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क्या उद्देश्य है वट सावित्री पूजन का ?


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क्या उद्देश्य है वट सावित्री पूजन का ?
वट सावित्री पूजन से सौभाग्य की वृद्धि और पतिव्रत के संस्कार आत्मसात होते हैं। कई व्रत विशेषज्ञ यह व्रत ज्येष्ठ मास की त्रयोदशी से अमावस्या तक तीन दिनों तक करने में भरोसा रखते हैं। इसी तरह शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी से पूर्णिमा तक भी यह व्रत किया जाता है। विष्णु उपासक इस व्रत को पूर्णिमा को करना ज्यादा हितकर मानते हैं।
वट सावित्री व्रत में ‘वट’ और ‘सावित्री’ दोनों का विशिष्ट महत्व माना गया है। पीपल की तरह वट या बरगद के पेड़ का भी विशेष महत्व है। पाराशर मुनि के अनुसार-
‘वट मूले तोपवासा’
ऐसा कहा गया है। पुराणों में यह स्पष्ट किया गया है कि वट में ब्रह्मा, विष्णु व महेश तीनों का वास है। इसके नीचे बैठकर पूजन, व्रत कथा आदि सुनने से मनोकामना पूरी होती हैं। वट वृक्ष अपनी विशालता के लिए भी प्रसिद्ध है। संभव है वनगमन में ज्येष्ठ मास की तपती धूप से रक्षा के लिए भी वट के नीचे पूजा की जाती रही हो और बाद में यह धार्मिक परंपरा के रूप में विकसित हो गई हो।
दार्शनिक दृष्टि से देखें तो वट वृक्ष दीर्घायु व अमरत्व- बोध के प्रतीक के नाते भी स्वीकार किया जाता है। वट वृक्ष ज्ञान व निर्वाण का भी प्रतीक है। भगवान बुद्ध को इसी वृक्ष के नीचे ज्ञान प्राप्त हुआ था। इसलिए वट वृक्ष को पति की दीर्घायु के लिए पूजना इस व्रत का अंग बना। महिलाएं व्रत-पूजन कर कथा कर्म के साथ-साथ वट वृक्ष के आसपास सूत के धागे की परिक्रमा के दौरान लपेटती हैं।

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देसी गायी के महत्त्व


देसी गायी के महत्त्व
1) पृथ्वी का सबसे अच्छा पोषणतत्व देसी गाय पैदा करती है I
2) देसी गाय का नाम स्मरण करने से मनुष्य सभी पापों से मुक्त होता है I
3) देसी गाय को जैवीक – नैसर्गिक संयंत्र कहा गया है I
4) देसी गाय स्वर्ग और मोक्ष की सीढ़ी है I
5) देसी गाय के पेट में सदा लक्ष्मी रहेती है I
आपको कोई शारीरिक प्रोब्लेम हो तो Whats app पर कॉन्टॉक्ट करें 9922144444
www.krishnapriyagoshala.org,www.youtube.com/krishnapriyagoshalakinwat

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आइये जानते हैं कि ब्रह्म मुहूर्त क्या है।●


आइये जानते हैं कि ब्रह्म मुहूर्त क्या है।●
■इसके वैज्ञानिक लाभ क्या हैं।■
ब्रह्म मुहूर्त का ही विशेष महत्व क्यों?
रात्रि के अंतिम प्रहर को ब्रह्म मुहूर्त कहते हैं। हमारे ऋषि मुनियों ने इस मुहूर्त का विशेष महत्व बताया है। उनके अनुसार यह समय निद्रा त्याग के लिए सर्वोत्तम है। ब्रह्म मुहूर्त में उठने से सौंदर्य, बल, विद्या, बुद्धि और स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है। सूर्योदय से चार घड़ी (लगभग डेढ़ घण्टे) पूर्व ब्रह्म मुहूर्त में ही जग जाना चाहिये। इस समय सोना शास्त्र निषिद्ध है।
“ब्रह्ममुहूर्तेया निद्रा सा पुण्यक्षयकारिणी”।
(ब्रह्ममुहूर्त की पुण्य का नाश करने वाली होती है।)
ब्रह्म मुहूर्त का विशेष महत्व बताने के पीछे हमारे विद्वानों की वैज्ञानिक सोच निहित थी। वैज्ञानिक शोधों से ज्ञात हुआ है कि ब्रह्म मुहुर्त में वायु मंडल प्रदूषण रहित होता है। इसी समय वायु मंडल में ऑक्सीजन (प्राण वायु) की मात्रा सबसे अधिक (41 प्रतिशत) होती है, जो फेफड़ों की शुद्धि के लिए महत्वपूर्ण होती है। शुद्ध वायु मिलने से मन, मस्तिष्क भी स्वस्थ रहता है।
आयुर्वेद के अनुसार ब्रह्म मुहूर्त में उठकर टहलने से शरीर में संजीवनी शक्ति का संचार होता है। यही कारण है कि इस समय बहने वाली वायु को अमृततुल्य कहा गया है। इसके अलावा यह समय अध्ययन के लिए भी सर्वोत्तम बताया गया है क्योंकि रात को आराम करने के बाद सुबह जब हम उठते हैं तो शरीर तथा मस्तिष्क में भी स्फूर्ति व ताजगी बनी रहती है। प्रमुख मंदिरों के पट भी ब्रह्म मुहूर्त में खोल दिए जाते हैं तथा भगवान का श्रृंगार व पूजन भी ब्रह्म मुहूर्त में किए जाने का विधान है।
ब्रह्ममुहूर्त के धार्मिक, पौराणिक व व्यावहारिक पहलुओं और लाभ को जानकर हर रोज इस शुभ घड़ी में जागना शुरू करें तो बेहतर नतीजे मिलेंगे।
आइये जाने ब्रह्ममुहूर्त का सही वक्त व खास फायदे –
धार्मिक महत्व – व्यावहारिक रूप से यह समय सुबह सूर्योदय से पहले चार या पांच बजे के बीच माना जाता है। किंतु शास्त्रों में साफ बताया गया है कि रात के आखिरी प्रहर का तीसरा हिस्सा या चार घड़ी तड़के ही ब्रह्ममुहूर्त होता है। मान्यता है कि इस वक्त जागकर इष्ट या भगवान की पूजा, ध्यान और पवित्र कर्म करना बहुत शुभ होता है। क्योंकि इस समय ज्ञान, विवेक, शांति, ताजगी, निरोग और सुंदर शरीर, सुख और ऊर्जा के रूप में ईश्वर कृपा बरसाते हैं। भगवान के स्मरण के बाद दही, घी, आईना, सफेद सरसों, बैल, फूलमाला के दर्शन भी इस काल में बहुत पुण्य देते हैं।
पौराणिक महत्व – वाल्मीकि रामायण के मुताबिक माता सीता को ढूंढते हुए श्रीहनुमान ब्रह्ममुहूर्त में ही अशोक वाटिका पहुंचे। जहां उन्होंने वेद व यज्ञ के ज्ञाताओं के मंत्र उच्चारण की आवाज सुनी।
व्यावहारिक महत्व – व्यावहारिक रूप से अच्छी सेहत, ताजगी और ऊर्जा पाने के लिए ब्रह्ममुहूर्त बेहतर समय है। क्योंकि रात की नींद के बाद पिछले दिन की शारीरिक और मानसिक थकान उतर जाने पर दिमाग शांत और स्थिर रहता है। वातावरण और हवा भी स्वच्छ होती है। ऐसे में देव उपासना, ध्यान, योग, पूजा तन, मन और बुद्धि को पुष्ट करते हैं।
इस तरह शौक-मौज या आलस्य के कारण देर तक सोने के बजाय इस खास वक्त का फायदा उठाकर बेहतर सेहत, सुख, शांति और नतीजों को पा सकते हैं।

