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गोस्वामी तुलसीदास


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काशी की विभूतियाँ

गोस्वामी तुलसीदास

श्री रामचरितमानस के रचयिता गोस्वामी तुलसीदास का जन्म सन् १५६८ में राजापुर में श्रावण शुक्ल ७ को हुआ था। पिता का नाम आत्माराम और माता का नाम हुलसी देवी था। तुलसी की पूजा के फलस्वरुप उत्पन्न पुत्र का नाम तुलसीदास रखा गया। पत्नी रत्नावली के प्रति अति अनुराग की परिणति वैराग्य में हुई। अयोध्या और काशी में वास करते हुए तुलसीदास ने अनेक ग्रन्थ लिखे। चित्रकूट में हनुमान् जी की कृपा से इन्हे राम जी का दर्शन हुआ। काशी और अयोध्या में (संवत् १६३१) ‘रामचरितमानस’ और ‘विनय पत्रिका’ की रचना की। तुलसी की ‘हनुमान् चालीसा’ का पाठ करोड़ो हिन्दू नित्य करते हैं। तुलसी घाट पर ही निवास करते हुए श्रावण शुक्ल तीज को राम में लीन हो गये।

गोस्वामी तुलसीदास जी को महर्षि वाल्मीकि का अवतार माना जाता है। उनका जन्म बांदा जिले के राजापुर गाँव में एक सरयू पारीण ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनका विवाह सं. १५८३ की ज्येष्ठ शुक्ल त्रयोदशी को बुद्धिमती (या रत्नावली) से हुआ। वे अपनी पत्नी के प्रति पूर्ण रुप से आसक्त थे। एक बार जब उनकी पत्नी मैके गयी हुई थी उस समय वे छिप कर उसके पास पहुँचे। पत्नी को अत्यंत संकोच हुआ उसने कहा –

हाड़ माँस को देह मम, तापर जितनी प्रीति।

तिसु आधो जो राम प्रति, अवसि मिटिहि भवभीति।।

तुलसी के जीवन को इस दोहे ने एक नयी दिशी दी। वे उसी क्षण वहाँ से चल दिये और सीधे प्रयाग पहुँचे।

फिर जगन्नाथ, रामेश्वर, द्वारका तथा बदरीनारायण की पैदल यात्रा की। चौदह वर्ष तक के निरंतर तीर्थाटन करते रहे। इस काल में उनके मन में वैराग्य और तितिक्षा निरंतर बढ़ती चली गयी। इस बीच आपने श्री नरहर्यानन्दजी को गुरु बनाया।

गोस्वामी जी के संबंध में कई कथाएँ प्रचलित हैं। कहते हैं जब वे प्रात:काल शौच के लिये गंगापार जाते थे तो लोटे में बचा हुआ पानी एक पेड़ेे की जड़ में डाल देते थे। उस पेड़ पर एक प्रेत रहता था। नित्य पानी मिलने से वह प्रेत संतुष्ट हो गया और गोस्वामी जी सामने प्रकट हो कर उनसे वर माँगने की प्रार्थना करने लगा। गोस्वामी जी ने रामचन्द्र जी के दर्शन की लालसा प्रकट की। प्रेत ने बताया कि अमुक मंदिर में सायंकाल रामायण की कथा होती है, यहाँ हनुमान् जी नित्य ही कोढ़ी के भेष में कथा सुनने आते हैं। वे सब से पहले आते हैं और सब के बाद में जाते हैं। गोस्वामी जी ने वैसा ही किया और हनुमान् जी के चरण पकड़ कर रोने लगे। अन्त में हनुमान् जी ने चित्रकूट जाने की आज्ञा दी।

आप चित्रकूट के जंगल में विचरण कर रहे थे तभी दो राजकुमार – एक साँवला और एक गौरवर्ण धनुष-बाण हाथ में लिये, घोड़ेे पर सवार एक हिरण के पीछे दौड़ते दिखायी पड़े। हनुमान् जी ने आ कर पूछा, “कुछ देखा? गोस्वामी जी ने जो देखा था, बता दिया। हनुमान् जी ने कहा,’वे ही राम लक्ष्मण थे।’ वि.सं. १६०७ का वह दिन। उस दिन मौनी अमावस्या थी। चित्रकूट के घाट पर तुलसीदास जी चंदन घिस रहे थे। तभी भगवान् रामचन्द्र जी उनके पास आये और उनसे चन्दन माँगने लगे। गोस्वामी जी ने उन्हें देखा तो देखते ही रह गये। ऐसी रुपराशि तो कभी देखी ही नहीं थी। उनकी टकटकी बंध गयी। उस दिन रामनवमी थी। संवत १६३१ का वह पवित्र दिन। हनुमान् जी की आज्ञा और प्रेरणा से गोस्वामी जी ने रामचरितमानस लिखना प्रारंभ किया और दो वर्ष, सात महीने तथा छब्बीस दिन में उसे पूरा किया। हनुमान् जी पुन: प्रकट हुए, उन्होंने रामचरितमानस सुनी और आशीर्वाद दिया, ‘यह रामचरितमानस तुम्हारी कीर्ति को अमर कर देकी।’

सच्चरित्र होने के कारण आप के हाथ से कुछ न कुछ चमत्कार हो जाते थे। एक बार उनके आशीर्वाद से एक विधवा का पति जीवित हो उठा। यह खबर बादशाह तक पहुँची। उसने उन्हें बुला भेजा और कहा, ‘कुछ करामात दिखाओ।’ गोस्वामी जी ने कहा कि ‘रामनाम’ के अतिरिक्त मैं कुछ भी करामात नहीं जानता। बादशाह ने उन्हें कैद कर लिया और कहा कि जब तक करामात नहीं दिखाओगे, तब तक छूट नहीं पाओगे। तुलसीदास जी ने हनुमान् जी की स्तुति की। हनुमान् जी ने बंदरों की सेना से कोट को नष्ट करना प्रारम्भ किया। बादशाह इनके चरणों पर गिर पड़े और उनसे क्षमायाचना की।

तुलसीदास जी के समय में हिंदु समाज में अनेक पंथ बन गये थे। मुसलमानों के निरंतर आतंक के कारण पंथवाद को बल मिला था। उन्होंने रामायम के माध्यम से वर्णाश्रम धर्म, अवतार धर्म, साकार उपासना, मूर्कित्तपूजा, सगुणवाद, गो-ब्राह्मण रक्षा, देवादि विविध योनियों का सम्मान एवं प्राचीन संस्कृति और वेदमार्ग का मण्डन तथा तत्कालीन मुस्लिम अत्याचारों और सामाजिक दोषों का तिरस्कार किया।

वे अच्छी तरह जानते थे कि राजाओं की आपसी फूट और सम्प्रदाय वाद के झगड़ों के कारण भारत में मुसलमान विजयी हो रहे हैं। उन्होंने गुप्त रुप से यही बातें रामचरितमानस के माध्यम से बतलाने का प्रयास किया किंतु राजाश्रय न होने के कारण लोग उनकी बात समझ नहीं पाये और रामचरितमानस का राजनीतिक उद्देश्य सफल नहीं हो पाया। यद्यपि रामचरितमानस को तुलसीदास जी ने राजनीतिक शक्ति का केन्द्र बनाने का प्रयत्न नहीं किया फिर भी आज वह ग्रंथ सभी मत-मतावलम्बियों को पूर्ण रुप से मान्य है। सब को एक सूत्र में बाँधने का जो कार्य शंकराचार्य ने किया था, वही कार्य बाद के युग में गोस्वामी तुलसीदास जी ने किया। गोस्वामी तुलसीदास ने अधिकांश हिदू भारत को मुसलमान होने से बचाया।

आप के लिखे बारह ग्रंथ अत्यंत प्रसिद्ध हैं –

दोहावली, कवित्तरामायण, गीतावली, रामचरित मानस, रामलला नहछू, पार्वतीमंगल, जानकी मंगल, बरवै रामायण, रामाज्ञा, विन पत्रिका, वैराग्य संदीपनी, कृष्ण गीतावली। इसके अतिरिक्त रामसतसई, संकट मोचन, हनुमान बाहुक, रामनाम मणि, कोष मञ्जूषा, रामशलाका, हनुमान चालीसा आदि आपके ग्रंथ भी प्रसिद्ध हैं।

१२६ वर्ष की अवस्था में संवत् १६८० श्रावण शुक्ल सप्तमी, शनिवार को आपने अस्सी घाट पर अपना शहरी त्याग दिया।

संवत सोलह सै असी, असी गंग के तीर।

श्रावण शुक्ला सप्तमी, तुलसी तज्यो शरीर।।

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जाति प्रथा की सच्चाई – 1


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जाति प्रथा की सच्चाई – 1

[कृपया ध्यान दें – यह लेख मुख्य: रूप से उस विचारधारा के लोगो पर पर केन्द्रित हैजो जन्मआधारित जातिगत भेदभाव का पक्ष लेते हैं. इसीलिए सभी लोगों से प्रार्थनाहै कि हमारी समीक्षा को केवल इस घृणास्पद प्रथा और ऐसी घृणास्पद प्रथा के सरंक्षक, पोषक और समर्थकों के सन्दर्भ में देखा जाए न कि किसी व्यक्ति, समाज और जाति के सन्दर्भ में. अग्निवीर हर किस्म के जातिवाद को आतंकवाद का सबसे ख़राब और घृणित रूप मानता है और ऐसी घृणास्पद प्रथा के सरंक्षक, पोषक और समर्थकों को दस्यु. बाकी हम सब लोग, चाहे वो इंसान के द्वारा स्वार्थवश बनाई गयी तथाकथित छोटी जाति या ऊंची जाति का हो, एक परिवार, एक जाति, एक नस्ल के ही हैं. हम अपने पाठकों से निवेदन करते हैं कि वो ये न समझेंकि इस लेख को वैदिक विचारधारा “वसुधैव कुटुम्बकम” के विपरीत किसीव्यक्ति या वर्ग विशेष के लिए लिखा गया है. ]

जाति प्रथा से जुड़े हुए कुछ ऐसे तथ्य जिनके बारे में हमें पता होना चाहिए और जिनके बारे में हम सोचें:

ब्राह्मण कौन है ?

जाति प्रथा के बारे में सबसे हँसी की बात ये है कि जन्म आधारित जातिप्रथा अस्पष्ट और निराधार कथाओं पर आधारित हैं. आज ऐसा कोई भी तरीका मौजूद नहीं जिससे इस बात का पता चल सके कि आज के तथाकथित ब्राह्मणों के पूर्वज भी वास्तविक ब्राह्मण ही थे. विभिन्न गोत्र और ऋषि नाम को जोड़ने के बाद भी आज कोई भी तरीका मौजूद नहीं है जिससे कि उनके दावे की परख की जा सके.

जैसे हम पहले भी काफी उदाहरण दे चुके हैं की वैदिक समय / प्राचीन भारत में एक वर्ण का आदमी अपना वर्ण बदल सकता था.

अगर हम ये कहें कि आज का ब्राह्मण [जाति / जन्म आधारित ] शूद्र से भी ख़राब है क्योंकि ब्राह्मण 1000 साल पहले चंडाल के घर में पैदा हुआ था, हमारे इस दावे को नकारने का साहस कोई भला कैसे कर सकता है ? अगर आप ये कहें कि ये ब्राह्मण परिवार भरद्वाज गोत्र का है तो हम इस दावे की परख के लिए उसके DNA टेस्ट की मांग करेंगे. और किसी DNA टेस्ट के अभाव में तथाकथित ऊँची जाति का दावा करना कुछ और नहीं मानसिक दिवालियापन और खोखला दावा ही है.

क्षत्रिय कौन है ?

ऐसा माना जाता है कि परशुराम ने जमीन से कई बार सभी क्षत्रियों का सफाया कर डाला था. स्वाभाविक तौर पर इसीलिए आज के क्षत्रिय और कुछ भी हों पर जन्म के क्षत्रिय नहीं हो सकते!

अगर हम राजपूतों की वंशावली देखें ये सभी इन तीन वंशों से सम्बन्ध रखने का दावा करते हैं – 1. सूर्यवंशी जो कि सूर्य / सूरज से निकले, 2. चंद्रवंशी जो कि चंद्रमा / चाँद से निकले, और 3. अग्निकुल जो कि अग्नि से निकले. बहुत ही सीधी सी बात है कि इनमे में से कोई भी सूर्य / सूरज या चंद्रमा / चाँद से जमीन पर नहीं आया. अग्निकुल विचार की उत्पत्ति भी अभी अभी ही की है. किवदंतियों / कहानियों के हिसाब से अग्निकुल की उत्पत्ति / जन्म आग से उस समय हुआ जब परशुराम ने सभी क्षत्रियों / राजपूतों का जमीन से सफाया कर दिया था. बहुत से राजपूत वंशों में आज भी ऐसा शक / भ्रम है कि उनकी उत्पत्ति / जन्म; सूर्यवंशी, चंद्रवंशी, अग्निकुल इन वंशो में से किस वंश से हुई है.

स्वाभाविक तौर से इन दंतकथाओं का जिक्र / वर्णन किसी भी प्राचीन वैदिक पुस्तक / ग्रन्थ में नही मिलता. जिसका सीधा सीधा मतलब ये हुआ कि जिन लोगों ने शौर्य / सेना का पेशा अपनाया वो लोग ही समय समय पर राजपूत के नाम से जाने गए.

ऊँची जाति के लोग चंडाल हो सकते हैं

अगर तथाकथित ऊँची जाति के लोग ये दावा कर सकते हैं कि दूसरे आदमी तथाकथित छोटी जाति के हैं तो हम भी ये दावा कर सकते हैं कि ये तथाकथित छोटी जाति के लोग ही असली ब्रह्मण, क्षत्रिय और वैश्य हैं. और ये ऊँची जाति के लोग असल में चांडालों की औलादें हैं जिन्होंने शताब्दियों पहले सत्ता पर कब्ज़ा कर लिया था और सारा इतिहास मिटा / बदल दिया था. आज के उपलब्ध इतिहास को अगर हम इन कुछ तथाकथित ऊँची जाति के लोगों की उत्पत्ति / जन्म की चमत्कारी कहानियों के सन्दर्भ में देखें तो हमारे दावे की और भी पुष्टि हो जाती है.

अबअगर किसी जन्मगत ब्राह्मणवादी को हमारी ऊपर लिखी बातों से बेईज्ज़ती महसूस होती है तो उसका भीकिसी आदमी को तथाकथित छोटी जाति का कहना अगर ज्यादा नहीं तोकम बेईज्ज़ती की बात नहीं है.

हम लोगों में से म्लेच्छकौन है ?

इतिहास से साफ़ साफ़ पता लगता है कि यूनानी, हूण, शक, मंगोल आदि इनके सत्ता पर काबिज़ होने के समय में भारतीय समाज में सम्मिलित होते रहे हैं. इनमे से कुछों ने तो लम्बे समय तक भारत के कुछ हिस्सों पर राज भी किया है और इसीलिए आज ये बता पाना बहुत मुश्किल है कि हममे से कौन यूनानी, हूण, शक, मंगोल आदि आदि हैं! ये सारी बातें वैदिक विचारधारा – एक मानवता – एक जाति से पूरी तरह से मेल खाती है लेकिन जन्म आधारित जातिप्रथा को पूरी तरह से उखाड़ देती हैं क्योंकि उन लोगो के लिए म्लेच्छ इन तथाकथित 4 जातियों से भी निम्न हैं.

