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Ducks Quack, Eagles Soar

Good article to share………Ducks Quack, Eagles Soar

I was waiting in line for a ride at the airport. When a cab pulled up, the first thing I noticed was that the taxi was polished to a bright shine. Smartly dressed in a white shirt, black tie, and freshly pressed black slacks, the cab driver jumped out and rounded the car to open the back passenger door for me.

He handed me a laminated card and said: ‘I’m Wasu, your driver. While I’m loading your bags in the trunk I’d like you to read my mission statement.’

Taken aback, I read the card. It said: Wasu’s Mission Statement:
To get my customers to their destination in the quickest, safest and cheapest way possible in a friendly environment.

This blew me away. Especially when I noticed that the inside of the cab matched the outside. Spotlessly clean!

As he slid behind the wheel, Wasu said, ‘Would you like a cup of coffee? I have a thermos of regular and one of decaf.’

I said jokingly, ‘No, I’d prefer a soft drink.’

Wasu smiled and said, ‘No problem. I have a cooler up front with regular and Diet Coke, lassi, water and orange juice.’

Almost stuttering, I said, ‘I’ll take a Lassi.’

Handing me my drink, Wasu said, ‘If you’d like something to read, I have The Hindu, Times  of India, ET and India Today.’

As they were pulling away, Wasu handed me another laminated card, ‘These are the stations I get and the music they play, if you’d like to listen to the radio.’

And as if that weren’t enough, Wasu told me that he had the air conditioning on and asked if the temperature was comfortable for him.

Then he advised me of the best route to my destination for that time of day. He also let me know that he’d be happy to chat and tell me about some of the sights or, if I preferred, to leave me with my own thoughts.

‘Tell me, Wasu,’ I was amazed and asked him, ‘have you always served customers like this?’

Wasu smiled into the rear view mirror. ‘No, not always. In fact, it’s only been in the last two years. My first five years driving, I  spent most of my time complaining like all the rest of the cabbies do. Then I heard about power of choice one day.’

‘Power of choice is that you can be a duck or an eagle.’

‘If you get up in the morning expecting to have a bad day, you’ll rarely disappoint yourself. Stop complaining!’

‘Don’t be a duck. Be an eagle. Ducks quack and complain. Eagles soar above the crowd.’

‘That hit me right,’ said Wasu.

‘It is about me. I was always quacking and complaining, so I decided to change my attitude and become an eagle. I looked around at the other cabs and their drivers. The cabs were dirty, the drivers were
unfriendly, and the customers were unhappy. So I decided to make some changes. I put in a few at a time. When my customers responded well, I did more.’

‘I take it that has paid off for you,’ I said.

‘It sure has,’ Wasu replied. ‘My first year as an eagle, I doubled my income from the previous year. This year I’ll probably quadruple it. My customers call me for appointments on my cell phone or leave a message on it.’

Wasu made a different choice. He decided to stop quacking like ducks and start soaring like eagles.

Have an eagle week… And next…And….
A great Thought..

“You don’t die if you fall in water, you die only if you don’t swim.

Thats the real meaning of life .
GOOD DAY Eagles..👍

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रास्ते का पत्थर : The stone on the Road

रास्ते का पत्थर : The stone on the Road

रास्ते का पत्थर : The stone on the Road

Looking over Boulder

बात बहुत पुरानी है, एक राजा ने मुख्य मार्ग पर बीचों-बीच एक बड़ा पत्थर रखवा दिया। वह एक पेड़ के पीछे छुपकर यह देखने लगा कि कोई उस पत्थर को हटाता है या नहीं। कई राजदरबारी और व्यापारी वहां से गुज़रे और उनमें से कई ने ऊंचे स्वर में राजा की इस बात के लिए निंदा की कि राज्य की सड़क व्यवस्था ठीक नहीं थी, लेकिन किसी ने भी उस पत्थर को स्वयं हटाने का कोई प्रयास नहीं किया।

फ़िर वहां से एक किसान गुज़रा जिसकी पीठ पर अनाज का बोरा लदा हुआ था। पत्थर के पास पहुँचने पर उसने अपना बोझा एक ओर रख दिया और पत्थर को हटाने का प्रयास करने लगा। बहुत कठोर परिश्रम करने के बाद वह उसे हटाने में सफल हो गया।

जब किसान ने अपना बोरा उठाया तो उसे उस जगह पर एक बटुआ रखा दिखा जहाँ पहले पत्थर रखा हुआ था। बटुए में सोने के सिक्के थे और राजा का लिखा हुआ एक पत्र था। पत्र में लिखा था कि सोने के सिक्के पत्थर हटानेवाले के लिए उपहारस्वरूप थे।