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1966 anti-cow slaughter agitation and murder of Hindu Saints by machiavellian Indira Gandhi….


1966 anti-cow slaughter agitation and murder of Hindu Saints by machiavellian Indira Gandhi….

1966 anti-cow slaughter agitation was the agitation by Hindu organizations in 1966 to demand a ban on the slaughter of cows in India, as enshrined in the Directive Principles of State Policy in the Constitution of India. Among others, the Shankaracharya fasted for the cause. The agitation culminated in a massive demonstration outside Sansad Bhavan in New Delhi on 7 November 1966 (as per Hindu Panchang, Vikram Samvat, Kartik Shukla Ashtami, famously known as Gopashtami among Hindus).
The Prime Minister, Indira Gandhi did not accept the demand for a ban on cow slaughtering. A mob of 10,000 advocates against cow slaughter, lead by Hindu holymen tried to storm the parliament, but were prevented. The mob then rampaged through the capital city. A 48 hour curfew was ordered, all the meetings were banned. The Mob also attacked the then congress president Kamaraj’s Delhi residence and set it on fire. (Please read Gulzari Lal Nanda’s testimony, to see how the administration worked against Hindu Saints.)
http://en.wikipedia.org/w…/1966_anti-cow_slaughter_agitation
Role of Indira Gandhi: The less said the better! The murderer of Hindu saints was branded as Devi in the Liberation war of 1971. Devis protect Dharma. Devis protect Saints, they don’t connive to get them butchered like Indira did.
Role of Gulzari Lal Nanda:
http://dharmanext.blogspot.in/…/the-day-sadhus-demanding-ba…
‘I had asked whether there was adequate police. I enquired whether they had made effective arrangements to prevent any persons coming too close to Parliament’s precincts; whether any additional barriers needed to be placed. I also enquired as to how much reserve police they had got after making arrangements for their disposition at the time of the procession and at the end I asked them whether there was any information from any source about any element of mischief, or any trouble that might be apprehended in connection with the procession. They told me repeatedly that everything was normal, that they had no information at all of any kind of trouble developing on that date.
‘On the 7th, I was naturally anxious to be in touch with what was happening but I was not able to get any regular reports. There were occasional telephone calls here and there. It appeared that the communication system just did not work properly. When I came to know that some trouble had arisen. I was naturally very anxious to get more precise information but it came only in very small bits.
‘When I went to Parliament in the early afternoon, I went up to the northern gate of Parliament House across which the procession was held up. Before that I had seen smoke rising in the sky. I was told that it was occasioned by tear gas shells. I had some information that earlier some persons from outside had started smashing some doors of business houses and shops and were creating mischief. I intended to go into the crowd myself, but I was prevented to do so. I peered into the scene through the iron gate. I saw some Naga Sadhus shouting and moving up and down but there was nothing very serious at that point.
I came back to my office in Parliament House and received reports about arson and some firing and some deaths. There was a hurried meeting of some members of the Cabinet and after consultations I prepared a statement for the Lok Sabha. I read this out at the end of the day’s business. My mind was full of the situation as naturally other people had expressed their sense of sorrow about the happenings. At the end, the prime minister asked me whether I would like to say something. I declined.
‘When she left, I followed her to her office and told her that in view of what had transpired in the committee, I did not think I would be able to carry on with my duties although I do not think that the home minister can be blamed for what had happened and there was no failure of responsibility on the part of the ministry. She then told me that I should not do anything in haste and that she would like to consider the matter the next day.’
Nanda was dropped as home minister. Being an honest man himself and keen on anti-corruption measures, he evidently made quite a few enemies in the Congress party and the government. Quite a few of them were worried how they would be able to fight any elections in the future if they were prevented from raising funds from various sources.
Pics (Times of India): Scenes from the huge rally in Delhi in 1966 against the Indira Gandhi government that ended in a march on Parliament and violence.

Hindus and Human Rights's photo.
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वास्तु दोष से बीमारी – पूर्व दिशा में वास्तु दोष:-


वास्तु दोष से बीमारी – पूर्व दिशा में वास्तु दोष:-
* यदि भवन में पूर्व दिशा का स्थान ऊँचा हो, तो व्यक्ति का सारा जीवन आर्थिक अभावों, परेशानियों में ही व्यतीत होता रहेगा और उसकी सन्तान अस्वस्थ, कमजोर स्मरणशक्ति वाली, पढाई-लिखाई में जी चुराने तथा पेट और यकृत के रोगों से पीडित रहेगी.

* यदि पूर्व दिशा में रिक्त स्थान न हो और बरामदे की ढलान पश्चिम दिशा की ओर हो, तो परिवार के मुखिया को आँखों की बीमारी, स्नायु अथवा ह्रदय रोग की स्मस्या का सामना करना पडता है.

