Posted in यत्र ना्यरस्तुपूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:

!! माता सती अनुसूया पौराणिक कथा !!


ॐ…🙏पतिव्रत धर्म की मूर्ती माता अनुसूया..
माता अनुसूया जी का स्थान पतिव्रता स्त्रियों श्रेणी में सर्वोपरी रहा है।

दक्ष प्रजापति की चौबीस कन्याओं में से एक थी अनुसूया जी जो मन से पवित्र एंव निश्छल प्रेम की परिभाषा थीं।
इन्हें सती साध्वी रूप में तथा एक आदर्श नारी के रूप में जाना जाता है।
अत्यन्त उच्च कुल में जन्म होने पर भी इनके मन में कोई अंह का भाव नहीं था।
इनका संपूर्ण जीवन ही एक आदर्श रहा है।
माता सीता जी भी इनके तेज से बहुत प्रभावित हुई थी तथा उनसे प्राप्त भेंट को सहर्ष स्वीकार करते हुए नमन किया।
अनुसूया जी का विवाह ब्रह्मा जी के मानस पुत्र परम तपस्वी महर्षि अत्रि जी के साथ हुआ था।
अपने सेवा तथा समर्पित प्रेम से इन्होंने अपने पति धर्म का सदैव पालन किया।

!! माता सती अनुसूया पौराणिक कथा !!
माता सती अनसूइया बहुत पतिव्रता थी जिस कारण उनकी ख्याती तीनों लोकों में फैल गई थी।
उनके इस सती धर्म को देखकर देवी माता पार्वती, माता लक्ष्मी जी और देवी माता सरस्वती जी के मन में द्वेष का भाव जागृत हो गया था, जिस कारण उन्होंने माता अनसूइया कि सच्चाई एवं पतीव्रता के धर्म की परिक्षा लेने की ठानी तथा अपने पतियों भगवान शिव, भगवान विष्णु और भगवान ब्रह्मा जी को माता अनसूया के पास परीक्षा लेने के लिए भेजना चाहा।
भगवान शिव, भगवान विष्णु और भगवान ब्रह्मा जी ने देवीयों को समझाने का पूर्ण प्रयास किया किंतु जब देवियां नहीं मानी तो विवश होकर तीनो भगवान शिव, भगवान विष्णु और भगवान ब्रह्मा जी ऋषि के आश्रम पहुँचे।
वहां जाकर भगवान ने सधुओं का वेश धारण कर लिया और आश्रम के द्वार पर भोजन की मांग करने लगे।
जब माता अनसूया उन्हें भोजन देने लगी तो उन्होंने देवी के सामने एक शर्त रखी की वह तीनों तभी यह भोजन स्वीकार करेंगे जब देवी निर्वस्त्र होकर उन्हें भोजन परोसेंगी।
इस पर माता अनसूया चिंता में डूब गई वह ऐसा कैसे कर सकती हैं।
अत: माता अनसूया ने आंखे मूंद कर पति को याद किया इस पर उन्हें दिव्य दृष्टि प्राप्त हुई तथा साधुओं के वेश में उपस्थित भगवान शिव, भगवान विष्णु और भगवान ब्रह्मा जी को उन्होंने पहचान लिया।
तब देवी अनसूया ने कहा की जो वह साधु चाहते हैं वह ज़रूर पूरा होगा किंतु इसके लिए साधुओं को शिशु रूप लेकर उनके पुत्र बनना होगा।
इस बात को सुनकर त्रिदेव शिशु रूप में बदल गए जिसके फलस्वरूप माता अनसूइया ने भगवान शिव, भगवान विष्णु और भगवान ब्रह्मा जी को सत्नपान करवाया।
इस तरह भगवान शिव, भगवान विष्णु और भगवान ब्रह्मा जी माता के पुत्र बन कर रहने लगे।
इस पर अधिक समय बीत जाने के पश्चात भी त्रिदेव अपने लोक नहीं पहुँचे तो माता पार्वती, माता लक्ष्मी और माता सरस्वती जी चिंतित एवं दुखी हो गई…
तीनों देवियों ने माता अनसूइया के समक्ष पहूंचकर क्षमा मांगी एवं अपने पतियों को बाल रूप से मूल रूप में लाने की प्रार्थना की।
माता अनसूया ने त्रिदेवों को उनका रूप प्रदान किया उसके पश्चात तीनों देव अपने असली रूप में प्रकट हो सती अनसूया की परीक्षा से प्रसन्न हो बोलेः- देवी ! वरदान मांगो।”
त्रिदेव की बात सुन अनसूया बोलीः- “प्रभु ! आप तीनों मेरी कोख से जन्म लें ये वरदान चाहिए अन्यथा नहीं।”
तभी से वह मां सती अनसूइया के नाम से प्रसिद्ध हुई तथा भगवान दत्तात्रेय के रूप में त्रिदेव ने सती अनुसुया के गर्भ से जन्म लिया जिनके तीन शीश तथा चार भुजायें थीं तथा इनमें त्रिदेव की शक्तियां समाहित थीं।
!! सती अनसूइया जयंती महत्व !!
माँ अनुसूया के दर्शन पाकर सभी लोग धन्य हो जाते हैं इसकी पवित्रता सभी के मन में समा जाती हैं।
सभी स्त्रियां मां सती अनसूया से पतिव्रता होने का आशिर्वाद पाने की कामना करती हैं।
प्रति वर्ष सती अनसूइया जी जयंती का आयोजन किया जाता है।
इस उत्सव के समय मेलों का भी आयोजन होता है।
रामायण में इनके जीवन के विषय में बताया गया है जिसके अनुसार वनवास काल में जब भगवान राम, सीता और लक्ष्मण जब महर्षि अत्रि के आश्रम में जाते हैं तो अनुसूया जी ने सीता जी को पतिव्रत धर्म की शिक्षा दी थी..
।। जय सती मां अनसूया ।।

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