उस किसान ने इससे वह सबक सीखा जो हममें से बहुत कम ही समझ पते हैं – “हमारे मार्ग में आनेवाली हर बाधा हमें उन्नति करने का अवसर प्रदान करती है”।

(Winning over obstacles – a motivational / inspirational story in Hindi)

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ध्यान दो

ध्यान दो


आजकल चीज़ों पर ध्यान दे पाना मुश्किल होता जा रहा है. बातें याद रखने के जितने जतन सुलभ है उन्हें भूलने के तरीके उनसे भी ज्यादा हो चले हैं. हमारे सामने अनगिनत विकल्प हैं, अनेक मार्ग हैं. इस पोस्ट को लिखते समय भी मैं किसी एक बिंदु पर फोकस नहीं कर पा रहा हूँ. मेरे सामने एक विषय है जिसपर कुछ लिखने के लिए मैंने सोचा है पर मन में कुछ और ही चल रहा है इसलिए मैंने अपनी बात की शुरुआत इस ज़ेन कहानी से करता हूँ:

एक छात्र ने ज़ेन गुरु इचू से कहा, “कृपया मेरे लिए ज्ञान की कोई बात लिख दें.”
गुरु इचू ने ब्रश उठाया और छात्र की तख्ती पर लिखा, “ध्यान दो”.
छात्र ने कहा, “बस इतना ही?”
गुरु इचू ने फिर से लिखा, “ध्यान दो. ध्यान दो”.
छात्र चिढ गया और बोला, “इसमें तो मुझे ज्ञान की कोई गहरी शिक्षा नहीं दिख रही”.
गुरु इचू ने इसपर पुनः लिखा, “ध्यान दो. ध्यान दो. ध्यान दो”.
छात्र झुंझलाकर बोल उठा, “आखिर इस ‘ध्यान दो’ का अर्थ क्या है?”
गुरु इचू ने कहा, “ध्यान देने का अर्थ है ध्यान देना”.

रचनात्मकता पर मैं पहले कुछ पोस्टें लिख चुका हूँ. इस बार मैंने लिखने के लिए जो बिंदु चुना था उसे अंग्रेजी में बहुत से लोग तीन C’s के नाम से जानते हैं. वे हैं, Clarity (स्पष्टता), Centrality (केन्द्रीयता या विषय-बद्धता), और Commitment (संकल्प). और इनके बारे में मैं संक्षेप में इतना ही कहना चाहता हूँ कि हम में से किसी के पास भी असीमित गतिविधियों के लिए असीमित समय नहीं है इसलिए हमें यह स्पष्ट रूप से पता होना चाहिए कि हम किस बारे में लिखने जा रहे हैं; हमें विषय पर केन्द्रित रहना चाहिए; और इसके साथ ही हमें एक संकल्पभाव भी मन में रखना चाहिए कि हम तय समय में अपना काम पूरा कर लेंगे. इस सबके लिए पर्याप्त ध्यान और फोकस की ज़रुरत होती है.

जैसा कि आप भांप गए होंगे, मैंने पोस्ट की शुरुआत ही कुछ ऐसी की थी… मैं सभी को वे सलाह और सुझाव देता रहता हूँ जिनपर अक्सर ही मैं खुद भी बेहतर अमल नहीं कर पाता. इस ब्लॉग की शुरुआत करते समय मेरा मन केवल आध्यात्मिक गूढ़ अर्थों वाली कहानियों में ही रमा रहता था जो धीरे-धीरे भटकता गया (यह भी ठीक ही हुआ) जिसका परिणाम यह है कि इस ब्लॉग में इतनी तरह की सामग्री का समावेश हो गया है कि यह अपनी तरह का एकमात्र हिंदी ब्लॉग बनकर उभर रहा है. लेकिन इसके बावजूद मैं यह जानता हूँ कि मैंने अपना ध्यान कई बार भटकाया है और मुझे बारंबार फोकस करने की ज़रुरत महसूस हुई है. किसी रचनात्मक काम की शुरुआत में पहले मन में विविध विचारों का आना अच्छी बात है लेकिन किसी फलदायी अंत तक पहुँचने के लिए हमें कुछ सूत्रों को पकड़कर ही काम करना पड़ता है.

मैं ऐसा ब्लॉग बनाना चाहता हूँ जिसमें हर आयु और रूचि रखनेवाले व्यक्ति के लिए प्रेरक और काम की बातों का खजाना हो. लेकिन अब मुझे यह लगता है कि यह बहुत ही श्रमसाध्य काम है और इसके लिए बहुत समय चाहिए. आपाधापी में रहने से कार्य की गुणवत्ता प्रभावित होती है.

