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हिंदू इतिहास और पुराण अनुसार ऐसे आठ व्यक्ति हैं,


हिंदू इतिहास और पुराण अनुसार ऐसे आठ व्यक्ति हैं, जो चिरंजीवी हैं। यह सब किसी न किसी वचन, नियम या शाप से बंधे हुए हैं और यह सभी दिव्य शक्तियों से संपन्न है। योग में जिन अष्ट सिद्धियों की बात कही गई है वे सारी शक्तियाँ इनमें विद्यमान है। यह परामनोविज्ञान जैसा है, जो परामनोविज्ञान और टेलीपैथी विद्या जैसी आज के आधुनिक साइंस की विद्या को जानते हैं वही इस पर विश्वास कर सकते हैं। आओ जानते हैं कि हिंदू धर्म अनुसार कौन से हैं यह आठ जीवित महामानव।

अश्वत्थामा बलिव्र्यासो हनूमांश्च विभीषण:।
कृप: परशुरामश्च सप्तएतै चिरजीविन:॥
सप्तैतान् संस्मरेन्नित्यं मार्कण्डेयमथाष्टमम्।
जीवेद्वर्षशतं सोपि सर्वव्याधिविवर्जित।।

अर्थात इन आठ लोगों (अश्वथामा, दैत्यराज बलि, वेद व्यास, हनुमान, विभीषण, कृपाचार्य, परशुराम और मार्कण्डेय ऋषि) का स्मरण सुबह-सुबह करने से सारी बीमारियां समाप्त होती हैं और मनुष्य 100 वर्ष की आयु को प्राप्त करता है।

प्राचीन मान्यताओं के आधार पर यदि कोई व्यक्ति हर रोज इन आठ अमर लोगों (अष्ट चिरंजीवी) के नाम भी लेता है तो उसकी उम्र लंबी होती है।

१. हनुमान – कलियुग में हनुमानजी सबसे जल्दी प्रसन्न होने वाले देवता माने गए हैं और हनुमानजी भी इन अष्ट चिरंजीवियों में से एक हैं। सीता ने हनुमान को लंका की अशोक वाटिका में राम का संदेश सुनने के बाद आशीर्वाद दिया था कि वे अजर-अमर रहेंगे। अजर-अमर का अर्थ है कि जिसे ना कभी मौत आएगी और ना ही कभी बुढ़ापा। इस कारण भगवान हनुमान को हमेशा शक्ति का स्रोत माना गया है क्योंकि वे चीरयुवा हैं।

२. कृपाचार्य- महाभारत के अनुसार कृपाचार्य कौरवों और पांडवों के कुलगुरु थे। कृपाचार्य गौतम ऋषि पुत्र हैं और इनकी बहन का नाम है कृपी। कृपी का विवाह द्रोणाचार्य से हुआ था। कृपाचार्य, अश्वथामा के मामा हैं। महाभारत युद्ध में कृपाचार्य ने भी पांडवों के विरुद्ध कौरवों का साथ दिया था।

३. अश्वथामा- ग्रंथों में भगवान शंकर के अनेक अवतारों का वर्णन भी मिलता है। उनमें से एक अवतार ऐसा भी है, जो आज भी पृथ्वी पर अपनी मुक्ति के लिए भटक रहा है। ये अवतार हैं गुरु द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा का। द्वापरयुग में जब कौरव व पांडवों में युद्ध हुआ था, तब अश्वत्थामा ने कौरवों का साथ दिया था। महाभारत के अनुसार अश्वत्थामा काल, क्रोध, यम व भगवान शंकर के सम्मिलित अंशावतार थे। अश्वत्थामा अत्यंत शूरवीर, प्रचंड क्रोधी स्वभाव के योद्धा थे। धर्म ग्रंथों के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण ने ही अश्वत्थामा को चिरकाल तक पृथ्वी पर भटकते रहने का श्राप दिया था।
अश्वथाम के संबंध में प्रचलित मान्यता… मध्य प्रदेश के बुरहानपुर शहर से 20 किलोमीटर दूर एक किला है। इसे असीरगढ़ का किला कहते हैं। इस किले में भगवान शिव का एक प्राचीन मंदिर है। यहां के स्थानीय निवासियों का कहना है कि अश्वत्थामा प्रतिदिन इस मंदिर में भगवान शिव की पूजा करने आते हैं।

४. ऋषि मार्कण्डेय- भगवान शिव के परम भक्त हैं ऋषि मार्कण्डेय। इन्होंने शिवजी को तप कर प्रसन्न किया और महामृत्युंजय मंत्र सिद्धि के कारण चिरंजीवी बन गए।

५. विभीषण- राक्षस राज रावण के छोटे भाई हैं विभीषण। विभीषण श्रीराम के अनन्य भक्त हैं। जब रावण ने माता सीता हरण किया था, तब विभीषण ने रावण को श्रीराम से शत्रुता न करने के लिए बहुत समझाया था। इस बात पर रावण ने विभीषण को लंका से निकाल दिया था। विभीषण श्रीराम की सेवा में चले गए और रावण के अधर्म को मिटाने में धर्म का साथ दिया।

६. राजा बलि- शास्त्रों के अनुसार राजा बलि भक्त प्रहलाद के वंशज हैं। बलि ने भगवान विष्णु के वामन अवतार को अपना सब कुछ दान कर दिया था। इसी कारण इन्हें महादानी के रूप में जाना जाता है। राजा बलि से श्रीहरि अतिप्रसन्न थे। इसी वजह से श्री विष्णु राजा बलि के द्वारपाल भी बन गए थे।

७. ऋषि व्यास- ऋषि भी अष्ट चिरंजीवी हैँ और इन्होंने चारों वेद (ऋग्वेद, अथर्ववेद, सामवेद और यजुर्वेद) का सम्पादन किया था। साथ ही, इन्होंने ही सभी 18 पुराणों की रचना भी की थी। महाभारत और श्रीमद्भागवत् गीता की रचना भी वेद व्यास द्वारा ही की गई है। इन्हें वेद व्यास के नाम से भी जाना जाता है। वेद व्यास, ऋषि पाराशर और सत्यवती के पुत्र थे। इनका जन्म यमुना नदी के एक द्वीप पर हुआ था और इनका रंग सांवला था। इसी कारण ये कृष्ण द्वैपायन कहलाए।

