Posted in भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas

મખવંતો ઝલ્લત…..હર શકિત કુલેશાત….જય ઝાલાવાડ .


મખવંતો ઝલ્લત…..હર શકિત કુલેશાત….જય ઝાલાવાડ .

— with Bhruguraj Sinh Zala and 48 others.

History of Zalawad's photo.

આશરે વિ.સ ૧૧૦૦ ની આસપાસ સિંધના ઈશાન ખૂણેથી ઈશાવતાર કિતીૅગઢના પાટવી કુંવર હરપાલદેવ પોતાના મોસાળ પાટણ પધાયાૅ તેમના નાનાબાપૂ પાટણપતિ શ્રી ભીમદેવ~૧ (બાણાવળી) તથા નાનીમાં ઉદયામતી (જેમને વિશ્વ પ્રસિધ્ધ રાણી ની વાવ બંધાવી ) તથા મામા શ્રી કરણદેવ~૧ સોલંકી અને મામીસા મીનળદેવી ના સમયમા બાબરોભૂત પાટણ ની રૈયતને અને કરણદેવ~૧ સોલંકી ના ઝાંઝમેર વાળા રાણી ફુલાદે ને પોતાની પ્રેત અસૂરી શકિતથી રંજાડતો આ વાત ની જાણ રાજા કરણદેવે પોતાના ભાણેજ કિતીૅગઢના કુમાર હરપાલદેવ ને કરી અને તેજ મહિના ની આસો વદ~૧૪ ( કાળી ચૈદશ ) ની કાળી રાત્રીએ કુળદેવી મમૅરાદેવી ને યાદ કરી પોતાના ભાયાૅ કુળઅંબા શકિતદેવી ( પાટણ ના સોલંકી કુળ ના ફટાયા કુવર ભકતરાજ પ્રતાપસસિંહ સોલંકી ના દિકરી હતા ) ની સહાયથી બાબરાભૂત ને વશ કરી અસૂર માંથી સૂર ( બાબરોસૂર ) બનાવ્યો અને મામા કરણદેવ સોલંકી એ આપેલ વચન મુજબ એકજ રાત્રી મા લોહીનું એકપણ ટીપુ રેડીયા વિના મોસાળ પકસે મામા કરણદેવ~૧ સોલંકી પાસેથી લીધા જેમા ૫૦૦ ભાલ પ્રદેશના રાણી ફુલાદેવી ને પાછા દઈ વિ.સ ૧૧૫૬ પાટભૂમી પાટડી ગાદી સ્થાપી ઝાલા અને ઝાલાવાડ ના કિતીૅના કોટ કંડારી ધામાની ધરતી ઉપર દેવપોઢી એકાદશી ને દિ શયન થયા .
એ ઝાલાવંશ ના આધ્યપિતા બાપા હરપાલદેવ ની પ્રતીમા ધ્રાંગધરા રાજના શ્રી શકિતચોકમાં સ્થાપીત કરવાનુ સૈભાગ્ય સોઢાણવંશજ ધ્રાગધરા નરેશ ૪૫ માં ઝલ્લેશ્વર મહારાજા મયુરધ્વજસિંહજી ( મેધરાજજીબાવા ) ને પ્રાપ્ત થયુ
અને આ મહા ઉત્સવ ની પ્રતીકૃતી ને આવનાર ઈતિહાસના પાને ચિત્રના રૂપમાં કંડારવાનુ કાયૅ તેમનાજ વચેટ કુંવર જયરાજસિંહજીદેવ ( જયબાપા ) ને થયુ ….જય ઝાલાવાડ…..સ્વસ્તી….અસ્તુ

Posted in आयुर्वेद - Ayurveda

यह शरीर आयुर्वेद के मतानुसार त्रिधातु में बंटा है


कफ
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यह शरीर आयुर्वेद के मतानुसार त्रिधातु में बंटा है जब तक
शरीर में त्रिधातु (बात, पित्त, कफ) समानता की स्थिति में रहत
है, वह स्वस्थ रहता है। किन्तु, उनकी असामानता की स्थिति में
अनेकों रोगों का जन्म होता है, इस बार हम त्रिधातु के तीसरे अंग
कफ के बारे में जारकारी दे रहें हैैं। कफ चिकना, भारी, सफेद,
पिच्छिल (लेसदार) मीठा तथा शीतल(ठंडा) होता हैं। विदग्ध
(दूषित) होने पर इसका स्वाद नमकीन हो जाता है। कफ से
सम्बन्धित तकलीफ लगभग 31 प्रतिशत लोगों को रहती है।
कफ के स्थान, नाम और कर्म
आमाशय में, सिर (मस्तिष्क) में, हृदय में और सन्धियों
(जोड़ों) में रहकर शरीर की स्थिरता और पुष्टि को करता
है।
1- जो कफ आमाशय में अन्न को पतला करता है, उसे क्लेदन कहते हैं।
2- जो कफ मूर्धि (मस्तिष्क) में रहता है, वह ज्ञानेन्द्रियों को तृप्त
और स्निग्ध करता है। इसलिए
उसको स्नेहन कफ कहते हैं।
3- जो कफ कण्ठ में रहकर कण्ठ मार्ग को कोमल और मुलायम रखता है
तथा जिव्हा की रस ग्रन्थियों को क्रियाशील बनाता है और
रस व ज्ञान की शक्ति उत्पन्न करता है,उसको रसन कफ कहते हैं।
4- हृदय में (समीपत्वेन उरःस्थित)रहने वाला कफ अपनी स्निग्धता
और शीतलता से सर्वदा हृदय की रक्षा करता है। अतः उसको
अवलम्बन कफ कहते हैं।
5- सन्धियों (जोड़ों) में जो कफ रहता है, वह उन्हें सदा चिकना
रखकर कार्यक्षम बनाता है। उसको संश्लेष्मक कफ कहते है।
कफ जनित रोग
1- तन्द्रा
2- अति निद्रा
3- निद्रा
4- मुख का माधुर्य – मुख के स्वाद का मीठा होना
5- मुख लेप – मुख का कफ से लिप्त रहना
6- प्रसेतका – मुख से जल का श्राव होना
7- श्वेत लोकन – समस्त पदार्थो का सफेद दिखना
8- श्वेत विट्कता – पुरीष का श्वेत वर्ण होना
9- श्वेत मूत्रता – मूत्र के वर्ण का श्वेत होना
10- श्वेतड़वर्णता – अंगो के वर्ण का श्वेत होना
11- शैत्यता – शीत प्रतीति
12- उष्णेच्छा – उष्ण पदार्थ और उष्णता की इच्छा
13- तिक्त कामिता – कड़वे और तीखे पदार्थांे की अभिलाषा
14- मलाधिक्य – मल की अधिकता
15- बहुमूत्रता – मूत्र का अधिक आना
16- शुक्र बहुल्यता – वीर्य की अधिकता
17- आलस्य – आलस्य अधिक आना
18- मन्द बुद्धित्व – बुद्धि की मन्दता
19- तृप्ति – भोजनेच्छा का अभाव
20- घर्घर वाक्यता – वर्णांे के स्पष्टोचारण का अभाव तथा
जड़ता।
कफ प्रकोप और शमन –
मधुर (मीठा), स्निग्ध (चिकना), शीतल (ठंडा) तथा
गुरु पाकी आहारों के सेवन से प्रातःकाल में भोजन करने के उपरान्त
में परिश्रम न करने से श्लेष्मा (कफ) प्रकुपित होता है और उपरोक्त
कारणों के विपरीत आचरण करने से शान्त होता है।
कफ प्रकृति के लक्षण-
कफ प्रकृति मनुष्य की बुद्धि गंभीर होती है। शरीर
मोटा होता है तथा केश चिकने होते हैैं। उसके शरीर में बल अधिक
होता हैंे, निद्रावस्था में जलाशयों (नदी, तालाब आदि) को
देखता है, अथवा उसमें तैरता है।
कफ रोग निवारक दवायें
1-सर्दी व जुका म
o-काली मिर्च का चूर्ण एक ग्राम सुबह खाली पेट
पानी के साथ प्रतिदिन लेते रहने से सर्दी जुकाम की शिकायत दूर
होती है।
o- दो लौंग कच्ची, दो लौंग भुनी हुई को पीसकर शहद में
मिलाकर सुबह खाली पेट एवं रात्रि में खाने के आधा घंटे के बाद लें,
कफ वाली खांसी में आराम आ जायेगा।
2- श्वासनाशक कालीहल्दी
कालीहल्दी को पानी में घिसकर एक चम्मच लेप
बनायंे। साथ ही एक चम्मच शहद के साथ सुबह खाली पेट दवा
नित्य 60 दिन खाने से दमा रोग में आराम हो जाता है।
3- कफ पतला हो तथा सूखी खांसी सही हो
शिवलिंगी, पित्त पापड़ा, जवाखार, पुराना गुड़, यह
सभी बराबर भाग लेकर पीसें और जंगली बेर के बराबर गोली
बनायें। एक गोली मुख में रखकर उसका दिन में दो तीन बार रस चूसंे।
यह कफ को पतला करती है, जिससे कफ बाहर निकल जाता है तथा
सूखी खांसी भी सही होती है।
4- दमा रोग
20 ग्राम गौमूत्र अर्क में 20 ग्राम शहद मिलाकर
प्रतिदिन सुबह खाली पेट 90 दिन तक पीने से दमा रोग में आराम
हो जाता है। इसे लगातार भी लिया जा सकता है, दमा,
टी.वी. हृदय रोग एवं समस्त उदर रोगों में भी लाभकारी है।
5- कुकुर खांसी
धीमी आंच में लोहे के तवे पर बेल की पत्तियों को
डालकर भूनते-भूनते जला डालें। फिर उन्हें पीसकर ढक्कन बन्द डिब्बे में
रख लें और दिन में तीन या चार बार सुबह, दोपहर, शाम और रात
सोते समय एक माशा मात्रा में 10 ग्राम शहद के साथ चटायें, कुछ
ही दिनों के सेवन से कुकुर खांसी ठीक हो जाती हैै। यह दवा हर
प्रकार की खांसी में लाभ करती है।
6- गले का कफ
पान का पत्ता 1 नग, हरड़ छोटी 1 नग, हल्दी आधा
ग्राम, अजवायन 1 ग्राम, काला नमक आवश्यकतानुसार, एक
गिलास पानी में डालकर पकायें आधा गिलास रहने पर गरम-गरम
दिन में दो बार पियें । इससे कफ पतला होकर निकल जायेगा।
रात्रि में सरसों के तेल की मालिश गले तथा छाती व पसलियांे
में करें।
7- खांसी की दवा-
भूरी मिर्च 5 ग्राम, मुनक्का बीज निकला 20 ग्राम,
मिश्री 20 ग्राम, छोटी पीपर 5 ग्राम तथा छोटी इलायची 5
ग्राम, इन सभी को पीसकर चने के बराबर गोली बना लें। सुबह एक
गोली मुँह में डाल कर चूसें। इसी तरह दोपहर और शाम को भी चूसें।
कफ ढ़ीला होकर निकल जाता है और खांसी सही हो जाती है।
8- गला बैठना
दिन में तीन या चार बार कच्चे सुहागे की चने बराबर
मात्रा मुंह में डालकर चूसें। गला निश्चित ही खुल जाता है और
मधुर आवाज आने लगती है। गायकों के लिए यह औषधि अति उत्तम
है।
9- श्वास
पीपल की छाल को रविपुष्य या गुरुपुष्य के दिन सुबह
न्यौता देकर तोड़ लाएं और सुखाकर रख लें। माघ पूर्णिमा को
बारह बजे रात में कपिला गाय के दूध में चावल की खीर बनाकर
उसमें एक चुटकी दवा डाल लें और चांदनी रात में तीन घंटे रखकर
मरीज को खिलाएं श्वास रोग के लिए अत्यंत
लाभकारी है।

