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गौशाला


हाल ही में कानपुर की एक गौशाला ने एक ऐसा सीएफएल बल्ब बनाया है, जो बैटरी से चलता है। इस बैटरी को चार्ज करने के लिए गौमूत्र की आवश्यकता पड़ती है। आधा लीटर गौमूत्र से 28 घंटे तक सीएफएल जलता रहेगा।
पेट्रोल, डीजल, कोयला व गैस तो सब प्राकृतिक स्रोत हैं, किंतु यह बायोगैस तो कभी न समाप्त होने वाला स्रोत है। जब तक गौवंश है, अब तक हमें यह ऊर्जा मिलती रहेगी।
सिर्फ एक प्लांट से करीब 7 करोड़ टन लकड़ी बचाई जा सकती है जिससे करीब साढ़े 3 करोड़ पेड़ों को जीवनदान दिया जा सकता है। साथ ही करीब 3 करोड़ टन उत्सर्जित कार्बन डाई ऑक्साइड को भी रोका जा सकता है।
केवल 40 करोड़ गौवंश के गोबर व मूत्र से भारत में 84 लाख एकड़ भूमि को उपजाऊ बनाया जा सकता है।
प्राचीनकाल में मकानों की दीवारों और भूमि को गाय के गोबर से लीपा-पोता जाता था। यह गोबर जहां दीवारों को मजबूत बनाता था वहीं यह घरों पर परजीवियों, मच्छर और कीटाणुओं के हमले भी रोकता था। आज भी गांवों में गाय के गोबर का प्रयोग चूल्हे बनाने, आंगन लीपने एवं मंगल कार्यों में लिया जाता है।

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शरद पूर्णिमा की रात में की गई चंद्र पूजन और आराधना से साल भर के लिए लक्ष्मी और कुबेर की कृपा प्राप्ति होती है।


शरद पूर्णिमा की रात में की गई चंद्र पूजन और आराधना से साल भर के लिए लक्ष्मी और कुबेर की कृपा प्राप्ति होती है।

शरद पूर्णिमा की रात मां लक्ष्मी का मंत्र
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्म्यै नमः

शरद पूर्णिमा की रात कुबेर का मंत्र
ॐ यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धन धान्याधिपतये
धन धान्य समृद्धिं मे देहि दापय स्वाहा।।

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मार्शल आर्ट के जनक विष्णुअवतार ‘परशुराम’


मार्शल आर्ट के जनक विष्णुअवतार ‘परशुराम’ **********************************************

आप चाहे दुनिया के किसी भी क्षेत्र में बैठे हों, कहीं से भी वास्ता रखते हों लेकिन कुंग्फू को समझने और उसकी दिलचस्प बातों को गहराई से जानने की कोशिश जरूर करते होंगे ! खासतौर पर लड़कों में कुंग्फू को लेकर एक खास दिलचस्पी होती है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि कुंग्फू विश्वविख्यात सबसे बड़े लड़ाकू खेलों में से एक मार्शल आर्ट का एक छोटा सा हिस्सा है !

कुंग्फू का नाम सुनते ही सभी के दिमाग में ‘ब्रूस ली’ की छवि आ जाती है ! उसकी तरह शरीर को पूरा घुमाकर, ना जाने कैसे-कैसे करतब करके दुश्मनों के छक्के छुड़ा देने की स्टाइल शायद ही आज के समय में किसी के पास होगी ! लेकिन ब्रूस ली ही इस आर्ट को आगे बढ़ाने के लिए जिम्मेदार है, ऐसा सोचना भी गलत है, क्योंकि मार्श आर्ट का सिद्धांत इतना पुराना है कि आप सोच भी नहीं सकते ! यदि हिन्दू पुराणों को खंगाल कर देखा जाए, तो ऐसी मान्यता है कि मार्शल आर्ट के संस्थापक भगवान परशुराम हैं ! जी हां… सही सुना आपने !

भगवान विष्णु के छठे अवतार, अपने शस्त्र ज्ञान के कारण पुराणों में विख्यात भगवान परशुराम को पूरे जगत में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है ! भगवान परशुराम मूल रूप से ब्राह्मण थे किंतु फिर भी उनमें शस्त्रों की अतिरिक्त जानकारी थी और इसी कारणवश उन्हें एक क्षत्रिय भी कहा जाता है, लेकिन उस समय में मार्शल आर्ट कहां था ? आप सोच रहे होंगे कि मार्शल आर्ट का भारतीय इतिहास से कोई संबंध है, ऐसा होना भी असंभव-सा है ! लेकिन यही सत्य है… भीष्म पितामाह, द्रोणाचार्य व कर्ण को शस्त्रों की महान विद्या देने वाले भगवान परशुराम ने कलरीपायट्टु नामक एक विद्या को विकसित किया था !