८. परशुराम- भगवान विष्णु के छठें अवतार हैं परशुराम। परशुराम के पिता ऋषि जमदग्नि और माता रेणुका थीं। इनका जन्म हिन्दी पंचांग के अनुसार वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को हुआ था। इसलिए वैशाख मास के शुक्ल पक्ष में आने वाली तृतीया को अक्षय तृतीया कहा जाता है। परशुराम का जन्म समय सतयुग और त्रेता के संधिकाल में माना जाता है। परशुराम ने 21 बार पृथ्वी से समस्त क्षत्रिय राजाओं का अंत किया था। परशुराम का प्रारंभिक नाम राम था। राम ने शिवजी को प्रसन्न करने के लिए कठोर तप किया था। शिवजी तपस्या से प्रसन्न हुए और राम को अपना फरसा (एक हथियार) दिया था। इसी वजह से राम परशुराम कहलाने लगे ।

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शुक्र ग्रह और महिलाएं


शुक्र ग्रह और महिलाएं

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शुक्र ग्रह और महिलाएं

शुक्र एक शुभ एवं रजोगुणी ग्रह है। यह विवाह , वैवाहिक जीवन , प्यार , रोमांस , जीवन साथी तथा यौन सम्बन्धों का नैसर्गिक कारक है। यह सौंदर्य , जीवन का सुख , वाहन , सुगंध और सौन्दर्य प्रसाधन का कारक भी है।

किसी भी स्त्री की कुंडली में जैसे वृहस्पति ग्रह महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है , वैसे ही शुक्र भी दाम्पत्य जीवन में प्रमुख भूमिका निभाता है।

कुंडली का अच्छा शुक्र चेहरा देखने से ही प्रतीत हो जाता है। यह स्त्री के चेहरे को आकर्षण का केंद्र बनाता है। यहाँ यह जरुरी नहीं की स्त्री का रंग गोरा है या सांवला।

सुन्दर -नेत्र और सुंदर केशराशि से पहचाना जा सकता है स्त्री का शुक्र शुभ ग्रहों के सानिध्य में है। वह सोंदर्य -प्रिय भी होती है।

अच्छे शुक्र के प्रभाव से स्त्री को हर सुख सुविधा प्राप्त होती है। वाहन , घर , ज्वेलरी , वस्त्र सभी उच्च कोटि के। किसी भी वर्ग की औरत हो , उच्च , मध्यम या निम्न उसे अच्छा शुक्र सभी वैभव प्रदान करता ही है। यहाँ यह कहना भी जरुरी है अगर आय के साधन सीमित भी हो तो भी वह ऐशो आराम से ही रहती है।

अच्छा शुक्र किसी भी स्त्री को गायन , अभिनय ,काव्य -लेखन की और प्रेरित करता है। चन्द्र के साथ शुक्र हो तो स्त्री भावुक होती है। और अगर साथ में बुध का साथ भी मिल जाये तो स्त्री लेखन के क्षेत्र में पारंगत होती है और साथ ही में वाक् पटु भी , बातों में उससे शायद ही कोई जीत पाता हो।

अच्छा शुक्र स्त्री में मोटापा भी देता है।जहाँ वृहस्पति स्त्री को थुलथुला मोटापा दे कर अनाकर्षक बनता है वही शुक्र से आने वाला मोटापा स्त्री को और भी सुन्दर दिखाता है।यहाँ हम शुभा मुदगल और किरन खेर , फरीदा जलाल का उदाहरण दे सकते हैं।

कुंडली का बुरा शुक्र या पापी ग्रहों का सानिध्य या कुंडली के दूषित भावों का साथ स्त्री में चारित्रिक दोष भी उत्पन्न करवा सकता है।यह विलम्ब से विवाह , कष्ट प्रद दाम्पत्य जीवन , बहु विवाह , तलाक की और भी इशारा करता है। अगर ऐसा हो तो स्त्री को हीरा पहनने से परहेज़ करना चाहिए।

कमज़ोर शुक्र स्त्री में मधुमेह , थाइराईड , यौन रोग , अवसाद और वैभव हीनता लाता है।

शुक्र को अनुकूल करने के लिए शुक्रवार का व्रत और माँ लक्ष्मी जी की आराधना करनी चाहिए। चावल , दही , कपूर , सफ़ेद -वस्त्र , सफ़ेद पुष्प का दान देना अनुकूल रहता है। छोटी कन्याओं को चावल में इलाइची डाल कर खीर भी खिलानी चाहिए।

कनक – धारा , श्री सूक्त , लक्ष्मी स्त्रोत , लक्ष्मी चालीसा का पाठ और लक्ष्मी मन्त्रों का जाप भी शुक्र को बलवान करता है।माँ लक्ष्मी को गुलाब का इत्र अर्पण करना विशेष फलदायी है।

हीरा भी धारण किया जा सकता है पर किसी अच्छे ज्योतिषी से कुंडली का विश्लेष्ण करवाने के बाद।

जन्म -कुंडली के अलग -अलग भावों और ग्रहों के साथ शुक्र के प्रभाव में अंतर आ सकता है। इसको आप एक सामान्य विश्लेष्ण माने ।

राधेकृष्ण
श्री राधा विजयते नमः

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सच्चा सुख –


सच्चा सुख –

एक सम्राट गहरी चिंता में डूबा रहता। कहने को तो वह शासक था पर वह अपने को अशक्त, परतंत्र और पराजित अनुभव करता था। एक दिन वह अपनी चिंताओं से पीछा छुड़ाने के लिए बहुत दूर एक जंगल में निकल पड़ा। उसे वहां बांसुरी के स्वर सुनाई पड़े। एक झरने के पास वृक्षों की छाया तले एक युवा चरवाहा बांसुरी बजा रहा था। उसकी भेड़ें पास में ही विश्राम कर रही थीं। सम्राट ने चरवाहे से कहा,’तुम तो ऐसे आनंदित हो जैसे तुम्हें कोई साम्राज्य ही मिल गया है।’ चरवाहे ने कहा, ‘आप ठीक कहते हैं। मैं सम्राट हूं।’ राजा ने आश्चर्य से पूछा, ‘ऐसा क्या है, जिसके कारण तुम अपने को सम्राट कहते हो?’