जाति निर्धारण के तरीके की खोज में

आप ये बात तो भूल ही जाओ कि क्या वेदों ने जातिप्रथा को सहारा दिया है या फिर नकारा है ? ये सारी बातें दूसरे दर्जे की हैं. जैसा कि हम सब देख चुके हैं कि असल में “वेद” तो जन्म आधारित जातिप्रथा और लिंग भेद के ख्याल के ही खिलाफ हैं. सारी बातों से भी ज्यादा जरूरी बात ये है कि हमारे में से किसी के पास भी ऐसा कोई तरीका नहीं है कि हम सिर्फ वंशावली के आधार पर ये निश्चित कर सकें कि वेदों कि उत्पत्ति के समय से हममे से कौन ऊँची जाति का है और कौन नीची जाति का. अगर हम लोगों के स्वयं घोषित और खोखले दावों की बातों को छोड़ दें तो किसी भी व्यक्ति के जाति के दावों को विचारणीय रूप से देखने का कोई भी कारण हमारे पास नहीं है.

इसलिए अगर वेदजन्म आधारित जातिप्रथा को उचित मानते तो वेदों में हमें किसी व्यक्ति की जाति निर्धारण करने का भरोसेमंद तरीका भी मिलना चाहिए था. ऐसे किसी भरोसेमंद तरीके की गैरहाजिरी में जन्म आधारित जातिप्रथा के दावे औंधे मुंह गिर पड़ते हैं.

इसी वज़ह से ज्यादा से ज्यादा कोई भी आदमी सिर्फ ये बहस कर सकता है कि हो सकता है की वेदों की उत्पत्ति के समय पर जातिप्रथा प्रसांगिक रही हो, पर आज की तारीख में जातिप्रथा का कोई भी मतलब नहीं रह जाता.

हालाँकि हमारा विचार ये है कि, जो कि सिर्फ वैदिक विचारधारा और तर्क पर आधारित है, जातिप्रथा कभी भी प्रसांगिक रही ही नहीं और जातिप्रथा वैदिक विचारधारा को बिगाड़ कर दिखाया जाना वाला रूप है. और ये विकृति हमारे समाज को सबसे महंगी विकृति साबित हुई जिसने कि हमसे हमारा सारा का सारा गर्व, शक्ति और भविष्य छीन लिया है.

नाम में क्या रखा है ?

कृपया ये बात भी ध्यान में रखें की गोत्र प्रयोग करने की प्रथा सिर्फ कुछ ही शताब्दियों पुरानी है. आपको किसी भी प्राचीन साहित्य में ‘राम सूर्यवंशी’ और ‘कृष्ण यादव’ जैसे शब्द नहीं मिलेंगे. आज के समय में भी एक बहुत बड़ी गिनती के लोगों ने अपने गाँव, पेशा और शहर के ऊपर अपना गोत्र रख लिया है. दक्षिण भारत के लोग मूलत: अपने पिता के नाम के साथ अपने गाँव आदि का नाम प्रयोग करते हैं. आज की तारीख में शायद ही ऐसे कोई गोत्र हैं जो वेदों की उत्पत्ति के समय से चले आ रहे हों.

प्राचीन समाज गोत्र के प्रयोग को हमेशा ही हतोत्साहितकिया करता था. उस समय लोगों की इज्ज़त सिर्फ उनके गुण, कर्म और स्वाभाव को देखकर की जाती थी न कि उनकी जन्म लेने की मोहर पर. ना तो लोगों को किसी जाति प्रमाण पत्र की जरूरत थी और ना ही लोगों का दूर दराज़ की जगहों पर जाने में मनाही थी जैसा कि हिन्दुओं के दुर्भाग्य के दिनों में हुआ करता था. इसीलिए किसी की जाति की पुष्टि करने के लिए किसी के पास कोई भी तरीका ही नहीं था . किसी आदमी की प्रतिभा / गुण ही उसकी एकमात्र जाति हुआ करती थी. हाँ ये भी सच है कि कुछ स्वार्थी लोगों की वज़ह से समय के साथ साथ विकृतियाँ आती चली गयीं. और आज हम देखते हैं कि राजनीति और बॉलीवुड भी जातिगत हो चुके हैं. और इसमें कोई भी शक की गुंजाईश नहीं है कि स्वार्थी लोगों की वज़ह से ही दुष्टता से भरी इस जातिप्रथा को मजबूती मिली. इन सबके बावजूद जातिप्रथा की नींव और पुष्टि हमेशा से ही पूर्णरूप से गलत रही है.

अगर कोई भी ये दावा करता है कि शर्मा ब्राहमणों के द्वारा प्रयोग किया जाने वाला गोत्र है, तो यह विवादास्पत है क्योंकि महाभारत और रामायण के काल में लोग इसका अनिवार्य रूप से प्रयोग करते थे, इस बात का कोई प्रमाण नहीं. तो हम ज्यादा से ज्यादा ये मान सकते हैं कि हम किसी को भी शर्मा ब्राह्मण सिर्फ इसीलिए मानते हैं क्योंकि वो लोग शर्मा ब्राह्मण गोत्र का प्रयोग करते हैं. ये भी हो सकता है कि उसके दादा और पड़दादा ने भी शर्मा ब्राह्मण गोत्र का प्रयोग किया हो. लेकिन अगर एक चंडाल भी शर्मा ब्राह्मण गोत्र का प्रयोग करने लगता है और उसकी औलादें भी ऐसा ही करती हैं तो फिर आप ये कैसे बता सकते हो कि वो आदमी चंडाल है या फिर ब्राह्मण? आपको सिर्फ और सिर्फ हमारे दावों पर ही भरोसा करना पड़ेगा. कोई भी तथाकथित जातिगत ब्राह्मण यह बात नहीं करता कि वो असल में एक चंडाल के वंश से भी हो सकता है, क्योंकि सिर्फ ब्राहमणहोने से उसे इतने विशेष अधिकार और खास फायदे मिले हुए हैं.

मध्य युग के बाहरी हमले

पश्चिम और मध्य एशिया के उन्मादी कबीलों के द्वारा हजार साल के हमलों से शहरों के शहरों ने बलात्कार का मंज़र देखा. भारत के इस सबसे काले और अन्धकार भरे काल में स्त्रियाँ ही हमेशा से हमलों का मुख्य निशाना रही हैं. जब भी कासिम, तैमूर, ग़ज़नी और गौरी जैसे लुटेरों ने हमला किया तो इन्होने ये सुनिश्चित किया कि एक भी घर ऐसा ना हो की जिसकी स्त्रियों का उसके सिपाहियों ने बलात्कार ना किया हो. खुद दिल्ली को ही कई बार लूटा और बर्बाद किया गया. उत्तर और पश्चमी भारत का मध्य एशिया से आने वाला रास्ता इस अत्याचार को सदियों से झेलता रहा है. भगवान् करे कि ऐसे बुरे दिन किसी भी समाज को ना देखने पड़ें. लेकिन हमारे पूर्वजों ने तो इसके साक्षात् दर्शन किये हैं. अब आप ही बताइए कि ऐसे पीड़ित व्यक्तियों के बच्चों को तथाकथित जातिप्रथा के हिसाब से “जाति से बहिष्कृत” लोगों के सिवाय और क्या नाम दे सकते हैं ? लेकिन तसल्ली कि बात ये है कि ऐसी कोई बात नहीं है.

हमारे ऋषियों को ये पता था कि विषम हालातों में स्त्रियाँ ही ज्यादा असुरक्षित होती हैं. इसीलिए उन्होंने “मनु स्मृति” में कहा कि ” एक स्त्री चाहे कितनी भी पतित हो, अगर उसका पति उत्कृष्ट है तो वो भी उत्कृष्ट बन सकती है. लेकिन पति को हमेशा ही ये सुनिश्चित करना चाहिए कि वो पतित ना हो.

ये ही वो आदेश था जिसने पुरुषों को स्त्रियों की गरिमा की रक्षा करने के लिए प्रेरित किया और भगवन ना करे, अगर फिर से कुछ ऐसा होता है तो पुरुष फिर से ऐसी स्त्री को अपना लेंगे और अपने एक नए जीवन की शुरुआत करेंगे. विधवाएं दुबारा से शादी करेंगी और बलात्कार की शिकार पीड़ित स्त्रियों का घर बस पायेगा. अगर ऐसा ना हुआ होता तो हमलावरों के कुछ हमलों के बाद से हम “जाति से बहिष्कृत” लोगों का समाज बन चुके होते.

निश्चित तौर से, उसके बाद वाले काल में स्त्री गरिमा और धर्म के नाम पर विधवा और बलात्कार की शिकार स्त्रियों के पास सिर्फ मौत, यातना और वेश्यावृति का ही रास्ता बचा. इस बेवकूफी ने हमें पहले से भी ज्यादा नपुंसक बना दिया.

कुछ जन्म आधारित तथाकथित ऊँची-जातियों के ठेकेदार इस बात को उचित ठहरा सकते हैं कि बलात्कार की शिकार स्त्रियाँ ही “जाति से बहिष्कृत” हो जाती हैं. अगर ऐसा है तो हम सिर्फ इतना ही कहेंगे कि ये विकृति की हद्द है.

बाकी अगले भाग में

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श्री शंकराचार्य


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काशी की विभूतियाँ

श्री शंकराचार्य

अद्वेत दर्शन के महान् आचार्य शंकर का प्रादुर्भाव ७८० ईस्वी में हुआ। केरल प्रदेश में अलवाई नदी के तट पर बसे कालाड़ी ग्राम में महान् भक्त शिव गुरु के घर माता विसिष्टा ने वैशाख शुक्ल पंचमी को इन्हें जन्म दिया। शंकर की कृपा से जन्में बालक का नाम शंकर पड़ा। आठवें वर्ष में शंकर ने सन्यास ले लिया। गुरु की खोज में ओंकारेश्वर पहुँचे जहाँ इन्हें गोविन्दाचार्य मिले। तीन वर्ष अध्ययन करके बारह वर्ष की आयु में ये काशी पहुँचे। मणिकर्णिका पर यह बाल-आचार्य वृद्ध शिष्यों को ‘मौन व्याख्यान’ देता था। काशी में गंगा स्नान करके लौटते समय एक चांडाल को मार्ग से हटो कहा तब चांडाल ने इन्हें ‘अद्वेत’ का वास्तविक ज्ञान दिया और काशी में चांडाल रुपधारी शंकर से पूर्ण शिक्षा प्राप्त कर शंकर ने १४ वर्ष की उम्र में ब्रह्मसूत्र, गीता, उपनिषद् पर भाष्य लिखे। सोलह वर्ष की उम्र में वेदव्यास से भेंट हुई।

प्रयाग में कुमारिल भ से मिले, महिष्मति में मंडन मिश्र से शास्रार्थ किया। इन्होंने केदार धाम में ३२ वर्ष की आयु में शिवसायुज्य प्राप्त किया।

भगवान् शंकर के संबंध में जो भी पाठ्य सामग्री प्राप्त है तथा उनके जीवन संबंध में जो भी घटनाएँ मिलती हैं उनसे ज्ञात होता है कि वे एक अलौकिक व्यक्ति थे। उनके व्यक्तित्व में प्रकाण्ड पाण्डित्य, गंभीर विचार शैली, अगाध भगवद्भक्ति आदि का दुर्लभ समावेश दिखायी देता है। उनकी वाणी में मानों सरस्वती का वास था। अपनी बत्तीस वर्ष की अल्पायु में उन्होंने अनेक बृहद् ग्रन्थों की रचना की, पूरा भारत भ्रमण कर अपने विरोधियों को शास्रार्थ में पराजित किया, भारत के चारों कोनों में मठ स्थापित किये तथा डूबते हुए सनातन धर्म की रक्षा की। धर्म संस्थापना के उनके इस कार्य को देख कर यह विश्वास दृढ़ हो उठता है कि वे साक्षात् शंकर के अवतार थे –

“शंकरो शंकर: साक्षात्”।

उनके ही समय में भारत में वेदान्त दर्शन अद्वेैतवाद का सर्वाधिक प्रचार हुआ, उन्हें अद्वेैतवाद का प्रवर्त्तक माना जात है। ब्रह्मसूत्र पर जितने भी भाष्य मिलते हैं उनमें सबसे प्राचीन शंकर भाष्य ही है। उनके जन्म तिथि के संबंध में मतभेद है लेकिन अधिकांश लोगों का यही मानना है कि वे ७८८ ई. में आविर्भूत हुए और ३२ वर्ष की आयु में तिरोहित हुए। उनका जन्म केरल प्रदेश के पूर्णानदी के तटवर्ती कलादी नामक ग्राम में वैशाख शुक्ल ५ को हुआ था। उनके पिता का नाम शिवगुरु तथा माता का नाम सुभद्रा या विशिष्टा था।

उनके बचपन से ही मालूम होने लगा कि किसी महान् विभूति का अवतार हुआ है। पाँचवे वर्ष में यज्ञोपवीत करा कर इन्हें गुरु के घर पढ़ने के लिए भेजा गया और सात वर्ष की आयु में ही आप वेद, वेदान्त और वेदाङ्गों का पूर्ण अध्ययन कर वापस आ गये। वेदाध्ययन के उपरान्त आपने संन्यास ग्रहण करना चाहा किन्तु माता ने उन्हें आज्ञा नहीं दी।

एक दिन वे माँ के साथ नदी पर स्नान करने गये, वहाँ मगर ने उन्हें पकड़ लिया। माँ हाहाकार मचाने लगी। शंकर ने माँ से कहा तुम यदि मुझे संन्यास लेने की अनुमति दो तो मगर मुझे छोड़े देगा। माँ ने आज्ञा दे दी। जाते समय माँ से कहते गये कि तुम्हारी मृत्यु के समय मैं घर पर उपस्थित रहूँगा। घर से चलकर आप नर्मदा तट पर आये, वहाँ गोविन्द-भगवत्पाद से दीक्षा ग्रहण की। उन्होंने गुरु द्वारा बताये गये मार्ग से साधना शुरु कर दी अल्पकाल में ही योग सिद्ध महात्मा हो गये। गुरु की आज्ञा से वे काशी आये। यहाँ उनके अनेक शिष्य बन गये, उनके पहले शिष्य बने सनन्दन जो कालान्तर में पद्मपादाचार्य के नाम से प्रसिद्ध हुए। वे शिष्यों को पढ़ाने के साथ-साथ ग्रंथ भी लिखते जाते थे। कहते हैं कि एक दिन भगवान विश्वनाथ ने चाण्डाल के रुप में उन्हें दर्शन दिया और ब्रह्मसूत्र पर भाष्य लिखने और धर्म का प्रचार करने का आदेश दिया। जब भाष्य लिख चुके तो एक दिन एक ब्राह्मण ने गंगा तट पर उनसे एक सूत्र का अर्थ पूछा। उस सूत्र पर उनका उस ब्राह्मण के साथ आठ दिन तक शास्रार्थ हुआ।

