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कलियुग के देवी अवतार और असुर आक्रमण– अरुण कुमार उपाध्याय


कलियुग के देवी अवतार और असुर आक्रमण– अरुण कुमार उपाध्याय
कलियुग अर्थात् महाभारत के बाद के देवी अवतारों के विषय में दुर्गा-सप्तशती, अध्याय ११ में कहा है-
वैवस्वतेऽन्तरे प्राप्ते अष्टाविंशति तमे युगे। शुम्भो निशुम्भश्चैवान्यावुत्पत्स्येते महासुरौ॥४१॥
नन्दगोपगृहे जाता यशोदा गर्भ सम्भवा। ततस्तौ नाशयिष्यामि विन्ध्याचल निवासिनी॥४२॥
पुनरप्यतिरौद्रेण रूपेण पृथिवीतले। अवतीर्य हनिष्यामि वैप्रचित्तांस्तु दानवान्॥४३॥
भक्षयन्त्याश्च तानुग्रान् वैप्रचित्तान्महासुरान्। रक्ता दन्ता भविष्यन्ति दाडिमीकुसुमोपमाः॥४४॥
ततो मां देवताः स्वर्गे मर्त्यलोके च मानवाः। स्तुवन्तो व्याहरिष्यन्ति सततं रक्तदन्तिकाम्॥४५॥
भूयश्च शतवार्षिक्यामनावृष्ट्यामनम्भसि। मुनिभिः संस्तुता भूमौ सम्भविष्याम्ययोनिजा॥४६॥
ततः शतेन नेत्राणां निरीक्षिष्यामि यन्मुनीन्। कीर्तयिष्यन्ति मनुजाः शताक्षीमिति मां ततः॥४७॥
ततोऽहमखिलं लोकमात्मदेहसमुद्भवैः। भरिष्यामि सुराः शाकैरावृष्टेः प्राणधारकैः॥४८॥
शाकम्भरीति विख्यातिं तदा यास्याम्यहं भुवि। तत्रैव च वधिष्यामि दुर्गमाख्यं महासुरम्॥४९॥
दुर्गा देवीति विख्यातं तन्मे नाम भविष्यति। पुनश्चाहं यदा भीमं रूपं कृत्वा हिमाचले॥५०॥
रक्षांसि भक्षयिष्यामि मुनीनां त्राणकारणात्। तदा मां मुनयः सर्वे स्तोष्यन्त्यानम्रमूर्तयः॥५१॥
भीमा देवीति विख्यातं तन्मे नाम भविष्यति। यदारुणाख्यस्त्रैलोक्ये महाबाधां करिष्यति॥५२॥
तदाहं भ्रामरं रूपं कृत्वाऽसंख्येयषट्पदम्। त्रैलोक्यस्य हितार्थाय वधिष्यामि महासुरम्॥५३॥
भ्रामरीति च मां लोकास्तदा स्तोष्यन्ति सर्वतः। इत्थं यदा यदा बाधा दानवोत्था भविष्यति॥५४॥
तदा तदावतीर्याहं करिष्याम्यरिसंक्षयम्॥ॐ॥५५॥
(१) प्रथम अवतार-नन्द गोप के घर में कन्या रूप में जन्म हुआ। कंस के मथुरा के कारागार में वसुदेव-देवकी के पुत्र रूप में उत्पन्न भगवान् कृष्ण को वहां से हटा कर नन्द घर में ले गये तथा वहां उत्पन्न कन्या को मथुरा ले आये तथा उसे जब कंस ने मारा तो वह आकाश में चली गयी तथा देवी रूप में कहा कि वह विन्ध्य में देवी रूप में रहेगी। यह विन्ध्याचल में विन्ध्यवासिनी कही जाती हैं। इस नगर का आजकल मिर्जापुर नाम हो गया है। इसका जन्म २८वें युग में हुआ जो ३१०२ ई.पू. में कलियुग आरम्भ के साथ पूर्ण हो गया। इस युग व्यवस्था का वर्णन ब्रह्माण्ड और मत्स्य पुराणों में है। स्वायम्भुव मनु से कलि-आरम्भ तक (जब पुराणों का संकलन नैमिषारण्य के शौनक महाशाला में आरम्भ हुआ) २६,००० वर्ष बीते जिसे ऐतिहासिक मन्वन्तर कहा गया है। इसमें ७१ युग थे, अतः १ युग प्रायः ३६० वर्ष का होगा, जिसे दिव्य वर्ष या दिव्य युग भी कहा गया है। इनमें वैवस्वत मनु तक ४३ युग या प्रायः १६००० वर्ष तथा उसके बाद कलि आरम्भ तक २८ युग या प्रायः २८ युग हुये।
ब्रह्माण्ड पुराण (१/२/९)-
स वै स्वायम्भुवः पूर्वम् पुरुषो मनुरुच्यते॥३‌६॥ तस्यैक सप्तति युगं मन्वन्तरमिहोच्यते॥३७॥
ब्रह्माण्ड पुराण (१/२/२९)-
त्रीणि वर्ष शतान्येव षष्टिवर्षाणि यानि तु। दिव्यः संवत्सरो ह्येष मानुषेण प्रकीर्त्तितः॥१६॥
त्रीणि वर्ष सहस्राणि मानुषाणि प्रमाणतः। त्रिंशदन्यानि वर्षाणि मतः सप्तर्षिवत्सरः॥१७॥
षड्विंशति सहस्राणि वर्षाणि मानुषाणि तु। वर्षाणां युगं ज्ञेयं दिव्यो ह्येष विधिः स्मृतः॥१९॥
मत्स्य पुराण अध्याय २७३-
अष्टाविंश समाख्याता गता वैवस्वतेऽन्तरे। एते देवगणैः सार्धं शिष्टा ये तान् निबोधत॥७६॥
