन उत्तर प्रदेश के जनपद शाहजहाँपुर के रहने वाले थे.

जीवन की अंतिम घड़ी में भी इन महान देशभक्तों के चेहरे पर मौत का कोई भय नहीं था. दोनों हंसते-हंसते भारत मां के चरणों में अपने प्राण अर्पित कर गए.

काकोरी कांड में शामिल सभी क्रांतिकारी उच्च शिक्षित थे. बिस्मिल जहां प्रसिद्ध कवि थे वहीं भाषाई ज्ञान में भी निपुण थे. उन्हें अंग्रेजी, हिन्दुस्तानी, उर्दू और बांग्ला भाषा का अच्छा ज्ञान था. अशफाक उल्ला खान इंजीनियर थे.

क्रांतिकारियों ने काकोरी की घटना को काफी चतुराई से अंजाम दिया था. इसके लिए उन्होंने अपने नाम तक बदल लिए थे.

हिंदुस्तान रिपब्लिकन आर्मी ने शचींद्रनाथ सान्याल और रामप्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में 1921 में गदर पार्टी के अधूरे कार्य को आगे बढाने का लिए हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन का गठन किया गया। क्रांतिकारी शचींद्रनाथ सान्याल अंडमान से काला पानी की सजा भुगतकर लौटे और बनारस को अपना केंद्र बना कर फिर आज़ादी का शंखनाद फूंका। हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन द्वारा अंजाम दिया गया काकोरी काँड भारत के क्राँतिकारी इतिहास में एक मील के पथ्थर की तरह है। इस क्राँतिकारी काँड में लखनऊ के निकट काकोरी नामक स्थान पर 8 डाउन कोलकत्ता मेल पर धावा बोलकर हिंदुस्तान रिपब्लिकन आर्मी के लीडर रामप्रसाद बिस्मिल की कयादत में 9 अगस्त 1925 को क्रांतिकारियों द्वारा सरकारी खजाना लूट लिया गया। इस क्रांतिकारी कार्यवाही में अशफाकउल्ला खान, ठाकुर रौशन सिंह, राजेंद्र लहडी़, योगेश चटर्जी, चंद्रशेखर आज़ाद, मन्मथनाथ गुप्त, रामदुलारे त्रिवेदी, प्रवणेश चटर्जी, रामनाथ पाँडे, मुकंदीलाल, रामकुमार सिन्हा, कुंदनलाल रामकृष्ण खत्री, प्रेमकिशन खन्ना, बनवारीलाल, सुरेश भट्टाचार्य, भूपेंद्र सान्याल, गोविंद चरण आदि क्रांतिकारियों ने शिरकत अंजाम दी।

काकोरी काँड की क्रांतिकारी कार्यवाही को अंजाम देने की योजना का सूत्रपात मेरठ शहर को वैश्य अनाथालय से हुआ, जहाँ कि मवाना के एक क्राँतिकारी विष्णुशरण दुबलिष अधीक्षक के तौर पर कार्यरत थे। काकोरी काँड की तैयारी के सिलसिले में अनेक क्रांतिकारियों का वैश्य अनाथालय में बेसरा रहा। क्राँतिकारी विष्णुशरण दुबलिश को काकोरी काँड के मुलजिम के तौर पर 26 सितम्बर 1925 को ब्रिटिश पुलिस ने गिरफ्तार किया। काकोरी काँड की क्रांतिकारी कार्यवाही के दौरान किसी क्रांतिकारी का एक गर्म शॉल घटना स्थल पर गलती से छूट गया था। इस गर्म शॉल के ड्राइकिलीनर के पते पर पुलिस ने पंहुच कर क्रांतिकारियों का सुराग हासिल कर लिया और एक के बाद दूसरे क्रांतिकारी को गिरफ्तार कर लिया गया। क्रांतिकारी चंद्रशेखर आज़ाद और कुंदनलाल को ब्रिटिश पुलिस अंत तक गिरफ्तार नहीं कर सकी।

