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अमरूद है एक बेहतरीन औषधि, इन रोगों में करता है दवा का काम


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अमरूद है एक बेहतरीन औषधि, इन रोगों में करता है दवा का काम

अमरूद एक बेहतरीन स्वादिष्ट फल है। अमरूद कई गुणों से भरपूर है। अमरूद में प्रोटीन 10.5 प्रतिशत, वसा 0. 2 कैल्शियम 1.01 प्रतिशत बी पाया जाता है। अमरूद का फलों में तीसरा स्थान है। पहले दो नम्बर पर आंवला और चेरी हैं। इन फलों का उपयोग ताजे फलों की तरह नहीं किया जाता, इसलिए अमरूद विटामिन सी पूर्ति के लिए सर्वोत्तम है।

विटामिन सी छिलके में और उसके ठीक नीचे होता है तथा भीतरी भाग में यह मात्रा घटती जाती है। फल के पकने के साथ-साथ यह मात्रा बढती जाती है। अमरूद में प्रमुख सिट्रिक अम्ल है 6 से 12 प्रतिशत भाग में बीज होते है। इसमें नारंगी, पीला सुगंधित तेल प्राप्त होता है। अमरूद स्वादिष्ट फल होने के साथ-साथ अनेक गुणों से भरा से होता है।

यदि कभी आपका गला ज्यादा ख़राब हो गया हो तो अमरुद के तीन -चार ताज़े पत्ते लें ,उन्हें साफ़ धो लें तथा उनके छोटे-छोटे टुकड़े तोड़ लें | एक गिलास पानी लेकर उसमे इन पत्तों को डाल कर उबाल लें , थोड़ा पकाने के बाद आंच बंद कर दें | थोड़ी देर इस पानी को ठंडा होने दें ,जब गरारे करने लायक ठंडा हो जाये तो इसे छानकर ,इसमें नमक मिलाकर गरारे करें , याद रखें कि इसमें ठंडा पानी नहीं मिलना है |

अमरूद के ताजे पत्तों का रस 10 ग्राम तथा पिसी मिश्री 10 ग्राम मिलाकर 21 दिन प्रात: खाली पेट सेवन करने से भूख खुलकर लगती है और शरीर सौंदर्य में भी वृद्धि होती है।

अमरूद खाने या अमरूद के पत्तों का रस पिलाने से शराब का नशा कम हो जाता है। कच्चे अमरूद को पत्थर पर घिसकर उसका एक सप्ताह तक लेप करने से आधा सिर दर्द समाप्त हो जाता है। यह प्रयोग प्रात:काल करना चाहिए। गठिया के दर्द को सही करने के लिए अमरूद की 4-5 नई कोमल पत्तियों को पीसकर उसमें थोड़ा सा काला नमक मिलाकर रोजाना खाने से से जोड़ो के दर्द में काफी राहत मिलती है।

डायबिटीज के रोगी के लिए एक पके हुये अमरूद को आग में डालकर उसे भूनकर निकाल लें और भुने हुई अमरुद को छीलकर साफ़ करके उसे अच्छे से मैश करके उसका भरता बना लें, उसमें स्वादानुसार नमक, कालीमिर्च, जीरा मिलाकर खाएं, इससे डायबिटीज में काफी लाभ होता है। ताजे अमरूद के 100 ग्राम बीजरहित टुकड़े लेकर उसे ठंडे पानी में 4 घंटे भीगने दीजिए। इसके बाद अमरूद के टुकड़े निकालकर फेंक दें। इस पानी को मधुमेह के रोगी को पिलाने से लाभ होता है।

जब भी आप फोड़े और फुंसियों से परेशान हो तो अमरूद की 7-8 पत्तियों को लेकर थोड़े से पानी में उबालकर पीसकर पेस्ट बना लें और इस पेस्ट को फोड़े-फुंसियों पर लगाने से आराम मिल जाएगा। चार हफ्तों तक नियमित रूप से अमरूद खाने से भी पेट साफ रहता है व फुंसियों की समस्या से राहत मिलती है।

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श्रीनिवास रामानुजन: एक विलक्षण गणितज्ञ


श्रीनिवास रामानुजन: एक विलक्षण गणितज्ञ

डॉ. कृष्णकुमार मिश्र

वर्तमान वर्ष भारत सरकार द्वारा राष्ट्रीय गणित वर्ष के रूप में मनाया जा रहा है। यह वर्ष महान भारतीय गणितज्ञ श्रीनिवासरामानुजन रामानुजन के जन्म का 125वाँ वर्ष है। रामानुजन विलक्षण प्रतिभा के धनी थे। उनका जन्म 22 दिसम्बर 1887 को मद्रास से 400 किलोमीटर दक्षिण-पश्चिम में स्थित इरोड नामक एक छोटे-से गांव में हुआ था। रामानुजन जब बहुत छोटे रहे होंगे उसी समय उनका परिवार इरोड से कुम्भकोणम आ गया। संसार में ऐसे अनेक गणितज्ञ हुए हैं जिनके कुटुम्ब के लोग गणितज्ञ या फिर गणित से लगाव वाले थे। लेकिन रामानुजन का मामला एकदम से भिन्न है। वे बहुत ही साधारण परिवार से ताल्लुक रखते थे। उनके पिता कुम्भकोणम में एक कपड़ा व्यापारी के यहां मुनीम का काम करते थे। जब वे पांच वर्ष के थे तो उनका दाखिला कुम्भकोणम के प्राइमरी स्कूल में करा दिया गया। सन्1898 में इन्होंने टाउन हाईस्कूल में प्रवेश लिया और सभी विषयों में बहुत अच्छे नम्बर हासिल कए। यहीं पर रामानुजन को जी. एस. कार की गणित पर लिखी किताब पढ़ने का मौका मिला। इस पुस्तक से प्रभावित होकर उन्होंने स्वयं ही गणित पर कार्य करना प्रारंभ कर दिया।

        रामानुजन धार्मिक प्रवृत्ति और शांत स्वभाव के चिन्तनशील बालक थे। अपने खपरैल की छत वाले पुश्तैनी घर के सामने एक ऊंचे चबूतरे पर बैठ कररामानुजन गणित के सवाल हल करने में डूब जाते थे। रामानुजन का गणित के प्रति जबर्दस्त लगाव था। विशुद्ध गणित के अतिरिक्त अन्य विषयों, जैसे गणितीयभौतिकी और अनुप्रयुक्त गणित में उनकी रुचि नहीं थी। रामानुजन गणित की खोज को ईश्वर की खोज के सदृश मानते थे। इसी कारण गणित के प्रति उनमें गहरालगाव था। उन्हें विश्वास था कि गणित से ही ईश्वर का सही स्वरूप स्पष्ट हो सकता है। वे संख्या ‘एक’ को अनन्त ईश्वर का स्वरूप मानते थे। वे रातदिन संख्याओंके गुणधर्मों के बारे में सोचते, मनन करते रहते थे और सुबह उठकर कागज पर अकसर सूत्र लिख लिया करते थे। उनकी स्मृति और गणना शक्ति अद्भुत थी। वे π, √2, e आदि संख्याओं के मानदशमलव के हजारवें स्थान तक निकाल लेने में सक्षम थे। यह उनकी गणितीय मेधा का प्रमाण है।

रामानुजन घर

रामानुजन जब दसवीं कक्षा के छात्र थे तो उन्होंने स्थानीय कॉलेज के पुस्तकालय से उच्च गणित में जार्ज शुब्रिजकाररामानुजन हार्डी का एक ग्रन्थ “सिनॉप्सिस आफ प्योर मैथेमेटिक्स” प्राप्त किया। इस ग्रन्थ में बीजगणिज, ज्यामिति, त्रिकोणमिति और कलन गणित के 6165 सूत्रदिये गये हैं। इनमें से कुछ सूत्रों की बहुत संक्षिप्त उपपत्ति दी गई है।  यह ग्रन्थ रामानुजन के लिये उच्च गणित का बहुत बड़ा खजाना था। वे गम्भीरता से इस ग्रन्थ के प्रत्येक सूत्र को हल करने में जुट गये और इन सूत्रों को सिद्धकरना उनके लिए गवेषणा का कार्य बन गया।  उन्होंने पहले मैजिक स्क्वायर तैयार करने की कुछ विधियाँ खोज निकालीं। रामानुजन ने समाकलन पर अच्छा ज्ञान अर्जित कर लिया। बीजगणित की कई नई श्रेणियां उन्होंने खोज निकालीं। उनके गुरु डॉ. हार्डी ने लिखा है- “इसमें संदेह नहीं है कि इस ग्रन्थ ने रामानुजन को बेहद प्रभावित किया और उनकी पूर्ण क्षमता को जगाया। यह ग्रन्थ उत्कृष्ट कृति नहीं है परन्तु रामानुजन ने इसे सुप्रसिद्ध कर दिया। इसके अध्ययन के बाद ही एक गणितज्ञ के रूप में रामानुजन के जीवन का नया अध्याय शुरू हुआ।”

कुम्भकोणम के शासकीय महाविद्यालय में अध्ययन के लिए रामानुजन को छात्रवृत्ति मिलती थी। परंतु रामानुजन द्वारा गणित के अलावा दूसरे विषयों की अनदेखी करने पर उनकी छात्रवृत्ति बंद कर दी गई। सन् 1905 में रामानुजन मद्रास विश्वविद्यालय की प्रवेश परीक्षा में सम्मिलित हुए परंतु गणित को छोड़कर शेष सभी विषयों में वे अनुत्तीर्ण हो गए। सन् 1906 एवं 1907 की प्रवेश परीक्षा का भी यही परिणाम रहा। आगे के वर्षों में रामानुजन कार की पुस्तक को मार्गदर्शक मानते हुए गणित में कार्य करते रहे और अपने परिणामों को लिखते गए जो कि ‘नोटबुक’ नाम से प्रसिद्ध हुए। रामानुजन को प्रश्न पूछना बहुत पसंद था। उनके प्रश्न अध्यापकों को कभी-कभी बहुत अटपटे लगते थे। मसलन कि संसार में पहला पुरुष कौन था? पृथ्वी और बादलों के बीच की दूरी कितनी होती है? वगैरह।

               रामानुजन का व्यवहार बड़ा ही मधुर था। सामान्य से कुछ ज्यादा ही कृशकाय, और जिज्ञासा से चमकती आखें इन्हें एक अलग पहचान देती थीं। इनके सहपाठियों के अनुसार इनका व्यवहार इतना सौम्य था कि कोई इनसे नाराज हो ही नहीं सकता था। विद्यालय में इनकी प्रतिभा ने दूसरे विद्यार्थियों और शिक्षकों पर छाप छोड़ना आरंभ कर दिया। इन्होंने स्कूल के समय में ही कालेज के स्तर की गणित का अध्ययन कर लिया था। एक बार इनके विद्यालय के हेडमास्टर ने कहा भी कि विद्यालय में होने वाली परीक्षाओं के मापदंड रामानुजन के लिए लागू नहीं होते। हाईस्कूल की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद इन्हें गणित और अंग्रेजी में अच्छे अंक लाने के कारण सुब्रमण्यम छात्रवृत्ति मिली और आगे कालेज की शिक्षा के लिए प्रवेश भी मिला।

      सन् 1909 में इनका विवाह हो गया और वे आजीविका के लिए नौकरी ढूँढ़ने लगे। नौकरी की खोज के दौरान रामानुजन कई प्रभावशाली व्यक्तियों के सम्पर्क में आए। ‘इंडियन मैथमैटिकल सोसायटी’ के संस्थापकों में से एक रामचंद्र राव भी उन्हीं प्रभावशाली व्यक्तियों में से एक थे। रामानुजन ने रामचंद्र राव के साथ एक वर्ष तक कार्य किया। इसके लिए उन्हें 25 रुपये महीना मिलता था। इन्होंने ‘इंडियन मैथमैटिकल सोसायटी’ के जर्नल के लिए प्रश्न एवं उनके हल तैयार करने का कार्य प्रारंभ कर दिया। सन् 1911 में बर्नोली संख्याओं पर प्रस्तुत शोधपत्र से इन्हें बहुत प्रसिद्धि मिली और मद्रास में गणित के विद्वान के रूप में पहचाने जाने लगे। सन् 1912 में रामचंद्र राव की सहायता से मद्रास पोर्ट ट्रस्ट के लेखा विभाग में लिपिक की नौकरी करने लगे। रामानुजन ने गणित में शोध करना जारी रखा और सन् 8फरवरी 1913 में इन्होंने जी. एच. हार्डी को पत्र लिखा। साथ में स्वयं के द्वारा खोजे प्रमेयों की एक लम्बी सूची भी भेजी। ये पत्र हार्डी को सुबह नाश्ते के टेबल पर मिले। इस पत्र में एक अनजान भारतीय द्वारा बहुत सारे बिना उपपत्ति के प्रमेय लिखे थे जिनमें से कई प्रमेय हार्डी देख चुके थे। पहली नज़र में हार्डी को ये सब बकवास लगा। उन्होंने इस पत्र को एक तरफ रख दिया और अपने कार्यों में लग गए। परंतु इस पत्र की वजह से उनका मन अशांत था। इस पत्र में बहुत सारे ऐसे प्रमेय थे जो उन्होंने न कभी देखे और न सोचे थे। उन्हें बार-बार यह लग रहा था कि यह व्यक्ति (रामानुजन) या तो धोखेबाज है या फिर गणित का बहुत बड़ा विद्वान। रात को 9 बजे हार्डी ने अपने एक शिष्य लिटिलवुड के साथ एक बार फिर इन प्रमेयों को देखना शुरू किया तथा आधी रात तक वे लोग समझ गये कि रामानुजन कोई धोखेबाज नही बल्कि गणित के बहुत बड़े विद्वान हैं जिनकी प्रतिभा को दुनिया के सामने लाना आवश्यक है। इसके बाद हार्डी ने उन्हें कैम्ब्रिज बुलाने का फैसला किया। हार्डी का यह निर्णय एक ऐसा निर्णय था जिससे न केवल उनकी बल्कि पूरे गणित की ही धारा बदल गई।