* घर के पूर्वी भाग में कूडा-कर्कट, गन्दगी एवं पत्थर, मिट्टी इत्यादि के ढेर हों, तो गृहस्वामिनी में गर्भहानि का सामना करना पडता है.

* भवन के पश्चिम में नीचा या रिक्त स्थान हो, तो गृहस्वामी यकृत, गले, गाल ब्लैडर इत्यादि किसी बीमारी से परिवार को मंझधार में ही छोडकर अल्पावस्था में ही मृत्यु को प्राप्त हो जाता है.

* यदि पूर्व की दिवार पश्चिम दिशा की दिवार से अधिक ऊँची हो, तो संतान हानि का सामना करना पडता है.

* अगर पूर्व दिशा में शौचालय का निर्माण किया जाए, तो घर की बहू-बेटियाँ अवश्य अस्वस्थ रहेंगीं.

बचाव के उपाय:-
* पूर्व दिशा में पानी, पानी की टंकी, नल, हैंडापम्प इत्यादि लगवाना शुभ रहेगा.
* पूर्व दिशा का प्रतिनिधि ग्रह सूर्य है, जो कि कालपुरूष के मुख का प्रतीक है. इसके लिए पूर्वी दिवार पर ‘सूर्य यन्त्र’ स्थापित करें और छत पर इस दिशा में लाल रंग का ध्वज(झंडा) लगायें.
* पूर्वी भाग को नीचा और साफ-सुथरा खाली रखने से घर के लोग स्वस्थ रहेंगें. धन और वंश की वृद्धि होगी तथा समाज में मान-प्रतिष्ठा बढेगी. बच्चे तरक्की करेंगे.

जन्मपत्री, हस्तरेखा, अंकविज्ञान, वास्तु, रुद्राक्ष, रत्नो के परामर्श और रुद्राक्ष, रत्नो को मंगवाने के लिए हमे लिखे.

EMERALD (पन्ना) Rs. 200/-, FIRE OPAL (फायर ओपल) Rs.200/- , CORAL (मूंगा) Rs.200/-, Yellow Sapphire (पुखराज) Rs 500/-, Blue Sapphire (नीलम) Rs 500/- each gem stone rate per ratti.

Pankaj Kumar Jain
D Future Teller (Astrology, Palmistry Research Centre)
Astrology, Numerology, Palmistry & Vastu Consultant :
Mob No. 08267894348, www.horoscopesolutions.comwww.facebook.com/profile.php?id=100001663869293

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इंजीनियरिंग की दुनिया को चुनौती है 1000 साल पुरानी यह बावड़ी


