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विष्णु स्तंभ है कुतुब मीनार, जानें महत्वपूर्ण तथ्‍य


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विष्णु स्तंभ है कुतुब मीनार, जानें महत्वपूर्ण तथ्‍य

कुतुब मीनार या लौह स्तम्भ एक ऐसा स्तम्भ है जिसे निजी और धार्मिक कार्यक्रम के तहत रूपांतरित किया गया, इसे अपवित्र किया गया और हेरफेर कर इसे दूसरा नाम दे दिया गया।

इतिहास में ऐसे प्रमाण और लिखित दस्तावेज हैं जिनके आधार पर यह साबित किया जा सकता है कि कुतुब मीनार एक हिंदू इमारत, विष्णु स्तम्भ है।

इसके बारे में एमएस भटनागर ने दो लेख लिखे हैं जिनमें इसकी उत्पत्ति, नामकरण और इसके इतिहास की समग्र जानकारी है। इनमें उस प्रचलित जानकारियों को भी आधारहीन सिद्ध किया गया है जो कि इसके बारे में इतिहास में दर्ज हैं या आमतौर पर बताई जाती हैं।

क्या आपको पता है कि अरबी में ‘कुतुब’ को एक ‘धुरी’, ‘अक्ष’, ‘केन्द्र बिंदु’ या ‘स्तम्भ या खम्भा’ कहा जाता है। कुतुब को आकाशीय, खगोलीय और दिव्य गतिविधियों के लिए प्रयोग किया जाता है। यह एक खगोलीय शब्द है या फिर इसे एक आध्यात्मिक प्रतीक के तौर पर समझा जाता है। इस प्रकार कुतुब मीनार का अर्थ खगोलीय स्तम्भ या टॉवर होता है।

सुल्तानों के जमाने में इसे इसी नाम से वर्णित किया जाता था। बाद में, अदालती दस्तावेजों में भी इसका इसी नाम से उल्लेख हुआ। कालांतर में इसका नाम सुल्तान कुतुबुद्दीन एबक से जोड़ दिया गया और इसके साथ यह भी माना जाने लगा है कि इसे कुतुबुद्दीन एबक ने बनवाया था।

प्रो. एमएस भटनागर, गाजियाबाद ने इस अद्वितीयी और अपूर्व इमारत के बारे में सच्चाई जाहिर की है और इससे जुड़ीं सभी भ्रामक जानकारियों, विरोधाभाषी स्पष्टीकरणों और दिल्ली के मुगल राजाओं और कुछ पुरातत्ववेताओं की गलत जानकारी को उजागर किया। वर्ष 1961 में कॉलेज के कुछ छात्रों का दल कुतुब मीनार देखने गया।
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(उन्होंने इतिहास में एक परास्नातक और सरकारी गाइड (मार्गदर्शक) से सवाल किए जिसके उत्तर कुछ इस तरह से दिए गए। )

जब गाइड से इस ‘मीनार’ को बनवाने का उद्देश्य पूछा गया तो उत्तर मिला कि यह एक विजय स्तम्भ है। किसने किस पर जीत हासिल की थी?

मोहम्मद गोरी ने राय पिथौरा (पृथ्वीराज) पर जीत हासिल की थी। कहां जीत हासिल की थी?

पानीपत के पास तराइन में।

तब इस विजय स्तम्भ को दिल्ली में क्यों बनाया गया?

गाइड का उत्तर था- पता नहीं। इस अवसर पर दिल्ली विश्वविद्यालय में इतिहास के एक लेक्चरर (जो कि भ्रमण के लिए आए थे) ने जवाब दिया।

विजय स्तम्भ को गोरी ने शुरू करवाया था क्योंकि दिल्ली उसकी राजधानी थी। लेकिन गोरी ने दिल्ली में कभी अपनी राजधानी नहीं बनाई क्योंकि उसकी राजधानी तो गजनी में थी। फिर दिल्ली में विजय स्तम्भ बनाने की क्या तुक थी?

कोई जवाब नहीं।

अगर इमारत को गोरी ने शुरू कराया था तो इसका नाम गोरी मीनार होना चाहिए, कुतुब मीनार नहीं। इसे कुतुब मीनार क्यों कहा जाता है।

इसके जवाब में कहा जाता है कि इस इमारत का निर्माण शुरू करने वाला कुतुबद्दीन एबक मोहम्मद गोरी का गुलाम था और उसने अपने मालिक के लिए इसकी नींव रखी थी।

अगर यह तर्क सही है तो उसने विजय स्तम्भ के लिए दिल्ली को ही क्यों चुना? उत्तर है कि दिल्ली कुतुबुद्दीन एबक की राजधानी थी।

अब सवाल यह है कि इस मीनार का निर्माण गोरी के जीवनकाल में शुरू हो गया था, वह जीवित था तो फिर उसके गुलाम ने दिल्ली को कैसे अपनी राजधानी बना लिया था?

विदित हो कि गोरी की मौत के बाद कुतुबुद्दीन को लाहौर में सुल्तान बनाया गया था। उसने लाहौर से शासन किया, दिल्ली से नहीं और अंतत: उसकी मौत भी लाहौर में हुई। जब उसकी राजधानी लाहौर थी तो उसने दिल्ली में विजय स्तम्भ क्यों बनाया?

भीड़ में से किसी ने ज्ञान दर्शाया कि मीनार एक विजय स्तम्भ नहीं है, वरन एक ‘मजीना’ है।

एक मस्जिद में मु‍अज्जिन का टॉवर है जिस पर से अजान दी जाती थी और यह ‘कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद’ से जुड़ा था। पर भारत के समकालीन इतिहास में ‘कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद’ का कहीं कोई उल्लेख नहीं है।

इस शब्द को उन्नीसवीं सदी में सर सैय्यद अहमद खान ने गढ़ा था। इस बात को लेकर आश्चर्यचकित ना हों कि भारतीय इतिहास में ‘कुतुब मीनार’ जैसा कोई शब्द नहीं है। यह हाल के समय का एक काल्पनिक तर्क है कि यह मीनार मुअज्जिन का टॉवर है। अगर ऐसा है तो मस्जिद का प्राथमिक महत्व है और टॉवर का द्वितीयक महत्व है।

दुर्भाग्य की बात है कि इसके पास एक ‍मस्जिद खंडहरों में बदल चुकी है। लेकिन तब इसका मुअज्जिन का टॉवर क्यों शान से खड़ा है?