काकोरी काँड का मुकदमा लखनऊ की सेशन कोर्ट में 19 महीने तक इंडियन पीनल कोड की धारा 121ए, 120बी, 369 को तहत चला। 6 अप्रैल 1927 को सेशन कोर्ट द्वारा क्रांतिकारी रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाकउल्ला खान, ठाकुर रौशन सिंह और राजेंद्र लहडी़ को सजाए मौत दी गई। हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के शीर्ष नेता शचींद्रनाथ सान्याल को आजन्म कारावास (काला पानी) की सजा, योगेश चटर्जी और मन्मथनाथ गुप्त को 20 साल की कैद ए बामशक्कत की सजा और बाकी क्रांतिकारियों को भी मुखतलिफ़ अवधियों की कठोर कारावास की सजा सुनाई गई। मेरठ के क्राँतिकारी विष्णुशरण दुबलिश को 10 वर्ष के लिए अंडमान में कैद ए बामशक्कत की सजा का ऐलान किया गया।

हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के क्राँतिकारी चंद्रशेखर आज़ाद ने जोकि काकोरी काँड में गिरफ्तारी से किसी तरह बच निकले थे और निरंतर फरार बने रहे। क्राँतिकारी चंद्रशेखर आज़ाद ने अपनी अद्भुत वीरता और संगठन क्षमता के बलबूते पर हिंदुस्तान रिपब्लिकन आर्मी को पुनर्जीवित कर दिखाया। भगतसिंह, राजगुरु, सुखदेव, शिववर्मा, जतीनदास, विजय कुमार सिन्हा, यशपाल, भगवतीचरण वोहरा, दुर्गा भाभी, सदाशिवराव मालापुरकर, भगवानदास माहौर, प्रकाशवती, सुशीला सरीखे सैकडो़ क्राँतिकारियों को संगठित किया। भगतसिंह ने हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन को समाजवाद के महान् आदर्शो से ओतप्रोत किया। फिरोजशाह कोटला मैदान दिल्ली में देशभर से एकत्र हुए क्रांतिकारियों की सहमति से क्राँतिकारी दल के साथ समाजवादी शब्द को संलग्न कर दिया गया और दल का उद्देश्य आजादी हासिल करने के साथ ही समतापूर्ण समाज की स्थापना करना घोषित किया गया। समतापूर्ण समाजवादी भारत को निर्मित करने का क्रांतिकारी स्वप्न अभी अधूरा है जिसे कि भारत के नौजवानों को क्राँतिकारी शहीदों के चरित्र से सद्प्रेरणा लेकर साकार करना है।

साभार
प्रभात कुमार

स्वदेशी रक्षक

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वराहमिहिर (वरःमिहिर)