गर्वीलो गुजरात

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इंजीनियरिंग की दुनिया को चुनौती है 1000 साल पुरानी यह बावड़ी
पाटण। ‘कुछ दिन तो गुजारिए गुजरात में’… बॉलीवुड के महानायक अमिताभ बच्चन का यह संवाद तो आपने सुना ही होगा। दरअसल गुजरात है ही ऐसा राज्य, जहां कदम-कदम पर ऐसी खूबसूरत जगहें मौजूद हैं, जो आपका दिल खुश कर देती हैं। कहीं, कच्छ का सूखा रण आपको तपाता तो दूसरे ही पल समुद्र की लहरें भिगो देती हैं। कहीं, आध्यशक्ति के दर्शन होंते हैं तो कहीं यहां के गौरवपूर्ण इतिहास के साक्षात दर्शन।
वैसे तो गुजरात में सैकड़ों दर्शनीय स्थल हैं, लेकिन हेरीटेज वीक (19 से 25 नवंबर) पर आज हम आपको पाटण (गुजरात की प्राचीन राजधानी) में स्थित ‘रानी की वाव’ की यात्रा करवाने ले जा रहे हैं। दरअसल यह प्राचीन (10-11वीं ई.) समय की वास्तुकला का ऐसा बेजोड़ नमूना है, जिसकी तारीफ शब्दों में करना शायद संभव ही नहीं। इसी के चलते इस बावड़ी को (सीढ़ीदार कुआं) को 23 जून, 2014 को यूनेस्को के विश्व विरासत स्थल में सम्मिलित किया गया है।
‘रानी की वाव’ वास्तुकला का वह बेजोड़ नमूना है, जो आधुनिक इंजीनियरिंग की दुनिया को भी आश्चर्यचकित कर सकता है। इसका निर्माण 10-11वीं सदी में सोलंकी राजवंश की रानी उदयमती ने पति भीमदेव सोलंकी की याद में करवाया था। यह प्रेम का प्रतीक कहलाती है।
राजा भीमदेव ही सोलंकी राजवंश के संस्थापक थे। भीमदेव गुजरात के सोलंकी वंश के शासक थे। उन्होंने वडनगर (गुजरात) पर 1021-1063 ई. तक शासन किया।
करीब 64 मीटर लंबी और 20 मीटर चौड़ी यह बावडी 27 मीटर गहरी है। ज्यादातर सीढ़ी युक्त कुओं में सरस्वती नदी के जल के कारण कीचड़ भर गया है। निर्माण कार्य में नक्काशीदार पत्थरों का प्रयोग किया गया है। अभी भी वाव के खंभे और उन पर उकेरी गईं कलाकृतियां सोलंकी वंश और उनके वास्तुकला के चमत्कार के समय में ले जाते हैं।
वाव की दीवारों और स्तंभों पर अधिकांश नक्काशियां, राम, वामन, महिषासुरमर्दिनी, कल्कि, आदि जैसे अवतारों के विभिन्न रूपों में भगवान विष्णु को समर्पित हैं। मूल रूप से बावड़ी सात मंजिल की थी, किन्तु इसकी पांच मंजिलों की ही संरक्षित रखा जा सका है
रानी वाव की बनावट विशिष्ट श्रेणी की है। इसकी सीढ़ियां सीधी हैं, लेकिन इस पर बनी कलाकृतियां अपने-आप में अनूठी हैं। सीढ़ियों पर बने आलिए तथा मेहराब हालांकि अब टूट-फूट चुके हैं, लेकिन फिर भी वे तत्कालीन समय की समृद्ध कारीगरी के दर्शन करवाते हैं। वाव की दीवारों पर लगी कलात्मक खूंटियां भी दिलकश हैं।
इस वाव में एक छोटा द्वार भी है, जहां से 30 किलोमीटर लम्बी सुरंग निकलती है। हालांकि अब यह अब पत्थरों व कीचड़ से अवरोधित हो गई है। इसके बारे में ऐसा भी कहा जाता है कि प्राचीन समय में ही इसे रानी ने बंद करवा दिया था। यह सुरंग पाटण के सिद्धपुर शहर को निकलती है।
इस सुरंग का निर्माण पराजय के दौरान भागने के लिए करवाया गया था। इस सुरंग का निर्माण भी इस तरह किया गया था कि इसकी जानकारी सिर्फ राजा रानी और उनके विश्वस्त सैनिकों को ही थी। यानी की महल पर कब्जा होने के बाद भी दुश्मन उनकी तलाश कर पाने में असमर्थ थे।
गुजरात की प्राचीन राजधानी थी पाटण…
महेसाणा जिले से 25 मील दूर स्थित पाटण प्राचीन समय में गुजरात की राजधानी हुआ करती थी। भीमदेव प्रथम और सिद्धराज जयसिंह जैसे प्रतापी शासकों की वजह से पाटण का न सिर्फ वैभव बढ़ा, बल्कि ऐतिहासिक पुस्तकों में इसका नाम बार-बार आता है। मौजूदा वक्त में पाटण अपनी पटोला साड़ियों, सहस्रलिंग तालाब और रानी की वाव स्मारक की वजह से मशहूर है, जो वास्तुकला का अनूठा नमूना है। इस जिले में कई और ऐतिहासिक स्थान हैं, मसलन सिद्धपुर, जहां मातृ तर्पण के लिए पूरे देश से लोग आते हैं।
पाटण का उल्लेख महाभारत में भी…
पाटण का उल्लेख महाभारत में भी मिलता है। महाभारत के अनुसार भीम ने यहीं पर हिडिंब राक्षस को मारकर उसकी बहन हिडिंबा से विवाह किया था। पाटण में एक सहस्त्रलिंग झील है, जिसके किनारे दर्जनों खंडहर आज भी मौजूद हैं। यहां खुदाई में अब तक कई बहुमूल्य स्मारक मिल चुके हैं। मसलन, पार्श्वनाथ मंदिर, रानी महल और ‘रानी वाव’।
राजा भीमदेव सोलंकी:
राजा भीमदेव ही सोलंकी राजवंश के संस्थापक थे। भीमदेव प्रथम गुजरात के सोलंकी वंश के शासक थे। उन्होंने वडनगर (गुजरात) पर 1021-1063 ई. तक शासन किया। लेकिन 1025-1026 ईं में जब सोमनाथ और उसके आसपास के क्षेत्रों को विदेशी आक्रमणकारी महमूद गजनी ने अपने कब्जे में कर लिया था। गजनी के आक्रमण के प्रभाव के अधीन होकर सोलंकियों ने अपनी शक्ति और वैभव को गंवा दिया था।
सोलंकी साम्राज्य की राजधानी कही जाने वाली ‘अहिलवाड़ पाटण’ भी अपनी महिमा, गौरव और वैभव को गंवाती जा रही थी जिसे बहाल करने के लिए सोलंकी राज परिवार और व्यापारी एकजुट हुए और उन्होंने गुजरात में संयुक्त रूप से भव्य और खंडित मंदिरों के निर्माण के लिए अपना योगदान देना शुरू किया।
भीमदेव सोलंकी ने ही करवाया था सूर्य मंदिर का निर्माण…
मोढ़ेरा के विश्व प्रसिद्ध सूर्य मंदिर, जो अहमदाबाद से तकरीबन सौ किलोमीटर की दूरी पर पुष्पावती नदी के तट पर स्थित है। माना जाता है कि इस मंदिर का निर्माण सम्राट भीमदेव सोलंकी प्रथम (ईसा पूर्व 1022-1063 में) ने ही करवाया था। इसकी पुष्टि एक शिलालेख से होती है, जो मंदिर के गर्भगृह की दीवार पर लगा है, जिसमें लिखा गया है- ‘विक्रम संवत् 1083 अर्थात् (1025-1026 ईसा पूर्व)।’
सोलंकी ‘सूर्यवंशी’ थे, वे सूर्य को कुलदेवता के रूप में पूजते थे। इसीलिए उन्होंने अपने आद्य देवता की आराधना के लिए एक भव्य सूर्य मंदिर बनाने का निश्चय किया और इस प्रकार मोढ़ेरा के सूर्य मंदिर ने आकार लिया। भारत में तीन सूर्य मंदिर हैं, जिसमें पहला उड़ीसा का कोणार्क मंदिर, दूसरा जम्मू में स्थित मातर्ंड मंदिर और तीसरा गुजरात के मोढ़ेरा का सूर्य मंदिर है।

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ऐतिहासिक शोध – सिकन्दर ने नहीं, महाराज पुरु ने सिकन्दर को हराया था??..


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कृपया पुरा पोस्ट पढकर अपने विवेक से ही सत्य का निर्णय करें….
ऐतिहासिक शोध – सिकन्दर ने नहीं, महाराज पुरु ने सिकन्दर को हराया था??….

झेलम और चेनाब नदियों के बीच पुरु का राज्य था. सिकन्दर के साथ हुई मुठभेड़ में पुरु परास्त हुआ. किन्तु सिकन्दर ने उसका प्रदेश उसे लौटा दिया-झा एंड श्रीमाली, पृष्ठ 171….
सिविल सेवा की तैयारी के दौरान दुर्भाग्यवश बहुत विधार्थी झा एंड श्रीमाली जैसे नीच और मुर्ख वामपंथी इतिहासकारों द्वारा लिखित ये मानक इतिहास हमने बार बार पढ़ते हैं, जिसमें अपनी शौर्य और वीरता के लिए जगत प्रसिद्द महान राजा पुरु का इतिहास सिकन्दर महान का गुणगान करते हुए महज उपर्युक्त दो वाक्यों में सिमटा दिया गया है. लेकिन क्या आपलोगों ने ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के इतिहासकार रोबिन लेन फोक्स के द्वारा सिकन्दर पर लिखित इतिहास की पुस्तक “अलेक्जेंडर द ग्रेट” पर आधारित 2004 में बनी ओलिवर स्टोन की फिल्म “अलेक्जेंडर” देखी है. जिसमे इन धूर्त वामपंथी इतिहासकारों के इतिहास के विपरीत यह दिखाया गया कि सिकन्दर की सेना पुरु सेना की वीरता और उसके गज सेना के आतंक से पस्त हो गयी और जब गुस्से में सिकन्दर खुद पुरु से द्वंद करने के लिए बढ़ा तो पुरु का पुत्र ने उसके घोड़े का अंत कर दिया तथा पुरु का तीर सीधे उसके पेट में जा धंसा और वह जमीन पर गिरकर बेहोश हो गया. यूनानी सैनिक उसे युद्ध भूमि से किसी प्रकार उठा ले भागे. सिकन्दर स्वस्थ हुआ परन्तु काफी कमजोर था और उसी हालात में वह वापस लौटने को बाध्य हो गया……