     सन् 1913 में हार्डी के पत्र के आधार पर रामानुजन को मद्रास विश्वविद्यालय से छात्रवृत्ति मिलने लगी। अगले वर्ष सन् 1914 में हार्डी ने रामानुजन के लिए कैम्ब्रिज के ट्रिनिटी कॉलेज आने की व्यवस्था की। रामानुजन ने गणित में जो कुछ भी किया था वह सब अपने बलबूते किया था। रामानुजन को गणित की कुछ शाखाओं का बिलकुल भी ज्ञान नहीं था, पर कुछ क्षेत्रों में उनका कोई सानी नहीं था। इसलिए हार्डी ने रामानुजन को पढ़ाने का जिम्मा स्वयं लिया। हार्डी ने इस बात को स्वीकार किया है कि जितना उन्होंने रामानुजन को सिखाया, उससे कहीं ज्यादा रामानुजन ने उन्हें सिखाया। सन्1916 में रामानुजन ने कैम्ब्रिज से बी.एस-सी. की उपाधि प्राप्त की।

       रामानुजन और हार्डी के कार्यों से शुरू से ही महत्वपूर्ण परिणाम मिले। सन् 1917 से ही रामानुजन बीमार रहने लगे थे और अधिकांश समय बिस्तर पर ही रहते थे। बीमारी की एक वजह थी। रामानुजन ब्राह्मण कुल में पैदा हुए थे। वे धर्म-कर्म में विश्वास करते थे तथा आचार-विचार का कड़ाई से पालन करते थे। रामानुजन शाकाहारी थे और इंग्लैण्ड में रहते समय अपना भोजन स्वयं पकाते थे। इंग्लैण्ड की कड़ी सर्दी और उस पर कठिन परिश्रम। फलस्वरूप रामानुजन का स्वास्थ्य खराब रहने लगा। और जब उनमें तपेदिक के लक्षण दिखाई देने लगे तो उन्हें अस्पताल में भर्ती कर दिया गया। इधर उनके लेख उच्चकोटि की पत्रिकाओं में प्रकाशित होने लगे थे। सन् 1918 में एक ही वर्ष में रामानुजन को कैम्ब्रिज फिलोसॉफिकल सोसायटी, रॉयल सोसायटी तथा ट्रिनिटी कॉलेज, कैम्ब्रिज तीनों का फेलो चुना गया। इससे रामानुजन का उत्साह और भी अधिक बढ़ा और वह काम में जी-जान से जुट गए। सन् 1919 में स्वास्थ ज्यादा खराब होने की वजह से उन्हें भारत वापस लौटना पड़ा।

       एक बार का किस्सा है। रामानुजन अस्पताल में भर्ती थे। डॉ. हार्डी टैक्सी में बैठकर उन्हें देखने अस्पताल पहुँचे। टैक्सी का नंबर 1729 था। रामानुजन से मिलने पर डॉ. हार्डी ने ऐसे ही सहज भाव सेकह दिया कि यह एक अशुभ संख्या है। बात यह थी कि 1729= 7x13x19। यहाँ आप देखेंगे कि 1729 का एक गुणनखंड 13 है। यूरोप के अंधविश्वासी लोग इस 13 संख्या से बहुत भय खाते हैं। वे संख्या13 को अशुभ मानते हैं। वे 13 संख्यावाली कुर्सी पर बैठने से बचेंगे, 13 संख्यावाले कमरे में ठहरने से बचेंगें। इसलिए डॉ. हार्डी ने रामानुजन से कहा था कि 1729 एक अशुभ संख्या है। लेकिन रामानुजनने झट जवाब दिया- नहीं, यह एक अद्भुत संख्या है। वास्तव में यह वह सबसे छोटी संख्या है जिसे हम दो घन संख्याओं के जोड़ से दो तरीकों में व्यक्त कर सकते है; जैसे- 1729 = 123 + 13 तथा1729=103+93

       इलिनॉय विश्वविद्यालय के गणित के प्रोफेसर ब्रूस सी. बर्नाड्ट ने रामानुजन की तीन पुस्तकों पर 20 वर्षों तक शोध किया और उनके निष्कर्ष पाँच पुस्तकों के संकलन के रूप में प्रकाशित हुए हैं। प्रो.बर्नाड्ट कहते हैं, “मुझे यह सही नहीं लगता जब लोग रामानुजन की गणितीय प्रतिभा को किसी दैवीय या आध्यात्मिक शक्ति से जोड़ कर देखते हैं। यह मान्यता ठीक नहीं है। उन्होंने बड़ी सावधानी से अपने शोध निष्कर्षों को अपनी पुस्तिकाओं में दर्ज किया है।” सन् 1903 से 1914 के दरम्यान कैम्ब्रिज जाने से पहले रामानुजन अपनी पुस्तिकाओं में 3,542 प्रमेय लिख चुके थे। उन्होंने ज्यादातर अपने निष्कर्ष ही दिए थे, उनकी उपपत्ति नहीं दी। शायद इसलिए कि वे काग़ज़ ख़रीदने में सक्षम नहीं थे और अपना कार्य पहले स्लेट पर करते थे। बाद में बिना उपपत्ति दिए उसे पुस्तिका में लिख लेते थे।

       रामानुजन के प्रमुख गणितीय कार्यों में एक है किसी संख्या के विभाजनों की संख्या ज्ञात करने के फार्मूले की खोज। उदाहरण के लिए संख्या 5 के कुल विभाजनों की संख्या 7 है। इस प्रकार: 5, 4+1, 3+2, 2+2+1, 2+1+1+1, 1+1+1+1+1 । रामानुजन के फार्मूले से किसी भी संख्या के विभाजनों की संख्या ज्ञात की जा सकती है। उदाहरण के लिए संख्या 200 के कुल 3972999029388 विभाजन होते हैं। हाल ही में भौतिक जगत की नयी थ्योरी ‘सुपरस्ट्रिंग थ्योरी’ में इस फार्मूले का काफ़ी उपयोग हुआ है। रामानुजन ने उच्च गणित के क्षेत्रों जैसे संख्या सिद्धान्त, इलिप्टिक फलन, हाईपरज्योमैट्रिक श्रेणी इत्यादि में अनेक महत्वपूर्ण खोज कीं। रामानुजन ने वृत्त की परिधि और व्यास के अनुपात ‘पाई’ (π) के अधिक से अधिक शुद्ध मान प्राप्त करने के अनेक सूत्र प्रस्तुत किए हैं। ये सूत्र अब कम्प्यूटर द्वारा πके दशमलव के लाखों स्थानों तक परिशुद्ध मान ज्ञात करने के लिए कारगर सिद्ध हो रहे हैं। आज सुपरकम्प्यूटरों की क्षमता प्रायः इस परीक्षण से आंकी जाती है कि वे π का मान दशमलव के कितने स्थानों तक कितने अल्पकाल में प्रस्तुत कर सकते हैं।

       सन् 1919 में इंग्लैण्ड से वापस आने के पश्चात् रामानुजन कुम्भकोणम में रहने लगे। उनका अंतिम समय चारपाई पर ही बीता। वे चारपाई पर पेट के बल लेटे-लेटे काग़ज़ पर बहुत तेज गति से यूँ लिखते रहते थे मानो उनके मस्तिष्क में गणितीय विचारों की आँधी चल रही हो। रामानुजन स्वयं कहते थे कि उनके द्वारा लिखे सभी प्रमेय उनकी कुलदेवी नामगिरि की प्रेरणा हैं। इंग्लैण्ड का मौसम उन्हें रास नहीं आया था। उनका गिरता स्वास्थ्य सबके लिए चिंता का विषय बन गया और यहां तक कि डॉक्टरों ने भी जवाब दे दिया था। अंतत: रामानुजन के जीवन की सांध्यवेला आ ही गई। 26 अप्रैल 1920की सुबह वे अचेत हो गए, और दोपहर होते-होते उनका देहावसान हो गया। उस समय वे महज 32 वर्ष के थे। अल्पायु में उनके असामयिक निधन से गणित जगत की अपूरणीय क्षति हुई।

                    उनकी मृत्योपरान्त मॉक थीटा फंक्शन से सम्बन्धित उनकी ‘नोटबुक’ मद्रास विश्वविद्यालय में जमा थी, जो बाद में प्रो. हार्डी के जरिए डॉ. वाटसन के पास पहुँची। तदोपरान्त रामानुजन की यह 130 पृष्ठों की नोटबुक ट्रिनिटी कालेज के ग्रन्थालय को सौंपी गई। इस ‘नोट बुक’ में रामानुजन ने जल्दी-जल्दी में लगभग 600 परिणाम प्रस्तुत किए हैं परन्तु उनकी उपपत्ति नहीं दी थी। विस्कोन्सिन विश्वविद्यालय के गणितज्ञ डॉ. रिचर्ड आस्की लिखते है- “मृत्युशैय्या पर लेटे-लेटे साल भर में किया गया रामानुजन का यह कार्य बड़े-बड़ै गणितज्ञों के जीवनभर के कार्य के बराबर है। सहसा यकीन नहीं होता कि उन्होंने अपनी उस दशा में यह कार्य किया। कदाचित किसी उपन्यास में ऐसा विवरण दिया जाता तो उस पर कोई भी विश्वास नहीं करता।” रामानुजन की नोट बुकों की यह अमूल्य विरासत गणितज्ञों के लिए शोध का विषय रहेगी। संख्या-सिद्धान्त पर उनके हैरतअंगेज कार्य के लिए उन्हें ‘संख्याओं का जादूगर माना जाता है। उनके महान गणितीय अवदान के लिए रामानुजन को”गणितज्ञों का गणितज्ञ” भी कहा जाता है।

 

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राष्ट्रीय गणित वर्ष 2012


राष्ट्रीय गणित वर्ष 2012

राष्ट्रीय गणित वर्ष 2012

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देवीय चमत्कार: गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन् आयंगर

 

श्रीनिवास रामानुजन्
विज्ञान आस्था को नहीं स्वीकारता मगर भारत माँ के यशस्वी पुत्र गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन् ने आस्था से प्राप्त उपलब्धियों के बल पर ही सम्पूर्ण विश्व को चमकृत किया  हैं। श्रीनिवास रामानुजन के अनुभव से हमारी शिक्षा व्यवस्था का खोखलापन भी उजागर होता है। 13 वर्ष की अल्पायु में रामानुजन् ने अपनी गणितीय विश्लेण की असाधारण प्रतिभा से अपने सम्पर्क के लोगों को चमत्कृत कर दिया मगर शिक्षा व्यवस्था ने उन्हें असफल घोषित कर बाहर का रास्ता दिखा दिया था। स्पष्ट है कि  शिक्षा व्यवस्था में विलक्षण बालकों के लिए कोई स्थान नहीं है। रामानुजन् की पारिवारिक पृष्ठभूमि गणित की नहीं थी। परिवार में कोई उनका मददगार भी नहीं था ऐसे में अपनी क्षमता को दुनिया के सामने लाने हेतु रामानुजन् को अत्यधिक परिश्रम करना पड़ा था।

साधारण प्रारम्भिक जीवन

श्रीनिवास रामानुजन् का जन्म 22 दिसम्बर 1887 को तत्कालीन मद्रास प्रान्त में हुआ था। इनका जन्म स्थान तंजोर जिले के कुम्भकोनम नगर के पास ‘इरोद’ नामक गाँव है। इनके पिता के.श्रीनिवास आयंगर एक निर्धन ब्राह्मण थे तथा कपड़े की दुकान पर मुनीम का कार्य करते थे। के.श्रीनिवास का विवाह होने के बहुत समय बाद तक उनके कोई संतान नहीं हुई थी। तब श्रीनिवास आयंगर के श्वसुर ने नामगिरी देवी से सन्तान के लिए मनौती मांगी। इसके बाद रामानुजन् का जन्म हुआ। रामानुजन् के जन्म के बाद इनकी माँ ने तीन संतानों को जन्म दिया था। तीनों संतानों में से कोई भी अगले जन्म दिन तक जीवित नहीं रह पाई थी। रामानुजन् के पिता को दुकान के कार्य से बहुत कम समय मिल पाता था। रामानुजन् के लालन-पालन की समस्त जिम्मेदारी इनकी माँ कोमल अमल ने संभाल रखी थी। धार्मिक विचारों वाली कोमल अमल मन्दिर में भजन गाया करती थी। अतः रामानुजन का बचपन मंदिर परिसर के पवित्र वातावरण में बीता। रामानुजन ने, बचपन के संस्कारों पूजा-पाठ,खान-पान आदि को, जीवन भर निभाया। आज कुछ लोग रामानुजन् के संस्कारों को उनकी संकीर्णता बताकर,उसे इनकी छोटी उम्र में मृत्यु के लिए जिम्मेदार बता रहे हैं। इसे उचित नहीं कहा जा सकता।

रामानुजन् का बचपन कठिन परिस्थितियों में गुजरा। दो वर्ष की उम्र में रामानुजन्, तंजार जिले में महामारी के रूप में फैली, घातक चेचक की चपेट में आगए थे। दैवीय कृपा से रामानुजन् बच गए। पिता की निर्धनता के कारण रामानुजन् को कभी नाना के घर  तो कभी पिता के घर पर रहना पड़ता था। इस कारण इनके स्कूल भी बदलते रहते थे। प्रारम्भिक शिक्षा तमिल माध्यम के स्थानीय विद्यालय में ही हुई। बाद में नाना ने इन्हें मद्रास के एक माध्यमिक विद्यालय में भर्ती कराया। मद्रास में विद्यालय जाना रामानुजन् को अच्छा नहीं लगता था। रामानुजन् नियमित रूप से विद्यालय भेजने के लिए इनके नाना ने एक सिपाही को लगा रखा था। छः माह बाद ही रामानुजन् नाना के घर मद्रास से पुनः कुम्बाकोनम लौट गए। इसके बाद भी रामानुजन् प्राथमिक कक्षा की परीक्षा में जिले भर में प्रथम रहे।