इस सवाल का कोई जवाब नहीं। हकीकत तो यह है कि मस्जिद और मजीना एक पूरी तरह बकवास कहानी है।

तथाकथित कुतुब मीनार और खंडहर हो चुकी जामा मस्जिद के पास मीनार को बनाने वाले एक नहीं हो सकते हैं। कुतुब मीनार एक बहुत अधिक पुराना टॉवर है।

फिर मीनार पर कुरान की आयतों को क्यों अंकित किया गया है?

मीनार पर अंकित कुरान की आयतें एक जबर्दस्ती और निर्जीव डाली हुई लिखावट है जो कि पूरी तरह से हिंदू डिजाइन के सुंदर चित्रवल्लरी वाली धारियों पर ऊपर से लिखी गई हैं। कुरान की आयतों के लिहाज से इसे मुस्लिम मूल की ठहराना ठीक इसी तरह होगा जैसा कि किसी गैर-मुस्लिम का खतना कर उसे मुसलमान बना दिया जाए।

यह मीनार वास्तव में ध्रुव स्तम्भ है या जिसे प्राचीन हिंदू खगोलीय वेधशाला का एक मुख्य निगरानी टॉवर या स्तम्भ है। दो सीटों वाले हवाई जहाज से देखने पर यह टॉवर 24 पंखुड़ियों वाले कमल का फूल दिखाई देता है। इसकी एक-एक पंखुड़ी एक होरा या 24 घंटों वाले डायल जैसी दिखती है। चौबीस पंखुड़ियों वाले कमल के फूल की इमारत पूरी तरह से एक‍ हिंदू विचार है। इसे पश्चिम एशिया के किसी भी सूखे हिस्से से नहीं जोड़ा जा सकता है जोकि वहां पैदा ही नहीं होता है।

इस इमारत की लम्बवत प्रोजेक्शन लाइन्स जो ‍कि टॉवर की प्रत्येक स्टोरी के शीर्ष पर बनी पत्थरों पर बारीक कारीगरी के मध्य बिंदुओं से लेकर इसके आधार पर बने क्षैतिज समधरातल पर एक कमल के फूल का निर्माण करते हैं जो कि टॉवर शीर्ष के ऊपर आसमान से देखा जा सकता है। ध्रुव स्तंभ का यह कमल के रूप में उठा हुआ भाग अतीत के किसी वास्तुविद या पुरातत्ववेत्ता के द्वारा सोचा या बनाया नहीं जा सकता है। आप कह सकते हैं कि ध्रुव स्तम्भ को मोहम्मद गोरी या कुतुबुद्दीन एबक का निर्माण बताने का को‍ई प्रश्न नहीं है। जिन सुल्तानों का इस मीनार के साथ नाम जुड़ा है, उन्होंने इसके आवरण को नष्ट कर दिया, जिन पत्थरों पर मनुष्य या पशुओं के आकार बने थे, उन्हें उलटा कर दिया और इन पर अरबी में लिखावट को उत्कीर्ण कर डाला।

वास्तव में, इन सुल्तानों की इस बात के लिए प्रशंसा नहीं की जा सकती है कि उन्होंने मीनार बनाई। किसी भी व्यक्ति ने इस आशय का लेख, अभिलेख या शिलालेख छोड़ा है कि उसने इस मीनार के बनवाने की शुरुआत कराई।

कुतुब मीनार को लेकर ही इस बात के बहुत अधिक प्रमाण हैं कि यह एक हिंदू टॉवर था जो कि कुतुबुद्दीन से भी सैकड़ों वर्षों पहले मौजूद था। इसलिए इसका नाम कुतुबुद्दीन से जोड़ना गलत होगा। कुतुब मीनार के पास जो बस्ती है उसे महरौली कहा जाता है। यह एक संस्कृ‍त शब्द है जिसे मिहिर-अवेली कहा जाता है। इस कस्बे के बारे में कहा जा सकता है कि यहां पर विख्यात खगोलज्ञ मिहिर (जो कि विक्रमादित्य के दरबार में थे) रहा करते थे। उनके साथ उनके सहायक, गणितज्ञ और तकनीकविद भी रहते थे। वे लोग इस कथित कुतुब टॉवर का खगोलीय गणना, अध्ययन के लिए प्रयोग करते थे।

इस टॉवर के चारों ओर हिंदू राशि चक्र को समर्पित 27 नक्षत्रों या तारामंडलों के लिए मंडप या गुंबजदार इमारतें थीं। कुतुबुद्‍दीन के एक विवरण छोड़ा है जिसमें उसने लिखा कि उसने इन सभी मंडपों या गुंबजदार इमारतों को नष्ट कर दिया था, लेकिन उसने यह नहीं लिखा कि उसने कोई मीनार बनवाई।

जिस मंदिर को उसने नष्ट भ्रष्ट कर दिया था, उसे ही कुव्वत-अल-इस्लाम मस्जिद का नाम दिया। तथाकथित कुतुब मीनार से निकाले गए पत्थरों के एक ओर हिंदू मूर्तियां थीं जबकि इसके दूसरी ओर अरबी में अक्षर लिखे हुए हैं। इन पत्थरों को अब म्यूजियम में रख दिया गया है।

इससे यह बात साबित होती है कि मुस्लिम हमलावर हिंदू इमारतों की स्टोन-ड्रेसिंग या पत्‍थरों के आवरण को निकाल लेते थे और मूर्ति का चेहरा या सामने का हिस्सा बदलकर इसे अरबी में लिखा अगला हिस्सा बना देते थे। बहुत सारे परिसरों के खम्भों और दीवारों पर संस्कृत में लिखे विवरणों को अभी भी पढ़ा जा सकता है। कॉर्निस में बहुत सारी मूर्तियों को देखा जा सकता है लेकिन इन्हें तोड़फोड़ दिया गया है।

