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The Island near Parvati Hill also known as Talyatla Ganpati now known as “Saras Baug”


The Island near Parvati Hill also known as Talyatla Ganpati now known as “Saras Baug”

Ganpati mandir can be seen.

The inscription in the temple
|| देवदेवेश्वर सुतं देवं | सारासोद्यान भूषणं || || कल्पद्रुमां त्वां भक्तानां | वन्दे सिद्धीविनायकं ||

The Deccan's photo.
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धन प्राप्ति के 10 अचूक उपाय, जानिए कौन से


धन प्राप्ति के 10 अचूक उपाय, जानिए कौन से

अनिरुद्ध जोशी ‘शतायु’

अपार धन की प्राप्ति हर मनुष्य की चाहत होती है। अपार धन चाहने की इच्छा भी अपार होना जरूरी है। सिर्फ चाहने से धन नहीं मिलता उसके लिए मन में तड़प होना भी जरूरी है।

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अपार धन प्राप्ति के लिए शुद्ध आचरण और शुद्ध विचार का होना भी जरूरी है। दरिद्रता, गरीबी या कर्ज से छुटकारा पाकर धनवान बनने के लिए यहां प्रस्तुत हैं आजमाए हुए ऐसे 10 अचूकजिन्हें आजमाकर आप भी धनवान बन सकते हैं।

विष्णु-लक्ष्मी पूजा : परमेश्वर के 3 रूपों में से एक भगवान विष्णु को पालनहार माना जाता है। विष्णु ने ब्रह्मा के पुत्र भृगु की पुत्री लक्ष्मी से विवाह किया था। शिव ने ब्रह्मा के पुत्र दक्ष की कन्या सती से विवाह किया था। विष्णु ही व्यक्ति को सुख, शांति और समृद्धि देने वाले देव हैं। विष्णु की पूजा और प्रार्थना करने से लक्ष्मीजी प्रसन्न होती है। लक्ष्मीजी के 18 पुत्रों की भी पूजा करने से धन की प्राप्ति होती है।

लक्ष्मी के 18 पुत्रों के नाम

* विष्णु-लक्ष्मी का बड़ा-सा चित्र घर में रहना चाहिए। शालिग्राम की नित्य पूजा पंचामृत के स्थान के साथ चंदन आदि लगाकर की जानी चाहिए।
* विष्णु-लक्ष्मी मंदिर में प्रति शुक्रवार को लाल रंग के फूल अर्पित किए जाने चाहिए।
* मां लक्ष्मी की प्रतिमा के सामने 11 दिनों तक अखंड ज्योत (तेल का दीपक) प्रज्वलित करें। 11वें दिन 11 कन्या को भोजन कराकर एक सिक्का व मेहंदी दें।
* शुक्रवार के दिन दक्षिणावर्ती शंख में जल भरकर भगवान विष्णु का अभिषेक करें। इस में मां लक्ष्मी जल्दी प्रसन्न हो जाती हैं।

देहली पूजा : प्रतिदिन सुबह उठकर विश्वासपूर्वक यह विचार करें कि लक्ष्मी आने वाली हैं। इसके लिए घर को साफ-सुथरा करने और स्नान आदि से निवृत्त होने के बाद सुगंधित वातावरण कर दें।

भगवान का पूजन करने के बाद अंत में देहली की पूजा करें। देहली (डेली) के दोनों ओर सातिया बनाकर उसकी पूजा करें। सातिये के ऊपर चावल की एक ढेरी बनाएं और एक-एक सुपारी पर कलवा बांधकर उसको ढेरी के ऊपर रख दें। इस से धनलाभ होगा।

बंद किस्मत खोले ताला : सबसे पहले आप ताले की दुकान पर किसी भी शुक्रवार को जाएं और एक स्टील या लोहे का ताला खरीद लें। लेकिन ध्यान रखें ताला बंद होना चाहिए, खुला ताला नहीं। ताला खरीदते समय उसे न दुकानदार को खोलने दें और न आप खुद खोलें। ताला सही है या नहीं, यह जांचने के लिए भी न खोलें। बस, बंद ताले को खरीदकर ले आएं।

उस ताले को एक डिब्बे में रखें और शुक्रवार की रात को ही अपने सोने वाले कमरे में बिस्तर के पास रख लें। शनिवार सुबह उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर ताले को बिना खोले किसी मंदिर या देवस्थान पर रख दें। ताले को रखकर बिना कुछ बोले, बिना पलटें वापस अपने घर आ जाएं।

विश्वास और श्रद्धा रखें, जैसे ही कोई उस ताले को खोलेगा आपकी किस्मत का ताला भी खुल जाएगा। यह लाल किताब का जाना-माना प्रयोग है। अपनी किस्मत चमकाने के लिए इसे अवश्य आजमाएं…

गाय को गुड़ खिलाएं : सवा 5 किलो आटा एवं सवा किलो गुड़ लें। दोनों का मिश्रण कर रोटियां बना लें। गुरुवार के दिन सायंकाल गाय को खिलाएं। 3 गुरुवार तक यह कार्य करने से दरिद्रता समाप्त होती है।
शुक्रवार को पीले कपड़े में 5 कौड़ी और थोड़ी-सी केसर, चांदी के सिक्के के साथ बांधकर तिजोरी या धन रखने के स्थान पर रख दें। उसके साथ थोड़ी हल्दी की गांठें भी रख दें। कुछ दिनों में ही इसका असर होने लगेगा।
धन से बढ़ता धन : अपनी तिजोरी में 10 के लगभग 100 से ज्यादा नोट रखें। जेब में हमेशा कुछ सिक्के रखें। खुद को धनवान मानना शुरू कर दें और उसी तरह से कपड़े पहनें और जो भी आप खरीदना चाहते हैं उसके बारे में कल्पना करें। जो लोग खुद को दरिद्र मानते हैं, वे हमेशा दरिद्र ही बने रहते हैं।

हमेशा सकारात्मक सोचें और खुद को साफ और स्वच्छ बनाए रखें। प्रतिदिन मंदिर जाएं और जो मिला है उसके लिए धन्यवाद देने के साथ अपनी नई मांग रखें और उस मांग की पूर्ति का श्रद्धा और सबूरी के साथ इंतजार करें।

अन्नदान से लाभ : प्रतिदिन कौए, गाय और कुत्ते को रोटी खिलाएं। काले कुत्ते को शनिवार के दिन सरसों के तेल से चुपड़ी हुई रोटी खिलाएं। धनलाभ में आ रही बाधा दूर होगी।
गुरुवार करें : प्रति गुरुवार को पीपल में जल चढ़ाएं और माथे पर केसर का तिलक लगाएं। धनलाभ होगा।
दीपक जलाएं : प्रति शनिवार को पीपल के वृक्ष के ‍नीचे घी का दीपक जलाएं और सुगंधित अगरबत्ती लगाएं।
गणेशजी को प्रसन्न करें : प्रति बुधवार को गणेशजी को बेसन के लड्डू का भोग लगाएं। मंदिर में 5 तरह के फल या गुड़ और चने का दान करने से भी धन की प्राप्ति होती है।

अनिरुद्ध जोशी ‘शतायु’

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पुण्यनदी गोदावरी


पुण्यनदी गोदावरी

 

सर्वतीर्थशिरोभूताम् आद्यां गोदां च धीमहि ।
धर्मं या नः प्रचोदयात् ॥ (संदर्भ : अज्ञात)

