Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

शैतान पप्पू!


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शैतान पप्पू!

एक बार एक एक बुज़ुर्ग आदमी ने देखा कि पप्पू घर के दरवाज़े पर लगी घंटी बजाने कि कोशिश कर रहा होता परन्तु उसका हाथ घंटी तक नहीं पहुँच पा रहा होता है, यह देख बुज़ुर्ग आदमी पप्पू के पास गया और उस से पूछा, “क्या हुआ बेटा?”

पप्पू: कुछ नहीं मुझे यह घंटी बजानी है पर मेरा हाथ नहीं पहुँच रहा तो क्या आप मेरे लिए ये घंटी बजा देंगे?

यह सुन बूढ़ा आदमी तुरंत हाँ कर देता है और घंटी बजा देता है, और घंटी बजाने के बाद पप्पू से पूछता है, “और बताओ बेटा क्या मै तुम्हारे लिए कुछ और कर सकता हूँ?”

यह सुन पप्पू बोला, “हाँ अब मेरे साथ भाग बुढ्ढे वरना तू भी पिटेगा अगर मकान का मालिक बाहर आ गया तो।”

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नकली नोट


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नकली नोट

एक आदमी नकली नोट छपता था . एक दिन गलती से उसने पंद्रह रूपये की एक नोट छाप दी.. अब पंद्रह रूपये की नोट आती तो हैं नहीं ..
उसने बहुत सोचा – “शहर में तो सब समझदार लोग होते हैं . अगर ये नोट यहाँ चलाने गया तो मैं पकड़ा जाऊंगा. हाँ अगर किसी दूर दराज़ के गाँव में गया तो शायद ये चल जाए .. “

ये सोच कर वो बहुत दूर बसे एक छोटे से गाँव में गया ..
उसने देखा की लोहार लोहे की धौकनी में काम कर रहा हैं ..

उसने लोहार से कहा – “अरे भाई ! मेरे एक नोट का छुट्टा करा दो .. “
ये कहके उसने पंद्रह रुपये का नोट आगे बढ़ा दिया …
लोहार ने अपना हाँथ पोंछा और नोट को पकड़ कर देखने लगा … साथ ही साथ उसने नोट छापने वाले को भी एक नज़र देखा ..
उस आदमी की तो हलक सुख गयी … उसे लगा “लगता है लोहार ने पकड़ लिया …”
लोहार बोला – “भाई जी ! मेरे पास पंद्रह रूपये शायद ना हो .. मैं चौदह रूपये दे सकता हूँ “
नोट छापने वाले ने सोचा – “अरे चलो मेरा क्या जाता है .. चौदह ही सही”
उसने लोहार से कहा – “अब पंद्रह मिलते तो अच्छा होता .. पर लाईये चौदह ही दें दें ..”

लोहार अन्दर गया और बहार आके उसको पैसे पकड़ा दिए …

उस आदमी ने गिनना चाहा तो देखा – दो सात रूपये के नोट हैं …

बिना कुछ कहे वो वह से चला गया …

Posted in भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas

Secular


कभी आपने सोचा कि…….
१. जिस सम्राट के नाम के साथ

संसार भर के इतिहासकार “महान” शब्द लगाते हैं……

२. जिस सम्राट

का राज चिन्ह अशोक चक्र भारत देश अपने झंडे में लगता है…..

३.जिस सम्राट का राज चिन्ह चारमुखी शेर को भारत देश

राष्ट्रीय प्रतीक मानकर सरकार

चलाती है……

४. जिस देश में सेना का सबसे बड़ा युद्ध

सम्मान सम्राट अशोक के नाम पर अशोक चक्र दिया जाता है…..

५. जिस

सम्राट से पहले या बाद में कभी कोई ऐसा राजा या सम्राट

नहीं हुआ, जिसने अखंड भारत (आज का नेपाल, बांग्लादेश,

पूरा भारत, पाकिस्तान और अफगानिस्तान) जितने बड़े भूभाग पर एक

छत्री राज किया हो……

६. जिस सम्राट के शाशन काल

को विश्व के बुद्धिजीवी और इतिहासकार

भारतीय इतिहासका सबसे स्वर्णिम काल मानते हैं…..

७.जिस सम्राट के शाशन काल में भारत विश्व गुरु था, सोने

की चिड़िया था, जनता खुशहाल और भेदभाव रहित

थी……

८. जिस सम्राट के शाशन काल

जी टी रोड जैसे कई हाईवे रोड बने, पूरे रोड पर

पेड़ लगाये गए, सराये बनायीं गईं इंसान तो इंसान जानवरों के लिए

भी प्रथम बार हॉस्पिटल खोले गए, जानवरों को मारना बंद कर

दिया गया…..

ऐसे महन सम्राट अशोक कि जयंती उनके

अपने देश भारत में

क्यों नहीं मनायी जाती, न किकोई

छुट्टी घोषित कि गई है??

अफ़सोस जिन लोगों को ये

जयंती मनानी चाहिए, वो लोग अपना इतिहास

ही नहीं जानते और जो जानते हैं

वो मानना नहीं चाहते ।

1. जो जीता वही चंद्रगुप्त ना होकर…

जो जीता वही सिकन्दर “कैसे” हो गया… ???

(जबकि ये बात सभी जानते हैं कि…. सिकंदर

की सेना ने चन्द्रगुप्त मौर्य के प्रभाव को देखते

हुये ही लड़ने से मना कर दिया था.. बहुत

ही बुरी तरह मनोबल टूट गया था…. जिस

कारण , सिकंदर ने मित्रता के तौर पर अपने

सेनापति सेल्युकश

कि बेटी की शादी चन्द्रगुप्त से की थी)

2. महाराणा प्रताप “”महान””” ना होकर………

अकबर “””महान””” कैसे हो गया…???