Kumar Rajiv

वराहमिहिर के बारे जानने के लिए चन्द्र प्रकाश त्रिवेदी (चाणक्य फेम ) द्वारा निर्मित उपनिषद गंगा का बहुत ही मनोरंजक EPISODE देखने के लिए यहाँ क्लिक करें
https://www.youtube.com/watch?v=ZJak-iBJdy0
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वराहमिहिर (वरःमिहिर) ईसा की पाँचवीं-छठी शताब्दी के भारतीय गणितज्ञ एवं खगोलज्ञ थे। वाराहमिहिर ने ही अपने पंचसिद्धान्तिका में सबसे पहले बताया कि अयनांश का मान 50.32 सेकेण्ड के बराबर है।
कापित्थक (उज्जैन) में उनके द्वारा विकसित गणितीय विज्ञान का गुरुकुल सात सौ वर्षों तक अद्वितीय रहा। वरःमिहिर बचपन से ही अत्यन्त मेधावी और तेजस्वी थे। अपने पिता आदित्यदास से परम्परागत गणित एवं ज्योतिष सीखकर इन क्षेत्रों में व्यापक शोध कार्य किया। समय मापक घट यन्त्र, इन्द्रप्रस्थ में लौहस्तम्भ के निर्माण और ईरान के शहंशाह नौशेरवाँ के आमन्त्रण पर जुन्दीशापुर नामक स्थान पर वेधशाला की स्थापना – उनके कार्यों की एक झलक देते हैं। वरःमिहिर का मुख्य उद्देश्य गणित एवं विज्ञान को जनहित से जोड़ना था। वस्तुतः ऋग्वेद काल से ही भारत की यह परम्परा रही है। वरःमिहिर ने पूर्णतः इसका परिपालजीवनी
वराहमिहिर का जन्म सन् ४९९ में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ। यह परिवार उज्जैन के निकट कपित्थ(कायथा) नामक गांव का निवासी था। उनके पिता आदित्यदास सूर्य भगवान के भक्त थे। उन्हीं ने मिहिर को ज्योतिष विद्या सिखाई। कुसुमपुर (पटना) जाने पर युवा मिहिर महान खगोलज्ञ और गणितज्ञ आर्यभट्ट से मिले। इससे उसे इतनी प्रेरणा मिली कि उसने ज्योतिष विद्या और खगोल ज्ञान को ही अपने जीवन का ध्येय बना लिया। उस समय उज्जैन विद्या का केंद्र था। गुप्त शासन के अन्तर्गत वहां पर कला, विज्ञान और संस्कृति के अनेक केंद्र पनप रहे थे। मिहिर इस शहर में रहने के लिये आ गये क्योंकि अन्य स्थानों के विद्वान भी यहां एकत्र होते रहते थे। समय आने पर उनके ज्योतिष ज्ञान का पता विक्रमादित्य चन्द्रगुप्त द्वितीय को लगा। राजा ने उन्हें अपने दरबार के नवरत्नों में शामिल कर लिया। मिहिर ने सुदूर देशों की यात्रा की, यहां तक कि वह यूनान तक भी गये। सन् ५८७ में वराहमिहिर की मृत्यु हो गई।
550 ई. के लगभग इन्होंने तीन महत्वपूर्ण पुस्तकें वृहज्जातक, वृहत्संहिता और पंचसिद्धांतिका, लिखीं। इन पुस्तकों में त्रिकोणमिति के महत्वपूर्ण सूत्र दिए हुए हैं, जो वराहमिहिर के त्रिकोणमिति ज्ञान के परिचायक हैं।
पंचसिद्धांतिका में वराहमिहिर से पूर्व प्रचलित पाँच सिद्धांतों का वर्णन है। ये सिद्धांत हैं : पोलिशसिद्धांत, रोमकसिद्धांत, वसिष्ठसिद्धांत, सूर्यसिद्धांत तथा पितामहसिद्धांत। वराहमिहिर ने इन पूर्वप्रचलित सिद्धांतों की महत्वपूर्ण बातें लिखकर अपनी ओर से ‘बीज’ नामक संस्कार का भी निर्देश किया है, जिससे इन सिद्धांतों द्वारा परिगणित ग्रह दृश्य हो सकें। इन्होंने फलित ज्योतिष के लघुजातक, बृहज्जातक तथा बृहत्संहिता नामक तीन ग्रंथ भी लिखे हैं। बृहत्संहिता में वास्तुविद्या, भवन-निर्माण-कला, वायुमंडल की प्रकृति, वृक्षायुर्वेद आदि विषय सम्मिबराहमिहिर वेदों के ज्ञाता थे मगर वह अलौकिक में आंखे बंद करके विश्वास नहीं करते थे। उनकी भावना और मनोवृत्ति एक वैज्ञानिक की थी। अपने पूर्ववर्ती वैज्ञानिक आर्यभट्ट की तरह उन्होंने भी कहा कि पृथ्वी गोल है। विज्ञान के इतिहास में वह प्रथम व्यक्ति थे जिन्होंने कहा कि कोई शक्ति ऐसी है जो चीजों को जमीन के साथ चिपकाये रखती है। आज इसी शक्ति को गुरुत्वाकर्षण कहते है। वराहमिहिर ने पर्यावरण विज्ञान (इकालोजी), जल विज्ञान (हाइड्रोलोजी), भूविज्ञान (जिआलोजी) के संबंध में कुछ महत्वपूर्ण टिप्पणियां की। है। उन्होंने लिखा भी बहुत था। संस्कृत व्याकरण में दक्षता और छंद पर अधिकार के कारण उन्होंने स्वयं को एक अनोखी शैली में व्यक्त किया था। अपने विशद ज्ञान और सरस प्रस्तुति के कारण उन्होंने खगोल जैसे शुष्क विषयों को भी रोचक बना दिया है जिससे उन्हें बहुत ख्याति मिली। उनकी पुस्तक पंचसिद्धान्तिका (पांच सिद्धांत), बृहत्संहिता, बृहज्जात्क (ज्योतिष) ने उन्हें फलित ज्योतिष में वही स्थान दिलाया है जो राजनीति दर्शन में कौटिल्य का, व्याकरण में पाणिनि का और विधान में मनु का है।
लित हैं।
त्रिकोणमिति
त्रिकोणमितीय सूत्र वाराहमिहिर ने प्रतिपादित किये हैं-।
वाराहमिहिर ने आर्यभट्ट प्रथम द्वारा प्रतिपादित ज्या सारणी को और अधिक परिशुद्धत बनाया।
अंकगणित
वराहमिहिर ने शून्य एवं ऋणात्मक संख्याओं के बीजगणितीय गुणों को परिभाषित किया। [1]
क्रमचय-संचय
वराहमिहिर ने वर्तमान समय में पास्कल त्रिकोण (Pascal’s triangle) के नाम से प्रसिद्ध संख्याओं की खोज की। इनका उपयोग वे द्विपद गुणाकों (binomial coefficients) की गणना के लिये करते थे। [2][3][4]
प्रकाशिकी
वराहमिहिर का प्रकाशिकी में भी योगदान है। उन्होने कहा है कि परावर्तन कणों के प्रति-प्रकीर्णन (back-scattering) से होता है। उन्होने अपवर्तन की भी व्याख्या की है