**नोट:::::::
वैसे तो सभी नुस्खे पूर्णतः निरापद हैं, परन्तु फिर भी इन्हें किसी अच्छे वैद्य से समझकर व सही दवाओं का चयन कर उचित मात्रा में सेवन करें, तो ही अच्छा रहेगा।
गलत रूप से किसी दवा का सेवन नुकसान दायक भी हो सकता है। ऐसी स्थिति में लेखक जिम्मेदार नही होंगे।
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विष्णु अरोङा's photo.
Posted in संस्कृत साहित्य

श्री कृष्ण ने किया था एकलव्य का वध …….. मगर क्यों ???


श्री कृष्ण ने किया था एकलव्य का वध …….. मगर क्यों ???
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महाभारत काल मेँ प्रयाग (इलाहाबाद) के तटवर्ती प्रदेश मेँ सुदूर तक फैला श्रृंगवेरपुर राज्य एकलव्य के पिता निषादराज हिरण्यधनु का था। गंगा के तट पर अवस्थित श्रृंगवेरपुर उसकी सुदृढ़ राजधानी थी।
उस समय श्रृंगवेरपुर राज्य की शक्ति मगध, हस्तिनापुर, मथुरा, चेदि और चन्देरी आदि बड़े राज्योँ के समकक्ष थी। निषाद हिरण्यधनु और उनके सेनापति गिरिबीर की वीरता विख्यात थी।
निषादराज हिरण्यधनु और रानी सुलेखा के स्नेहांचल से जनता सुखी व सम्पन्न थी। राजा राज्य का संचालन आमात्य (मंत्रि) परिषद की सहायता से करता था। निषादराज हिरण्यधनु को रानी सुलेखा द्वारा एक पुत्र प्राप्त हुआ जिसका नाम “अभिद्युम्न” रखा गया। प्राय: लोग उसे “अभय” नाम से बुलाते थे।
पाँच वर्ष की आयु मेँ एकलव्य की शिक्षा की व्यवस्था कुलीयगुरूकुल मेँ की गई।
बालपन से ही अस्त्र शस्त्र विद्या मेँ बालक की लगन और एकनिष्ठता को देखते हुए गुरू ने बालक का नाम “एकलव्य” संबोधित किया। एकलव्य के युवा होने पर उसका विवाह हिरण्यधनु ने अपने एक निषाद मित्र की कन्या सुणीता से करा दिया। एकलव्य धनुर्विद्या की उच्च शिक्षा प्राप्त करना चाहता था। उस समय
धनुर्विद्या मेँ गुरू द्रोण की ख्याति थी। पर वे केवल ब्राह्मण तथा क्षत्रिय वर्ग को ही शिक्षा देते थे और शूद्रोँ को शिक्षा देने के कट्टर विरोधी थे। महाराज हिरण्यधनु ने एकलव्य को काफी समझाया कि द्रोण तुम्हे शिक्षा नहीँ देँगे। पर एकलव्य ने पिता को मनाया कि उनकी शस्त्र विद्या से प्रभावित होकर आचार्य द्रोण स्वयं उसे अपना शिष्य बना लेँगे। पर एकलव्य का
सोचना सही न था – द्रोण ने दुत्तकार कर उसे आश्रम से भगा दिया।
एकलव्य हार मानने वालोँ मेँ से न था और बिना शस्त्र शिक्षाप्राप्त तिए वह घर वापस लौटना नहीँ चाहता था।
इसलिए एकलव्य ने वन मेँ आचार्य द्रोण की एक प्रतिमा बनायी और धनुर्विद्या का अभ्यास करने लगा। शीघ्र ही उसने धनुर्विद्या मेँ निपुणता प्राप्त कर ली। एक बार द्रोणाचार्य अपने शिष्योँ और एक कुत्ते के साथ उसी वन मेँ आए। उस समय एकलव्य धनुर्विद्या का अभ्यास कर रहे थे। कुत्ता एकलव्य को देख भौकने
लगा। कुत्ते के भौंकने से एकलव्य की साधना में बाधा पड़ रही थी
अतः उसने अपने बाणों से कुत्ते का मुँह बंद कर दिया। एकलव्य ने इस कौशल से बाण चलाये थे कि कुत्ते को किसी प्रकार की चोट नहीं लगी। कुत्ता द्रोण के पास भागा। द्रोण और शिष्य ऐसी श्रेष्ठ धनुर्विद्या देख आश्चर्य मेँ पड़ गए। वे उस महान धुनर्धर की
खोज मेँ लग गए अचानक उन्हे एकलव्य दिखाई दिया जिस धनुर्विद्या को वे केवल क्षत्रिय और ब्राह्मणोँ तक सीमित रखना चाहते थे उसे शूद्रोँ के हाथोँ मेँ जाता देख उन्हेँ चिँता होने लगी।
तभी उन्हे अर्जुन को संसार का सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर बनाने के वचन की याद आयी। द्रोण ने एकलव्य से पूछा- तुमने यह धनुर्विद्या किससे सीखी? एकलव्य- आपसे आचार्य एकलव्य ने द्रोण की मिट्टी की बनी प्रतिमा की ओर इशारा किया। द्रोण ने एकलव्य से गुरू
दक्षिणा मेँ एकलव्य के दाएँ हाथ का अगूंठा मांगा एकलव्य ने अपना अगूंठा काट कर गुरु द्रोण को अर्पित कर दिया।
कुमार एकलव्य अंगुष्ठ बलिदान के बाद पिता हिरण्यधनु के पास चला आता है। एकलव्य अपने साधनापूर्ण कौशल से बिना अंगूठे के धनुर्विद्या मेँ पुन: दक्षता प्राप्त कर लेता है। आज के युग मेँ आयोजित होने वाली सभी तीरंदाजी प्रतियोगिताओँ मेँ
अंगूठे का प्रयोग नहीँ होता है, अत: एकलव्य को आधुनिक तीरंदाजी का जनक कहना उचित होगा।
पिता की मृत्यु के बाद वह श्रृंगबेर राज्य का शासक बनता हैl
अमात्य परिषद की मंत्रणा से वह न केवल अपने राज्य का संचालन करता है, बल्कि निषाद भीलोँ की एक सशक्त सेना और नौसेना गठित करता है और अपने राज्य की सीमाओँ का विस्तार करता
है।
विष्णु पुराण और हरिवंश पुराण में उल्लिखित है कि निषाद वंश का राजा बनने के बाद एकलव्य ने जरासंध की सेना की तरफ से मथुरा पर आक्रमण कर यादव सेना का लगभग सफाया कर दिया था। यादव वंश में हाहाकर मचने के बाद जब कृष्ण ने दाहिने हाथ में महज चार अंगुलियों के सहारे धनुष बाण चलाते हुए एकलव्य को देखा तो उन्हें इस दृश्य पर विश्वास ही नहीं हुआ।
एकलव्य अकेले ही सैकड़ों यादव वंशी योद्धाओं को रोकने में सक्षम था। इसी युद्ध में कृष्ण ने छल से एकलव्य का वध किया था। उसका पुत्र केतुमान महाभारत युद्ध में भीम के हाथ से मारा गया था।
जब युद्ध के बाद सभी पांडव अपनी वीरता का बखान कर रहे थे तब कृष्ण ने अपने अर्जुन प्रेम की बात कबूली थी।
कृष्ण ने अर्जुन से स्पष्ट कहा था कि “तुम्हारे प्रेम में मैंने क्या-क्या नहीं किया है। तुम संसार के सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर कहलाओ इसके लिए मैंने द्रोणाचार्य का वध करवाया, महापराक्रमी कर्ण को कमजोर किया और न चाहते हुए भी तुम्हारी जानकारी के बिना भील पुत्र एकलव्य को भी वीरगति दी ताकि तुम्हारे रास्ते में कोई बाधा ना आए”।

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विष्णु अरोङा's photo.
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हिंदू सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य


हिंदू सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य (Hindu Emperor Chandragupta Maurya)