जबकि, अकबर अपने हरम में

हजारों लड़कियों को रखैल के तौर पर

रखता था…. यहाँ तक कि उसने

अपनी बेटियो और बहनोँ की शादी तक पर

प्रतिबँध लगा दिया था जबकि..

महाराणा प्रताप ने अकेले दम पर उस अकबर के

लाखों की सेना को घुटनों पर

ला दिया था)

3. सवाई जय सिंह को “””महान वास्तुप्रिय”””

राजा ना कहकर शाहजहाँ को यह

उपाधि किस आधार मिली …… ???

जबकि… साक्ष्य बताते हैं कि…. जयपुर के

हवा महल से लेकर तेजोमहालय{ताजमहल}तक ….

महाराजा जय सिंह ने ही बनवाया था)

4. जो स्थान महान मराठा क्षत्रिय वीर

शिवाजी को मिलना चाहिये वो………. क्रूर

और आतंकी औरंगजेब को क्यों और कैसे मिल

गया ..????

5. ऋषि दयानंद और आचार्य चाणक्य

की जगह… ….. गांधी को महात्मा बोलकर ….

हिंदुस्तान पर क्यों थोप दिया गया…??????

6. तेजोमहालय- ताजमहल……… ..लालकोट-

लाल किला……….. फतेहपुर सीकरी का देव

महल- बुलन्द दरवाजा…….. एवं सुप्रसिद्ध

गणितज्ञ वराह मिहिर की

मिहिरावली(महरौली) स्थित वेधशाला-

कुतुबमीनार….. ……… क्यों और कैसे

हो गया….?????

7. यहाँ तक कि….. राष्ट्रीय गान भी…..

संस्कृत के वन्दे मातरम की जगह

गुलामी का प्रतीक””जन-गण-मन हो गया””

कैसे और क्यों हो गया….??????

8. और तो और…. हमारे अराध्य भगवान् राम..

कृष्ण तो इतिहास से कहाँ और कब गायब

हो गये……… पता ही नहीं चला……….आखिर

कैसे ????

9. यहाँ तक कि…. हमारे अराध्य भगवान राम

की जन्मभूमि पावन अयोध्या …. भी कब और

कैसे विवादित बना दी गयी… हमें पता तक

नहीं चला….!

कहने का मतलब ये है कि….. हमारे दुश्मन सिर्फ….

बाबर , गजनवी , लंगड़ा तैमूरलंग…..ही नहीं हैं…… बल्कि आज के

सफेदपोश सेक्यूलर भी हमारे उतने ही बड़े दुश्मन

हैं…. जिन्होंने हम हिन्दुओं के अन्दर हीन

भाबना का उदय कर सेकुलरता का बीज उत्पन्न किया

Posted in यत्र ना्यरस्तुपूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:

!! माता सती अनुसूया पौराणिक कथा !!


ॐ…🙏पतिव्रत धर्म की मूर्ती माता अनुसूया..
माता अनुसूया जी का स्थान पतिव्रता स्त्रियों श्रेणी में सर्वोपरी रहा है।

दक्ष प्रजापति की चौबीस कन्याओं में से एक थी अनुसूया जी जो मन से पवित्र एंव निश्छल प्रेम की परिभाषा थीं।
इन्हें सती साध्वी रूप में तथा एक आदर्श नारी के रूप में जाना जाता है।
अत्यन्त उच्च कुल में जन्म होने पर भी इनके मन में कोई अंह का भाव नहीं था।
इनका संपूर्ण जीवन ही एक आदर्श रहा है।
माता सीता जी भी इनके तेज से बहुत प्रभावित हुई थी तथा उनसे प्राप्त भेंट को सहर्ष स्वीकार करते हुए नमन किया।
अनुसूया जी का विवाह ब्रह्मा जी के मानस पुत्र परम तपस्वी महर्षि अत्रि जी के साथ हुआ था।
अपने सेवा तथा समर्पित प्रेम से इन्होंने अपने पति धर्म का सदैव पालन किया।