इसी विद्या को आज के युग में मार्शल आर्ट के नाम से जाना जाता है ! ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार कलरीपायट्टु नामक इस विद्या को भगवान परशुराम एवं सप्तऋषि अगस्त्य देश के दक्षिणी भाग में लेकर आए थे ! कहते हैं कि भगवान परशुराम शस्त्र विद्या में महारथी थे इसलिए उन्होंने उत्तरी कलरीपायट्टु या वदक्क्न कलरी विकसित किया था और सप्तऋषि अगस्त्य ने शस्त्रों के बिना दक्षिणी कलरीपायट्टु का विकास किया था !

हैरानी होती है इस बात पर कि कितने पुराने समय में विकसित की गई यह विद्या आज भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में मार्शल आर्ट के नाम से जानी जाती है, लेकिन इस आर्ट ने समय के साथ अपनी कई शाखाएं बना लीं ! जिसमें से एक है कुंग्फू, जो फिलहाल चीन, जापान, थाईलैंड और अन्य दक्षिण और पूर्वी एशियाई देशों में जबरदस्त लोकप्रिय है ! लेकिन यह विद्या भारत से होते हुए इन देशों में कैसे आई ? दरअसल यदि इतिहास के पन्नों को खंगाल कर देखा जाए, तो ऐसे तथ्य मिले हैं जो हैरान करने वाले हैं ! ऐसा माना जाता है कि ज़ेन बौद्ध धर्म के संस्थापक बोधिधर्मन ने भी इस प्रकार की विद्या की जानकारी प्राप्त की थी व अपनी चीन की यात्रा के दौरान उन्होंने विशेष रूप से बौद्ध धर्म को बढ़ावा देते हुए इस मार्शल आर्ट का भी उपयोग किया था !

आगे चलकर वहां के वासियों ने इस आर्ट का मूल रूप से प्रयोग कर शाओलिन कुंग फू मार्शल आर्ट की कला विकसित की ! इतिहासकारों के मुताबिक़ बोधिधर्मन दक्षिण भारतीय तमिल राजवंश पल्लव वंश के राजकुमार थे ! पांचवीं शताब्दी में पल्लव साम्राज्य के शासक महाराज कांता वर्मन के तीसरे राजकुमार बोधिधर्मन ने बालावस्था में ध्यान करना प्रारम्भ कर दिया था !

बोधिवर्मन अपने जीवन में कुछ अलग करना चाहते थे ! कुछ ऐसा जिसे जानने के बाद वे अपने शिक्षकों को अच्छाई के मार्ग पर ला सकें, शायद इसलिए उन्होंने भगवान परशुराम द्वारा विकसित की गई कलारिप्पयतु विद्या की शिक्षा प्राप्त की ! शुरुआत में उन्होंने इस विद्या को आत्मरक्षा के रूप में प्रयोग किया, लेकिन धीरे-धीरे उन्हें समझ आया कि इस विद्या में सारा ज्ञान है, और यदि इसे पूरे विश्व में फैलाया जाए तो यह बेहद उपयोगी है !

अतः युवावस्था में बौद्ध धर्म स्वीकृत करने के पश्चात बोधिधर्मन ने इसके प्रचार-प्रसार करने हेतु चीन की ओर प्रस्थान किया, और वहां शरीर, बुद्धि और आत्मा को सम्मिलत रूप से एकीकृत करने वाली ध्यान की तकनीक कलारिप्पयतु को और विकसित किया ! शुरू में तो यह विद्या कलारिप्पयतु के नाम से ही जानी गई, लेकिन बाद में चीनी क्षेत्रों में इसे मार्शल आर्ट का नाम दिया गया ! यह तथ्य अचंभित कर देने वाला है, लेकिन सच में बोधिधर्मन ने इस विद्या को चीन के भिक्षुओं को भी सिखाया और उन्हें आत्मरक्षा का महत्व समझाया !