यदि हम यह सोच लें कि अगले कुछ समय तक जैसे एक महीने तक हम रचनात्मकता पर लिखेंगे, उसके बाद एक महीने ब्लौगिंग पर, फिर एक महीने नैतिकता पर तो इससे खुद पर लिखने का दबाव बढ़ जाता है. फिर कुछ समय बाद यह लगने लगता है कि हम केवल ब्लॉग में एक पोस्ट अटकाने लिखने के लिए ही लिख रहे हैं. यदि लेखन में मौलिकता कम हो तो जल्द ही ट्यूब खाली होने का खटका होने लगता है.

जीवन के छत्तीस साल… एक तरह से कहें तो यह आधा जीवन ही तो है. इतना समय बीत जाने पर अब प्रौढ़ावस्था और उसकी मुश्किलें सामने मुंह बाए खड़ी हैं. तकरीबन रोजाना ही कुछ न कुछ ऐसा होता रहता है जो ज़िंदगी को बोझिल और बेमजा करता रहता है. विवाह, बच्चे, नौकरी, उलझनें, पारिवारिक, आर्थिक, तथा व्यक्तिगत समस्याएँ – और इनके साथ ही खुद को हर दुनियावी कुटिलता और दुश्वारियों से बचने की जद्दोजहद से मेरे जैसे अनगिनत मनुष्य सर्वथा दो-चार होते रहते हैं. इस सबके बीच मेरे भीतर से यह चाह उठती रहती है कि इस ब्लॉग के माध्यम से मुझमें और सभी में शुभ संस्कारों और सरलता के बीज पड़ें, सबका जीवन ज़ेनमय बने.

इसी को ध्यान में रखकर मैं ब्लॉग पर प्रकाशित होनेवाली सामग्री को लेकर कुछ परिवर्तन करने जा रहा हूँ. संभव है कि मैं इसमें लिखने के लिए किसी सह-लेखक या अतिथि-लेखक को भी शामिल करूं. सामग्री में होने वाले परिवर्तन में पहली बात यह होगी कि इसमें ओशो द्वारा उनके प्रवचनों में कही गयी अनगिनत बोधकथाओं और संस्मरणों को सम्मिलित किया जाएगा. ओशो की बोधकथाओं को शामिल करने की मांग पहले कुछ पाठकों ने की है और अब उनकी इच्छा पूर्ण हो जायेगी. ओशो के अनुज ओशो शैलेन्द्र के मार्गदर्शन में चयनित बोधकथाएं नियमित अंतराल पर पोस्ट की जायेंगीं.

कृपया पथ के साथी बने रहें.

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100 वें बंदर की क्रांति

100 वें बंदर की क्रांति

100 वें बंदर की क्रांति


प्रकृतिविज्ञानियों ने जापान के प्रसिद्द और खूबसूरत मकाक बंदरों का उनके प्राकृतिक परिवेश में 30 सालों तक अध्ययन किया.

1952 में जापान के कोशिमा द्वीप पर प्रकृतिविज्ञानियों ने बंदरों को खाने के लिए शकरकंद दिए जो रेत में गिर जाते थे. बंदरों को शकरकंद का स्वाद भा गया लेकिन रेत के कारण उनके मुंह में किरकिरी हो जाती थी.

18 माह की इमो नामक एक मादा बन्दर ने इस समस्या का हल शकरकंद को समीप बहती स्वच्छ जलधारा में धोकर निकाल लिया. उसने यह तरकीब अपनी माँ को भी सिखा दी. देखते-ही-देखते बहुत सारे बच्चे और उनकी माएँ पानी में धोकर शकरकंद खाने लगे.

प्रकृतिविज्ञानियों के सामने ही बहुत सारे बंदरों ने इस नायब तरीके को अपना लिया. 1952 से 1958 के दौरान सभी वयस्क बन्दर शकाराकंदों को पानी में धोकर खाने लायक बनाना सीख गए. केवल वे वयस्क बन्दर ही इसे सीख पाए जिन्होंने अपने बच्चों को ऐसा करते देखा था. वे बन्दर जिनकी कोई संतान नहीं थीं, वे पहले की भांति गंदे शकरकंद खाते रहे.

तभी एक अनूठी घटना हुई. 1958 के वसंत में कोशिमा द्वीप के बहुत सारे बंदर शकरकंदों को धोकर खा रहे थे – उनकी निश्चित संख्या का पता नहीं है. मान लें कि एक सुबह वहां 99 बंदर थे जिन्हें पानी में धोकर खाना आ गया था. अब यह भी मान लें कि अगली सुबह 100 वें बंदर ने भी पानी में धोकर शकरकंद खाना सीख लिया.

