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Eusebeia and dharma


Eusebeia and dharma
rock inscription is from Indian Emperor Asoka, from 258 BC, and found in Afghanistan. The inscription renders the word Dharma in Sanskrit as Eusebeia in Greek, suggesting Dharma in ancient India meant spiritual maturity, devotion, piety, duty towards and reverence for human community.
In mid 20th century, an inscription of the Indian Emperor Asoka from the year 258 BC was discovered in Afghanistan. This rock inscription contained Sanskrit, Aramaic and Greek text. According to Paul Hacker,[33] on the rock appears a Greek rendering for the Sanskrit word dharma: the word eusebeia.[33] Scholars of Hellenistic Greece explain eusebeia as a complex concept. Eusebia means not only to venerate gods, but also spiritual maturity, a reverential attitude toward life, and includes the right conduct toward one’s parents, siblings and children, the right conduct between husband and wife, and the conduct between biologically unrelated people. This rock inscription, concludes Paul Hacker,[33] suggests dharma in India, about 2300 years ago, was a central concept and meant not only religious ideas, but ideas of right, of good, of one’s duty toward the human community.( from Wiki)

Harshad Kanaiyalal Ashodiya's photo.
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सत्यं वद धर्मं चर स्वाध्यायान्मा प्रमदः । आचारस्य प्रियं धनमाहृत्य प्रजातन्तुं मा व्यवच्छेत्सीः ॥


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सत्यं वद धर्मं चर स्वाध्यायान्मा प्रमदः ।
आचारस्य प्रियं धनमाहृत्य प्रजातन्तुं मा व्यवच्छेत्सीः ॥

A lesson to students graduating from the gurukul. Always speak the truth, Live by the code (Dharma), Never stop to self learning, Pay appropriate fees to the teacher and do not abstain from the next phase of life (which involves setting up a family and sustaining the race)

अर्थात सत्य बोलो, धर्म का आचरण करो, स्वाध्याय में आलस्य मत करो। अपने श्रेष्ठ कर्मों से साधक को कभी मन नहीं चुराना चाहिए।

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सत्यं वद । धर्मं चर । स्वाध्यायात् मा प्रमदः ॥ – तैत्तिरीयोपनिषत् १-११


सत्यं वद । धर्मं चर । स्वाध्यायात् मा प्रमदः ॥ – तैत्तिरीयोपनिषत् १-११

सत्यमेव वद, धर्ममेव आचर, स्वाध्यायात् प्रमत्तो मा भव ॥

आचार्येण हि शिष्याय क्रियमाणः उपदेशोऽयम् । सद्गुरुसेवापरायणः शिष्यः गुरोः सकाशात्
वेदविद्यां कृत्स्नतया अधीत्य गुरुगृहात् स्वगृहं प्रति यदा जिगमिषति, तदा गुरुणा प्रीत्या स्वशिष्यं
प्रति क्रियमाणोऽयम् उपदेशः, आदेशश्च ॥

अत्रमन्त्रे प्राधान्येन उपदेशत्रयं गुरुणा क्रियते । ते च त्रयः उपदेशाः इमे, सत्यवचनम्, धर्माचरणम्,
स्वाध्यायानुष्ठानं च । एतानि साधनानि अनुतिष्ठतः अभ्युदयफलानि लभ्यन्ते ॥
सत्यवचनम् नाम अतिमुख्यं तपः । सत्यात् नास्ति परं तपः । सत्यमेव परं तपः । अतः सत्यमेव वक्तव्यम् ॥
धर्माचरणम् नाम अहिंसा जपशमदमादयः । ते च धर्मस्य रूपान्तराणि । धर्म एव सदा अनुष्ठेयः, न कदापि अधर्मः ॥
स्वाध्यायो नाम वेदाध्ययनम् । एतानि कर्तव्यान्येव ॥

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‘सत्यं वद, धर्मं चर, …’ – तैत्तिरीय उपनिषद् के उपदेशात्मक मंत्र


‘सत्यं वद, धर्मं चर, …’ – तैत्तिरीय उपनिषद् के उपदेशात्मक मंत्र

https://vichaarsankalan.wordpress.com/2009/08/12/%E2%80%98%E0%A4%B8%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%82-%E0%A4%B5%E0%A4%A6-%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%82-%E0%A4%9A%E0%A4%B0-%E2%80%99-%E0%A4%A4%E0%A5%88%E0%A4%A4%E0%A5%8D/