दूसरी तरफ 1950 के दशक में बनी सोहराब मोदी का फिल्म “सिकन्दर” भी इसी प्रकार युद्ध की घटना चित्रित किया है. परन्तु वह इन धूर्त वामपंथियों के मिथ्याचार का शिकार हो इसे एक टर्निंग पॉइंट दे देता है. सोहराब मोदी के फिल्म में सिकन्दर के घोड़ा को तीर लगने और उसके जमीन पर गिरने के बाद जब महाराज पुरु भाला से बार करने लगते हैं तो उन्हें सिकन्दर की ईरानी प्रेमिका को दिए वो वचन याद आ जाता है, जो महाराज पुरु की वीरता से भयभीत सिकन्दर के प्राणों की भीख मांगने पुरु के पास आई थी और पुरु ने उसे वचन दिया था कि वह सिकन्दर की हत्या नहीं करेगा. उस वक्त युद्ध से भागने के पश्चात सिकन्दर रात्रि में पुरु के सोते हुए सैनिकों पर हमला करता है और पुरु को बंदी बना लेता है…..

सवाल है कि भारत के नीच और मक्कार वामपंथी इतिहासकार सिकंदर को महान और महाराज पुरु को पराजित क्यों घोषित करता है? इतिहास पर महान शोधकर्ता स्वर्गीय पुरुषोत्तम नागेश ओक कहते हैं की “असत्य का यह घोर इतिहास भारतीय इतिहास में इसलिए पैठ गया है. क्योंकि हमको उस महान संघर्ष के जितने भी वर्णन मिले हैं, वे सबके सब यूनानी इतिहासकारों के किए हुए हैं”. वे आगे लिखते हैं, “ऐसा कहा जाता है कि सिकन्दर ने झेलम नदी को सेना सहित घनी अँधेरी रात में नावों द्वारा पार कर पुरु की सेना पर आक्रमण किया था. उस दिन बारिस हो रही थी और पोरस के विशालकाय हाथी दलदल में फंस गए. किन्तु यूनानियों के इन वर्णनों की भी यदि ठीक से सूक्ष्म विवेचना करें तो स्पष्ट हो जायेगा की पोरस की गज सेना ने शत्रु शिविर में प्रलय मचा दिया था और सिकन्दर के शक्तिशाली फ़ौज को तहस-नहस कर डाला था”….
एरियन लिखता है भारतीय युवराज ने सिकन्दर को घायल कर दिया और उसके घोड़े बुक फेलस् को मार डाला….
जस्टिन भी लिखता है की ज्यों ही युद्ध प्रारम्भ हुआ, पोरस ने महानाश करने का आदेश दे दिया…..
कर्टियस लिखता है कि “सिकन्दर की सेना झेलम नदी पर पड़ाव डाले था. पुरु की सेना नदी तैर कर उस पार पहुंचकर सिकन्दर की सेना के अग्रिम पंक्ति पर जोरदार हमला किया. उन्होंने अनेक यूनानी सैनिकों को मार डाला. मृत्यु से बचने के लिए अनेक यूनानी नदी में कूद पड़े, किन्तु वे सब उसी में डूब गए”…..
कर्टियस हाथियों के आतंक का वर्णन करते हुए आगे लिखता है, “इन पशुओं ने घोर आतंक उत्पन्न कर दिया था और उनकी चिग्घार ने घोड़ों को न केवल भयातुर कर दिया. जिससे वे बिगडकर भाग उठते, बल्कि घुडसवारों के ह्रदय भी दहला देते. उन्होंने इतनी भगदड़ मचाई कि अनेक विजयों के ये शिरोमणि अब ऐसे स्थान की खोज में लग गए, जहाँ इनको शरण मिल सके. अब सिकन्दर ने छोटे छोटे टुकड़ों में हाथियों पर हमले का आदेश दिया, जिससे आहत पशुओं ने क्रुद्ध हो आक्रमणकारियों पर भीषण हमला कर दिया, उन्हें पैरों तले रौंद देते, सूंड से पकड़कर हवा में उछल देते, अपने सैनिकों के पास फेंक देते और सैनिक तत्काल उनका सर काट देते.”….
डीयोडोरस ने भी पुरु के हस्ती सेना का ऐसा ही वर्णन किया है. ओलिवर स्टोन ने अपने फिल्म में इस घटना को बारीकी से दर्शाया है. अस्तु, यह सब वर्णन स्पष्तः प्रदर्शित करता है कि युद्ध या तो सुखी भूमि पर ही लड़ा गया था या भूमि के गीले पन का कोई प्रभाव नहीं पड़ा था और यूनानियों ने सिर्फ अपनी हार का गम मिटाने के लिए हाईडेस्पिस् (झेलम) की लड़ाई के बारे में मिथ्या फैलाया. रात्रि के अंधकार में छिप कर हमला कर पुरु को परास्त करने और दल दल में पुरु के हस्ती सेना के फंस जाने के सच्चे झूठे यूनानियों के लिखित इतिहास से इतना तो स्पष्ट हो जाता है की भारत के सीमावर्ती जंगलों में महीनों से सांप बिच्छू का दंश और हैजा मलेरिया आदि बिमारियों को झेलकर पहले से आक्रांत सिकन्दर की सेना पुरु की सेना से आमने सामने लड़ाई में जितने में सक्षम नहीं था इसलिए रात्रि के अंधकार और बारिस का सहारा लिया…..
इथोपियाई महाकाव्यों का सम्पादन करने वाले श्री ई ए डव्लू बेंज ने अपनी रचना में सिकन्दर के जीवन और उसके विजय अभियानों का वर्णन सम्मिलित किया है. उनका कहना है कि “झेलम के युद्ध में सिकन्दर की अश्व सेना का अधिकांश भाग मारा गया था. सिकन्दर ने अनुभव कर लिया था कि यदि मैं लड़ाई जारी रखूंगा, तो पूर्ण रूप से अपना नाश कर लूँगा. अतः उसने युद्ध बंद कर देने के लिए पोरस से प्रार्थना की. भारतीय परम्परा के अनुरूप ही पोरस ने शरणागत शत्रु का वध नहीं किया. इसके बाद दोनों ने एक संधि पर हस्ताक्षर किए. अन्य प्रदेशों को अपने सम्राज्यधीन करने में. फिर, पोरस की सहायता सिकन्दर ने की.”….