अर्थ : सर्व तीर्थोंमें श्रेष्ठ और आदि नदी गोदावरीका हम ध्यान करते हैं । यह  गोदावरी हमें धर्माचरणके लिए सत्प्रेरणा दे ।

पुण्यनदी गोदावरी हिन्दू संस्कृतिकी एक ऐतिहासिक और समृद्ध विरासत है ! इस  पुण्यसलिलाके तटपर सनातन धर्मसंस्कृतिका विकास हुआ । यहीं यज्ञवेत्ता ऋषिमुनियों ने वास्तव्य किया एवं प्रभु श्रीरामचंद्रजीने सीता सहित १२ वर्ष निवास किया । गोदावरीका इतिहास उत्तर भारतीय और दक्षिण भारतीय संस्कृतियोंके संगमका इतिहास है । आर्यावर्तके अनेक धर्मपुरुषोंने गोदावरी के किनारे वास किया । इसलिए यह सांस्कृतिक संगम धर्मग्रंथोंमें भी दिखाई देता है ।

गौतमी साक्षात गंगा है । सरस्वतीके समान ही वह नदी-तमा, अर्थात सर्वश्रेष्ठ नदी है । यह गंगा सर्वपापक्षालन करनेवाली और मोक्षदायिनी है । यह गोदा सुखदा और सुकृता है । राजा भगीरथने भागीरथीद्वारा सहस्रों सगरपुत्रोंका उद्धार किया । वही महान कार्य गौतमऋषीके आशीर्वादसे गोदावरीने महाराष्ट्र और आंध्रप्रदेशके कोट्यावधि भक्तोंके लिए किया । अमृतके स्रोतवाली यह सुरसरिता हिन्दुओंकी तीर्थरूप जननी है । उसके दर्शनमात्र से पापोंका नाश होता है । पाप-ताप निवारण करनेवाली इस महानदी गोदाका कितना गुणगान किया जाए !

सिंहस्थ महापर्वमें गोदावरीस्नान करनेसे अन्य गोदास्नान की तुलनामें १ लक्ष गुना अधिक आध्यात्मिक लाभ होता है । दक्षिण और पश्चिम भारतके इस एकमात्र  सिंहस्थ कुंभमेलेका महत्व वेदोंसे सन्त तुकाराम महाराजकी गाथातक सर्वत्र उद्धृत किया गया है । इसलिए प्रस्तुत ग्रंथमें गोदावरीसे सम्बन्धित सिंहस्थ महापर्वादि  उत्सवोंकी जानकारी, संपूर्ण गोदास्नानविधि तथा गोदावरीदेवीकी व्यष्टि और समष्टि साधना कैसे करनी चाहिए, इसका मार्गदर्शन किया है । आज देवनदी गोदावरी प्रदूषित नदी बन गई है । उसकी रक्षाके लिए कैसे प्रयास करने चाहिए, यह भी इस ग्रंथमें विशद किया है ।

इस ग्रंथका प्रयोजन पुण्यसरिता गोदावरी नदीकी महानता सभीको ज्ञात करवाना है । गोदावरीकी महानता ज्ञात होनेपर ही श्रद्धायुक्त मनसे उसकी रक्षा तथा संवर्धन करना  सम्भव होगा तथा इसलिए यह गंगा-गौतमी-गोदावरी युगों-युगोंतक सकल जनोंको  पवित्र कर शाप-पाप-ताप-संसारचक्र आदिसे मुक्त करती रहेगी ।

ग्रंथका यह प्रयोजन सफल हो, यही गौतमी गंगाके चरणोंमें प्रार्थना है !

१. गोदावरी शब्द की व्युत्पत्ति और अर्थ

अ. गां स्वर्गं ददाति स्नानेन इति गोदा । तासु वरी श्रेष्ठा गोदावरी । – शब्दकल्पद्रुम

अर्थ : जिसके स्नानसे स्वर्ग प्राप्त होता है, उसे गोदा कहते हैं । स्वर्ग प्राप्त करवानेवाली नदियोंमें जो श्रेष्ठ है, वह गोदावरी.

आ. गौतमस्य गवे जीवनं ददाति इति गोदा ।

अर्थ : गौतमऋषीकी गायको (गौतमऋषीके स्पर्शसे मृत हुई गायको) जीवन देनेवाली गोदा (गोदावरी) है ।

२. गोदावरीका भूलोकमें अवतरण

२ अ. गौतमऋषीने घोर तपस्याकर गोदावरीको

भूलोकपर लाना एवं शिवके आशीर्वादसे वह महातीर्थ बनना

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सत्ययुगमें एक बार पृथ्वीपर निरंतर १२ वर्ष अनावृष्टि हुई । तब पर्जन्यवृष्टिके लिए गौतमऋषीने एक वर्ष तपस्याकर श्री गणेशजीको प्रसन्न कर लिया । श्री गणेशजीका आशीर्वाद मिलनेपर गौतमऋषीके आश्रमपर अनावृष्टिका संकट दूर होकर विपुल मात्रामें अनाज मिलने लगा । इस अनाज की सहायता से गौतमऋषीने अनेक देशोंके ऋषिमुनियोंका पोषण किया । कालांतरसे गौतमऋषीके आश्रयमें रहनेवाले कुछ विद्वेषी ब्राह्मणोंने एक मायानिर्मित

गाय गौतमऋषीके आश्रममें छोड दी । यह मायावी गाय आश्रमका हविद्र्रव्य खा रही थी, तब गौतमऋषीके स्पर्श मात्र से वह गाय मृत हो गई । यह देखते ही सर्व ब्राह्मणोंने गौतमऋषी को गोहत्याका पाप लगा है, उनके घरका भोजन नहीं चाहिए, यह कहकर गौतमऋषीका आश्रम छोड दिया । तत्पश्चात गौतमऋषीने  पापमुक्तिके लिए घोर तपस्या की तथा स्वर्ग से गंगा लाने हेतु भगवान शंकरसे प्रार्थना की । तब गंगा भगवान शिवकी जटामें आई । (टीप १) तब गौतमऋषीने प्रार्थना की कि, हे जगदीश्वर, समस्त लोकोंको पवित्र करनेवाली इस देवीको आप ब्रह्मगिरीपर छोडिए । इसमें स्नान कर लोग स्वयंके पापोंका क्षालन करेंगे । इसके तटपर रहनेवाले एक योजनतक उसमें स्नान न करते हुए भी मुक्ति प्राप्त करेंगे । तब भगवान शंकरने गौतमऋषीको आशीर्वाद देते हुए गोदावरीको भूलोक पर प्रकट किया ।  (ब्रह्मपुराण)

टीप १ – भगवान शंकरजीकी जटामें समाए हुए जलके दो भाग ही गोदावरी और गंगा : भगवान शंकरजीकी जटामें समाए हुए जलके दो भाग हुए । उनमें से एक भाग  गोदावरी तथा दूसरा भाग बलवान क्षत्रिय राजा भगीरथने कठोर तपस्याकर पृथ्वीपर लाई हुई गंगा नदी है ।(ब्रह्मपुराण)