गणित से रामानुजन् का औपचारिक परिचय माध्यमिक विद्यालय में भर्ती के बाद हुआ। 11 वर्ष की उम्र में रामानुजन् ने, मकान में किराए रहने वाले, दो महाविद्यालयी विद्यार्थियों के साथ उनके गणित के प्रश्न हल करने लगे थे। गणित के प्रति रामानुजन का रुझान देख, इन्हें उच्च त्रिकोणमिति पर एस.एल.लोनी द्वारा लिखित पुस्तक करने को दी गई। 13 वर्ष में रामानुजन् ने उस पुस्तक की सभी समस्याओं को हल कर दिया था। रामानुजन् ने गणित की पुस्तक के प्रश्न हल करने में महारत हासिल करने के साथ ही अपने स्तर पर भी कई प्रमेय सिद्ध कर दिखाए थे। इस दौरान विभिन्न गणित प्रतियोगिताओं के अनेक पुरस्कार एवं प्रशंसापत्र रामानुजन को मिलते रहे। रामानुजन की प्रसिद्धि का लाभ इनके विद्यालय को भी मिला। उस समय रामानुजन के विद्यालय में 1200 विद्यार्थी एवं 35 शिक्षक होगए थे।

हाई स्कूल परीक्षा में रामानुजन् ने गणित का प्रश्नपत्र, निर्धारित समय से, आधे समय में ही हल कर लिया था। गणित में अनन्त श्रेढ़ी के प्रति इनका अधिक लगाव था। 16 वर्ष की उम्र में जार्ज कर द्वारा लिखी गई पुस्तक “ए सिनोप्सिस ऑफ एलिमेन्टरी रिजल्टस् इन प्योर एण्ड एप्लाइड मेथेमेटिक्स” ने रामानुजन् को पूर्णरूप से गणित की दुनियां में पहुँचा दिया। पुस्तक में संग्रहित 5000 प्रमेयों के साथ बरनॉली संख्या, यूलर स्थिरांक आदि की गणनाएं कर रामानुजन अपने साथियों को चमकृत करने लगे थे। रामानुजन के प्रधानाध्यापक ने उन्हें गणित के रंगनाथन पुरस्कार से सम्मानित किया। प्रधानाध्यापक ने रामानुजन् की मेधा की सराहना करने के साथ ही परीक्षा में पूर्णाकों से भी अधिक अंक पाने की सम्भावना भी प्रकट की और कुम्बाकोनम के राजकीय महाविद्यालय में अध्ययन करने हेतु छात्रवृति की अग्रिम स्वीकृत भी कर दी थी।

बुरे दिनों की शुरुआत

चारों ओर से प्राप्त प्रशंसा रामानुजन् को रास नहीं आई। इन्टर का परीक्षा परिणाम आया तो रामानुजन् ने गणित में बहुत अच्छे अंक पाए मगर अन्य विषयों में असफल रहे थे। पूर्व में स्वीकृत छात्रवृति कोई काम नहीं आई। निराश हो रामानुजन् घर छोड़ भाग गए। बाद में मद्रास के एक महाविघालय में प्रवेश लिया। यहाँ भी गणित को छोड़ कर अन्य विषयों में रामानुजन् की उपलब्घि निराशजनक ही रही थी। अगले वर्ष फिर प्रयास किया मगर असफल ही रहे। अतः बिना डिग्री लिए ही रामानुजन् को औपचारिक अध्ययन छोड़ना पड़ा। अपने अध्ययन के बल पर रामानुजन् कभी भी डिग्री प्राप्त नहीं कर सके।

22 वर्ष की आयु में रामानुजन् का विवाह 9 वर्ष की कन्या जानकी अमल से हुआ। प्रचलित प्रथा के कारण वयस्क होने तक पत्नी पिता के घर ही रही थी। उसी समय रामानुजन् के अण्डकोष में पानी भरने का रोग होगया। शल्य चिकित्सा ही उसका एकमात्र उपचार था। उनके निर्धन परिवार के पास आपरेशन के लिए पर्याप्त धन नहीं था। एक डाक्टर ने निशुल्क ऑपरेशन कर  रामानुजन् को कष्ट से मुक्त कराया था। ठीक होने के बाद रामानुजन् ने मित्रों के यंहा रहकर गुजारा किया। इस दौरान क्लर्क की नौकरी की तलाश में रामानुजन् मद्रास में जगह जगह भटकते रहे। रामानुजन् ने बच्चों को गणित पढ़़ाना प्रारम्भ कर दिया, जिससे कुछ आमदनी होने लगी थी। 1910 के समाप्त होने के पूर्व ही रामानुजन् फिर बीमार हो गए। उस बीमारी ने रामानुजन् को इतना भयभीत कर दिया कि वे बचने की आशा भी छोड़ चुके थे। रामानुजन् ने अपने गणितीय अनुसंधान के पत्र अपने एक मित्र आर.राधाकृष्णन अयर दे दिए। रामानुजन् को विश्वास था कि  यदि रामानुजन् की मृत्यु हो जाती है तो मित्र वे पत्र प्रोफेसर सिंगानुरुवेलुर मदालियर या मद्रास क्रिश्चिनयन कॉलेज के ब्रिटिश प्रोफेसर एडवर्ड बी रोस को सौंप देगा।

रोग से उभरने के बाद रामानुजन् ने मित्र से अपने अनुसंधान पत्र वापस ले लिए।  रामानुजन् फ्रान्सिसी नियन्त्रित क्षेत्र विलिपुरुम जाकर इण्डियन मेथेमेटीकल सोसाइटी के संस्थापक वी रामास्वामी अयर से मिले। वी रामास्वामी अयर वहाँ राजस्व विभाग में डिप्टि कलक्टर थे। रामानुजन् चाहते थे कि उन्हे उसी विभाग में क्लर्क की नौकरी मिल जावे। रामास्वामी रामानुजन् के गणित अनुसंधान कार्य को देखकर बहुत प्रभावित हुए। रामास्वामी नहीं चाहते थे कि रामानुजन् जैसा मेधावी व्यक्ति कलर्क के रूप में जीवन बितावे। रामास्वामी ने एक प्रंशसा पत्र देकर रामानुजन् अपने गणितीय मित्रों के पास मद्रास भेज दिया।

रामानुजन् नेलोर के जिला कलक्टर तथा इण्डियन मेथेमेटीकल सोसाइटी के सचिव रामचन्द्र राव से मिले। राव को इनके कार्य की मौलिकता पर पहले तो विश्वास नहीं हुआ मगर बाद में, विस्तार से हुई बातचीत तथा मित्र सी.वी.राजगोपालाचार्य के कहने पर, वे संतुष्ट होगए। राव ने रामानुजन् को आर्थिक सहयोग उपलब्ध कराया तथा मद्रास मे रह कर अनुसंधान कार्य जारी रखने का सुझाव दिया। वी रामास्वामी अयर के सहयोग से इनका अनुसंधान कार्य जनरल ऑफ इण्डियन मेथेमेटीकल सोसाइटी में प्रकाशित हुआ। प्रथम औपचारिक पत्र बरनूली की संख्या पर प्रकाशित किया था। जनरल के संपादक के अनुसार रामानुजन् का अनुसंधान बहुत ही मौलिक एवं मेधावी था मगर स्पष्टता की कमी के कारण अधिकांश लोग उनकी बातों को समझ ही नहीं पाते थे।

                            अच्छे दिनों की शुरुआत

1912 में रामानुजन् को मद्रास के एकाउन्टेन्ट जनरल के कार्यालय में 20 रुपए मासिक पर क्लर्क के अस्थायी पद पर कार्य मिल गया। रामानुजन् ने मद्रास पोर्ट ट्रस्ट के एकाउटेन्ट जनरल कार्यालय में भी नौकरी का आवेदन दे दिया था। आवेदन पत्र में गणित के अनुसंधान का व्यौरा देने क साथ ही प्रेसीडेन्सी कॉलेज के प्रोफेसर ई.डब्लू.मिडलमास्ट का प्रंशसा पत्र भी लगा दिया था। इनका प्रार्थना पत्र स्वीकार कर लिया गया। रामानुजन् को 30 रुपए मासिक का स्थायी पद प्राप्त हो गया। यहाँ अधिकारी तथा सहयोगियों की सदाशयता के कारण रामानुजन अपना कार्य जल्दी से पूरा कर शेष समय में गणित के अनुसंधान करने लगे।

शुभचिन्तकों के सुझाव पर रामानुजन् ने अंग्रेज गणितज्ञों का ध्यान अपने अनुसंधान कार्य की ओर दिलाने का प्रयास भी प्रारम्भ किया। युनिर्वसिटी कॉलेज लन्दन के गणितज्ञ एम. सी. एम. हिल गणित के प्रति रूचि रामानुजन् की से रुची से प्रभावित तो हुए मगर रामानुजन् की कमजोर अकादमिक पृष्टभूमि व कुछ अन्य कमियों के कारण उन्हें विद्यार्थी के रूप में स्वीकार नहीं कर सके। रामानुजन् निराश नहीं हुए। पुनः नया प्रारूप तैयार कर क्रेम्बिज विश्वविद्यालय के तीन गणितज्ञों को भेजा। दो ने. बिना किसी टिप्पणी के, इनके पत्र को लौटा दिया। केवल प्रोफेसर जी.एच.हार्डी ने रामानुजन् के कार्य में रुचि दिखलाई। प्रोफेसर जी.एच.हार्डी ने अपने सहयोगी जे.ई.लिटिलवुड के साथ मिलकर रामानुजन् के कार्य की गम्भीरता से जाँच की। पहले तो उन्हें भी रामानुजन् की खोजों की सत्यता पर सन्देह हुआ था। अन्त में प्रोफेसर जी.एच.हार्डी ने रामानुजन को अद्वितीय प्रतिभा का उत्कृष्ट गणितज्ञ स्वीकार कर लिया।

प्रोफेसर हार्डी ने पत्र लिखकर रामानुजन को इगलैण्ड आने का आग्रह किया। प्रोफेसर हार्डी ने भारत में नियुक्त अंग्रेज अधिकारियों से संपर्क कर रामानुजन के इ्रंग्लैण्ड जाने की सभी व्यवस्थाएं भी कर दी थी। रामानुजन् अपने संस्कार वश, विदेश यात्रा के, हार्डी के निमन्त्रण को स्वीकार नहीं कर सके। आभार स्वीकृति के पत्र के साथ, कुछ ओर प्रमेय प्रोफेसर हार्डी को भेज दिए। प्रोफेसर हार्डी ने ट्रिनिटि कॉलेज के पूर्व गणितज्ञ गिल्बर्ट वाकर को रामानुजन् का कार्य दिखाया। वाकर ने रामानुजन का कार्य देखा तो वे आष्चर्यचकित रह गए। गिल्बर्ट वाकर ने रामानुजन् को पत्र लिख कुछ समय केम्ब्रिज में बिताने का अनुरोध किया। इस आग्रह को, रामानुजन् के भारतीय शुभचिन्तकों ने, गम्भीरता से लिया। परिणाम स्वरूप मद्रास विश्वविद्यालय ने दो वर्ष के लिए 75 रुपए मासिक की छात्रवृति रामानुजन् को स्वीकृत कर दी। रामानुजन् अपना अनुसंधान कार्य जनरल ऑफ इण्डियन मेथेमेटीकल सोसाइटी में प्रकाशित कराते रहे। इस दौरान चकित करने वाली एक घटना हुई। रामानुजम् ने एक पॉलिश गणितज्ञ के अनुसंधान परिणाम, मूल पत्र के प्रकाशित होने से पूर्व ही, प्रकाशित कर दिए थे। रामानुजम् ने वह कार्य अपने पूर्व अनुमानों के बल पर किया था।

रामानुजन् के इंगलैण्ड जाने से इंकार करने की बात प्रोफेसर हार्डी को बुरी थी। वैज्ञानिक द्दष्टिकोण के कारण प्रोफेसर हार्डी ने रामानुजन को बुलाने का प्रयास त्यागा नहीं। कुछ समय बाद प्रोफेसर हार्डी का एक साथी ई.एच.नेविल भाषण के लिए मद्रास  आया। प्रोफेसर हार्डी ई.एच.नेविले से रामानुजन् से मिल कर, उन्हें इंलैण्ड आने के लिए समझाने का आग्रह किया था। नेविले का प्रयास सफल रहा। कहते है कि नामम्कल की नामगिरी देवी ने स्वप्न में, रामानुजन की मा को, रामानुजन को विदेश जाने देने का आदेश दिया था। रामानुजन की माँ ने उनके विदेष जाने का विरोध करना छोड़ दिया था। 17 मार्च  को मद्रास से प्रस्तान कर रामानुजन 14 अप्रेल 1914 को इंगलैण्उ पहुँच गए। ई.एच.नेविले कार लेकर, इंगलैण्ड के पोर्ट पर, रामानुजन का इन्तजार कर रहे थे। छः सप्ताह नेविले के घर रूकने के बाद रामानुजन  अलग मकान में रहने लगे थे।