शायद यही कारण है कि बोधिधर्मन को चीन, जापान, थाईलैंड आदि देशों में भगवान की तरह पूजा जाता है ! बोधिधर्मन के बारे में एक और बात काफी प्रसिद्ध एवं रोचक है कि वे आत्मरक्षा कला के जनक होने के साथ ही एक महान चिकित्सक भी थे ! उन्होंने अपने ग्रंथों में उन्नत प्रौद्योगिकी (डीएनए) के माध्यम से बीमारियों को ठीक करने की विधि के बारे में भी विस्तृत प्रकाश डाला है ! बोधिधर्मन को चीन में “दा मो” और “बा ताओ” के नाम से भी जाना जाता है !

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मप्र स्थापना दिवस विशेष


” यह स्थापना दिवस विषेश समाचार है या दास मानसिकता(चाटुकार की भी चटुकारिता) की परकाष्ठा”

जब नेहरू की 555 ब्रांड की सिगरेट लेने 200 KM दूर भेजा गया विशेष विमान

Sourabh Khandelwal | Oct 26, 2015, 04:09:00 PM IST

मप्र स्थापना दिवस विशेष : 1 नवंबर को मप्र का 60वां स्थापना दिवस है। इस मौके परdainikbhaskar.com आपको बता रहा है मप्र की राजनीति के रोचक किस्से।

भोपाल। जवाहरलाल नेहरू ने मप्र को कई सौगातें दी हैं। मप्र के राजनेता शंकरदयाल शर्मा और उनके बीच खासी नजदीकी थी। इस वजह से अकसर नेहरू मप्र आया करते थे। जवाहरलाल नेहरू अपने प्रधानमंत्री के कार्यकाल के दौरान सिर्फ भोपाल शहर में 18 से ज्यादा बार आए।

सिगरेट के लिए राज्यपाल ने इंदौर भेजा विशेष विमान
एक बार जवाहरलाल नेहरू भोपाल के दौरे पर थे। राजभवन में यह पता चला कि नेहरू की फेवरेट ब्रांड 555 सिगरेट भोपाल में नहीं मिल रही है। नेहरू खाने के बाद सिगरेट पीते थे। यह पता चलते ही भोपाल से इंदौर एक विशेष विमान भेजा गया। इंदौर एयरपोर्ट पर सिगरेट के कुछ पैकेट पहुंचाए गए और विमान सिगरेट के पैकेट लेकर वापस भोपाल लौट आया। इस घटना का जिक्र मप्र राजभवन की वेबसाइट पर है।

भोपाल नवाब के महल में रुकने पर राज्यपाल ने जताई नाराजगी
जवाहरलाल नेहरू जब भी भोपाल आते थे तो भोपाल नवाब के महल या उनकी चिकलोद स्थित कोठी पर रुकते थे। यह देखकर मप्र के दूसरे राज्यपाल हरि विनायक पाटस्कर काफी नाराज हुए। उन्होंने जवाहरलाल नेहरू से साफ कह दिया कि आप अधिकारिक यात्रा पर भोपाल आ रहे हैं, इसलिए आपके ठहरने के लिए राजभवन से उपयुक्त कोई और जगह नहीं है।

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वैदिक ऋषि कण्व की तपोस्थली कंसुआ शिव मंदिर