यह टॉवर आसपास की इमारतों का हिस्सा है। ऐसा नहीं है कि पहले की हिंदू इमारतों के चारों ओर काफी जगह होती थी और यह जगह पर्याप्त थी कि कुतुबुद्दीन आए और इसमें एक टॉवर बना दे, लेकिन स्तम्भ की अलंकृत शैली यह सिद्ध करती है कि यह एक हिंदू इमारत है। मुस्लिम मीनारों की धरातल पूरी तरह समतल होता है। जो लोग यह तर्क करते हैं कि इस टॉवर का उपयोग मुस्लिमों की अजान के लिए होता था, तो ऐसे लोग कभी इसके ऊपर तक नहीं गए हैं और उन्होंने ऊपर से नीचे रहने वाले के लिए कभी चिल्लाकर नहीं देखा होगा।

अगर उन्होंने ऐसा किया होता तो उन्हें पता लग जाता कि इतनी ऊंचाई से बोले गए शब्दों को नीचे खड़ा आदमी सुन ही नहीं सकता है। इस तरह के बेहूदा और मूर्खतापूर्ण दावे प्राचीन हिंदू इमारतों को इस्लामी बनाने के लिए किए गए हैं। इस बारे में एक महत्वपूर्ण विचार यह भी है कि टॉवर का प्रवेश द्वार उत्तर दिशा में है, पश्चिम में नहीं, जबकि इस्लामी धर्मशास्त्र और परम्परा में पश्चिम का महत्व है।

प्रवेश द्वार के एक ओर पत्थर का कमल का फूल बना है जो कि यह सिद्ध करता है कि यह एक हिंदू इमारत थी। मध्यकालीन इमारतों में पत्‍थरों के फूल बनाना एक प्रमुख हिंदू परम्परा रही है। मुस्लिम कभी भी इमारतें बनाते समय इस तरह के फूल नहीं बनाते हैं। टॉवर पर चित्र वल्लरी पर नमूनों में इनमें मिलावट नजर आती है, ये एकाएक समाप्त हो जाते हैं या बेमेल लाइनों का घालमेल नजर आता है। कमल की कलियों जैसे हिंदू रूपांकन के बीच में अरबी के अक्षरों को फैला दिया गया है।

एक कट्‍टर मुस्लिम और विद्वान सैयद अहमद खान स्वीकार करते हैं कि यह मीनार एक हिंदू इमारत है। अगर आप टॉवर के शीर्ष पर एक एयरोप्लेन से देखें तो आपको विभिन्न गैलरियां ऊपर से नीचे तक एक दूसरे में फिसलती नजर आती हैं और ये एक 24 पंखुड़ी वाले किसी पूरी तरह से खिले कमल की तरह दिखाई देती हैं।

विदित हो कि 24 का अंक वैदिक परम्परा में पवित्र माना जाता है क्योंकि यह 8 का गुणनफल होता है। टॉवर की इंटों का लाल रंग भी हिंदुओं में पवित्र समझा जाता है। इस टॉवर का नाम विष्णु ध्वज या विष्णु स्तम्भ या ध्रुव स्तम्भ के तौर पर जाना जाता था जिससे यह स्पष्ट होता है कि यह खगोलीय प्रेक्षण टॉवर था।

पास में ही जंग न लगने वाले लोहे के खम्भे पर ब्राह्मी लिपि में संस्कृत में लिखा है कि विष्णु का यह स्तम्भ विष्णुपाद गिरि नामक पहाड़ी पर बना था। इस विवरण से साफ होता है कि टॉवर के मध्य स्थित मंदिर में लेटे हुए विष्णु की मूर्ति को मोहम्मद गोरी और उसके गुलाम कुतुबुद्दीन ने नष्ट कर दिया था। खम्भे को एक हिंदू राजा की पूर्व और पश्चिम में जीतों के सम्मानस्वरूप बनाया गया था।

टॉवर में सात तल थे जोकि एक सप्ताह को दर्शाते थे, लेकिन अब टॉवर में केवल पांच तल हैं। छठवें को गिरा दिया गया था और समीप के मैदान पर फिर से खड़ा कर दिया गया था। सातवें तल पर वास्तव में चार मुख वाले ब्रह्मा की मूर्ति है जो कि संसार का निर्माण करने से पहले अपने हाथों में वेदों को लिए थे।

ब्रह्मा की मूर्ति के ऊपर एक सफेद संगमरमर की छतरी या छत्र था जिसमें सोने के घंटे की आकृति खुदी हुई थी। इस टॉवर के शीर्ष तीन तलों को मूर्तिभंजक मुस्लिमों ने बर्बाद कर दिया जिन्हें ब्रह्मा की मूर्ति से घृणा थी। मुस्लिम हमलावरों ने नीचे के तल पर शैय्या पर आराम करते विष्णु की मूर्ति को भी नष्ट कर दिया।

लौह स्तम्भ को गरुड़ ध्वज या गरुड़ स्तम्भ कहा जाता था। यह विष्णु के मंदिर का प्रहरी स्तम्भ समझा जाता था। एक दिशा में 27 नक्षत्रों के म‍ंदिरों का अंडाकार घिरा हुआ भाग था। लाल पत्थरों का एक विशाल, अलंकृत दरवाजा एक पवित्र क्षेत्र को जाता था जिसे नक्षत्रालय कहा जाता था। इसलिए परम्परागत रूप से मुख्य द्वार को आलय-द्वार के तौर पर जाना जाता है।

कनिंगघम जैसे इतिहासकार इस दरवाजे को फर्जी तरीके से सुल्तान अलाउद्दीन से जोड़ते हैं हालांकि स्वयं अलाउद्दीन की ओर से ऐसा कोई दावा नहीं किया गया है।