चंद्रगुप्त मौर्य का जन्म 340 ईसापूर्व को पाटलिपुत्र में हुआ था ,वह पहला मौर्य सम्राट था और अखंड भारत पर भी राज करने वाला करने वाला पहला सम्राट था ।
जन्म से ही वह गरीब था ,उसके पिता की मृत्यु उसके जन्म से पहले ही हो गई थी,कुछ लेखो के अनुसार वह अंतिम नंद सम्राट धनानंद का पुत्र था और उसकी माँ का नाम मुरा था ।
हर ग्रंथ में मतभेद है चंद्रगुप्त की उत्पत्ति को लेकर ।
बोद्ध ग्रंथ अनुसार चंद्रगुप्त मौर्य मोरिया नाम के काबिले से ताल्लुक रखता था जो शाक्यो के रिश्तेदार थे ।
मुरा या तो काबिले के सरदार की लड़की थी या धनानंद की दासी थी ।
10 वर्ष की उम्र में उसकी माँ मुरा की मृत्यु हो गई थी और तब चाणक्य नाम के ब्राह्मण ने अनाथ चंद्रगुप्त को पाला ।
चाणक्य को धनानंद से बदला लेना था और नंद के भ्रष्ट राज को ख़त्म करना था ।
चाणक्य ने चंद्रगुप्त सम्राट जैसी बात देखि और इसीलिए वे उसे तक्षिला ले गए ।
तक्षिला में ज्ञान प्राप्ति के बाद चाणक्य और चंद्रगुप्त ने पहले तो तक्षिला पर विजय पाई और आस पास के कई कबीलों और छोटे राज्यों को एक कर पाटलिपुत्र पर हमला किया ।
सिक्किम के कुछ काबिले मानते है की उनके पुरखे चंद्रगुप्त मौर्य की सेना में थे ।
320 ईसापूर्व में चंद्रगुप्त मौर्य मगध का सम्राट बन चूका था ।
इसके बाद उसने कई युद्ध लड़े और सम्पूर्ण भारतीय उपमहाद्वीप पर एकछत्र राज किया ।
298 ईसापूर्व में चंद्रगुप्त मौर्य की मृत्यु हो गई ।
हिंदू और बोद्ध ग्रंथ चंद्रगुप्त मौर्य के अंतिम दिनों के बारे में कुछ नहीं लिखते पर कुछ जैन लेखो के अनुसार चंद्रगुप्त मौर्य जैन भिक्षु बन गया था और कई दिनों तक उपवास रखने के कारण उसकी मृत्यु हो गई ।
पर केवल जैन ग्रंथ के आधार पर कैसे कहे की चंद्रगुप्त मौर्य ने जैन धर्म अपना लिया था ??
जैन ग्रंथो में राम को जैन कहा गया है,सम्राट भारत को भी ,सम्राट अजातशत्रु को भी और प्राचीन काल में कुछ जैन तो गौतम बुध को भी जैन मानते थे पर यह सब जैन नहीं थे ।
हो सकता हो की जैन ग्रंथो की बात सही हो या गलत भी हो सकती है ।
जैन कथाओ के अनुसार चंद्रगुप्त मौर्य ने 16 सपने देखे थे और उन सपनो का अर्थ जानने चंद्रगुप्त दिगंबर पंथ के जैन गुरु भद्रबाहु के पास गए ।
भद्रबाहु ने चंद्रगुप्त को उन सपनो का अर्थ बताया फिर चंद्रगुप्त मौर्य जैन बन गया ।
इसके बाद अपने पुत्र बिंदुसार को राजा बना कर चंद्रगुप्त मौर्य भद्रबाहु के साथ चले गए ।
पर जैन कवी हेमचन्द्र के अनुसार भद्रबाहु की मृत्यु चंद्रगुप्त मौर्य के राज के 12वे वर्ष में ही हो गई थी ,तो चंद्रगुप्त किसके साथ गए थे ??
बचपन से ही चंद्रगुप्त चाणक्य के साथ रहा था और हिंदू धर्म का उसपर काफी असर था ।
चाणक्य के अर्थशास्त्र में विष्णु की आराधना करने की बात कही गई है ।
चंद्रगुप्त के काल के सिक्को पर हमें जैन प्रभाव कही नज़र नहीं आता जबकि हमें उसके सिक्को पर राम,लक्ष्मन और सीता के चित्र मिलते है ।
चित्र नंबर 1,2 और 3 देखे
इनमे आपको 3 मानवों की आकृति दिखेगी जो राम,लक्ष्मन और सीता के है ।(नंबर 1 चित्र का नाम है GH 591)
अब सम्राट अशोक ने बोद्ध धर्म अपनाया था और उसके सिक्को पर आप बोद्ध प्रभाव देख सकते है ।
चित्र नंबर 4 देखे ,आपको बोद्ध धर्म चक्र नज़र आयेगा ।
यदि चंद्रगुप्त जैन था तो उसके सिक्को में जैन चिन्ह क्यों नहीं है ??

केवल एक मत के आधार पर चंद्रगुप्त मौर्य को जैन कहना ठीक नहीं ।

— with Ram Sarathe and 15 others.

विष्णु अरोङा's photo.
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मध्य प्रदेश का उज्जैन शहर


मध्य प्रदेश का उज्जैन शहर न सिर्फ अपने विश्व प्रसिद्ध मंदिरों के लिए जाना जाता है बल्कि यहां कई ऐसे रहस्यमय स्थान भी हैं, जो लोगों को बरबस ही अपनी ओर खींचते हैं। उज्जैन में ऐसा ही एक स्थान है राजा भृर्तहरि की गुफा। यह गुफा मुख्य नगर से थोड़ी दूरी पर शिप्रा नदी के तट पर एक सुनसान क्षेत्र में स्थित है। यह गुफा नाथ संप्रदाय के साधुओं का साधना स्थल है। गुफा के अंदर जाने का रास्ता काफी छोटा है।
गुफा में प्रवेश करते ही सांस लेने में कठिनाई महसूस होती है। गुफा की ऊंचाई भी काफी कम है, अत: अंदर जाते समय काफी सावधानी रखना होती है। यहां प्रकाश भी काफी कम है, अंदर रोशनी के लिए बल्ब लगे हुए हैं। इसके बावजूद गुफा में अंधेरा दिखाई देता है। गुफा में भर्तृहरि की प्रतिमा के सामने एक धुनी भी है, जिसकी राख हमेशा गर्म ही रहती है। राजा भृर्तहरि के साधना स्थल के सामने ही एक अन्य गुफा भी है। मान्यता है कि इस गुफा से चारों धामों के लिए रास्ता जाता है।

जानिए कौन थे राजा भृर्तहरि
प्राचीन उज्जैन को उज्जयिनी के नाम से जाना जाता था। उज्जयिनी के परम प्रतापी राजा हुए थे विक्रमादित्य। विक्रमादित्य के पिता महाराज गंधर्वसेन थे और उनकी दो पत्नियां थीं। एक पत्नी के पुत्र विक्रमादित्य और दूसरी पत्नी के पुत्र थे भर्तृहरि। गंधर्वसेन के बाद उज्जैन का राजपाठ भर्तृहरि को प्राप्त हुआ, क्योंकि भर्तृहरि विक्रमादित्य से बड़े थे। राजा भर्तृहरि धर्म और नीतिशास्त्र के ज्ञाता थे। प्रचलित कथा के अनुसार राजा भर्तृहरि अपनी पत्नी पिंगला से बहुत प्रेम करते थे। एक दिन जब राजा भृर्तहरि को पता चला की रानी पिंगला किसी ओर पर मोहित है तो उनके मन में वैराग्य उत्पन्न हो गया और वे राजपाठ छोड़कर गुरु गोरखनाथ के शिष्य बन गए।