वैदिक ऋषि कण्व की तपोस्थली कंसुआ शिव मंदिर की प्राचीनतम और आध्यात्मिक वैभवता के साथ कई ऐसे प्रसंग जुड़े हैं, जिनकी सत्यता प्रामाणिकता इतिहास के पन्नों पर दर्ज है। देश के कुछेक प्राचीनतम धार्मिक स्थलों की सूची में दर्ज कंसुआ धाम शिवालय और इसके आसपास मौजूद सैकडों साल पुरानी पुरासंपदा वह अनमोल धरोहर है, जिस पर इस शहर को गर्व होना चाहिए। दुष्यंत-शकुंतला के प्रणय प्रसंग और उससे जन्मे महाप्रतापी भरत की क्रीड़ा स्थली है यह। वे ही भरत, जिनके नाम पर हमारे देश का नामकरण हुआ। भला इससे बड़ा गौरव और क्या हो सकता है। प्रत्येक शहरवासी का दायित्व है कि वह न केवल इसे सहेजे बल्कि दुनिया को इसके बारे में बताए भी।
ञ्चडॉ. जगतनारायण (इतिहासकार)।
‘हमारे माता और पिता अगर बूढ़े हो जाएं, उनके बाल सफेद और दांत गिर जाएं तो क्या हम उनके पास जाना छोड़ देते हैं? तब क्या हम उनके अस्तित्व को नकार देते हैं? बिल्कुल नहीं, बल्कि हम उनकी ज्यादा देखभाल और फिक्र करते हैं। आश्चर्य की बात है कि मेरे नगरवासी यहां की इतिहास प्रसिद्ध महान थाती से अपरिचित हैं। हां, हम चर्चा कर रहे हैं, कोटा स्थित पवित्र कण्वाश्रम तीर्थ की महत्ता की। जिसके नाम पर आज कंसुआ बस्ती बसी हुई है। यह सही है कि आज यह स्थान इसके आसपास गंदगी और टूटफूट से विकृत नजर आता है लेकिन इसके अंतरंग में जो प्राचीनतम भव्य गौरवशाली स्मारक है उसको जानने का कोई प्रयास नहीं करता।
आज की कंसुआ बस्ती जो एक नाले के किनारे बसी हुई है। उसका इतना चौड़ा पाट है कि यह अवश्य कभी कोई नदी रही होगी। यह नदी दक्षिण पश्चिम दिशा से आती हुई जहां पूर्वमुखी होती है, वहीं पर एक प्राचीन मंदिर है। हमारे धर्मग्रंथों में यह कहा जाता है कि जहां नदी पूर्वमुखी होती है वहां बनाए गए मंदिर को तीर्थ माना जाता है। इसलिए इस मंदिर को पुरातनकाल से कंसुआ तीर्थ कहा जाता है। यहां जो प्राचीन शिवमंदिर खड़ा हुआ है इसका निर्माण विक्रमी संवत 795 यानि 738 ईस्वी में हुआ था। इस हिसाब से यह मंदिर 1274 साल पुराना है। कभी किसी आक्रांता द्वारा या हमारी लापरवाही के कारण यह मंदिर भग्न हो गया था और इसका शिखर टूट गया था। बाद में जब इसका पुनरुद्धार किया गया तो छावना (लेंटल) स्तर तक यह मूल मंदिर था और इसका शिखर बाद में बनाया गया। इस मंदिर के दाहिनी दीवार पर एक शिलालेख लगा हुआ है, जिसमें इस मंदिर के निर्माण का उल्लेख हुआ है। हिंदी के महाकवि जयशंकर प्रसाद ने अपने नाटक ‘चंद्रगुप्तÓ की भूमिका में इस शिलालेख का उल्लेख किया है। इस शिलालेख को कुटिल लिपि में लिखे गए देश के श्रेष्ठतम शिलालेखों में से शीर्ष माना जाता है। शिलालेख में इस स्थान को प्राचीनतम धार्मिक तीर्थस्थल उल्लेखित करने के साथ ही लिखा हुआ है कि यह प्राचीनतम कण्व आश्रम है। इसलिए ही इस स्थान की महत्ता को समझकर चित्तौड़ के राजा धवल मौर्य के सामंत शिवगण ने विक्रमी संवत 795 में इस मंदिर का निर्माण कराया था। शिवगण ब्राह्मण था और उसने शिवमंदिर का निर्माण कराके वैदिक ऋषि महर्षि कण्व के आश्रम को हमेशा के लिए अमर बना दिया। हमारी कोटा नगरी धन्य है, जहां कि वैदिक कालीन महर्षि कण्व ने अपना आश्रम बनाया था। मंदिर का समय समय पर कोटा के हाड़ा वंशीय शासकों ने भी जीर्णोद्धार कराया।