दो विपरीत व्यक्तित्वों का संगम

केम्ब्रिज पहुँचते  ही रामानुजन् ने लिटिलवुड व हार्डी के साथ कार्य प्रारम्भ कर दिया था। रामानुजन् 120 प्रमेय पहले ही हार्डी को भेज चुके थे। रामानुजन् के नोट्स में और बहुत कुछ ऐसा था जिसको प्रकाश में लाया जाना शेष था। रामानुजन् के कार्य कि लिटिलवुड व हार्डी ने मुक्त कण्ठ से प्रशंसा की और उनकी तुलना जेकोबी तथा यूलर जैसे विद्वानों से की। मजे की बात यह थी कि हार्डी व रामानुजन् दो विपरीत संस्कृतियों के प्रतिनिधि थे। हार्डी नास्तिक विचारों व गणितीय सोच के व्यक्ति थे तो रामानुजन् पूर्ण धार्मिक तथा अंतरात्मा की आवाज पर कार्य करन वाले थे। फिर भी 5 वर्ष तक मिलकर कार्य किया। इस दौरान हार्डी ने रामानुजन् की कमियों को भरने का पूर्ण प्रयास किया।

हाईली कम्पोजिट नम्बर शीर्षक के अनुसंधान कार्य के आधार पर 1916 में रामानुजन् को बी.ए. की उपाधि प्रदान की गई। प्रोफेसर हार्डी की यह सदाशयता ने रामानुजन् के जीवन की एक बड़ी कमी को दूर कर दिया। यह उपाधि वह चाबी थी जिसने आगे की सफलता के सभी द्वार खोल दिए थे। बाद में उसी उपाधि को पी.एचडी. में बदल दिया गया था। रामानुजन् के शोध प्रबन्ध का सार जनरल ऑफ लन्दन मेथेमेटीकल सोसाइटी में 50 पृष्ठ के विस्तार से छपा था। प्रोफेसर हार्डी के अनुसार तब तक किसी अन्य का ऐसा विद्वतापूर्ण पत्र उस जनरल में नहीं छपा था।  रामानुजन् को लन्दन मेथेमेटीकल सोसाईटी तथा रॉयल सोसाइटी व ट्रिनिटी कॉलेज केब्रिज का सदस्य चुना गया। उर्दासियर कुर्सेतजी के बाद रॉयल सोसाइटी के लिए चुने जाने वाले रामानुजन दूसरे भारतीय सदस्य थे।
गणितीय अनुसंधान का अत्यधिक दबाब तथा अपर्याप्त भोजन के कारण रामानुजन बीमार हो गए। रामानुजन पूर्ण शाकाहारी थे। विश्वयुद्ध के कारण सही खाद्य-सामग्री उपलब्ध नहीं हो पारही थी। टीबी का रोगी बता कर रामानुजन को सेनीटोरियम में रखा गया।1919 में रामानुजन भारत लौट आए। भारत में रामानुजन के शुभचिन्तको ने उनका हर संभव ईलाज कराया। इस बार रामानुजन उभर नहीं सके। 26 अप्रेल 1920 को वे सदा के लिए हमसे बिछड़ गए।

रामानुजन् ने आधुनिक विश्व के गणित  मानचित्र पर भारत को विशिष्ट स्थान दिलाया। रामानुजन् ने यह भी प्रतिपादित किया कि आस्था मेधावी व्यक्ति के जीवन में महत्वपूर्ण स्थान रखती है। रामानुजन को सम्पूर्ण विश्व के गणितज्ञों का सम्मान मिला है। देश व तमिलनाडु राज्य विषेष रूप से रामानुजन को याद करता है। कई पुरस्कार तथा सम्मान उनकी याद में प्रदान किए जाते हैं। 10000 डालर का शास्त्रा रामानुजन पुरुस्कार महत्पूर्ण है। यह पुरुस्कार प्रतिवर्ष 32 वर्ष तक की उम्र के व्यक्ति को गणित में उल्लेखनीय कार्य करने हेतु दिया जाता है। यह पुरुस्कार कुम्बाकोनम में आयोजित एक समारोह में दिया जाता है। रामानुजन् कठिन परिस्थितियों में भी निरन्तर आगे बढ़ने के आदर्श के रूप में भारतीय प्रतिभाओं को प्रेरणा देते रहेंगे। श्रीनिवास रामानुजन की 125 वीं जयंती के उपलक्ष्य में वर्ष 2012 को राष्ट्रीय गणित वर्ष तथा श्रीनिवास रामानुजन के जन्म दिवस 22दिसंबर को राष्ट्रीय गणित दिवस घोषित किया है। इन आयोजनों की सार्थकता इस बात में निहित है कि रामानुजन जैसी प्रतिभाओं को पहचान कर उन्हें उसी तरह तराशा जावे जैसे प्रोफेसर हार्डी ने रामानुजन को तराशा था।

विष्णुप्रसाद चतुर्वेदी द्वारा 22nd April 2012 पोस्ट किया गया

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गणित के जादूगर: श्रीनिवास रामानुजन


गणित के जादूगर: श्रीनिवास रामानुजन

http://a-timetraveller.blogspot.com/2012/04/blog-post_25.html

(आज महान भारतीय गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन कि पुण्यतिथि है|  समययात्री इस महान व्यक्तित्व के बारे में जन्म से कहानियां सुनता चला आया है, और इन कहानियों से समययात्री भी हमेशा प्रभावित हुआ है| समय यात्री को एक महान गणितज्ञ को याद करते हुए गर्व महसूस हो रहा है……. )                          -मेहरबान राठौर         श्रीनिवास रामानुजन विश्व के महानतम गणितज्ञों में गिने जाते हैं। अगर विश्लेषण किया जाये तो हम पायेंगे कि श्रीनिवास रामानुजन अल्बर्ट आइन्सटीन के स्तर के, अपने समय के सबसे अधिक प्रतिभावान लोगों में से एक थे। सामान्यतः महान लोग दो प्रकार के माने जा सकते हैं- एक तो ऐसे महान लोग कि अगर कोई व्यक्ति सामान्य से सौ गुना मेहनत करे तो उन लोगों जैसा महान व्यक्तित्व बन सकता है, लेकिन कुछ महान लोग जादूगरों की तरह होते हैं, उनके काम की प्रशंसा तो आप कर सकते हैं, मगर उन जैसा काम आप मेहनत के बल पर नहीं कर सकते। रामानुजन दूसरे तरह के महानतम व्यक्तित्वों में से ही एक थे। उनके लिखे कई सूत्र या प्रमेय आज भी हल नहीं किये जा सके है, या कहें कि उनकी उपपत्ति आज भी उपलब्ध नहीं है, मगर उन सूत्रों का उपयोग विभिन्न क्षेत्रों में बहुत सफ़लता के साथ हो रहा है। पूरी दुनिया के तमाम महान वैज्ञानिक और गणितज्ञ रामानुजन के द्वारा लिखे गये सूत्रों पर आज भी गहन शोध कार्य कर रहे हैं।         यह अत्यन्त हर्ष का विषय है कि भारत में यह वर्ष “राष्ट्रीय गणित वर्ष” के रूप में मनाया जा रहा है। चेन्नई में सम्पन्न हुयी राष्टीय विज्ञान काँग्रेस में प्रसिद्ध भारतीय गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन के जन्म के 125वें वर्ष को राष्ट्रीय गणित वर्ष के रूप में मनाने का निर्णय लिया गया। यह सर्व विदित है कि श्रीनिवास रामानुजम का जन्म तमिलनाडु में इरोड में एक बहुत ही साधारण परिवार में 22 दिसम्बर, 1887 को हुआ था। अत्यन्त साधारण परिवार में जन्म लेने के बावजूद रामानुजम अद्वितीय प्रतिभा और तर्कशक्ति और सृजनात्मकता के धनी थे। रामानुजम बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि के बालक थे और मद्रास विश्वविद्यालय से सन 1903 में उन्होंने दसवीं की परीक्षा कई पुरस्कारों के साथ पास की। हाई स्कूल के बाद ही उन्हें अत्यन्त प्रतिष्ठित “सुब्रयमण्यम छात्रवृत्ति” प्रदान की गयी जो कि उस समय गणित और अंग्रेजी के बहुत उत्कृष्ट छात्रों को दी जाती थी। उनका मन गणित की कठिन से कठिन समस्याओं को सुलझाने में खूब लगता था, और इसी कारण वे अन्य विषयों में उचित ध्यान न दे पाने की वजह से  ग्यारहवीं कक्षा में फेल हो गये। इसके बाद कुछ वर्षों तक वे ट्यूशन पढाकर और बही खाते लिखने और मिलाकर अपनी आजीविका चलाते रहे। 1906 में उन्होंने एक बार फिर मद्रास के पचियप्पा कॉलेज में ग्यारहवीं में प्रवेश लिया, और सन 1907 में उन्होंने बारहवी कक्षा की परीक्षा असंस्थागत विद्याथी के रुप में दी मगर पास नहीं हो पाये। इस तरह उनकी परंपरागत शिक्षा यहीं समाप्त हो गयी। ज़िन्दगी के विभिन्न पहलुओं और कष्टों को लगातार झेलते हुये भी  उन्होंने गणित में अपना शोधकार्य सतत जारी रखा। रामानुजन का यह सफर अत्यन्त रोचक और प्रेरणादायी है।           इसी बीच 14 जुलाई, 1909 को रामानुजम का विवाह कुंभकोणम के पास राजेन्द्रम गाँव के सम्भ्रान्त परिवार वाले श्री रंगास्वामी की पुत्री जानकीअम्मल से हो गयी। इसके बाद वे नौकरी की तलाश में निकल पडे।  बहुत प्रयास करने के बावजूद उन्हें सफलता नहीं मिली तो उन्होंने अपने रिश्तेदार और पुराने मित्रों से इस सम्बन्ध में मदद माँगी। वे अपने पूर्व शिक्षक प्रोफेसर अय्यर की सिफारिश पर नैल्लोर के तत्कालीन जिलाधीश श्री आर. रामचंद्र राव से मिले जो कि उस समय इंडियम मैथमैटिकल सोसाइटी के अध्यक्ष भी थे। आर. रामचंद्र राव ने रामानुजम की नोटबुक देखकर (जिसमें उन्होंने सूत्रों और प्रमेय लिखे थे जिनकी उपपत्ति उन्होंने स्वयं की थी) काफी सोच विचार करके रामानुजम के लिये पच्चीस रुपये प्रतिमाह की व्यवस्था कर दी थी। सन 1911, की शुरुआत से लगभग एक साल तक रामानुजम को यह पारितोषिक प्राप्त होता रहा। इसी साल रामानुजम का प्रथम शोध पत्र “जनरल ऑफ इंडियन मैथमेटिकल सोसाइटी” में प्रकाशित हुआ। इस शोध पत्र में उन्होंने बरनौली संख्याओं के बारे में अध्य्यन किया था और इस शोध पत्र का शीर्षक था- “बरनौली संख्याओं की कुछ विशेषतायें” [जनरल ऑफ इंडियन मैथमेटिकल सोसाइटी, वर्ष-3 पृष्ठ219-234]। एक वर्ष तक की अवधि वाले पारितोषिक के खत्म होने के बाद 1 मार्च 1912 को उन्होंने मद्रास पोर्ट ट्र्स्ट में क्लास 3, चतुर्थ ग्रेड के क्लर्क के बतौर मात्र तीस रुपये प्रति माह के वेतन पर नौकरी शुरु कर दी। मद्रास पोर्ट ट्रस्ट की नौकरी करते हुये रामानुजम ने विशुद्ध गणित के अनेक क्षेत्रों में स्वतंत्र रुप से शोध कार्य किया, इस प्रक्रिया में वे किसी की मदद नहीं लेते थे और न ही उन्हें  उत्कृष्ट किताबें उपलब्ध थीं। शायद, गणित में शोध कार्य वे स्वांत सुखाय करते थे, उन्हें गणित के सूत्र हल करने में आन्तरिक आनन्द की प्राप्ति होती थी। रामानुजन ने एक बार कहा था, “यदि कोई गणितीय समीकरण अथवा सूत्र किसी भगवत विचार से मुझे नहीं भर देता तो वह मेरे लिये निरर्थक है।” रामानुजन सामान्यतः स्लेट और चॉक के साथ समीकरणों और सूत्रों का हल करते और जो निश्कर्ष निकलकर सामने आते उन्हें वे अपनी एक नोटबुक में लिख लेते थे। ऐसा वे शायद इस लिये करते थे क्यों कि उनके पास कागज और पेन की सहायता से शोध करने के लिये पर्याप्त धन की कमी थी। हालाँकि मद्रास पोर्ट ट्रस्ट में उनके पास जो काम होता था उसे वे अपनी गणितीय क्षमताओं के बल पर बहुत ही कम समय में पूरा कर देते थे और बाकी समय में कार्यालय के खराब कागजों पर सूत्र हल किया करते थे।        मद्रास पोर्ट ट्रस्ट में रामानुजन के अधिकारियों का रवैया बहुत ही सौहार्द पूर्ण था, वे रामानुजन की गणितीय क्षमताओं के प्रशंसक थे और चाहते थे कि रामानुजन गणित के क्षेत्र में अपना कार्य जारी रखें। रामचन्द्र राव भी रामानुजन का पूरा ध्यान रखते थे। उनके ही कहने पर मद्रास इंजीनियरिंग कालेज के प्रोफेसर सी.एल.टी. ग्रिफिथ ने रामानुजन के कार्य को विभिन्न प्रसिद्ध और जानकार गणितज्ञों के पास भेजा, जिनमें यूनीवर्सिटी कॉलेज लन्दन के प्रसिद्ध गणितज्ञ एम. जे. एम. हिल प्रमुख थे। प्रो. हिल ने रामानुजन को अपनी समझदारी और प्रस्तुतिकरण में सुधार के सम्बन्ध में कई बार बहुत अच्छे सुझाव दिये लेकिन उन्होंने रामानुजन को विशुद्ध गणित में शोध के क्षेत्र में स्थापित होने के लिये कोई अन्य महत्वपूर्ण प्रया नहीं किये।           इसके बाद रामानुजन ने कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के प्रमुख गणितज्ञों को पत्र लिखने शुरु किये और इन पत्रों के साथ अपने शोध कार्य के कुछ नमूने भी भेजे ताकि वे उनके कार्य का प्रथम दृष्टतया मूल्याँकन कर सकें। इसी बीच रामानुजन के ही एक पूर्व शिक्षक प्रो. शेषु अय्यर ने उन्हें प्रो.जी.एच. हार्डी को पत्र लिखने की सलाह दी। 16 जनवरी 1913 को पहली बार रामानुजन ने प्रो, हार्डी को पत्र लिखा और साथ में स्वयं द्वारा खोजी गयी प्रमेयों को भी अलग से संलग्न किया। संलग्न पृष्ठों में बीजगणित, त्रिकोंणमिति, और कैलकुलस की शब्दावली में अपने निश्कर्षों को लिखा था। रामनुजन ने प्रो. हार्डी को लगभग 120 प्रमेयों जो कि निश्चिततान्त्मक-समाकलन के मान निकालने, अनंत श्रेणियों के योग निकालने, श्रेणियों को समाकलनों से परिवर्तित करने, और इनका निकटतम मान निकालने आदि से सम्बन्धित थीं। प्रथमदृष्टतया प्रो. हार्डी को लगा कि कोई लडका शायद बडी बडी बातें कर रहा है, मगर चूंकि रामानुजन ने पत्र में अपनी प्रमेयों की उपपत्तियाँ नहीं लिखीं थी, अतः प्रो. हार्डी रामानुजन की प्रमेयों में उलझते चले गये, वे कुछ प्रमेयों के हल निकालने में असफल रहे, मगर उन्होंने पाया कि वे प्रमेय कई स्थानों पर प्रयोग करने पर सही सिद्ध होती थी। प्रो. हार्डी उस समय मात्र 35 वर्ष की आयु के होने के बावजूद इंग्लैड में गणित के क्षेत्र में नयी विचारधारा के प्रवर्तक के रुप में जाने जाते थे। इस प्रकार प्रो, हार्डी ने रामानुजन की प्रतिभा का लोहा माना और यह स्वीकार किया कि उन्हें पत्र लिखने वाला कोई साधारण लडका नहीं बल्कि असीम प्रतिभा का धनी गणितज्ञ है। इसके बाद प्रो. हार्डी ने रामानुजन को इंग्लैंड बुलाने के लिये निमंत्रण भी भेजा मगर रामानुजन उस समय विदेश जाने को तैयार नहीं हुये। इसी बीच उनका प्रो. हार्डी के साथ पत्र व्यवहार चलता रहा।            रामानुजन व्यक्तिगत कारणों से विदेश नहीं जाना चाह रहे थे, मगर बाद में 22 जनवरी, 1914 को प्रो.हार्डी को लिखे पत्र में वे इंग्लैड जाने के लिये सहमत हो गये।रामानुजन के इंग्लैंड जाने के लिये सहमत होने के पीछे भी एक कहानी प्रचलित है, जो कि लोगों में काफी प्रसिद्ध भी है। 17 मार्च, 1914 को वह समुद्री जहाज से इंग्लैडके लिये रवाना हो गये। तब तक रामानुजन गणितज्ञ के रुप में काफी प्रसिद्ध हो गये थे, और उन्हें जहाज पर छोडने आने वालों में कई गणमान्य लोग आये थे। 14 अप्रैल को वह टेम्स नदी के किनारे इंग्लैंड पहुंच गये, और अप्रैल के महीने में  ही कैम्ब्रिज में प्रो. हार्डी से मिलकर शोधकार्य शुरु कर दिया। यहाँ उन्होंने गणित के सिद्धान्तों को और अच्छी तरह से समझने के लिये कुछ अच्छे प्रोफेसरों की कक्षाओं में जाना शुरु कर दिया। धीरे धीरे रामानुजन ने अपनी प्रतिभा से सबको प्रभावित करना शुरु किया। मार्च 1916 में उन्हें कैन्ब्रिज विश्वविद्यालय के द्वारा अपने 62 पृष्ठों वाले अंग्रेजी में प्रकाशित शोध लेख “हाईली कम्पोजिट नम्बर्स” के आधार पर बी.ए. (शोध के द्वारा) की उपाधि दी गयी। सन 1915 से 1918 तक उन्होंने कई शोध पत्र लिखे। 6 दिसम्बर, 1917 को रामानुजन प्रो. हार्डी के प्रयासों से लंदन मैथमेटिकल सोसाइटी में चुन लिये गये। । इसके बाद, मई 1918 में रामानुजन को “रॉयल सोसाइटी ऑफ लन्दन” का फेलो चुन लिया गया। यह किसी भारतीय के लिये बहुत ही सम्मान की बात थी। इस बीच रामानुजन का स्वास्थ्य लगातार गिरता चला गया था। इन सम्मानों के कारण रामानुजन के उत्साह में पुनः परिवर्तन आया और उन्होंने प्रो. हार्डी को कई महत्वपूर्ण निष्कर्ष भेजे। इसके बाद उनका एक शोध पत्र “सम प्रोपरटीज ऑफ पी(एन), द नम्बर ऑफ पार्टीशन्स ऑफ ’एन’ प्रोसीडिंग्स ऑफ द कैम्ब्रिज फिलोसोफ़िकल सोसाइटी के सन 1919 के अंक में भी प्रकाशित हुआ। इसके तुरंत बाद, इसी वर्ष एक और शोध पत्र “प्रूफ ऑफ़ सर्टेन आइडेंटिटीज इन कंबीनेटोरियल एनालिसिस” भी इसी शोध जर्नल में प्रकाशित हुआ। इसके अलावा उनके दो महत्वपूर्ण शोध पत्र और प्रकाशित हुये जिनमें उन्होंने पार्टिशन फलनों और प्रथम एवं द्वितीय रोजर-रामानुजन के बीच सम्बन्ध स्थापित किये थे। 27 मार्च, 1919 को रामानुजन बम्बई आ गए। अपने चार साल के अल्प प्रवास में उन्होंने असाधारण उपलब्धियाँ प्राप्त कीं थी। उनके विशुद्ध गणित के क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण शोध पत्र प्रकाशित हो चुके थे और कई फ़ेलोशिप्स भी उन्हें मिल चुकी थीं। सबसे महत्वपूर्ण उपाधि रॉयल सोसाइटी ऑफ लन्दन से उन्हें अपना फ़ेलो  (एफ.आर. एस.) चुना जाना था। चार साल के अल्प प्रवास में इतनी बडी उपलब्धियाँ कोई असाधारण ही प्राप्त कर सकता है।          उनका स्वास्थ्य लगातार बिगड रहा था, मगर वे लगातार गणित में शोध कार्य करते जा रहे थे। अपने अन्तिम समय में उन्होंने मॉक थीटा फलन और फाल्स थीटा फलन पर शोध कार्य किया जो कि उनका सबसे महत्वपूर्ण और विशिष्ट कार्य माना जाता है। 12 जनवरी, 1920 को उन्होंने प्रो. हार्डी को एक पत्र लिखा जिसमें उन्होंने उन्होंने कई निष्कर्ष भेजे। इन निष्कर्षों में 4 तीसरी श्रेणी के. 10 पाँचवी श्रेणी आदि ”मॉक थीटा फलन” के कई नये सूत्र थे। उनका मॉक थीटा और क्यू-सीरीज पर किया गया कार्य विस्तृत है, कुल मिलाकर इसमें 650 सूत्र हैं। 26 अप्रैल, 1920 को रामानुजन लम्बे समय तक खराब स्वास्थ्य के कारण सुबह ही अचेत हो गये और कुछ घन्टों बाद वह चिर निद्रा में सो गये।           रामानुजन के सुत्रों पर विदेशों में उत्कृष्ट विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों के प्रतिभावान वैज्ञानिक शोध कार्य में लगे हुये है। रामानुजन को भौतिकी के अल्बर्ट आइन्स्टीन की कोटि का गणितज्ञ कहा जाना चाहिये, जिन्होंने गणित में बिना किसी औपचारिक शिक्षा के ग्रहण किये भी गणित के विकास की दिशा को न सिर्फ़ प्रभावित किया बल्कि नये आयाम दिये। रामानुजन भारतीय प्रतिभा के प्रतीक हैं और सिरमौर भी। उनके जन्म की 125वीं वर्षगाँठ को भारत “राष्ट्रीय गणित वर्ष” के रुप में मना रहा है। रामानुजन अपने शोध कार्य और गणितीय प्रतिभा के कारण अनन्त काल तक हमें प्रेरणा देते रहेंगे।