सवाल यह है कि अलाउद्दीन के समय में यह स्‍थान पूरी तरह से चूर-चूर होते खंडहरों में बदल चुका था। ऐसी हालत में अलाउद्दीन को क्यों ऐसी जगह पर एक शानदार अलंकृत दरवाजा बनाने की सूझी होगी जो कि कहीं से कहीं तक नहीं पहुंचता था? इसे मुअज्जिन का टॉवर बताना भी सफेद झूठ है। कोई भी मुअज्जिन एक दिन के लिए भी 365 संकरी और घूमती हुई अंधेरी सीढि़यों पर चढ़ने-उतरने का साहस नहीं करेगा। ऐसे आदमी के निश्चित तौर पर गिरकर मर जाने की संभावना होगी।

समीपवर्ती तथाकथित कुव्वल-अल-इस्लाम मस्जिद का भी मेहराबदार द्वार भी गुजरात में पाए जाने वाले मंदिरों में पाए जाने वाले द्वारों से अलग नहीं है। इस इमारत की चित्रवल्लरी का स्वरूप भी विकृत करने की गवाही देता है और सिद्ध करता है कि मुस्लिम आक्रमणकारियों ने मंदिरों के पत्थरों का मस्जिदों को बनाने में उपयोग किया।

टॉवर का घेरा ठीक ठीक तरीके से 24 मोड़ देने से बना है और इसमें क्रमश: मोड़, वृत की आकृति और त्रिकोण की आकृतियां बारी-बारी से बदलती हैं। इससे यह पता चलता है कि 24 के अंक का सामाजिक महत्व था और परिसर में इसे प्रमुखता दी गई थी। इसमें प्रकाश आने के लिए 27 झिरी या छिद्र हैं। यदि इस बात को 27 नक्षत्र मंडपों के साथ विचार किया जाए तो इस बात में कोई संदेह नहीं रह जाता है कि टॉवर खगोलीय प्रेक्षण स्तम्भ था।

टॉवर के निर्माण में बड़े-बड़े शिलाखंडों को एक साथ जोड़कर रखने के लिए इन्हें लोहे की पत्तियों से बांध दिया गया है। इसी तरह की पत्तियों को आगरे के किले को बनाने में इस्तेमाल किया गया है। मैंने (भटनागर) अपनी पुस्तक ‘ताज महल एक राजपूत महल था’ में किलों की उत्पत्ति के बारे में विस्तार से लिखा है और यह सिद्ध किया है कि यह मुस्लिमों के समय से पहले मौजूद था। इससे यह भी सिद्ध होता है कि बड़ी इमारतों में पत्थरों को जोड़े रखने के लिए लोहे की पत्तियों का प्रयोग करना एक हिंदू विधि थी। यही विधि तथाकथित दिल्ली की कुतुब मीनार में भी इस्तेमाल की गई है।

इसके साथ यह भी सिद्ध होता है कि कुतुब मीनार एक मुस्लिमों के भारत में आने से पहले की इमारत है। अगर 24 पंखुड़ी वाले कमल को इसके केन्द्र से ऊपर की ओर खींचा जाता है तो इस तरह का एक टॉवर बन जाएगा। और कमल का स्वरूप कभी भी मुस्लिम नहीं होता है।

(साभार : हिन्दू जागृति से)

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DHOLAVIRA ……( 2500-1900 BCE )


"Steps of the southern reservoir ...."
"Eastern reservoir ...."
"North gate of castle , general view ...."
Dashrath Varotariya's photo.
"A burial with limestone slab lining all around along with burial pots ......"

DHOLAVIRA ……( 2500-1900 BCE )
KUTCHH , GUJARAT ….

Dholavira (Gujarati:) is an archaeological site at Khadirbet in Bhachau Taluka of Kutch District, in the state of Gujarat in western India, which has taken its name from a modern village 1 km (0.62 mi) south of it. This village is 165 km from Radhanpur. Also known locally as Kotada timba, the site contains ruins of an ancient Indus Valley Civilization/Harappan city. It is one of the five largest Harappan sites[1] and most prominent archaeological sites in India belonging to the Indus Valley Civilization. It is also considered as having been the grandest of cities of its time. It is located on Khadir bet island in the Kutch Desert Wildlife Sanctuary in the Great Rann of Kutch. The area of the full site is more than 100 ha (250 acres). The site was occupied from c.2650 BCE, declining slowly after about 2100 BCE. It was briefly abandoned then reoccupied until c.1450 BCE.

The site was discovered in 1967-8 by J. P. Joshi and is the fifth largest of eight major Harappan sites. It has been under excavation since 1990 by the Archaeological Survey of India, which opines that “Dholavira has indeed added new dimensions to personality of Indus Valley Civilisation.”[5] The other major Harappan sites discovered so far are: Harappa, Mohenjo-daro, Ganeriwala, Rakhigarhi, Kalibangan, Rupnagar and Lothal.

Architecture and Material Culture

Estimated to be older than the port-city of Lothal,[citation needed] the city of Dholavira has a rectangular shape and organization, and is spread over 22 ha (54 acres). The area measures 771.1 m (2,530 ft) in length, and 616.85 m (2,023.8 ft) in width. Unlike Harappa and Mohenjo-daro, the city was constructed to a pre-existing geometrical plan consisting of three divisions – the citadel, the middle town, and the lower town.The acropolis and the middle town had been furnished with their own defence-work, gateways, built-up areas, street system, wells, and large open spaces. The acropolis is the most thoroughly fortified and complex area in the city, of which it appropriates the major portion of the southwestern zone. The towering “castle” stands is defended by double ramparts. Next to this stands a place called the ‘bailey’ where important officials lived.The city within the general fortifications accounts for 48 ha (120 acres). There are extensive structure-bearing areas which are outside yet integral to the fortified settlement. Beyond the walls, another settlement has been found.[5] The most striking feature of the city is that all of its buildings, at least in their present state of preservation, are built of stone, whereas most other Harappan sites, including Harappa itself and Mohenjo-daro, are almost exclusively built of brick. Dholavira is flanked by two storm water channels; the Mansar in the north, and the Manhar in the south.