बाद में मालूम हुआ कि ब्राह्मण और कोई नहीं साक्षात् भगवान् वेद व्यास थे। वहाँ के कुरुक्षेत्र होते हुए वे बदरिकाश्रम पहुँचे। उन्होंने अपने सभी ग्रंथ प्राय: काशी या बदरिकाश्रम में लिखे थे, वहाँ से वे प्रयाग गये और कुमारिल भ से भेंट की। कुमारिल भ के कथनानुसार वे माहिष्मति नगरी में मण्डन मिश्र के पास शास्रार्थ के लिए आये। उस शास्रार्थ में मध्यस्थ थीं मण्डन मिश्र की विदुषी पत्नी भारती। इसमें मण्डन मिश्र की पराजय हुई, और उन्होंने शंकराचार्य का शिष्यत्व ग्रहण किया। इस प्रकार भारत-भ्रमण के साथ विद्वानों को शास्रार्थ में पराजित कर वे बदरिकाश्रम लौट आये वहाँ ज्योतिर्मठ की स्थापना की और तोटकाचार्य को उसका माठीधीश बनाया। अंतत: वे केदार क्षेत्र में आये और वहीं इनका जीवन सूर्य अस्त हो गया।

उनके लिखे ग्रंथों की संख्या २६२ बतायी जाती है, लेकिन यह कहना कठिन है कि ये सारे ग्रंथ उन्हीं के लिख हैं। उनके प्रधान ग्रंथ इस प्रकार हैं – ब्रह्मसूत्र भाष्य, उपनिषद् भाष्य, गीता भाष्य, विष्णु सहस्रनाम भाष्य, सनत्सुजातीय भाष्य, हस्तामलक भाष्य आदि।

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श्री पाणिनी


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श्री पाणिनी

पाणिनी मुनि अपने व्याकरण ‘अष्टाध्यायी” अथवा ‘पाणिनीय अष्टक’ के लिये प्रसिद्ध हैं। अब तक प्रकाशित ग्रंथों में सर्वाधिक प्राचीन ग्रंथ पाणिनी का ही है। पाणिनी का काल ३५० ई.पू. माना जाता है किंतु इस संबंध में प्रस्तुत सन्देह रहित नहीं है। संभवत: उनका काल ५०० ई. पूर्व या उसके बाद का था।

सूत्र साहित्य में पाणिनी कृत – ‘अष्टाधायायी’, ‘श्रौत सूत्र’, ‘गृह्यसूत्र’ तथा धर्मसूत्र का समावेश है। पाणिनीकृता ‘अष्टाध्यायी’ संस्कृत व्याकरण संबंद ग्रंथ है। इसमें श्रौत सूत्रों में पुरोहितों द्वारा सम्पादित किये जाने वाले संस्कारों का विवरण है। ‘धर्मसूत्र’ में परम्परागत नियम तथा विधियाँ दी गयी हैं और गृह्यसूत्रों में जन्म से लेकर मृत्युपर्यन्त तक की जीवन विष्यक क्रियाओं का उल्लेख है। प्रमुख सूत्रकारों में गौतम, बोधायन-आपस्तम्ब, वशिष्ठ, आश्वलायन तथा कात्यायन आदि कि गणना होती है।

पाणिनी के नाम से कमनीय पद्य केवल सूक्तियों में ही संग्रहित नहीं है, बल्कि कोश ग्रंथों में तथा अलंकार शास्रीय पुस्तकों में भी उधृत मिलते हैं। पुरातत्व वेत्ताओं में इस बात पर गहरा मतभेद है कि ये कविताएँ, वैय्याकरण पाणिनी की हैं अथवा ‘पाणिनी’ नामधारी किसी अन्य कवि की? डॉक्टर भाण्डारकर, पीचर्सन आदि विद्वान सब कुछ सोचने-विचारने के बाद यही सोचते हैं कि इन श्लोकों का रचियता पाणिनी वैय्याकरण पाणिनी नहीं हो सकता। इस के विपरीत डॉक्टर औफ्रेक्ट तथा डॉक्टर पिशेल की सम्मति है कि पाणिनी को केवल एक खूसट वैय्याकरम मानना बड़ी भारी भूल करना है, वह स्वयं अच्छ कवि थे। संस्कृत साहित्य की परंपरागत प्रसिद्धि पर दृष्टि डालने से ज्ञात होता है कि पाणिनी ही इन पद्यों के नि:सन्दिग्ध रचयिता है। राजशेखर ने सूक्तिग्रंथों में पाणिनी को व्याकरण तथा ‘जाम्बवती जय’ का रचयिता माना है –

नम: पाणिनये तस्मै यस्मादाविर भूदिह।

आदौ व्याकरणं काव्यमनु जाम्बवतीजयम्।।

यह बात महत्वपूर्ण है कि पाणिनी यदा-कदा फुटकर पद्य लिखने वाले कवि नहीं थे, बल्कि संस्कृत साहित्य के सर्वप्रथम महाकाव्य लिखने का श्रेय उन्हीं को जाता है। इस महाकाव्य का नाम कहीं तो ‘पाताल विजय’ तो कहीं ‘जाम्बवती जय’ पाया जाता है। अष्टाध्यायी में पारिभाषिक शब्दों में ऐसे अनेक शब्द हैं जो पाणिनी के बनाये हुए हैं और बहुत से ऐसे हैं जो पहले से ही प्रचलित हैं। पाणिनी ने अपने रचे शब्दों की व्याख्या की है और पहले के अनेक पारिभाषिक शब्दों की भी नयी व्याख्या कर उनके प्रयोग को विकसित किया है।

महर्षि पाणिनी ने काशी शब्द को गण के आदि में दिखलाया है।

काश्यादिभ्यष्ठञत्रिठौ-अष्टाध्यायी ४-२-११६

अष्टाध्यायी में ‘काशीय:’ रुप की सिद्धि भी बतायी गयी है।

संस्कृत में उच्चारण की शुद्धता पर अधिक जोर दिया जाता है। वैदिक मन्त्रों में उच्चारण में यदि छोटी सी भी त्रुटि हो जाती है, तो महान् अनर्थ उपस्थित हो जाता है और इस अनर्थ का भाजन स्वयं वृत्तासुर को बनना पड़ा था जिसे यज्ञ में स्वर के अपराध से लेने के देने पड़ गये थे। महर्षि पाणिनी ने व्याघ्री को अपने बच्चे को मुँह में ले जाते देखा था और उसी को उन्होंने वर्णोंच्चारण-विधान में आदर्श माना था। बोलने वाले को चाहिये कि न तो वह वर्णों का काटे, न वर्णों को मुँह से बिखरने दे –

व्याघ्री यथा हरेत् पुत्रान् दंष्ट्राभ्यां न च पीडयेत्।

भीता पतन-भेदाभ्यां तद्वद् वर्णान प्रजोजयेत्।।-पाणिनी शिक्षा-श्लोक २४

उच्चारण की गलतियों का उल्लेख पाणिनी ने अपने सूत्रों में किया है। एक बार अशुद्ध उच्चारण के लिये ‘कारयति’ का प्रयोग होता है। अर्थात बारंबार अशुद्ध उच्चारण करने पर ‘कारयते’ आत्मनेपद् का प्रयोग समुचित माना जाता है। इसके लिये पाणिनी का विधान इस सूत्र में है-

मिथोपपदात् कृञोडभ्यासे (१/३/७१)

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संत रैदास


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संत रैदास

(१४३३, माघ पूर्णिमा)

प्राचीनकाल से ही भारत में विभिन्न धर्मों तथा मतों के अनुयायी निवास करते रहे हैं। इन सबमें मेल-जोल और भाईचारा बढ़ाने के लिए सन्तों ने समय-समय पर महत्वपूर्ण योगदान दिया है। ऐसे सन्तों में रैदास का नाम अग्रगण्य है। वे सन्त कबीर के गुरुभाई थे क्योंकि उनके भी गुरु स्वामी रामानन्द थे। लगभाग छ: सौ वर्ष पहले भारतीय समाज अनेक बुराइयों से ग्रस्त था। उसी समय रैदास जैसे समाज-सुधारक सन्तों का प्रादुर्भाव हुआ। रैदास का जन्म काशी में चर्मकार कुल में हुआ था। उनके पिता का नाम रग्घु और माता का नाम घुरविनिया बताया जाता है। रैदास ने साधु-सन्तों की संगति से पर्याप्त व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त किया था। जूते बनाने का काम उनका पैतृक व्यवसाय था और उन्होंने इसे सहर्ष अपनाया। वे अपना काम पूरी लगन तथा परिश्रम से करते थे और समय से काम को पूरा करने पर बहुत ध्यान देते थे।

उनकी समयानुपालन की प्रवृति तथा मधुर व्यवहार के कारण उनके सम्पर्क में आने वाले लोग भी बहुत प्रसन्न रहते थे।

रैदास के समय में स्वामी रामानन्द काशी के बहुत प्रसिद्ध प्रतिष्ठित सन्त थे। रैदास उनकी शिष्य-मण्डली के महत्वपूर्ण सदस्य थे।

प्रारम्भ में ही रैदास बहुत परोपरकारी तथा दयालु थे और दूसरों की सहायता करना उनका स्वभाव बन गया था। साधु-सन्तों की सहायता करने में उनको विशेष आनन्द मिलता था। वे उन्हें प्राय: मूल्य लिये बिना जूते भेंट कर दिया करते थे। उनके स्वभाव के कारण उनके माता-पिता उनसे अप्रसन्न रहते थे। कुछ समय बाद उन्होंने रैदास तथा उनकी पत्नी को अपने घर से अलग कर दिया। रैदास पड़ोस में ही अपने लिए एक अलग झोपड़ी बनकार तत्परता से अपने व्यवसाय का काम करते थे और शेष समय ईश्वर-भजन तथा साधु-सन्तों के सत्संग में व्यतीत करते थे।

उनके जीवन की छोटी-छोटी घटनाओं से समय तथा वचन के पालन सम्बन्धी उनके गुणों का पता चलता है। एक बार एक पर्व के अवसर पर पड़ोस के लोग गंगा-स्नान के लिए जा रहे थे। रैदास के शिष्यों में से एक ने उनसे भी चलने का आग्रह किया तो वे बोले, ‘गंगा-स्नान के लिए मैं अवश्य चलता किन्तु एक व्यक्ति को जूते बनाकर आज ही देने का मैंने वचन दे रखा है। यदि आज मैं जूते नहीं दे सका तो वचन भंग होगा। गंगा स्नान के लिए जाने पर मन यहाँ लगा रहेगा तो पुण्य कैसे प्राप्त होगा? मन जो काम करने के लिए अन्त:करण से तैयार हो वही काम करना उचित है। मन सही है तो इसे कठौते के जल में ही गंगास्नान का पुण्य प्राप्त हो सकता है।’ कहा जाता है कि इस प्रकार के व्यवहार के बाद से ही कहावत प्रचलित हो गयी कि – मन चंगा तो कठौती में गंगा।

रैदासे ने ऊँच-नीच की भावना तथा ईश्वर-भक्ति के नाम पर किये जाने वाले विवाद को सारहीन तथा निरर्थक बताया और सबको परसम्पर मिलजुल कर प्रेमपूर्वक रहने का उपदेश दिया।

वे स्वयं मधुर तथा भक्तिपूर्ण भजनों की रचना करते थे और उन्हें भाव-विभोर होकर सुनाते थे। उनका विश्वास था कि राम, कृष्ण, करीम, राघव आदि सब एक ही परमेश्वर के विविध नाम हैं। वेद, कुरान, पुराण आदि ग्रन्थों में एक ही परमेश्वर का गुणगान किया गया है।

“कृस्न, करीम, राम, हरि, राघव, जब लग एक न पेखा।

वेद कतेब कुरान, पुरानन, सहज एक नहिं देखा।।”

उनका विश्वास था कि ईश्वर की भक्ति के लिए सदाचार, परहित-भावना तथा सदव्यवहार का पालन करना अत्यावश्यक है। अभिमान त्याग कर दूसरों के साथ व्यवहार करने और विनम्रता तथा शिष्टता के गुणों का विकास करने पर उन्होंने बहुत बल दिया। अपने एक भजन में उन्होंने कहा है –

“कह रैदास तेरी भगति दूरि है, भाग बड़े सो पावै।

तजि अभिमान मेटि आपा पर, पिपिलक हवै चुनि खावै।”

उनके विचारों का आशय यही है कि ईश्वर की भक्ति बड़े भाग्य से प्राप्त होती है। अभिमान शून्य रहकर काम करने वाला व्यक्ति जीवन में सफल रहता है जैसे कि विशालकाय हाथी शक्कर के कणों को चुनने में असमर्थ रहता है जबकि लघु शरीर की पिपीलिका (चींटी) इन कणों को सरलतापूर्वक चुन लेती है। इसी प्रकार अभिमान तथा बड़प्पन का भाव त्याग कर विनम्रतापूर्वक आचरण करने वाला मनुष्य ही ईश्वर का भक्त हो सकता है।

रैदास की वाणी भक्ति की सच्ची भावना, समाज के व्यापक हित की कामना तथा मानव प्रेम से ओत-प्रोत होती थी। इसलिए उसका श्रोताओं के मन पर गहरा प्रभाव पड़ता था। उनके भजनों तथा उपदेशों से लोगों को ऐसी शिक्षा मिलती थी जिससे उनकी शंकाओं का सन्तोषजनक समाधान हो जाता था और लोग स्वत: उनके अनुयायी बन जाते थे।

उनकी वाणी का इतना व्यापक प्रभाव पड़ा कि समाज के सभी वर्गों के लोग उनके प्रति श्रद्धालु बन गये। कहा जाता है कि मीराबाई उनकी भक्ति-भावना से बहुत प्रभावित हुईं और उनकी शिष्या बन गयी थीं।

‘वर्णाश्र अभिमान तजि, पद रज बंदहिजासु की।

सन्देह-ग्रन्थि खण्डन-निपन, बानि विमुल रैदास की।।”

आज भी सन्त रैदास के उपदेश समाज के कल्याण तथा उत्थान के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने अपने आचरण तथा व्यवहार से यह प्रमाणित कर दिया है कि मनुष्य अपने जन्म तथा व्यवसाय के आधार पर महान नहीं होता है। विचारों की श्रेष्ठता, समाज के हित की भावना से प्रेरित कार्य तथा सदव्यवहार जैसे गुण ही मनुष्य को महान बनाने में सहायक होते हैं। इन्हीं गुणों के कारण सन्त रैदास को अपने समय के समाज में अत्याधिक सम्मान मिला और इसी कारण आज भी लोग इन्हें श्रद्धापूर्वक स्मरण करते हैं।

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श्री वल्लभाचार्य


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काशी की विभूतियाँ

श्री वल्लभाचार्य

श्री नाथ जी के आराध्य महाप्रभु वल्लभाचार्य का प्राकट्य सन् १४७८ में वैशाख कृष्ण एकादशी को हुआ। कांकरवाड निवासी लक्ष्मण भट्ट की द्वितीय पत्नी इल्लभा ने आपको जन्म दिया। काशी में जतनबर में आपने शुद्धाद्वेैत ब्रह्मवाद का प्रचार किया और वेद रुपी दधि से प्राप्त नवनीत रुप पुष्टि मार्ग का प्रवर्तन किया। आपका विवाह काशी के श्री देवभ की पुत्री महालक्ष्मी से हुआ जिनसे उन्हें दो पुत्र गोपीनाथ और विट्ठलेश हुए। आपने ८४ लाख योनी में भटकते जीवों के उद्धारार्थ ८४ वैष्णव ग्रन्थ, ८४ बैठके और ८४ शब्दों का ब्रह्म महामंत्र दिया। काशी में अपने आराध्य को वर्तमान गोपाल मंदिर में स्थापित किया और सन् १५३० में संन्यास ले लिया। हनुमान् घाट पर आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को गंगा में जल समाधि ले ली।