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श्‍व का महान गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन आयंगर


 विश्‍व का महान गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन आयंगर

http://www.scientificworld.in/2012/08/srinivasa-ramanujan-iyengar.html

 लेखक-डॉ0 ज़ाकिर अली ‘रजनीश’
 
कहावत है कि प्रतिभा किसी उम्र की मोहताज नहीं होती। इस बात को प्रमाणित किया 22 दिसम्बर, 1887 को मद्रास से 400 किमी0 दूर इरोड नामक एक छोटे से कस्बे में जन्में एक महान गणितज्ञ ने। यह गणितज्ञ सिर्फ 33 वर्ष की अवस्था तक जीवित रहा, लेकिन इस छोटी सी उम्र में भी उसने गणित के क्षेत्र में ऐसी महत्वपूर्ण स्थापनाएँ दी, जिनसे सारा विश्‍व चमत्कृत हो उठा। उस महान गणितज्ञ का नाम है श्रीनिवास रामानुजन आयंगर।
रामानुजन का जन्म एक गरीब ब्राह्मण परिवार में हुआ। उनके पिता आजीविका के लिए मंदिर में वेद-पाठ किया करते थे। इसके साथ ही साथ वे एक दुकानदर का बही-खाता लिखने का भी कार्य करते थे।
रामानुजन की प्रारम्भिक शिक्षा 05 वर्ष की आयु में तमिल माध्यम से प्रारम्भ हुई। वे बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि के थे। यही कारण था कि उन्होंने हाई स्कूल की परीक्षा में सर्वोच्च स्थान प्राप्त किया। उस समय उनकी आयु 10 वर्ष थी। उनकी इस प्रतिभा के कारण उन्हें स्कूल की तरफ से छात्रवृत्ति प्राप्त हुई। किन्तु गणित में अत्यधित रूचि लेने के कारण वे इण्टर प्रथम वर्ष की परीक्षा में फेल हो गये, जिससे उनकी छात्रवृत्ति बंद हो गयी और वे आगे नहीं पढ़ सके।
रामानुजन के मन में बचपन से ही गणित के प्रति बेहद रूझान था। वे गणित की पहेलियाँ सुना कर अपने साथियों का मनोरंजन किया करते थे। उनकी प्रतिभा का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जब वे सातवीं में थे, तो अपने पड़ोस के बी.ए. के लड़के को गणित पढ़ाया करते थे। पढा़ई छूटने के बाद रामानुजन घर पर रहकर गणित के सम्बंध में शोधकार्य करने लगे। यह देखकर उनके पिता बेहद निराश हो गये। इसलिए उन्होंने 1909 में जानकी देवी के साथ रामानुजन का विवाह करा दिया।
विवाह के पष्चात रामानुजन के सामने घर चलाने की समस्या आ खड़ी हुई। ऐसे समय में नेल्लूर के कलक्टर दीवान बहादुर आर. रामचंद्र राव ने उनकी भरपूर मदद की। उनकी मदद से रामानुजन को मद्रास पोर्ट ट्रस्ट के आफिस में 30 रूपये मासिक की नौकरी प्राप्त हो गयी और उनका जीवन आराम से कटने लगा।
23 वर्ष की अवस्था में रामानुजन का एक लेख एक गणित की पत्रिका में प्रकाशित हुआ। उसे पढ़कर मद्रास इंजीरियरिंग कॉलेज के प्राध्यापक ग्रिफीथ महाशय ने उन्हें कैम्ब्रिज विश्‍वविद्यालय के प्रोफेसर जी.एच. हार्डी को पत्र लिखने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने साथ ही अपनी कुछ प्रमेय भी प्रो0 हार्डी को भेजने की सलाह दी।
प्रो0 हार्डी उस समय के जाने-माने गणितज्ञ थे। रामानुजन की प्रमेय देखकर उन्होंने उनकी प्रतिभा को फौरन पहचान लिया। उन्हें विश्‍वास हो गया कि यदि इस लड़के को गणित की कुछ मूलभूत जानकारी मिल जाए, तो यह गणित के क्षेत्र में हलचल मचा सकता है। प्रो0 हार्डी ने न सिर्फ रामानुजन का उत्साहवर्द्धन किया वरन अपने व्यक्तिगत प्रयासों से लंदन भी बुला भेजा।
डॉ0 हार्डी के अथक प्रयासों की बदौलत 17 मार्च 1914 को रामानुजन इंग्लैण्ड के लिए रवाना हुए। वहाँ पर उन्होंने प्रो. हार्डी एवँ प्रो. लिटिलवुड के निर्देशन में ट्रिनिटी कॉलेज में दाखिला लिया तथा अपना अध्ययन कार्य प्रारम्भ किया।
रामानुजन का जन्म एक कट्टर धार्मिक परिवार में हुआ था। वह नियम के पक्के व्यक्ति थे। वे इंग्लैण्ड जैसे अत्यंत ठण्डे देश में भी नियम से प्रातःकाल उठकर स्नान करते थे। वे शुद्ध शाकाहारी व्यक्ति थे और लहसुन प्याज ही नहीं टमाटर तक से परहेज करते थे। खान-पान की इस आदत के कारण उन्हें अपना खाना स्वयँ ही बनाना पड़ता था। इसका दुष्प्रभाव यह होता था कि न चाहते हुए भी उनका बहुत सा समय इन सब कामों में निकल जाता था।
रामानुजन ने इंग्लैण्ड में रहकर बहुत थोड़े ही समय में अपनी धाक जमा दी। उन्होंने प्रो0 हार्डी के निर्देशन में अध्ययन करते हुए गणित सम्बंधी अनेक स्थापनाएँ दीं, जो 1914 से 1916 के मध्य विभिन्न शोधपत्रों में प्रकाशित हुईं। उनके इन शोधकार्यों से सारे संसार में हलचल मच गयी। उनकी योग्यता को दृष्टिगत रखते हुए 28 फरवरी 1918 को रॉयल सोसायटी ने उन्हें अपना सदस्य बना कर सम्मानित किया। इस घटना के कुछ ही समय बाद ट्रिनिटी कॉलेज ने भी उन्हें अपना फैलो चुनकर सम्मानित किया।
एक तो रामानुजन का दुबला-पतला शरीर, दूसरे लंदन का बेहद ठण्डा मौसम, उस पर खानपान की उचित व्यवस्था का अभाव। ऐसे में रामानुजन को क्षय रोग ने घेर लिया। उस समय तक क्षय रोग का कारगर इलाज उपलब्ध नहीं था। सिर्फ आराम और समुचित डॉक्टरी देखरेख ही उन्हें बचा सकती थी। लेकिन रामानुजन की गणित की दीवानगी ने उन्हें चैन से नहीं बैठने दिया। इससे उनकी तबियत बिगड़ती गयी और अतः 27 फरवरी 1919 को उन्हें भारत लौटना पड़ा।
अब तक रामानुजन का स्वास्थ्य बहुत बिगड़ चुका था। डॉक्टरों ने उन्हें पूर्ण आराम की सलाह दी। लेकिन रामानुजन भला गणित को छोड़ कर कैसे रह पाते? नतीजतन उनकी बीमारी बढ़ती चली गयी और 26 अप्रैल 1920 को कावेरी नदी के तट पर स्थित कोडुमंडी गाँव में 33 वर्ष की अल्पायु में उनका निधन हो गया।
रामानुजन सन 1903 से 1914 के बीच, कैम्ब्रिज जाने से पहले, गणित की 3,542 प्रमेय लिख चुके थे। उनकी इन तमाम नोटबुकों को बाद में ‘टाटा इंस्टीट्यूट आफ फंडामेंटल रिसर्च बाम्बे’ (मुम्बई) ने प्रकाशित किया। इन नोट्स पर इलिनॉय विश्वविद्यालय के गणितज्ञ प्रो0 ब्रूस सी. बर्नाड्ट ने 20 वर्षों तक शोध किया और अपने शोध पत्र को पाँच खण्डों में प्रकाशित कराया।