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ATULYA BHARAT BAVKA THE ANCIENT SHIVA TEMPLE DAHOD GUJARAT


"ATULYA BHARAT BAVKA SHIV TEMPLE DAHOD GUJARAT

indexAbout District Historical PlacesShivmandir Bavka

Shivmandir Bavka
Detailed information of place
Ancient remains of Shiva temple constructed during 746-483 B.C. are situated at Bavka village of Dahod taluka, this temple is declared as historical monument due to its unique sculpture. A tank near the temple creates beautiful, pleasant natural atmosphere"
"ATULYA BHARAT BAVKA SHIV TEMPLE DAHOD GUJARAT

indexAbout District Historical PlacesShivmandir Bavka

Shivmandir Bavka
Detailed information of place
Ancient remains of Shiva temple constructed during 746-483 B.C. are situated at Bavka village of Dahod taluka, this temple is declared as historical monument due to its unique sculpture. A tank near the temple creates beautiful, pleasant natural atmosphere"
"ATULYA BHARAT BAVKA SHIV TEMPLE DAHOD GUJARAT

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Shivmandir Bavka
Detailed information of place
Ancient remains of Shiva temple constructed during 746-483 B.C. are situated at Bavka village of Dahod taluka, this temple is declared as historical monument due to its unique sculpture. A tank near the temple creates beautiful, pleasant natural atmosphere"
"RATATULYA BHARAT BAVKA SHIV MANDIR DAHOD GUJA

Shivmandir Bavka
Detailed information of place
Ancient remains of Shiva temple constructed during 746-483 B.C. are situated at Bavka village of Dahod taluka, this temple is declared as historical monument due to its unique sculpture. A tank near the temple creates beautiful, pleasant natural atmosphere"
"ATULYA BHARAT BAVKA SHIV TEMPLE DAHOD GUJARAT

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Shivmandir Bavka
Detailed information of place
Ancient remains of Shiva temple constructed during 746-483 B.C. are situated at Bavka village of Dahod taluka, this temple is declared as historical monument due to its unique sculpture. A tank near the temple creates beautiful, pleasant natural atmosphere"
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Jigna Shah added photos to December 18, 2015 in INDIAN HISTORY ~ REAL TRUTH.

21 hrs ·

ATULYA BHARAT BAVKA THE ANCIENT SHIVA TEMPLE DAHOD GUJARAT
12th-century Shiv temple in Bavka, an interior village in Dahod district. About 14 km from Dahod, the Bavka temple, according to locals, was constructed by a devdasi (a temple dancer) in a single night.

It was constructed during 746-483 B.C. is situated at Bavka village in Dahod, this temple is declared as historical monument due to its unique sculpture. A tank near the temple creates beautiful, pleasant natural atmosphere.It was destroyed by Mahmud of Ghazni. Residents of the village say that several statues and carved stones have been stolen during these years of neglect.

ASI had included the temple in the list of protected monuments more than 20 years ago. Despite that important parts of the temple, including carvings, have been either stolen or shattered.

ASI Superintendent Engineer (Vadodara Circle) Shivananda said: “The temple has one of the most beautiful panels of carvings on kriyas. In fact, such carvings are found in all the temples built during that era in India.