आचार्यपाद श्री वल्लभाचार्य का जन्म चम्पारण्य में रायपुर मध्यप्रान्त में हुआ था। वे उत्तारधि तैलंग ब्राह्मण थे। इनके पिता लक्ष्मण भट्टजी की सातवीं पीढ़ी से ले कर सभी लोग सोमयज्ञ करते आये थे। कहा जाता है कि जिसके वंश में सौ सोमयज्ञ कर लिए जाते हैं, उस कुल में महापुरुष का जन्म होता है। इसी नियम के साक्ष्य के रुप में श्री लक्ष्मण भ के कुल में सौ सोमयज्ञ पूर्ण हो जाने से उस कुल में श्री वल्लाभाचार्य के रुप में भगवान् का प्रादुर्भाव हुआ। कुछ लोग उन्हें अग्निदेव का अवतार मानते हैं। सोमयज्ञ की पूर्कित्त के उपलक्ष्य में लक्ष्मण भ जी एक लाख ब्राह्मणों को भोजन कराने के उद्देश्य से सपरिवार काशी आ रहे थे तभी रास्ते में श्री वल्लभ का चम्पारण्य में जन्म हुआ। बालक की अद्भुत प्रतिभा तथा सौन्दर्य देख कर लोगों ने उसे ‘बालसरस्वती वाक्पति’ कहना प्रारंभ कर दिया। काशी में ही अपने विष्णुचित् तिरुमल्ल तथा माधव यतीन्द्र से शिक्षा ग्रहण की तथा समस्त वैष्णव शास्रों में पारंगत हो गये।

काशी से आप वृन्दावन चले गये। फिर कुछ दिन वहाँ रह कर तीर्थाटन पर चले गये। उन्होंने विजयनगर के राजा कृष्णदेव की सभा में उपस्थित हो कर बड़े-बड़े विद्वानों को शास्रार्थ में पराजित किया। यहीं उन्हें वैष्णवाचार्य की उपाधि से विभूषित किया गया।

राजा ने उन्हें स्वर्ण सिंहासन पर बैठा कर उनका साङ्गोपाङ्ग पूजन किया तथा स्वर्ण राशि भेंट की। उसमें से कुछ भाग ग्रहण कर उन्होंने शेष राशि उपस्थित विद्वानों और ब्राह्मणों में वितरित कर दी।

श्री वल्लभ वहां से उज्जैन आये और क्षिप्रा नदी के तट पर एक अश्वत्थ पेड़ के नीचे निवास किया। वह स्थान आज भी उनकी बैठक के रुप में विख्यात है। मथुरा के घाट पर भी ऐसी ही एक बैठक है और चुनार के पास उनका एक मठ और मन्दिर है। कुछ दिन वे वृन्दावन में रह कर श्री कृष्ण की उपासना करने लगे।

भगवान् उनकी आराधना से प्रसन्न हुए और उन्हें बालगोपाल की पूजा का प्रचार करने का आदेश दिया। अट्ठाईस वर्ष की अवस्था में उन्होंने विवाह किया। कहा जाता है कि उन्होंने भगवान् कृष्ण की प्रेरणा से ही ‘ब्रह्मसूत्र’ के ऊपर ‘अणुभाष्य’ की रचना की। इस भाष्य में आपने शाङ्कर मत का खण्डन तथा अपने मत का प्रतिपादन किया है।

आचार्य ने पुष्टिमार्ग की स्थापना की। उन्होंने श्रीमद्भागवत् में वर्णित श्रीकृष्ण की लीलाओं में पूर्ण आस्था प्रकट की। उनकी प्रेरणा से स्थान-स्थान पर श्रीमद्भागवत् का पारायण होने लगा। अपने समकालीन श्री चैतन्य महाप्रभु से भी उनकी जगदीश्वर यात्रा के समय भेंट हुई थी। दोनों ने अपनी ऐतिहासिक महत्ता की एक दूसरे पर छाप लगा दी। उन्होनें ब्रह्मसूत्र, श्रीमद्भागवत् तथा गीता को अपने पुष्टिमार्ग का प्रधान साहित्य घोषित किया। परमात्मा को साकार मानते हुए उन्होंने जीवात्मक तथा जड़ात्मक सृष्टि निर्धारित की। उनके अनुसार भगवान श्रीकृष्ण ही परब्रह्म हैं।

संसार की अंहता और ममता का त्याग कर श्रीकृष्ण के चरणों में सर्व अर्पित कर भक्ति के द्वारा उनका अनुग्रह प्राप्त करना ही ब्रह्म संबंध है। श्री वल्लभ ने बताया कि गोलोकस्थ श्रीकृष्ण की सायुज्य प्राप्ति ही मुक्ति है। आचार्य वल्लभ ने साधिकार सुबोधिनी में यह मत व्यक्त किया है कि प्राणिमात्र को मोक्ष प्रदान करने के लिये ही भगवान् की अभिव्यक्ति होती है –

गृहं सर्वात्मना त्याज्यं तच्चेत्यक्तुं नशक्यते।

कृष्णाथर्ं तत्प्रयुञ्जीत कृष्णोऽनर्थस्य मोचक:।।

उनके चौरासी शिष्यों में प्रमुख सूर, कुम्भन, कृष्णदास और परमानन्द श्रीनाथ जी की सेवा और कीर्त्तन करने लगे। चारों महाकवि उनकी भक्ति कल्पलता के अमर फल थे।

उनका समग्र जीवन चमत्कार पूर्ण घटनाओं से ओतप्रोत था। गोकुल में भगवान् श्रीकृष्ण ने उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन दिये थे।

श्री वल्लभाचार्य महान् भक्त होने के साथ-साथ दर्शनशास्र के प्रकाण्ड विद्वान् थे। उन्होंने ब्रह्मसूत्र पर अणुभाष्य, भागवत् की सुबोधिनी व्याख्या, सिद्धान्त-रहस्य, भागवत् लीला रहस्य, एकान्त-रहस्य, विष्णुपद, अन्त:करण प्रबोध, आचार्यकारिका, आनन्दाधिकरण, नवरत्न निरोध-लक्षण और उसकी निवृत्ति, संन्यास निर्णय आदि अनेक ग्रंथों की रचना की।

वल्लभाचार्य जी के परमधाम जाने की घटना प्रसिद्ध है। अपने जीवन के सारे कार्य समाप्त कर वे अडैल से प्रयाग होते हुए काशी आ गये थे। एक दिन वे हनुमान् घाट पर स्नान करने गये। वे जिस स्थान पर खड़े हो कर स्नान कर रहे थे वहाँ से एक उज्जवल ज्योति-शिखा उठी और अनेक लोगों के सामने श्री वल्लभाचार्य सदेह ऊपर उठने लगे। देखते-देखते वे आकाश में लीन हो गये। हनुमान घाट पर उनकी एक बैठक बनी हुई है। उनका महाप्रयाण वि.सं. १५८३ आषाढ़ शुक्ल ३ को हुआ। उनकी आयु उस समय ५२ वर्ष थी।

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Death warrant of Shahid Bhagat Singh.


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Death warrant of Shahid Bhagat Singh.

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वाराणसी वैभव या काशी वैभव काशी की भौगोलिक स्थिति


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वाराणसी वैभव या काशी वैभव

काशी की भौगोलिक स्थिति

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किसी नगर के इतिहास को जानने के पहले उसकी प्राकृतिक बनावट के बारे में जानना अत्यंत आवश्यक है। सुदूर प्राचीन काल में वाराणसी की स्थापना का आधार धार्मिक न होकर आर्थिक या व्यापारिक था। अगर ध्यान देकर देखा जाए तो उनके यहां भू-स्थापना का कारण यहां की भौगोलिक स्थिति है। यह शहर अर्धचन्द्राकार में गंगा की रचना किनारे पर अवस्थित है। नगर की रचना एक ऊँचे कंकरीले करारे पर जो गंगा के पश्चिमी किनारे पर अवस्थित है, जहां बाढ़ का खतरा नहीं रहता है। आधुनिक राजघाट का चोरस मैदान जहां नदी-नालों का कटाव नहीं मिलता, शहर बसने के लिए उपयुक्त था। एक ओर “”बरना” नदी तो दूसरी ओर गंगा नगर की प्राकृति खाई का काम करती है। ये जंगल भी वाराणसी के बचाव के लिए अपनी भूमिका अदा करते रहे होगें। आधुनिक मिर्जापुर जिले की विंध्याचल की पहाड़ियां भी बनारस के बचाव में महत्वपूर्ण थीं।

पश्चिम की ओर गंगा और यमुना के रास्ते वाराणसी के व्यापारी मथुरा पहुंचते थे तथा पूरब की ओर चंपा होते हुए ताम्रलिप्ति के बन्दरगाह तक जाते थे। वाराणसी उसी महाजनपद पर अवस्थित थी जो तक्षशिला से राजगृह के बाद पाटलिपुत्र को जाता था। यहां से अन्य सड़कें देश के भिन्न-भिन्न भागों को जाती थीं, जिनमें होकर काशिक चंदन और वस्र के द्वारा वाराणसी की व्यापारिक महत्ता देश में चारों ओर फैलती थी।

यह कहना कठिन है कि जब आरंभिक युग में यहां मनुष्य बसे तो बनारस की प्राकृतिक बनावट का क्या रुप था पर कृत्यकल्पतरु, काशीखण्ड और १९वीं सदी के जान प्रिंसेप के नक्शे के आधार पर यह कहना सम्भव है कि गंगा-बरना संगम से लेकर गंगा अस्सी संगम के कुछ उत्तर तक एक कंकरीला करारा है, जो गोदौलिया नाले के पास कट जाती है। जमीन की सतह नदी की सतह से नीची पड़ जाने पर पानी बरना में चला जाता था। गोदौलिया नाले में मिसिर पोखरा, लक्षमीकुण्ड था, बेनिया तालाब का पानी गंगा में बह जाता था। मछोदरी रकबे का पानी बरना में गिरता था। मछोदरी के पूरब में कगार के नीचे एक चौरस मैदान पड़ जाता था जिसके उत्तर में नाले बहते थे।

स्थलपुराणों में मत्स्योदरी का काशी में एक नदी के रुप में उल्लेख एक पहेली है। लक्ष्मीधर १ ने तीर्थ विवेचन कांड में (पृ. ३४, ५८, ६९) इस नदी का तीन बार उल्लेख किया है। एक स्थान पर (पृ. ३४-३५) शुष्क नदी यानि अस्सी को पिंगला नाड़ी, वरुणा को इला नाड़ी और इन दोनों के बीच मत्स्योदरी को सुषुम्ना नाड़ी माना है। अन्यत्र (पृ. ५८) गंगा और मत्स्योदरी के संगम पर स्नान मोक्षदायक माना गया है। तीसरे स्थान पर (पृ.६९) इस नदी के तीर पर देवलोक छोड़कर देवताओं के बसने की बात कही गयी है। मित्र मिश्र द्वारा उद्धृत काशीखण्ड (पृ. २४०) में मत्स्योदरी को बहिरन्तश्चर कहा गया है और वह गंगा के प्रतिकूल धारा (संहार मार्ग) से मिलती थी। सोलहवीं सदी में नारायण भ की व्युत्पत्ति के अनुसार मत्स्याकार काशी के गर्भ में अवस्थित होने से इसका नाम मत्स्योदरी पड़ा।

उपर्युक्त सामग्री के अवलोकन से सभी बातें स्पष्ट हो जाती हैं। काशी खंड के अनुसार शिवगणों ने मत्स्योदरी तीर्थ के सन्निकट शैलों से घिरा हुआ दुर्ग बनाया और उसके पास मत्स्योदरी के जल से भरी परिखा (मोट) थी। अत: एक तो मत्स्योदरी झील थी जिसका जल भीतर ही भीतर प्रवाहित था या अंतश्चर था और दूसरी मत्स्योदरी परिखा थी जिसका जल बहकर वरुणा को पीछे ठेलता था। वर्षा काल में गंगा में बाढ़ आती तो गंगा का पानी वरुणा को पिछे ठेलता मत्स्योदरी परिखा में प्रविष्ट होता और अंतत: मत्स्योदरी तीर्थ में आ पहुँचता। इसी को पुनीत मत्स्योदरी योग कहा जाता है। इस बहते हुए गंगा जल से काशी क्षेत्र पूर्णत: घिर जाता और उसका स्वरुप मछली सा हो जाता। २ इसी स्थिति को त्रिस्थली सेतु ने काव्यमयी भाषा में कहा है कि ऐसा प्रतीत होता है कि गंगा ने स्वयं मत्स्योदरी रुपर धारण कर लिया है। इस पुनीत संगम का महात्म्य बताते हुए लिखा है कि समस्त तीर्थ और शिवलिंग यहां प्राप्त हो जाते हैं। गंगा-वरुणा और मत्स्योदरी का यह संगम आंकारेश्वर के पास होता था और यहीं भैरवरुप भगवान् शंकर ने स्नान किया था और कपालमोचन तीर्थ की सृष्टि हुई थी। वाराणसी में तीन पुण्यदा नदियों की चर्चा कृत्य-कल्पतरु ने की है- ये हैं- पितामह-स्रोतिका (ब्रह्मनाल), मन्दाकिनी (मध्यमेश्वर के पास) और मत्स्योदरी (ओंकारेश्वर के पास) ये तीनों वर्षा के दिनों में नदी का रुप धारण करती थी। पितामहस्रोतिका नाले से अविमुक्तेश्वर क्षेत्र का जल गंगा में गिरता था। मन्दाकिनी में वर्तमान दारानगर, औसानगंज, काशीपुरा, विश्वेसरगंज का जल एकत्र होता था जो बुलानाला, सप्तसागर भुलेटन, बेनिया, मिसिरपोखरा, गोदावरी तीर्थ (गोदौलिया) होते हुए शीतलाघट के पास गंगा में गिरता था। मत्स्योदरी परिखा का जल ओंकारेश्वर के पास होते हुए वरुणा में गिरता था। बड़ी बाढ़ में मत्स्योदरी के भर जाने पर जल शिवतड़ाग (हालूगड़हा जिस पर विश्वेश्वर गंज का बाजार बसा है) को भरता हुआ मंदाकिनी में मिलता, वहां से दशाश्वमेघ के पास गंगा में मिलता। इस प्रकार राजघाट से दशाश्वमेघ तक का समूचा क्षेत्र पानी से घिर जाता था या वाराणसी क्षेत्र ही मत्स्याकार हो जाता था।