!! माता सती अनुसूया पौराणिक कथा !!
माता सती अनसूइया बहुत पतिव्रता थी जिस कारण उनकी ख्याती तीनों लोकों में फैल गई थी।
उनके इस सती धर्म को देखकर देवी माता पार्वती, माता लक्ष्मी जी और देवी माता सरस्वती जी के मन में द्वेष का भाव जागृत हो गया था, जिस कारण उन्होंने माता अनसूइया कि सच्चाई एवं पतीव्रता के धर्म की परिक्षा लेने की ठानी तथा अपने पतियों भगवान शिव, भगवान विष्णु और भगवान ब्रह्मा जी को माता अनसूया के पास परीक्षा लेने के लिए भेजना चाहा।
भगवान शिव, भगवान विष्णु और भगवान ब्रह्मा जी ने देवीयों को समझाने का पूर्ण प्रयास किया किंतु जब देवियां नहीं मानी तो विवश होकर तीनो भगवान शिव, भगवान विष्णु और भगवान ब्रह्मा जी ऋषि के आश्रम पहुँचे।
वहां जाकर भगवान ने सधुओं का वेश धारण कर लिया और आश्रम के द्वार पर भोजन की मांग करने लगे।
जब माता अनसूया उन्हें भोजन देने लगी तो उन्होंने देवी के सामने एक शर्त रखी की वह तीनों तभी यह भोजन स्वीकार करेंगे जब देवी निर्वस्त्र होकर उन्हें भोजन परोसेंगी।
इस पर माता अनसूया चिंता में डूब गई वह ऐसा कैसे कर सकती हैं।
अत: माता अनसूया ने आंखे मूंद कर पति को याद किया इस पर उन्हें दिव्य दृष्टि प्राप्त हुई तथा साधुओं के वेश में उपस्थित भगवान शिव, भगवान विष्णु और भगवान ब्रह्मा जी को उन्होंने पहचान लिया।
तब देवी अनसूया ने कहा की जो वह साधु चाहते हैं वह ज़रूर पूरा होगा किंतु इसके लिए साधुओं को शिशु रूप लेकर उनके पुत्र बनना होगा।
इस बात को सुनकर त्रिदेव शिशु रूप में बदल गए जिसके फलस्वरूप माता अनसूइया ने भगवान शिव, भगवान विष्णु और भगवान ब्रह्मा जी को सत्नपान करवाया।
इस तरह भगवान शिव, भगवान विष्णु और भगवान ब्रह्मा जी माता के पुत्र बन कर रहने लगे।
इस पर अधिक समय बीत जाने के पश्चात भी त्रिदेव अपने लोक नहीं पहुँचे तो माता पार्वती, माता लक्ष्मी और माता सरस्वती जी चिंतित एवं दुखी हो गई…
तीनों देवियों ने माता अनसूइया के समक्ष पहूंचकर क्षमा मांगी एवं अपने पतियों को बाल रूप से मूल रूप में लाने की प्रार्थना की।
माता अनसूया ने त्रिदेवों को उनका रूप प्रदान किया उसके पश्चात तीनों देव अपने असली रूप में प्रकट हो सती अनसूया की परीक्षा से प्रसन्न हो बोलेः- देवी ! वरदान मांगो।”
त्रिदेव की बात सुन अनसूया बोलीः- “प्रभु ! आप तीनों मेरी कोख से जन्म लें ये वरदान चाहिए अन्यथा नहीं।”
तभी से वह मां सती अनसूइया के नाम से प्रसिद्ध हुई तथा भगवान दत्तात्रेय के रूप में त्रिदेव ने सती अनुसुया के गर्भ से जन्म लिया जिनके तीन शीश तथा चार भुजायें थीं तथा इनमें त्रिदेव की शक्तियां समाहित थीं।
!! सती अनसूइया जयंती महत्व !!
माँ अनुसूया के दर्शन पाकर सभी लोग धन्य हो जाते हैं इसकी पवित्रता सभी के मन में समा जाती हैं।
सभी स्त्रियां मां सती अनसूया से पतिव्रता होने का आशिर्वाद पाने की कामना करती हैं।
प्रति वर्ष सती अनसूइया जी जयंती का आयोजन किया जाता है।
इस उत्सव के समय मेलों का भी आयोजन होता है।
रामायण में इनके जीवन के विषय में बताया गया है जिसके अनुसार वनवास काल में जब भगवान राम, सीता और लक्ष्मण जब महर्षि अत्रि के आश्रम में जाते हैं तो अनुसूया जी ने सीता जी को पतिव्रत धर्म की शिक्षा दी थी..
।। जय सती मां अनसूया ।।

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SC और ST


sameer sharma

स्कूल से एक 6th क्लास का बच्चा अपने घर आ कर अपनी माँ से पूछता है – “माँ ये SC और ST क्या हैं ?”
.
माँ: बेटा ये तुम्हे क्यों जानना है ??
.
बच्चा: माँ आज सर हमसे पूछ रहे थे की कौन-कौन SC ST का हैं !!!!!
.
माँ: बेटा उन्होंने ऐसा क्यों पूछा, उन्होंने नहीं बताया क्या ??
.
बच्चा:- बताया, पर सिर्फ इतना कि जो जो SC ST के हैं उन्हें पैसे मिलेंगे…..!
.
पर माँ ये क्या होता हैं??
.
माँ: बेटा हमारे सविधान में 4 कास्ट बनायीं है SC ST Obc और General
तो सरकार उन्हें गरीब और पिछड़े हुए लोगो को मदद करने के लिए सुविधा दी हैं।
.
बच्चा: पर माँ सिर्फ उन्हें ही क्यों मिलती हैं और मेरा दोस्त तो गरीब भी नहीं हैं फिर
भी उसे मिलेगे पैसे ..ये सुविधा गरीब के लिए हैं तो हम भी गरीब है न तो हमको क्यों नहीं मिलेंगे पैसे??
.
माँ: बेटा ये सविधान में लिखा है ।
.
बेटा: पर माँ सविधान के बारे में कहा था की सब को एक जैसा हक़ है तो फिर ये क्यों ??
.
माँ: बेटा ये सब राजनीति का गन्दा खेल हैं उनकी वजह से आज धर्म और जाति के नाम पर लोग एक सामान नही हैं….!
.
बेटा: पर माँ हम क्या हैं जिस से हम को पैसे नहीं मिलेगे ।
.
माँ: बदनसीब।
.
हम लोग बदनसीब है बेटा ।
.
पूरे विश्व में कही पर इस तरह का नियम नहीं है बस हमारे भारत में है ये सुविधा । …सविधान निर्माता ने इसको सिर्फ 10 वर्ष के लिए रखा था पर ये देश के दलालो ने इसको पूर्ण रूप से लागू कर दिया ।
….अगर इन्हें लागू करना ही है तो राजनीति में भी लागू करना चाहिए मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री भी SC और ST का होना चाहिए तब पता चलेगा उन्हें भी ।
.
बेटा: माँ क्या आगे भी मुझे इसी तरह की दिक्कत होगी ???
.
माँ: हाँ बेटा ।
.
आगे तुझे पढ़ाई में,नोकरी में ,प्रमोशन में, हर जगह दिक्कत आएगी …
.
जातिवाद का जहर तुझे मजबूर कर देगा और तू कितना भी सहन कर ले एक दिन तू जरूर बोलेगा की ये कोटा बंद करो ।
.
बेटा: माँ तो क्या हमारी मदद कोई नहीं करेगा काश में भारत छोड़ कही और पैदा हुआ होता ।
.
माँ: बस ये सत्ता के भूखे लोग हमारी गरीबी दूर करने के बजाये वोट पाने की होड़ में हैं ।
.
बेटा: माँ मेरा दोस्त बोलता हैं की पैसे मिलेगे तो पार्टी करेगे. माँ हमें एक रोज
की रोटी बड़ी मुश्किल से मिलती हैं और मेरे दोस्त पार्टी करेगे । माँ में नहीं जाउगा स्कूल कल से ।
.
माँ: नहीं बेटा तुम रोज स्कूल जाओ और पढ़ो ….पढ़ लिख कर शायद तुम इस कोटा को बदल दो…..
.
बेटा : हा माँ में खूब पढूंगा पर हमारे पास इतने पैसे नहीं हैं की आगे पढ़ सकूँ…!!!
.
माँ: तू चिंता न कर मैं काम करुँगी न तेरी पढ़ाई के लिए |
.
इसे इतना शेयर करे कि ये सन्देश हमारे राजनेताओ तक पहुचे और वो सिर्फ गरीबो को कोटा दे न कि विकसित लोगो को |
यदि ये Message आपको बार-बार मिले तो परेशान न होए ।
इसे फिर शेयर कर दें। आपकी एक पहल शायद किसी प्रतिभाशाली व्यक्ति का जीवन सुधार दे….