चरवाहा बोला,’व्यक्ति संपत्ति और शक्ति के कारण नहीं, स्वतंत्रता के कारण सम्राट होता है। मेरे पास तो कुछ भी नहीं है सिवा स्वयं के। मैं इसे ही अपनी संपदा मानता हूं। सौंदर्य को देखने के लिए मेरे पास आंखें हैं। प्रेम करने के लिए मेरे पास हृदय है। सूर्य जितना प्रकाश मुझे देता है उससे ज्यादा सम्राट को नहीं देता। चंद्रमा जितनी चांदनी मुझ पर बरसाता है उससे ज्यादा सम्राट पर नहीं बरसाता। सुंदर फूल जितने सम्राट के लिए खिलते हैं उतने ही मेरे लिए भी खिलते हैं। सम्राट पेट भर खाता है और तन भर पहनता है। मैं भी वही करता हूं। फिर सम्राट के पास ऐसा क्या है जो मेरे पास नहीं है। मेरे पास तो एक सम्राट से ज्यादा ही कुछ है। मैं जब चाहता हूं संगीत का सुख लेता हूं, जब चाहता हूं सो जाता हूं, जबकि एक सम्राट चाहकर भी ऐसा नहीं कर सकता।’ सम्राट हतप्रभ हो चरवाहे को देखता रह गया।

शिक्षा — सब सुविधायें एकत्र करने से सुख नहीं प्राप्त होता है सुख मिलता है संतुष्टि से । जीवन मे आप कितना भी अर्जन कर ले परंतु यदि संतुष्टि नहीं है तो सब व्यर्थ हो जाता है क्योंकि संतुष्टि न होने से आप कभी सुख का अनुभव ही नहीं कर पाएंगे ।

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शुक्राचार्य :-


शुक्राचार्य :-
असुराचार्य, भृगु ऋषि तथा हिरण्यकशिपु की पुत्री दिव्या के पुत्र जो शुक्राचार्य के नाम से अधिक ख्यात हें। इनका जन्म का नाम ‘शुक्र उशनस’ है। पुराणों के अनुसार याह दैत्यों के गुरू तथा पुरोहित थे।

कहते हैं, भगवान के वामनावतार में तीन पग भूमि प्राप्त करने के समय, यह राजा बलि की झारी के मुख में जाकर बैठ गए और बलि द्वारा दर्भाग्र से झारी साफ करने की क्रिया में इनकी एक आँख फूट गई। इसीलिए यह “एकाक्ष” भी कहे जाते थे। आरंभ में इन्होंने अंगिरस ऋषि का शिष्यत्व ग्रहण किया किंतु जब वह अपने पुत्र के प्रति पक्षपात दिखाने लगे तब इन्होंने शंकर की आराधना कर मृतसंजीवनी विद्या प्राप्त की जिसके बल पर देवासुर संग्राम में असुर अनेक बार जीते। इन्होंने 1,000 अध्यायोंवाले “बार्हस्पत्य शास्त्र” की रचना की। ‘गो’ और ‘जयंती’ नाम की इनकी दो पत्नियाँ थीं। असुरों के आचार्य होने के कारण ही इन्हें ‘असुराचार्य’ कहते हैं।

शुक्राचार्य से संबन्धित कुछ विशेष बातें –
01- शुक्राचार्य की कन्या का नाम देवयानी तथा पुत्र का नाम शंद और अमर्क था।
02- बृहस्पति के पुत्र कच ने इनसे संजीवनी विद्या सीखी थी ।
03- दैत्यों के गुरु शुक्र का वर्ण श्वेत है। उनके सिर पर सुन्दर मुकुट तथा गले में माला हैं वे श्वेत कमल के आसन पर विराजमान हैं। उनके चार हाथों में क्रमश:- दण्ड, रुद्राक्ष की माला, पात्र तथा वरदमुद्रा सुशोभित रहती है।
04- महर्षि भृगु के पुत्र शुक्राचार्य जी ने बृहस्पति जी से प्रतिद्वन्द्विता रखने के कारण दैत्यों का आचार्यत्व स्वीकार किया।
05- शुक्राचार्य दानवों के पुरोहित हैं। ये योग के आचार्य हैं। अपने शिष्य दानवों पर इनकी कृपा सर्वदा बरसती रहती है। इन्होंने भगवान शिव की कठोर तपस्या करके उनसे मृत संजीवनी विद्या प्राप्त की थी। उसके बल से ये युद्ध में मरे हुए दानवों को ज़िंदा कर देते थे।
06- आचार्य शुक्र वीर्य के अधिष्ठाता हैं। दृश्य जगत में उनके लोक शुक्र तारक का भूमि एवं जीवन पर प्रभाव ज्यौतिषशास्त्र में वर्णित है।
07- आचार्य शुक्र नीति शास्त्र के प्रवर्तक थे। इनकी शुक्र नीति अब भी लोक में महत्त्वपूर्ण मानी जाती है। इनके पुत्र षण्ड और अमर्क हिरण्यकशिपु के यहाँ नीति शास्त्र का अध्यापन करते थे।
08- मत्स्य पुराण के अनुसार शुक्राचार्य ने असुरों के कल्याण के लिये ऐसे कठोर व्रत का अनुष्ठान किया जैसा आज तक कोई नहीं कर सकां इस व्रत से इन्होंने देवाधिदेव शंकर को प्रसन्न कर लिया। शिव ने इन्हें वरदान दिया कि तुम युद्ध में देवताओं को पराजित कर दोगे और तुम्हें कोई नहीं मार सकेगा। भगवान शिव ने इन्हें धन का भी अध्यक्ष बना दिया। इसी वरदान के आधार पर शुक्राचार्य इस लोक और परलोक की सारी सम्पत्तियों के स्वामी बन गये।
09- महाभारत के अनुसार सम्पत्ति ही नहीं, शुक्राचार्य औषधियों, मन्त्रों तथा रसों के भी स्वामी हैं। इनकी सामर्थ्य अद्भुत है। इन्होंने अपनी समस्त सम्पत्ति अपने शिष्य असुरों को दे दी और स्वयं तपस्वी-जीवन ही स्वीकार किया।
10- ब्रह्मा की प्रेरणा से शुक्राचार्य ग्रह बनकर तीनों लोकों के प्राण का परित्राण करने लगे। कभी वृष्टि, कभी अवृष्टि, कभी भय, कभी अभय उत्पन्न कर ये प्राणियों के योग-क्षेम का कार्य पूरा करते हैं। ये ग्रह के रूप में ब्रह्मा की सभा में भी उपस्थित होते हैं। लोकों के लिये ये अनुकूल ग्रह हैं तथा वर्षा रोकने वाले ग्रहों को शान्त कर देते हैं। इनके अधिदेवता इन्द्राणी तथा प्रत्यधिदेवता इन्द्र हैं।
11- मत्स्य पुराण के अनुसार शुक्राचार्य का वर्ण श्वेत है। इनका वाहन रथ है, उसमें अग्नि के समान आठ घोड़े जुते रहते हैं। रथ पर ध्वजाएँ फहराती रहती हैं। इनका आयुध दण्ड है। शुक्र वृष और तुला राशि के स्वामी हैं तथा इनकी महादशा 20 वर्ष की होती है।

