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भीतरगाँव मंदिर के नाम से ही इसकी स्थिति का पता चलता है।


भीतरगाँव मंदिर के नाम से ही इसकी स्थिति का पता चलता है। किवदंती के अनुसार यह पुष्पपुर या फूलपुर नामक प्राचीन गाँव के आंतरिक भाग में स्थित है। भीतरगाँव में एक प्राचीन मंदिर है जिसका निर्माण 6 वीं शताब्दी में भारत के स्वर्णिम गुप्तकाल के दौरान हुआ था। अत: इस मंदिर का नाम इस गाँव के आधार पर पड़ा।
भीतरगाँव मंदिर को सबसे प्राचीन हिन्दू पवित्र स्थान माना जाता है जिसमें ऊंची छत या शिखर है। 68.25 ऊंची यह संरचना टेराकोटा और 18 इंच लम्बी, 9 इंच चौड़ी और 3 इंच मोटी ईंटों से बनी है। यह 36 फीट लंबे और 47 फीट चौड़े मंच पर बना है। मंदिर की दीवारों की मोटाई 8 फीट है।
इसमें एक गुम्बदाकार मेहराब है जिसका उपयोग भारत में पहली बार किया गया। पूरा ढांचा उस समय की वास्तुकला का प्रमाण है। 15 फीट लम्बा और 15 फीट चौड़ा यह गर्भगृह दो मंजिला है और यह देवी सीता के अपहरण से अधिक नर और नारायण की पश्चाताप की हिंदु अवधारणा को प्रस्तुत करता है।[bhitargaon kanpur]

Jigna Shah's photo.
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भिक्षापात्र भगवान बुद्ध का नहीं है।


गुंजन अग्रवाल's photo.
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काबुल-स्थित अफगानिस्तान के राष्ट्रीय संग्रहालय काबुल प्रवेश द्वार पर रखे भगवान बुद्ध के 350-400 किलोग्राम वजनी भिक्षापात्र के अध्ययन के लिए भारत ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के नागपुर स्थित फारसी और अरबी पुरालेख विभाग के विशेषज्ञ जी.एस. ख्वाजा और पी.के. मिश्र को अफगानिस्तान भेजाI दल ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि यह भिक्षापात्र भगवान बुद्ध का नहीं है।
उल्लेखनीय है कि भगवान बुद्ध ने अपना भिक्षापात्र कुशीनारा जाते समय वैशाली के लोगों को भेंटस्वरूप दिया था. तब से यह भिक्षापात्र वैशाली में था लेकिन प्रथम शताब्दी ईसवी में कुषाण शासक कनिष्क यह भिक्षापात्र संस्क़ृत बौद्ध महाकवि अश्वघोष के साथ 6 करोड़ रुपये में खरीदकर पुरुषपुर (पेशावर) ले गया था। कई चीनी यात्रियों ने इस भिक्षापात्र को तीसरी से नौवीं शताब्दी के बीच पेशावर और बाद में कंधार में देखने का दावा किया। यह भिक्षापात्र अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति नजीबुल्ला के शासनकाल में कंधार में था जिसे बाद में काबुल लाया गया। तब से वह काबुल के राष्ट्रीय संग्रहालय में है। आज इस भिक्षापात्र पर अरबी तथा फारसी भाषाओं में कुरान की आयतें लिखी हुई हैं। तालिबान के शासनकाल में उसके संस्कृति मंत्री ने बौद्ध धर्म से जुड़े सभी प्रतीक-चिन्हों को तोड़ने का आदेश दिया था । लेकिन बुद्ध के इस भिक्षापात्र पर अरबी और फारसी में पंक्तियां लिखे होने के कारण इसे नहीं तोड़ा गया। क़ुरआन की आयतों के आधार पर भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण ने कहा की यह भिक्षापात्र बुद्ध का नहीं है. जबकि गोरखपुर विश्वविद्यालय में प्राचीन इतिहास विभाग के पूर्व प्रो. शैलनाथ चतुर्वेदी के अनुसार इस भिक्षापात्र के कई स्थानों से होकर गुजरने का उल्लेख मिलता है, इसलिए इस पर स्थानीय भाषाओं में कुछ उल्लेख मिलना कोई आश्चर्य की बात नहीं है। इस भिक्षापात्र पर स्वस्तिक के भी चिह्न उत्कीर्ण हैं जिससे यह निश्चित रूप से बौद्ध धर्म से सम्बंधित है. इस विषय पर एलेक्जेंडर कनिंघम ने अपने आलेख ‘मिडिल ला, मिडिल वे’ में पृष्ठ संख्या 136 में इस भिक्षापात्र का उल्लेख किया है । जहां तक पात्र के आकार का प्रश्न है, पूर्व में भी बड़े आकार के कई ऐतिहासिक चिन्हों को विभिन्न काल में शासक एक स्थान से दूसरे स्थान ले गए। बौद्ध मठों में इस तरह के पात्र मठ के बाहर दरवाजे पर रखे रहते थे, जिसमें लोग मठ के लिए दान डालते थे। यह भी उल्लेखनीय है कि मुस्लिम आक्रांता प्रत्येक हिन्दू-वास्तु, जैसे— मंदिरों, स्तम्भों आदि के मूल हिन्दू-स्वरुप को विकृतकर उसे इस्लामी स्वरुप देने में कुशल रहे हैं. बुद्ध के भिक्षापात्र पर भी उन्होंने क़ुरआन की आयतें ठोंक दी हों, तो कोई आश्चर्य की बात नहीं होनी चाहिए.