“The kind of efficient system of Harappans of Dholavira, developed for conservation, harvesting and storage of water speaks eloquently about their advanced hydraulic engineering, given the state of technology in the third millennium BCE” says R.S.Bist, Joint Director General (Rtd.), Archeological Survey of India.[1] One of the unique features[13] of Dholavira is the sophisticated water conservation system[14] of channels and reservoirs, the earliest found anywhere in the world,[citation needed] built completely of stone. The city had massive reservoirs, three of which are exposed.[15] They were used for storing fresh water brought by rains[14] or to store water diverted from two nearby rivulets.[16] This clearly came in response to the desert climate and conditions of Kutch, where several years may pass without rainfall. A seasonal stream which runs in a north-south direction near the site was dammed at several points to collect water.[4]

The inhabitants of Dholavira created sixteen or more reservoirs[4] of varying size during Stage III.[5] Some of these took advantage of the slope of the ground within the large settlement,[5] a drop of 13 m from northeast to northwest. Other reservoirs were excavated, some into living rock. Recent work has revealed two large reservoirs, one to the east of the castle and one to its south, near the Annexe.[17]

The reservoirs are cut through stone vertically, and are about 7 meters deep and 79 meters long. They skirt the city, while the citadel and bath are centrally located on raised ground.[14] There is also a large well with a stone-cut trough connecting it to a drain meant for conducting water to a storage tank.[14] The bathing tank had steps descending inwards.[14]

In October 2014 excavation began on a rectangular stepwell which measured 73.4m long, 29.3m wide, and 10m deep, making it three times bigger than the Great bath of Mohenjedaro.[18]

Seal Making
Some of the seals found at Dholavira, belonging to Stage III, contained animal only figures, without any type of script and it is suggested that these type of seals represent early conventions of Indus seal making.[4]

Other structures and objects
A huge circular structure on the site is believed to be a grave or memorial,[14]although it contained no skeletons or other human remains. The structure consists of ten radial mud-brick walls built in the shape of a spoked wheel.[14] A soft sandstone sculpture of a male with phallus erectus but head and feet below ankle truncated was found in the passageway of the eastern gate. Many funerary structures have been found (although all but one were devoid of skeletons),[14] as well as pottery pieces, terra cotta seals, bangles, rings, beads, and intaglio engravings.

Hemispherical Constructions

Seven Hemispherical constructions were found at Dholavira, of which two were excavated in detail, which were constructed over large rock cut chambers.[5] Having a circular plan, these were big hemispherical elevated mud brick constructions. One of the excavated structures was designed in the form of a spoked wheel. The other was also designed in same fashion, but as a wheel without spokes. Although they contained burial goods of pottery, no skeletons were found except for one grave, where a skeleton and a copper mirror were found.[5] A necklace of steatite beads strung to a copper wire with hooks at both ends, a gold bangle, gold and other beads were also found in one of the hemispherical structures.

These hemispherical structures bear similarity to early Buddhist stupas.[5] The Archeological Survey of India, which conducted the excavation, opines that “the kind of design that is of spoked wheel and unspoked wheel also remind one of the Sararata-chakra-citi and sapradhi-rata-chakra-citi mentioned in the Satapatha Brahmana and Sulba-sutras”.

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जो साई को पूजते है उनसे एक एक सवाल …..


जो साई को पूजते है उनसे एक एक सवाल …..

किस धर्मग्रंथ मे साई का नाम लिखा है ?????

राम के चरणों कि स्तुति गाने वाले ….कृष्ण की लीलाओ का रसास्वादन करने वाले ….शिव कि महिमाओ का वर्णन करके खुद को परम धन्य समझने वाले परम सौभाग्यशाली हिन्दुओ ने किस आधार पर …साई के नाम का घंटा बजाना चालू कर दिया ….

जवाब हो तो जरूर दीजिएगा………….

किस धर्मग्रंथ मे साई का नाम लिखा है ????????

अगर तुम लोगो को संतो को पूजना ही आधुनिक फैशन लग रहा है अथवा साई को पूजने के लिए ये तर्क है तो … ऋषियों को पूजो …..वशिष्ठ को पूजो …. अत्री मुनि को पूजो …. संदीपनी को पूजो …….दधीचि को पूजो ……..वाल्मीकि को पूजो …..

साई बाबा न इनसे बड़ा संत था न इनसे बड़ा सिध्द ……

अगर ये पुराने लगते है तो तुलसी दास को पूजो ………. उन्होेंने रामायण लिख दी…… उन्हे मंदिरो में स्थापित
नहीं किया ।

हां चार चमत्कार दिखाकर…. एक दो उपदेश देकर….” सबका मालिक एक ” का नारा देने वाले साई महाशय को किस आधार पर भगवान बनाकर मंदिरो में स्थापित करने का फतवा जारी कर दिया कुछ साई अंधभक्तो ने…..

अथवा साई एजेंटो ने अथवा साई दलालो ने अथवा साई के नाम पर धंधा करने वालो ने ….

भारत एक भक्ति प्रधान देश है यहां कि अंधी जनता को हर दस वर्ष में एक नया भगवान चाहिए ।

अरे मूढ़ो क्या तेतीस कोटि देवता तुम्हारे लिए कम पड गए है… या शिव जी , श्री हरि , श्री कृष्ण , श्री राम , माँ भवानी सब से मन ऊब गया है तुम्हारा… या बस चार चमत्कार देख लिए या किसी के मुँह से सुन भी लिए तो बस वही हो गया तुम्हारा मुक्ति दाता ।

अक्ल पर पत्थर पड गए है या पापों ने बुद्धि को इतना कुंठित कर दिया है कि इतना नहीं सोच पा रहे कि साई महाराज को किस आधार पर भगवान घोषित कर दिया….बिना सिर पैर के तर्को के आधार पर ही तुम किसी को भगवान मान लोगे ?

संत पुज्यनीय होते है उनके लिए मन में श्रद्धा होनी चाहिए पर ये जो तुम कर रहे हो वो तो आँख वाला होकर भी कुएं में गिर पड़ने कि तरह है ।

मेरी श्रद्धा सभी संतो पर है , पर संतो को ही एक मात्र परब्रह्म मानकर सर्वव्यापक परमेश्वर कि अवमानना नहीं कि जा सकती और अवतार अकारण नहीं होता स्वयं भगवान कहते है कि किसी उद्देश्य से होता है और साई महाराज का क्या उद्देश्य था सिर्फ ज्ञान देना…..एकता का संदेश देना …

बस….या फिर साई महाराज के ‘ लेटैस्ट वर्जन ‘ सत्य साई के अवतार लेने का उद्देश्य क्या था मुह से बॉल निकालकर दिखाना , उँगलियो से राख़ निकालकर दिखाना , जादू से हाथ से जंजीर पैदा कर देना …..ऐसी चीजे सड़को पर एक एक दो दो रुपया मांगते जादूगर दिखाया करते थे…….