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

स्वामी विवेकानंदजी


एक अंग्रेज ने स्वामी विवेकानंदजी से पूछा था-सबसे अच्छा दूध किस जानवर का होता है ?
स्वामी विवेकानंदजी :- भैँस का ।
अंग्रेज :- परंतु आप भारतीय तो गाय को हि सर्वश्रेष्ठ मानते है ना ?
स्वामी जी :- आपने ‘दुध’ के बारे मे पुछा है जनाब ‘अमृत’ के बारेमे नहि और दुसरी बात आप ने जानवर के बारे मेँ पूछा था गाय तो हमारी माता हैँ कोई जानवर नही….!
Posted in सुभाषित - Subhasit

कीचड़ में पैर फंस जाये तो


Sujeet Tiwari

कीचड़ में पैर फंस जाये तो
नल के पास जाना चाहिए
मगर………
नल को देखकर
कीचड़ में नही जाना चाहिए,
इसी प्रकार..
जिन्दगी में बुरा समय आ जाये
तो….
पैसों का उपयोग करना चाहिए
मगर……..
पैसों को देखकर
बुरे रास्ते पर नही जाना चाहिए

Posted in रामायण - Ramayan

रामायण की चोपाई के माध्यम से कुछ जीवन के कुछ महत्वपूर्ण मंत्र दिए जा रहे है


Jai shri Ram…

रामायण की चोपाई के माध्यम से कुछ जीवन के कुछ महत्वपूर्ण मंत्र दिए जा रहे है जिनके जाप से सत्-प्रतिशत सफलता मिलती है मेरा आप से अनुरोध है इन मंत्रो का जीवन मे प्रयोग अवश्य करे प्रभु श्री राम आप के जीवन को सुख मय बना देगे !!

रक्षा के लिए
मामभिरक्षक रघुकुल नायक !
घृत वर चाप रुचिर कर सायक !!

विपत्ति दूर करने के लिए
राजिव नयन धरे धनु सायक !
भक्त विपत्ति भंजन सुखदायक !!

सहायता के लिए
मोरे हित हरि सम नहि कोऊ !
एहि अवसर सहाय सोई होऊ !!

सब काम बनाने के लिए
वंदौ बाल रुप सोई रामू !!
सब सिधि सुलभ जपत जोहि नामू !!

वश मे करने के लिए
सुमिर पवन सुत पावन नामू !!
अपने वश कर राखे राम !!

संकट से बचने के लिए
दीन दयालु विरद संभारी !!
हरहु नाथ मम संकट भारी !!

विघ्न विनाश के लिए
सकल विघ्न व्यापहि नहि तेही !!
राम सुकृपा बिलोकहि जेहि !

रोग विनाश के लिए
राम कृपा नाशहि सव रोगा !
जो यहि भाँति बनहि संयोगा !!

ज्वार ताप दूर करने के लिए
दैहिक दैविक भोतिक तापा !
राम राज्य नहि काहुहि व्यापा !!

दुःख नाश के लिए
राम भक्ति मणि उस बस जाके !
दुःख लवलेस न सपनेहु ताके !

खोई चीज पाने के लिए
गई बहोरि गरीब नेवाजू !
सरल सबल साहिब रघुराजू !!

अनुराग बढाने के लिए
सीता राम चरण रत मोरे !
अनुदिन बढे अनुग्रह तोरे !!

घर मे सुख लाने के लिए
जै सकाम नर सुनहि जे गावहि !
सुख सम्पत्ति नाना विधि पावहिं !!

सुधार करने के लिए
मोहि सुधारहि सोई सब भाँती !
जासु कृपा नहि कृपा अघाती !!

विद्या पाने के लिए
गुरू गृह पढन गए रघुराई !
अल्प काल विधा सब आई !!

सरस्वती निवास के लिए
जेहि पर कृपा करहि जन जानी !
कवि उर अजिर नचावहि बानी !

निर्मल बुध्दि के लिए
ताके युग पदं कमल मनाऊँ !!
जासु कृपा निर्मल मति पाऊँ !!