२ आ. गोदावरीका उद्गम क्षेत्र तथा उसके प्रकट होनेका काल

समुद्रमंथनका काल और गोदावरीका जन्मकाल एक ही है ।
कृते लक्षद्वयातीते मान्धातरि शके सति ।
कूर्मे चैवावतारे च सिंहस्थे च बृहस्पतौ ॥
माघशुक्लदशम्यां च मध्याह्ने सौम्यवासरे ।
गङ्गा समागता भूमौ गौतमप्रार्थिता सति ॥
महापापादियुक्तानां जनानां पावनाय च ।
औदुम्बरतरोर्मूले ययौ प्रत्यक्षतां तदा ॥ (संदर्भ : अज्ञात)

अर्थ : कृतयुगके दो लाख वर्ष पूर्ण होनेपर, मांधात पृथ्वीके सार्वभौम राजाके कालमें, श्रीविष्णुके कूर्मावतारके समय, (धाता नाम संवत्सरी,) सिंह राशीमें गुरु, माघ मास, शुक्ल पक्ष, दशमी, सोमवारको, दिनके दो प्रहरमें (दोपहर १२ बजे), गौतमऋषीकी प्रार्थनासे (त्र्यंबकेश्वरके ब्रह्मगिरी पर्वतपर) औदुंबर वृक्षकी जडके पास गोदावरी भूलोकपर प्रकट हुई ।

३. गोदावरी के कुछ नाम

३ अ. गंगा अथवा दक्षिण गंगा : गोदावरी मूलतः साक्षात शिवकी जटासे पृथ्वीपर अवतीर्ण हुई है । इसलिए उसे गंगा कहते हैं । वह भारतके दक्षिण क्षेत्रमें प्रकट हुई है । इसलिए उसे दक्षिण गंगाके नामसे सम्बोधित किया जाता है ।

३ आ. गौतमी : महर्षि गौतम गोदावरीको पृथ्वीपर लाए हैं; इसलिए उसे गौतमी भी कहते हैं । ब्रह्मपुराणमें विन्ध्य पर्वतके दूसरी ओर (वर्तमान भारतके दक्षिण क्षेत्रमें) गंगाको गौतमीके नामसे जाना जाता है ।

३ इ. अन्य नाम : भगवान शंकरने गौतमऋषीको गोदावरीके माहेश्वारी, वैष्णवी, नंदा, सुनंदा, कामदायिनी, ब्रह्मतेजससमानिता, सर्वपापप्रणाशिनी आदि नाम बताए हैं । उन्होंने यह बताया है कि इन नामोंमें से गोदावरी नाम ही स्वयंको प्रिय है ।  कण्वऋषीने गोदावरीकी स्तुति करते हुए उसे ब्राह्मी और त्र्यंबका नामोंसे सम्बोधित किया है । (ब्रह्मपुराण)

४. गोदावरी की विशेषताएं

४ अ. भौगोलिक विशेषताएं

४ अ १. आदि नदी : गोदावरी समुद्रवलयांकित पृथ्वीकी आदि नदी है । पुरुषार्थचिंतामणी ग्रंथमें कहा गया है कि आद्या सा गौतमी गङ्गा दि्वतीया जाह्नवी स्मृता ।, अर्थात गोदावरी आदि गंगा (नदी) है । जाह्नवी उसके पश्चात आई है ।

४ अ २. सप्तप्रवाही : गंगासागरमें (बंगालके उपसागरमें) मिलनेसे पूर्व गोदावरी नदीके सात प्रवाह बनते हैं । ये प्रवाह सात ऋषियों गौतमी, वासिष्ठी, कौशिकी, आत्रेयी, काश्यपी, जामदग्न्या और भारद्वाजी के नाम से जाने जाते हैं ।

एक मतानुसार काश्यपी और जामदग्न्या दो नामोंके स्थानपर वृद्ध गौतमी और तुल्या ये नाम ग्राह्य हैं ।

४ अ ३. भारतकी दि्वतीय क्रमांक की लंबी नदी : महाराष्ट्रकी सह्याद्री पर्वतश्रृंखला के  ब्रह्मगिरीपर गोदावरी और वैतरणा इन दो नदियोंका उद्गम होता है । इन दोनों में से    वैतरणा नदी १५४ कि.मी. यात्राकर पशि्चममें सिंधुसागरमें (अरबी समुद्रमें) मिलती है, तो गोदावरी नदी पूर्व दिशासे दकि्षणवाहिनी होकर १ सहस्र ४६५ कि.मी.की यात्रा करते हुए गंगासागरमें (बंगालके उपसागरमें) मिलती है । इतन बडी लम्बाईवाली गोदावरी नदी देशकी गंगा नदीके पश्चात दूसरे क्रमांक की लंबी नदी है ।

४ आ. भौतिक विशेषताएं

४ आ १. जीवनदायिनी : गोदावरी लोककल्याणकी धारा है । वह लाखों वर्षोंसे   महाराष्ट्र, छत्तीसगढ, तेलंगाना, आंध्रप्रदेश और पांडिचेरी राज्योंकी भूमिको सुजलाम् सुफलाम् बना रही है ।

४ आ २. आरोग्यदायिनी : गोदावरीका जल आरोग्य अर्थात स्वास्थ्यके लिए लाभदायक है ।
पित्तार्तिरक्तार्तिसमीरहारि पथ्यं परं दीपनपापहारि ।
कुष्ठादिदुष्टामयदोषहारि गोदावरीवारि तृषानिवारि ॥ – राजनिघंटु, वर्ग १४, श्लोतक ३२

अर्थ : गोदावरी नदीका जल पित्त, रक्त, वातसे सम्बन्धित व्याधि दूर करनेवाला, भूख बढानेवाला, पापोंका हरण करनेवाला, पापसे उत्पन्न होनेवाले त्वचाविकारों जैसे  विकार दूर करनेवाला और प्यास बुझानेवाला है ।

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कुंभपर्व एवं उनका माहात्म्य


कुंभपर्व एवं उनका माहात्म्य

http://www.hindujagruti.org/hindi/s/194.html

कुंभपर्वका लाभ उठानेके लिए देश-विदेशसे श्रद्धालु एकत्र आ रहे हैं । इस निमित्तसे कुंभमेलेकी महिमाका वर्णन करनेवाले सूत्र पाठकोंके लिए यहां प्रस्तुत कर रहे हैं ।

१. कुंभपर्वका अर्थ

प्रत्येक १२ वर्षके उपरांत प्रयाग, हरद्वार (हरिद्वार), उज्जैन एवं त्र्यंबकेश्वर-नासिकमें आनेवाला पुण्ययोग ।

 

