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बुजुर्ग की दूरदृष्टि!


અરવિંદ પટેલ
बुजुर्ग की दूरदृष्टि!
रेलवे स्टेशन पर एक बुजुर्ग रेल का इंतजार कर रहे थे।
वहां एक नवयुवक आया और उसने बुजुर्ग से पूछा, “अंकल, समय क्या हुआ है?”
बुजुर्ग: मुझे नहीं मालूम।
युवक- लेकिन आपके हाथ में घड़ी तो है, प्लीज बता दीजिए कितने बजे हैं?
बुजुर्ग: मैं नहीं बताऊंगा।
युवक: पर क्यों?
बुजुर्ग: क्योंकि अगर मैं तुम्हें समय बता दूंगा तो तुम मुझे धन्यवाद बोलोगे और अपना नाम बताओगे, फिर तुम मेरा नाम, काम आदि पूछोगे। फिर संभव है हम आपस में बातचीत करें। इस तरह से हम दोनों में जान-पहचान हो जाएगी। तो हो सकता है कि ट्रेन आने पर तुम मेरी बगल वाली सीट पर ही बैठ जाओ। फिर हो सकता है कि तुम भी उसी स्टेशन पर उतरो जहां मुझे उतरना है। वहां मेरी बेटी, जो बहुत सुंदर है, मुझे लेने स्टेशन आएगी। तुम मेरे साथ ही होगे तो निश्चित है तुम दोनों एक-दूसरे को देखोगे। हो सकता है दोनों एक दूसरे को दिल दे बैठो। शादी करने की जिद करने लगो। इसलिए भाई, मुझे माफ करो! मैं ऐसा कंगाल दामाद नहीं चाहता, जिसके पास समय देखने के लिए अपनी घड़ी तक नहीं है।
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बड़े शहर के सुपर मार्केट में शॉपिंग करते हुए एक युवक ने नोटिस किया


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बड़े शहर के सुपर मार्केट में शॉपिंग करते हुए एक युवक ने नोटिस किया
कि एक बूढ़ी अम्मा उसका पीछा कर रही है।
वो रुकता तो बूढ़ी अम्मा रुक जाती।
वो चलता तो अम्मा भी चलने लगती।
युवक कुछ समझ पाता उससे पहले ही वह अम्मा उसके पास आई और बोली कि बेटा मैं चाहकर भी तुमसे दूर नहीं हो पा रही हूं।
जानते हो इसकी वजह क्या है।
तुम बिलकुल मेरे स्वर्गवासी बेटे जैसे दिखते हो।
इसलिए मैं तुम्हे देखते हुए तुम्हारे पीछे-पीछे चल रही हूं।
मुझे तुममें अपना बेटा नजर आ रहा है।
युवक भावकु हो गया। बोला कोई बात नहीं, अम्मा जी। मुझे कोई परेशानी नहीं।
आप चाहें तो मेरे पीछे नहीं मेरे साथ-साथ शॉपिंग कर लें।
फिर दोनों पूरे स्टोर में साथ-साथ घूमने लगे।
इतने में अम्मा ने कहा कि बेटा मुझे जाना है, क्या तुम मेरी एक छोटी सी मदद करोगे।
तुम्हें अजीब लगेगा।
लेकिन जब मैं स्टोर से जाऊं तब क्या तुम मुझे एक बार ‘गुड बाय, मॉम’ कहोगे, जैसे मेरा बेटा कहा करता था।
युवक ने कहा इसमें क्या दिक्कत है।
फिर, बूढ़ी अम्मा जब बाहर जाने लगी तब युवक ने जोर से आवाज लगाई- गुड बाय, मॉम। टेक केयर।
बूढ़ी अम्मा पलटी और बहुत स्नेह से युवक की तरफ देखा।
उसे दुआएं दी, मुस्कुराई और चली गई।
युवक भी बहुत खुश हुआ। अपनी शॉपिंग पूरी करके वह सामान ट्रॉली में रख काउंटर पर पहुंचा और बिल पूछा।
काउंटर क्लर्क ने कहा सर मात्र 52 हजार रुपए हुए हैं।
युवक ने पूछा इतना ज्यादा बिल कैसे?
क्लर्क ने कहा सर आप की मॉम बोलकर गई हैं कि, उनका बिल आप पे करोगे।

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Karkala, the famed Jain centre in Udupi district, Karnataka


Karkala,  the famed Jain centre in Udupi district, Karnataka

Karkala town in Udupi district of Karnataka is home to several historically significant hundreds of years old temples

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प्राचीन महाभारत काल की बात है