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ATULYA BHARAT :-DABHOI FORT , DABHOI NEAR BARODA GUJARAT


"Dabhoi also called as Darbhavati is a city and a municipality in Vadodara district in the state of Gujarat, India. It was originally known as Darbhavati."
"Dabhoi also called as Darbhavati is a city and a municipality in Vadodara district in the state of Gujarat, India. It was originally known as Darbhavati."
"Dabhoi also called as Darbhavati is a city and a municipality in Vadodara district in the state of Gujarat, India. It was originally known as Darbhavati."
"Dabhoi also called as Darbhavati is a city and a municipality in Vadodara district in the state of Gujarat, India. It was originally known as Darbhavati."
"Dabhoi also called as Darbhavati is a city and a municipality in Vadodara district in the state of Gujarat, India. It was originally known as Darbhavati."
Jigna Shah added photos to December 17, 2015 in INDIAN HISTORY ~ REAL TRUTH.

ATULYA BHARAT :-DABHOI FORT , DABHOI NEAR BARODA GUJARAT

Dabhoi Fort is known for its four gateways, namely Hira Bhagol located in the east, Vadodara Gate in the west, Champaner Gate in the north and Nandod Gate in the south.
Of these four gateways, Hira Bhagol is famous for its exquisite stone carvings. Named after the famous architect, Hiradhar, this eastside gateway of the fort keep the tourists enthralled with its magnificent iconography. The four gates are in the middle of each side of the fort wall. It was altered during the time of Visaldev and the Muslim rule. The fort is a home to several Jain and Hindu temples, including an ancient Goddess Kalka temple at one side. The temple showcases beautiful wood carvings.
History
A contemporary of Rudra Mahalaya and Zinzuwada Fort, Dabhoi Fort was founded in the early 6th century AD by great king of Gujarat, Siddhraj Jaisinh, whose reign continued from 1093 to 1143 AD. Followed by the debacle of Patan, the Muslim rulers captured the fort in 1300 AD. Some of the designes of the gates were changed during the Muslim rule. In 18th century, the famous battle of Dabhoi was fought out of this fort.
The battle was fought between Sarsenapati Trimbakrao Dabhade and Bajirao Peshwa. At various points of time, an array of Jain scholars stayed at Dabhoi Fort. For this reason, the fort is considered the birthplace of some of the important Jain literatures with great socio-religious significance. The fort is also famous for being the birthplace of eminent Gujarati poet and Garbi composer, Dayaram.

Posted in जीवन चरित्र

राम प्रसाद ‘बिस्मिल’


राम प्रसाद ‘बिस्मिल’ किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। उनके लिखे ‘सरफ़रोशी की तमन्ना’ जैसे अमर गीत ने हर भारतीय के दिल में जगह बनाई और अंग्रेज़ों से भारत की आज़ादी के लिए चिंगारी छेड़ी। ब्रिटिश साम्राज्य को दहला देने वाले “काकोरी काण्ड” को रामप्रसाद बिस्मिल ने ही अंजाम दिया था। इस महान स्वतंत्रता सेनानी की आज पुण्यतिथि है। इनकी पुण्यतिथि पर भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करें!!

उनका जन्म 11 जून, 1889 को उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर में ठाकुर मुरलीधर सिंह तोमर के यहाँ हुआ था। उनका पैतृक गाँव मध्य प्रदेश के मुरैना जिले के तोमरधार में बरबई था। तोमरधार में चम्बल नदी के किनारे रूहर तथा बरबई नाम के ये दो गांव अपनी उद्दंडता के लिए आज भी प्रसिद्ध हैं। भूपसिंह, तात्या, मानसिंह आदि प्रसिद्ध डाकू यहीं के निवासी थे। इन गाँवों के निवासी हमेशा अंग्रेजो को परेशान करते रहते थे। रामप्रसाद जी बिस्मिल के पूर्वज इन्हीं गांवों के निवासी थे । इन के दादा जी अमानसिंह, समानसिंह और नारायणसिंह – ये तीनों सगे भाई थे और तोमर राजपूत थे। उनका ‘ वंश-वृक्ष ‘ निम्न है –