२. उत्पत्तिकी कथा

अमृतकुंभ प्राप्ति हेतु देवों एवं दानवोंने (राक्षसोंने) एकत्र होकर क्षीरसागरका मंथन करनेका निश्चय किया । समुद्रमंथन हेतु मेरु (मंदार) पर्वतको बिलोनेके लिए सर्पराज वासुकीको रस्सी बननेकी विनती की गई । वासुकी नागने रस्सी बनकर मेरु पर्वतको लपेटा । उसके मुखकी ओर दानव एवं पूंछकी ओर देवता थे । इस प्रकार समुद्रमंथन किया गया । इस समय समुद्रमंथनसे क्रमशः हलाहल विष, कामधेनु (गाय), उच्चैःश्रवा (श्वेत घोडा), ऐरावत (चार दांतवाला हाथी), कौस्तुभमणि, पारिजात कल्पवृक्ष, रंभा आदि देवांगना (अप्सरा), श्री लक्ष्मीदेवी (श्रीविष्णुपत्नी), सुरा (मद्य), सोम (चंद्र), हरिधनु (धनुष), शंख, धन्वंतरि (देवताओंके वैद्य) एवं अमृतकलश (कुंभ) आदि चौदह रत्न बाहर आए । धन्वंतरि देवता हाथमें अमृतकुंभ लेकर जिस क्षण समुद्रसे बाहर आए, उसी क्षण देवताओंके मनमें आया कि दानव अमृत पीकर अमर हो गए तो वे उत्पात मचाएंगे । इसलिए उन्होंने इंद्रपुत्र जयंतको संकेत दिया तथा वे उसी समय धन्वंतरिके हाथोंसे वह अमृतकुंभ लेकर स्वर्गकी दिशामें चले गए । इस अमृतकुंभको प्राप्त करनेके लिए देव-दानवोंमें १२ दिन एवं १२ रातोंतक युद्ध हुआ । इस युद्धमें १२ बार अमृतकुंभ नीचे गिरा । इस समय सूर्यदेवने अमृतकलशकी रक्षा की एवं चंद्रने कलशका अमृत न उडे इस हेतु सावधानी रखी एवं गुरुने राक्षसोंका प्रतिकार कर कलशकी रक्षा की । उस समय जिन १२ स्थानोंपर अमृतकुंभसे बूंदें गिरीं, उन स्थानोंपर उपरोक्त ग्रहोंके विशिष्ट योगसे कुंभपर्व मनाया जाता है । इन १२ स्थानोंमेंसे भूलोकमें प्रयाग (इलाहाबाद), हरद्वार (हरिद्वार), उज्जैन एवं त्र्यंबकेश्वर-नासिक समाविष्ट हैं ।

 

३. कुंभपर्वका विविध धर्मग्रंथोंमें वर्णित माहात्म्य

३ अ. ऋग्वेद

        ऋग्वेदके खिलसूक्तमें कहा गया है –

सितासिते सरिते यत्र सङ्गते तत्राप्लुतासो दिवमुत्पतन्ति ।

ये वै तन्वं विसृजन्ति धीरास्ते जनासो अमृतत्वं भजन्ते ।।

– ऋग्वेद, खिलसूक्त

अर्थ : जहां गंगा-यमुना दोनों नदियां एक होती हैं, वहां स्नान करनेवालोंको स्वर्ग मिलता है एवं जो धीर पुरुष इस संगममें तनुत्याग करते हैं, उन्हें मोक्ष-प्राप्ति होती है ।

३ आ. पद्मपुराण

प्रयागराज तीर्थक्षेत्रके विषयमें पद्मपुराणमें कहा गया है –

ग्रहाणां च यथा सूर्यो नक्षत्राणां यथा शशी ।

तीर्थानामुत्तमं तीर्थं प्रयागाख्यमनुत्तमम् ।।

अर्थ : जिस प्रकार ग्रहोंमें सूर्य एवं नक्षत्रोंमें चंद्रमा श्रेष्ठ है, उसी प्रकार सर्व तीर्थोंमें प्रयागराज सर्वोत्तम हैं ।

३ इ. कूर्मपुराण

कूर्मपुराणमें कहा गया है कि प्रयाग तीनों लोकोंमें सर्वश्रेष्ठ तीर्थ है ।

३ ई. महाभारत

प्रयागः सर्वतीर्थेभ्यः प्रभवत्यधिकं विभो ।।

श्रवणात् तस्य तीर्थस्य नामसंकीर्तनादपि ।।

मृत्तिकालम्भनाद्वापि नरः पापात् प्रमुच्यते।।

– महाभारत, पर्व ३, अध्याय ८३, श्लोक ७४, ७५

अर्थ : हे राजन्, प्रयाग सर्व तीर्थोंमें श्रेष्ठ है । उसका माहात्म्य श्रवण करनेसे, नामसंकीर्तन करनेसे अथवा वहांकी मिट्टीका शरीरपर लेप करनेसे मनुष्य पापमुक्त होता है ।

(संदर्भ – सनातनका ग्रंथ – कुंभमेलेकी महिमा एवं पवित्रताकी रक्षा )

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राष्‍ट्रगान का अर्थ और असलियत जिससे आप अनजान हैं


अध्यापक भारत's photo.