इसके बाद तो चमत्कार हो गया!

उस शाम तक द्वीप के सभी बंदर पानी में धोकर फल खाने लगे. उस 100 वें बन्दर द्वारा उठाये गए कदम ने एक वैचारिक क्रांति को जन्म दे दिया था.

यह चमत्कार यहीं पर नहीं रुका बल्कि समुद्र को लांघकर दूसरे द्वीपों तक जा पहुंचा! ताकासकियामा द्वीप के सारे बंदर भी अपने फल को पानी में धोकर खाते देखे गए. और भी द्वीपों पर मौजूद बंदर अपने फल धोकर खा रहे थे.

इससे यह निष्कर्ष निकाला गया कि जब किसी समूह में निश्चित संख्या में सदस्यों में जागरूकता आ जाती है तो वह जागरूकता चेतना के रहस्यमयी मानसिक स्तर पर फ़ैल जाती है. सही-सही संख्या का अनुमान लगाना संभव नहीं है लेकिन 100 वें बन्दर की क्रान्ति यह बताती है कि जब सुनिश्चित संख्या में यह जागरूकता उत्पन्न हो जाती है तो वह चेतना में घर कर लेती है.

ऐसे में यदि केवल एक अतिरिक्त जीव में इस जागरूकता का प्रसार हो जाये तो वह चेतना एकाएक विराट समुदाय में फ़ैल जाती है.

क्या मनुष्यों के विषय में भी ऐसा कहा जा सकता है?

(The revolution of 100th monkey – in Hindi)

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मूर्ख बंदर और चंद्रमा

मूर्ख बंदर और चंद्रमा

100 वें बंदर की क्रांति

एक रात एक छोटा बंदर कुँए पर पानी पीने के लिए गया. जब उसने कुँए में झाँककर देखा तो उसे पानी में चंद्रमा झिलमिलाता हुआ दिखाई दिया. यह देखकर वह बहुत डर गया और दूसरे बंदरों को यह बात बताने के लिए दौड़ा.

“दोस्तों!” – वह चिल्लाया – “चंद्रमा पानी में गिर गया है!”

“कहाँ! किस जगह!” – दूसरे बंदरों ने पूछा.

“मेरे साथ आओ! मैं तुम्हें दिखलाऊँगा!” – छोटे बंदर ने कहा.

छोटा बंदर उन्हें कुँए तक ले गया. वे सभी झुंड बनाकर कुँए में झाँकने लगे.

“अरे हाँ! चंद्रमा तो पानी में गिर गया है!” – वे चिल्लाये – “हमारा सुंदर चंद्रमा कुँए में गिर गया! अब रात में अँधेरा हो जायेगा और हमें डर लगेगा! अब हम क्या करें!?”

“मेरी बात सुनो” – एक बूढ़े बंदर ने कहा – “हम सिर्फ एक ही काम कर सकते हैं, हमें चंद्रमा को कुँए से निकालने की कोशिश करनी चाहिए”.

“हाँ! हाँ! ज़रूर!” – सभी उत्साह से बोले – “हमें बताओ कि ऐसा कैसे करें”.

“वो देखो कुँए के ऊपर पेड़ की एक डाली लटक रही है. हम सभी उससे लटक जायेंगे और चुटकियों में चंद्रमा को कुँए से निकाल लेंगे”.

“बहुत अच्छा तरीका है” – सब चिल्लाये – “चलो, डाली से लटकें”.

देखते ही देखते बहुत सारे बंदर उस पतली सी डाली से लटक गए और कुँए के भीतर झूलने लगे. उनमें से एक बंदर कुँए के भीतर पानी में हाथ डालकर चंद्रमा को निकालनेवाला ही था कि ऊपर पेड़ पर डाली चटक गई. सभी मूर्ख बन्दर कुँए में गिरकर पानी में डूब गए. चंद्रमा आकाश में स्थिर चमकता रहा.

(कहानी और चित्र यहाँ से लिए गए हैं)

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दो बंदरों की कहानी

दो बंदरों की कहानी

दो बंदरों की कहानी

कल मैंने आपको कुछ बंदरों की कहानी पढ़वाई थी जो कुँए में दिख रहे चंद्रमा को वास्तविक चंद्रमा समझकर उसे निकालने का प्रयास करते हैं लेकिन पेड़ की डाली टूट जाने के कारण बेचारे कुँए में गिरकर मर जाते हैं. कहानी का शीर्षक था ‘मूर्ख बंदर और चंद्रमा’. कहानी का ऐसा शीर्षक निष्प्रयोजन ही दिया गया था. वस्तुतः किसी भी जीव को मूर्ख नहीं कहना चाहिए. जिन जीवों जैसे गधा आदि को हम बहुधा मूर्ख कहते हैं वे मानव जाति के बहुत काम आते हैं और हर प्रकार के कष्टों को सहकर भी मानवों के लिए अति उपयोगी सिद्ध होते हैं!