वाराणसी की पौराणिक व्युत्पत्ति को स्वीकार करने में बहुत सी कठिनाइयां है। पहली कठिनाई तो यह है कि अस्सी नदी न होकर बहुत ही साधारण नाला है और इस बात का भी कोई प्रमाण नहीं है कि प्राचीन काल में इसका रुप नदी का था। प्राचीन वाराणसी की स्थिति भी इस मत का समर्थन नहीं करती। प्राय: विद्वान एक मत है कि प्राचीन वाराणसी आधुनिक राजघाट के ऊंचे मैदान पर बसी थी और इसका प्राचीन विस्तार जैसा कि भग्नावशेषों से भी पता चलता है – बरना के उस पार भी था, पर अस्सी की तरफ तो बहुत ही कम प्राचीन अवशेष मिले हैं और जो मिले भी हैं वे परवर्ती अर्थात् मध्यकाल के हैं।

वाराणस्यां नदी पु सिद्धगन्धर्वसेविता।
प्रविष्टा त्रिपथा गंगा तस्मिन् क्षेत्रे मम प्रिये।।

अर्थात्- हे प्रिये, सिद्ध गंधर्वों से सेवित वाराणसी में जहां पुण्य नदी त्रिपथगा गंगा आता है वह क्षेत्र मुझे प्रिय है। यहां अस्सी का उल्लेख नहीं है। वाराणसी क्षेत्र का विस्तार बताते हुए मत्स्यपुराण में एक और जगह कहा गया है-

वरणा च नदी यावद्यावच्छुष्कनदी तथा।
भीष्मयंडीकमारम्भ पर्वतेश्वरमन्ति के।।
(म.पु.कृ.क.त.पृ. ३९)

मत्स्यपुराण की मुद्रित प्रति में “”वाराणसी नदीमाय यावच्छुष्क नदी तवै” ऐसा पाठ है। पुराणकार के अनुसार पूर्व से पश्चिम दो योजन या ढ़ाई योजन लम्बाई वरणा से असी तक है, और चौड़ाई अर्द्ध योजन भीष्मचंडी से पर्वतेश्वर तक है अर्थात् चौड़ाई के तीन परिमाप बताये हैं। वास्तव में यहां कोई विशेष विरोधाभास नहीं है- वाराणसी क्षेत्र वरणा नदी से असी तक है, पर गंगा अर्द्धचंद्राकार होने के कारण सीमा निर्देश पूरा नहीं होता। भीष्मचंड़ी से पर्वतेश्वर तक इसका विस्तार आधा योजन हे। इनमें भिष्म चंड़ी, शैलपुत्री दुर्गा के दक्षिण में और पर्वतेश्वर सेंधिया घाट पर है। पद्मपुराण में तो स्पष्टत: चौड़ाई सदर बाजार स्थित पाशपाणिगणेश तक बताई है। वरणा संगम के आगे कोटवां गांव के पास का भाग गंगा तक लगभग ढ़ाई कोस है (जिसे पद्मपुराण ने ढ़ाई योजन बताया है)।

उक्त उद्धरणों सी जांच पड़ताल से यह पता चलता है कि वास्तव में नगर का नामकरण वरणासी पर बसने से हुआ। अस्सी और बरणा के बीच में वाराणसी के बसने की कल्पना उस समय से उदय हुई जब नगर की धार्मिक महिमा बढ़ी और उसके साथ-साथ नगर के दक्षिण में आबादी बढ़ने से दक्षिण का भाग भी उसकी सीमा में आ गया।

लेकिन प्राचीन वाराणसी सदैव बरना पर ही स्थित नहीं थी, गंगा तक उसका प्रसार हुआ था। कम-से-कम पंतजलि के समय में अर्थात् ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी में तो यह गंगा के किनारे-किनारे बसी थी, जैसी कि अष्टाध्यायी के सूत्र “यस्य आया:’ (२/१/१६) पर पंतजलि ने भाष्य “अनुगङ्ग’ वाराणसी, अनुशोणं पाटलिपुत्रं (कीलहार्न ६,३८०) से विदित है। मौर्य और शुंगयुग में राजघाट पर गंगा की ओर वाराणसी के बसने का प्रमाण हमें पुरातत्व के साक्ष्य से भी लग चुका है।

वरणा शब्द एक वृक्ष का ही द्योतक है। प्राचीनकाल में वृक्षों के नाम पर भी नगरों के नाम पड़ते थे जैसे कोशंब से कोशांबी, रोहीत से रोहीतक इत्यादि। यह संभव है कि वाराणसी और वरणावती दोनों का ही नाम इस वृक्ष विशेष को लेकर ही पड़ा हो।

वाराणसी नाम से उक्त विवेचन से यह न समझ लेना चाहिए कि काशी की इस राजधानी का केवल एक ही नाम था। कम-से-कम बौद्ध साहित्य में तो इसके अनेक नाम मिलते हैं। उदय जातक में इसका नाम सुर्रूंधन (सुरक्षित), सुतसोम जातक में सुदर्शन (दर्शनीय), सोमदंड जातक में ब्रह्मवर्द्धन, खंडहाल जातक में पुष्पवती, युवंजय जातक में रम्म नगर (सुन्दर नगर) (जा. ४/११९), शंख जातक में मोलिनो (मुकुलिनी) (जा. ४/१५) मिलता है। इसे कासिनगर और कासिपुर के नाम से भी जानते थे (जातक, ५/५४, ६/१६५ धम्मपद अट्ठकथा, १/६७)। अशोक के समय में इसकी राजधानी का नाम पोतलि था (जा. ३/३९)। यह कहना कठिन है कि ये अलग-अलग उपनगरों के नाम है अथवा वाराणसी के ही भिन्न-भिन्न नाम है।

यह संभव है कि लोग नगरों की सुन्दरता तथा गुणों से आकर्षित होकर उसे भिन्न-भिन्न आदरार्थक नामों से पुकराते हो। पंतजलि के महाभाष्य से तो यही प्रकट होता है। अष्टाध्यायी के ४/३/७२ सूत्र के भाष्य में (कीलहार्न ७/२१३) “नवै तत्रेति तद् भूयाज्जित्वरीयदुपाचरेत्’ श्लोक पर पंतजलि ने लिखा है- वणिजो वाराणसी जित्वरीत्युपाचरन्ति, अर्थात् ई. पू. दूसरी शताब्दी में व्यापारी लोग वाराणसी को जित्वरी नाम से पुकारते थे। जित्वरी का अर्थ है जयनशीला अर्थात् जहां पहुंचकर पूरी जय अर्थात् व्यापार में पूरा लाभ हो। जातकों में वाराणसी का क्षेत्र उस उपनगर को सम्मिलित कर बारह योजन बताया गया है- (जा. ४, ३७७, ५, १६०)। इस कथन की वास्तविकता का तो तभी पता चल सकता है जब प्राचीन वाराणसी और उसके उपनगरों की पूरी तौर से खुदाई हो पर बारह योजन एक रुढिगत अंक सा विदित होता है।

वाराणसी वैभव या काशी वैभव

काशी की राजधानी वाराणसी का नामकरण

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यह महत्वपूर्ण प्रश्न है कि काशी की राजधानी वाराणसी का नामकरण कैसे हुआ? बाद की पौराणिक अनुश्रुतियों के अनुसार “वरणा’ और “असि’ नाम की नदियों के बीच में बसने के कारण ही इस नगर का नाम वाराणसी पड़ा। कनिधम १ भी इस मत की पुष्टि करते हैं, लेकिन एम. जूलियन ने इस मत के बारे में संदेह प्रकट किया था। २ उन्होंने “वरणा’ का प्राचीन नाम ही “वरणासि’ माना था पर इसके लिए उन्होंने कोई प्रमाण नहीं दिया। विद्वानों ने इस मत की पुष्टि नहीं की, पर इस मत के पक्ष में बहुत से प्रमाण हैं।

अब हमें विचार करना पड़ेगा कि वाराणसी का उल्लेख साहित्य में कब से आया। काशी शब्द तो जैसा हम आगे देखेंगे सबसे पहले अथर्ववेद की पैप्पलाद शाखा से आया है और इसके बाद शतपथ में। लेकिन यह संभव है कि नगर का नाम जनपद में पुराना हो। अथर्ववेद (४/७/१) में वरणावती नदी का नाम आया है और शायद इससे आधुनिक बरना का ही तात्पर्य हो। अस्सी को पुराणों में असिसंभेद तीर्थ कहा है। काशी खंड में कहा है कि संसार के सभी तीर्थ असिसंभेद को षोड़शांश के बराबर नहीं होते और यहां स्नान करने से सभी तीर्थों का फल मिल जाता है। (काशीखण्ड त्रि.से. पृ. १६१)। इस तीर्थ के संबंध में इतना ही कहा गया है। पौराणिक साहित्य में असि नदी का नाम वाराणसी की व्युत्पत्ति की सार्थकता दिखलाने को आया है। (अग्नि पु. ३५२०)। यहां एक विचार करने की बात है कि अग्निपुराण में असि नदी को नासी भी कहा गया है। वस्तुत: इसमें एक काल्पनिक व्युत्पत्ति बनाने की प्रक्रिया दिख पड़ती है। वरणासि का पदच्छेद करके नासी नाम की नदी निकाली गयी है, लेकिन इसका असि रुप संभवत: और बाद में जाकर स्थिर हुआ। महाभारत ६/१०/३० तो इस बात की पुष्टि कर देता है कि वास्तव में बरना का प्राचीन नाम वाराणसी था और इसमें से दो नदियों के नाम निकालने की कल्पना बाद की है। पद्यपुराणांतर्गत काशी महात्म्य ३ में भी “वाराणसीति विख्यातां तन्मान निगदामि व: दक्षिणोत्तरयोर्नघोर्वरणासिश्च पूर्वत). जाऋवी पश्चिमेऽत्रापि पाशपाणिर्गणेश्वर:।।’ (प.प.वि.मि. १७५) लिखा है अर्थात् दक्षिण-उत्तर में वरुणा और अस्सी नदी है, पूर्व में जाऋवी (गंगा) और पश्चिम में पाशपाणिगणेश। मत्स्यपुराण में शिव वाराणसी का वर्णन करते हुए कहते हैं –

वाराणस्यां नदी पु सिद्धगन्धर्वसेविता।
प्रविष्टा त्रिपथा गंगा तस्मिन् क्षेत्रे मम प्रिये।।

अर्थात्- हे प्रिये, सिद्ध गंधर्वों� से सेवित वाराणसी में जहां पुण्य नदी त्रिपथगा गंगा आता है वह क्षेत्र मुझे प्रिय है। यहां अस्सी का उल्लेख नहीं है। वाराणसी क्षेत्र का विस्तार बताते हुए मत्स्यपुराण में एक और जगह कहा गया है-

वरणा च नदी यावद्यावच्छुष्कनदी तथा।
भीष्मयंडीकमारम्भ पर्वतेश्वरमन्ति के।।
(म.पु.कृ.क.त.पृ. ३९)

मत्स्यपुराण की मुद्रित प्रति में “”वाराणसी नदीमाय यावच्छुष्क नदी तवै” ऐसा पाठ है। पुराणकार के अनुसार पूर्व से पश्चिम दो योजन या ढ़ाई योजन लम्बाई वरणा से असी तक है, और चौड़ाई अर्द्ध योजन भीष्मचंडी से पर्वतेश्वर तक है अर्थात् चौड़ाई के तीन परिमाप बताये हैं। वास्तव में यहां कोई विशेष विरोधाभास नहीं है- वाराणसी क्षेत्र वरणा नदी से असी तक है, पर गंगा अर्द्धचंद्राकार होने के कारण सीमा निर्देश पूरा नहीं होता। भीष्मचंड़ी से पर्वतेश्वर तक इसका विस्तार आधा योजन हे। इनमें भिष्म चंड़ी, शैलपुत्री दुर्गा के दक्षिण में और पर्वतेश्वर सेंधिया घाट पर है। पद्मपुराण में तो स्पष्टत: चौड़ाई सदर बाजार स्थित पाशपाणिगणेश तक बताई है। वरणा संगम के आगे कोटवां गांव के पास का भाग गंगा तक लगभग ढ़ाई कोस है (जिसे पद्मपुराण ने ढ़ाई योजन बताया है)।

उक्त उद्धरणों सी जांच पड़ताल से यह पता चलता है कि वास्तव में नगर का नामकरण वरणासी पर बसने से हुआ। अस्सी और बरणा के बीच में वाराणसी के बसने की कल्पना उस समय से उदय हुई जब नगर की धार्मिक महिमा बढ़ी और उसके साथ-साथ नगर के दक्षिण में आबादी बढ़ने से दक्षिण का भाग भी उसकी सीमा में आ गया।

लेकिन प्राचीन वाराणसी सदैव बरना पर ही स्थित नहीं थी, गंगा तक उसका प्रसार हुआ था। कम-से-कम पंतजलि के समय में अर्थात् ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी में तो यह गंगा के किनारे-किनारे बसी थी, जैसी कि अष्टाध्यायी के सूत्र “यस्य आया:’ (२/१/१६) पर पंतजलि ने भाष्य “अनुगङ्ग’ वाराणसी, अनुशोणं पाटलिपुत्रं (कीलहार्न ६,३८०) से विदित है। मौर्य और शुंगयुग में राजघाट पर गंगा की ओर वाराणसी के बसने का प्रमाण हमें पुरातत्व के साक्ष्य से भी लग चुका है।

वरणा शब्द एक वृक्ष का ही द्योतक है। प्राचीनकाल में वृक्षों के नाम पर भी नगरों के नाम पड़ते थे जैसे कोशंब से कोशांबी, रोहीत से रोहीतक इत्यादि। यह संभव है कि वाराणसी और वरणावती दोनों का ही नाम इस वृक्ष विशेष को लेकर ही पड़ा हो।

वाराणसी नाम से उक्त विवेचन से यह न समझ लेना चाहिए कि काशी की इस राजधानी का केवल एक ही नाम था। कम-से-कम बौद्ध साहित्य में तो इसके अनेक नाम मिलते हैं। उदय जातक में इसका नाम सुर्रूंधन (सुरक्षित), सुतसोम जातक में सुदर्शन (दर्शनीय), सोमदंड जातक में ब्रह्मवर्द्धन, खंडहाल जातक में पुष्पवती, युवंजय जातक में रम्म नगर (सुन्दर नगर) (जा. ४/११९), शंख जातक में मोलिनो (मुकुलिनी) (जा. ४/१५) मिलता है। इसे कासिनगर और कासिपुर के नाम से भी जानते थे (जातक, ५/५४, ६/१६५ धम्मपद अट्ठकथा, १/६७)। अशोक के समय में इसकी राजधानी का नाम पोतलि था (जा. ३/३९)। यह कहना कठिन है कि ये अलग-अलग उपनगरों के नाम है अथवा वाराणसी के ही भिन्न-भिन्न नाम है।