राष्‍ट्रगान का अर्थ और असलियत जिससे आप अनजान हैं..
जन गण मन अधिनायक जय हे, — (हे भारत के जन गण और मन के नायक (जिनके हम अधीन हैं))
भारत-भाग्य-विधाता —(आप भारत के भाग्य के विधाता हैं)
पंजाब, सिंध, गुजरात, मराठा, —(वह भारत जो पंजाब, सिंध, गुजरात, महाराष्ट्र)
द्वाविड़, उत्कल, बंग — (तमिलनाडु, उड़ीसा, और बंगाल जैसे प्रदेश से बना है)
विन्ध्य, हिमाचल, यमुना-गंगा, — (जहाँ विन्ध्याचल तथा हिमालय जैसे पर्वत हैं और यमुना-गंगा जैसी नदियाँ हैं)
उच्छल जलधि तरंगा —(और जिनकी तरंगे उच्छश्रृंखल होकर उठतीं हैं)
तव शुभ नामे जागे — (आपका शुभ नाम लेकर ही प्रातः उठते हैं)
तव शुभ आशिष माँगे — (और आपके आर्शीवाद की याचना करते हैं)
जन-गण-मंगलदायक जय हे, — (आप हम सभी जनों का मंगल करने वाले हैं, आपकी जय हो)
गाहे तव जयगाथा, — (सभी आपकी ही जय की गाथा गायें)
जन-गण-मंगलदायक जय हे —(हे जनों का मंगल करने वाले आपकी जय हो)
भारत भाग्य विधाता — (आप भारत के भाग्य विधाता हैं)
जय हे, जय हे, जय हे, — (आपकी जय हो, जय हो, जय हो)
जय, जय, जय, जय हे — (जय, जय, जय, जय हो)
जन गण मन का इतिहास
सन 1911 तक भारत की राजधानी बंगाल हुआ करता था। सन 1905 में जब बंगाल विभाजन को लेकर अंग्रेजो के खिलाफ बंग-भंग आन्दोलन के विरोध में बंगाल के लोग उठ खड़े हुए तो अंग्रेजो ने अपने आपको बचाने के लिए के कलकत्ता से हटाकर राजधानी को दिल्ली ले गए और 1911 में दिल्ली को राजधानी घोषित कर दिया। पूरे भारत में उस समय लोग विद्रोह से भरे हुए थे तो अंग्रेजो ने अपने इंग्लॅण्ड के राजा को भारत आमंत्रित किया ताकि लोग शांत हो जाये। इंग्लैंड का राजा जोर्ज पंचम 1911 में भारत में आया। रविंद्रनाथ टैगोर पर दबाव बनाया गया कि तुम्हे एक गीत जोर्ज पंचम के स्वागत में लिखना ही होगा। उस समय टैगोर का परिवार अंग्रेजों के काफी नजदीक हुआ करता था, उनके परिवार के बहुत से लोग ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए काम किया करते थे, उनके बड़े भाई अवनींद्र नाथ टैगोर बहुत दिनों तक ईस्ट इंडिया कंपनी के कलकत्ता डिविजन के निदेशक (Director) रहे। उनके परिवार का बहुत पैसा ईस्ट इंडिया कंपनी में लगा हुआ था। और खुद रविन्द्र नाथ टैगोर की बहुत सहानुभूति थी अंग्रेजों के लिए। रविंद्रनाथ टैगोर ने मन से या बेमन से जो गीत लिखा उसके बोल है “जन गण मन अधिनायक जय हे भारत भाग्य विधाता”। इस गीत के सारे के सारे शब्दों में अंग्रेजी राजा जोर्ज पंचम का गुणगान है, जिसका अर्थ समझने पर पता लगेगा कि ये तो हकीक़त में ही अंग्रेजो की खुशामद में लिखा गया था।
इस राष्ट्रगान का अर्थ कुछ इस तरह से होता है “भारत के नागरिक, भारत की जनता अपने मन से आपको भारत का भाग्य विधाता समझती है और मानती है। हे अधिनायक (Superhero) तुम्ही भारत के भाग्य विधाता हो। तुम्हारी जय हो ! जय हो ! जय हो ! तुम्हारे भारत आने से सभी प्रान्त पंजाब, सिंध, गुजरात, मराठा मतलब महारास्त्र, द्रविड़ मतलब दक्षिण भारत, उत्कल मतलब उड़ीसा, बंगाल आदि और जितनी भी नदिया जैसे यमुना और गंगा ये सभी हर्षित है, खुश है, प्रसन्न है , तुम्हारा नाम लेकर ही हम जागते है और तुम्हारे नाम का आशीर्वाद चाहते है। तुम्हारी ही हम गाथा गाते है। हे भारत के भाग्य विधाता (सुपर हीरो ) तुम्हारी जय हो जय हो जय हो। ” जोर्ज पंचम भारत आया 1911 में और उसके स्वागत में ये गीत गाया गया। जब वो इंग्लैंड चला गया तो उसने उस जन गण मन का अंग्रेजी में अनुवाद करवाया। क्योंकि जब भारत में उसका इस गीत से स्वागत हुआ था तब उसके समझ में नहीं आया था कि ये गीत क्यों गाया गया और इसका अर्थ क्या है। जब अंग्रेजी अनुवाद उसने सुना तो वह बोला कि इतना सम्मान और इतनी खुशामद तो मेरी आज तक इंग्लॅण्ड में भी किसी ने नहीं की। वह बहुत खुश हुआ। उसने आदेश दिया कि जिसने भी ये गीत उसके (जोर्ज पंचम के) लिए लिखा है उसे इंग्लैंड लाया जाये। रविन्द्र नाथ टैगोर इंग्लैंड गए। जोर्ज पंचम उस समय नोबल पुरस्कार समिति का अध्यक्ष भी था। उसने रविन्द्र नाथ टैगोर को नोबल पुरस्कार से सम्मानित करने का फैसला किया। तो रविन्द्र नाथ टैगोर ने इस नोबल पुरस्कार को लेने से मना कर दिया। क्यों कि गाँधी जी ने बहुत बुरी तरह से रविन्द्रनाथ टेगोर को उनके इस गीत के लिए खूब डांटा था। टैगोर ने कहा की आप मुझे नोबल पुरस्कार देना ही चाहते हैं तो मैंने एक गीतांजलि नामक रचना लिखी है उस पर मुझे दे दो लेकिन इस गीत के नाम पर मत दो और यही प्रचारित किया जाये क़ि मुझे जो नोबेल पुरस्कार दिया गया है वो गीतांजलि नामक रचना के ऊपर दिया गया है। जोर्ज पंचम मान गया और रविन्द्र नाथ टैगोर को सन 1913 में गीतांजलि नामक रचना के ऊपर नोबल पुरस्कार दिया गया। रविन्द्र नाथ टैगोर की ये सहानुभूति ख़त्म हुई 1919 में जब जलिया वाला कांड हुआ और गाँधी जी ने लगभग गाली की भाषा में उनको पत्र लिखा और कहा क़ि अभी भी तुम्हारी आँखों से अंग्रेजियत का पर्दा नहीं उतरेगा तो कब उतरेगा, तुम
अंग्रेजों के इतने चाटुकार कैसे हो गए, तुम इनके इतने समर्थक कैसे हो गए ? फिर गाँधी जी स्वयं रविन्द्र नाथ टैगोर से मिलने गए और बहुत जोर से डाटा कि अभी तक तुम अंग्रेजो की अंध भक्ति में डूबे हुए हो ? तब जाकर रविंद्रनाथ टैगोर की नीद खुली। इस काण्ड का टैगोर ने विरोध किया और नोबल पुरस्कार अंग्रेजी हुकूमत को