अपने आरंभिक छात्रजीवन के समय संस्कृत पाठ्यपुस्तकों में मैंने “सत्यं वद । धर्मं चर ।… मातृदेवो भव । पितृदेवो भव । …” के शिक्षाप्रद वचन पढ़े थे । अपरिपक्व सोच के उस काल में इन वचनों की अर्थवत्ता इम्तहान पास करने में अधिक थी और उनके निहितार्थ समझने में कम । हो सकता है उनका कुछ प्रभाव अपने आचरण पर पड़ा हो । कह नहीं सकता ।

इन वचनों के स्रोत के बारे में जिज्ञासा होने पर मैंने उननिषदों के पन्ने पलटना आरंभ किए तो पाया कि ये तैत्तिरीय उपनिषद् में समाहित हैं । इस उपनिषद् के तीन खंड हैं जिन्हें वल्ली कहा गया हैःशिक्षावल्ली, ब्रह्मानन्दवल्ली तथा भृगुवल्ली । प्रत्येक वल्ली स्वयं में अनुवाकों (अध्यायों) में विभक्त है । शिक्षावल्ली के ग्यारहवें अनुवाक में इस बात का वर्णन है कि कैसे वेदाध्यापन के बाद गुरु द्वारा अपने शिष्यों को सम्यग् आचरण की शिक्षा दी जाती है । उसी अनुवाक के आंरभ के दो मंत्र ये हैं:

वेदमनूच्याचार्योऽन्तेवासिनमनुशास्ति । सत्यं वद । धर्मं चर । स्वाध्यायान्मा प्रमदः । आचार्याय प्रियं धनमाहृत्य प्रजानन्तुं मा व्यवच्छेसीः । सत्यान्न प्रमदितव्यम् । धर्मान्न प्रमदितव्यम् । कुशलान्न प्रमदितव्यम् । भूत्यै न प्रमदितव्यम् । स्वाध्यायप्रवचनाभ्यां न प्रमदितव्यम् ।।
(तैत्तिरीय उपनिषद्, शिक्षावल्ली, अनुवाक ११, मंत्र १)

अर्थ:- वेद के शिक्षण के पश्चात् आचार्य आश्रमस्थ शिष्यों को अनुशासन सिखाता है । सत्य बोलो । धर्मसम्मत कर्म करो । स्वाध्याय के प्रति प्रमाद मत करो । आचार्य को जो अभीष्ट हो वह धन (भिक्षा से) लाओ और संतान-परंपरा का छेदन न करो (यानी गृहस्थ बनकर संतानोत्पत्ति कर पितृऋण से मुक्त होओ) । सत्य के प्रति प्रमाद (भूल) न होवे, अर्थात् सत्य से मुख न मोड़ो । धर्म से विमुख नहीं होना चाहिए । अपनी कुशल बनी रहे ऐसे कार्यों की अवहेलना न की जाए । ऐश्वर्य प्रदान करने वाले मंगल कर्मों से विरत नहीं होना चाहिए । स्वाध्याय तथा प्रवचन कार्य की अवहेलना न होवे ।

देवपितृकार्याभ्यां न प्रमदितव्यम् । मातृदेवो भव । पितृदेवो भव । आचार्यदेवो भव । अतिथिदेवो भव । यान्यनवद्यानि कर्माणि । तानि सेवितव्यानि । नो इतराणि । यान्यस्माकं सुचरितानि । तानि त्वयोपास्यानि ।।
(तैत्तिरीय उपनिषद्, शिक्षावल्ली, अनुवाक ११, मंत्र २)

अर्थ:- देवकार्य तथा पितृकार्य से प्रमाद नहीं किया जाना चाहिए । (कदाचित् इस कथन का आशय देवों की उपासना और माता-पिता आदि के प्रति श्रद्धा तथा कर्तव्य से है ।) माता को देव तुल्य मानने वाला बनो (मातृदेव = माता है देवता तुल्य जिसके लिए) । पिता को देव तुल्य मानने वाला बनो । आचार्य को देव तुल्य मानने वाला बनो । अतिथि को देव तुल्य मानने वाला बनो । अर्थात् इन सभी के प्रति देवता के समान श्रद्धा, सम्मान और सेवाभाव का आचरण करे । जो अनिन्द्य कर्म हैं उन्हीं का सेवन किया जाना चाहिए, अन्य का नहीं । हमारे जो-जो कर्म अच्छे आचरण के द्योतक हों केवल उन्हीं की उपासना की जानी चाहिए; उन्हीं को संपन्न किया जाना चाहिए । (अवद्य = जिसका कथन न किया जा सके, जो गर्हित हो, प्रशंसा योग्य न हो ।)संकेत है कि गुरुजनों का आचरण सदैव अनुकरणीय हो ऐसा नहीं है । अपने विवेक के द्वारा व्यक्ति क्या करणीय है और क्या नहीं इसका निर्णय करे और तदनुसार व्यवहार करे ।