रानी ने दिया था राजा भृर्तहरि को धोखा
प्रचलित कथा के अनुसार एक बार राजा भृर्तहरि शिकार करने जंगल में गए। वहां उन्होंने एक हिरन का शिकार किया। तभी वहां से गुरु गोरखनाथ गुजरे। जब उन्होंने राजा भृर्तहरि को शिकार करते देखा तो उन्होंने कहा कि जब तुम किसी प्राणी को जीवित नहीं कर सकते तो उसे मारने का भी तुम्हें कोई अधिकार नहीं है। तब राजा भृर्तहरि ने कहा कि यदि आप इस मृत हिरन को पुनः जीवित कर दें तो मैं आपकी शरण में आ जाऊंगा।
भृर्तहरि के ऐसा कहने पर गुरु गोरखनाथ ने अपनी तपस्या के बल पर उस मृत हिरन को पुनर्जीवित कर दिया, लेकिन राजा भृर्तहरि का मन अब भी अपनी सबसे सुंदर रानी पिंगला के प्रेम में उलझा हुआ था। गुरु गोरखनाथ राजा के मन की बात जान गए। उन्होंने राजा को एक फल दिया और कहा कि इसे खाने से तुम सदैव जवान बने रहोगे, कभी बुढ़ापा नहीं आएगा, सदैव सुंदरता बनी रहेगी। राजा भृर्तहरि ने यह फल अपनी सबसे प्रिय रानी पिंगला को दे दिया, ताकि वह सदैव सुंदर व जवान रहे।
रानी पिंगला भर्तृहरि पर नहीं बल्कि उसके राज्य के कोतवाल पर मोहित थी। यह बात राजा नहीं जानते थे। जब राजा ने वह चमत्कारी फल रानी को दिया तो रानी ने सोचा कि यह फल यदि कोतवाल खाएगा तो वह लंबे समय तक उसकी इच्छाओं की पूर्ति कर सकेगा। रानी ने यह सोचकर चमत्कारी फल कोतवाल को दे दिया। वह कोतवाल एक वेश्या से प्रेम करता था और उसने चमत्कारी फल उसे दे दिया। ताकि वेश्या सदैव जवान और सुंदर बनी रहे।
वेश्या ने फल पाकर सोचा कि यदि वह जवान और सुंदर बनी रहेगी तो उसे यह गंदा काम हमेशा करना पड़ेगा। नर्क समान जीवन से मुक्ति नहीं मिलेगी। इस फल की सबसे ज्यादा जरूरत हमारे राजा को है। राजा हमेशा जवान रहेगा तो लंबे समय तक प्रजा को सभी सुख-सुविधाएं देता रहेगा। यह सोचकर उसने चमत्कारी फल राजा को दे दिया। राजा वह फल देखकर हतप्रभ रह गए। राजा ने वेश्या से पूछा कि यह फल उसे कहा से प्राप्त हुआ।
वेश्या ने बताया कि यह फल उसे कोतवाल ने दिया है। भर्तृहरि ने तुरंत कोतवाल को बुलवा लिया। सख्ती से पूछने पर कोतवाल ने बताया कि यह फल उसे रानी पिंगला ने दिया है। जब भर्तृहरि को पूरी सच्चाई मालूम हुई तो वह समझ गया कि पिंगला उसे धोखा दे रही है। पत्नी के धोखे से भर्तृहरि के मन में वैराग्य जाग गया और वे अपना संपूर्ण राज्य अपने छोटे भाई विक्रमादित्य को सौंपकर गुरु गोरखनाथ की शरण में आ गए। मान्यता है कि गुरु गोरखनाथ के कहने पर राजा भृर्तहरि ने इसी गुफा में वर्षों तक घोर तपस्या की थी।
भृर्तहरि की तपस्या से इंद्र भी हो गए थे भयभीत
राजा भृर्तहरि की कठोर तपस्या से देवराज इंद्र भी भयभीत हो गए थे। इंद्र ने सोचा की भृर्तहरि वरदान पाकर स्वर्ग पर आक्रमण करेंगे। यह सोचकर इंद्र ने भृर्तहरि पर एक विशाल पत्थर गिरा दिया। तपस्या में बैठे भृर्तहरि ने उस पत्थर को एक हाथ से रोक लिया और तपस्या में बैठे रहे। इसी प्रकार कई वर्षों तक तपस्या करने से उस पत्थर पर भर्तृहरि के पंजे का निशान बन गया।
यह निशान आज भी भर्तृहरि की गुफा में राजा की प्रतिमा के ऊपर वाले पत्थर पर दिखाई देता है। पंजे का यह निशान काफी बड़ा है, जिसे देखकर सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि राजा भृर्तहरि की कद-काठी कितनी विशाल रही होगी। भृर्तहरि ने वैराग्य पर वैराग्य शतक की रचना की, जो कि काफी प्रसिद्ध है। इसके साथ ही भृर्तहरि ने श्रृंगार शतक और नीति शतक की भी रचना की। यह तीनों ही शतक आज भी उपलब्ध हैं।

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  • Kailash Vaishnav अदभुत ज्ञान मिला । आगे भी ऐसी ही ज्ञान की जानकारी की आशा रखता हु आपसे
  • Madhu Saxena इस कथा पर फ़िल्म भी बन चुकी है शायद सन् 50 के आसपास ।मेरी माँ इसके बारे में बताया करती थी ।बाबा गोरखनाथ ने राजा को शिष्य बनाने से पहले शर्त रखी थी की अपनी पत्नी को मैया कह कर भिक्षा मांगें । तो राजा ने वहीँ किया और राजा को साधू के वेश में देखकर रानी पSee More
  • Geetanjali Geet हम लोग जब भर्तरि गुफा देखने जाया करते थे तब केवल इतना मालूम था इन्द्रदेव ने राजा भर्तरि की तपस्या भंग करने के लिए उन पर शिला गिराई उस शिला को थामे रखने पर राजा भर्तरि के पंजे के निशान उस पर बन गए..आज पूरी कहानी पता चली शुक्रिया
  • Harshadkumar Kadia Bharathari Cave Ujjain-

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  • Bharat Soni On 19-4-2015 I visited Ujjain and this cave.

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हमारे जीवन में पानी का बहुत महत्व है


हमारे जीवन में पानी का बहुत महत्व है, क्योंकि पानी के बिना जीवन संभव ही नहीं है। धर्म ग्रंथों में भी पानी से संबंधित कई महत्वपूर्ण बातें बताई गई हैं। उसके अनुसार जिस घर में पानी का दुरुपयोग होता है वहां सदैव धन का अभाव रहता है और धन की देवी मां लक्ष्मी भी ऐसे घर में नहीं ठहरतीं। यही बात वास्तु शास्त्र में भी कही गई है। जानिए पानी का कैसा दुरुपयोग करने पर या उसे गंदा करने पर मां लक्ष्मी रुठ जाती हैं-

1. वास्तु शास्त्र के अनुसार जिस घर के नलों में व्यर्थ पानी टपकता रहता है। उस घर में सदा धन का अभाव रहता है। नल से व्यर्थ टपकते पानी की आवाज उस घर के आभा मंडल को भी प्रभावित करती है। इसलिए इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि घर के नलों से पानी व्यर्थ नहीं टपके।

2. स्कंदपुराण के अनुसार-
मलं मूत्रं पुरीषं च श्लेश्म: निष्ठीनाश्रु च।
गण्डूषाश्चैव मुञ्चन्ति ये ते ब्रह्ममहणै: समा:।।
अर्थात जो मनुष्य नदी, तालाब या कुंओं के जल में मल-मूत्र, थूक, कुल्ला करते हैं या उसमें कचरा फेंकते हैं, उनको ब्रह्महत्या का पाप लगता है। साथ ही ऐसे लोग कभी संपन्न नहीं होते।

3. हमारे धर्म शास्त्रों में एवं पुराणों में जल को बचाने के लिए जल को अंजली (हाथों से) से पीने को निषेध बताया गया है।
न वार्यञ्जलिना पिबेत-मनुस्मृति,स्कंदपुराण
जलं पिबेन्नाञ्जलिना-याज्ञववल्क्यस्मृति
क्योंकि इससे जल पीने में कम अंजली के आस पास से ढुलता ज्यादा है। इस संबंध में एक कथा भी प्रचलित है- समुद्र मंथन के समय लक्ष्मीजी से पहले उनकी बड़ी बहन अलक्ष्मी अर्थात दरिद्रता उत्पन्न हुई थी। उनको रहने के लिए स्थान बताते समय लोमश ऋषि ने जो स्थान बताए थे उनमें एक स्थान यह भी था कि जिस घर में जल का व्यय ज्यादा किया जाता हो वहां तुम अपने पति अधर्म के साथ सदैव निवास करना। अर्थात जिस घर में पानी को व्यर्थ बहाया जाता है, वहां दरिद्रता अपने पति अधर्म के साथ निवास करती है।

4. बहुत से लोगों को रात में भी स्नान करने की आदत होती है। किंतु शास्त्रों में रात के स्नान को निषिद्ध माना गया है।
निशायां चैव न स्नाचात्सन्ध्यायां ग्रहणं विना।
अर्थात- रात के समय स्नान नहीं करना चाहिए। जिस दिन ग्रहण हो केवल उस दिन ही रात के समय स्नान करना उचित रहता है। रात के समय स्नान करना जल का दुरुपयोग करने के समान है। जो भी जल का ऐसा दुरुपयोग करता है, उसके घर में सदैव धन का अभाव रहता है।

5. श्रीमद्भागवत में एक प्रसंग आता है जब गोपियां निर्वस्त्र होकर यमुना में स्नान कर रही होती हैं तब श्रीकृष्ण कहते हैं-
यूयं विवस्त्रा यदपो धृतव्रता व्यगाहतैत्तदु देवहेलनम्।
बद्ध्वाञ्जलिं मूध्न्र्यपनुत्तयेंहस: कृत्वा नमोधो वसनं प्रगृह्यताम्।।
श्रीकृष्ण ने अपनी परमप्रिय गोपियों से कहा कि तुमने निर्वस्त्र होकर यमुना नदी में स्नान किया इससे जल के देवता वरुण और यमुनाजी दोनों का अपमान हुआ अत:दोनों हाथ जोड़कर उनसे क्षमा मांगों।
भगवान इस प्रसंग से हमें ये सीख देते हैं कि जहां पर भी संग्रहित जल हो उस स्थान के स्वामी वरुण देवता होते है। उसको गंदा करने से या दूषित करने से जल के देवता का अपमान होता है व ऐसे लोग सदैव धन के अभाव में जीते हैं।

— with Sanjay Katariya and 48 others.

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जानिए किस भगवान को चढ़ता है कौन सा फूल?


जानिए किस भगवान को चढ़ता है कौन सा फूल?

भगवान अपने भक्त को छप्पन प्रकार का भोग लगा कर पूजा करने के लिए नहीं कहते हैं. वे तो केवल आपके सच्चे भक्ति-भाव से ही प्रसन्न हो जाते हैं. महाभारत में भी भगवान श्रीकृष्ण को दुर्योधन ने भोजन के लिए आमंत्रित किया तो कृष्ण उसका तिरस्कार कर विदुर के घर शाक-पात खाने को पहुंच गए. एक पुरानी कहावत है कि भक्त अपने सामर्थ से ‘पान का पत्ता न सही, पान का डंठल ही सही’ सच्चे मन से चढ़ाता है तो प्रभु खुश हो जाते हैं. प्रभु की सच्ची भक्ति और उपासना के लिए यह जरूरी है कि भक्तगण को यह ज्ञात हो कि किस देवी-देवता को कौन सा चढ़ावा प्रिय है.??
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आज बात करेंगे कि किस देवी-देवता को कौन सा फूल अति प्रिय है. मान्यता है कि प्रभु के प्रिय फूल को चढ़ाने से वह शीघ्र प्रसन्न होते हैं और भक्तों की मनोकामना पूरी करते हैं. देवों के इस श्रेणी में सबसे पहले पूजे जाने वाले श्री गणेशजी की बात करते हैं.