कड़वा लगे पर सच यही है ….. कि भ्रांति युक्त बुद्धि से , सिर्फ सुनकर और सिर्फ सुनकर ही ” सबका मालिक एक ” चिल्लाते हुये शिरडी वाले साई बाबा आए है तेरे दर पर — गाते हुये शिर्डी कि परिक्रमा लगाकर खुद को भगवान का परम उपासक समझने वाले सिर्फ मूर्ख है सिर्फ मूर्ख है सिर्फ मूर्ख है ।

…… इतना बहुत है …….जिस साई के उपासक के पास इन सब बातो का पूर्णतः ठोस जवाब हो तो ही बात करे … वरना इतने पर भी इन बातो को दरकिनार कर अब भी पूजा कि अलमारी मे भगवान के बीच में रखे साई बाबा के सामने बैठकर … साई राम , साई राम चिल्लाना इससे बड़ा मूर्खता का उदाहरण मुझे तो ढूँढे नहीं मिलेगा……..

……… सोचिए……… और निस्कर्ष निकालिए ….. सच क्या है ….और इतने पर भी जो हिन्दू साई का लॉकेट अपने गले से न निकाले तो उसे खुद को हिन्दू कहने का हक तो है पर वो सनातन धर्मी कतई नहीं है ….क्यो कि सनातन धर्म मे साई था ही नहीं …….न है ।

अक्सर इन बातो को सुनकर भी कुछ धर्मप्रिय हिंदुत्ववादी हिन्दू साई का मोह नहीं छोड़ पाते इसलिए वो अंत मे एक तर्क देते है कि हे हे हे अजी हम तो साई को संत मानते है इसलिए मंदिरो में स्थापित करके उनकी पूजा करते है ।

तो क्या साई महाराज से पहले कोई ज्ञानी संत नहीं हुये थे … महर्षि वाल्मीकि जिन्होने कि अपनी त्रिकाल दर्शिता से राम की लीलाओ के अंत से पहले ही रामायण कि रचना पूर्ण कर दी थी क्या साई महाराज जी उनसे ज्यादा त्रिकालदर्शी थे या ब्रह्मऋषि वशिष्ठ से भी ज्यादा श्रेष्ठ थे , जो कि स्वयं श्री राम के कुलगुरु थे …. या विश्वामित्र से ज्यादा बड़े तपस्वी थे…. या वेद व्यास जी जिनके द्वारा अठारह पुराण , चारो वेद , महाभारत , श्रीमदभगवतगीता सहित अनेकों धर्मग्रंथो कि रचना कि थी उनसे बड़े ज्ञानी … या महर्षि दधीचि से ज्यादा बड़े त्यागी थे….चमत्कारों कि कहो तो साई महाराज से बड़े बड़े चमत्कार पहले भी ऋषि मुनियो ने प्रकट किए है ।

तुलसी दास जी ने भी किए थे , सूरदास जी ने भी…..तो ये बस ईश्वर भक्त थे , भगवान नहीं तो साई महाराज भगवान कैसे हो गए ?

……या बस कोई साधारण मनुष्य साई चरित नाम से कोई पुस्तक लिख दे उसी के आधार पर उन्हे भगवान मान लिया ?

अरे मुर्खाधिराजों ( सच है कृपया मुंह कड़वा मत होने देना ) … इन धर्मग्रंथो कि रचना क्यो कि गयी …. इसीलिए ताकि जब मनुष्य भटके तो इनसे धर्म की प्रेरणा ले सके ।

…किस धर्मग्रंथ में लिखा है कि साई महाराज नाम के कोई अवतार होंगे ?

…..लिखा हुआ तो बहुत दूर रामायण , महाभारत , श्रीमद्भगवत गीता , वेद , उपनिषद श्रुतिया पुराण इनमे साई महाराज का नाम तक नहीं है….

तो हिन्दू हो तो क्या धर्मग्रंथो को भी झूठा साबित करोगे ।

इनमे कलयुग में सिर्फ दो अवतार लिखे गए है एक हो चुका और दूसरा कलयुग के अंतिम चरण में होगा कल्कि अवतार…..

तो क्या वेद व्यास जी साई महाराज का जिक्र करना भूल गए होंगे ?

…..वेदव्यास जी ने ग्रंथो में और तुलसी दास जी ने रामायण में बहुत पहले ही कलयुग का चित्रण किया है जो कि बिलकुल सही है तो क्या उन्होने जान बूझकर साई महाराज के बारे में नहीं लिखा कि साई महाराज नाम के कोई अवतार होंगे ?

…… नहीं जिसको भी भक्ति का क्षय और अपना धर्म भ्रष्ट करना हो …..वही साई साई करे …..

जो हिन्दू है …..और भगवान को प्यार करता है ……साई बाबा के चक्कर में न पड़े…….

भगवान को छोडकर …… किसी और को भगवान के स्थान पर पूजना …..भगवान के साथ साथ भक्ति और धर्म का भी अपमान है ……

जय श्री राम
अपने परमसमर्थ , परम कृपालु , परम भक्तवत्सल…… परम दयालु श्री भगवान को छोडकर ……साई के दर पर जाकर दौलत की भीख मांगने वालो , साई से अपनी इच्छाओं की पूर्ति की आशा रखने वालो तुमसे बड़ा मूर्खता का उदाहरण कलियुग में और क्या होगा ?

"जो साई को पूजते है उनसे एक एक सवाल …..

किस धर्मग्रंथ मे साई का नाम लिखा है ?????