यह संभव है कि लोग नगरों की सुन्दरता तथा गुणों से आकर्षित होकर उसे भिन्न-भिन्न आदरार्थक नामों से पुकराते हो। पंतजलि के महाभाष्य से तो यही प्रकट होता है। अष्टाध्यायी के ४/३/७२ सूत्र के भाष्य में (कीलहार्न ७/२१३) “नवै तत्रेति तद् भूयाज्जित्वरीयदुपाचरेत्’ श्लोक पर पंतजलि ने लिखा है- वणिजो वाराणसी जित्वरीत्युपाचरन्ति, अर्थात् ई. पू. दूसरी शताब्दी में व्यापारी लोग वाराणसी को जित्वरी नाम से पुकारते थे। जित्वरी का अर्थ है जयनशीला अर्थात् जहां पहुंचकर पूरी जय अर्थात् व्यापार में पूरा लाभ हो। जातकों में वाराणसी का क्षेत्र उस उपनगर को सम्मिलित कर बारह योजन बताया गया है- (जा. ४, ३७७, ५, १६०)। इस कथन की वास्तविकता का तो तभी पता चल सकता है जब प्राचीन वाराणसी और उसके उपनगरों की पूरी तौर से खुदाई हो पर बारह योजन एक रुढिगत अंक सा विदित होता है।

वाराणसी वैभव या काशी वैभव
क्षेत्र विस्तार

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कृत्यकल्पतरु १ के तीर्थ-विवेचन में भी वाराणसी के संबंध में अनेक उद्धरण मिलते हैं। ब्रह्म पुराण में शिव पार्वती से कहते हैं कि- हे सुरवल्लभे, वरणा और असि इन दोनों नदियों के बीच में ही वाराणसी क्षेत्र है, उसके बाहर किसी को नहीं बसना चाहिए। मत्स्य पुराण के अनुसार यह क्षेत्र पश्चिम की ओर ढाई योजन तक फैला था और दक्षिण में यह क्षेत्र वरणा से गंगा तक आधा योजन फैला हुआ था। मत्स्य पुराण में ही अन्यत्र नगर का विस्तार बतलाते हुए कहा गया है- पूर्व से पश्चिम तक इस क्षेत्र का विस्तार दो योजन है और दक्षिण में आधा योजन नगर भीष्मचंडी से लेकर पर्वतेश्वर तक फैला हुआ था। ब्रह्मपुराण के अनुसार इस क्षेत्र का प्रमाण पांच कोस का था उसमें उत्तरमुखी गंगा है २ जिससे क्षेत्र का महात्म्य बढ़ गया। उत्तर की ओर गंगा दो योजन तक शहर के साथ-साथ बहती थी। स्कंद पुराण के अनुसार उस क्षेत्र का विस्तार चारों ओर चार कोस था।

लिंग पुराण में इस क्षेत्र का विस्तार कुछ और बढ़ाकर कहा गया है। इसके अनुसार कृतिवास से आरंभ होकर यह क्षेत्र एक-एक कोस चारों ओर फैला हुआ है। उसके बीच में मध्यमेश्वर नामक स्वयंभू लिंग है। यहां से भी एक-एक कोस चारों ओर क्षेत्र का विस्तार है। यही वाराणसी की वास्तविक सीमा है। उसके बाहर विहार न करना चाहिए।

अग्नि पुराण (३५२०) के अनुसार वरणा और असी नदियों के बीच बसी हुई वाराणसी का विस्तार पूर्व में दो योजन और दूसरी जगह आधा योजन है। मत्स्य पुराण की मुद्रित प्रति (१८४/५१) में इसकी लम्बाई-चौड़ाई अधिक स्पष्ट रुप से वर्णित है। पूर्व-पश्चिम ढ़ाई (२ १/२) योजन भीष्मचंडी से पर्वतेश्वर तक, उत्तर-दक्षिण आधा (१/२) योजन, शेष भाग वरुणा और अस्सी के बीच।

ऊपर के उद्धरणों से यह पता चलता है कि प्राचीन वाराणसी का विस्तार काफी दूर तक था। बरना के पश्चिम में राजघाट का किला जहां निस्संदेह प्राचीन वाराणसी बसी थी एक मील लंबा और ४०० गज चौड़ा है। गंगा नदी उसके दक्षिण-पूर्व मुख की रक्षा करती है, और बरना नदी उत्तर और उत्तर-पूर्व मुखों की रक्षा एक छिछली खाई के रुप में करती है, पश्चिम की ओर एक खाली नाला है जिसमें से होकर किसी समय बरना नदी बहती थी। रक्षा के इस प्राकृतिक साधनों को देखते हुए ही शायद प्राचीन काल में वाराणसी नगर के लिए यह स्थान चुना गया। सन् १८५७ ई. की बगावत के समय अंग्रेजों ने भी नगर रस्का के लिए बरना के पीछे ऊंची जमीन पर कच्ची मिट्टी की दीवारें उठाकर किलेबन्दी की थी। पर पुराणों में आयी वाराणसी की सीमा राजघाट की उक्त लम्बाई-चौड़ाई से कहीं अधिक है। ऐसा जान पड़ता है कि उन प्रसंगों में केवल नगर की सीमा ही नहीं वर्णित है, वरन् समूचे क्षेत्र को सम्मिलित कर लिया गया है। यह भी बात ध्यान देने योग्य है कि बरना के उस पार तक प्राचीन बस्ती के अवशेष काफी दूर तक चले गए हैं। हो सकता है पुराणों द्वारा वर्णित इस क्षेत्र में वे सब भाग भी आ गये हों। अगर यह ठीक है तो पुराणों में वर्णित नगर की लम्बाई-चौड़ाई एक तरह से ठीक ही उतरती है।

वाराणसी के चारों ओर शहरपनाह का वर्णन जातकों में आया है (जा. १/१२)। यहां नगर के चारों ओर की शहरपनाह का विस्तार १२ योजन और नगर और उसके उपनगरों की शहरपनाह का विस्तार ३०० योजन कहा गया है। यह कहने की आवश्यकता नहीं कि शहरपनाह का यह आयाम अतिश्योक्तिपूर्ण है, अत: इससे हम केवल यही निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि वाराणसी के चारों ओर शहरपनाह थी। युद्ध में इस शहरपनाह का क्या उपयोग होता था इसका सुन्दर वर्णन एक जातक में आया है (जा. २/६४-६५)। एक समय एक बड़ी सेना के साथ, हाथी पर सवार होकर एक राजा ने धावा बोल दिया और नगर के चारों ओर घेरा डालकर उसने एक पत्र द्वारा काशिराज को आत्मसमपंण करने अथवा लड़ने के लिए ललकारा। बनारस के राजा ने लड़ने की ठानी। वह नगर के रक्षार्थ प्राकार, द्वार, अट्टालिका और गोपुरों पर यौद्धाओं को नियुक्त करके शत्रुओं का सामना करने लगा। इस पर आक्रमणशील राजा ने अपने हाथी को पाखर पहना दिया और स्वयं जिरह बख्तर पहन कर और हाथ में अंकुश लेकर हाथ को शहर की ओर बढ़ा दिया। नगर रक्षक सेना को खौलती मिट्टी, गुलेलों से पत्थर (यन्तपासाण) आदि भाँति-भाँति से शस्रास्रों को साथ चलता देखकर हाथी डरा लेकिन पीलवान ने उसे आगे बढ़ाया। एक भारी बल्ली को सूंढ़ में लपेटकर उसने नगर द्वार (तोरण) पर धक्के मार कर द्वार के व्योड़े (पलिघं) तो तोड़ दिया और इस तरह वह शहर में घुस गया।

यह उल्लेखनीय है कि वाराणसी की प्राचीन शहरपनाह के चिन्ह अब भी बच गए हैं। सेकिंरग ने ३ इस बात की जांच की और उन्हें बरना संगम से आदमपुर मुहल्ले तक लगातार ऊंचे टीले इस प्राचीन शहरपनाह के भग्नावशेष प्रतीत हुए। बाढ़ के दिनों में बरना का जल शहरपनाह अथवा टीलों की इस श्रृंखला तक पहुंच जाता है। सूखे दिनों में इन टीलों और बरना के बीच में एक खोल पड़ा जाती है। प्रिंसेप का मत था कि इस शहरपनाह को मुसलमानों ने शत्रु से नगर की रक्षा करने के लिए बनवाया, पर अपने मत के पक्ष में उन्होंने कोई प्रमाण नहीं दिया। शहर-पनाह का दक्षिण-पश्चिमी छोर अब गंगा से एक-तिहाई मील पर है लेकिन यह मानने का पर्याप्त कारण है कि मुसलमानी आक्रमण के बहुत पहले यह शहरपनाह गंगा से मिली हुई थी। इस सब बातों के साक्ष्य से ऐसा जान पड़ता है कि यह लंबी शहरपनाह प्राचीन काल में दक्षिण ओर से नगर की सीमा निश्चित करती थी और बाद में जब नगर दक्षिण और दक्षिण-पश्चिम की ओर बढ़ गया, और नगरवासियों ने आत्मरक्षार्थ इस साधन को छोड़ दिया तब मुसलमानों ने इन टीलों का उपयोग आक्रमण के लिए किया ४ । यह शहरपनाह आरंभ में शायद वर्तमान टीलों की सीध में गंगा तक चली गयी थी अथवा दूरी कम करने के लिए यह गंगा तक वर्तमान तेलिया नाला होकर पहुंची हो। ऐसी अवस्था में इसका कुछ भाग बाद में नहर बनाने के लिए तोड़ दिया गया होगा क्योंकि इस बात के काफी प्रमाण है कि गंगा के किनारे शहर एक संकरी पट्टी के रुप में बसा। अगर यह विचार सही है तो इससे यह नतीजा निकलता है कि बनारस शहर की सबसे पुरानी बस्ती बरना से गंगा तक फैली थी तथा इन दोनों नदियों के संगम तक एक लम्बा अंतरीप छोड़ती हुई वह राजघाट के पठार को घेरती हुई इस शहरपनाह के अन्दर आ जाती थी। ऐसा होने पर आधुनिक शहर की तुलना में प्राचीन वाराणसी काफी छोटा रहा होगा। लेकिन वाराणसी क्षेत्र की सीमा जैसा हमें पुराणकार बतलाते है काफी लम्बी-चौड़ी थी और वह इस लिए कि शहरपनाह के बाहर का भी नगर की सीमा में ले लिया गया था।

बुद्ध पूर्व महाजनपद युग में वाराणसी काशी जनपद की राजधानी थी। यह कहना कठिन है कि प्राचीन काशी जनपद का विस्तार कहां तक था। जातकों में (जा. ३/१८१, ५/४१, ३/३०४, ३६१) काशी का विस्तार ३०० योजन दिया गया है। काशी जनपद के उत्तर में कोसल पूर्व में मगध और पश्चिम में वत्स

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वाराणसी


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वाराणसी

वाराणसी (अंग्रेज़ी: Vārāṇasī, ) भारत के उत्तर प्रदेश राज्य का प्रसिद्ध शहर है। इसे ‘बनारस’ और ‘काशी’ भी कहते हैं। इसे हिन्दू धर्म में सर्वाधिक पवित्र शहर माना जाता है और इसे अविमुक्त क्षेत्र कहा जाता है। इसके अलावा बौद्ध एवं जैन धर्म में भी इसे पवित्र माना जाता है। यह संसार के प्राचीनतम बसे शहरों में से एक और भारत का प्राचीनतम बसा शहर है।

काशी नरेश (काशी के महाराजा) वाराणसी शहर के मुख्य सांस्कृतिक संरक्षक एवं सभी धार्मिक क्रिया-कलापों के अभिन्न अंग हैं। वाराणसी की संस्कृति का गंगा नदी एवं इसके धार्मिक महत्त्व से अटूट रिश्ता है। ये शहर सहस्रों वर्षों से भारत का, विशेषकर उत्तर भारत का सांस्कृतिक एवं धार्मिक केन्द्र रहा है। हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत का बनारस घराना वाराणसी में ही जन्मा एवं विकसित हुआ है। भारत के कई दार्शनिक, कवि, लेखक, संगीतज्ञ वाराणसी में रहे हैं, जिनमें कबीर, वल्लभाचार्य, रविदास, स्वामी रामानंद, त्रैलंग स्वामी, शिवानन्द गोस्वामी, मुंशी प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, आचार्य रामचंद्र शुक्ल, पंडित रवि शंकर, गिरिजा देवी, पंडित हरि प्रसाद चौरसिया एवं उस्ताद बिस्मिल्लाह खां आदि कुछ हैं। गोस्वामी तुलसीदास ने हिन्दू धर्म का परम-पूज्य ग्रंथ रामचरितमानस यहीं लिखा था और गौतम बुद्ध ने अपना प्रथम प्रवचन यहीं निकट ही सारनाथ में दिया था।

वाराणसी में चार बड़े विश्वविद्यालय स्थित हैं: बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय, महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ, सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ हाइयर टिबेटियन स्टडीज़ और संपूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय। यहां के निवासी मुख्यतः काशिका भोजपुरी बोलते हैं, जो हिन्दी की ही एक बोली है। वाराणसी को प्रायः ‘मंदिरों का शहर’, ‘भारत की धार्मिक राजधानी’, ‘भगवान शिव की नगरी’, ‘दीपों का शहर’, ‘ज्ञान नगरी’ आदि विशेषणों से संबोधित किया जाता है।

प्रसिद्ध अमरीकी लेखक मार्क ट्वेन लिखते हैं: “बनारस इतिहास से भी पुरातन है, परंपराओं से पुराना है, किंवदंतियों (लीजेन्ड्स) से भी प्राचीन है और जब इन सबकों एकत्र कर दें, तो उस संग्रह से भी दोगुना प्राचीन है।”

नाम का अर्थ

वाराणसी नाम का उद्गम संभवतः यहां की दो स्थानीय नदियों वरुणा नदी एवं असि नदी के नाम से मिलकर बना है। ये नदियाँ गंगा नदी में क्रमशः उत्तर एवं दक्षिण से आकर मिलती हैं।नाम का एक अन्य विचार वरुणा नदी के नाम से ही आता है जिसे संभवतः प्राचीन काल में वरणासि ही कहा जाता होगा और इसी से शहर को नाम मिला।इसके समर्थन में शायद कुछ आरंभिक पाठ उपलब्ध हों, किन्तु इस दूसरे विचार को इतिहासवेत्ता सही नहीं मानते हैं। लंबे काल से वाराणसी को अविमुक्त क्षेत्र, आनंद-कानन, महाश्मशान, सुरंधन, ब्रह्मावर्त, सुदर्शन, रम्य, एवं काशी नाम से भी संबोधित किया जाता रहा है। ऋग्वेद में शहर को काशी या कासी नाम से बुलाया गया है। इसे प्रकाशित शब्द से लिया गया है, जिसका अभिप्राय शहर के ऐतिहासिक स्तर से है, क्योंकि ये शहर सदा से ज्ञान, शिक्षा एवं संस्कृति का केन्द्र रहा है। काशी शब्द सबसे पहले अथर्ववेद की पैप्पलाद शाखा से आया है और इसके बाद शतपथ में भी उल्लेख है। लेकिन यह संभव है कि नगर का नाम जनपद में पुराना हो। स्कंद पुराण के काशी खण्ड में नगर की महिमा १५,००० श्लोकों में कही गयी है। एक श्लोक में भगवान शिव कहते हैं:

तीनों लोकों से समाहित एक शहर है, जिसमें स्थित मेरा निवास प्रासाद है काशी
वाराणसी का एक अन्य संदर्भ ऋषि वेद व्यास ने एक अन्य गद्य में दिया है:

गंगा तरंग रमणीय जातकलापनाम, गौरी निरंतर विभूषित वामभागम.
नारायणप्रियम अनंग मदापहारम, वाराणसीपुर पतिम भज विश्वनाथम