मित्रों, बेंज की बातों में सच्चाई मालूम पड़ती है. भला एक साम्राज्यवादी विजेता अथक प्रयास और अपूरणीय क्षति के बाद विजित राजा को उसके राज्य के साथ साथ अपने द्वारा विजित अन्य प्रदेश भी कैसे दे सकता है, ताकि वह और शक्तिशाली हो जाए? इसके अतिरिक्त इतिहास में इस प्रकार का कोई और उद्धरण तो मैंने नहीं देखा है. परन्तु विदेशियों के गुलाम वामपंथी इतिहासकार हमे यूनानियों की यही बात मानने को बाध्य करते हैं कि सिकन्दर ने पुरु को परास्त किया फिर उदारता दिखाते हुए उसके राज्य लौटा दिए और फिर अपने विजित राज्य का एक हिस्सा भी उसे दे दिया. यही तथ्य कि पोरस ने सिकन्दर से अपना प्रदेश खोने की अपेक्षा कुछ जीता ही था, प्रदर्शित करता है कि वास्तविक विजेता सिकन्दर नहीं महाराज पुरु थे और सिकन्दर को अपना विजित प्रदेश देकर संधि करनी पड़ी थी. हमे जो इतिहास पढाया जाता है, वो मुर्ख वामपंथी इतिहासकारों का प्रपंच मात्र है……

यह लिखित तथ्य भी कि बाद में अभिसार ने सिकन्दर से मिलने से इंकार कर दिया था, सिकन्दर की पराजय का संकेतक हैं. यदि सिकन्दर विजेता होता तो उसकी अधीनता स्वीकार कर चूका अभिसार कभी भी उसकी अवहेलना करने की हिम्मत नहीं करता. लौटते वक्त सिकन्दर अपने ही द्वारा विजित क्षेत्रों से वापस लौटने की हिम्मत नहीं जूटा सका. नियार्कास के नेतृत्व में कुछ लोग समुद्र के रास्ते गए तो बाकी सिकन्दर के नेतृत्व में जेड्रोसिया के रेगिस्तान के रास्ते. उस पर भी रास्ते में छोटे छोटे कबीले वालों ने उसकी सेना पर भयंकर आक्रमण कर अपने जन धन और अपमान का बदला लिया. मलावी नामक जनजातियों के बीच तो सिकन्दर मरते मरते बचा था. प्लूटार्क लिखता है की “भारत में सबसे अधिक खूंखार लड़ाकू जाती मलावी लोगों के द्वारा सिकन्दर की देह के टुकड़े-टुकड़े होने ही वाले थे…..”
बेबिलोनिया पहुँचते पहुँचते रास्ते में उसके काफी सेना नष्ट हो चुके थे. सिकन्दर का न सिर्फ अहंकार और युद्धपिपासा बुरी तरह दमित हुई थी बल्कि हार, अपमान और सामरिक नुकसान से वह बुरी तरह टूट चूका था और शायद यही कारण है की वह बहुत अधिक शराब पीकर नशे में धुत रहने लगा था और अधिक शराब पिने की वजह से ही वह सिर्फ 28 जून 323 BC में मर गया…..

जरा सोचिये, यूनानी तो सिकन्दर की हार को जीत बताकर अपने देश की गौरवगाथा और अपना माथा ऊँचा रखने का प्रयास कर रहे थे. परन्तु नीच वामपंथी इतिहासकार अपने ही देश की गौरवगाथा को मिटटी में मिलाकर किसका भला कर रहे हैं? आपको यह भी बता दूँ की सिकन्दर की मौत पश्चात उसकी पत्नी ने ऑगस नामक एक पुत्र को जन्म दिया था, किन्तु कुछ महीनों के भीतर ही सिकन्दर की पत्नी एवं अबोध शिशु मार डाले गए. यदि सिकन्दर विजेता होता तो उसके मरणोंपरांत उसकी पत्नी और बच्चे की यह दुर्दशा नहीं होता……
सौजन्य से – Mukesh Kumar Verma

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अकबर को धूल चटाने वाले राणा प्रताप ने इस गुफा में खाई थीं घास की रोटियां