बच्चों की कहानियों में आमतौर पर विभिन्न जंतुओं के लिए ‘चालाक लोमडी’, ‘धूर्त सियार’, ‘कपटी मगरमच्छ’ जैसी उपमाओं का प्रयोग किया जाता है लेकिन इसका उद्देश्य केवल कहानी को बच्चों (और बड़ों) के लिए रोचक और बोधगम्य बनाना होता है, किसी जन्तुविशेष को अन्य जंतुओं से हीन दिखाना या उसका अपमान करना नहीं.

इस ब्लौग में समय-समय पर अलग-अलग प्रकार की कथाओं के दौर चलते रहते हैं. प्रारंभ में इसमें ज़ेन, ताओ, सूफी कथाएँ प्रकाशित की गईं, फिर प्रेरक प्रसंग, संस्मरण, लेख आदि पोस्ट किये गए. आजकल मैं अपरिचित सी बाल-कथाओं का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ. इन्हें बड़े तथा बच्चे सभी पढ़कर आनंद उठा सकते हैं और इनसे शिक्षा भी ग्रहण कर सकते हैं.

प्रस्तुत है ‘दो बंदरों की कथा’

two monkeysदो बंदर एक दिन घूमते-घूमते एक गाँव के समीप पहुँच गए और उन्होंने वहां सुन्दर व मीठे प्रतीत होने वाले फलों से लदा हुआ एक पेड़ देखा.

“इस पेड़ को देखो!” – एक बंदर ने दूसरे से चिल्लाकर कहा – “ये फल कितने सुंदर दिख रहे हैं. ये अवश्य ही बहुत स्वादिष्ट होंगे! चलो हम दोनों पेड़ पर चढ़कर फल खाएं”.

दूसरा बंदर बुद्धिमान था. उसने कुछ सोचकर कहा – “नहीं, नहीं. एक पल के लिए सोचो. यह पेड़ गाँव के इतने समीप लगा है और इसके फल इतने सुंदर और पके हुए हैं, लेकिन यदि ये अच्छे फल होते तो गाँव वाले इन्हें ऐसे ही क्यों लगे रहने देते? लोगों ने इन्हें अवश्य ही तोड़ लिया होता! लेकिन ऐसा लगता है कि किसी ने भी इन फलों को हाथ भी नहीं लगाया है. इन्हें मत खाओ. मुझे विश्वास है कि ये फल खाने लायक नहीं हैं”.

“कैसी बेकार की बातें कर रहे हो!” – पहले बंदर ने कहा – “मुझे तो इन फलों में कुछ बुरा नहीं दिख रहा. मैं तो फल खाने के लिए पेड़ पर चढूंगा”.

“जैसी तुम्हारी इच्छा” – बुद्धिमान बन्दर ने कहा – “मैं खाने के लिए कुछ और ढूंढता हूँ”.

पहला बंदर पेड़ पर चढ़कर फल खाने लगा और उसने जी भर के फल खाए. लेकिन वे फल उसका अंतिम भोजन बन गए क्योंकि फल स्वादिष्ट तो थे परन्तु जहरीले थे. दूसरा बंदर जब कहीं और से खा-पी कर आया तो उसने पेड़ के नीचे अपने मित्र को मरा हुआ पाया. उसे यह देखकर बहुत दुःख हुआ लेकिन वह तो पहले ही अपने मित्र को सावधान कर चुका था.

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मूर्ख युवक का संकल्प

मूर्ख युवक का संकल्प

मूर्ख युवक का संकल्प

Kalidasaमालव राज्य की राजकुमारी विद्योत्तमा अत्यंत बुद्धिमान और रूपवती थी. उसने यह प्रण लिया था कि वह उसी युवक से विवाह करेगी जो उसे शास्त्रार्थ में हरा देगा.

विद्योत्तमा से विवाह की इच्छा अपने मन में लिए अनेक विद्वान् दूर-दूर से आये लेकिन कोई भी उसे शास्त्रार्थ में हरा न सका. उनमें से कुछ ने अपमान और ग्लानि के वशीभूत होकर राजकुमारी से बदला लेने के लिए एक चाल चली. उन्होंने एक मूर्ख युवक की खोज प्रारंभ की. एक जंगल में उन्होंने एक युवक को देखा जो उसी डाल को काट रहा था जिसपर वह बैठा हुआ था.