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बृहस्पति पुत्र कच व शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी –


बृहस्पति पुत्र कच व शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी –

बार-बार देवताओ और राक्षसों में युद्ध होता रहा देवता जीतते हुए भी युद्ध हार जाते थे क्यों की राक्षसों के गुरु शुक्राचार्य के पास संजीवनी विद्या थी ! वे मृत व घायल राक्षसों को पुनः जिन्दा कर देते थे, राक्षस राजा वृषपर्वा और देवराज़ इंद्र के बीच युद्ध हुआ, युद्ध में देवताओ की पराजय हुई, देवता अपनी हार से बहुत दुखी थे सभी गुरु बृहस्पति के पास मंत्रणा हेतु पहुचे विचार-बिमर्ष में गुरु बृहस्पति ने कहा की शुक्राचार्य के पास संजीवनी विद्या है उसका तोड़ हमारे पास नहीं है इस नाते किसी को उनके पास जाकर यह विद्य सीखनी पड़ेगी तब हम विजय प्राप्त कर सकेगे, देवता बहुत दुखी हुए कौन जायेगा राक्षसों के यहाँ ? कौन अपनी जान खतरे में डालेगा ? उनके गुरुकुल में क्या राक्षस उसे पहचानेगे नहीं ? सभी एक दुसरे का मुख देखने लगे –तब-तक एक बालक ने कहा मै जाउगा संजीवनी विद्य सीखने के लिए –! यह साहसी बृहस्पति पुत्र कच था । देवराज इन्द्र इसके लिए तैयार नहीं थे, मै अपने स्वार्थ के लिए गुरु पुत्र का बलिदान नहीं ले सकता, इस पर गुरु पुत्र कच ने कहा की मै गुरु पुत्र हु हमारा कर्तब्य बनता है की मै अपने समाज, अपने राष्ट्र और अपने शिष्यों की रक्षा करू पिता बृहस्पति से आशीर्वाद के साथ वह शुक्राचार्य के आश्रम (गुरुकुल ) चला गया|
अप्रत्यासित घटना–! वह समिधा लेकर गुरु शुक्राचार्य के पास गया अपना परिचय दिया शुक्राचार्य अपने मित्र बृहस्पति के पुत्र को अपने गुरुकुल में शिक्षा देना है यह सोचकर बड़े प्रसंद हुए गुरुकुल में प्रवेश दे दिया, लेकिन बाद में उन्हें चिंता हुई की यदि राक्षसों को पता चला तो क्या होगा ? वे सतर्क रहते, कच आश्रम में बड़े ही लगन व प्रेम से रहता आश्रम वासियों का वह प्रिय हो गया राक्षसगुरु शुक्राचार्य पुत्री देवयानी उसकी प्रतिभा से अछूती न रह सकी धीरे-धीरे उसे कच से प्रेम होने लगा, कच प्रति दिन गाय चराने जंगल में जाता वहां से आश्रम हेतु लकड़ी लेकर आता वह बहुत अच्छा शिष्य था, कुछ दिन बीतने के पश्चात् राक्षसों को यह पता चल गया की शुक्राचार्य के गुरुकुल में देवताओं के गुरु बृहस्पति का लड़का पढता है उन्हें यह बात अच्छी नहीं लगी एक बार तो राक्षसराज ने विरोध भी किया लेकिन शुक्राचार्य ने इसकी परवाह नहीं किया, प्रति दिन की भांति कच जब गाय चराने गया था तो वह देर शाम तक नहीं लौटा आश्रम वासी बड़े दुखी हो गए सबने गुरु शुक्राचार्य से विनती की शुक्राचार्य ने ध्यान लगाया तो देखा कि राक्षसों ने उसकी हत्या कर दी, वे बहुत दुखी होते है की अपने सहपाठी बृहस्पति को क्या उत्तर देगे देवयानी सहित सभी आश्रमवासियों के प्रार्थना पर कच के मृत शरीर को मगाकर शुक्राचार्य ने संजीवनी विद्या से कच को जीवित कर दिया लेकिन उन्होंने कच से कहा की पुत्र तुम अब यहाँ से अपने देश पिता के यहाँ देवलोक चले जावो लेकिन कच का उद्देश्य तो संजीवनी विद्या सीखना था उसने कहा की आचार्य मै तो बिना शिक्षा पूर्ण किये नहीं जाउगा और देवयानी सहित सभी आश्रमवासी के आग्रह पर उसे रुकने की अनुमति इस शर्त पर मिल जाती है की वह आश्रम के बाहर सतर्कता के साथ जायेगा, यह बात राक्षसों को पता चल गया कि कच को आचार्य ने जिन्दा कर दिया वे उसकी हत्या करने की ताक में रहने लगे । दिन व् दिन -देवयानी का कच के प्रति आकृषण बढ़ता ही जा रहा था । देवयानी -कच से प्रेम करने लगी संयोग से एक दिन कच पुनः जंगल में आश्रम हेतु लकड़ी लेने गया था कि अवसर देखकर राक्षसों ने फिर उसकी हत्या कर उसके टुकड़े कर जंगल में बिखेर दिया, कच देर रात तक आश्रम नहीं लौटा आश्रमवासी बहुत चिंतित हो गए और देवयानी तो विह्बल हो गयी सबने मिलकर फिर शुक्राचार्य से कहा- कच कहाँ रह गया, चिंतित शुक्राचार्य ने ध्यान लगाया तो पता चला की उसे तो टुकड़े- टुकड़े कर राक्षसों ने जंगल में बिखेर दिया है बड़ी ही कठिनाई से आचार्य ने उसे इकठ्ठा करा पुनः इस शर्त पर जीवित किया की वह अपने राज्य चला जायेगा क्योंकि कब-तक उसे जीवित करते रहेगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ उसने पुनः वही शब्द दुहराया की मेरी शिक्षा का क्या होगा ? देवयानी भी जिद करने लगी की ये यहीं रहेगा और वह वही रहकर शिक्षा ग्रहण करने लगा, राक्षसों को जब यह पता चला की कच फिर जिन्दा हो गया है तो उन्हें लगा की कही उसे संजीवनी विद्या न सिखा दे, राक्षसों ने कड़ा पहरा लगा दिया कच भी बाहर नहीं निकलता लेकिन होनी को कौन टाल सकता था । एक दिन वह फिर जंगल लकड़ी लेने गया कि राक्षसों ने उसे मारकर उसके शरीर का सोमरस बनाकर शुक्राचार्य को पिला दिया, वह नहीं लौटा कहाँ है कच उसकी चिंता सबको सताने लगी, देवयानी बहुत ही दुखी हो गयी उसका दुःख शुक्राचार्य से नहीं देखा जाता था । वह उनकी कमजोरी थी । अब क्या करें ? उन्होंने फिर ध्यान किया तो पता चला कि वह तो मेरे पेट में है —-देवयानी से कहा -पुत्री वह तो मेरे पेट में है ! तुम्हे दोनों मे से एक ही मिलेगा पिता चाहिए अथवा कच, देवयानी बिना कच के नहीं रह सकती उसने कहा पिता जी मुझे पिता भी चाहिए कच भी !
अंत में शुक्राचार्य ने संजीवनी विद्या अपने पेट में ही कच को सिखाया शुक्राचार्य के पेट को आपरेशन कर कच को बाहर किया गया और कच ने उसी संजीवनी विद्या से शुक्राचार्य को जीवित किया, अब उसकी शिक्षा पूर्ण हो चुकी थी अपने गुरु को प्रणाम कर वह अपने देश जाने लगा देवयानी ने उसे रोकना चाहा और कहा- मै तुमसे प्रेम करती हूँ तुम मुझे छोड़कर कैसे जा सकते हो? कच ने कहा कि मै तो तुम्हे गुरु पुत्री के नाते अपनी बहन ही मानता रहा, प्रेम करता रहा आचार्य ने मुझे पुत्र के समान मानकर ही शिक्षा दी, मै ऐसा कैसे कर सकता हूँ मेरे लिए मानव जीवन मूल्य ही सर्वश्रेष्ठ है, देवयानी बहुत दुखी हुई वह बोली, ” मैं और मैरे कुल मे रक्त सम्बन्धों मे ही विवाह निषेध अतः आप मुझसे विवाह कर सकते है । तब कच ने कहा कि हमारा विवाह फिर भी नहीं हो सकता क्योंकि मेरा अन्तिम बार जन्म गुरु शुक्राचार्य के पेट से हुआ है अतः हमारा तुम्हारा रक्त संबंध भी हुआ इस नाते भी मे तुम्हारा भाई हुआ और तुमसे विवाह अधर्म होगा जो मे नहीं कर सकता । तब देवयानी ने क्रोध वश कच को शाप दिया कि जिस विध्या के कारण तुमने मुझे व मेरे पिता को छला है वह विध्या तुम्हारे लिए निरर्थक हो जाएगी तुम इसका प्रयोग नहीं कर पाओगे और यदि तुमने किसी को यह विध्या सिखाई तो तुम्हारी मृत्यु हो जाएगी । लेकिन कच ने तो अपने राष्ट्र, देश और देवताओ के गौरव को बचाने हेतु अपना सब कुछ न्यवछावर कर दिया था, वह देवताओ, आर्यों, स्वधर्म रक्षार्थ देवलोक लौट गया और वहाँ अपने पिता को संजीवनी विध्या सीखकर स्वम मृत्यु को प्राप्त हो गया । शापित होने के कारण संजीवनी विध्या का उस पर कोई प्रभाव नहीं हुआ । अतः अपने कुल और लोक कि रक्षा के कच ने अपना बलिदान दे दिया ।