लौटा दिया। सन 1919 से पहले जितना कुछ भी रविन्द्र नाथ टैगोर ने लिखा वो अंग्रेजी सरकार के पक्ष में था और 1919 के बाद उनके लेख कुछ कुछ अंग्रेजो के खिलाफ होने लगे थे। रविन्द्र नाथ टेगोर के बहनोई, सुरेन्द्र नाथ बनर्जी लन्दन में रहते थे और ICS ऑफिसर थे। अपने बहनोई को उन्होंने एक पत्र लिखा था (ये 1919 के बाद की घटना है) । इसमें उन्होंने लिखा है कि ये गीत ‘जन गण मन’ अंग्रेजो के द्वारा मुझ पर दबाव डलवाकर लिखवाया गया है। इसके शब्दों का अर्थ अच्छा नहीं है। इस गीत को नहीं गाया जाये तो अच्छा है। लेकिन अंत में उन्होंने लिख दिया कि इस चिठ्ठी को किसी को नहीं दिखाए क्योंकि मैं इसे सिर्फ आप तक सीमित रखना चाहता हूँ किन जब कभी मेरी म्रत्यु हो जाये तो सबको बता दे। 7 अगस्त 1941 को रबिन्द्र नाथ टैगोर की मृत्यु के बाद इस पत्र को सुरेन्द्र नाथ बनर्जी ने ये पत्र सार्वजनिक किया, और सारे देश को ये कहा क़ि ये जन गन मन गीत न गाया जाये। 1941 तक कांग्रेस पार्टी थोड़ी उभर चुकी थी। लेकिन वह दो खेमो में बट गई। जिसमे एक खेमे के समर्थक बाल गंगाधर तिलक थे और दुसरे खेमे में मोती लाल नेहरु थे। मतभेद था सरकार बनाने को लेकर। मोती लाल नेहरु चाहते थे कि स्वतंत्र भारत की सरकार अंग्रेजो के साथ कोई संयोजक सरकार (Coalition Government) बने। जबकि गंगाधर तिलक कहते थे कि अंग्रेजो के साथ मिलकर सरकार बनाना तो भारत के लोगों को धोखा देना है। इस मतभेद के कारण लोकमान्य तिलक कांग्रेस से निकल गए और उन्होंने गरम दल बनाया। कोंग्रेस के दो हिस्से हो गए। एक नरम दल और एक गरम दल। गरम दल के नेता थे लोकमान्य तिलक जैसे क्रन्तिकारी। वे हर जगह वन्दे मातरम गाया करते थे। और नरम दल के नेता थे मोती लाल नेहरु (यहाँ मैं स्पष्ट कर दूँ कि गांधीजी उस समय तक कांग्रेस की आजीवन सदस्यता से इस्तीफा दे चुके थे, वो किसी तरफ नहीं थे, लेकिन गाँधी जी दोनों पक्ष के लिए आदरणीय थे क्योंकि गाँधी जी देश के लोगों के आदरणीय थे)। लेकिन नरम दल वाले ज्यादातर अंग्रेजो के साथ रहते थे। उनके साथ रहना, उनको सुनना, उनकी बैठकों में शामिल होना। हर समय अंग्रेजो से
समझौते में रहते थे। वन्देमातरम से अंग्रेजो को बहुत चिढ होती थी। नरम दल वाले गरम दल को चिढाने के लिए 1911 में लिखा गया गीत “जन गण मन” गाया करते थे और गरम दल वाले “वन्दे मातरम”। नरम दल वाले अंग्रेजों के समर्थक थे और अंग्रेजों को ये गीत पसंद नहीं था तो अंग्रेजों के कहने पर नरम दल वालों ने उस समय एक हवा उड़ा दी कि मुसलमानों को वन्दे मातरम नहीं गाना चाहिए क्यों कि इसमें बुतपरस्ती (मूर्ति पूजा) है। और आप जानते है कि मुसलमान मूर्ति पूजा के कट्टर विरोधी है। उस समय मुस्लिम लीग भी बन गई थी जिसके प्रमुख मोहम्मद अली जिन्ना थे। उन्होंने भी इसका विरोध करना शुरू कर दिया क्योंकि जिन्ना भी देखने भर को (उस समय तक) भारतीय थे मन,कर्म और वचन से अंग्रेज ही थे उन्होंने भी अंग्रेजों के इशारे पर ये कहना शुरू किया और मुसलमानों को वन्दे मातरम गाने से मना कर दिया। जब भारत सन 1947 में स्वतंत्र
हो गया तो जवाहर लाल नेहरु ने इसमें राजनीति कर डाली। संविधान सभा की बहस चली। संविधान सभा के 319 में से 318 सांसद ऐसे थे जिन्होंने बंकिम बाबु द्वारा लिखित वन्देमातरम को राष्ट्र गान स्वीकार करने पर सहमति जताई।बस एक सांसद ने इस प्रस्ताव को नहीं माना। और उस एक सांसद का नाम था जवाहर लाल नेहरु। उनका तर्क था कि वन्दे मातरम गीत से मुसलमानों के दिल को चोट पहुचती है इसलिए इसे नहीं गाना चाहिए (दरअसल इस गीत से मुसलमानों को नहीं अंग्रेजों के दिल को चोट पहुंचती थी)। अब इस झगडे का फैसला कौन करे, तो वे पहुचे गाँधी जी के पास। गाँधी जी ने कहा कि जन गन मन के पक्ष में तो मैं भी नहीं हूँ और तुम (नेहरु ) वन्देमातरम के पक्ष में नहीं हो तो कोई तीसरा गीत तैयार किया जाये। तो महात्मा गाँधी ने तीसरा विकल्प झंडा गान के रूप में दिया “विजयी विश्व तिरंगा प्यारा झंडा ऊँचा रहे हमारा”। लेकिन नेहरु जी उस पर भी तैयार नहीं हुए। नेहरु जी का तर्क था कि झंडा गान ओर्केस्ट्रा पर नहीं बज सकता और जन गन मन ओर्केस्ट्रा पर बज सकता है। उस समय बात नहीं बनी तो नेहरु जी ने इस मुद्दे को गाँधी जी की मृत्यु तक टाले रखा और उनकी मृत्यु के बाद नेहरु जी ने जन गण मन को राष्ट्र गान घोषित कर दिया और जबरदस्ती भारतीयों पर इसे थोप दिया गया जबकि इसके जो बोल है उनका अर्थ कुछ और ही कहानी प्रस्तुत करते है, और दूसरा पक्ष नाराज न हो इसलिए वन्दे मातरम को राष्ट्रगीत बना दिया गया लेकिन कभी गया नहीं गया। नेहरु जी कोई ऐसा काम नहीं करना चाहते थे जिससे कि अंग्रेजों के दिल को चोट पहुंचे, मुसलमानों के वो इतने हिमायती कैसे हो सकते थे जिस आदमी ने पाकिस्तान बनवा दिया जब कि इस देश के मुसलमान पाकिस्तान नहीं चाहते थे, जन गण मन को इस लिए तरजीह दी गयी क्योंकि वो अंग्रेजों की भक्ति में गाया गया गीत था और वन्देमातरम इसलिए पीछे रह गया क्योंकि इस गीत से अंगेजों को दर्द होता था। बीबीसी ने एक सर्वे किया था। उसने पूरे संसार में जितने भी भारत के लोग रहते थे, उनसे पुछा कि आपको दोनों में से कौन सा गीत ज्यादा पसंद है तो 99 % लोगों
ने कहा वन्देमातरम। बीबीसी के इस सर्वे से एक बात और साफ़ हुई कि दुनिया के सबसे लोकप्रिय गीतों में दुसरे नंबर पर वन्देमातरम है। कई देश है जिनके लोगों को इसके बोल समझ में नहीं आते है लेकिन वो कहते है कि इसमें जो लय है उससे एक जज्बा पैदा होता है। तो ये इतिहास है वन्दे मातरम का और जन गण मन का। अब ये आप को तय करना है कि आपको क्या गाना है ? ये उस पत्र का चित्र है जिसे रविन्द्रनाथ टैगोर ने गाँधी को जन गण मन पर खेद जताते हुए क्षमायाचक भाव से लिखा था जो आज भी गाँधी स्न्ग्रहली गुजरात में संरक्षित है.

