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देवालय चंद्रिका – एक देवप्रासाद-वास्‍तुशास्‍त्र


देवालय चंद्रिका – एक देवप्रासाद-वास्‍तुशास्‍त्र

देवालयों के निर्माण की कला बहुत रोचक है। बड़ी विज्ञान सम्‍मत। आज तो अलग से तैयार किए गए आवश्‍यक भागों को जमा दिया जाता है मगर प्राचीनकाल में बहुत ही नियोजित रूप से भूमि चयन से लेकर शिखर तक का न्‍यास खास गणना से किया जाता था।
15वीं सदी में हुए केरल के तंत्र समुच्‍चयकार श्री नारायण नंबूदिरीपाद ने ‘देवालयचंद्रिका’ की रचना की थी। मगर, इसका मूल पाठ उपलब्‍ध नहीं है, इस पर एक मलयालम टीका अड्डयार लाइब्रेरी, मद्रास में मौजूद है। 1958 में इस पर एक संक्षिप्‍त परिचयात्‍मक आलेख विश्‍वेश्‍वरानंद वैदिक संस्‍थान, होशियारपुर के प्रो. के. वी. शर्मा ने लिखा था। इसके बाद, यह पत्र प्रकाशित भी हुआ। यह पत्र मेरे लिए उपयोगी हुआ। मेरे लिए यह चुनौती थी कि इस ग्रंथ को कैसे तैयार किया जाए ? जो सूचनाएं मिलीं, उनका अनुसरण करते-करते पूर्वा-पर ग्रंथों से एक-एक श्‍लोक का चुनाव किया और उनकी संस्‍कृत टीका भी खोजी। इसी आधार पर यह ग्रंथ न केवल पहली बार संपादित हुआ, बल्कि हिंदी में अनूदित भी हुआ। सच यह है कि बीजों के आधार पर ही इसका पल्‍लवन हुआ है। केवल मंगलाचरण का श्‍लोक मिला था, मगर कैसे उनकी संख्‍या डेढ़ सौ तक पहुंची। परिश्रम और तलाश की इंतहा ही थी। आठ बरस लग गए। तीन अध्‍याय और करीब डेढ़ सौ श्‍लोक। देवालय निर्माण की विधि से लेकर बालालय, दण्‍ड, सभादि बनाने की युक्तियां भी इसमें है और शिवलिंग से लेकर वैष्‍णवादि प्रतिमाओं के निर्माण का विधान भी। परिशिष्‍ट में कठिन शब्‍दों के अंग्रेजी अर्थ तथा सुविधा के लिए श्‍लोकानुक्रमणिका। इस तरह बनी-ठनी देवालयचंद्रिका चंद रोज पहले ही पहली बार प्रकाशित होने गई है। आई तो आप सबके लिए जरूर एक उपहार होगा। दुआओं में हमेशा याद रखियेगा। जय-जय।

Shri Krishan Jugnu's photo.

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