प्राचीन महाभारत काल की बात है जब महाभारत के युद्ध में जो कुरुक्षेत्र के मैंदान में हुआ, जिसमें अठारह अक्षौहणी सेना मारी गई।

इस युद्ध के समापन और सभी मृतकों को तिलांज्जलि देने के बाद पांडवों सहित भगवान श्री कृष्ण पितामह भीष्म से आशीर्वाद लेकर हस्तिनापुर को वापिस चलने के लिए रवाना होने लगे तब भगवान श्रीकृष्ण को रोक कर पितामाह ने श्रीकृष्ण से पूछ ही लिया।

“मधुसूदन, ये मेरे कौन से कर्म का फल है जो मैं सरसैया पर पड़ा हुआ हूं?”

फिर भगवान श्रीकृष्ण ने कहा कि जो जैसे कर्म करता है, उसे वैसा ही फल मिलता है जिसकी जैसी करनी होती है, उसकी गति भी वैसी होती है ।

यह बात सुनकर मधुसूदन मुस्कराए और पितामह भीष्म से पूछा, “पितामह आपको कुछ पूर्व जन्मों का ज्ञान है?” इस पर पितामह ने कहा, “हां”।

भगवान श्रीकृष्ण मुझे अपने सौ पूर्व जन्मों का ज्ञान है कि मैंने किसी व्यक्ति का कभी अहित नहीं किया।इस पर श्रीकृष्ण मुस्कराए और बोले पितामह आपने ठीक कहा कि आपने कभी किसी को कष्ट नहीं दिया।

लेकिन एक सौ एकवें पूर्वजन्म में आज की तरह तुमने तब भी राजवंश में जन्म लिया था और अपने पुण्य कर्मों से बार-बार राजवंश में जन्म लेते रहे,

लेकिन उस जन्म में जब तुम युवराज थे, तब एक बार आप शिकार खेलकर जंगल से निकल रहे थे, तभी आपके घोड़े के अग्रभाग पर एक करकैंटा एक वृक्ष से नीचे गिरा ।

आपने अपने बाण से उठाकर उसे पीठ के पीछे फेंक दिया, उस समय वह बेरिया के पेड़ पर जा कर गिरा और बेरिया के कांटे उसकी पीठ में धंस गए । करकेंटा जितना निकलने की कोशिश करता उतना ही कांटे उसकी पीठ में चुभ जाते.

इस प्रकार करकेंटा अठारह दिन जीवित रहा और यही ईश्वर से प्रार्थना करता रहा, “हे युवराज! जिस तरह से मैं तड़प-तड़प कर मृत्यु को प्राप्त हो रहा हूं, ठीक इसी प्रकार तुमें भी तड़प-तड़प कर मृत्यु मिलेंगी।”

इसी कारणवंश पितामह भीष्म! तुम्हारे पुण्य कर्मों की वजह से आज तक तुम पर करकेंटा का श्राप लागू नहीं हो पाया। लेकिन हस्तिनापुर की राज सभा में द्रोपदी का चीर-हरण होता रहा और आप मूक दर्शक बनकर देखते रहे।

जबकि आप सक्षम थे उस अबला पर अत्याचार रोकने में, लेकिन आपने दुर्योधन और दुशासन को नहीं रोका।

इसी कारण पितामह आपके सारे पुण्यकर्म क्षीण हो गए और करकेंटा का ‘श्राप’ आप पर लागू हो गया। अतः पितामह प्रत्येक मनुष्य को अपने कर्मों का फल कभी न कभी तो भोगना ही पड़ेगा।

जो जैसा कर्म करता हैं उसे वैसा ही फल प्राप्त होता है ,हमारे द्वारा किए गए कर्मों का फल हमें आगे चल कर भुगतना ही पड़ता है।

इसलिए पृथ्वी पर निवास करने वाले प्रत्येक प्राणी व जीव जन्तु को भी भोगना पड़ता है और कर्मों के ही अनुसार ही जन्म होता है।

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आधी छोड़ सारी को धावे…


आधी छोड़ सारी को धावे…
एक छोटे – से सरोवर में एक हंस प्रतिदिन उस सरोवर में रहने वाली एक मछली से मिलता था। वहां घंटों उससे बातें करता। रात होने पर जब अंधेरा छा जाता तब मछली भी तल में जाकर सो जाती। पास के पेड़ के ऊपर जाकर हंस भी सो जाता। सुबह होने पर हंस कहीं उड़कर चला जाता और दो- एक घंटे के बाद मछली के पास पहुंच जाता ।
दोनों में गहरी दोस्ती थी ।जब कभी हंस को आने में देर हो जाती तो मछली बड़ी बेसब्री से उसका इंतजार करतीI एक दिन मछली ने हंस से पूछा, “मित्र, तुम रोजाना कहां जाते हो?”
हंस ने बताया ,,”मैं समुंदर की ओर जाता हूं Iवहां बहुत – सी सीप होती हैं। उन सीपों के बीच की एक सीप से मोती निकलता है। मैं मोती को खा लेता हूं,।