एक शंका का समाधान मुझे कहीं नहीं मिला है । वैदिक साहित्य में सर्वत्र पुरुषों को केंद्र में रखते हुए ही बातें कही गयी हैं । ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए उन्हें आश्रम में रहने की बातें कही जाती हैं । यज्ञादि भी उन्हीं के द्वारा संपन्न होते रहे हैं । गार्हस्थ जीवन में भी उन्हीं के प्रवेश की बात की जाती रही है, जिसमें स्त्री एक सहायिका की भूमिका निभाती हो, इत्यादि । ऐसा क्यों रहा होगा ? स्त्रियों के बारे में इतनी विस्तृत बातें पुरातन साहित्य में पढ़ने को नहीं मिलती हैं । कदाचित् यह स्थिति विश्व के अन्य उन्नत समाजों में भी व्याप्त है । – योगेन्द्र जोशी

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Japanese Goddess Benzaiten (弁才天, 弁財天) is a Japanese Buddhist goddess, who originated from the Hindu goddess Saraswati.


Japanese Goddess Benzaiten (弁才天, 弁財天) is a Japanese Buddhist goddess, who originated from the Hindu goddess Saraswati.

Hinduism DeMystified's photo.

Japanese Goddess Benzaiten (弁才天, 弁財天) is a Japanese Buddhist goddess, who originated from the Hindu goddess Saraswati.

Worship of Benzaiten arrived in Japan during the 6th through 8th centuries, mainly via the Chinese translations of the Sutra of Golden Light, which has a section devoted to her. She is also mentioned in the Lotus Sutra and often depicted holding a biwa, a traditional Japanese lute, just as Saraswati holds a veena. Benzaiten is a highly syncretic entity with both a Buddhist and a Shinto side.

Benzaiten is the goddess of everything that flows: water, words, speech, eloquence, music and by extension, knowledge. The original characters used to write her name read “Biancaitian” in Chinese and “Bensaiten” in Japanese (辯才天) and reflect her role as the goddess of eloquence.

Because the Sutra of Golden Light promised protection of the state, in Japan she became a protector-deity, at first of the state and then of people.Lastly, she became one of the Seven Gods of Fortune when the Sino-Japanese characters used to write her name changed to 弁財天 (Benzaiten), emphasizing her role in bestowing monetary fortune. Sometimes she is called Benten although this name usually refers to the god Brahma.

In Rig-Veda (6.61.7) Saraswati is credited with killing the three-headed Vritra also known as Ahi (“snake“). Vritra is also strongly associated with rivers, as is Sarasvati. This is probably one of the sources of Saraswati/Benzaiten’s close association with snakes and dragons in Japan instead of white swan as in India.

Benzaiten the Goddess of Music and Good Fortune

In Japan, Sarasvati is known by different names.
She is associated with different faculties like music, sweet voice, wealth, fortune, beauty, happiness, eloquence, wisdom and as one who confers strength on warriors.

Name Goddess of
Benzaiten Talent and wealth
Myoten Sweet voice
Daiben, Dai Benzaiten Intelligence
SamaBenzamini Inspirer to poets and artistes
Benteu, Benten Speech with a flute in her hands
KrodhaBenzaiten Violent form worshipped by generals before
going to War.

According to documents like ‘Kokei, recorded by Buddhist monks, link the periodic appearance of comets with the goddess Benzaiten.

For example, the comet that appeared in 552 AD, and again in late 593 AD were associated with deity Benzaiten.
These records suggest that the exchange of cultural and spiritual ideas from Buddhism and Hinduism in India to Japan, through deities such as Benzaiten, occurred well before the 5th century.