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एक ऐसा सन्देश जो आपके मर्म को


एक ऐसा सन्देश जो आपके मर्म को
छू लेगा —-
गाँव में एक किसान रहता था जो दूध से दही और मक्खन बनाकर बेचने का काम करता था।
एक दिन बीवी ने उसे मक्खन तैयार करके दिया वो उसे बेचने के लिए अपने गाँव से शहर की तरफ रवाना हुवा।वो मक्खन गोल पेढ़ो की शकल मे बना हुवा था और हर पेढ़े का वज़न एक kg था।शहर मे किसान ने उस मक्खन को हमेशा की तरह एक दुकानदार को बेच दिया,और दुकानदार से चायपत्ती,चीनी,तेल और साबुन व गैरह खरीदकर वापस अपने गाँव को रवाना हो गया.
किसान के जाने के बाद ……दुकानदार ने मक्खन को फ्रिज़र मे रखना शुरू किया…..उसे खयाल आया के क्यूँ ना एक पेढ़े का वज़न किया जाए, वज़न करने पर पेढ़ा सिर्फ 900 gm. का निकला, हैरत और निराशा से उसने सारे पेढ़े तोल डाले मगर किसान के लाए हुए सभी पेढ़े 900-900 gm.के ही निकले।
अगले हफ्ते फिर किसान हमेशा की तरह मक्खन लेकर जैसे ही दुकानदार की दहलीज़ पर चढ़ा, दुकानदार ने किसान से चिल्लाते हुए कहा, के वो दफा हो जाए, किसी बे-ईमान और धोखेबाज़ शखस से कारोबार करना उसे गवारा नही।900 gm.मक्खन को पूरा एक kg.कहकर बेचने वाले शख्स की वो शक्ल भी देखना गवारा नही करता.
किसान ने बड़ी ही आजिज़ी (विनम्रता) से दुकानदार से कहा–
“मेरे भाई मुझसे बद-ज़न ना हो हम तो गरीब और बेचारे लोग है, हमारी माल तोलने के लिए बाट (वज़न) खरीदने की हैसियत कहाँ” आपसे जो एक किलो चीनी लेकर जाता हूँ उसी को तराज़ू के एक पलड़े मे रखकर दूसरे पलड़े मे उतने ही वज़न का मक्खन तोलकर ले आता हूँ।
इस कहानी को पढ़ने के बाद आप क्या महसूस करते हैं, किसी पर उंगली उठाने से पहले क्या हमें अपने गिरहबान मे झांक कर देखने की ज़रूरत नही……?
कहीं ये खराबी हमारे अंदर ही तो मौजूद नही…..?
क्योंकि अपने अंदर झांकना बहुत ही मुश्किल काम है…

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एक हथिया देवाल मंदिर ।पिथौरागढ़ उत्तराखंड।


देवालय परिचय - Devalaya Parichay's photo.