राम के चरणों कि स्तुति गाने वाले ….कृष्ण की लीलाओ का रसास्वादन करने वाले ….शिव कि महिमाओ का वर्णन करके खुद को परम धन्य समझने वाले परम सौभाग्यशाली हिन्दुओ ने किस आधार पर …साई के नाम का घंटा बजाना चालू कर दिया ....

जवाब हो तो जरूर दीजिएगा………….

किस धर्मग्रंथ मे साई का नाम लिखा है ???????? 

अगर तुम लोगो को संतो को पूजना ही आधुनिक फैशन लग रहा है अथवा साई को पूजने के लिए ये तर्क है तो … ऋषियों को पूजो …..वशिष्ठ को पूजो …. अत्री मुनि को पूजो …. संदीपनी को पूजो …….दधीचि को पूजो ……..वाल्मीकि को पूजो …..

साई बाबा न इनसे बड़ा संत था न इनसे बड़ा सिध्द …… 

अगर ये पुराने लगते है तो तुलसी दास को पूजो ………. उन्होेंने रामायण लिख दी…… उन्हे मंदिरो में स्थापित
नहीं किया ।

हां चार चमत्कार दिखाकर…. एक दो उपदेश देकर…." सबका मालिक एक " का नारा देने वाले साई महाशय को किस आधार पर भगवान बनाकर मंदिरो में स्थापित करने का फतवा जारी कर दिया कुछ साई अंधभक्तो ने…..

अथवा साई एजेंटो ने अथवा साई दलालो ने अथवा साई के नाम पर धंधा करने वालो ने ….

भारत एक भक्ति प्रधान देश है यहां कि अंधी जनता को हर दस वर्ष में एक नया भगवान चाहिए । 

अरे मूढ़ो क्या तेतीस कोटि देवता तुम्हारे लिए कम पड गए है… या शिव जी , श्री हरि , श्री कृष्ण , श्री राम , माँ भवानी सब से मन ऊब गया है तुम्हारा… या बस चार चमत्कार देख लिए या किसी के मुँह से सुन भी लिए तो बस वही हो गया तुम्हारा मुक्ति दाता । 

अक्ल पर पत्थर पड गए है या पापों ने बुद्धि को इतना कुंठित कर दिया है कि इतना नहीं सोच पा रहे कि साई महाराज को किस आधार पर भगवान घोषित कर दिया….बिना सिर पैर के तर्को के आधार पर ही तुम किसी को भगवान मान लोगे ?

संत पुज्यनीय होते है उनके लिए मन में श्रद्धा होनी चाहिए पर ये जो तुम कर रहे हो वो तो आँख वाला होकर भी कुएं में गिर पड़ने कि तरह है । 

मेरी श्रद्धा सभी संतो पर है , पर संतो को ही एक मात्र परब्रह्म मानकर सर्वव्यापक परमेश्वर कि अवमानना नहीं कि जा सकती और अवतार अकारण नहीं होता स्वयं भगवान कहते है कि किसी उद्देश्य से होता है और साई महाराज का क्या उद्देश्य था सिर्फ ज्ञान देना…..एकता का संदेश देना …

बस….या फिर साई महाराज के ‘ लेटैस्ट वर्जन ‘ सत्य साई के अवतार लेने का उद्देश्य क्या था मुह से बॉल निकालकर दिखाना , उँगलियो से राख़ निकालकर दिखाना , जादू से हाथ से जंजीर पैदा कर देना …..ऐसी चीजे सड़को पर एक एक दो दो रुपया मांगते जादूगर दिखाया करते थे…….

कड़वा लगे पर सच यही है ….. कि भ्रांति युक्त बुद्धि से , सिर्फ सुनकर और सिर्फ सुनकर ही " सबका मालिक एक " चिल्लाते हुये शिरडी वाले साई बाबा आए है तेरे दर पर — गाते हुये शिर्डी कि परिक्रमा लगाकर खुद को भगवान का परम उपासक समझने वाले सिर्फ मूर्ख है सिर्फ मूर्ख है सिर्फ मूर्ख है ।

…… इतना बहुत है …….जिस साई के उपासक के पास इन सब बातो का पूर्णतः ठोस जवाब हो तो ही बात करे … वरना इतने पर भी इन बातो को दरकिनार कर अब भी पूजा कि अलमारी मे भगवान के बीच में रखे साई बाबा के सामने बैठकर … साई राम , साई राम चिल्लाना इससे बड़ा मूर्खता का उदाहरण मुझे तो ढूँढे नहीं मिलेगा……..

……… सोचिए……… और निस्कर्ष निकालिए ….. सच क्या है ….और इतने पर भी जो हिन्दू साई का लॉकेट अपने गले से न निकाले तो उसे खुद को हिन्दू कहने का हक तो है पर वो सनातन धर्मी कतई नहीं है ….क्यो कि सनातन धर्म मे साई था ही नहीं …….न है ।

अक्सर इन बातो को सुनकर भी कुछ धर्मप्रिय हिंदुत्ववादी हिन्दू साई का मोह नहीं छोड़ पाते इसलिए वो अंत मे एक तर्क देते है कि हे हे हे अजी हम तो साई को संत मानते है इसलिए मंदिरो में स्थापित करके उनकी पूजा करते है ।

तो क्या साई महाराज से पहले कोई ज्ञानी संत नहीं हुये थे … महर्षि वाल्मीकि जिन्होने कि अपनी त्रिकाल दर्शिता से राम की लीलाओ के अंत से पहले ही रामायण कि रचना पूर्ण कर दी थी क्या साई महाराज जी उनसे ज्यादा त्रिकालदर्शी थे या ब्रह्मऋषि वशिष्ठ से भी ज्यादा श्रेष्ठ थे , जो कि स्वयं श्री राम के कुलगुरु थे …. या विश्वामित्र से ज्यादा बड़े तपस्वी थे…. या वेद व्यास जी जिनके द्वारा अठारह पुराण , चारो वेद , महाभारत , श्रीमदभगवतगीता सहित अनेकों धर्मग्रंथो कि रचना कि थी उनसे बड़े ज्ञानी … या महर्षि दधीचि से ज्यादा बड़े त्यागी थे….चमत्कारों कि कहो तो साई महाराज से बड़े बड़े चमत्कार पहले भी ऋषि मुनियो ने प्रकट किए है ।

तुलसी दास जी ने भी किए थे , सूरदास जी ने भी…..तो ये बस ईश्वर भक्त थे , भगवान नहीं तो साई महाराज भगवान कैसे हो गए ?