भगवान गणेश

देवों में सर्वप्रथम भगवान गणेशजी को तुलसी छोड़कर हर तरह के फूल पसंद है. खास बात यह है कि गणपति को दूब अधिक प्रिय है. दूब की फुनगी में 3 या 5 पत्त‍ियां हों, तो ज्यादा अच्छा रहता है. ध्यान रहे कि गणेशजी पर तुलसी कभी न चढ़ाएं.

भगवान महादेव

भोले बाबा को सभी सुगंधित पुष्प पंसद हैं. चमेली, श्वेत कमल, शमी, मौलसिरी, पाटला, नागचंपा, शमी, खस, गूलर, पलाश, बेलपत्र, केसर उन्हें खास प्रिय हैं. धतूरा और बेलपत्र महादेव को खास प्रिय हैं.

भगवान विष्णु

यदि आप भगवान विष्णु के भक्त हैं तो उन्हें तुलसी अर्पित करें. भगवान विष्णु को तुलसी बहुत पसंद है. काली तुलसी और गौरी तुलसी, उन्हें दोनों ही पंसद हैं. तुलसी के साथ कमल, बेला, चमेली, गूमा, खैर, शमी, चंपा, मालती, कुंद आदि फूल विष्णु को प्रिय हैं.

हनुमान जी

महावीर हनुमानजी को लाल फूल चढ़ाना ज्यादा अच्छा रहता है. वैसे उन्हें कोई भी सुगंधित फूल चढ़ाया जा सकता है.

सूर्य भगवान सूर्य को आक का फूल सबसे ज्यादा प्रिय है. मान्यता है कि अगर सूर्य को एक आक का फूल अर्पण कर दिया जाए, तो सोने की 10 अशर्फियां चढ़ाने का फल मिल जाता है. उड़हुल, कनेल, शमी, नीलकमल, लाल कमल, बेला, मालती आदि चढ़ाए है. ध्यान रहे कि सूर्य पर धतूरा, अपराजिता, अमड़ा और तगर कभी न चढ़ाएं.

माता गौरी और दुर्गा

आम तौर पर भगवान शंकर को जो भी फूल पसंद हैं, देवी पार्वती को वे सभी फूल चढ़ाए जा सकते हैं. सभी लाल फूल और सुगंधित सभी सफेद फूल भगवती को विशेष प्रिय हैं. बेला, चमेली, केसर, श्वेत कमल, पलाश, चंपा, कनेर, अपराजित आदि फूलों से भी देवी की पूजा की जाती है. आक और मदार के फूल केवल दुर्गाजी को ही चढ़ाना चाहिए, अन्य किसी देवी को नहीं. दुर्गाजी पर दूब कभी न चढ़ाएं. लक्ष्मीजी को कमल का फूल चढ़ाने का विशेष महत्व है.

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क्या आप जानते हैं कि कट्टर मुस्लिम बादशाह अकबर का घमंड इस मन्दिर में आकर टूटा


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क्या आप जानते हैं कि कट्टर मुस्लिम बादशाह अकबर का घमंड इस मन्दिर में आकर टूटा, यह 1542 से 1605 के मध्य का समय था तब अकबर दिल्ली का राजा था। ध्यानु भक्त माता ज्वाला जी का परम भक्त था। एक बार देवी के दर्शन के लिए वह अपने गांववासियो के साथ ज्वालाजी के लिए निकला। जब उसका काफिला दिल्ली से गुजरा तो मुगल बादशाह अकबर के सिपाहियों ने उसे रोक लिया और राजा अकबर के दरबार में पेश किया। अकबर ने जब ध्यानु से पूछा कि वह अपने गांववासियों के साथ कहां जा रहा है तो उत्तर में ध्यानु ने कहा वह जोतावाली के दर्शनो के लिए जा रहे है। अकबर ने कहा तेरी मां में क्या शक्ति है ? और वह क्या-क्या कर सकती है ? तब ध्यानु ने कहा वह तो पूरे संसार की रक्षा करने वाली हैं। ऐसा कोई भी कार्य नही है जो वह नहीं कर सकती है। अकबर ने ध्यानु के घोड़े का सर कटवा दिया और कहा कि अगर तेरी मां में शक्ति है तो घोड़े के सर को जोड़कर उसे जीवित कर दें। यह वचन सुनकर ध्यानु देवी की स्तुति करने लगा और अपना सिर काट कर माता को भेट के रूप में प्रदान किया। माता की शक्ति से घोड़े का सर जुड गया। फिर अकबर ध्यानू भक्त के साथ इस मन्दिर में आया और यहाँ बिना घी तेल बाती के जलती नौ जोतें देख कर हैरान हुआ और उन्हें बुझाने के लिए के नहर का पानी इन जोतों पर डलवाया, उसके बाद भी ये जोतें न बुझी ,इस प्रकार अकबर को देवी की शक्ति का एहसास हुआ। बादशाह अकबर ने देवी के मंदिर में सोने का छत्र भी चढाया। किन्तु उसके मन मे अभिमान हो गया कि वो सोने का सवा मण का भारी छत्र चढाने लाया है, तो माता ने उसके हाथ से छत्र को गिरवा दिया और उसे एक अजीब (नई) धातु का बना दिया जो आज तक वैज्ञानिकों को भी समझ नही आई है। अपने छत्र की हालत देख अकबर का घमंड टूटा और वो श्रधा से एक छोटा सोने का छत्र लेकर आया. अकबर पहला बड़ा छत्र आज भी मंदिर में मौजूद है। मंदिर का मुख्य द्वार काफी सुंदर एव भव्य है। मंदिर में प्रवेश के साथ ही बाये हाथ पर अकबर नहर है। इस नहर को अकबर ने बनवाया था। उसने मंदिर में प्रज्‍जवलित ज्योतियों को बुझाने के लिए यह नहर बनवाया था। उसके आगे मंदिर का गर्भ द्वार है जिसके अंदर माता ज्योति के रूम में विराजमान है। मंदिर में अलग-अलग नौ ज्योतियां है जिसे अलग-अलग नाम से जाना जाता है। इसमें ज्वाला माता का एक शयन कक्ष भी है जिस के बारे में कहा जाता है कि ज्वाला माँ हर रात्रि इस कक्ष में शयन करती हैं और वास्तव में एक आश्चर्यजनक बात देखने को मिलती है कि यहाँ सांयकाल की शयन आरती के बाद माता की सेज सज़ा कर उसके पास एक पानी का लोटा और एक दांतून रखी जाती है और फिर शयन कक्ष के द्वार सुबह तक बंद कर दिए जाते हैं , फिर जब सुबह द्वार खोले जाते हैं तो सेज की चादर पर सिलवटें मिलती हैं और दान्तुन भी की हुई मिलती है. के लिए थोडा ऊपर की ओर जाने पर गोरखनाथ का मंदिर है जिसे गोरख डिब्बी के नाम से जाना जाता है। इस मे एक पानी का एक कुन्द (KUND) है जो देख्नने मे खौलता हुआ लगता है पर वास्तव मे एकदम गरम नही है। ज्वालाजी के पास ही में 4.5 कि.मी. की दूरी पर नगिनी माता का मंदिर है। इस मंदिर में जुलाई और अगस्त के माह में मेले का आयोजन किया जाता है। 5 कि.मी. कि दूरी पर रघुनाथ जी का मंदिर है जो राम, लक्ष्मण और सीता को समर्पि है। इस मंदिर का निर्माण पांडवो द्वारा कराया गया था। ज्वालामुखी मंदिर की चोटी पर सोने की परत चढी हुई है।ज्वालाजी में नवरात्रि के समय में विशाल मेले का आयोजन किया जाता है। साल के दोनों नवरात्रि यहां पर बडे़ धूमधाम से मनाये जाते है। नवरात्रि में यहां पर आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या दोगुनी हो जाती है। इन दिनों में यहां पर विशेष पूजा अर्चना की जाती है। अखंड देवी पाठ रखे जाते हैं और वैदिक मंत्रोच्चारण के साथ हवन इत्यादि की जाती है। नवरात्रि में पूरे भारत वर्ष से श्रद्धालु यहां पर आकर देवी की कृपा प्राप्त करते है। कुछ लोग देवी के लिए लाल रंग के ध्वज भी लाते है।मंदिर में आरती के समय अद्भूत नजारा होता है। मंदिर में पांच बार आरती होती है। एक मंदिर के कपाट खुलते ही सूर्योदय के साथ में की जाती है। दूसरी दोपहर को की जाती है। आरती के साथ-साथ माता को भोग भी लगाया जाता है। फिर संध्या आरती होती है। इसके पश्चात रात्रि आरती होती है। इसके बाद देवी की शयन शय्या को तैयार किया जाता है। उसे फूलो और सुगंधित सामग्रियों से सजाया जाता है। इसके पश्चात देवी की शयन आरती की जाती है जिसमें भारी संख्या में आये श्रद्धालु भाग लेते है। जब अवसर मिले यहाँ अवश्य जा कर देखें.