ठा .अमान सिंह समान सिंह

नारायण सिंह

राजाराम सिंह

करन सिंह ——————– भीकम सिंह** ————– कोक सिंह**
** (जब पुस्तक प्रकाशित हुई 1996तब दोनों जीवित ऐसा उल्लेख )

नारायण सिंह (दादा जी )
श्रीमती विचित्रा देवी ( दादी जी )

ठा .मुरलीधर सिंह —————————————–ठा .कल्याणमल सिंह

राम प्रसाद सिंह ( बिस्मिल )—–रमेश सिंह** ———श्रीमती शाश्त्री देवी
**सुशीलचंद्र (उपनाम )
ग्राम -बरवाई ,तहसील -अम्बाह ,जिला मुरेना।

बिस्मिल के दादा नारायणसिंह कौटुम्बिक कलह और अपनी भाभी के असह्य दुर्व्यवहार से तंग आकर अपनी पत्नी और दो बेटों सहित घर से निकल गए और शाहजहांपुर आकर बस गए। वहॉ उनके आचार-विचार, सत्यनिष्ठा व धार्मिक प्रवृत्ति से स्थानीय लोग प्रायः उन्हें “पण्डित जी” कहते थे। साथ में वो कभी कभार पंडिताई का काम भी करने लगे। इससे वो पण्डित के रूप में मशहूर हो गए। उनका नाम भी नारायण सिंह की जगह नारायण लाल कहा जाने लगा।

अमर शहीदों को शत शत नमन।

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Dr Stephen Hawking’s Opinion on the Science in Veda


Hinduism DeMystified's photo.
Hinduism DeMystified

Dr Stephen Hawking’s Opinion on the Science in Veda

Stephen Hawking, The scientist, theoretical physicist , cosmologist, general relativity and Quantum Theory expert in Cambridge University, U.K. has referred the Vedic science books authored by Dr. Sivarambabu (Organizing secretary, I-SERVE) and said that Vedas might have a theory superior to Einstein’s law E=MC2. His statement on this subject is reproduced below.

Vedas might have a theory superior to Einstein’s law E=MC2

Te Satapatha Brahmana 7-1-2-23 and Gayatri Mantra talk about Universe being threefold (triloka): Prithvi (Earth), Antariksha (the space in between) and Dayu (Heaven). Krishna Yajurveda 23.12 (7-4-45) 43 Pannam-18th Anuvakam-45th Panasa suggests the existence of a softer intermediate space called Pilipila. Modern science says the matter and energy are interchangeable but the Vedic science says there is Pilipila in between the two.(Ref: Modern Science in Vedas- 1 and 2 by Dr. Sakamuri sivaram Babu and Arjunadevi-Guntur-A.P.India published in 2007). Both Vedic and modern science agree upon a continuous dance of creation and annihilation of particle energy everywhere in the universe – Siva tandavam as per Hindu mythology, Rigveda discusses this cycle in detail.

Vedic View: The Universe rotates, shaped like an egg.
Modern View: The Universe is still and it resembles the surface of a sphere.

Dr. Sivarambabu presented an invited paper in the 2nd International Congress on Advanced Materials (AM 2013) at Jaingsu University, Jaingsu, China, in association with University of Jinan, East China University of Science and Technology. Hengyang Normal University, China during May 2013. The conference was attended by Noble Laureates apart from other scientific professionals in the modern sciences. Later the paper was published in the Avagadro Journal of chemistry 1(2)(2013), 7-12. www.academicjournals.com during September 2013

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Seashore Temple (8th century AD) after rain


Worldwide Hindu Temples ॐ's photo.
Worldwide Hindu Temples ॐ with Евдокия Соя.

Seashore Temple (8th century AD) after rain

Place- Mamallapuram aka Mahabalipuram, Tamil Nadu State, BHARAT (India)

Legend
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As the Shore Temple was initially identified as part of the Seven Pagodas at Mahabalipuram, an ancient Hindu legend referred to the origin of these pagodas in mythical terms. Prince Hiranyakasipu refused to worship the god Vishnu. The prince’s son, Prahlada, loved and was devoted to Vishnu greatly and criticized his father’s lack of faith. Hiranyakasipu banished Prahlada but then relented and allowed him to come home. Father and son quickly began to argue about Vishnu’s nature. When Prahlada stated that Vishnu was present everywhere, including in the walls of their home, his father kicked a pillar. Vishnu emerged from the pillar in the form of a man with a lion’s head, and killed Hiranyakasipu. Prahlada eventually became the king, and had a son named Bali. Bali founded Mahabalipuram on this site.