……या बस कोई साधारण मनुष्य साई चरित नाम से कोई पुस्तक लिख दे उसी के आधार पर उन्हे भगवान मान लिया ?

अरे मुर्खाधिराजों ( सच है कृपया मुंह कड़वा मत होने देना ) … इन धर्मग्रंथो कि रचना क्यो कि गयी …. इसीलिए ताकि जब मनुष्य भटके तो इनसे धर्म की प्रेरणा ले सके ।

…किस धर्मग्रंथ में लिखा है कि साई महाराज नाम के कोई अवतार होंगे ?

…..लिखा हुआ तो बहुत दूर रामायण , महाभारत , श्रीमद्भगवत गीता , वेद , उपनिषद श्रुतिया पुराण इनमे साई महाराज का नाम तक नहीं है….

तो हिन्दू हो तो क्या धर्मग्रंथो को भी झूठा साबित करोगे ।

इनमे कलयुग में सिर्फ दो अवतार लिखे गए है एक हो चुका और दूसरा कलयुग के अंतिम चरण में होगा कल्कि अवतार…..

तो क्या वेद व्यास जी साई महाराज का जिक्र करना भूल गए होंगे ?

…..वेदव्यास जी ने ग्रंथो में और तुलसी दास जी ने रामायण में बहुत पहले ही कलयुग का चित्रण किया है जो कि बिलकुल सही है तो क्या उन्होने जान बूझकर साई महाराज के बारे में नहीं लिखा कि साई महाराज नाम के कोई अवतार होंगे ?

…… नहीं जिसको भी भक्ति का क्षय और अपना धर्म भ्रष्ट करना हो …..वही साई साई करे …..

जो हिन्दू है …..और भगवान को प्यार करता है ……साई बाबा के चक्कर में न पड़े…….

भगवान को छोडकर …… किसी और को भगवान के स्थान पर पूजना …..भगवान के साथ साथ भक्ति और धर्म का भी अपमान है …… 

जय श्री राम
अपने परमसमर्थ , परम कृपालु , परम भक्तवत्सल…… परम दयालु श्री भगवान को छोडकर ……साई के दर पर जाकर दौलत की भीख मांगने वालो , साई से अपनी इच्छाओं की पूर्ति की आशा रखने वालो तुमसे बड़ा मूर्खता का उदाहरण कलियुग में और क्या होगा ?"
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Posted in सुभाषित - Subhasit

कितना सत्य है ना…..


कितना सत्य है ना…..

भक्ति जब भोजन में प्रवेश करती है,
भोजन ‘प्रसाद’ बन जाता है।

भक्ति जब भूख में प्रवेश करती है,
भूख ‘व्रत’ बन जाती है।

भक्ति जब पानी में प्रवेश करती है,
पानी ‘चरणामृत’ बन जाता है।

भक्ति जब सफर में प्रवेश करती है,
सफर ‘तीर्थयात्रा’ बन जाता है।

भक्ति जब संगीत में प्रवेश करती है,
संगीत ‘कीर्तन’ बन जाता है।

भक्ति जब घर में प्रवेश करती है,
घर ‘मन्दिर’ बन जाता है।

भक्ति जब कार्य में प्रवेश करती है,
कार्य ‘कर्म’ बन जाता है।

भक्ति जब क्रिया में प्रवेश करती है,
क्रिया ‘सेवा’ बन जाती है।

और…

भक्ति जब व्यक्ति में प्रवेश करती है,
व्यक्ति ‘मानव’ बन जाता है।

भक्तिमय,

Posted in यत्र ना्यरस्तुपूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:

Sikh woman (Bhaag kaur) fought against tyrant mughals in the 18th century.


Sikh woman (Bhaag kaur) fought against tyrant mughals in the 18th century.

Mai BHAGO (Mata Bhaag Kaur)

Mai bhago (also called bhaag Kaur) was born at Amritsar Punjab.She married to Bhai Nidhan singh of patti village(Punjab).She was a very brave woman and was expert in Archery,swordsmanship and horsemanship.She was one of the Sikh women warriors and was a great Sikh women, with a Keski tied around her head, with the Khalsa Uniform, with her Kirpan fighting, she was the first women in the history of Punjab, to fight On a battlefield.

BATTLE OF MUKTSAR (1705)

She led a force of 40 Sikhs in the battle of MUKTSAR in 1705.All the 40 Sikhs fought bravely with 1000 Mughal army. The Sikhs defeated the Mughal forces in the battle.All the 40 Sikhs died fighting in the battle field except Mai bhago. Later on,Guru Gobind Singh ji addressed them as 40 muktas (the fourty liberators).

She also accompanied Guru gobind singh to Nanded with other Sikhs and served Khalsa. In 1708,Mai Bhago settled down at Jinvara (Karnataka) ,where she died at old age…

"Mai BHAGO (Mata Bhaag Kaur)

 Mai bhago (also called bhaag Kaur) was born at Amritsar Punjab.She married to Bhai Nidhan singh of patti village(Punjab).She was a very brave woman and was expert in Archery,swordsmanship and horsemanship.She was one of the Sikh women warriors and was a great Sikh women, with a Keski tied around her head, with the Khalsa Uniform, with her Kirpan fighting, she was the first women in the history of Punjab, to fight On a battlefield. 

 BATTLE OF MUKTSAR (1705)

 She led a force of 40 Sikhs in the battle of MUKTSAR in 1705.All the 40 Sikhs fought bravely with 1000 Mughal army. The Sikhs defeated the Mughal forces in the battle.All the 40 Sikhs died fighting in the battle field except Mai bhago. Later on,Guru Gobind Singh ji addressed them as 40 muktas (the fourty liberators).

 She also accompanied Guru gobind singh to Nanded with other Sikhs and served Khalsa. In 1708,Mai Bhago settled down at Jinvara (Karnataka) ,where she died at old age..."