मूर्तिकला की बेजोड़ मिसाल है कंसुआधाम
कंसुआधाम में छावना तक जो मूल मंदिर है, वह आठवीं शताब्दी की मंदिर व मूर्तिकला की बेजोड़ मिसाल है। हमारे स्थापत्य और मंदिर निर्माण में जिन पुरातन शास्त्रसम्मत विधान का उल्लेख है, उसका इस मंदिर निर्माण में पूर्णतया पालन हुआ है। इसकी पत्थरों की पॉलिश मूर्तियों की सुघड़ता भव्य होने के साथ ही बड़ी ही भव्य आकर्षक महसूस होती है। मुख्य मंदिर के सामने जो पंचमुखी शिवलिंग है वह मूर्तिकला का अनुपम उदाहरण है। यूं तो पूरा परिसर शिवलिंग से भरा हुआ है। लगता है हर काल में प्रमुख श्रद्धालुओं ने यहां एक-एक शिवलिंग की स्थापना की होगी। नाले के किनारे चबूतरे पर सहस्त्र शिवलिंग बना हुआ है, जिसमें मुख्य शिवलिंग पर 999 छोटे शिवलिंग उत्कीर्ण हैं।
भरत की जन्मस्थली शोध का विषय
पहले जब हमें ज्ञात था कि देश में केवल यही कोटा का कंसुआ धाम महर्षि कण्व का आश्रम था। तब हम बड़े दावे से कहते थे कि शकुंतला इसी आश्रम में रहती थी और उनकी कोख से भारत के प्रतापी नरेश भरत का जन्म इसी जगह हुआ था। लेकिन अब देश के कुछेक स्थानों से महर्षि कण्व का आश्रम होने के समाचार आने लगे तो हमारे लिए यह शोध का विषय हो गया कि भरत का जन्म किस कण्व आश्रम में हुआ था। शकुंतला का जन्म अजमेर के पुष्कर में महर्षि विश्वामित्र और अप्सरा मेनका के संसर्ग से हुआ था। पुष्कर से वापस लौटते समय मेनका अपनी नवजात पुत्री शकुंतला को पालन पोषण के लिए कण्व ऋषि के आश्रम के समीप छोड़ गई थी।
कोटा पुष्कर के नजदीक होने से हमारा एक ध्यान यह भी जाता है कि शायद इसी स्थान पर शकुंतला रही हो।
पवित्र स्नान का पुण्य और गोठ का मजा था यहां
कंसुआधाम का स्मारक (शिवालय) तो सुरक्षित है लेकिन बाहर का ऐतिहासिक परिसर गंदगी से अटा है। पुराने समय में यह परिसर कोटा क्षेत्र के लोगों के लिए पवित्र स्नान और गोठ का स्थान था। परिसर के बीच में बहुत ही सुंदर चौकोर कुंड बना हुआ है, जिसमें किसी समय स्वच्छ निर्मल जल भरा रहता था। एक झरने के रूप में यह पानी गिरता था। यह झरना इस नदी के ऊपर बनाए गए बंधे से गिरता था। वहां विपुल जलराशि रहती थी जिससे नाला निरंतर भरता रहता था। बाद में इस तीर्थ स्थली के आसपास अनेक कारखाने लगने और बस्ती की गंदगी से इस जलराशि के जल संग्रहण स्थल को पूरी तरह पाट दिया गया। बरसात के पानी को भी लोग गंदगी डालकर दूषित कर देते हैं जो 12 माह इस जगह भरा रहता है। प्राचीन नदी व नाले का उपयोग खुले शौचालय के रूप में किया जा रहा है। विडंबना है कि प्रशासन इस गौरवमयी तीर्थस्थली के रखरखाव व सौंदर्यीकरण का जिम्मा नहीं निभाता। कुंड के आसपास जो गोठ करने, भोजन बनाने के कक्ष थे वे भी भग्न अवस्था में हैं और उनकी मरम्मत पर कोई ध्यान नहीं देता।