Scriptures also mention that Gods were jealous of the architectural elegance of the monuments of Mahablipuram, and as a result they caused floods to occur, which submerged most parts of the city, except for a few structures that are seen now.

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

देशद्रोहीको पाठ पढानेवाली वीरमति !


🔴 देशद्रोहीको पाठ पढानेवाली वीरमति !

‘चौदहवीं शताब्दीमें देवगिरी राज्यपर राजा रामदेव राज्य करते थे । मुसलमान सम्राट (बादशाह) अल्लाउद्दीनने देवगिरीपर आक्रमण किया तथा राजाको आत्मसमर्पण करने हेतु कहा; परन्तु पराक्रमी रामदेवने उसे धिक्कारा । इसलिए अल्लाउद्दीन क्रोधित हो गया तथा उसने प्रचंड सेनाके साथ देवगिरीपर चढाई की । देवगिरीका किला अभेद्य था सेना युद्धमें निपुण थी । अल्लाउद्दीनकी सेनाके असंख्य सैनिक मारे गए । उसे पराजय स्वीकारकर पीछे लौटना पडा । उस समय देवगिरीपर बडा विजयोत्सव मनाया गया ।

राजा रामदेवकी सेनाका एक पराक्रमी सैनिक पूर्वके एक युद्धमें वीरगतिको प्राप्त हो गया था । उसकी पुत्री वीरमतिको राजाने स्वयंकी पुत्रीके समान संभाला था तथा विवाह योग्य होते ही कृष्णराव नामक एक युवकके साथ उसका विवाह निश्चित किया । कृष्णराव अत्यंत स्वार्थी एवं लोभी था । पराजित अल्लाउद्दीन जब लौट रहा था, उस समय कृष्णरावने उससे भेंट की तथा विजय प्राप्त करनेके उपरांत कृष्णरावको राजा बनानेका प्रतिबन्ध लगाते हुए देवगिरी किलेका रहस्य एवं सेनाकी शक्तिकी सम्पूर्ण जानकारी अल्लाउद्दीनको दी । अल्लाउद्दीनने देवगिरीपर पुनः आक्रमण किया ।

यह समाचार मिलते ही राजा रामदेवने त्वरित सर्व सरदारोंकी सभा आमन्त्रित की तथा कहा कि, ‘‘किसी प्रकारकी सूचना मिले बिना पराजित शत्रु पुनः आक्रमण नहीं करता । इसका अर्थ यह है कि हममें से किसीने दगा किया है; परन्तु चिन्ता न करें, हम उसे पुनः पराजित करेंगे ।’’ यह सुनकर सभीने अपनी अपनी तलवारें बाहर निकाली तथा बोले ‘‘इस युद्धमें हम पूर्ण शक्तिसे लडेंगे तथा देवगिरीकी रक्षा करेंगे ।’’ उस समय कृष्णराव मौन ही था । इसलिए सभीको आश्चर्य हुआ । सबने उसके मौनका कारण पूछा । तब वीरमति क्रोधित शेरनीके समान उसपर झपट पडी तथा बोली कि यह देशद्रोही है एवं बिजलीकी गतिसे उसने कटिसे तीक्ष्ण कट्यार निकालकर उसकी छातीमें घोंप दी । वीरमतिको कृष्णरावकी प्रामाणिकतापर पूर्वसे ही सन्देह था; इसलिए उसने उसपर गुप्त दृष्टि रखी थी । जब उसे जानकारी मिली कि वह अल्लाउद्दीनसे जा मिला है, तब वह आगबबूला हो गई थी । उसे उसके पापका दंड देना ही था । अवसर मिलते ही उसने उसे दंड दिया ।

मरते मरते कृष्णराव बोला, ‘‘मैं देशद्रोही होते हुए भी तुम्हारा पति….’’ तब वीरमति बोली ‘‘मेरा विवाह आपसे होनेवाला था तथा मैंने भी आपको ही अपना पति माना था । हिन्दू स्त्री एक बार मनसे जिसे पति मान लेती है, पुनः अन्य पुरुषका विचार भी नहीं करती । आप जैसे देशद्रोहीको मारकर मैंने देशकर्तव्य किया है । अब पत्नीके धर्मका पालन करूंगी ।’’ यह कहकर उसने तलवार निकाली एवं स्वयंके पेटमें घोंप ली । दूसरे ही क्षण वह गतप्राण होकर कृष्णरावके शवके पास गिर पडी ।’
“जननी जन्म भूमि स्वर्ग से महान है।”