क्योंकि वह मेरी खुराक है। मै हंस हूं सिर्फ मोती ही खाता हूं।” यह सुनकर मछली ने कहा, “मित्र हंस ! मुझे भी समुद्र देखना है कि वह कैसा होता है?” हंस ने कहा, समुद्र की गहराई आज तक कोई नाप नहीं सका, उसका तल कितना नीचे है, कोई नहीं जानता।” मछली ने कहा, “मुझे भी समुद्र में जाना है। तुम तो अपने पंखो के सहारे उड़कर रोजाना समुद्रतट तक चले जाते हो, मैं समुद्र में कैसे जाऊं ? यह किस तरह संभव होगा कि मैं समुद्र को देख आऊं ?” इस पर हंस ने जवाब दिया, “थोड़ी ही दूरी पर एक नदी है जो समुद्र में
जाकर मिल जाती है। यदि तुम उस नदी में भी पहुंच जाओ तो एक दिन नदी का बहाव तुम्हें समुद्र में ले जाएगा।” एक दिन बादल गरजने लगे और जोर-जोर से पानी बरसने लगा। हंस ने मछली से कहा,“मित्र, आज तुम्हारी प्रार्थना भगवान ने सुन ली। पानी बरसने से अब यह सरोवर पूरी तरह जल से भर जाएगा और सरोवर का पानी दूर- दूर तक फैल जाएगा। संभव है बरसात का पानी इतना विशाल रूप धारण कर ले की सरोवर नदी तट को मिला दे।तब तुम नदी तट तक जल्दी से तैरकर नदी के जल में चली जाना। फिर तुम्हें नदी का बहाव एक दिन समुद्र में पहुंचा देगा।” और सचमुच ऐसा ही हुआ। जल ने नदी की ओर तेजी से बढ़ना शुरू कर दिया। वर्षा की तेजी कुछ ही देर में उसे नदी में बहाकर ले गई। मछली समुद्र में पहुंच गई। इसके बाद हंस मछली से फिर कभी न मिल सका। वह बहुत उदास रहने लगा ।
उधर उस विशाल समुद्र में लाखों मछलियां थी। हंस की दोस्त उस छोटी मछली को कोई पूछता भी नहीं था। वह अकेली पड़ गई। अब तो उसे बहुत पछतावा हुआ कि वह क्यों इस समुद्र में आई। वह उन दिनों को याद कर-करके व्याकुल रहने लगी जब उसकी अपने मित्र हंस से दिन भर बातें होती थी। किसी ने सच ही कहा है कि कुछ बड़ा पाने की चाहत में हम अपने आपको खो बैठते हैं और छोटी-छोटी खुशियों से भी हाथ धो बैठते हैं।

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वजन कम करने के लिए खाएं तुलसी और हरा धनिया, 5 घरेलू नुस्खे


वजन कम करने के लिए खाएं तुलसी और हरा धनिया, 5 घरेलू नुस्खे

दीपावली जैसे फेस्टिव सीजन के बाद वेट लॉस करने के लिए शरीर को डिटॉक्स करना ज़रूरी है। डिटॉक्स ऐसी प्रोसेज है जिसमें बॉडी में मौजूद बैड केमिकल दूर हो जाते हैं और हम लाइट फील करते हैं।

ऐसी 5 चीजें जो आपके किचन में ही मिल जाएंगी, इन्हें खाकर आप आसानी से अपनी बॉडी को डिटॉक्स कर सकते हैं :

1. धनिया पत्ता :
इसका इस्तेमाल तो हर भारतीय खाने में होता है। फेस्टिव सीजन के बाद रोजाना सुबह उठकर धनिया पत्तों को बारीक पीस लें और एक गिलास गर्म पानी के साथ लें। तीन दिन में ही बॉडी के सारे बैड केमिकल्स दूर हो जाएंगे। बढ़ा हुआ वजन कम होगा। इससे कब्ज़ से भी राहत मिलेगी। साथ ही यह डाइबीटिज और एनीमिया को कंट्रोल करने में भी मदद करता है।