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उरुग्वे एक ऐसा देश है, जिसमे औसतन हर एक आदमी के पास चार गायें हैं


उरुग्वे एक ऐसा देश है, जिसमे औसतन हर एक आदमी के पास चार गायें हैं और पुरे विश्व में वो खेती के मामले में नंबर वन है ! सिर्फ 33 लाख लोगों का देश है उरूग्वे और 1 करोड़ 20 लाख गायें हैं !

हर एक गाय के कान पर इलेक्ट्रॉनिक चिप लगा होता है ,जिससे कौन सी गाय कहाँ पर है वो देखते रहते हैं ! एक किसान मशीन के अंदर बैठा फसल कटाई कर रहा है तो दूसरा उसे सक्रीन पर जोड़ता है कि फसल का डाटा क्या है ? इकट्ठा हुए डाटा के जरिए किसान प्रति वर्ग मीटर की
पैदावार का विश्लेषण करेगा !

2005 में 33 लाख लोगों का देश 90 लाख लोगों के लिए अनाज पैदा करता था ! और आज की तारीख में 2 करोड़ 80 लाख लोगों का अनाज पैदा होता है !

उरुग्वे के सफल प्रदर्शन के पीछे देश, किसानों और पशुपालकों का दशकों का अध्ययन शामिल है ! पूरी खेती को देखने के लिए 500 कृषि इंजीनयर लगाए गए हैं और ये लोग ड्रोन और सैटेलाइट से किसानो पर नजर रखते हैं कि खेती का वही तरीका वो अपनाएं जो निर्धारित है ! यानि दूध दही घी मक्खन के साथ आबादी से कई गुना ज्यादा
अनाज उत्पादन ! सब आराम से निर्यात होता है और हर किसान लाखों में खेलता है ! कम से कम एक आदमी की आय 1 लाख 25 हज़ार रूपए महीने है यानि 19000 डॉलर सालाना !!
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मिथक नहीं है पौराणिक कथाओं में वर्णित देवी लक्ष्मी का निवास-स्थान ‘श्री क्षेत्र’


मिथक नहीं है पौराणिक कथाओं में वर्णित देवी लक्ष्मी का निवास-स्थान ‘श्री क्षेत्र’

देवी लक्ष्मी के चरण-चिह्न

रायपुर: छत्तीसगढ़ देश का एक अनूठा राज्य है, जिसके भूगर्भ में न जाने कितने रहस्य और मिथक छिपे पड़े हैं। छत्तीसगढ़ के प्रयागराज के रुप में प्रसिद्ध राजिम क्षेत्र में पुरातत्ववेत्ताओं को खुदाई में देवी लक्ष्मी के चरण चिह्न् मिले हैं।

यह पहला अवसर है कि जब पौराणिक कथाओं में बार-बार ‘श्री क्षेत्र’ के रुप में वर्णित राजिम में पुरातात्विक खुदाई में देवी लक्ष्मी की पूजा के साक्ष्य मिले हैं। पौराणिक कथाओं में उल्लिखित ‘श्री क्षेत्र’ को धन की देवी लक्ष्मी का निवास-स्थान बताया गया है। “श्री” का अर्थ होता है- धन, ऐश्वर्य, संपदा आदि।

राजिम में देवी लक्ष्मी का चरण चिह्न् मिलने से बात की पुष्टि होती है कि राजिम क्षेत्र को पौराणिक कथाओं में ‘श्री क्षेत्र’ कहा जाना बेबुनियाद नहीं है।

छत्तीसगढ़ में पहली बार मिले हैं देवी लक्ष्मी के चरण-चिह्न

पुरातत्वविद् डॉ. अरुण शर्मा के अनुसार, “माता लक्ष्मी के चरण चिह्न् पूरे छत्तीसगढ़ में पहली बार मिले हैं। ये मौर्यकालीन उत्तर मुखी त्रिदेवी मंदिर में लाल पत्थर पर अंकित मिलते हैं। ये चरण चिह्न् दो कमल फूलों पर मिले हैं, जिसमें से एक कमल का फूल सीधा और एक उल्टा है।”

उन्होंने बताया, “उल्टे कमल फूल के ऊपर ये चरणचिन्ह हैं। चरण चिह्न् 60 गुणा 60 सेंटीमीटर के लाल पत्थर पर मिले हैं। इसके ऊपर 15 सेंटीमीटर के व्यास के अंदर ये चिह्न् अंकित हैं।

डॉ. शर्मा का कहना है, “माता लक्ष्मी के चरण चिन्ह मिलने से इस बात की प्रामाणिकता सिद्ध होती है कि पौराणिक कथाओं में राजिम क्षेत्र को श्री क्षेत्र कहा जाता था। वहीं लक्ष्मी देवी की उपासना ढाई हजार साल पूर्व से चली आ रही है।”

इससे पहले प्राप्त हुए हैं मौर्यकालीन उत्तरमुखी मंदिर

उल्लेखनीय है कि इससे पहले राजिम के सीताबाड़ी में एक मंदिर परिसर में बड़े-बड़े पत्थरों को तराशकर बनाए गए तीन गर्भगृहों में विराजित लक्ष्मी, सरस्वती और दुर्गा देवी का उत्तरमुखी मंदिर भी मिल चुका है। माना जा रहा है कि ये मंदिर ढाई हजार साल पुराने हैं यानी यानी मौर्यकालीन हैं।