विद्वानों को अपनी हार का बदला लेने के लिए आदर्श युवक मिल गया. उन्होंने उससे कहा – “यदि तुम मौन रह सकोगे तो तुम्हारा विवाह एक राजकुमारी से हो जायेगा”.

उन्होंने युवक को सुन्दर वस्त्र पहनाये और उसे शास्त्रार्थ के लिए विद्योत्तमा के पास ले गए. विद्योत्तमा से कहा गया कि युवक मौन साधना में रत होने के कारण संकेतों में शास्त्रार्थ करेगा.

विद्वानों ने युवक के मूर्खतापूर्ण सकेतों की ऐसी व्याख्या की कि विद्योत्तमा को अंततः अपनी हार माननी पड़ी और उसने युवक से विवाह कर लिया.

कुछ दिनों तक युवक मौन साधना का ढोंग करता रहा लेकिन एक दिन वह ऊँट को देखकर गलत उच्चारण कर बैठा. विद्योत्तमा को सच्चाई का पता चल गया कि उसका पति जड़बुद्धि है.

क्रोधित विद्योत्तमा ने अपने पति को प्रताड़ित और अपमानित करके महल से निकाल दिया. युवक ने संकल्प लिया कि वह उच्च कोटि का विद्वान बनकर ही महल में लौटेगा.

अपने संकल्प के अनुसार युवक ने विद्यारम्भ कर दिया और कठोर अध्ययन एवं परिश्रम के उपरांत महान विद्वान बना. कालांतर में यही युवक महाकवि कालीदास के नाम से प्रख्यात हुआ.

(A motivational / inspiring story of Mahakavi Kalidasa – in Hindi)

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Yaksha Prashna – यक्ष प्रश्न

Yaksha Prashna – यक्ष प्रश्न

Yaksha Prashna – यक्ष प्रश्न

पांडवों के वनवास के बारह वर्ष समाप्त होनेवाले थे. इसके बाद एक वर्ष के अज्ञातवास की चिंता युधिष्ठिर को सता रही थी. इसी चिंता में मग्न एक दिन युधिष्ठिर भाइयों और कृष्ण के साथ विचार विमर्श कर रहे थे कि उनके सामने एक रोता हुआ ब्राम्हण आ खड़ा हुआ. रोने का कारण पूछने पर उसने बताया – “मेरी झोपडी के बाहर अरणी की लकड़ी टंगी हुई थी. एक हिरण आया और वह इस लकड़ी से अपना शरीर खुजलाने लगा और चल पड़ा. अरणी की लकड़ी उसके सींग में ही अटक गई. इससे हिरण घबरा गया और बड़ी तेजी से भाग खड़ा हुआ. अब मैं अग्नि होत्र के लिए अग्नि कैसे उत्पन्न करूंगा?” (अरणी ऐसी लकड़ी है जिसे दूसरी अरणी से रगड़कर आग पैदा की जाती है).

pondउस ब्राम्हण पर तरस खाकर पाँचों भाई हिरण की खोज में निकल पड़े. हिरण उनके आगे से तेजी से दौड़ता हुआ बहुत दूर निकल गया और आँखों से ओझल हो गया. पाँचों पांडव थके हुए प्यास से व्याकुल होकर एक बरगद की छाँव में बैठ गए. वे सभी इस बात से लज्जित थे कि शक्तिशाली और शूरवीर होते हुए भी ब्राम्हण का छोटा सा काम भी नहीं कर सके. प्यास के मारे उन सभी का कंठ सूख रहा था. नकुल सभी के लिए पानी की खोज में निकल पड़े. कुछ दूर जाने पर उन्हें एक सरोवर मिला जिसमें स्वच्छ पानी भरा हुआ था. नकुल पानी पीने के लिए जैसे ही सरोवर में उतरे, एक आवाज़ आई – “माद्री के पुत्र, दुस्साहस नहीं करो. यह जलाशय मेरे आधीन है. पहले मेरे प्रश्नों के उत्तर दो, फिर पानी पियो”.

नकुल चौंक उठे, पर उन्हें इतनी तेज प्यास लग रही थी कि उन्होंने चेतावनी अनसुनी कर दी और पानी पी लिया. पानी पीते ही वे प्राणहीन होकर गिर पड़े.

बड़ी देर तक नकुल के नहीं लौटने पर युधिष्ठिर चिंतित हुए और उन्होंने सहदेव को भेजा. सहदेव के साथ भी वही घटना घटी जो नकुल के साथ घटी थी.