रामानुजन एक विलक्षण गणितज्ञ थे। वे रोग के दौरान भी अपनी शय्या पर लेटे-लेटे गणितीय परिकल्पनाएँ हल किया करते थे। एक बार जब वे अस्पताल में भर्ती थे तो प्रो. हार्डी उन्हें देखने आए। हार्डी जिस टैक्सी में आए थे उसका नं. था 1729 (7 X 13 X 19)। प्रो0 हार्डी को यह संख्या अशुभ लगी। यह सुनकर रामानुजन बोले- यह वह सबसे छोटी संख्या है, जिसे हम दो घन संख्याओं के जोड़ से दो प्रकार से व्यक्त कर सकते हैं-

रामानुजन की गणितीय प्रतिभा का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनके निधन के लगभग 90 वर्ष व्यतीत होने जाने के बाद भी उनकी बहुत सी प्रमेय अनसुलझी बनी हुई हैं। उनकी इस विलक्षण प्रतिभा के प्रति सम्मान प्रकट करते हुए भारत सरकार ने उनकी 125वीं जयंती के उपलक्ष्य में वर्ष 2012 को ‘राष्ट्रीय गणित वर्ष’ के रूप में मनाने का निष्चय किया है। इसके अतिरिक्त प्रत्येक वर्ष उनका जन्म दिवस (22 दिसम्बर) ‘राष्ट्रीय गणित दिवस’ के रूप में भी मनाया जाएगा।
(बालवाणी: जुलाई-अगस्‍त, 2012 के अंक में प्रकाशित)
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श्रीनिवास रामानुजन्


श्रीनिवास रामानुजन्

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श्रीनिवास रामानुजन्

श्रीनिवास रामानुजन् (1887-1920)
जन्म 22 दिसम्बर, 1887
इरोड, तमिल नाडु
मृत्यु 26 अप्रैल, 1920
चेटपट, (चेन्नई), तमिल नाडु
आवास Flag of India.svg भारत, Flag of the United Kingdom.svg संयुक्त राजशाही
राष्ट्रीयता Flag of India.svg भारतीय
क्षेत्र गणित
शिक्षा कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय
डॉक्टरी सलाहकार गॉडफ्रे हेरॉल्ड हार्डी और जॉन इडेन्सर लिटलवुड
प्रसिद्धि लैंडॉ-रामानुजन् स्थिरांक
रामानुजन्-सोल्डनर स्थिरांक
रामानुजन् थीटा फलन
रॉजर्स-रामानुजन् तत्समक
रामानुजन् अभाज्य
कृत्रिम थीटा फलनs

रामानुजन् योग

श्रीनिवास रामानुजन् इयंगर (तमिल ஸ்ரீனிவாஸ ராமானுஜன் ஐயங்கார்) (22 दिसम्बर 1887 – 26 अप्रैल 1920) एक महान भारतीयगणितज्ञ थे। इन्हें आधुनिक काल के महानतम गणित विचारकों में गिना जाता है। इन्हें गणित में कोई विशेष प्रशिक्षण नहीं मिला, फिर भी इन्होंने विश्लेषण एवं संख्या सिद्धांत के क्षेत्रों में गहन योगदान दिए। इन्होंने अपने प्रतिभा और लगन से न केवल गणित के क्षेत्र में अद्भुत अविष्कार किए वरन भारत को अतुलनीय गौरव भी प्रदान किया।

ये बचपन से ही विलक्षण प्रतिभावान थे। इन्होंने खुद से गणित सीखा और अपने जीवनभर में गणित के 3,884 प्रमेयों का संकलन किया। इनमें से अधिकांश प्रमेय सही सिद्ध किये जा चुके हैं। इन्होंने गणित के सहज ज्ञान और बीजगणित प्रकलन की अद्वितीय प्रतिभा के बल पर बहुत से मौलिक और अपारम्परिक परिणाम निकाले जिनसे प्रेरित शोध आज तक हो रहा है, यद्यपि इनकी कुछ खोजों को गणित मुख्यधारा में अब तक नहीं अपनाया गया है। हाल में इनके सूत्रों को क्रिस्टल-विज्ञान में प्रयुक्त किया गया है। इनके कार्य से प्रभावित गणित के क्षेत्रों में हो रहे काम के लिये रामानुजन जर्नल की स्थापना की गई है।

आरंभिक जीवनकाल

रामानुजन का जन्म 22 दिसम्बर1887 को भारत के दक्षिणी भूभाग में स्थित कोयंबटूर के ईरोड नामके गांव में हुआ था। वह पारंपरिक ब्राह्मण परिवार में जन्मे थे। इनकी की माता का नाम कोमलताम्मल और इनके पिता का नाम श्रीनिवास अय्यंगर था। इनका बचपन मुख्यतः कुंभकोणम में बीता था जो कि अपने प्राचीन मंदिरों के लिए जाना जाता है। बचपन में रामानुजन का बौद्धिक विकास सामान्य बालकों जैसा नहीं था। यह तीन वर्ष की आयु तक बोलना भी नहीं सीख पाए थे। जब इतनी बड़ी आयु तक जब रामानुजन ने बोलना आरंभ नहीं किया तो सबको चिंता हुई कि कहीं यह गूंगे तो नहीं हैं। बाद के वर्षों में जब उन्होंने विद्यालय में प्रवेश लिया तो भी पारंपरिक शिक्षा में इनका कभी भी मन नहीं लगा। रामानुजन ने दस वर्षों की आयु में प्राइमरी परीक्षा में पूरे जिले में सबसे अधिक अंक प्राप्त किया और आगे की शिक्षा के लिए टाउन हाईस्कूल पहुंचे। रामानुजन को प्रश्न पूछना बहुत पसंद था। उनके प्रश्न अध्यापकों को कभी-कभी बहुत अटपटे लगते थे। जैसे कि-संसार में पहला पुरुष कौन था? पृथ्वी और बादलों के बीच की दूरी कितनी होती है? रामानुजन का व्यवहार बड़ा ही मधुर था। इनका सामान्य से कुछ अधिक स्थूल शरीर और जिज्ञासा से चमकती आखें इन्हें एक अलग ही पहचान देती थीं। इनके सहपाठियों के अनुसार इनका व्यवहार इतना सौम्य था कि कोई इनसे नाराज हो ही नहीं सकता था। विद्यालय में इनकी प्रतिभा ने दूसरे विद्यार्थियों और शिक्षकों पर छाप छोड़ना आरंभ कर दिया। इन्होंने स्कूल के समय में ही कालेज के स्तर के गणित को पढ़ लिया था। एक बार इनके विद्यालय के प्रधानाध्यापक ने यह भी कहा था कि विद्यालय में होने वाली परीक्षाओं के मापदंड रामानुजन के लिए लागू नहीं होते हैं। हाईस्कूल की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद इन्हें गणित और अंग्रेजी मे अच्छे अंक लाने के कारण सुब्रमण्यम छात्रवृत्ति मिली और आगे कालेज की शिक्षा के लिए प्रवेश भी मिला।
आगे एक परेशानी आई। रामानुजन का गणित के प्रति प्रेम इतना बढ़ गया था कि वे दूसरे विषयों पर ध्यान ही नहीं देते थे। यहां तक की वे इतिहास, जीव विज्ञान की कक्षाओं में भी गणित के प्रश्नों को हल किया करते थे। नतीजा यह हुआ कि ग्यारहवीं कक्षा की परीक्षा में वे गणित को छोड़ कर बाकी सभी विषयों में फेल हो गए और परिणामस्वरूप उनको छात्रवृत्ति मिलनी बंद हो गई। एक तो घर की आर्थिक स्थिति खराब और ऊपर से छात्रवृत्ति भी नहीं मिल रही थी। रामानुजन के लिए यह बड़ा ही कठिन समय था। घर की स्थिति सुधारने के लिए इन्होने गणित के कुछ ट्यूशन तथा खाते-बही का काम भी किया। कुछ समय बाद 1907 में रामानुजन ने फिर से बारहवीं कक्षा की प्राइवेट परीक्षा दी और अनुत्तीर्ण हो गए। और इसी के साथ इनके पारंपरिक शिक्षा की इतिश्री हो गई।

रामानुजन का पैत्रिक आवास

औपचारिक शिक्षा की समाप्ति और संघर्ष का समय

विद्यालय छोड़ने के बाद का पांच वर्षों का समय इनके लिए बहुत हताशा भरा था। भारत इस समय परतंत्रता की बेड़ियों में जकड़ा था। चारों तरफ भयंकर गरीबी थी। ऐसे समय में रामानुजन के पास न कोई नौकरी थी और न ही किसी संस्थान अथवा प्रोफेसर के साथ काम करने का मौका। बस उनका ईश्वर पर अटूट विश्वास और गणित के प्रति अगाध श्रद्धा ने उन्हें कर्तव्य मार्ग पर चलने के लिए सदैव प्रेरित किया। नामगिरी देवी रामानुजन के परिवार की ईष्ट देवी थीं। उनके प्रति अटूट विश्वास ने उन्हें कहीं रुकने नहीं दिया और वे इतनी विपरीत परिस्थितियों में भी गणित के अपने शोध को चलाते रहे। इस समय रामानुजन को ट्यूशन से कुल पांच रूपये मासिक मिलते थे और इसी में गुजारा होता था। रामानुजन का यह जीवन काल बहुत कष्ट और दुःख से भरा था। इन्हें हमेशा अपने भरण-पोषण के लिए और अपनी शिक्षा को जारी रखने के लिए इधर उधर भटकना पड़ा और अनेक लोगों से असफल याचना भी करनी पड़ी।