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महाराणा प्रताप


तुषार शर्मा's photo.

मुगलों से अधिक इन भारतीय राजाओं को जानने की जरूरत है हमे * महाराणा प्रताप के भाले का वजन 80 किलो था और कवच का वजन 80 किलो था और कवच भाला,कवच,ढाल,और हाथ मे तलवार का वजन मिलाये तो 207 किलो
*आज भी महाराणा प्रताप कि तलवार कवच आदि सामान उदयपुर राज घराने के संग्रालय में सुरक्षित है
*अकबर ने कहा था कि अगर राणा प्रताप मेरे सामने झुकते है तो आधा भारत के वारिस वो होंगे पर बादशाहत अकबर कि रहेगी
*हल्दी घाटीकी लड़ाई में मेवाड़ से 20,000 सैनिक थे और अकबर कि और से 85000 सैनिक
*राणाप्रताप के घोड़े चेतक का मंदिर भी बना जो आज हल्दी घटी में सुरक्षित है
*महाराणा ने जब महलो का त्याग किया तब उनके साथ लुहार जाति के हजारो लोगो ने भी घर छोड़ा और दिन रात राणा कि फौज के लिए तलवारे बनायीं इसी समाज को आज गुजरात मध्यप्रदेश और राजस्थान में गड़लिया लोहार कहा जाता है नमन है ऐसे लोगो को
*हल्दी घाटी के युद्ध के 300 साल बाद भी वह जमीनो में तलवारे पायी गयी। … आखिरी बार तलवारों का जखीरा 1985 हल्दी घाटी के में मिला
*महाराणा प्रताप अस्त्र शत्र कि शिक्षा जैमल मेड़तिया ने दी थी जो 8000 राजपूतो को लेकर 60,000 से लड़े थे। …. उस युद्ध में 48,000 मारे गए थे जिनमे 8000 राजपूत और 40,000 मुग़ल थे
*राणा प्रताप के देहांत पर अकबर भी रो पड़ा था
*राणा का घोडा चेतक भी बहुत ताकत वर था उसके मुह के आगे हाथी कि सूंड लगाई जाती थी
*मेवाड़ के आदिवासी भील समाज ने हल्दी घाटी में अकबर कि फोज को आपने तीरो से रोंद डाला था वो राणाप्रताप को अपना बेटा मानते थे और राणा जी बिना भेद भाव के उन के साथ रहते थे आज भी मेवाड़ के राज चिन्ह पैर एक तरह राजपूत है तो दूसरी तरह भील
*राणा का घोडा चेतक महाराणा को 26 फीट का दरिआ पार करने के बाद वीरगति को प्राप्त हुआ। उसकी एक टांग टूटने के बाद भी वो दरिआ पार कर गया। जहा वो घायल हुआ वहा आज खोड़ी इमली नाम का पेड़ है जहा मारा वह मंदिर । हेतक और चेतक नाम के दो घोड़े थे
*मरने से पहले महाराणा ने खोया हुआ 85 % मेवार फिर से जीत लिया था
*सोने चांदी और महलो को छोड़ वो 20 साल मेवाड़ के जंगलो में घूमने
*महाराणा प्रताप का वजन 110 किलो… और लम्बाई – 7’5” थी…..
दो मियान वाली तलवार और 80 किलो का भाला रखते थे हाथ में.
*मेवाड़ राजघराने के वारिस को एक लिंग जी भगवन का दीवान माना जाता है।
*छत्रपति शिवाजी भी मूल रूप से मेवाड़ से तलूक रखते थे वीर शिवा जी के पर दादा उदैपुर महा राणा के छोटे भाई थे
*अकबर को अफगान के शेख रहमुर खान ने कहा था अगर तुम राणा प्रताप और जयमल मेड़तिया को मिला दो अपने साथ तोह तुम्हे विश्व विजेता बनने से कोई नहीं रोक सकता पर इन दो वीरो ने जीते जी कभी हार नहीं मानी।
*नेपाल का राज परिवार भी चित्तोर से निकला है दोनों में भाई और खून का रिश्ता है
*मेवाड़ राजघराना आज भी दुनिया का सबसे प्राचीन राजघराना है उस के बाद जापान का है
* महाराणा प्रताप के पूर्वज रानासांगा ने अकबर के दादा बाबर से खांवा मे युद्ध लडे थे और प्रताप ने अकबर से और महाराणा के बेटे अमर सिँह ने जहागीर को संधी के लिये मजबुर किया था और आपने 15 सालो के राज मे पूरा मेवार अपने कब्जे मे ले लिया था

Posted in कविता - Kavita - કવિતા

रुई का गद्दा बेच कर


रुई का गद्दा बेच कर
मैंने इक दरी खरीद ली,
ख्वाहिशों को कुछ कम किया मैंने
और ख़ुशी खरीद ली ।

सबने ख़रीदा सोना
मैने इक सुई खरीद ली,
सपनो को बुनने जितनी
डोरी ख़रीद ली ।

मेरी एक खवाहिश मुझसे
मेरे दोस्त ने खरीद ली,
फिर उसकी हंसी से मैंने
अपनी कुछ और ख़ुशी खरीद ली ।

इस ज़माने से सौदा कर
एक ज़िन्दगी खरीद ली,
दिनों को बेचा और
शामें खरीद ली ।

शौक-ए-ज़िन्दगी कमतर से
और कुछ कम किये,
फ़िर सस्ते में ही
“सुकून-ए-ज़िंदगी” खरीद ली..

https://baramdekidhoop.wordpress.com/2013/06/15/%E0%A4%96%E0%A4%BC%E0%A5%81%E0%A4%B6%E0%A5%80/

आं

अंकित सोलंकी

Posted in गौ माता - Gau maata

देसी गाय के पंचगव्य का उपयोग


Krishnapriya Goshala's photo.
Krishnapriya Goshala's photo.
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देसी गाय के पंचगव्य का उपयोग
1) देसी गाय का दही सेवन करने से कोलेस्ट्रॉल नियंत्रीत रहेता है I
2) देसी गाय के १० तोला घी से १ टन ऑक्सीजन निर्माण होता है I
3) अतीसार होनेपर देसी गाय के गरम दूध में निंबू निचोडकर सेवन करना चाहीए आराम मिलेगा I
4) हैजा, उलटी होनेपर देसी गाय का गोमूत्र सेवन करें आराम मिलेगा I
5) बछीया के गोबर का रस निकालकर गर्भवती महिला को प्रसव के समय पिलाने से प्रसव सहजता से होता है I
आपको कोई शारीरिक प्रोब्लेम हो तो Whats app पर कॉन्टॉक्ट करें 9922144444
www.krishnapriyagoshala.org, www.youtube.com/krishnapriyagoshalakinwat

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रोगप्रतिकारक शक्ति बनाये रखने के उपाय व सावधानियाँ