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जब हनुमान


रामचन्द्र आर्य

जब हनुमान जी लंका को अग्नि की भेंट चढ़ाकर और माता जानकी की संदेश रूपी चूडामणि लेकर खेमे में प्रभु श्री राम के चरणों में लौटे तो उत्सव का वातावरण था। श्री राम हनुमान जी के प्रति कृतज्ञ भाव से बोले- ” पवन पुत्र! आपने मेरी प्राण प्रिय जानकी का पता लगाकर मुझ पर बहुत बड़ा उपकार किया है।”

हनुमान जी बोले- ” नहीं प्रभु ! मैं कुछ भी करने लायक नहीं हूं। ये जो कुछ भी हुआ है सब आपकी ही कृपा का पुण्य प्रताप है।”

श्री राम बोले- ” जाम्बवंत जी कह रहे हैं कि तुमने लंका जला दी? क्या यह सत्य है?”

हनुमान जी बोले- ” नहीं प्रभु ! मैंने लंका नहीं जलाई।”

श्री राम बोले- ” तुम असत्य क्यों बोल रहे हो हनुमान? सभी तरफ तो यही चर्चा है की लंका पहुंचते ही तुम जानकी की खोज में जुट गए। अशोक वाटिका में जब जानकी पेड़ के नीचे बैठी मिली तो पेड़ पर चढ़कर मेरे द्वारा दी गई अंगूठी नीचे डाल दी। अगूंठी देखकर जानकी आश्चर्यचकित रह गई। उन्होंने अगूंठी डालने वाले को बुलाया। तभी तुम सामने गए। जानकी को प्रणाम कर अशोक वाटिका के मधुर फल खाने की आज्ञा प्राप्त करी। जब जानकी ने आज्ञा दे दी तो फल खाने के लिए पेड़ो को तोड़ना शुरू कर दिया तत्पश्चात रावण के दरबार में खलबली मच गई। तभी उसका पुत्र अक्षय कुमार आ गया और तुमने उसका वध कर दिया। मेघनाथ के हाथों तुम स्वयं ब्रह्मपाश में बंध कर रावण के सामने गए। रावण ने दण्ड के रूप में तुम्हारी प्रिय पूंछ में कपड़ा लपेटकर आग लगा दी और तुमने जलती आग से सोने की लंका को जलाकर राख कर दिया।”

हनुमान जी बोले- ” प्रभु! आप मुझ से पुत्रवत प्रेम करते हैं और पुत्र द्वारा की गई बदमाशियां भी अच्छी लगती हैं। मैंने जो कुछ किया खेल-खेल में ही किया। त्रिलोकी में इतना बलशाली और हिम्मत वाला कौन है? जो दशानन रावण की लंका जला सके अथवा उससे टक्कर लेने की सोच भी सके।

अब श्रीराम चौंके और बोले- “हनुमान!! तुम कहना क्या चाहते हो?”

हनुमान जी बोले- ” प्रभु! आप ठीक कह रहे हैं। लंका जलते तो मैंने भी देखी थी मगर मेरा विश्वास करें लंका मैंने नहीं जलाई मगर मैंने 5 लोगों को एकत्रित होकर लंका जलाते हुए देखा है।”

लक्ष्मण जी के धैर्य का बांध टूट गया वे बोले- “भ्राता हनुमान! कृपया पहेलियां मत बुझाइये। साफ-साफ बताइये। आप कहना क्या चाहते हैं।”

हनुमान जी ने कहा- “मैंने पांच लोगों को लंका जलाते देखा है। वे पांच लोग थे-

(1) रावण का पाप
(2) माता सीता का संताप
(3) विभीषण का जाप
(4) श्री राम प्रभु का प्रताप
एवं
(5) मेरे पिता पवन देव

हनुमान जी के मुख से इस प्रकार का उत्तर सुन कर प्रभु श्री राम ने उठकर उन्हें अपने गले से लगा लिया।