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अकबर को धूल चटाने वाले राणा प्रताप ने इस गुफा में खाई थीं घास की रोटियां
godwar virasat ‘वीरता की एक झलक’ सीरीज के तहत अपने पाठकों को उस गुफा के बारे में बता रहा है जहां अकबर को धूल चटाने वाले वीर योद्धा महाराणा प्रताप ने घास की रोटियां खाकर कुछ दिन बिताए थे। यह वो प्रतापी विरासत है जिसे प्रताप ने अपना शस्त्रागार बनाया था। आईए जानते हैं इस गुफा की कहानी।
हम बात कर रहे हैं मेवाड़ की विरासतों में शुमार मायरा की गुफा के बारे में। प्रकृति ने इस दोहरी कंदरा को कुछ इस तरह गढ़ा है मानो शरीर में नसें। इस गुफा में प्रवेश के तीन रास्ते हैं, जो किसी भूल-भुलैया से कम नहीं। इसकी खासियत यह भी है कि बाहर से देखने में इसके रास्ते का द्वार किसी पत्थर के टीले की तरह दिखाई पड़ता है। लेकिन जैसे-जैसे हम अंदर जाते हैं रास्ते भी निकलता जाता हैं। यही कारण है कि यह अभी तक हर तरफ से सुरक्षित है। यही तो कारण था कि महाराणा प्रताप ने इसे अपना शस्त्रागार बनाया था।
दरअसल, जब महाराणा प्रताप का जन्म हुआ उस समय दिल्ली सम्राट अकबर का शासन था। वह सभी राजा-महाराजाओं को अपने अधीन कर मुगल साम्राज्य का ध्वज फहराना चाहता था। वहीं मेवाड़ की भूमि को मुगल आधिपत्य से बचाने के लिए महाराणा प्रताप ने प्रतिज्ञा की थी कि जब तक मेवाड़ आजाद नहीं होगा, मैं महलों को छोड़ जंगलों में निवास करूंगा। अकबर ने कहा था कि अगर राणा प्रताप मेरे सामने झुकते है तो आधे हिंदुस्तान के वारिस वो होंगे पर बादशाहत अकबर कि रहेगी। जवाब में प्रताप ने कहा था कि स्वादिष्ट भोजन को त्याग कंदमूल फलों से ही पेट भरूंगा लेकिन अकबर का अधिपत्य कभी स्वीकार नहीं करूंगा।
हल्दी घाटी में अकबर और प्रताप के बीच हुए युद्ध के दौरान इसी गुफा को प्रताप ने अपना शस्त्रागार बनाया था। यह युद्ध आज भी पूरे विश्व के लिए आज एक मिसाल है। इसका पता इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस युद्ध में अकबर के 85 हजार और प्रताप के केवल 20 हजार सैनिक थे। इसके बावजूद प्रताप ने अकबर को धूल चटा दिया था। प्रताप का पराक्रम ऐसा था कि उनकी मृत्यु पर उनकी बहादुरी को याद कर अकबर भी रो पड़ा था।
हालांकि प्रताप की जीत में उनके घोड़े का भी अहम योगदान था। एक पांव चोटिल होने के बाद भी प्रताप को पीठ पर लिए वह नाले को पार कर गया लेकिन मुगल सैनिक उसे पार न कर सके। हल्दी घाटी के युद्ध की याद दिलाती यह गुफा इतनी बड़ी है कि इसके अंदर घोड़ो को बांधने वाली अश्वशाला और रसोई घर भी है। इस गुफा के अंदर वही अश्वशाला है जहां चेतक को बांधा जाता था, इसलिए यह जगह आज भी पूजा जाता है। पास ही मां हिंगलाज का स्थान है। प्रकृति और इतिहास की यह विरासत अरसे से अनदेखी का शिकार है।

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जैसलमेर


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कृष्ण ने 1 तीर से इस किले में खोद डाला था कुआं, बुझाई थी अर्जुन की प्यास
जैसलमेर. यूनेस्को के विश्व धरोहरों में शामिल जैसलमेर का किला कई विशेषताओं के लिए फेमस है। इस किले में 99 बुर्ज हैं जिन पर दुश्मनों के छक्के छुड़ाने के लिए तोप रखे जाते थे। आज भी ये तोप देखे जा सकते हैं। इसे रेगिस्तान की बालू रेत से मिलते-जुलते गहरे पीले रंग के पत्थरों को बिना चूने की सहायता के आश्चर्यजनक ढंग से जोड़कर बनाया गया है। यह अपने आप में मौलिक और अनूठी विशेषता है। यह किला चारों ओर से रेत (मरुस्थल) से घिरा हुआ है। 858 साल से रेगिस्तान में खड़ा है यह किला, इस किले में 1200 से ज्यादा घर हैं।
इस किले से जुड़ी है महाभारत काल की कहानी। कहते हैं एक बार भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन यहां 80 मीटर ऊंची त्रिकुट पहाड़ी पर आये तब अर्जुन को बहुत तेज की प्यास लगी चारों तरफ पानी का नामोनिशान भी नहीं था तब भगवान श्रीकृष्ण ने तीर का प्रहार कर यहां पाताल तोड़ कुआं खोद दिया जिसके पानी से अर्जुन ने अपनी प्यास बुझाई आज भी यह कृष्ण कुण्ड के नाम से विख्यात है
क्यों कहते हैं गोल्डन फोर्ट…?
जैसलमेर की शान के रूप में माना जाने वाला यह किला ‘सोनार किला’ और ‘गोल्डन फोर्ट’ के नाम से जाना जाता है। यह किला पीले बलुआ पत्थर का किला सूर्यास्त के समय सोने की तरह चमकता है। इसे 1156 ई. में एक भाटी राजपूत शासक जैसल द्वारा त्रिकुट पहाड़ी के शीर्ष पर निर्मित किया गया था।
बॉलीवुड के लिए बना प्राइम लोकेशन
जैसलमेर के पर्यटन स्थल और यहां की विरासत बॉलीवुड के लिए प्राइम लोकेशन है। अब तक जैसलमेर में कई बॉलीवुड फिल्मों, एड, रीजनल फिल्मों की शूटिंग हो चुकी है। अभी तक यहां मुख्य रूप से कच्चे धागे, कृष्णा, सरफरोश, टशन, रुदाली और कोका कोला, बोरो प्लस, पेप्सी व हीरो होंडा जैसी कंपनियों की एड भी यहां शूट हो चुके हैं। उदयपुर स्थित लीला पैलेस यहां के सबसे बेहतरीन होटलों में शुमार होता है।
अकाल के समय चरणों में रख दी थी तलवार फिर हुई थी बारिश
किले में भगवान श्रीकृष्ण का एक मंदिर भी बना हुआ है जिनमें भगवान लक्ष्मीनाथ जी विराजे हुए हैं। संगमरमर की मूर्ति इतनी मोहक है कि दर्शन को आने वाले सैलानी भी एक बार टकटकी लगाये देखते रह जाते हैं। शांति समृद्धि के लिए भगवान को यहां एक विषेष प्रकार का पेड़ा प्रसाद के रूप में चढ़ाया जाता है। कहते हैं जैसलमेर में जब भीषण अकाल पड़ा और जीवन त्रस्त हो गया तब यहां के महाराजा ने अपनी तलवार भगवान लक्ष्मीनाथ जी के चरणों में रख दी थी और यह प्रण लिया था कि जब तक बारिश नहीं होगी तब तक वे तलवार नहीं उठायेंगे। भगवान ने उनकी सुन ली और उस साल बारिश हुई।
आज भी मिलता है राजसी ठाठ का आनंद
यह किला धार्मिक महत्व भी रखता है। किले में प्राचीन काल के जैन मंदिर भी बने हुए हैं जो अपनी स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना पेष करते हैं। पत्थर के बाद पर्यटन ही यहां का मुख्य व्यवसाय है। कई लोगों ने अपने पुराने हवेलीनुमा घरों को भले ही पर्यटन के लिए खोल दिया हो लेकिन उन्होंने उसके मूल स्वरूप को नहीं बदला है। यहां आज भी पर्यटक राजसी अहसास का आनंद ले सकते हैं।
शहर की आबादी का एक चौथाई हिस्सा रहता है यहां
इस किले में कई खूबसूरत हवेलियां या मकान, मंदिर और सैनिकों तथा व्यापारियों के आवासीय परिसर हैं। वर्तमान में, यह शहर की आबादी के एक चौथाई के लिए एक आवासीय स्थान है। इस किले में 1200 से ज्यादा घर हैं। कभी अकाल झेल चुके इस किले में आज कई कुएं हैं जो यहां के लोगों के लिए पानी का स्रोत बने हुए हैं।
यहां के पत्थर हैं ‘अनमोल’
यहां पीले रंग का एक बेहद बेषकीमती पत्थर पाया जाता है जो यहां का मुख्य व्यवसास भी है। इस पत्थर से जुड़ा रोचक तथ्य यह है कि इसका पीला रंग सूर्य के प्रकाष में दोगुना हो जाता है। इससे यह सोने के रंग सा अहसास कराता है और कारीगरी के लिए यह पत्थर बेहद अच्छा है। कई हवेलियों और किले की स्थापत्य कला अपने आप में अनूठी बन पड़ी है। यह यहां की जालीदार नक्काषी, झरोखों के लिए भी जाना जाता है।