💫रोगप्रतिकारक शक्ति बनाये रखने के उपाय व सावधानियाँ💫

1- 90 प्रतिशत रोग केवल पेट से होते हैं। पेट में कब्ज नहीं रहना चाहिए। अन्यथा रोगों की कभी कमी नहीं रहेगी।
2- कुल 13 असाधारणीय शारीरिक वेग होते हैं । उन्हें रोकना नहीं चाहिए ।।
3-160 रोग केवल मांसाहार से होते है
4- 103 रोग भोजन के बाद जल पीने से होते हैं। भोजन के 1 घंटे बाद ही जल पीना चाहिये।
5- 80 रोग चाय पीने से होते हैं।
6- 48 रोग ऐलुमिनियम के बर्तन या कुकर के खाने से होते हैं।
7- शराब, कोल्डड्रिंक और चाय के सेवन से हृदय रोग होता है।
8- अण्डा खाने से हृदयरोग, पथरी और गुर्दे खराब होते हैं।
9- ठंडेजल (फ्रिज)और आइसक्रीम से बड़ीआंत सिकुड़ जाती है।
10- मैगी, गुटका, शराब, सूअर का माँस, पिज्जा, बर्गर, बीड़ी, सिगरेट, पेप्सी, कोक से बड़ी आंत सड़ती है।
11- भोजन के पश्चात् स्नान करने से पाचनशक्ति मन्द हो जाती है और शरीर कमजोर हो जाता है।
12- बाल रंगने वाले द्रव्यों(हेयरकलर) से आँखों को हानि (अंधापन भी) होती है।
13- दूध(चाय) के साथ नमक (नमकीन पदार्थ) खाने से चर्म रोग हो जाता है।
14- शैम्पू, कंडीशनर और विभिन्न प्रकार के तेलों से बाल पकने, झड़ने और दोमुहें होने लगते हैं।
15- गर्म जल से स्नान से शरीर की प्रतिरोधक शक्ति कम हो जाती है और शरीर कमजोर हो जाता है। गर्म जल सिर पर डालने से आँखें कमजोर हो जाती हैं।
16- टाई बांधने से आँखों और मस्तिश्क हो हानि पहुँचती है।
17- खड़े होकर जल पीने से घुटनों(जोड़ों) में पीड़ा होती है।
18- खड़े होकर मूत्रत्याग करने से रीढ़ की हड्डी को हानि होती है।
19- भोजन पकाने के बाद उसमें नमक डालने से रक्तचाप (ब्लडप्रेशर) बढ़ता है।
20- जोर लगाकर छींकने से कानों को क्षति पहुँचती है।
21- मुँह से साँस लेने पर आयु कम होती है।
22- पुस्तक पर अधिक झुकने से फेफड़े खराब हो जाते हैं और क्षय(टीबी) होने का डर रहता है।
23- चैत्र माह में नीम के पत्ते खाने से रक्त शुद्ध हो जाता है मलेरिया नहीं होता है।
24- तुलसी के सेवन से मलेरिया नहीं होता है।
25- मूली प्रतिदिन खाने से व्यक्ति अनेक रोगों से मुक्त रहता है।
26- अनार आंव, संग्रहणी, पुरानी खांसी व हृदय रोगों के लिए सर्वश्रेश्ठ है।
27- हृदयरोगी के लिए अर्जुनकी छाल, लौकी का रस, तुलसी, पुदीना, मौसमी, सेंधा नमक, गुड़, चोकरयुक्त आटा, छिलकेयुक्त अनाज औशधियां हैं।
28- भोजन के पश्चात् पान, गुड़ या सौंफ खाने से पाचन अच्छा होता है। अपच नहीं होता है।
29- अपक्व भोजन (जो आग पर न पकाया गया हो) से शरीर स्वस्थ रहता है और आयु दीर्घ होती है।
30- मुलहठी चूसने से कफ बाहर आता है और आवाज मधुर होती है।
31- जल सदैव ताजा (चापाकल, कुएं आदि का) पीना चाहिये, बोतलबंद (फ्रिज) पानी बासी और अनेक रोगों के कारण होते हैं।
32- नीबू गंदे पानी के रोग (यकृत, टाइफाइड, दस्त, पेट के रोग) तथा हैजा से बचाता है।
33- चोकर खाने से शरीर की प्रतिरोधक शक्ति बढ़ती है। इसलिए सदैव गेहूं मोटा ही पिसवाना चाहिए।
34- फल, मीठा और घी या तेल से बने पदार्थ खाकर तुरन्त जल नहीं पीना चाहिए।
35- भोजन पकने के 48 मिनट के अन्दर खा लेना चाहिए । उसके पश्चात् उसकी पोशकता कम होने लगती है। 12 घण्टे के बाद पशुओं के खाने लायक भी नहीं रहता है।।
36- मिट्टी के बर्तन में भोजन पकाने से पोशकता 100% कांसे के बर्तन में 97% पीतल के बर्तन में 93% अल्युमिनियम के बर्तन और प्रेशर कुकर में 7-13% ही बचते हैं।
37- गेहूँ का आटा 15 दिनों पुराना और चना, ज्वार, बाजरा, मक्का का आटा 7 दिनों से अधिक पुराना नहीं प्रयोग करना चाहिए।
38- मनष्य को मैदे से बनीं वस्तुएं (बिस्कुट, ब्रेड, पीज़ा समोसा आदि)
कभी भी नहीं खाना चाहिए।
39- खाने के लिए सेंधा नमक सर्वश्रेष्ठ होता है उसके बाद काला नमक का स्थान आता है। सफेद नमक जहर के समान होता है।
40- जल जाने पर आलू का रस, हल्दी, शहद, घृतकुमारी में से कुछ भी लगाने पर जलन ठीक हो जाती है और फफोले नहीं पड़ते।
41- सरसों, तिल,मूंगफली या नारियल का तेल ही खाना चाहिए। देशी घी ही खाना चाहिए है। रिफाइंड तेल और
वनस्पति घी (डालडा) जहर होता है।
42- पैर के अंगूठे के नाखूनों को सरसों तेल से भिगोने से आँखों की खुजली लाली और जलन ठीक हो जाती है।
43- खाने का चूना 70 रोगों को ठीक करता है।
44- चोट, सूजन, दर्द, घाव, फोड़ा होने पर उस पर 5-20 मिनट तक चुम्बक रखने से जल्दी ठीक होता है।
हड्डी टूटने पर चुम्बक का प्रयोग करने से आधे से भी कम समय में ठीक होती है।
45- मीठे में मिश्री, गुड़, शहद, देशी (कच्ची) चीनी का प्रयोग करना चाहिए सफेद चीनी जहर होता है।
46- कुत्ता काटने पर हल्दी लगाना चाहिए।
47-बर्तन मिटटी के ही परयोग करन चाहिए।
48- टूथपेस्ट और ब्रश के स्थान पर दातून और मंजन करना चाहिए दाँत मजबूत रहेंगे ।
(आँखों के रोग में दातून नहीं करना)
49- यदि सम्भव हो तो सूर्यास्त के पश्चात् न तो पढ़े और लिखने का काम तो न ही करें तो अच्छा है ।
50- निरोग रहने के लिए अच्छी नींद और अच्छा(ताजा) भोजन अत्यन्त आवश्यक है।
51- देर रात तक जागने से शरीर की प्रतिरोधक शक्ति कमजोर हो जाती है। भोजन का पाचन भी ठीक से नहीं हो पाता है आँखों के रोग भी होते हैं।
52- प्रातः का भोजन राजकुमार के समान, दोपहर का राजा और देर रात्रि का भिखारी के
समान ।

😊😊😊😊😊😊😊😊😊😊

आपने पढ़ा अब आगे ओर सब भी पढ़ें ऐसा कुछ करें । 💫

Posted in ज्योतिष - Astrology

राहु ग्रह


Pankaj Jain's photo.

राहु ग्रह : राहु अकेला ही ऐसा ग्रह है जो सबसे कम समय में किसी व्यक्ति को करोड़पति, अरबपति या फिर कंगाल भी बना सकता है तथा इसी लिए इस ग्रह को मायावी ग्रह के नाम से जाना जाता है। काला जादू करने वाले लोग भी राहु के विशेष प्रभाव में ही होते हैं।

इसके अतिरिक्त राहु को बिना सोचे समझे मन में आ जाने वाले विचार, बिना सोचे समझे अचानक मुंह से निकल जाने वाली बात, क्षणों में ही भारी लाभ अथवा हानि देने वाले क्षेत्रों जैसे जुआ, लाटरी, घुड़दौड़ पर पैसा लगाना, इंटरनैट तथा इसके माध्यम से होने वाले व्यवसायों तथा ऐसे ही कई अन्य व्यवसायों तथा क्षेत्रों का कारक माना जाता है।

कुंडली में राहु के बलहीन होने से अथवा किसी बुरे ग्रह के प्रभाव में होने से जातक को अपने जीवन में कई बार अचानक आने वाली हानियों तथा समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। ऐसे जातक बहुत सा धन कमा लेने के बावजूद भी उसे संचित करने में अथवा उस धन से संपत्ति बना लेने में आम तौर पर सक्षम नहीं हो पाते क्योंकि उनका कमाया धन साथ ही साथ खर्च होता रहता है। राहु पर अशुभ ग्रहों का प्रभाव कुंडली धारक को मानसिक रोगों, अनिद्रा के रोग, बुरे सपने आने की समस्या, त्वचा के रोगों तथा ऐसे ही अन्य कई बिमारियों से पीड़ित कर सकता है।

ख़राब राहु उपाय : काले कुत्ते को मीठी रोटियां खिलाएं. सरसों का तेल व काले तिल का दान दें. रात को सोते समय अपने सिरहाने में जौ रखें जिसे सुबह पंक्षियों को दें. बहते पानी में शीशा अथवा नारियल प्रवाहित करें.

पंकज कुमार जैन
मोबाइल नंबर 08267894348, www.horoscopesolutions.com
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