सहदेव के न लौटने पर अर्जुन उस सरोवर के पास गए. दोनों भाइयों को मृत पड़े देखकर उनकी मृत्यु का कारण सोचते हुए अर्जुन को भी उसी प्रकार की वाणी सुनाई दी जैसी नकुल और सहदेव ने सुनी थी. अर्जुन कुपित होकर शब्दभेदी बाण चलने लगे पर उसका कोई फल नहीं निकला. अर्जुन ने भी क्रोध में आकर पानी पी लिया और वे भी किनारे पर आते-आते मूर्छित होकर गिर गए.

अर्जुन की बाट जोहते-जोहते युधिष्ठिर व्याकुल हो उठे. उन्होंने भाइयों की खोज के लिए भीम को भेजा. भीमसेन तेजी से जलाशय की ओर बढ़े. वहां उन्होंने अपने तीन भाइयों को मृत पाया. उन्होंने सोचा कि यह अवश्य किसी राक्षस के करतूत है पर कुछ करने से पहले उन्होंने पानी पीना चाहा. यह सोचकर भीम ज्यों ही सरोवर में उतरे उन्हें भी वही आवाज़ सुनाई दी. – “मुझे रोकनेवाला तू कौन है!?” – यह कहकर भीम ने पानी पी लिया. पानी पीते ही वे भी वहीं ढेर हो गए.

चारों भाइयों के नहीं लौटने पर युधिष्ठिर चिंतित हो उठे और उन्हें खोजते हुए जलाशय की ओर जाने लगे. निर्जन वन से गुज़रते हुए युधिष्ठिर उसी विषैले सरोवर के पास पहुँच गए जिसका जल पीकर उनके चारों भाई प्राण खो बैठे थे. उनकी मृत्यु का कारण खोजते हुए युधिष्ठिर भे पानी पीने के लिए सरोवर में उतरे और उन्हें भी वही आवाज़ सुनाई दी – “सावधान! तुम्हारे भाइयों ने मेरी बात न मानकर तालाब का जल पी लिया. यह तालाब मेरे आधीन है. मेरे प्रश्नों का सही उत्तर देने पर ही तुम इस तालाब का जल पी सकते हो!”

युधिष्ठिर जान गए कि यह कोई यक्ष बोल रहा था. उन्होंने कहा – “आप प्रश्न करें, मैं उत्तर देने का प्रयास करूंगा!”

यक्ष ने प्रश्न किया – मनुष्य का साथ कौन देता है?
युधिष्ठिर ने कहा – धैर्य ही मनुष्य का साथ देता है.

यक्ष – यशलाभ का एकमात्र उपाय क्या है?
युधिष्ठिर – दान.

यक्ष – हवा से तेज कौन चलता है?
युधिष्ठिर – मन.

यक्ष – विदेश जानेवाले का साथी कौन होता है?
युधिष्ठिर – विद्या.

यक्ष – किसे त्याग कर मनुष्य प्रिय हो जाता है?
युधिष्ठिर – अहम् भाव से उत्पन्न गर्व के छूट जाने पर.

यक्ष – किस चीज़ के खो जाने पर दुःख नहीं होता?
युधिष्ठिर – क्रोध.

यक्ष – किस चीज़ को गंवाकर मनुष्य धनी बनता है?
युधिष्ठिर – लोभ.

यक्ष – ब्राम्हण होना किस बात पर निर्भर है? जन्म पर, विद्या पर, या शीतल स्वभाव पर?
युधिष्ठिर – शीतल स्वभाव पर.

यक्ष – कौन सा एकमात्र उपाय है जिससे जीवन सुखी हो जाता है?
युधिष्ठिर – अच्छा स्वभाव ही सुखी होने का उपाय है.

यक्ष – सर्वोत्तम लाभ क्या है?
युधिष्ठिर – आरोग्य.

यक्ष – धर्म से बढ़कर संसार में और क्या है?
युधिष्ठिर – दया.

यक्ष – कैसे व्यक्ति के साथ की गयी मित्रता पुरानी नहीं पड़ती?
युधिष्ठिर – सज्जनों के साथ की गयी मित्रता कभी पुरानी नहीं पड़ती.

यक्ष – इस जगत में सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है?
युधिष्ठिर – रोज़ हजारों-लाखों लोग मरते हैं फिर भी सभी को अनंतकाल तक जीते रहने की इच्छा होती है. इससे बड़ा आश्चर्य और क्या हो सकता है?