विवाह और गणित साधना

वर्ष 1908 में इनके माता पिता ने इनका विवाह जानकी नामक कन्या से कर दिया। विवाह हो जाने के बाद अब इनके लिए सब कुछ भूल कर गणित में डूबना संभव नहीं था। अतः वे नौकरी की तलाश में मद्रास आए। बारहवीं की परीक्षा उत्तीर्ण न होने की वजह से इन्हें नौकरी नहीं मिली और उनका स्वास्थ्य भी बुरी तरह गिर गया। अब डॉक्टर की सलाह पर इन्हें वापस अपने घर कुंभकोणम लौटना पड़ा। बीमारी से ठीक होने के बाद वे वापस मद्रास आए और फिर से नौकरी की तलाश शुरू कर दी। ये जब भी किसी से मिलते थे तो उसे अपना एक रजिस्टर दिखाते थे। इस रजिस्टर में इनके द्वारा गणित में किए गए सारे कार्य होते थे। इसी समय किसी के कहने पर रामानुजन वहां के डिप्टी कलेक्टर श्री वी. रामास्वामी अय्यर से मिले। अय्यर गणित के बहुत बड़े विद्वान थे। यहां पर श्री अय्यर ने रामानुजन की प्रतिभा को पहचाना और जिलाधिकारी श्री रामचंद्र राव से कह कर इनके लिए 25 रूपये मासिक छात्रवृत्ति का प्रबंध भी कर दिया। इस वृत्ति पर रामानुजन ने मद्रास में एक साल रहते हुए अपना प्रथम शोधपत्र प्रकाशित किया। शोध पत्र का शीर्षक था “बरनौली संख्याओं के कुछ गुण” और यह शोध पत्र जर्नल ऑफ इंडियन मैथेमेटिकल सोसाइटी में प्रकाशित हुआ था। यहां एक साल पूरा होने पर इन्होने मद्रास पोर्ट ट्रस्ट में क्लर्क की नौकरी की। सौभाग्य से इस नौकरी में काम का बोझ कुछ ज्यादा नहीं था और यहां इन्हें अपने गणित के लिए पर्याप्त समय मिलता था। यहां पर रामानुजन रात भर जाग कर नए-नए गणित के सूत्र लिखा करते थे और फिर थोड़ी देर तक आराम कर के फिर दफ्तर के लिए निकल जाते थे। रामानुजन गणित के शोधों को स्लेट पर लिखते थे। और बाद में उसे एक रजिस्टर में लिख लेते थे। रात को रामानुजन के स्लेट और खड़िए की आवाज के कारण परिवार के अन्य सदस्यों की नींद चौपट हो जाती थी।

प्रोफेसर हार्डी के साथ पत्रव्यावहार

इस समय भारतीय और पश्चिमी रहन सहन में एक बड़ी दूरी थी और इस वजह से सामान्यतः भारतीयों को अंग्रेज वैज्ञानिकों के सामने अपने बातों को प्रस्तुत करने में काफी संकोच होता था। इधर स्थिति कुछ ऐसी थी कि बिना किसी अंग्रेज गणितज्ञ की सहायता लिए शोध कार्य को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता था। इस समय रामानुजन के पुराने शुभचिंतक इनके काम आए और इन लोगों ने रामानुजन द्वारा किए गए कार्यों को लंदन के प्रसिद्ध गणितज्ञों के पास भेजा। पर यहां इन्हें कुछ विशेष सहायता नहीं मिली लेकिन एक लाभ यह हुआ कि लोग रामानुजन को थोड़ा बहुत जानने लगे थे। इसी समय रामानुजन ने अपने संख्या सिद्धांत के कुछ सूत्र प्रोफेसर शेषू अय्यर को दिखाए तो उनका ध्यान लंदन के ही प्रोफेसर हार्डी की तरफ गया। प्रोफेसर हार्डी उस समय के विश्व के प्रसिद्ध गणितज्ञों में से एक थे। और अपने सख्त स्वभाव और अनुशासन प्रियता के कारण जाने जाते थे। प्रोफेसर हार्डी के शोधकार्य को पढ़ने के बाद रामानुजन ने बताया कि उन्होने प्रोफेसर हार्डी के अनुत्तरित प्रश्न का उत्तर खोज निकाला है। अब रामानुजन का प्रोफेसर हार्डी से पत्रव्यवहार आरंभ हुआ। अब यहां से रामानुजन के जीवन में एक नए युग का सूत्रपात हुआ जिसमें प्रोफेसर हार्डी की बहुत बड़ी भूमिका थी। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो जिस तरह से एक जौहरी हीरे की पहचान करता है और उसे तराश कर चमका देता है, रामानुजन के जीवन में वैसा ही कुछ स्थान प्रोफेसर हार्डी का है। प्रोफेसर हार्डी आजीवन रामानुजन की प्रतिभा और जीवन दर्शन के प्रशंसक रहे। रामानुजन और प्रोफेसर हार्डी की यह मित्रता दोनो ही के लिए लाभप्रद सिद्ध हुई। एक तरह से देखा जाए तो दोनो ने एक दूसरे के लिए पूरक का काम किया। प्रोफेसर हार्डी ने उस समय के विभिन्न प्रतिभाशाली व्यक्तियों को 100 के पैमाने पर आंका था। अधिकांश गणितज्ञों को उन्होने 100 में 35 अंक दिए और कुछ विशिष्ट व्यक्तियों को 60 अंक दिए। लेकिन उन्होंने रामानुजन को 100 में पूरे 100 अंक दिए थे।

आरंभ में रामानुजन ने जब अपने किए गए शोधकार्य को प्रोफेसर हार्डी के पास भेजा तो पहले उन्हें भी पूरा समझ में नहीं आया। जब उन्होंने अपने मित्र गणितज्ञों से सलाह ली तो वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि रामानुजन गणित के क्षेत्र में एक दुर्लभ व्यक्तित्व है और इनके द्वारा किए गए कार्य को ठीक से समझने और उसमें आगे शोध के लिए उन्हें इंग्लैंड आना चाहिए। अतः उन्होने रामानुजन को कैंब्रिज आने के लिए आमंत्रित किया।

विदेश गमन

कुछ व्यक्तिगत कारणों और धन की कमी के कारण रामानुजन ने प्रोफेसर हार्डी के कैंब्रिज के आमंत्रण को अस्वीकार कर दिया। प्रोफेसर हार्डी को इससे निराशा हुई लेकिन उन्होनें किसी भी तरह से रामानुजन को वहां बुलाने का निश्चय किया। इसी समय रामानुजन को मद्रास विश्वविद्यालय में शोध वृत्ति मिल गई थी जिससे उनका जीवन कुछ सरल हो गया और उनको शोधकार्य के लिए पूरा समय भी मिलने लगा था। इसी बीच एक लंबे पत्रव्यवहार के बाद धीरे-धीरे प्रोफेसर हार्डी ने रामानुजन को कैंब्रिज आने के लिए सहमत कर लिया। प्रोफेसर हार्डी के प्रयासों से रामानुजन को कैंब्रिज जाने के लिए आर्थिक सहायता भी मिल गई। रामानुजन ने इंग्लैण्ड जाने के पहले गणित के करीब 3000 से भी अधिक नये सूत्रों को अपनी नोटबुक में लिखा था।

रामानुजन ने लंदन की धरती पर कदम रखा। वहां प्रोफेसर हार्डी ने उनके लिए पहले से व्ववस्था की हुई थी अतः इन्हें कोई विशेष परेशानी नहीं हुई। इंग्लैण्ड में रामानुजन को बस थोड़ी परेशानी थी और इसका कारण था उनका शर्मीला, शांत स्वभाव और शुद्ध सात्विक जीवनचर्या। अपने पूरे इंग्लैण्ड प्रवास में वे अधिकांशतः अपना भोजन स्वयं बनाते थे। इंग्लैण्ड की इस यात्रा से उनके जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन आया। उन्होंने प्रोफेसर हार्डी के साथ मिल कर उच्चकोटि के शोधपत्र प्रकाशित किए। अपने एक विशेष शोध के कारण इन्हें कैंब्रिज विश्वविद्यालय द्वारा बी.ए. की उपाधि भी मिली। लेकिन वहां की जलवायु और रहन-सहन की शैली उनके अधिक अनुकूल नहीं थी और उनका स्वास्थ्य खराब रहने लगा। डॉक्टरों ने इसे क्षय रोग बताया। उस समय क्षय रोग की कोई दवा नहीं होती थी और रोगी को सेनेटोरियम मे रहना पड़ता था। रामानुजन को भी कुछ दिनों तक वहां रहना पड़ा। वहां इस समय भी यह गणित के सूत्रों में नई नई कल्पनाएं किया करते थे।

रॉयल सोसाइटी की सदस्यता

इसके बाद वहां रामानुजन को रॉयल सोसाइटी का फेलो नामित किया गया। ऐसे समय में जब भारत गुलामी में जी रहा था तब एक अश्वेत व्यक्ति को रॉयल सोसाइटी की सदस्यता मिलना एक बहुत बड़ी बात थी। रॉयल सोसाइटी के पूरे इतिहास में इनसे कम आयु का कोई सदस्य आज तक नहीं हुआ है। पूरे भारत में उनके शुभचिंतकों ने उत्सव मनाया और सभाएं की। रॉयल सोसाइटी की सदस्यता के बाद यह ट्रिनीटी कॉलेज की फेलोशिप पाने वाले पहले भारतीय भी बने। अब ऐसा लग रहा था कि सब कुछ बहुत अच्छी जगह पर जा रहा है। लेकिन रामानुजन का स्वास्थ्य गिरता जा रहा था और अंत में डॉक्टरों की सलाह पर उन्हें वापस भारत लौटना पड़ा। भारत आने पर इन्हें मद्रास विश्वविद्यालय में प्राध्यापक की नौकरी मिल गई। और रामानुजन अध्यापन और शोध कार्य में पुनः रम गए।

स्वदेश आगमन

भारत लौटने पर भी स्वास्थ्य ने इनका साथ नहीं दिया और हालत गंभीर होती जा रही थी। इस बीमारी की दशा में भी इन्होने मॉक थीटा फंक्शन पर एक उच्च स्तरीय शोधपत्र लिखा। रामानुजन द्वारा प्रतिपादित इस फलन का उपयोग गणित ही नहीं बल्कि चिकित्साविज्ञान में कैंसर को समझने के लिए भी किया जाता है।

मृत्यु

इनका गिरता स्वास्थ्य सबके लिए चिंता का विषय बन गया और यहां तक की अब डॉक्टरों ने भीजवाब दे दिया था। अंत में रामानुजन के विदा की घड़ी आ ही गई। 26 अप्रैल1920 के प्रातः काल में वे अचेत हो गए और दोपहर होते होते उन्होने प्राण त्याग दिए। इस समय रामानुजन की आयु मात्र 33 वर्ष थी। इनका असमय निधन गणित जगत के लिए अपूरणीय क्षति था। पूरे देश विदेश में जिसने भी रामानुजन की मृत्यु का समाचार सुना वहीं स्तब्ध हो गया।

रामानुजन की कार्यशैली और शोध

रामानुजन और इनके द्वारा किए गए अधिकांश कार्य अभी भी वैज्ञानिकों के लिए अबूझ पहेली बने हुए हैं। एक बहुत ही सामान्य परिवार में जन्म ले कर पूरे विश्व को आश्चर्यचकित करने की अपनी इस यात्रा में इन्होने भारत को अपूर्व गौरव प्रदान किया। इनका उनका वह पुराना रजिस्टर जिस पर वे अपने प्रमेय और सूत्रों को लिखा करते थे 1976 में अचानक ट्रिनीटी कॉलेज के पुस्तकालय में मिला। करीब एक सौ पन्नों का यह रजिस्टर आज भी वैज्ञानिकों के लिए एक पहेली बना हुआ है। इस रजिस्टर को बाद में रामानुजन की नोट बुक के नाम से जाना गया। मुंबई के टाटा मूलभूत अनुसंधान संस्थान द्वारा इसका प्रकाशन भी किया गया है। रामानुजन के शोधों की तरह उनके गणित में काम करने की शैली भी विचित्र थी। वे कभी कभी आधी रात को सोते से जाग कर स्लेट पर गणित से सूत्र लिखने लगते थे और फिर सो जाते थे। इस तरह ऐसा लगता था कि वे सपने में भी गणित के प्रश्न हल कर रहे हों। रामानुजन के नाम के साथ ही उनकी कुलदेवी का भी नाम लिया जाता है। इन्होने शून्य और अनन्त को हमेशा ध्यान में रखा और इसके अंतर्सम्बन्धों को समझाने के लिए गणित के सूत्रों का सहारा लिया। रामानुजन के कार्य करने की एक विशेषता थी। पहले वे गणित का कोई नया सूत्र या प्रमेंय पहले लिख देते थे लेकिन उसकी उपपत्ति पर उतना ध्यान नहीं देते थे। इसके बारे में पूछे जाने पर वे कहते थे कि यह सूत्र उन्हें नामगिरी देवी की कृपा से प्राप्त हुए हैं। रामानुजन का आध्यात्म के प्रति विश्वास इतना गहरा था कि वे अपने गणित के क्षेत्र में किये गए किसी भी कार्य को आध्यात्म का ही एक अंग मानते थे। वे धर्म और आध्यात्म में केवल विश्वास ही नहीं रखते थे बल्कि उसे तार्किक रूप से प्रस्तुत भी करते थे। वे कहते थे कि “मेरे लिए गणित के उस सूत्र का कोई मतलब नहीं है जिससे मुझे आध्यात्मिक विचार न मिलते हों।”

गणितीय कार्य एवं उपलब्धियाँ

रामानुजन ने इंग्लैण्ड में पाँच वर्षों तक मुख्यतः संख्या सिद्धान्त के क्षेत्र में काम किया।

सूत्र

रामानुजन् ने निम्नलिखित सूत्र प्रतिपादित किया-

 1+\frac{1}{1\cdot 3} + \frac{1}{1\cdot 3\cdot 5} + \frac{1}{1\cdot 3\cdot 5\cdot 7} + \frac{1}{1\cdot 3\cdot 5\cdot 7\cdot 9} + \cdots + {{1\over 1 + {1\over 1 + {2\over 1 + {3\over 1 + {4\over 1 +                                     {5\over 1 + \cdots }}}}}}} = \sqrt{\frac{e\cdot\pi}{2}}

इस सूत्र की विशेषता यह है कि यह गणित के दो सबसे प्रसिद्ध नियतांकों (‘पाई’ तथा ‘ई’) का सम्बन्ध एक अनन्त सतत भिन्न के माध्यम से व्यक्त करता है।

पाई के लिये उन्होने एक दूसरा सूत्र भी (सन् १९१० में) दिया था-

 \pi = \frac{9801}{2\sqrt{2} \displaystyle\sum^\infty_{n=0} \frac{(4n)!}{(n!)^4} \times \frac{[1103 + 26390n]}{(4 \times 99)^{4n}}}

रामानुजन संख्याएँ

‘रामानुजन संख्या’ उस प्राकृतिक संख्या को कहते हैं जिसे दो अलग-अलग प्रकार से दो संख्याओं के घनों के योग द्वारा निरूपित किया जा सकता है।

उदाहरण – 9^3 + 10^3 = 1^3 + 12^3 = 1729.