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राजतरंगिणी



राजतरंगिणी

राजतरंगिणी कल्हण द्वारा रचित एक संस्कृत ग्रन्थ है। जिसकी रचना 1148 से 1150 के बीच हुई। कश्मीर के इतिहास पर आधारित इस ग्रंथ की रचना में कल्हण ने ग्यारह अन्य ग्रंथों का सहयोग लिया है जिसमें अब केवल नीलमत पुराण ही उपलब्ध है।
यह ग्रंथ संस्कृत में ऐतिहासिक घटनाओं के क्रमबद्ध इतिहास लिखने का प्रथम प्रयास है। इसमें आदिकाल से लेकर 1151 ई. के आरम्भ तक के कश्मीर के प्रत्येक शासक के काल की घटनाओं क्रमानुसार विवरण दिया गया हैं| यह कश्मीर का राजनीतिक उथलपुथल का काल था। आरंभिक भाग में यद्यपि पुराणों के ढंग का विवरण अधिक मिलता है।, परंतु बाद की अवधि का विवरण पूरी ऐतिहासिक ईमानदारी से दिया गया है।
अपने ग्रंथ में कल्हण ने इस आदर्श को सदा ध्यान में रखा है इसलिए कश्मीर के ही नहीं, तत्काल भारतीय इतिहास के संबंध में भी राजतरंगिणी में बड़ी महत्त्वपूर्ण और प्रमाणिक सामग्री प्राप्त होती है। राजतंरगिनी के उद्धरण अधिकतर इतिहासकारों ने इस्तेमाल किये है। इस ग्रंथ से कश्मीर के इतिहास के बारे में जानकारी मिलती है।
कल्हण की राजतरंगिणी में कुल आठ तरंग एवं लगभग 8000 श्लोक हैं। पहले के तीन तरंगों में कश्मीर के प्राचीन इतिहास की जानकारी मिलती है। चौथे से लेकर छठवें तरंग में कार्कोट एवं उत्पल वंश के इतिहास का वर्णन है। अन्तिम सातवें एवं आठवें तरंग में लोहार वंश का इतिहास उल्लिखित है। इस पुस्तक में ऐतिहासिक घटनाओं का क्रमबद्ध उल्लेख है।
कल्हण ने पक्षपातरहित होकर राजाओं के गुण एवं दोषों का उल्लेख किया है। पुस्तक के विषय के अन्तर्गत राजनीति के अतिरिक्त सदाचार एवं नैतिक शिक्षा पर भी प्रकाश डाला गया है।
कल्हण ने अपने ग्रंथ राजतरंगिणी में संस्कृत भाषा का प्रयोग किया है।
रचना काल

यह माना जाता है कि ‘राजतरंगिणी’ 1147 से 1149 ईस्वी के बीच लिखी गई। बारहवीं शताब्दी का यह काल कश्मीर के इतिहास का एक ऐसा काल है जिसे यूं भी कहा जा सकता है कि आज वही इतिहास अपने आपको फिर से दोहरा रहा है। कल्हण के समय कश्मीर राजनीतिक अस्थिरता और उठापटक के दौर से गुजर रहा था। कल्हण ने कश्मीर के इतिहास की सबसे शक्तिशाली महिला शासक दिद्दा का उल्लेख किया है, जो 950-958 ईस्वी में राजा क्षेमगुप्त (क्षेमेन्द्र गुप्त) की पत्नी थी और शारीरिक रूप से कमज़ोर पति के कारण उसी ने सत्ता का पूरी तरह उपयोग किया। वह पति की मृत्यु के बाद सिंहासन पर बैठी और उसने एक साफ़ सुथरा शासन देने की कोशिश करते हुए भ्रष्ट मंत्रियों और यहां तक कि अपने प्रधानमंत्री को भी बर्खास्त कर दिया लेकिन दिद्दा को सत्ता और वासना की ऐसी भूख थी, जिसके चलते उसने अपने ही पुत्रों को मरवा दिया। वह पुंछ के एक ग्वाले तुंगा से प्रेम करती थी, जिसे उसने प्रधानमंत्री बना दिया। इतिहास का ऐसा वर्णन सिवा कल्हण के किसी और संस्कृत कवि ने नहीं किया। 120 छंदों में लिखित ‘राजतरंगिणी’ में यूं तो कश्मीर का आरम्भ से यानी ‘महाभारत’ काल से लेकर कल्हण के काल तक का इतिहास है, लेकिन मुख्य रूप से इसमें राजा अनंत देव के पुत्र राजा कैलाश के कुशासन का वर्णन है। कल्हण बताते हैं कि कश्मीर घाटी पहले एक विशाल झील थी जिसे कश्यप ऋषि ने बारामुला की पहाड़िया काटकर ख़ाली किया। श्रीनगर शहर सम्राट अशोक महान ने बसाया था और यहीं से बौद्ध धर्म पहले कश्मीर घाटी में और फिर मध्य एशिया, तिब्बत और चीन पहुंचा।[1]
राजतरंगिणी का महत्त्व

‘राजतरंगिणी’ एक ऐसी रचना है, जिसे संस्कृत के ऐतिहासिक महाकाव्यों का ‘मुकुटमणि’ कहा जा सकता है। इसके रचयिता कश्मीरी कवि ‘कल्हण’ हैं। संस्कृत साहित्य में इतिहास को इतिहास मानकर लिखने वाले तथ्यों को तिथि आदि के प्रामाणिक-साक्ष्य और क्रम के साथ प्रस्तुत करने वाले ये अब तक ज्ञात पहले कवि हैं यही कारण है कि इनकी कृति ‘राजतरंगिणी’ का देश-विदेश में सर्वत्र आदर हुआ है। यह कश्मीर के राजाओं का विस्तृत इतिहास है, जिसका रचना-शिल्प बहुत कुछ महाभारत जैसा और अनेक काव्य-गुणों से समृद्ध है। इसमें महाभारत-काल से आरम्भ कर 1150 ईसवी तक के कश्मीरी नरेशों का इतिवृत्त तथा चरित्रांकन अत्यन्त हृदय तथा प्रसादिक शैली में किया गया है। राजतरंगिणी आठ तरंगों में विभक्त है, जिनमें कुल लगभग 7826 श्लोक हैं। प्रारम्भ में छह तरंग छोटे तथा अन्तिम दो तरंग बहुत बड़े हैं, जिनमें आठवां तरंग, समस्त ग्रन्थ के आधे परिमाण से भी अधिक है। अपने लेखन के समय से ही ‘राजतरंगिणि’ अत्यन्त लोकप्रिय रही है।[2]
इतिहास का सूत्रपात

कल्हण पारम्परिक अनुश्रुतियों के आधार पर, पौराणिक शैली में जलोद्भव नामक असुर के वध और प्रजापति कश्यप द्वारा कश्मीर मण्डल की स्थापना से इस इतिहास का सूत्रपात करते हैं। विक्रम पूर्व बारहवीं शताब्दी के किसी गोनन्द नामक राजा की कथा से राजचरित का क्रम आरम्भ होता है। उनके इस वर्णन का बहुत कुछ आधार ‘नीलमतपुराण’ है, इसके अतिरिक्त इस विषय में उन्होंने अपने से पूर्व लिखे गए ग्यारह ग्रन्थों और पहले के राजाओं के अभिलेख, प्रशस्तिपत्र एवं वंशावलियों के देखे जाने का भी उल्लेख किया है।[3] कवि, इस वर्णन में ज्यों-ज्यों अपने समय की ओर अभिमुख होते जाते हैं, यह पौराणिकता एवं कल्पना-प्रवणता धीरे-धीरे कम होती जाती है और यथार्थ का ठोस धरातल उभरता दिखलाई पड़ता है। 812 ईसवी तक के राजाओं का वर्णन बिना तिथि के ही चलता है, किन्तु 813-814 ईस्वी से इस वर्णन में तिथिक्रम का स्पष्ट उल्लेख प्राप्त होता है। अष्टम तरंग तो कवि की स्वयं आंखों देखी और अनुभूत घटनाओं का प्रामाणिक लेखा-जोखा है। संक्षेप में इसके प्रत्येक तरंग में राजाओं का विवरण इस प्रकार है-
प्रथम तरंग

गोनन्द प्रथम से लेकर अन्ध युधिष्ठिर तक 75 राजाओं का विवरण है।
द्वितीय तरंग

6 राजाओं के 192 वर्षों के शासनकाल का अंकन किया गया है।
तृतीय तरंग

गोनन्द वंश के अन्तिम राजा बालादित्य तक दश राजाओं के 536 वर्षों के राज्यकाल का विवरण है।
चतुर्थ तरंग

260 वर्षों तक राज्य करने वाले 17 नृपों का इतिहास निरूपित है।
पंचम तरंग

अवन्तिवर्मा के राज्यारोहण के साथ उत्पल वंश के सूत्रपात का वर्णन तथा कल्यापाल वंशज संकटवर्मा, सुगन्धादेवी और शंकर वर्मन के राज्यकाल का निरूपण है।
षष्ठ तरंग

10 राजाओं के, 936 से 1003 ईस्वी तक के शासनकाल का विवरण दिया गया है।
सप्तम तरंग

6 राजाओं के सन् 1003 से 1101 ईस्वी तक के समय का चित्रण है।
अष्टम तरंग

सातवाहन वंश के, उच्चल, सुस्सल, भिक्षाचर और जयसिंह आदि राजाओं की जीवनगाथा तथा कृत्यों का प्रत्यक्षीकरण कराया गया है। प्रथम चार तरंगों में ऐतिहासिक तथ्यपरकता की दृष्टि से कई स्थल कल्हण में संदिग्ध हैं। वे पुराणों और आख्यानों से प्राप्त अतिप्राकृत और अविश्वसनीय घटना-प्रसंगों का भी विवरण विश्वासपूर्वक दे देते हैं। पर पांचवें तरंग से जैसे-जैसे वे अपने समय के निकट आते हैं, वे एक खरे इतिहासकार की भांति तथ्यों को जांच परख कर प्रस्तुत करते है, वे तथ्यों की जांच के लिये उपलब्ध सामग्री का हवाला भी देते हैं।
सिंध पर पहला मुस्लिम आक्रमण

सन् 712 ईस्वी में सिंध पर पहला मुस्लिम आक्रमण हुआ और 1000 ईस्वी के आस-पास महमूद गजनी ने भारत को रौंदना शुरू किया। कल्हण ने षष्ठ और अष्टम तरंगों में देश की राजनीतिक और ऐतिहासिक परिस्थितियों पर दूरगामी प्रभाव छोड़ने वाले इन आक्रमणों का उल्लेख किया है। कश्मीर में मुस्लिम संस्कृति के प्रवेश का भी वे संकेत देते हैं।
राजा हर्ष का उत्थान और पतन