मोह नाश के लिए
होय विवेक मोह भ्रम भागा !
तब रघुनाथ चरण अनुरागा !!

प्रेम बढाने के लिए
सब नर करहिं परस्पर प्रीती !
चलत स्वधर्म कीरत श्रुति रीती !!

प्रीती बढाने के लिए
बैर न कर काह सन कोई !
जासन बैर प्रीति कर सोई !!

सुख प्रप्ति के लिए
अनुजन संयुत भोजन करही !
देखि सकल जननी सुख भरहीं !!

भाई का प्रेम पाने के लिए
सेवाहि सानुकूल सब भाई !
राम चरण रति अति अधिकाई !!

बैर दूर करने के लिए
बैर न कर काहू सन कोई !
राम प्रताप विषमता खोई !!

मेल कराने के लिए
गरल सुधा रिपु करही मिलाई !
गोपद सिंधु अनल सितलाई !!

शत्रु नाश के लिए
जाके सुमिरन ते रिपु नासा !
नाम शत्रुघ्न वेद प्रकाशा !!

रोजगार पाने के लिए
विश्व भरण पोषण करि जोई !
ताकर नाम भरत अस होई !!

इच्छा पूरी करने के लिए
राम सदा सेवक रूचि राखी !
वेद पुराण साधु सुर साखी !!

पाप विनाश के लिए
पापी जाकर नाम सुमिरहीं !
अति अपार भव भवसागर तरहीं !!

अल्प मृत्यु न होने के लिए
अल्प मृत्यु नहि कबजिहूँ पीरा !
सब सुन्दर सब निरूज शरीरा !!

दरिद्रता दूर के लिए
नहि दरिद्र कोऊ दुःखी न दीना !
नहि कोऊ अबुध न लक्षण हीना !!

प्रभु दर्शन पाने के लिए
अतिशय प्रीति देख रघुवीरा !
प्रकटे ह्रदय हरण भव पीरा !!

शोक दूर करने के लिए
नयन बन्त रघुपतहिं बिलोकी !
आए जन्म फल होहिं विशोकी !!

क्षमा माँगने के लिए
अनुचित बहुत कहहूँ अज्ञाता !
क्षमहुँ क्षमा मन्दिर दोऊ भ्राता !!

जयश्रीराम 🙏🙏
जय श्री कृष्ण🙏🙏

Posted in संस्कृत साहित्य

श्राद्ध करते समय ध्यान रखने योग्य 26 बातें


श्राद्ध करते समय ध्यान रखने योग्य 26 बातें

धर्म ग्रंथों के अनुसार श्राद्ध के सोलह दिनों में लोग अपने पितरों को जल देते हैं तथा उनकी मृत्युतिथि पर श्राद्ध करते हैं। ऐसी मान्यता है कि पितरों का ऋण श्राद्ध द्वारा चुकाया जाता है। वर्ष के किसी भी मास तथा तिथि में स्वर्गवासी हुए पितरों के लिए पितृपक्ष की उसी तिथि को श्राद्ध किया जाता है।

पूर्णिमा पर देहांत होने से भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा को श्राद्ध करने का विधान है। इसी दिन से महालय (श्राद्ध) का प्रारंभ भी माना जाता है। श्राद्ध का अर्थ है श्रद्धा से जो कुछ दिया जाए। पितृपक्ष में श्राद्ध करने से पितृगण वर्षभर तक प्रसन्न रहते हैं। धर्म शास्त्रों में कहा गया है कि पितरों का पिण्ड दान करने वाला गृहस्थ दीर्घायु, पुत्र-पौत्रादि, यश, स्वर्ग, पुष्टि, बल, लक्ष्मी, पशु, सुख-साधन तथा धन-धान्य आदि की प्राप्ति करता है।