अथर्ववेद में वरणावती नदी का नाम आया है जो बहुत संभव है कि आधुनिक वरुणा नदी के लिये ही प्रयोग किया गया हो। अस्सी नदी को पुराणों में असिसंभेद तीर्थ कहा है। स्कंद पुराण के काशी खंड में कहा गया है कि संसार के सभी तीर्थ मिल कर असिसंभेद के सोलहवें भाग के बराबर भी नहीं होते हैं।अग्निपुराण में असि नदी को व्युत्पन्न कर नासी भी कहा गया है। वरणासि का पदच्छेद करें तो नासी नाम की नदी निकाली गयी है, जो कालांतर में असी नाम में बदल गई। महाभारत में वरुणा या आधुनिक बरना नदी का प्राचीन नाम वरणासि होने की पुष्टि होती है। अतः वाराणासी शब्द के दो नदियों के नाम से बनने की बात बाद में बनायी गई है। पद्म पुराण के काशी महात्म्य, खंड-३ में भी श्लोक है:

वाराणसीति विख्यातां तन्मान निगदामि व: दक्षिणोत्तरयोर्नघोर्वरणासिश्च पूर्वत।
जाऋवी पश्चिमेऽत्रापि पाशपाणिर्गणेश्वर:।।

अर्थात दक्षिण-उत्तर में वरुणा और अस्सी नदी है, पूर्व में जाह्नवी और पश्चिम में पाशपाणिगणेश।
मत्स्य पुराण में शिव वाराणसी का वर्णन करते हुए कहते हैं –

वाराणस्यां नदी पु सिद्धगन्धर्वसेविता।
प्रविष्टा त्रिपथा गंगा तस्मिन् क्षेत्रे मम प्रिये॥

अर्थात्- हे प्रिये, सिद्ध गंधर्वों से सेवित वाराणसी में जहां पुण्य नदी त्रिपथगा गंगा आता है वह क्षेत्र मुझे प्रिय है।

यहां अस्सी का कहीं उल्लेख नहीं है। वाराणसी क्षेत्र का विस्तार बताते हुए मत्स्य पुराण में एक और जगह कहा गया है-

वरणा च नदी यावद्यावच्छुष्कनदी तथा।
भीष्मयंडीकमारम्भ पर्वतेश्वरमन्ति के॥

उपरोक्त उद्धरणों से यही ज्ञात होता है कि वास्तव में नगर का नामकरण वरणासी पर बसने से हुआ। अस्सी और वरुणा के बीच में वाराणसी के बसने की कल्पना उस समय से उदय हुई जब नगर की धार्मिक महिमा बढ़ी और उसके साथ-साथ नगर के दक्षिण में आबादी बढ़ने से दक्षिण का भाग भी उसकी सीमा में आ गया। वैसे वरणा शब्द एक वृक्ष का भी नाम होता है। प्राचीनकाल में वृक्षों के नाम पर भी नगरों के नाम पड़ते थे जैसे कोशंब से कौशांबी, रोहीत से रोहीतक इत्यादि। अतः यह संभव है कि वाराणसी और वरणावती दोनों का ही नाम इस वृक्ष विशेष को लेकर ही पड़ा हो।

वाराणसी नाम के उपरोक्त कारण से यह अनुमान कदापि नहीं लगाना चाहिये कि इस नगर के से उक्त विवेचन से यह न समझ लेना चाहिए कि काशी राज्य के इस राजधानी शहर का केवल एक ही नाम था। अकेले बौद्ध साहित्य में ही इसके अनेक नाम मिलते हैं। उदय जातक में सुर्रूंधन (अर्थात सुरक्षित), सुतसोम जातक में सुदर्शन (अर्थात दर्शनीय), सोमदंड जातक में ब्रह्मवर्द्धन, खंडहाल जातक में पुष्पवती, युवंजय जातक में रम्म नगर (यानि सुन्दर नगर), शंख जातक में मोलिनो (मुकुलिनी) नाम आते हैं। इसे कासिनगर और कासिपुर के नाम से भी जाना जाता था। सम्राट अशोक के समय में इसकी राजधानी का नाम पोतलि था। यह निश्चय पूर्वक नहीं कहा जा सकता है कि ये सभी नाम एक ही शहर के थे, या काशी राज्य की अलग-अलग समय पर रहीं एक से अधिक राजधानियों के नाम थे।

इतिहास
पौराणिक कथाओं के अनुसार, काशी नगर की स्थापना हिन्दू भगवान शिव ने लगभग ५००० वर्ष पूर्व की थी, जिस कारण ये आज एक महत्त्वपूर्ण तीर्थ स्थल है। ये हिन्दुओं की पवित्र सप्तपुरियों में से एक है। स्कन्द पुराण, रामायण, महाभारत एवं प्राचीनतम वेद ऋग्वेद सहित कई हिन्दू ग्रन्थों में इस नगर का उल्लेख आता है। सामान्यतया वाराणसी शहर को लगभग ३००० वर्ष प्राचीन माना जाता है।, परन्तु हिन्दू परम्पराओं के अनुसार काशी को इससे भी अत्यंत प्राचीन माना जाता है। नगर मलमल और रेशमी कपड़ों, इत्रों, हाथी दांत और शिल्प कला के लिये व्यापारिक एवं औद्योगिक केन्द्र रहा है। गौतम बुद्ध (जन्म ५६७ ई.पू.) के काल में, वाराणसी काशी राज्य की राजधानी हुआ करता था। प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेन त्सांग ने नगर को धार्मिक, शैक्षणिक एवं कलात्मक गतिविधियों का केन्द्र बताया है और इसका विस्तार गंगा नदी के किनारे ५ कि.मी. तक लिखा है।

विभूतियाँ
काशी में प्राचीन काल से समय समय पर अनेक महान विभूतियों का प्रादुर्भाव या वास होता रहा हैं। इनमें से कुछ इस प्रकार हैं:

महर्षि अगस्त्य
धन्वंतरि
गौतम बुद्ध
संत कबीर
अघोराचार्य बाबा कानीराम
लक्ष्मीबाई
पाणिनी
पार्श्वनाथ
पतञ्जलि
संत रैदास
स्वामी रामानन्दाचार्य
वल्लभाचार्य
शंकराचार्य
गोस्वामी तुलसीदास
महर्षि वेदव्यास
वल्लभाचार्य

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वाराणसी वैभव या काशी वैभव


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वाराणसी वैभव या काशी वैभव

नदियाँ

गंगा

बाराणसी की प्राकृतिक रचना में गंगा का मुख्य स्थान है। गंगापुर के बेतवर गांव से पहले-पहल गंगा इस जिले में घुसती है। यहां इससे सुबहा नाला आ मिला है। वहां से प्राय: सात मील तक गंगा वाराणसी को मिर्जापुर जिले से अलग करती है और इसके बाद वाराणसी जिले में वाराणसी और चन्दौली को विभाजित करती है। गंगा की धारा अर्ध-वृत्ताकार रुप में वर्ष भर बहती है। इसके बाहरी भाग के ऊपर करारे पड़ते हैं और भीतरी भाग में बालू अथवा बाढ़ की मिट्टी मिलती है। जिले में गंगा का रुख पहले उत्तर की तरफ होता हुआ रामनगर के कुछ आगे तक देहात अमानत को राल्हूपुर से अलग करता है। यहां करारा कंकरीला है और नदी उसके ठीक नीचे बहती है। तूफान में नावों को यहां काफी खतरा रहता है। देहात अमानत में गंगा का बांया किनारा मुंडादेव तक चला गया है। इसके नीचे की ओर वह रेत में परिणत हो जाता है और बाढ़ में पानी से भर जाता है। रामनगर छोड़ने के बाद गंगा की उत्तर-पूर्व की ओर झुकती दूसरी केहुनी शुरु होती है। धारा यहां बायें किनारे से लगकर बहती है। अस्सी संगम से लेकर करारे पर बनारस के मंदिर, घाट और मकान बने हैं और दाहिने किनारे पर बलुआ मैदान है। मालवीय पुल से कैथ तक नदी पूरब की और बहती है। यहां धारा बायें किनारे से लगकर बहती है। और यह करारा बरना संगम के कुछ आगे तक चला जाता है। नावों के लिए खतरनाक चचरियों की वजह से गंगा की धारा बदलने की संभावना ही नहीं रह जाती। तांतेपुर पर यह धारा दूसरे किनारे की ओर जाने लगती है और किनारा नीचा और बलुआ होने लगता है। दाहिनी ओर मिट्टी के नीचे करारे का बाढ़ से ढूबने का भय रहता है।ंचा

कैथी के पास गंगा पुन: उत्तर की ओर झुकती है और उसका यह रुख बलुआ तक रहता है। कैथी से कांवर तक दक्षिणी किनारा पहले तो भरभरा रहता है पर बाद में कंकरीले करारे में बदल जाता है लेकिन कांवर से बलुआ तक मिट्टी की एक उपजाऊ पट्टी कुछ भीतर घुसती हुई पड़ती है। इस घुमाव के अंदर जाल्हूपुर परगना है। इस परगन के अन्दर से गंगा की एक उपधारा बलुआ के कुछ ऊपर गंगा से मिल जाती है। बलुआ से गंगा उत्तर-पश्चिम की ओर घूम जाती है। इसका बांयी ओर का किनारा जाल्हूपुर और कटेहर की सीमा तक नीचा और बलुआ है। यहां से नदी पहले उत्तर की ओर बाद में उत्तर-पूर्व की ओर बहती है। कटेहर के दक्षिण-पूरब कंकरीला किनारा शुरु हो जाता है और यहां-वहां खादर के टुकड़े दीख पड़ते हैं। दूसरा किनारा परगना बरह में पड़ता है। बरह के उत्तरी छोर से कुछ दूर गंगा गाजीपुर और वाराणसी की सीमा अलग करती है और वह गाजीपुर जिले में घुस जाती है।

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बानगंगा

किनारे की भूगर्भिक बनावट और बहुत जगहों पर कंकरीले करारों की वजह से जिले में नदी की धारा में बहुत कम अदल-बदल हुआ है। इस बात का भी कोई प्रमाण नहीं है कि प्राचीन काल में बरह शाखा के सिवा गंगा की कोई दूसरी धारा थी। लेकिन इस बात का प्रमाण है कि गंगा की धारा प्राचीन काल में दूसरी ही तरह से बहती थी। परगना कटेहर में कैथ के पास की चचरियों से ऐसा लगता है कि इन्हीं कंकरीले करारों की वजह से नदी एक समय दक्षिण की ओर घूम जाती थी। गंगा की इस प्राचीन धारा के बहाव का पता हमें बानगंगा से मिलता है जो बरसात में भर जाती है। टांड़ा से शुरु होकर बानगंगा दक्षिण की ओर छ: मील तक महुवारी की ओर जाती है, फिर पूर्व की ओर रसूलपुर तक, अन्त में उत्तर में रामगढ़ को पार करती हुई वह हसनपुर (सैयदपुर के सामने) तक जाती है। जिस समय गंगा की धार का यह रुख था उस समय गंगा की वर्तमान धारा में गोमती बहती थी जो गंगा में सैयदपुर के पास मिल जाती थी। यह कहना आसान नहीं है कि कैथी और टांड़ा के बीच में कंकरीले करारे को गंगा ने कब तोड़ा लेकिन ऐसा हुआ अवश्य, इसका पता यहां की जमीन की बनावट से लगता है। ऊपर हम देख चुके हैं कि इस स्थान पर नदी का पाट दूसरी जगहों की उपेक्षा जहां नदी ने अपना पाट नहीं बदला है, बहुत कम चौड़ा है। इससे यह बात स्पष्ट हो जाती है कि किसी समय यह किसी बड़ी नदी का पाट था। वैरांट की लोक कथाओं से भी इस मत की पुष्टि होती है। जनश्रुति यह है कि शान्तनु ने बानगंगा को काशिराज की कन्या के स्वयंवर के अवसर पर पृथ्वी फोड़कर निकाला। काशिराज की राजधानी उस समय रामगढ़ थी। अगर किसी समय राजप्रसाद रामगढ़ में था तो वह गंगा पर रहा होगा और इस तरह इस लोक कथा के आधार पर भी यह कहा जा सकता है कि एक समय गंगा रामगढ़ से होकर बहती थी।

गंगा की इस प्राचीन धारा के बारे में प्राचीन साहित्य में भी अनेक प्रमाण हैं। ब्राह्मण और बौद्ध साहित्य में तो गंगा की इस धारा की कोई चर्चा नहीं है पर जैन साहित्य में इसका थोड़ा बहुत उल्लेख है। जैनों ने एक प्राचीन अंग नायाधम्म कहा (४/१२१) में इस बात का उल्लेख है कि वाराणसी के उत्तर-पूर्व में मयगंगा तीर्थदह अर्थात मृतगंगा तीर्थहृद था। उत्तराध्ययन चूर्णि (१३, पृ. २१५) आवश्यक चूर्णि (पृ. ५१६) के अनुसार मयगंगा के निचले बहाव के रुख में एक हृद था जिसमें काफी पानी इकट्ठा हो जाता था जो कभी निकलता नहीं था। जिनप्रभसूरि ने विविध तीर्थकल्प १ में मातंग ॠषि बल का जन्म स्थान मृतगंगा का किनारा बतलाया है। कथा में यह कहा गया है कि ॠषि बल एक समय तिन्दुक नामक उपवन में ठहरे थे। वहां उन्होंने अपने गुणों से गंडी तिन्दुक यक्ष को प्रसन्न कर लिया। कोसल राज की कन्या ने एक समय ॠषि को देखकर उन पर थूक दिया। इस पर यक्ष उसके सिर पर गढ़ गाय और राज कन्या को ॠषि से विवाह करना पड़ा। ॠषि ने बाद में उसे त्याग दिया और उसने रुद्रदेव से विवाह कर लिया। भिक्षा-याचना पर निकले ॠषि का एक समय ब्राह्मण अपमान कर रहे थे लेकिन भद्रा ने उन्हें पहचाना और ब्राह्मणों की भत्र्सना की। ॠषि ने फिर ब्राह्मणों को भी क्षमा कर दिया।

मृतगंगा संबंधी उक्त कथा से कई बातें ज्ञात होती है, पहली यह कि कम-से-कम गुप्तयुग में जब नायाधम्म कहा लिखी गयी मृतगंगा आज के जैसी ही थी। दूसरी यह कि यह मृतगंगा वाराणसी के उत्तर-पूर्व में थी जो भौगोलिक दृष्टिकोण से बिलकुल ठीक है। तीसरी यह कि आज से १३०० बरस पहले इसमें पानी भरा रहता था और यह दह बन जाती थी। अब तो मृतगंगा में पानी केवल बरसात में आता है। संभवत: १००० बरस पहले बानगंगा अधिक गहरी थी और बाद में मिट्टी भरने से छिछली हो जाने के कारण पानी रोकने में असमर्थ हो गयी।