इसी प्रकार यक्ष ने कई प्रश्न किये और युधिष्ठिर ने उन सभी के ठीक-ठीक उत्तर दिए. अंत में यक्ष ने कहा – “राजन, मैं तुम्हारे मृत भाइयों में से केवल किसी एक को ही जीवित कर सकता हूँ. तुम जिसे भी चाहोगे वह जीवित हो जायेगा”.

युधिष्ठिर ने यह सुनकर एक पल को सोचा, फिर कहा – “नकुल जीवित हो जाये”.

युधिष्ठिर के यह कहते ही यक्ष उनके सामने प्रकट हो गया और बोला – “युधिष्ठिर! दस हज़ार हाथियों के बल वाले भीम को छोड़कर तुमने नकुल को जिलाना क्यों ठीक समझा? भीम नहीं तो तुम अर्जुन को ही जिला लेते जिसके युद्ध कौशल से सदा ही तुम्हारी रक्षा होती आई है!”

युधिष्ठिर ने कहा – “हे देव, मनुष्य की रक्षा न तो भीम से होती है न ही अर्जुन से. धर्म ही मनुष्य की रक्षा करता है और धर्म से विमुख होनेपर मनुष्य का नाश हो जाता है. मेरे पिता की दो पत्नियों में से कुंती माता का पुत्र मैं ही बचा हूँ. मैं चाहता हूँ कि माद्री माता का भी एक पुत्र जीवित रहे.”

“पक्षपात से रहित मेरे प्रिय पुत्र, तुम्हारे चारों भाई जीवित हो उठें!” – यक्ष ने युधिष्ठिर को यह वर दिया. यह यक्ष और कोई नहीं बल्कि स्वयं धर्मदेव थे. उन्होंने ही हिरण का और यक्ष का रूप धारण किया हुआ था. उनकी इच्छा थी कि वे अपने धर्मपरायण पुत्र युधिष्ठिर को देखकर अपनी आँखें तृप्त करें.

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दो भाई साथ साथ खेती करते थे

दो भाई साथ साथ खेती करते थे। मशीनों की भागीदारी और चीजों का व्यवसाय किया करते थे। चालीस साल के साथ के बाद एक छोटी सी ग़लतफहमी की वजह से उनमें पहली बार झगडा हो गया था झगडा दुश्मनी में बदल गया था।

एक सुबह एक बढई बड़े भाई से काम मांगने आया. बड़े भाई ने कहा “हाँ ,मेरे पास तुम्हारे लिए काम हैं। उस तरफ देखो, वो मेरा पडोसी है, यूँ तो वो मेरा भाई है, पिछले हफ्ते तक हमारे खेतों के बीच घास का मैदान हुआ करता था पर मेरा भाई बुलडोजर ले आया और अब हमारे खेतों के बीच ये खाई खोद दी, जरुर उसने मुझे परेशान करने के लिए ये सब किया है अब मुझे उसे मजा चखाना है, तुम खेत के चारों तरफ बाड़ बना दो ताकि मुझे उसकी शक्ल भी ना देखनी पड़े.”

“ठीक हैं”, बढई ने कहा।
बड़े भाई ने बढई को सारा सामान लाकर दे दिया और खुद शहर चला गया, शाम को लौटा तो बढई का काम देखकर भौंचक्का रह गया, बाड़ की जगह वहा एक पुल था जो खाई को एक तरफ से दूसरी तरफ जोड़ता था. इससे पहले की बढई कुछ कहता, उसका छोटा भाई आ गया।

छोटा भाई बोला “तुम कितने दरियादिल हो , मेरे इतने भला बुरा कहने के बाद भी तुमने हमारे बीच ये पुल बनाया, कहते कहते उसकी आँखे भर आईं और दोनों एक दूसरे के गले लग कर रोने लगे. जब दोनों भाई सम्भले तो देखा कि बढई जा रहा है।

रुको! मेरे पास तुम्हारे लिए और भी कई काम हैं, बड़ा भाई बोला। 
मुझे रुकना अच्छा लगता ,पर मुझे ऐसे कई पुल और बनाने हैं, बढई मुस्कुराकर बोला और अपनी राह को चल दिया.

दिल से मुस्कुराने के लिए जीवन में पुल की जरुरत होती हैं खाई की नहीं। छोटी छोटी बातों पर अपनों से न रूठें।

“दीपावली आ रही है घरेलू रिश्तों के साथ साथ सभी दोस्ती के रिश्तों पर जमी धूल भी साफ कर लेना, खुशियाँ चार गुनी हो जाएंगी”

आने वाली दीपावली आप सभी के लिए खुशियाँ ले कर आए।…