श्राद्ध में पितरों को आशा रहती है कि हमारे पुत्र-पौत्रादि हमें पिण्ड दान तथा तिलांजलि प्रदान कर संतुष्ट करेंगे। इसी आशा के साथ वे पितृलोक से पृथ्वीलोक पर आते हैं। यही कारण है कि हिंदू धर्म शास्त्रों में प्रत्येक हिंदू गृहस्थ को पितृपक्ष में श्राद्ध अवश्य रूप से करने के लिए कहा गया है।
श्राद्ध से जुड़ी कई ऐसी बातें हैं जो बहुत कम लोग जानते हैं। मगर ये बातें श्राद्ध करने से पूर्व जान लेना बहुत जरूरी है क्योंकि कई बार विधिपूर्वक श्राद्ध न करने से पितृ श्राप भी दे देते हैं। आज हम आपको श्राद्ध से जुड़ी कुछ विशेष बातें बता रहे हैं, जो इस प्रकार हैं- 🍂🍂🍂🍂🍂🍂🍂🍂🍂🍂🍂🍂🍂🍂🍂🍂 1- श्राद्धकर्म में गाय का घी, दूध या दही काम में लेना चाहिए। यह ध्यान रखें कि गाय को बच्चा हुए दस दिन से अधिक हो चुके हैं। दस दिन के अंदर बछड़े को जन्म देने वाली गाय के दूध का उपयोग श्राद्ध कर्म में नहीं करना चाहिए।
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2- श्राद्ध में चांदी के बर्तनों का उपयोग व दान पुण्यदायक तो है ही राक्षसों का नाश करने वाला भी माना गया है। पितरों के लिए चांदी के बर्तन में सिर्फ पानी ही दिए जाए तो वह अक्षय तृप्तिकारक होता है। पितरों के लिए अर्घ्य, पिण्ड और भोजन के बर्तन भी चांदी के हों तो और भी श्रेष्ठ माना जाता है।
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3- श्राद्ध में ब्राह्मण को भोजन करवाते समय परोसने के बर्तन दोनों हाथों से पकड़ कर लाने चाहिए, एक हाथ से लाए अन्न पात्र से परोसा हुआ भोजन राक्षस छीन लेते हैं।
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4- ब्राह्मण को भोजन मौन रहकर एवं व्यंजनों की प्रशंसा किए बगैर करना चाहिए क्योंकि पितर तब तक ही भोजन ग्रहण करते हैं जब तक ब्राह्मण मौन रहकर भोजन करें।
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5- जो पितृ शस्त्र आदि से मारे गए हों उनका श्राद्ध मुख्य तिथि के अतिरिक्त चतुर्दशी को भी करना चाहिए। इससे वे प्रसन्न होते हैं। श्राद्ध गुप्त रूप से करना चाहिए। पिंडदान पर साधारण या नीच मनुष्यों की दृष्टि पहने से वह पितरों को नहीं पहुंचता।
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6- श्राद्ध में ब्राह्मण को भोजन करवाना आवश्यक है, जो व्यक्ति बिना ब्राह्मण के श्राद्ध कर्म करता है, उसके घर में पितर भोजन नहीं करते, श्राप देकर लौट जाते हैं। ब्राह्मण हीन श्राद्ध से मनुष्य महापापी होता है।
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7- श्राद्ध में जौ, कांगनी, मटर और सरसों का उपयोग श्रेष्ठ रहता है। तिल की मात्रा अधिक होने पर श्राद्ध अक्षय हो जाता है। वास्तव में तिल पिशाचों से श्राद्ध की रक्षा करते हैं। कुशा (एक प्रकार की घास) राक्षसों से बचाते हैं।
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8- दूसरे की भूमि पर श्राद्ध नहीं करना चाहिए। वन, पर्वत, पुण्यतीर्थ एवं मंदिर दूसरे की भूमि नहीं माने जाते क्योंकि इन पर किसी का स्वामित्व नहीं माना गया है। अत: इन स्थानों पर श्राद्ध किया जा सकता है।
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9- चाहे मनुष्य देवकार्य में ब्राह्मण का चयन करते समय न सोचे, लेकिन पितृ कार्य में योग्य ब्राह्मण का ही चयन करना चाहिए क्योंकि श्राद्ध में पितरों की तृप्ति ब्राह्मणों द्वारा ही होती है।
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10- जो व्यक्ति किसी कारणवश एक ही नगर में रहनी वाली अपनी बहिन, जमाई और भानजे को श्राद्ध में भोजन नहीं कराता, उसके यहां पितर के साथ ही देवता भी अन्न ग्रहण नहीं करते।
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11- श्राद्ध करते समय यदि कोई भिखारी आ जाए तो उसे आदरपूर्वक भोजन करवाना चाहिए। जो व्यक्ति ऐसे समय में घर आए याचक को भगा देता है उसका श्राद्ध कर्म पूर्ण नहीं माना जाता और उसका फल भी नष्ट हो जाता है।
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12- शुक्लपक्ष में, रात्रि में, युग्म दिनों (एक ही दिन दो तिथियों का योग)में तथा अपने जन्मदिन पर कभी श्राद्ध नहीं करना चाहिए। धर्म ग्रंथों के अनुसार सायंकाल का समय राक्षसों के लिए होता है, यह समय सभी कार्यों के लिए निंदित है। अत: शाम के समय भी श्राद्धकर्म नहीं करना चाहिए।
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13- श्राद्ध में प्रसन्न पितृगण मनुष्यों को पुत्र, धन, विद्या, आयु, आरोग्य, लौकिक सुख, मोक्ष और स्वर्ग प्रदान करते हैं। श्राद्ध के लिए शुक्लपक्ष की अपेक्षा कृष्णपक्ष श्रेष्ठ माना गया है।
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14- रात्रि को राक्षसी समय माना गया है। अत: रात में श्राद्ध कर्म नहीं करना चाहिए। दोनों संध्याओं के समय भी श्राद्धकर्म नहीं करना चाहिए। दिन के आठवें मुहूर्त (कुतपकाल) में पितरों के लिए दिया गया दान अक्षय होता है।
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15- श्राद्ध में ये चीजें होना महत्वपूर्ण हैं- गंगाजल, दूध, शहद, दौहित्र, कुश और तिल। केले के पत्ते पर श्राद्ध भोजन निषेध है। सोने, चांदी, कांसे, तांबे के पात्र उत्तम हैं। इनके अभाव में पत्तल उपयोग की जा सकती है।
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16- तुलसी से पितृगण प्रसन्न होते हैं। ऐसी धार्मिक मान्यता है कि पितृगण गरुड़ पर सवार होकर विष्णु लोक को चले जाते हैं। तुलसी से पिंड की पूजा करने से पितर लोग प्रलयकाल तक संतुष्ट रहते हैं।
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17- रेशमी, कंबल, ऊन, लकड़ी, तृण, पर्ण, कुश आदि के आसन श्रेष्ठ हैं। आसन में लोहा किसी भी रूप में प्रयुक्त नहीं होना चाहिए।
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18- चना, मसूर, उड़द, कुलथी, सत्तू, मूली, काला जीरा, कचनार, खीरा, काला उड़द, काला नमक, लौकी, बड़ी सरसों, काले सरसों की पत्ती और बासी, अपवित्र फल या अन्न श्राद्ध में निषेध हैं।
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19- भविष्य पुराण के अनुसार श्राद्ध 12 प्रकार के होते हैं, जो इस प्रकार हैं- 1- नित्य, 2- नैमित्तिक, 3- काम्य, 4- वृद्धि, 5- सपिण्डन, 6- पार्वण, 7- गोष्ठी, 8- शुद्धर्थ, 9- कर्मांग, 10- दैविक, 11- यात्रार्थ, 12- पुष्टयर्थ
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20- श्राद्ध के प्रमुख अंग इस प्रकार हैं-