रामगढ़ में बानगंगा के तट पर वैरांट के प्राचीन खंडहरों की स्थिति है, जो महत्वपूर्ण है। लोक कथाओं के अनुसार यहां एक समय प्राचीन वाराणसी बसी थी। सबसे पहले बैरांट के खंडहरों की जांच पड़ताल ए.सी.एल. कार्लाईल २ ने की। वैरांट की स्थिति गंगा के दक्षिण में सैदपुर से दक्षिण-पूर्व में और वाराणसी के उत्तर-पूर्व में करीब १६ मील और गाजीपुर के दक्षिण-पश्चिम करीब १२ मील है। वैरांट के खंडहर बानगंगा के बर्तुलाकार दक्षिण-पूर्वी किनारे पर हैं।

बैैरांट के नाम व्युत्पत्ति के बारे में ठीक-ठीक नहीं कहा जा सकता। मत्स्यों की राजधानी बैरांट जो जयपुर, राजस्थान में है, इससे भिन्न है, फिर भी मत्स्यों के इस प्रदेश में होने का उल्लेख एक जगह महाभारत में आया है। लगता है मत्स्य एक जगह स्थिर न होकर आगे-पीछे आते-जाते रहे होगें और शायद इस नाम से उनका संबंध भी हो। पर लौकिक अनुश्रुति में सत्य का अंश है और इसे एक कोरी गप्प मानकर नहीं टाल सकते।

बैरांट के खंडहरों में प्राचीन किले का भग्नावशेष बानगंगा के पूर्वी कोने पर है। प्राचीन नगर के अवशेष किले से लेकर दक्षिण में बहुत दूर तक जमीन पर है, इसके बाद वे घूमकर दक्षिण-पश्चिम की ओर नदी के किनारे पर स्थित है। पुराना किला मिट्टी का बना है पर उसमें बहुत सी ईंटें भी मिलती है। उत्तर-दक्षिण में इसकी लम्बाई लगभग ४१० मीटर और पूरब में लगभग २७५ मीटर है। इसके बगल में प्राकार के २० से ३० मीटर चौड़े वप्र के अवशेष हैं। कहीं-कहीं यह वप्र है पर अधकर नालियों से कट गया है। किले के तीन ओर अर्थात् उत्तर-पूर्व, उत्तर-पश्चिम और दक्षिण-पूर्व के अट्टालक बच गए हैं। किले के चारों फाटकों का विशेष रुप से उत्तर-दक्षिण के फाटकों का अभी-भी पता लगता है। किले के अंदर दक्षिण में करीब एक तिहाई भाग नीचा है, फिर एक तिहाई जमीन उत्तर की ओर चढ़ती हुई है और किले की उत्तरी चौथा भाग और भी है। उत्तर-पूर्व अट्टालक के पास किसी बड़ी इमारत के भग्नावशेष हैं। किले के बाहर की खाई के निशान अब भी उत्तर-दक्षिण की ओर दिखती हैं।

किले से करीब १२० मीटर की दूरी पर वैरांट नामक गांव है। इस गांव के उत्तर-पूर्व में ५० मीटर की दूर पर एक दूसरा टीला है। गांव से उत्तर की ओर करीब ६२० मीटर पर भगतिन का तालाब है, जिसके उत्तर में करीब १०० मीटर पर एक दूसरा टीला है। तालाब से करीब २०० मीटर पश्चिम में रामसाला नाम का मंदिर है, जहां अघोरी महंत और उनके चेले रहते हैं। इस मंदिर से करीब १ कि.मी. उत्तर में रामगढ़ का गांव है।ंचींचा

बैरांट गांव के उत्तर-पूर्व २१० मीटर पर ठीकरों और ईंटों से पटी कुछ जमीन है। किले के दक्षिण में करीब १४० मीटर पर प्राकार के भग्नावशेष हैं, जो पूर्व से पश्चिम तक करीब ४२५ मीटर तक दीख पड़ते हैं। इसके पास में ही चौरस टीला है जिसके दक्षिण में एक नाला है। इस नाले से करीब ९०० मीटर पर रसूलपुर का गांव और एक टीला है। इस तरह देखने से पता चलता है कि बानगंगा के पूर्वी किनारे पर पुराने किले से रसूलपुर तक कोई प्राचीन शहर बसा था क्योंकि वर्षा काल में बराबर यहां से ढीकरे और ईंटें निकलती रहती है। इतना ही नहीं प्राचीन शहर के भग्नावशेष रसूलपुर से दक्षिण-पश्चिम करीब ७००-८०० मीटर और आगे तक चले गए हैं। शहर के इस बढ़ाव के दक्षिणी कोने पर बानगंगा पर पुराना घाट है। जहां शहर के अवशेष खत्म होते हैं वहां मिट्टी का एक बुर्ज है।

कार्लाइल के अनुसार प्राचीन किले को छोड़कर शहर की पूरी लम्बाई करीब ३ या ३-५ कि.मी. है। पूरब से पश्चिम तक शहर की चौड़ाई का इसलिए ठीक पता नहीं लगता क्योंकि खेतों के लिए जमीन समतल कर दी गयी है। लेकिन ध्यान से देखने पर शहर की उत्तरी और चौड़ाई लगभग ६०० मीटर और दक्षिण ४०० मीटर से ३०० मीटर और ठेठ दक्षिणी ओर २४० मीटर रह जाती है। प्राचीन नगर के ठेठ पूर्व में एक प्राचीन छिछली नदी का तल थी जिससे नगर घिरा था। अब सूख गया है पर इसमें बरसात में थोड़ा पानी भर जाता है।

कार्लाइल ने बैरांट से बहुत-से आहत और ढलुए सिक्के पाए। ईसा पूर्व दूसरी सदी की ब्राह्मी लिपि में ज्येष्ठदत्त तथा विजयमित्र के सिक्के तथा कनिष्क के भी सिक्के उन्हें मिले। राम कृष्णदास एवं डॉ. मोती चन्द ने भी बैरांट से बहुत आहत सिक्के इकट्ठे किये। एक सिक्के पर शुंगकालीन ब्राह्मी में “गोमि’ लेख है।

कार्लाइल को अकीक इत्यादि की बहुत सी मणियां भी यहां से मिली है। भारतकला भवन काशी हिन्दु विश्वविद्यालय में भी ऐसी मणियों का अच्छा संग्रह है। यहां हाथी दांत की चूड़ियों के भी टुकड़े काफी संख्या में मिलते हैं।

कार्लाइल को बैरांट के आस-पास के नालों और खेतों से प्रस्तर युग की चिप्पियाँ (flakes ) तथा कोर भी मिले थे इन सब बातों से यह सिद्ध हो जाता है कि बैरांट की बस्ती प्राचीन है। काली मिट्टी के ओपदार बर्तनों के टुकड़ों के मिलने से तो यह निश्चित हो जाता है कि मौर्य युग में यहां बस्ती थी।

ऊपर हमने वैरांट के प्राचीन शहर का इसलिए विस्तारपूर्वक वर्णन किया कि इस नगर की स्थिति से वाराणसी के प्राचीन इतिहास पर प्रकाश पड़ता है। इस जगह काशी की प्राचीन स्थिति के संबंध की कुछ बातों का जानना आवश्यक है। महाभारत (अनुशासन पर्व, १८९९, १९००) में यह कथा आयी है कि काशिराज हर्य को वीतिष्व्यो ने गंगा-यमुना के मैदान में हराकर मार डाला। हर्य के पुत्र सुदेव को भी लड़ाई में मात खानी पड़ी। बाद में उनके पुत्र दिवोदास ने दूसरी वाराणसी गंगा के उत्तर किनारे और गोमती के दक्षिण किनारे पर बसायी। ३ अब प्रश्न उठता है कि दिवोदास का बसाया यह दूसरा वाराणसी कहां पर था? गंगा की आधुनिक धारा को देखते हुए यह नगर गंगा-गोमती के संगम कैथी के पास होना चाहिए पर कैथी के आस-पास किसी प्राचीन नगर का भग्नावशेष नहीं है। चंद्रावती के भी गाहड़वाल युग के पहले के नहीं है और एक बड़े शहर का तो यहां नाम निशान भी नहीं मिलता। आज तक यह भी नहीं सुनने में आया कि चंद्रावती से कोई प्राचीन सिक्के भी मिले हैं। आसपास खोजने पर बैरांट के सिवा कोई ऐसी दूसरी जगह नहीं मिलती जहां प्राचीन काल में एक शहर रहा है। गंगा-गोमती की वर्तमान धारा इस मत के विरुद्ध पड़ती है, पर गंगा की प्राचीन धारा की अगर कल्पना की जाए तो बैरांट पर ही दिवोदास की बनायी दूसरी वाराणसी संभव जान पड़ती है। बानगंगा रसूरपुर तक पूर्ववाहिनी होकर हसनपुर में गंगा के वर्तमान प्रवाह में मिल जाती है। जिस समय गंगा का मूल प्रवाह बानगंगा काँठे से था, इस समय गोमती गंगा की वर्तमान धारा में बहती हुई सैदपुर के पास गंगा से आ मिलती थी। इस तरह बैरांट या प्राचीन वाराणसी गोमती के दक्षिण में पड़ता था जैसा कि महाभारत में कहा गया है।

अब प्रश्न यह है कि यह नयी वाराणसी कब तक बसी रही? ऐसा जान पड़ता है कि जब तक गंगा ने अपना प्रवाह नहीं बदला था तब तक नगर बैरांट में ही बना रहा। पर जब गंगा ने इस जगह को छोड़ दिया तब नगर भी धीरे-धीरे वीरान हो चला और अंत में केवल टीला रह गया। लेकिन यह सब हुआ कब? ऐसा पता लगता है कि मौर्ययुग तक तो वैरांट का शहर बसा था और शायद गंगा ने तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व के बाद ही अपना रास्ता बदला होगा। कम-से-कम जैसा हमें अनुश्रुतियों से पता लगता है गुप्तयुग में तो मृतगंगा अर्थात् बाणगंगा इतिहास में आ चुकी थी, अत: गंगा ने अपना रास्ता इसके कई शताब्दी पहले बदला होगा। यह प्रश्न ऐतिहासिक दृष्टि से बड़े महत्व का है पर इस प्रश्न पर और अधिक प्रकाश तभी पड़ सकता है जब वैरांट की आधुनिक ढ़ंग से खुदाई हो।

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बरना

सुबहा और अस्सी जैसे दो एक मामूली नाले-नालियों को छोड़कर इस जिले में गंगा की मुख्य सहायक नदियां बरना और गोमती है। वाराणसी के इतिहास के लिए तो बरना का काफी महत्व है क्योंकि जैसा हम पहले सिद्ध कर चुके हैं इस नदी के नाम पर ही वाराणसी नगर का नाम पड़ा। अथर्ववेद (५/७/१) में शायद बरना को ही बरणावती नाम से संबोधन किया गया है। उस युग में लोगों का विश्वास था कि इस नदी के पानी में सपं-विष दूर करने का अलौकिक गुण है। प्राचीन पौराणिक युग में इस नदी का नाम “वरणासि’ था। बरना इलाहाबाद और मिर्जापुर जिलों की सीमा पर फूलपुर के ताल से निकालकर वाराणसी जिले की सीमा में पश्चिमी ओर से घुसती है और यहां उसका संगम विसुही नदी से सरवन गांव में होता है। विसुही नाम का संबंध शायद विष्ध्नी से हो। संभवत: बरना नदी के जल में विष हरने की शक्ति के प्राचीन विश्वास का संकेत हमें उसकी एक सहायक नदी के नाम से मिलता है। बिसुही और उसके बाद वरना कुछ दूर तक जौनपुर और वाराणसी की सीमा बनाती है। बल खाती हुई बरना नदी पूरब की ओर जाती है और दक्षिण और कसवार ओर देहात अमानत की ओर उत्तर में पन्द्रहा अठगांवा और शिवपुर की सीमाएं निर्धारित करती है। बनारस छावनी के उत्तर से होती हुई नदी दक्षिण-पूर्व की ओर घूम जाती है और सराय मोहाना पर गंगा से इसका संगम हो जाता है। वाराणसी के ऊपर इस पर दो तीर्थ है, रामेश्वर ओर कालकाबाड़ा। नदी के दोनों किनारे शुरु से आखिर तक साधारणत: हैं और अनगिनत नालों से कटे हैं।

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गोमती

इस नदी का भी पुराणों में बहुत उल्लेख है। पौराणिक युग में यह विश्वास था कि वाराणसी क्षेत्र की सीमा गोमती से बरना तक थी। इस जिले में पहुंचने के पहले गोमती का पाट सई के मिलने से बढ़ जाती है। नदी जिले के उत्तर में सुल्तानीपुर से घुसती है और वहां से २२ मील तक अर्थात कैथी में गंगा से संगम होने तक यह जिले की उत्तरी सरहद बनाती है। नदी का बहाव टेढ़ा-मेढ़ा है और इसके किनारे कहीं और कहीं ढालुएं हैं।
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नंद

नंद ही गोमती की एकमात्र सहायक नदी है। यह नदी जौनपुर की सीमा पर कोल असला में फूलपुर के उत्तर-पूर्व से निकलती है और धौरहरा में गोमती से जा मिलती है। नंद में हाथी नाम की एक छोटी नदी हरिहरपुर के पास मिलती है।

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करमनासा

मध्यकाल में हिन्दुओं का यह विश्वास था कि करमनासा के पानी के स्पर्श से पुण्य नष्ट हो जाता है। करमनासा और उसकी सहायक नदियां चंदौली जिले में है। नदी कैभूर पहाड़ियों से निकलकर मिर्जापुर जिले से होती हुई, पहले-पहल बनारस जिले में मझवार परगने से फतहपुर गांव से घूमती है। मझवार के दक्षिण-पूरबी हिस्से में करीब १० मील चलकर करमनासा गाजीपुर की सरहद बनाती हुई परगना नरवम को जिला शाहाबाद से अलग करती है। जिले को ककरैत में छोड़ती हुई फतेहपुर से ३४ मील पर चौंसा में वह गंगा से मिल जाती है। नौबतपुर में इस नदी पर पुल है और यहीं से ग्रैंड ट्रंक रोड और गया को रेलवे लाइन जाती है।

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गड़ई

करमनासा की मुख्य सहायक नदी गड़ई है जो मिर्जापुर की पहाड़ियों से निकलकर परगना धूस के दक्षिण में शिवनाथपुर के पास से इस जिले में घुसती है और कुछ दूर तक मझवार और धूस की सीमा बनाती हुई बाद में मझवार होती हुई पूरब की ओर करमनासा में मिल जाती है।

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चन्द्रप्रभा
मझवार में गुरारी के पास मिर्जापुर के पहाड़ी इलाके से निकलकर चन्द्रप्रभा बनारस जिले को बबुरी पर छूती हुई थोड़ी दूर मिर्जापुर में बहकर उत्तर में करमनासा से मिल जाती है।

बनारस जिले की नदियों के उक्त वर्णन से यह ज्ञात होता है कि बनारस में तो प्रस्रावक नदियां है लेकिन चंदौली में नहीं है जिससे उस जिले में झीलें और दलदल हैं, अधिक बरसात होने पर गांव पानी से भर जाते हैं तथा फसल को काफी नुकसान पहुंचता है। नदियों के बहाव और जमीन की की वजह से जो हानि-लाभ होता है इसे प्राचीन आर्य भली-भांति समझते थे और इसलिए सबसे पहले आबादी बनारस में हुई। —