कल्हण ने राजा हर्ष के उत्थान और पतन का जो विशद विवरण दिया है, वह भारतीय इतिहास का एक महत्त्वपूर्ण अध्याय है। किशोरावस्था में हर्ष बड़ा गुणानुरागी और काव्यात्मक प्रवृत्ति वाला था। उसका लोभी पिता कलश विद्वानों से द्रोह रखता था, पर हर्ष स्वयं भूखा रहकर अपना खर्च पंडितों और कवियों को दे डालता था[4] उसने राज्यारूढ होने पर अपने विद्वत्प्रेम को चरितार्थ किया। प्रजा की प्रार्थना सुनने के लिए तो उसने अपने प्रसाद के चारों ओर बड़े-बड़े घंटे लगवा दिये थे, जिनके बजते ही वह प्रार्थियों से स्वयं मिलने पहुंच जाता। यहां तक कि कर्नाटक के राजा से विद्यापति की उपाधि पाने वाले विल्हण भी हर्ष के काव्य और कला के प्रति अनुराग की कथा सुनकर उसके लिये स्पृहा करता था।[5] पर इसी हर्ष को धीरे-धीरे चाटुकारों ने घेर लिया। उसका अन्त:पुर सुंदरियों से भर गया। वह विलासी बन गया और अविवेकी अमात्यों के परामर्श पर जनता को लूटने लगा। उसने योग्य मंत्री कंदर्प को बंदी बनाने का प्रयास किया, अपने ही भतीजों की हत्या करवायी, यहां तक कि देवालयों से स्वर्ण और रत्न भी उसने लूटे। कर्नाटक के राजा पर्माडि (विक्रमादित्य षष्ठ) की पत्नी चन्दा (चन्द्रावती) का चित्र देखकर वह इतना कामातुर हो उठा कि कर्नाटक के राजा से युद्ध कर उसकी रानी को प्राप्त करने की उसने ठान ली।[6] वह कर्नाटक तक आक्रमण करने न पहुंच सका, पर धूर्त लोग रानी चन्द्रा के नाम पर उससे रुपया लूटते रहे। अन्त में बड़ी कारुणिक और विडंबनामय स्थितियों में हर्ष की जीवनलीला समाप्त हुई। कल्हण ने राजा हर्ष के उत्थान और मर्मान्तक पतन का रोमांचक इतिहास 1400 पद्यों में लिखा है, और यह पूरा अंश अपने आप में उनके समय का न केवल कच्चा चिट्ठा है, वह एक विराट महाकाव्य भी है। इसी प्रकार अवन्तिवर्मा, कलश, रानी दिद्दा आदि के शासनकाल के प्रसंग भी अपने आप में अलग-अलग महाकाव्यों का आस्वाद देते हैं तथा कश्मीर के कुछ शताब्दियों के इतिहास को भी प्रामाणिक रूप में प्रस्तुत करते हैं।
समग्र अष्टम तरंग

कवि का भोगा हुआ अपना वर्तमान ही है। यह समय कश्मीर के इतिहास में, वंशानुगत संघर्षों, षड्यन्त्रों, विद्रोहों तथा रक्तरंजित क्रान्तियों का काल था, उस समय काश्मीर का जनजीवन तथा प्रशासन दोनों ही अस्थिर तथा भयग्रस्त थे। कल्हण ने हर्ष (सन् 1089-1101 ईस्वी) के जीवन, नैतिक पतन, विश्वासघात तथा दु:खद अंत का ऐसा प्रभावी चित्रण किया है, जिसे पढ़कर रोमांच हो जाता है। कश्मीर के कुलीन अमीरों के रक्तरंजित अत्याचार, उनके आपसी संघर्ष, तत्कालीन अकाल, जल-प्लावन, अग्निदाह आदि प्राकृतिक विपत्तियों का जो वर्णन कवि ने किया है उसमें उनकी अपनी भोगी हुई पीड़ा के दंश भी विद्यमान हैं। अपने देश और काल की यह दु:खद स्थिति कवि को मर्मान्तक वेदना दे रही थी, किन्तु वह विवश था। परिस्थितियों ने उसे एकाकी बना दिया था। कदाचित् इन्हीं परिस्थितियों से प्रेरित होकर अपने ढंग से उनका प्रतिकार करने की भावना से ही कवि ने लेखनी का यह शस्त्र उठाया था। ‘राजतरंगिणी’ की रचना उसी का परिणत फल है।
ऐतिहासिक कृति

‘राजतरंगिणी’ एक निष्पक्ष और निर्भय ऐतिहासिक कृति है। ग्रन्थाकार के मतानुसार एक सच्चे इतिहास लेखक की वाणी को न्यायाधीश के समान राग-द्वैष-विनिर्मुक्त होना चाहिए, तभी उसकी प्रशंसा हो सकती है-

श्लाध्य: स एव गुणवान् रागद्वेषबहिष्कृता।
भूतार्थकथने यस्य स्थेयस्येव सरस्वती॥[7]

अपनी कृति में उन्होंने इस कसौटी का पूर्णरूप से पालन किया है। राजतरंगिणी में राजाओं के चारित्रिक पतन एवं कश्मीरी लोगों के प्रवंचनामय चरित्र का वे खुलकर उद्घाटन करते हैं। मन्त्रियों के पारस्पिरिक विरोध, सेनाध्यक्षों में मतभेद, सैनिकों में अनुशासनहीनता, पुराहितों में दम्भ तथा षड्यन्त्रकारिता, जनसामान्य के गृह-कलह और छल-प्रपंच का स्पष्ट अंकन करने में उन्हें तनिक भी संकोच नहीं होता। यह सब होते हुए भी तरंगिणीकार की कश्मीरभूमि के प्रति आत्मीय-आस्था और प्रीति अक्षुण्ण और अडिग है। अपनी जन्मभूमि को स्वर्ग से भी अधिक निरूपित करते हुए वे कहते हैं कि ऊँचे-ऊँचे विद्याभवन, केसर, शीतल जल और द्राक्षा- ये सब स्वर्ग में भी दुर्लभ वस्तुएं जिस कश्मीर में सामान्यत: प्राप्य हैं उसकी तुलना भला और किससे की जा सकती है-

विद्यावेश्मानि तुङ्गानि कुङ्कुमं साहिमं पय:।
द्राक्षेति यत्र सामान्यमस्ति त्रिदिवदुर्लभम्॥[8]

फिर भी राजतरंगिणी कोरा इतिहास ग्रन्थ ही नहीं है। काव्यात्मक चारुता का सन्निवेश भी उसमें देखा जा सकता है। लक्षण ग्रन्थों की प्रचलित परिभाषा के अनुसार इसका महाकाव्यत्व भले ही उत्पन्न न होता हो, किन्तु है वह चित्तावर्जक काव्य ही, और अपने आकारगत तथा विषयगत महत्त्व के कारण इसे एक पृथक् शैली का ऐतिहासिक महाकाव्य कहने में किसी को भी कोई अनुपपत्ति नहीं हो सकती। महाकवि कल्हण अमृतस्यन्दी सुकवि के गुणों की वन्दना करते हुए उन्हें कवि और वर्णनीय विषय दोनों को अमर कर देने वाला रसायन स्वीकार करते हैं[9] सिद्ध करते है।[10]उनके अनुसार, जिनकी भुजाओं की छत्रछाया में समुद्र सहित यह धरती सुरक्षित रहती है, वे बड़े-बड़े बलशाली राजागण जिसकी कृपा के बिना स्मरण भी नहीं किये जाते वह प्रकृति का सर्वोत्कृष्ट कविकर्म ही नमस्कार योग्य है-

भुजवनतरुच्छायां येषां निषेव्य महौजसां
जलधिरशनामेदिन्यासीदसावकुतोभया ॥
स्मृतिमपति न ते यान्ति क्ष्मापा विना यदनुग्रहं
प्रकृतिमहते कुर्मस्तस्मै नम: कविकर्मणे॥[11]
भाषा और शैली

सहस्रों वर्षों की कालावधि में उत्पन्न, भिन्न-भिन्न शील, स्वभाव तथा इतिवृत्त वाले विविध नरेशों का वर्णन होने के कारण इसकी शैली में सतत गत्वरता और एक प्रकार की सामासिकता है, अत: अन्य महाकाव्यों की भांति शृंगार, वीर, हास आदि रसों का तथा आलम्बन-उद्दीपन के रूप में सोद्देश्य किये गये प्राकृतिक वर्णनों का वैसा चमत्कार तो नहीं मिलता। फिर भी प्रसंगानुसार, सभी रसों का उचित सन्निवेश तथा इतिवृत्त की पीठिका के रूप में प्रकृति के चित्रमय वर्णनों की उपलब्धि यहां देखी जा सकती है।
शान्त रस

हमारे आद्य इतिहास महाभारत की भांति राजतरंङ्गिणी का अंगी रस भी ‘शान्त’ है। कल्हण, एक दार्शनिक की भांति संसार की क्षणभंगुरता पर विचार करते हुए काव्यशास्त्रीय दृढ़ता से ‘शान्त’ रस की सर्वोत्कृष्टता सिद्ध करते हैं-

क्षणभङ्गिनि जन्तूनां स्फुरिते परिचिन्तिते।
मूर्धाभिषेक: शास्तस्य रसस्यात्र विचार्यताम्॥[12]
छंद

तरंगिणी की शैली सामान्यत: सरल-तरल है। कवि ने अपनी रचना में वैदर्भी-रीति तथा अनुष्टुप् छन्द का ही आश्रय लिया है, किन्तु कहीं-कहीं पांचाली और गौड़ीरीति तथा बीच-बीच में वसन्ततिलका, शार्दूलविक्रीडित, हरिणी आदि बड़े छन्दों का भी प्रयोग दिखलाई पड़ता है।
अलंकार

अलंकारों का प्रयोग भी सहज और अकृत्रिम रूप से हुआ हैं। उपमा, उत्प्रेक्षा, रूपक, दीपक, अतिशयोक्ति, दृष्टान्त आदि अर्थालंकार तथा अनुप्रास आदि शब्दालंकार स्वाभाविक रूप से उपस्थित हुए हैं। कश्मीर वर्णन में यह उत्प्रेक्षा कितनी रमणीय है-