2. तुलसी :
जल्दी डाइजेशन और मेटाबॉलिज्म की प्रोसेस को तेज करने में तुलसी बहुत मदद करती है। तो फेस्टिव सीजन में आपने जो ज्यादा खाया है, उसे यह बैलेंस करने का काम करेगी। इससे वजन कम होने के साथ-साथ बॉडी लाइट फील होगी। यह इम्युनिटी को बढ़ाकर शरीर को किसी भी प्रकार के इन्फेक्शन और बीमारी से दूर रखती है।

3.पुदीना :
यह नैचुरल तरीके से शरीर को डिटॉक्स तो करता ही है, साथ ही बॉडी में ब्लड सर्कुलेशन को बेहतर भी बनाता है। इसे खाने से शरीर हल्का फील करता है। पुदीने के पत्तों को पीसकर पानी के साथ खा लें या फिर पराठों में डालकर भी इसे खाया जा सकता है।

4.कढ़ी पत्ते :
कढ़ी पत्ते (मीठे नीम के पत्ते) से भोजन में फ्लेवर आने के साथ-साथ वेट लॉस करने में भी मदद मिलती है। कढ़ी के पत्तों में लैक्सेटिव (laxative) प्रॉपर्टी होती है जिसके कारण यह डाइजेशन पॉवर बढ़ाता है और शरीर से टॉक्सिक केमिकल्स निकालने में मदद करता है। इससे वजन कम करने में भी मदद मिलती है। दीपावली के बाद कम से कम सात दिन तक आपको अपने भोजन में कढ़ी पत्तों को जरूर शामिल करना चाहिए।

5. नींबू:
वैसे तो नींबू को रोज ही भोजन में या पानी के साथ लेना चाहिए। यह फायदा ही करेगा। लेकिन फेस्टिव सीजन के बाद तो इसे कम से कम सात दिन लेना ही चाहिए। यह बॉडी को डिटॉक्स करने का एक आसान उपाय है। फेस्टिवल की अगली सुबह से ही गुनगुने गर्म पानी में शहद और नींबू डालकर पीने से बॉडी में हल्कापन आएगा और कुछ ही दिनों में वज़न में भी कमी फील करेंगे। नींबू में एंटी एजिंग प्रॉपर्टी होती है और यह इम्युनिटी को भी बढ़ाता है।

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ज्ञान और चरित्र


K.L कक्कड़

ज्ञान और चरित्र
राजा भोज के दरबार में एक अत्यंत ज्ञानी महात्मा पधारे ।राजा के अनुरोध पर उन्होंने प्रजा के हितार्थ सात दिनों तक प्रवचन किया। उनके उपदेश सुनकर सभी बेहद खुश और संतुष्ट हुए। राजा भी बहुत प्रभावित हुआ। उसने दक्षिणा स्वरूप महात्मा को ढेरों मुद्राएं दी और फिर आने का निमंत्रण देकर आदरपूर्वक विदा किया। चलते समय राजा ने महात्मा से पूछा कि इस दुनिया में ब्रह्मज्ञानी श्रेष्ठ है या चरित्रवान। महात्मा ने चरित्रवान को श्रेष्ठ बताया, लेकिन राजा इस उत्तर से संतुष्ट नहीं हुआ। उसे लगा कि अपने उच्च ज्ञान की वजह से ही महात्मा ने इतना आदर और सम्मान पाया ।महात्मा इस प्रश्न का समाधान फिर कभी करने का आश्वासन देकर विदा हुए। कुछ दिनों बाद राज दरबार में एक चोर लाया गया। उस पर एक मुद्रा चुराने का आरोप था। जब अपराधी को सामने लाया गया, तो राजा उसे पहचान कर दंग रह गया यह तो वही महात्मा थे, जिन्होंने पिछले दिनों सबको धर्म और जीवन का मर्म समझाया था। राजा को आश्चर्यचकित देखकर चोर के रूप में पकड़े गए महात्मा ने मुस्करा कर कहा, “हे राजन! मैं आज भी पूर्व की भांति ही गुणी और ज्ञानवान पंडित हूं। किंतु लालच और चोरी से चरित्रहीन माना जाऊंगा और अब तुम्हारे दंड का भागी हूं।” राजा को महात्मा के कथन का मर्म समझ में आ गया कि किस तरह चरित्र का दर्जा ज्ञान से ऊपर है ।राजा को यह समझाने के लिए ही महात्मा ने चोर का स्वांग भरा था। मानव जीवन में ज्ञान से चरित्र का दर्जा सदा श्रेष्ठ माना गया है।