इन मंदिरों के क्षतिग्रस्त होने की बाबत पुरातत्वशास्त्रियों का मानना है कि ये मंदिर 12वीं शताब्दी में बाढ़ से क्षतिग्रस्त हो गए थे।

भगवान नृसिंह की शांत मुद्रावाली की मूर्ति भी मिली

पुरातत्वविद् डॉ. अरुण शर्मा ने बताया, “माता लक्ष्मी के चरण चिह्न् मिलने के साथ ही राजिम में एक व्यक्ति के यहां शांत मुद्रा वाली नृसिंह की मूर्ति भी मिली है। मूर्ति 10 गुणा 9 गुणा 2.5 सेंटीमीटर की है।”

उन्होंने बताया, “ये मूर्ति छत्तीसगढ़ में अब तक चार स्थानों पर प्राप्त हुई है। इसमें सिरपुर, गिदपुरी, केशकाल तथा अब राजिम शामिल है। मूर्ति काले ग्रेनाइड पत्थर की बनी हुई है।”

उल्लेखनीय है कि अबतक भगवान नृसिंह की हिरण्यकश्यप का वध करती हुई प्रतिमा मिलती आई है। लेकिन नृसिंह भगवान की शांत मुद्रा वाली भारत के किसी स्थान से पहली बार प्राप्त हुए हैं।

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खड़ाऊँ


खड़ाऊँ पुरातन समय में हमारे पूर्वज पैरों में पहना करते थे। यह लकड़ी से बनी होती है। प्राचीन समय से ही भारत में ऋषि-मुनियों द्वारा यह पहनी जाती रही है। खड़ाऊँ जहाँ पहनने में बेहद हल्की होती हैं, वहीं दूसरी ओर यह काफ़ी मजबूत भी होती है।

महत्त्व
पैरों में लकड़ी के खड़ाऊँ पहनने के पीछे भी हमारे पूर्वजों की सोच पूर्णत: वैज्ञानिक थी। गुरुत्वाकर्षण का जो सिद्धांत वैज्ञानिकों ने बाद में प्रतिपादित किया, उसे हमारे ऋषि-मुनियों ने काफ़ी पहले ही समझ लिया था। इस सिद्धांत के अनुसार शरीर में प्रवाहित हो रही विद्युत तरंगे गुरुत्वाकर्षण के कारण पृथ्वी द्वारा अवशोषित कर ली जाती हैं। यदि यह प्रक्रिया निरंतर चलती रहे तो शरीर की जैविक शक्ति समाप्त हो जाती है। इसी जैविक शक्ति को बचाने के लिए हमारे पूर्वजों ने पैरों में खड़ाऊँ पहनने की प्रथा प्रारंभ की, जिससे शरीर की विद्युत तंरगों का पृथ्वी की अवशोषण शक्ति के साथ संपर्क न हो सके। इसी सिद्धांत के आधार पर खड़ाऊँ पहनी जाने लगी।

धार्मिक तथा सामाजिक तथ्य

पुराने समय में चमड़े का जूता कई धार्मिक और सामाजिक कारणों से समाज के एक बड़े वर्ग को मान्य नहीं था और कपड़े के जूते का प्रयोग हर कहीं सफल नहीं हो पाया। जबकि लकड़ी के खड़ाऊँ पहनने से किसी धर्म व समाज के लोगों को आपत्ति नहीं थी। इसीलिए यह अधिक प्रचलन में आई। कालांतर में यही खड़ाऊँ ऋषि-मुनियों के स्वरूप के साथ जुड़ गई और उनकी मुख्य पहचान भी बन गई। किसी भी साधु-संत के लिए यह आवश्यक है कि वह लकड़ी के खड़ाऊँ धारण करे।

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शेखुलरिज्म का भूत झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई को भी ले डूबा था..!!


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Madan Mohan Tiwari with Avinash Kumar Singh and 48 others

शेखुलरिज्म का भूत झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई को भी ले डूबा था..!!