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लुटता रहा ‘आजाद हिन्द फौज’ का ख़जाना, देखते रहे नेहरू


लुटता रहा ‘आजाद हिन्द फौज’ का ख़जाना, देखते रहे नेहरू…, क्या देशद्रोही थे?

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नई दिल्ली। पिछले 67 सालों से प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की नेताजी सुभाष चन्द्र बोस से संबंधित जिन करतूतों और नापका कार्यों की फाईलों को काँग्रेस ने सरकार साउथ ब्लॉक में ऑफिशियल सीक्रेट के नाम पर दबा रखा था, उन फाईलों के बाहर आते ही नेहरू की छोटी मानसिकता की पोल परत दर परत खुलता जा रहा है।

नेताजी ने आजाद हिंद फौज के बैंक के लिए जो खजाना जुटाया था, जिसे उनके करीबियों ने नेहरू के ईशारे पर लूट लिया था। आश्चर्य इस बात की है कि इस पूरे मामले की जानकारी तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को थी, पर नेहरू सरकार आँखे मूंदे बैठी रही। यह खुलासा उन 37 फाइलों में से निकली है, जिसे लगातार सार्वजनिक करने की मांग उठती रही है। उसी में से एक फाइल से यह जानकारी सामने आई है।

RH-Nehru Netajiफाइल के मुताबिक नेताजी ने आजाद हिंद फौज को खड़ा करने के लिए आम लोगों से पैसे लेकर खजाना तैयार किया था। यह वह सोना था, जिसे भारत की मां-बहनों ने आजादी की लड़ाई के लिए नेताजी को दान में दिया था। नेताजी के निजी सहायक कुंदन सिंह के हवाले से बताया गया कि हिटलर ने भी स्टील के चार संदूकों में गहने भरकर नेताजी को गिफ्ट किया था।

उस खजाने में 65 किलो से ज्यादा सोना था। कुछ तो बताते हैं कि तकरीबन 100 किलो सोना नेताजी को दान में मिला था। नेताजी ने इस खजाने का बड़ा हिस्सा साईगान में आजाद हिंद फौज का बैंक बनाने के लिए रखा था। अब सीक्रेट फाइलों से यह पता चला है कि उस खजाने को जब लूटा जा रहा था, तब भारत की नेहरू सरकार चुपचाप देख रही थी अथवा उन्हीं के ईशारे पर यह सारा पाप किया जा रहा था।

दस्तावेज से यह बात भी सामने आई है कि तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू को जापान सरकार ने बार-बार बताया कि नेताजी का खजाना उन्हीं के करीबी लूट रहे हैं, लेकिन प्रधानमंत्री नेहरू ने कोई कार्रवाई नहीं की। उलटे जिस शख्स पर खजाना लूटने का आरोप था, उसी की चिट्ठी संसद में पढ़ी गई, जिसमें उसने नेताजी की मौत की पुष्टि की थी। दस्तावेजों के मुताबिक नेताजी के करीबी ए. अय्यर और एम. रामामूर्ति ही खजाना लूटने के आरोपी हैं। जाहिर है उस खजाने की कीमत आज करोड़ों में होती।

दस्तावेजों के मुताबिक, तोक्यो में पहले भारतीय संपर्क मिशन के प्रमुख बेनेगल रामाराव ने भारत सरकार को बताया कि राममूर्ति ने नेताजी के पैसों और उनके कीमती सामान का गबन किया। इसके बाद मिशन प्रमुख बने के. के. चेत्तूर ने लिखा कि राममूर्ति और अय्यर का संबंध नेताजी के रहस्यमय ढंग से गायब खजाने से जरूर है। तोक्यों में भारतीय राजदूत ए. के. डार ने 1955 में लिखा कि सरकार को इस बात की जांच करानी चाहिए कि इस खजाने को चुराने वाले कौन हैं।

दस्तावेज बताते हैं कि इस दिशा में भारत सरकार ने कोई कदम नहीं उठाया। आलम यह है कि 65 किलो से ज्यादा सोने में से सिर्फ 11 किलो सोना ही भारत लौट सका। 1952 में चार पैकिटों में आजाद हिंद फौज का 11 किलो सोना वापस आ सका। यह ताइवान हादसे के बाद जमा किया गया था। जले हुए बैग में यह खजाना दिल्ली के नेशनल म्यूजियम में 62 साल से पड़ा है। इस पूरे मामले के सामने आने के बाद इसे आजाद भारत में काँग्रेस सरकार का पहला महाघोटाला और देशद्रोह माना जा रहा है।