Posted in भारतीय मंदिर - Bharatiya Mandir

एक हथिया देवाल मंदिर ।पिथौरागढ़ उत्तराखंड।


देवालय परिचय - Devalaya Parichay's photo.

एक हथिया देवाल मंदिर ।पिथौरागढ़ उत्तराखंड।

एक हाथ से बने इस मंदिर में आज तक नहीं हुई पूजा।

‪#‎Devalaya‬ ‪#‎Bhakti‬ ‪#‎Devotion‬ ‪#‎Temple‬
एक अद्भुत मंदिर उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले की डीडी हाट तहसील में स्थित है।पर यहां श्रद्धालु भगवान का पूजन नहीं करते। यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। यहां दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं, भगवान भोलेनाथ का दर्शन करते हैं, मंदिर की अनूठी स्थापत्य कला को निहारते हैं और पुनः अपने घरों को लौट जाते हैं। यहां भगवान की पूजा नहीं की जाती।
इस मंदिर का नाम एक हथिया देवाल है जिसका मतलब एक हाथ से बना हुआ। यह मंदिर बहुत प्राचीन है और पुराने ग्रंथों, अभिलेखों में भी इसका जिक्र आता है। किसी समय यहां राजा कत्यूरी का शासन था।उस दौर केशासकों को स्थापत्य कला से बहुत लगाव था। यहां तक कि वे इस मामले में दूसरों से प्रतिस्पर्द्धा भी करते थे। मंदिर में दर्शन के लिए लोग दूर-दूर से आते हैं। कुछ भक्तिवश तो कुछ जिज्ञासा के कारण यहां आकर मंदिर का स्वरूप देखते हैं और उस कारीगर की प्रशंसा करते हैं।
लोगों का मानना है कि एक बार यहां किसी कुशल कारीगर ने मंदिर का निर्माण करना चाहा। वह काम में जुट गया। कारीगर की एक और खास बात थी। उसने एक हाथ से मंदिर का निर्माण शुरू किया और पूरी रात में मंदिर बना भी दिया।राजा ने मंदिर देखा। उसे बहुत अच्छा लगा लेकिन एक बात उसे पसंद नहीं आई। मंदिर बहुत सुंदर था, इसलिए वह चाहता था कि इससे सुंदर मंदिर कोई और न बने। यही सोचकर उसने कारीगर के हाथ कटवा दिए।
जब जनता को यह बात मालूम हुई तो उसे बहुत दुख हुआ। लोगों ने यह फैसला किया कि उनके मन में भगवान भोलेनाथ के प्रति श्रद्धा तो पूर्ववत रहेगी लेकिन राजा के इस कृत्य का विरोध जताने के लिए वे मंदिर में पूजन आदि नहीं करेंगे।तब से यह सिलसिला चला आ रहा है। लोग भगवान शिव का दर्शन तो करते हैं लेकिन जिस विधि-विधान से उनका पूजन किया जाना चाहिए, वैसा यहां नहीं किया जाता।
इस मंदिर के बारे में एक और कथा भी प्रचलित है। उसके अनुसार उस मूर्तिकार का हाथ किसी दुर्घटना में खराब हो गया था। बाद में वह एक हाथ से ही मूर्तियां बनाने लगा। कुछ लोग उससे सवाल करते कि अब एक हाथ से वह काम कैसे कर सकेगा?बार-बार ऐसे सवाल सुनकर उसे क्रोध आता था। उसने प्रण कर लिया कि वह अब उस गांव को छोड़ देगा। एक रात उसने अपने उपकरण लिए और चला गया। जाते-जाते उसने गांव के बाहर खड़ी विशाल चट्टान को काटकर मंदिर का रूप दे दिया।सुबह लोगों ने देखा तो चकित रह गए। उन्होंने कारीगर की तलाश की लेकिन वह नहीं मिला। कारीगर जा चुका था। रात में जल्दबाजी से काम के दौरान कारीगर से एक भूल हो गई थी।उसने शिवलिंग का अरघा विपरीत दिशा में बना दिया था। शास्त्रों के अनुसार यह दोष होने के कारण शिवलिंग की पूजा शुभ फल नहीं देती। इसलिए यहां बने शिवलिंग की आज तक पूजा नहीं हुई।

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