उनकी सेना में बहुत पिण्डारी अफगान पठान थे
गुलाम मोहम्मद उनका प्रमुख था
और इन्हीं पठानों ने उनको धोखा दिया और वे अंग्रेजों से मिल गए

झाँसी की रानी ने अपने डाकिये भेजे ताकि उनको समय रहते सहायता मिल सके
उन डाकियों को भी इन पठानों ने मार डाला

वास्तव में उन पठानों ने शेखूलर रानी लक्ष्मीबाई के साथ मिलकर 1857 का विद्रोह लड़ा पर उन्होंने
अंग्रेजों के विरुद्ध न लड़के.. झाँसी के हिन्दुओं के विरुद्ध उस युद्ध को जिहाद में बदल डाला था

ऐसे ही एक पठान वहीउद्दीन (कुछ लोग उसका नाम बहरउद्दीन भी बताते हैं)
जिसने किले का दरवाजा खोला और झाँसी की रानी को युद्ध के मैदान में पहचान करवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई

चूँकि रानी की सखी मुंदरी मुस्लिम थी पर उसका चेहरा ठीक रानी जैसा ही था
कहते हैं …वही गद्दार वहीउद्दीन या बहरउद्दीन इस शिर्डी साईं का बाप है

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इन्दिरा


वामपंथी बुद्धिजीवी और गुलाम मानसिकता के चैनल इन्दिरा की प्रशंसा में गीत गाते हैं कि वो तो बहुत तगड़ी शासिका थी… ये कर दिया …वो कर दिया ! बड़ी सख्तमिजाज राष्ट्राध्यक्ष थी…आयरन लेडी थी… पाकिस्तान के घुटने टिकवा दिये…बांग्लादेश बनवाया…फलाना कारनामा कर दिया…!

अरे कोई ये क्यों नहीं बता रहा कि इस कथित आयरन लेडी के आयरनपने से देश को आखिर हासिल क्या हुआ ?? अरे, पाकिस्तान के घुटने अगर टिकवाये भी तो उससे देश ने हासिल क्या किया ?? पाकिस्तान की तो उस समय वैसे भी कमर टूटी पड़ी थी, इसलिए अगर बदले में पाक अधिकृत कश्मीर वापिस लेकर अपने बाप की गलती सुधार लेती तो हम भी आज उसकी तारीफ में कसीदे पढ़ते ! लेकिन, इस कथित आयरन लेडी ने कश्मीर वापस लेना तो दूर उल्टा ‘शिमला समझौता’ नामक एक कागज के टुकड़े के बदले में भारतीय फौज द्वारा बँदी बनाए गए 90000 पाकिस्तानी पिल्लों को छोड़ा ही नही बल्कि सकुशल-सुरक्षित उनके घरों तक पहुँचाया ! वहीं पाकिस्तान द्वारा कब्जाए गए जम्मु एवं कशमीर के तीन चौथाई हिस्से को आजाद करवाना तो दूर इसी युद्ध में पाकिस्तान द्वारा बँदी बनाए गए 54 भारतीय सैनिकों को यह आयरन लेडी मुक्त नही करवा पाई और आज भी वो फौजी ISI की कैद में अमानवीय यातनाएँ भुगत रहे हैं तथा कई तो शायद पाकिस्तानी सुअरों की दरिन्दगी सहते-सहते अपना मानसिक सन्तुलन भी खो चुके हैं !

बांग्लादेश बनवाया तो क्या कमाया ? भारत का एक और शत्रु खड़ा कर दिया ! पूर्वी पाकिस्तान (बांग्लादेश) को पाकिस्तान से अलग कर भारत में मिला देती तो हम भी आज उसे सलाम करते ! बांग्लादेश बनने के बाद से वहाँ हिन्दुओं का समूल नाश हुआ, आज उत्तर पूर्व में बान्गलादेश नाम का नया जिहादी राक्षस खड़ा हो गया है जो आसाम, पश्चिम बंगाल समेत पूरे उत्तर पूर्व को लील रहा है ! उपर से पहले ही करोड़ों बान्गलादेशी शरणार्थियों और घुसपैठियो का बोझ है जो देश को खोखला कर रहा है !

मीडिया वालों साथ में ये भी बता देते कि इन्दिरा ने केजीबी से पैसा खाकर देश का कितना नाश किया ! रुसी घूस के बदले भारत में कम्युनिज्म की खरपतवार बोई ! आपातकाल लगाकर लोकतन्त्र का गला घोंटा ! भिन्डरावाले को खड़ा करके पन्जाब को आतन्कवाद की आग में झुलसाया और हिन्दू-सिखों का भाईचारा बिगाड़ा !

इन्दिरा के इन घटिया तोहफो पर कॉंग्रेसी खुश होना चाहें हो लें पर जनता से उम्मीद न करें !!
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विष्णु अरोङा's photo.