तर्पण- इसमें दूध, तिल, कुशा, पुष्प, गंध मिश्रित जल पितरों को तृप्त करने हेतु दिया जाता है। श्राद्ध पक्ष में इसे नित्य करने का विधान है।

भोजन व पिण्ड दान- पितरों के निमित्त ब्राह्मणों को भोजन दिया जाता है। श्राद्ध करते समय चावल या जौ के पिण्ड दान भी किए जाते हैं।

वस्त्रदान- वस्त्र दान देना श्राद्ध का मुख्य लक्ष्य भी है।

दक्षिणा दान- यज्ञ की पत्नी दक्षिणा है जब तक भोजन कराकर वस्त्र और दक्षिणा नहीं दी जाती उसका फल नहीं मिलता।
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21 – श्राद्ध तिथि के पूर्व ही यथाशक्ति विद्वान ब्राह्मणों को भोजन के लिए बुलावा दें। श्राद्ध के दिन भोजन के लिए आए ब्राह्मणों को दक्षिण दिशा में बैठाएं।
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22- पितरों की पसंद का भोजन दूध, दही, घी और शहद के साथ अन्न से बनाए गए पकवान जैसे खीर आदि है। इसलिए ब्राह्मणों को ऐसे भोजन कराने का विशेष ध्यान रखें।
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23- तैयार भोजन में से गाय, कुत्ते, कौए, देवता और चींटी के लिए थोड़ा सा भाग निकालें। इसके बाद हाथ जल, अक्षत यानी चावल, चन्दन, फूल और तिल लेकर ब्राह्मणों से संकल्प लें।
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24- कुत्ते और कौए के निमित्त निकाला भोजन कुत्ते और कौए को ही कराएं किंतु देवता और चींटी का भोजन गाय को खिला सकते हैं। इसके बाद ही ब्राह्मणों को भोजन कराएं। पूरी तृप्ति से भोजन कराने के बाद ब्राह्मणों के मस्तक पर तिलक लगाकर यथाशक्ति कपड़े, अन्न और दक्षिणा दान कर आशीर्वाद पाएं।
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25- ब्राह्मणों को भोजन के बाद घर के द्वार तक पूरे सम्मान के साथ विदा करके आएं। क्योंकि ऐसा माना जाता है कि ब्राह्मणों के साथ-साथ पितर लोग भी चलते हैं। ब्राह्मणों के भोजन के बाद ही अपने परिजनों, दोस्तों और रिश्तेदारों को भोजन कराएं।
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26- पिता का श्राद्ध पुत्र को ही करना चाहिए। पुत्र के न होने पर पत्नी श्राद्ध कर सकती है। पत्नी न होने पर सगा भाई और उसके भी अभाव में सपिंडों( एक ही परिवार के) को श्राद्ध करना चाहिए । एक से अधिक पुत्र होने पर सबसे बड़ा पुत्र श्राद्ध करता है

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पितृ पक्ष पन्द्रह दिन की समयावधि होती है जिसमें हिन्दू जन अपने पूर्वजों को भोजन अर्पण कर उन्हें श्रधांजलि देते हैं।

दक्षिणी भारतीय अमांत पञ्चाङ्ग के अनुसार पितृ पक्ष भाद्रपद के चन्द्र मास में पड़ता है और पूर्ण चन्द्रमा के दिन या पूर्ण चन्द्रमा के एक दिन बाद प्रारम्भ होता है।

उत्तरी भारतीय पूर्णीमांत पञ्चाङ्ग के अनुसार पितृ पक्ष अश्विन के चन्द्र मास में पड़ता है और भाद्रपद में पूर्ण चन्द्रमा के दिन या पूर्ण चन्द्रमा के अगले दिन प्रारम्भ होता है।

यह चन्द्र मास की सिर्फ एक नामावली है जो इसे अलग-अलग करती हैं। उत्तरी और दक्षिणी भारतीय लोग श्राद्ध की विधि समान दिन ही करते हैं।

श्राद्ध के दिन
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२७सितम्बर(रविवार)पूर्णिमा श्राद्ध२८सितम्बर(सोमवार)प्रतिपदा श्राद्ध२९सितम्बर(मंगलवार)द्वितीया श्राद्ध३०सितम्बर(बुधवार)महा भरणी, तृतीया श्राद्ध०१अक्टूबर(बृहस्पतिवार)चतुर्थी श्राद्ध०२अक्टूबर(शुक्रवार)पञ्चमी श्राद्ध०३अक्टूबर(शनिवार)षष्ठी श्राद्ध०४अक्टूबर(रविवार)सप्तमी श्राद्ध०५अक्टूबर(सोमवार)अष्टमी श्राद्ध०६अक्टूबर(मंगलवार)नवमी श्राद्ध०७अक्टूबर(बुधवार)दशमी श्राद्ध०८अक्टूबर(बृहस्पतिवार)एकादशी श्राद्ध०९अक्टूबर(शुक्रवार)मघा श्राद्ध, द्वादशी श्राद्ध१०अक्टूबर(शनिवार)त्रयोदशी श्राद्ध११अक्टूबर(रविवार)चतुर्दशी श्राद्ध१२अक्टूबर(सोमवार)सर्वपित्रू अमावस्या

पितृ पक्ष का अन्तिम दिन सर्वपित्रू अमावस्या या महालय अमावस्या के नाम से जाना जाता है। पितृ पक्ष में महालय अमावस्या सबसे मुख्य दिन होता है।

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स्वर्ग का द्वार


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स्वर्ग के द्वार पर बहुत भीड़ इकठ्ठा हो गयी थी . चित्र गुप्त को बुलाया गया .. चित्र गुप्त ने कहा की हमारे पास बस 3 लक्ज़री सुइट्स बचे हैं … जिसके मरने की कहानी सबसे रोचक होगी वोही अन्दर जाएगा .