असन्तापार्हतां जानन् यत्र पित्रा विनिर्मिते।
गौरवादिव तिग्मांशुर्धत्ते ग्रीष्मेऽप्यतीव्रताम्॥[13]
पिता कश्यप जी के द्वारा स्थापित किए गए कश्मीर-मण्डल को ताप देना उचित नहीं है मानो यह सोचकर वहां ग्रीष्म में भी सूर्य अपनी किरणों में तीखापन नहीं लाते। ब्राह्मणों के अपकार रूप दुष्ट-कर्म से तारापीड नामक राजा नष्ट हो गया। इस वर्णन में कवि ने अग्नि और मेघ का यह सुन्दर दृष्टान्त प्रस्तुत किया है-

योऽयं जनोपकरणाय श्रयत्युपायं

तेनैव तस्य नियमेन भवेद् विनाश:।
धूमं प्रसौति नयनान्ध्यकरं यमग्नि-
र्भूत्वाम्बुद: स शमयेत् सलिलैस्तमेव॥[14]
राजतरंगिणी में स्थान-स्थान पर सूक्तिमुक्ताप्रसविनी पद्य-सूक्तियाँ बिखरी पड़ी हैं। जिनमें कवि के संघर्षमय, प्रौढ़ जीवन का अनुभव, आभा बनकर झांकता प्रतीत होता है। यदि शीलरूपी चिन्तामणि का विगलन हो गया तो फिर जीवन में सारे दुर्गुण क्रमश: किस प्रकार आते-जाते हैं इसका वर्णन देखिए-

प्रागुन्मीलति दुर्यश: सुविषमं गर्ह्योऽभिलाषस्ततो
धर्म: पूर्वमुपैति संक्षयमथो श्लाघ्योऽभिमानक्रम:।
सन्देहं प्रथमं प्रयात्यभिजनं पश्चात्पुनर्जीवितं
किं नाभ्येति विपर्ययं विगलने शीलस्य चिन्तामणे:॥[15]
कवि ने तत्कालीन राजाओं की विलासिता, नृशंसता और मूर्खता का खुलकर चित्रण किया है। इस समय के नरेश, दुर्लभ मृगनयनियों को प्राप्त करने में, घोड़ों की ख़रीद-फरोक्त में, विट और वैतालिकों के द्वारा अपनी प्रशंसा करवाने में ही अपने धन का अपव्यव कर डालते हैं[16] प्रजारक्षण में विनियुक्त उनका सम्पूर्ण समय रूठी कामिनियों को मनाने में, घोड़ा-हाथी आदि की ख़रीददारी में और नौकरों के साथ शिकार करने में ही बीत जाता है।[17] अपनी युक्तियों में तत्कालीन सामाजिक परिस्थितियों से उद्धृत अनेक मार्मिक चित्र कवि ने उपस्थित किए हैं, जिनमें अनुभूति और संवेदना की निश्छल अभिव्यक्ति हुई है।

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मीरा : एक दिव्‍य दास्‍तां के कदमों की निशानी


मीरा : एक दिव्‍य दास्‍तां के कदमों की निशानी

मीरां उस दौर के एक स्‍त्री-जीवन का नाम है जब पति के न रहते नारी को नितांत अरक्षित करार देने के प्रयास परवान पर थे, साम्राज्‍य व संपत्ति विस्‍तार की लिप्‍सा में शासक एक दूसरे के दुर्ग पर कब्‍जा कर जमीन से लेकर जाेरु तक को अपनी लूट की मिल्कियत मानने का दंभ पाले हुए रहते थे और दबाव में आए शासकों के सामने कुल की विधाओं और योद्धाओं की परिणिताओं की सुरक्षा की सुविचारित नीति का अभाव था। ऐसे दौर में सर्वेश्‍वर की शरणागति ही ढाल भी थी और तलवार भी। जिसे भक्ति का नाम दिया जाता है, वह लोकाश्रय का सबसे बड़ा साधन भी है और स्‍त्री का अपना कारगर रक्षात्‍मक उपाय भी। मीरांबाई का जीवन एेसे ही हालात के येन-केन- प्रकारेण निर्वाह का स्‍वत:सिद्ध प्रतिबिंब है। इस जीवन की झांकी काे सर्वाधिक धो-पोंछकर निखारने और सहानुभूति, जो संस्‍कृत स्‍वरूप में श्रद्धा है, की पीठिका पर स्‍थापित करने का सर्वांगतया श्रेय लोक काे है। लोक की यों तो कोई भौगा‍ेलिक सीमा या ओर-छोर नहीं मगर मीरां के यात्रा और प्रभाव क्षेत्र के रूप में मेवाड़ से कहीं अधिक गुजरात और दूसरे स्‍थान पर ब्रज ने उस स्‍त्री जीवन को यशस्‍वी बनाने का सर्वसंभव किया जिसको इतिहास का कोई भी साधन कदाचित ही बना पाता। लोक की यह सबसे बड़ी ताकत है कि जिसे वह नयनपुतली पर बिठाता है, उसे अदृश्‍य नहीं होने देता। मीरां का जीवन ऐसे ही लोक का आलोक बना और बना हुआ है।
मारवाड़ ने मीरां को बेटी के रूप में देखा और मेवाड़ ने बहू की तरह। स्‍त्री जीवन के ये दो ही पलड़े हैं। बेटी होकर बड़ी होना और बहू होकर सीमा (मर्यादाओं) में सांस लेना, विदाई दोनों में ही होती है। दुल्‍हन के रूप में और दिवंगता होकर। मेड़ता उसे रख नहीं सकता था और मेवाड़ उसे रख नहीं पाया। वह ब्रज पहुंची तो बैरागन के वेश में थी जो भले ही सांवरिया को रिझाने का दैहिक चाेला भर था मगर वहां के पुरुष वर्चस्‍व ने स्‍त्री भावोचित विचारों को अवसर देना उचित नहीं समझा, फिर संप्रदाय-धर्मिता के आग्रहों के तिरस्‍कार ने तो नारी के पांव ही उखाड़ दिए। ऐसे में व्‍यापार में संलग्‍नता सहित संप्रदाय पाश से लगभग मुक्‍त गुजरात की ओर रुख ही अन्‍यतम उपाय था। मीरां ने गुजरात की राह ली और खासकर सौराष्‍ट्र ने छली में बली की हैसियत वाली मीरां को अंगीकार भी किया और आदर भी दिया।
गुजरात के लिए मीरा अति‍‍थि थी। स्‍वगोत्रीय राजे-सामंतों और उनकी स्त्रियों ने तंबूरे के दम पर गिरधर गुणगायिका को जिस भी नजर से देखा हो, परंतु लोक के लिए वह ‘सत्’ की चित्‍कारभरी लपटों से बचकर निकली थी, जिसे ‘सांप पिटारा’ और ‘जहर प्‍याला’ के रूप में जाना गया, वह प्रहलाद जैसे कौतुक से कहीं अधिक थी। गुजरात वासियों ने सीता सुलक्षणी (संत पीपाजी की स्‍त्री) के बाद कुल-लाज छोड़े मीरां को श्रीकृष्‍ण से संबद्ध स्‍थलों पर विहार करते देखा तो लगाव जागा। उस पाहुनी के इतने प्रशंसक हो गए कि उसे बार-बार न्‍यौता जाने लगा : म्‍हारै घरां आवौ नी प्रीतम प्‍यारा। उसका आतिथ्‍य जहां कहीं, जब कभी एकरस या निरस हुआ, वह यात्रा पर निकली। महाराणा कुंभा और रायमल के बाद सांगा के चर्चे तो वहां पहले ही थे, उसी कुल की रानी तंबूरा बजाते, नाचते-गाते दीखे तो कौन नहीं देखना चाहेगा। य‍ह निनादमयता ही मीरां के लिए वरदान बनी। स्‍मृतियों में पिता, भ्राता, पति और पुत्र के हाथों रक्षित कही जाने वाली नारी लोक के पास सुरक्षित हो निर्भय हो गई। गुजरात ने मीरां को अपनाया ही नहीं, बचाया और छुपाया भी। उसे इतना मान और मोह दिया कि कोशिशों में भी मेवाड़ याद नहीं आया। उसके हर प्रसंग को कौतुक सा कीर्तिमय किया, उसके निर्देश पर निर्मितियाें का निरूपण किया। यही नहीं, उसके ‘इह’ को अपने में ऐसा अलोपा कि ‘पर’ होकर भी उसे पराई नहीं होने दिया। उसके आराध्‍य को भी उसकी चुनर के रंग में चित्रित, वस्‍त्र मंडित करने की परंपरा का प्रवर्तन किया।
” पचरंग चाेला पहर सखी री ” मीरां के जीवन और तत्‍कालीन समाज पर केंद्रित कृति है। ये ही विषय आरंभान्‍त अपने में विभिन्‍न साक्ष्‍यों, सन्‍दर्भों को समेटे हुए हैं। कृतिकार डॉ. माधव हाड़ा ने पूर्व-तत्-पर साक्ष्‍यों को स्‍थल-स्‍थल पर उद्धृत करते हुए मीरां के जीवन का रेखाचित्र खींचने का श्‍लाघ्‍नीय प्रयास किया है। इस चरित्र पर अब तक आई कृतियों की अपेक्षा इसमें सर्वाधिक पंक्तियां उद्धरण के रूप में हैं जिनका विश्‍लेषण भी उद्धरणों से ही पुष्‍ट-प्रबल हुआ है। यह मुग्‍धता से ज्‍यादा एक भक्तिमती के ज्‍यों के त्‍यों चरित्र पर समकालीन विवेचन का स्‍वरूप है। सुन्दर सज्‍जा और साफ सुथरे 166 मु्द्रित, चित्रित पृष्‍ठों वाली, भूमिका रहित होकर भी यह कृति बधाई बटोरती है। – डॉ. श्रीकृष्‍ण ‘जुगनू’

Shri Krishan Jugnu's photo.
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