एक हथिया देवाल मंदिर ।पिथौरागढ़ उत्तराखंड।

एक हाथ से बने इस मंदिर में आज तक नहीं हुई पूजा।

‪#‎Devalaya‬ ‪#‎Bhakti‬ ‪#‎Devotion‬ ‪#‎Temple‬
एक अद्भुत मंदिर उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले की डीडी हाट तहसील में स्थित है।पर यहां श्रद्धालु भगवान का पूजन नहीं करते। यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। यहां दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं, भगवान भोलेनाथ का दर्शन करते हैं, मंदिर की अनूठी स्थापत्य कला को निहारते हैं और पुनः अपने घरों को लौट जाते हैं। यहां भगवान की पूजा नहीं की जाती।
इस मंदिर का नाम एक हथिया देवाल है जिसका मतलब एक हाथ से बना हुआ। यह मंदिर बहुत प्राचीन है और पुराने ग्रंथों, अभिलेखों में भी इसका जिक्र आता है। किसी समय यहां राजा कत्यूरी का शासन था।उस दौर केशासकों को स्थापत्य कला से बहुत लगाव था। यहां तक कि वे इस मामले में दूसरों से प्रतिस्पर्द्धा भी करते थे। मंदिर में दर्शन के लिए लोग दूर-दूर से आते हैं। कुछ भक्तिवश तो कुछ जिज्ञासा के कारण यहां आकर मंदिर का स्वरूप देखते हैं और उस कारीगर की प्रशंसा करते हैं।
लोगों का मानना है कि एक बार यहां किसी कुशल कारीगर ने मंदिर का निर्माण करना चाहा। वह काम में जुट गया। कारीगर की एक और खास बात थी। उसने एक हाथ से मंदिर का निर्माण शुरू किया और पूरी रात में मंदिर बना भी दिया।राजा ने मंदिर देखा। उसे बहुत अच्छा लगा लेकिन एक बात उसे पसंद नहीं आई। मंदिर बहुत सुंदर था, इसलिए वह चाहता था कि इससे सुंदर मंदिर कोई और न बने। यही सोचकर उसने कारीगर के हाथ कटवा दिए।
जब जनता को यह बात मालूम हुई तो उसे बहुत दुख हुआ। लोगों ने यह फैसला किया कि उनके मन में भगवान भोलेनाथ के प्रति श्रद्धा तो पूर्ववत रहेगी लेकिन राजा के इस कृत्य का विरोध जताने के लिए वे मंदिर में पूजन आदि नहीं करेंगे।तब से यह सिलसिला चला आ रहा है। लोग भगवान शिव का दर्शन तो करते हैं लेकिन जिस विधि-विधान से उनका पूजन किया जाना चाहिए, वैसा यहां नहीं किया जाता।
इस मंदिर के बारे में एक और कथा भी प्रचलित है। उसके अनुसार उस मूर्तिकार का हाथ किसी दुर्घटना में खराब हो गया था। बाद में वह एक हाथ से ही मूर्तियां बनाने लगा। कुछ लोग उससे सवाल करते कि अब एक हाथ से वह काम कैसे कर सकेगा?बार-बार ऐसे सवाल सुनकर उसे क्रोध आता था। उसने प्रण कर लिया कि वह अब उस गांव को छोड़ देगा। एक रात उसने अपने उपकरण लिए और चला गया। जाते-जाते उसने गांव के बाहर खड़ी विशाल चट्टान को काटकर मंदिर का रूप दे दिया।सुबह लोगों ने देखा तो चकित रह गए। उन्होंने कारीगर की तलाश की लेकिन वह नहीं मिला। कारीगर जा चुका था। रात में जल्दबाजी से काम के दौरान कारीगर से एक भूल हो गई थी।उसने शिवलिंग का अरघा विपरीत दिशा में बना दिया था। शास्त्रों के अनुसार यह दोष होने के कारण शिवलिंग की पूजा शुभ फल नहीं देती। इसलिए यहां बने शिवलिंग की आज तक पूजा नहीं हुई।

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भारत में मुसलमानो के 800 वर्ष के शासन का झूठ ——————————————————–


Virendra Kumar Dwivedi's photo.
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भारत में मुसलमानो के 800 वर्ष के शासन का झूठ
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क्या भारत में मुसलमानो ने 800 वर्षो तक शासन किया है। सुनने में यही आता है पर न कभी कोई आत्ममंथन करता है और न इतिहास का सही अवलोकन।

प्रारम्भ करते है मुहम्मद बिन कासिम से।

भारत पर पहला आक्रमण मुहम्मद बिन ने 711 ई में सिंध पर किया। राजा दाहिर पूरी शक्ति से लड़े और मुसलमानो के धोखे के शिकार होकर वीरगति को प्राप्त हुए।

दूसरा हमला 735 में राजपुताना पर हुआ जब हज्जात ने सेना भेजकर बाप्पा रावल के राज्य पर आक्रमण किया।

वीर बाप्पा रावल ने मुसलमानो को न केवल खदेड़ा बल्कि अफगानिस्तान तक मुस्लिम राज्यो को रौंदते हुए अरब की सीमा तक पहुँच गए। ईरान अफगानिस्तान के मुस्लिम सुल्तानों ने उन्हें अपनी पुत्रिया भेंट की और उन्होंने 35 मुस्लिम लड़कियो से विवाह करके सनातन धर्म का डंका पुन बजाया। बाप्पा रावल का इतिहास कही नहीं पढ़ाया जाता यहाँ तक की अधिकतर इतिहासकर उनका नाम भी छुपाते है। गिनती भर हिन्दू होंगे जो उनका नाम जानते है। दूसरे ही युद्ध में भारत से इस्लाम समाप्त हो चूका था। ये था भारत में पहली बार इस्लाम का नाश ।

अब आगे बढ़ते है गजनवी पर।

बाप्पा रावल के आक्रमणों से मुसलमान इतने भयक्रांत हुए की अगले 300 सालो तक वे भारत से दूर रहे। इसके बाद महमूद गजनवी ने 1002 से 1017 तक भारत पर कई आक्रमण किये पर हर बार उसे भारत के हिन्दू राजाओ से कड़ा उत्तर मिला। महमूद गजनवी ने सोमनाथ पर भी कई आक्रमण किये पर 17वे युद्ध में उसे सफलता मिली थी। सोमनाथ के शिवलिंग को उसने तोडा नहीं था बल्कि उसे लूट कर वह काबा ले गया था जिसका रहस्य आपके समक्ष जल्द ही रखता हु। यहाँ से उसे शिवलिंग तो मिल गया जो चुम्बक का बना हुआ था पर खजाना नहीं मिला।

भारतीय राजाओ के निरंतर आक्रमण से वह वापिस गजनी लौट गया और अगले 100 सालो तक कोई भी मुस्लिम आक्रमणकारी भारत पर आक्रमण न कर सका।

1098 में मुहम्मद गौरी ने पृथ्वीराज राज चौहान को 16 युद्द के बाद परास्त किया और अजमेर व् दिल्ली पर उसके गुलाम वंश के शासक जैसे कुतुबुद्दीन इल्तुमिश व् बलबन दिल्ली से आगे न बढ़ सके। उन्हें हिन्दू राजाओ के प्रतिरोध का सामना करना पड़ा। पश्चिमी द्वार खुला रहा जहाँ से बाद में ख़िलजी लोधी तुगलक आदि आये।