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

अकबर ने बीरबल के सामने अचानक एक दिन 3 प्रश्न उछाल दिये।


Bhagvan ki khoj
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अकबर ने बीरबल के सामने
अचानक एक दिन 3 प्रश्न उछाल दिये। 〰〰〰〰〰〰〰
प्रश्न यह थे –
1) ‘ भगवान कहाँ रहता है?
2) वह कैसे मिलता है
और
3) वह करता क्या है?”

बीरबल इन प्रश्नों को सुनकर सकपका गये और बोले – ”जहाँपनाह! इन प्रश्नों  के उत्तर मैं कल आपको दूँगा।”

जब बीरबल घर पहुँचे तो वह बहुत उदास थे।

उनके पुत्र ने जब उनसे पूछा तो उन्होंने बताया –

”बेटा! आज बादशाह ने मुझसे एक साथ तीन प्रश्न:
✅ ‘भगवान कहाँ रहता है?
✅ वह कैसे मिलता है?
✅ और वह करता क्या है?’ पूछे हैं।

मुझे उनके उत्तर सूझ नही रहे हैं और कल दरबार में इनका उत्तर देना है।”

बीरबल के पुत्र ने कहा- ”पिता जी! कल आप मुझे दरबार में अपने साथ ले चलना मैं बादशाह के प्रश्नों के उत्तर दूँगा।”

पुत्र की हठ के कारण बीरबल अगले दिन अपने पुत्र को साथ लेकर दरबार में पहुँचे।

बीरबल को देख कर बादशाह अकबर ने कहा – ”बीरबल मेरे प्रश्नों के उत्तर दो।

बीरबल ने कहा – ”जहाँपनाह आपके प्रश्नों के उत्तर तो मेरा पुत्र भी दे सकता है।”

अकबर ने बीरबल के पुत्र से पहला प्रश्न पूछा – ”बताओ!

‘ भगवान कहाँ रहता है?” बीरबल के पुत्र ने एक गिलास शक्कर मिला हुआ दूध बादशाह से मँगवाया और कहा- जहाँपनाह दूध कैसा है?

अकबर ने दूध चखा और कहा कि ये मीठा है।

परन्तु बादशाह सलामत या आपको इसमें शक्कर दिखाई दे रही है।

बादशाह बोले नही। वह तो घुल गयी।

जी हाँ, जहाँपनाह! भगवान भी इसी प्रकार संसार की हर वस्तु में रहता है।

जैसे शक्कर दूध में घुल गयी है परन्तु वह दिखाई नही दे रही है।

बादशाह ने सन्तुष्ट होकर अब दूसरे प्रश्न का उत्तर पूछा – ”बताओ!

भगवान मिलता केैसे है ?” बालक ने कहा –

”जहाँपनाह थोड़ा दही मँगवाइए।

” बादशाह ने दही मँगवाया तो बीरबल के पुत्र ने कहा –

”जहाँपनाह! क्या आपको इसमं मक्खन दिखाई दे रहा है।

बादशाह ने कहा- ”मक्खन तो दही में है पर इसको मथने पर ही दिखाई देगा।”

बालक ने कहा- ”जहाँपनाह! मन्थन करने पर ही भगवान के दर्शन हो सकते हैं।”

बादशाह ने सन्तुष्ट होकर अब अन्तिम प्रश्न का उत्तर पूछा – ”बताओ! भगवान करता क्या है?”

बीरबल के पुत्र ने कहा- ”महाराज! इसके लिए आपको मुझे अपना गुरू स्वीकार करना पड़ेगा।”

अकबर बोले- ”ठीक है, आप गुरू और मैं आप का शिष्य।”

अब बालक ने कहा- ”जहाँपनाह गुरू तो ऊँचे आसन पर बैठता है
और शिष्य नीचे।

” अकबर ने बालक के लिए सिंहासन खाली कर दिया और स्वयं नीचे बैठ गये।

अब बालक ने सिंहासन पर बैठ कर कहा – ”महाराज! आपके
अन्तिम प्रश्न का उत्तर तो यही है।”

अकबर बोले- ”क्या मतलब? मैं कुछ समझा नहीं।”

बालक ने कहा- ”जहाँपनाह! भगवान यही तो करता है।

“पल भर में राजा को रंक बना देता है और भिखारी को सम्राट बना देता है।”

👍👏👏   pasand aye to aage bhejiye…..