पहला आदमी आया – वो मोटा सा अधेड़ उम्र का था और सूट बूट पहने हुए था .

चित्रगुप्त ने पूछा – “तुम कैसे मरे ?”

पहला आदमी – “मैं एक बिजनेसमैन हूँ ! मैंने पिछले साल एक खूबसूरत और जवान लड़की से शादी की .
मैं दिन रात मेहनत करके पैसे कमाता हूँ , मुझे शक था की मेरी पत्नी का अपने बॉयफ्रेंड के साथ चक्कर है .
मेरा अपार्टमेंट दस मंजिले का हैं और मैं पांचवी मंजिल पर रहता हूँ .
आज सुबह मैंने एक आदमी को मेरे घर में आते देख लिया . मैंने एक्स्ट्रा चाभी से घर में घुसा और बेडरूम में गया . अपनी पत्नी की स्थिति देखकर मेरा शक यकीन में बदल गया . बस मैं उस आदमी को मारने के लिए ढूँढने लगा . मैंने पूरा घर छान मारा पर वो नहीं मिला , तभी मैंने देखा की वो अंडरवियर में मेरे बालकनी के रेलिंग से लटका हुआ है .. मैं दौड़ के उसका हाँथ छुड़ाने लगा ताकि वो नीचे गिर के मर जाए … लेकिन वो कमीना बड़ा सख्त जान निकला ..
वो हाँथ छोड़ने का नाम ही नहीं ले रहा था .
मैं दौड़ के एक हथौड़ी ले आया और उसके हाँथ पर मारने लगा .
इस बार उसका हाँथ छुट गया और वो पांच मंजिल नीचे जा गिरा .
लेकिन मैंने देखा की वो लॉन पर गिरने की वजह से मरा नहीं है ..

मैं दौड़ के घर का फ्रीज उठा लाया और उसके ऊपर फेंक दिया … फ्रीज उसके ऊपर गिरा और चकना चूर हो गया …
लेकिन वो अभी भी जिंदा था …
मुझे कुछ समझ नहीं आया और मैं भी ऊपर से कूद गया उसके ऊपर …
पता नहीं क्या हुआ ? मैं तो मर कर यहाँ आ गया …”

चित्रगुप्त ने कहा – “तुम्हारी कहानी इंट्रेस्टिंग है .. अन्दर आ जाओ … नेक्स्ट !!”

दूसरा आदमी जो जवान और गठीला था आया – वो सिर्फ अंडरवियर में था .

चित्रगुप्त ने पूछा – “तुम कैसे मरे ?”

दूसरा आदमी – “मैं एक स्पोर्ट्समैन हूँ .. मेरा अपार्टमेंट दस मंजिले का हैं और मैं दसवीं मंजिल पर रहता हूँ .
आज सुबह मैं बालकनी में कसरत कर रहा था की किसी तरह से नीचे गिर गया “

चित्रगुप्त ने पूछा – “और तुम गिर के मर गए ?”
दूसरा आदमी – “नहीं ! गिरते वक़्त मैंने किसी नीचे वाली मंजिल के बालकनी की रेलिंग पकड़ ली . अभी मैं ऊपर चड़ने की कोशिश कर ही रहा था की एक मोटा आदमी आया और मुझे बचाने की बजाय उल्टा मेरा हाँथ रेलिंग से छुड़ाने लगा .. “

चित्रगुप्त ने पूछा – “और तुम गिर के मर गए ?”
दूसरा आदमी – “नहीं ! मैंने कैसे भी करके अपना पकड़ बनाये रख्खा .. तभी वो कही से हथौड़ी ले के आया और मेरे हाँथ पर ताबड़तोड़ हमला करने लगा … “

चित्रगुप्त ने पूछा – “और तुम गिर के मर गए ?”
दूसरा आदमी – “नहीं ! मैं नीचे लॉन पर गिरा .. कुछ हड्डियाँ टूटी होंगी पर मरा नहीं … तभी वो पागल आदमी कही से फ्रीज उठा लगा और बालकनी से मेरे ऊपर फेंक दिया …”

चित्रगुप्त ने पूछा – “और तुम दब के मर गए ?”
दूसरा आदमी – “नहीं ! मैं फिर भी जिंदा था … तब तक मोटे आदमी को क्या सुझा और वो खुद ही मेरे ऊपर कूद गया … “

चित्रगुप्त ने पूछा – “और तुम मर गए ?”
दूसरा आदमी – “ हाँ .. लेकिन वो मोटा भी नहीं बचा होगा … “

चित्रगुप्त ने कहा – “तुम्हारी कहानी इंट्रेस्टिंग है .. अन्दर जाओ , बड़ा मज़ा आएगा … नेक्स्ट !!”

तीसरा आदमी जो जवान पर हल्का फुल्का था वही खड़ा था और सबकी बाते बड़े ध्यान से सुन रहा था आगे बढ़ा.

चित्रगुप्त ने पूछा – “और तुम मर गए ?”
तीसरा आदमी नीचे निगाहें किये हुए – “वो बात ये हैं ना … मैं वो … फ्रीज के अन्दर छुपा हुआ था … “