ख़िलजी भारत के उत्तरी भाग से होते हुए बिहार बंगाल पहुँच गए। कूच बिहार व् बंगाल में मुसलमानो का राज्य हो गया पर बिहार व् अवध प्रदेश मुसलमानो से अब भी दूर थे। शेष भारत में केवल गुजरात ही मुसलमानो के अधिकार में था। अन्य भाग स्वतन्त्र थे

1526 में राणा सांगा ने इब्राहिम लोधी के विरुद्ध बाबर को बुलाया। बाबर ने लोधियों की सत्ता तो उखाड़ दी पर वो भारत की सम्पन्नता देख यही रुक गया और राणा सांगा को उसमे युद्ध में हरा दिया। चित्तोड़ तब भी स्वतंत्र रहा पर अब दिल्ली मुगलो के अधिकार में थी।

हुमायूँ दिल्ली पर अधिकार नहीं कर पाया पर उसका बेटा अवश्य दिल्ली से आगरा के भाग पर शासन करने में सफल रहा। तब तक कश्मीर भी मुसलमानो के अधिकार में आ चूका था। अकबर पुरे जीवन महाराणा प्रताप से युद्ध में व्यस्त रहा जो बाप्पा रावल के ही वंशज थे और उदय सिंह के पुत्र थे जिनके पूर्वजो ने 700 सालो तक मुस्लिम आक्रमणकारियो का सफलतापूर्वक सामना किया।

जहाँगीर व् शाहजहाँ भी राजपूतो से युद्धों में व्यस्त रहे व् भारत के बाकी भाग पर राज्य न कर पाये। दक्षिण में बीजापुर में तब तक इस्लाम शासन स्थापित हो चुका था। औरंगजेब के समय में मराठा शक्ति का उदय हुआ और शिवाजी महाराज से लेकर पेशवाओ ने मुगलो की जड़े खोद डाली।

शिवाजी महाराज द्वारा स्थापित हिंदवी स्वराज्य को बाजीराव पेशवा ने भारत में हिमाचल बंगाल और पुरे दक्षिण में फैलाया। दिल्ली में उन्होंने आक्रमण से पहले गौरी शंकर भगवान् से मन्नत मांगी थी की यदि वे सफल रहे तो चांदनी चौक में वे भव्य मंदिर बनाएंगे जहाँ कभी पीपल के पेड़ के नीचे 5 शिवलिंग रखे थे। बाजीराव ने दिल्ली पर अधिकार किया और गौरी शंकर मंदिर का निर्माण किया जिसका प्रमाण मंदिर के बाहर उनके नाम का लगा हुआ शिलालेख है। बाजीराव पेशवा ने एक शक्तिशाली हिन्दुराष्ट्र की स्थापन की जो 1830 तक अंग्रेजो के आने तक स्थापित रहा। मुगल सुल्तान मराठाओ को चौथ व् कर देते रहे और केवल लालकिले तक सिमित रह गए। और वे तब तक शक्तिहीन रहे जब तक अंग्रेज भारत में नहीं आ गए।

1760 के बाद भारत में मुस्लिम जनसँख्या में जबरदस्त गिरावट हुई जो 1800 तक मात्र 7 प्रतिशत तक पहुँच गयी थी। अंग्रेजो के आने के बाद मुसल्मानो को संजीवनी मिली और पुन इस्लाम को खड़ा किया गया ताकि भारत में सनातन धर्म को नष्ट किया जा सके इसलिए अंग्रेजो ने 50 साल से अधिक समय से पहले ही मुसलमानो के सहारे भारत विभाजन का षड्यंत्र रच लिया था। मुसलमानो के हिन्दुविरोधी रवैये व् उनके धार्मिक जूनून को अंग्रेजो ने सही से प्रयोग किया।

असल में पूरी दुनिया में मुस्लिम कौम सबसे मुर्ख कौम है जिसे कभी ईसाइयो ने कभी यहूदियो ने कभी अंग्रेजो ने अपने लाभ के लिए प्रयोग किया। आज उन्ही मुसलमानो को पाकिस्तान में हमारी एजेंसीज अपने लाभ के लिये प्रयोग करती है जिस पर अधिक जानने के लिए अगली पोस्ट की प्रतीक्षा करे।

ये झूठ इतिहास क्यों पढ़ाया गया।
असल में हिन्दुओ पर 1200 सालो के निरंतर आक्रमण के बाद भी जब भारत पर इस्लामिक शासन स्थापित नहीं हुआ और न ही अंग्रेज इस देश को पूरा समाप्त करे तो उन्होंने शिक्षा को अपना अस्त्र बनाया और इतिहास में फेरबदल किये। अब हिन्दुओ की मानसिकता को मसलन है तो उन्हें ये बताना होगा की तुम गुलाम हो। लगातार जब यही भाव हिन्दुओ में होगा तो वे स्वयं को कमजोर और अत्याचारी को शक्तिशाली समझेंगे। अत: भारत के हिन्दुओ को मानसिक गुलाम बनाया गया जिसके लिए झूठे इतिहास का सहारा लिया गया और परिणाम सामने है। लुटेरे और चोरो को आज हम बादशाह सुलतान नामो से पुकारते है उनके नाम पर सड़के बनाते है शहरो के नाम रखते है है और उसका कोई हिन्दू विरोध भी नहीं करता जो बिना गुलाम मानसिकता के संभव नहीं सकता था इसलिए इतिहास बदलो, मन बदलो और गुलाम बनाओ। यही
आज तक होता आया है।

जिसे हमने मित्र माना वही अंत में हमारी पीठ पर वार करता है। इसलिए झूठे इतिहास और झूंठे मित्र दोनों से सावधान रहने की आवश्यकता है।

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आजाद हिन्द बैंक ” की स्थापना सन १९४३ में हुई थी ।