इसी प्रकार,

  • 2^3 + 16^3 = 9^3 + 15^3 = 4 104
  • 10^3 + 27^3 = 19^3 + 24^3 = 20 683
  • 2^3+ 34^3 = 15^3 + 33^3 = 39 312
  • 9^3 + 34^3 = 16^3 + 33^3 = 40 033

अतः 1729, 4104, 20683, 39312, 40033 आदि रामानुजन संख्याएं हैं।

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कॉंग्रेस✋का जन्म आज से 132 साल पहले अफगानिस्तान में हुआ था।


कॉंग्रेस✋का जन्म आज से 132 साल पहले अफगानिस्तान में हुआ था।
गाजी खान ने अंग्रेज़ो के साथ मिलकर यह पार्टी बनाई थी।

गाजी खान के तीन लड़के थे – सबसे बड़ा फेजल खान
उसके बाद सलीम खान और
सबसे छोटा मोइन खान याने
बाद मे(मोती लाल नेहरू)

फेजल खान एक बीमारी की वजह से 14 साल की उम्र मे ही मर गया।
सलीम खान शादी के बाद कश्मीर मे रहने लगा।

उसी सलीम खान के वंशज की औलाद आज कश्मीर मे फारुख अब्दुला और उमर अब्दुला है,
जो कॉंग्रेस के साथ है।

अब बात आती है गाजी खान की। गाजी खान ने चुनाव लड़ा,पर कभी जीता नहीं।

गाजी खान के मरने के बाद मोइन खान फायदे के लिए हिन्दू बन कर अपना नाम मोतीलाल नेहरू रख लिया। पर वो भी कभी चुनाव नहीं जीता।

उसके बाद मोतीलाल की औलाद, जवाहरलाल नेहरू ने जिन्ना के साथ मिलकर रणनीति बनाई

कि जब अंग्रेज़ 1947 मे देश छोडें
तो देश का बटवारा करके
जिन्ना को पाकिस्तान का पीएम
बनाया जाएगा
और नेहरु को इंडिया का पीएम
बनाया जाएगा।

पर जनता सरदार पटेल को पीएम
बनाना चाहती थी।
पर महात्मा गांधी ने नेहरू का साथ दिया।
(इसीलिए गांधी हत्यारा मराठा नाथूराम गोडसे गांधी के खिलाफ था)
और नेहरू को पीएम बना दिया गया।

फिर नेहरू की बेटी इंदरा
जो फिरोजखान से निकाह
करके फिर से मुसलमान बन गई।

पर महात्मा गांधी ने लोगो की आँखों मे धूल झोकने के लिए इंदरा को अपने नाम के आगे खान की जगह गांधी लगाने को कहा।

उसी दिन से ये गांधी का नाम लगा कर देश को लूट रहे है।
फिरोजखान के बाद राजीवखान,के बाद सोनियाखान,के बाद अब
राहुलखान।

इस पोस्ट को इतना शेयर करो की इस नकली गांधी परिवार की असलियत सभी को पता चले।

सूचना : इस पोस्ट में हर एक मुद्दे का सबूत और लिंक दिए हैं !

आज सबूतों के साथ देखिये की किस तरह धर्मनिरपेक्षता के बहाने आम हिंदुओ का पैसा कांग्रेस मुसलमानों में बाट रही है ताकि

उसका वोट बैंक और मजबूत हो सके और सेक्युलर हिंदू आज भी अनजान है और गुलामो की तरह देशद्रोही पार्टियों कों वोट दे रहे है !

1) मुसलामानों को करोडो की हज सबसिडी
http://article.wn.com/view/WNAT413778122370bd3b91d6603ab1ab5889/
http://www.hindujagruti.org/news/3414.html

अमरनाथ यात्रा पे जजिया
2) गाय के कत्लखानों को सबसिडी, गौशाला पर लगाया टैक्स
http://timesofindia.indiatimes.com/india/Beef-exports-up-44-in-4-years-India-is-top-seller/articleshow/19314449.cms
http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/02/130222_beef_global_india_da.shtml
~~~~~~~~~~~~~~~~
3) मस्जिद और मदरसों कों मुफ्त जमिन, बिजली और अनुदान
http://www.hindustantimes.com/india-news/mumbai/maharashtra-govt-scheme-to-provide-aid-to-madrasas-takes-off/article1-1135253.aspx
http://www.indianexpress.com/news/muslim-body-asks-govt-to-provide-land-to-build-more-mosques/946285/
http://zeenews.india.com/election09/story.aspx?aid=684052
http://www.indianexpress.com/news/jama-masjid-runs-up-rs-4cr-power-bill-spat-over-dues-has-area-in-dark/1007397
http://www.jagran.com/uttar-pradesh/pilibhit-10482123.html

मंदिरो पर टॅक्स ठोका
http://articles.timesofindia.indiatimes.com/2011-05-27/varanasi/29590887_1_water-tax-vnn-varanasi-nagar-nigam
http://articles.timesofindia.indiatimes.com/2013-03-16/india/37766404_1_worship-tax-exemption-income-tax
~~~~~~~~~~~~~~~~
4) दिवाली के पटाखो पे बंधन, नवरात्र में डीजे पर पाबंदी
http://www.hindustantimes.com/India-news/Mumbai/No-bursting-crackers-on-roads-this-Diwali/Article1-615228.aspx
http://tinyurl.com/mcc4h6n
http://www.dnaindia.com/ahmedabad/report-people-cant-be-deprived-of-navratri-celebrations-hc-1898277

नमाज के लाउड़ स्पीकर कों छूट

5) बांग्लादेशी मुस्लिम कों राशन कार्ड,
http://www.rediff.com/news/1998/jul/29bang1.htm
http://hindi.business-standard.com/storypage_hin.php?autono=81302
http://www.bhaskar.com/article/RAJ-JAI-bangladeshis-pakistanis-trying-to-build-the-ration-card-the-congress-mlas-3518261.html

पाकिस्तानी हिंदू कों नहीं
http://tinyurl.com/l5o82hj

6) मुस्लिम छात्राओ को 30,000 रु, हिंदू छात्राओं कों इनकार !
http://hindi.in.com/latest-news/News/Sp-Govt-Launch-Scheme-For-Only-Muslim-Girls-1725032.html
http://ibnlive.in.com/news/up-akhilesh-yadav-launches-girl-education-aid-scheme-bjp-slams-move/309845-3-242.html

7) रमजान में नियमित बिजली आपूर्ति;
http://articles.timesofindia.indiatimes.com/2011-07-18/hyderabad/29786562_1_uninterrupted-power-power-supply-areas
http://www.khaskhabar.com/hindi-news/no-load-shedding-in-ramzan-in-up-072011311123404812.html

दिवाली में भारी कटौती
http://navbharattimes.indiatimes.com/faridabad/–/articleshow/6843011.cms
http://articles.timesofindia.indiatia

8) मुस्लिमो कों कॉलेज, नौकरी में आरक्षण; गरीब हिंदू कों नहीं
http://www.siasat.com/english/news/muslim-reservation-cong-achievement-not-ysrs-ma-shabbir
http://abpnews.newsbullet.in/ind/34-more/40401-2012-12-17-09-34-44
http://tinyurl.com/l8awtry
http://articles.timesofindia.indiatimes.com/2010-03-26/india/28121377_1_exclusive-quota-muslim-castes-muslims-and-christians

मुसलमानों कों बिना ब्याज के सस्ते कर्ज, हिंदुओ कों इनकार
http://khabar.ibnlive.in.com/news/72883/3/19
http://www.jagran.com/bihar/kaimoor-10463554.html
http://navbharattimes.indiatimes.com/other-news-mumbai/–/articleshow/6246679.cms

9) आतंकवादियों कों, अबू सलेम कों VIP जेल
http://www.mid-day.com/news/2010/jul/270710-arthur-road-jail-abu-salem-underworld-don-luxury-items-ramesh-bagwe.htm
http://ibnlive.in.com/news/abu-salem-lived-like-a-vip-in-jail-minister/127524-3.html

साध्वी प्रज्ञा कों जेल में यातनाए दी
http://www.dnaindia.com/mumbai/1607207/report-african-drug-peddlers-tormenting-me-in-jail-sadhvi

10) मुसलमान लड़कियों को शादी के लिए 50 हजार, हिंदू को नहीं
http://bit.ly/1lxAOuM

http://timesofindia.indiatimes.com/city/bangalore/Congress-gifts-Nikah-Bhagya-ahead-of-LS-polls/articleshow/24224212.cms
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11) मस्जिदो के इमामो कों भत्ता, मंदिरों के पुजारियों कों इनकार
http://khabar.ibnlive.in.com/news/72883/3/19
http://post.jagran.com/Mamata-Banerjee-announces-Rs-2500-monthly-stipend-for-imams-1333533792
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12) पाकिस्तानी आतंकवादियों कों पेन्शन

इंडियन आर्मी कंगाल
http://articles.timesofindia.indiatimes.com/2012-03-29/india/31253747_1_air-defence-defence-secretary-army
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हिंदू लाईट बिल, पानी पट्टी, गृह कर, इनकम टैक्स, अमरनाथ यात्रा पर टैक्स चुकाता है और कांग्रेस उसे सेक्युलरिजम के नाम पर मुसलमानों में बाटती है !

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પિતૃઓને શ્રાદ્ધ ની પ્રાપ્તિ કઇ રીતે થાય ?


પિતૃઓને શ્રાદ્ધ ની પ્રાપ્તિ કઇ રીતે થાય ?
આ જીજ્ઞાસા સ્વાભાવિક છે કે શ્રાદ્ધમાં
દેવામાં આવતી અન્ન પિંડ વગેરે સામગ્રિ પિતૃઓને
મળે કઇ રીતે ; કેમકે કર્મ અનુસાર મૃત્યુ પછી જીવ ને
ભિન્ન ભિન્ન ગતિ પ્રાપ્ત થાય છે. કોઇ દેવ યોનિ
પામે, કોઇ મનુષ્ય યોનિ પામે,કોઇ પિતૃ યોનિ,
કોઇ પ્રેત યોનિ, કોઇ હાથી, કોઇ કીડી, તો કોઇ
વૃક્ષ ની યોનિ પામે. શ્રાદ્ધ માં દેવામાં આવતા
પિંડદાન આદિ હાથી નું પેટ કઇ રીતે ભરી શકે ? એવો
જ રીતે કીડી આવડા મોટા પિંડ ને કઇ રીતે ખાઇ
શકે ? દેવતાઓ તો અમૃતથી જ તૃપ્ત થાય,પિંડ
આપવાથી એની તૃપ્તિ કઇ રીતે શક્ય બને? આ
પ્રશ્નોના જવાબ આપણા શાસ્ત્રકારો એ સુસ્પષ્ટ
રીતે આપ્યો છે કે નામ અને ગોત્ર નાં આધારે
વિશ્વેદેવ અને અગ્નિષ્વાત આદિ દિવ્ય દેવ આપણા
દિધેલા પિંડદાનાદિ ને પિતૃઓને પ્રાપ્ત કરાવી
આપે છે | જો આપણા પિતૃઓ દેવયોનિમાં હોય તો
આપણે દીધેલું પિંડદાન આદી તેમને અમૃત નાં રૂપમાં
પ્રાપ્ત થાય | મનુષ્યયોનિ માં અન્નરૂપમાં તથા
પશુયોનિમાં તૃણનાં રૂપમાંપ્રાપ્ત
થાય.નાગયોનિમાં હોય તો વાયનાંરૂપમાં
પ્રાપત થાય.
नाममंत्रास्तथा देशा भवान्तरगतानपि ।
प्राणिनः प्रीणयन्त्येते तदाहारत्वमागतान् ।।
देवो यदि पिता जातः शुभकर्मानुयोगतः ।
तस्यान्नममृतं भूत्वा देवत्वेऽप्युनुगच्छति ।।
मर्त्यत्वे ह्यन्नरूपेण पशुत्वे च तृणं भवेत् ।
श्राद्धान्नं वायुरूपेण नागत्वे ऽ प्युपतिष्ठति ।।
જે રીતે ગૌશાળામાં અનેક ગાયો ની વચ્ચે ભૂલું
પડેલ વાછરડું કોઇ ને કોઇ રીતે પોતાની માતા ને
શોધી લે છે. તે જ રીતે મંત્ર દ્વારા નામ ગોત્ર
પૂર્વક અપાયેલ વસ્તુ તે જે યોનિ માં હોય તે પ્રમાણે
તેમને યથોચિત માત્રામાં પહોચાડી દેવામાં
આવે. નામ ગોત્ર હ્રદયની શ્રદ્ધા એવં સંકલ્પપૂર્વક
દેવામાં આવેલ પદાર્થોને ભક્તિપૂર્વક મંત્ર દ્વારા
તેમની પાસે પહોચાડી આપે છે. જીવ ચાહે સૈંકડો
યોનિયોંને પાર કેમ ન કરી ગયો હોય તૃપ્તિ તો
એમની પાસે પહોંચી જાય છે.
यथा गोष्ठे प्रणष्टां वै वत्सो विन्देत मातरम् ।
तथा तं नयते मंत्रो जन्तुर्यत्रावतिष्ठते ।
नाम गोत्रं च मंत्रश्च दत्तमन्नं नयन्ति तम् ।
अपि योनिशतं प्राप्तांस्तृप्तिस्ताननुगच्छति ।।

                         ~ महादेव हर ~