वन्देमातरम (भारतमाता) 4 hr वन्देमातरम (भारतमाता) 4 hrs · ======================================================== एक लाख रुपये का नोट जारी करने वाले ” आजाद हिन्द बैंक ” की स्थापना सन १९४३ में हुई थी । तव इस बैंक को १० देशों बर्मा , क्रोएशिया , नानकिंग , मंचूको , इटली , थाईलैंड , फिलीपीन्स व आयरलैण्ड के बैंकों ने इसकी करेंसी को मान्यता दी थी । ————————————————————————————————————— इस बैंक ने १० रु. के सिक्के से लेकर , एक लाख रु. तक के नोट जारी किये थे । इसके पूर्व तक ५००० रु. तक के जारी किये गये नोट की जानकारी ही सार्वजनिक थी । पांच हजार का एक नोट काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (B.H.U ) के भारत कला-भवन में रखा है। जबकि शनिवार ३०-जून-२०१५ , को एक लाख रुपये के नोट की तस्वीर नेताजी की प्रपौत्री राज्यश्री चौधरी नें ” विशाल भारत संस्थान को उपलब्ध कराई ! यहाँ पर यह उल्लेखनीय है कि ०५-जून से , विशाल भारत संस्थान की तरफ से , नेताजी श्री सुभाष चन्द्र बोस के बारे में खोज को लेकर एक राष्ट्र-व्यापी कार्यक्रम का शुभारम्भ किया जा रहा है । इसमें समस्त विश्व से ” सुभाषवादियों ” को आमंत्रित किया गया है । इस अभियान के केंन्द्र-बिन्दू बनेंगे , नेताजी के चालक रहे श्री कर्नल निजामुद्दीन जी , जो अपने स्वास्थ्य संबंधी उपचार हेतु , इस समय वाराणसी में ही रह रहे हैं । उनहोंने बताया कि जब नेताजी रंगून के जुबली हाल में भाषण दिया था , तो उन्हें सुनने के लिए एशिया भर से लोग आये थे । उस समय नेताजी को , लोगों नें सोने चाँदी के आभूषणों से भरे २७ बोरियों से उन्हें तोला था , और उन बोरियों को वह स्वयं और कुछ अन्य साथियों ने भी अपने कंधों से ढोकर , आजाद हिन्द फौज के राजकोष में जमा किया था । सुभाषवादियों का यह भी दावा है कि उस समय आजाद हिन्द बैंक में , करीब ७० हजार करोड़ रु. जमा थे । इस बैंक ने बर्मा को दस लाख रुपये ऋण देने का एक प्रस्ताव भी पारित किया था। आरोप यह भी है कि श्री नेताजी की हत्या या गुमनामी के पीछे , इतनी बड़ी धनराशि का मामला होना भी , एक प्रमुख कारण था । जिसे बाद में भारतीय और इंग्लैण्ड के राजनेताओं ने बंदर-बांट कर लिया होगा। विशाल भारत संस्थान के संस्थापक अध्यक्ष श्री राजीव श्रीवास्तव कहते हैं , कि आजाद हिन्द सरकार नें , फौज और बैंक की स्थापना के बाद , श्री नेताजी को जनवरी में हुए एक कार्यक्रम में , उन्हें आजाद-भारत का पहला राष्ट्रपति बनाने की माँग भी की गई थी । ———————————————————————————————— आजाद हिन्द सरकार का अपना रेडियो स्टेशन , अपना अखबार और एक बड़ी फौज भी थी , जो कई देशों में फैली हुई थी । ================================================ वन्देमातरम (भारतमाता)’s photo. Harshad Kanaiyalal Ashodiya Unlike · Comment · Share · 135s · ======================================================== एक लाख रुपये का नोट जारी करने वाले ” आजाद हिन्द बैंक ” की स्थापना सन १९४३ में हुई थी । तव इस बैंक को १० देशों बर्मा , क्रोएशिया , नानकिंग , मंचूको , इटली , थाईलैंड , फिलीपीन्स व आयरलैण्ड के बैंकों ने इसकी करेंसी को मान्यता दी थी । ————————————————————————————————————— इस बैंक ने १० रु. के सिक्के से लेकर , एक लाख रु. तक के नोट जारी किये थे । इसके पूर्व तक ५००० रु. तक के जारी किये गये नोट की जानकारी ही सार्वजनिक थी । पांच हजार का एक नोट काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (B.H.U ) के भारत कला-भवन में रखा है। जबकि शनिवार ३०-जून-२०१५ , को एक लाख रुपये के नोट की तस्वीर नेताजी की प्रपौत्री राज्यश्री चौधरी नें ” विशाल भारत संस्थान को उपलब्ध कराई ! यहाँ पर यह उल्लेखनीय है कि ०५-जून से , विशाल भारत संस्थान की तरफ से , नेताजी श्री सुभाष चन्द्र बोस के बारे में खोज को लेकर एक राष्ट्र-व्यापी कार्यक्रम का शुभारम्भ किया जा रहा है । इसमें समस्त विश्व से ” सुभाषवादियों ” को आमंत्रित किया गया है । इस अभियान के केंन्द्र-बिन्दू बनेंगे , नेताजी के चालक रहे श्री कर्नल निजामुद्दीन जी , जो अपने स्वास्थ्य संबंधी उपचार हेतु , इस समय वाराणसी में ही रह रहे हैं । उनहोंने बताया कि जब नेताजी रंगून के जुबली हाल में भाषण दिया था , तो उन्हें सुनने के लिए एशिया भर से लोग आये थे । उस समय नेताजी को , लोगों नें सोने चाँदी के आभूषणों से भरे २७ बोरियों से उन्हें तोला था , और उन बोरियों को वह स्वयं और कुछ अन्य साथियों ने भी अपने कंधों से ढोकर , आजाद हिन्द फौज के राजकोष में जमा किया था । सुभाषवादियों का यह भी दावा है कि उस समय आजाद हिन्द बैंक में , करीब ७० हजार करोड़ रु. जमा थे । इस बैंक ने बर्मा को दस लाख रुपये ऋण देने का एक प्रस्ताव भी पारित किया था। आरोप यह भी है कि श्री नेताजी की हत्या या गुमनामी के पीछे , इतनी बड़ी धनराशि का मामला होना भी , एक प्रमुख कारण था । जिसे बाद में भारतीय और इंग्लैण्ड के राजनेताओं ने बंदर-बांट कर लिया होगा। विशाल भारत संस्थान के संस्थापक अध्यक्ष श्री राजीव श्रीवास्तव कहते हैं , कि आजाद हिन्द सरकार नें , फौज और बैंक की स्थापना के बाद , श्री नेताजी को जनवरी में हुए एक कार्यक्रम में , उन्हें आजाद-भारत का पहला राष्ट्रपति बनाने की माँग भी की गई थी । ———————————————————————————————— आजाद हिन्द सरकार का अपना रेडियो स्टेशन , अपना अखबार और एक बड़ी फौज भी थी , जो कई देशों में फैली हुई थी । ================================================ वन्देमातरम (भारतमाता)’s photo. Harshad Kanaiyalal Ashodiya Unlike · Comment · Share · 135