चत्वारिंशत् त्रयश्चैव भविष्यास्ते महात्मनः। अवशिष्टा युगाख्यास्ते ततो वैवस्वतो ह्ययम्॥७७॥
भविष्य पुराण, प्रतिसर्ग पर्व १/४-षोडशाब्दसहस्रे च शेषे तद्द्वापरे युगे॥२६॥
द्विशताष्टसहस्रे द्वे शेषे तु द्वापरे युगे॥२८॥ तस्मादादमनामासौ पत्नी हव्यवतीस्मृता॥२९॥
यहां दिव्य वर्ष के २ अर्थ हैं- ३६० वर्ष जो ऊपर ब्रह्माण्ड पुराण (१/२/२९/१६) उद्धरण में दिया है। सप्तर्षि वर्ष की २ परिभाषाओं में सौर वर्ष (३६५.२५ दिन) को दिव्य वर्ष तथा चान्द्र परिक्रमा वर्ष (१२ चन्द्र परिक्रमा = ३२७ दिन) को मानुष वर्ष कहा गया है, क्योंकि चन्द्रमा मन से उत्पन्न है। चन्द्र की परिक्रमा २७.२ दिन में होती है, पर उसकी कलाओं का चक्र २९.५ दिन में होता है। कला के १२ चक्र में चन्द्र की प्रायः १३ परिक्रमा होती है जो ३५४ दिन का चान्द्र वर्ष कहा जाता है।
अतः १ सप्तर्षि वर्ष = ३०३० मानुष वर्ष = २७०० दिव्य वर्ष।
ब्रह्माण्ड पुराण मध्य भाग, (३) उपोद्धात पाद, अध्याय ७४-
सप्तविंशति पर्यन्ते कृत्स्ने नक्षत्रमण्डले। सप्तर्षयस्तु तिष्ठन्ते पर्यायेन शतं शतम्।२३१।
सप्तर्षीणां युगं त्वेतद्दिव्यया संख्यया स्मृतम्। मासा दिव्याः स्मृताः षट् च दिव्याब्दाश्चैव सप्त हि॥२३२॥
तेभ्यः प्रवर्तते कालो दिव्यः सप्तर्षिभिस्तु तैः। सप्तर्षीणां तु यौ पूर्वौ दृश्येते उत्तरा दिशि ॥२३३॥
तयोर्मध्ये च नक्षत्रं दृश्यते यत्समं निशि। तेन सप्तर्षयो युक्ता ज्ञेया व्योम्नि शतं समाः॥२३४॥
वायु पुराण, अध्याय ५७-
त्रीणि वर्ष सहस्राणि मानुषेण प्रमाणतः। त्रिंशद्यानि तु वर्षाणि मतः सप्तर्षिवत्सरः॥१७॥
वायुपुराण (अध्याय९८)-सप्तविंशतिपर्यन्तेकृत्स्नेनक्षत्रमण्डले।
सप्तर्षयस्तु तिष्ठन्ते पर्यायेण शतं शतम्॥ सप्तर्षीणां युगं ह्येत दिव्यया संख्यया स्मृतम्॥४१९॥
मासा दिव्या स्मृता षट् च दिव्याह्नाश्चैव सप्तभिः। तेभ्यः प्रवर्तते कालो दिव्यः सप्तर्षिभिस्तुतैः॥४२०॥
भगवान् कृष्ण ने १२५ वर्ष की आयु में जब इस लोक का त्याग किया तो ३१०२ ई. में कलियुग आरम्भ हुआ। अतः उनका जन्म उसके १२५ वर्ष पूर्व भाद्र शुक्ल अष्टमी = १९-७-३२२८ ई.पू. में हुआ था। प्रायः इसी दिन यशोदा की पुत्री रूप में देवी का जन्म हुआ था।
(२) रक्तदन्तिका द्वारा विप्रचित्ति दानव वध-निर्दोष को मारना हत्या है, पर आततायी को दण्ड रूप में मारना वध है। दानव आक्रमणकारी को मेगास्थनीज आदि ग्रीक लेखकों ने डायोनिसस कहा है जिसका आक्रमण सिकन्दर आक्रमण (३२६ ई.पू. जुलाई-वर्षा आरम्भ) से ६४५१ वर्ष ३ मास पूर्व अर्थात् प्रायः ६७७७ ई.पू. अप्रैल मास में हुआ था। यह ग्रीक लेखकों ने भारतीय गणना के अनुसार लिखा है क्योंकि किसी अन्य देश में इतनी लम्बी कालगणना नहीं थी। इस आक्रमण में पुराणों के अनुसार सूर्यवंशी राजा बाहु मारा गया था। उसके प्रायः २० वर्ष बाद उसके पुत्र सगर ने यवनों को भारत की पश्चिमी सीमा (अरब) से खदेड़ दिया था। वहां से भाग कर वे ग्रीस में बसे जिसका नाम यवनों के अनुसार यूनान (हेरोडोटस-इयोनिया) हो गया। बाहु से सिकन्दर आक्रमण या गुप्त काल के आरम्भ तक भारतीय राजाओं की १५४ पीढ़ी ने शासन किया था। इसमें २ काल गणतन्त्र के थे-१२० वर्ष में परशुराम के २१ गणतन्त्र जो २१ बार क्षत्रिय संहार कहा गया है। परशुराम के निधन के बाद ६१७७ ई.पू. में कलम्ब सम्वत् (केरल का कोल्लम) आरम्भ हुआ। परशुराम उसके प्रायः १५० वर्ष पूर्व (३० वर्ष में सहस्रबाहु वध + १२० वर्ष गणतन्त्र) हुये थे। मेगास्थनीज के अनुसार यह डायोनिसस की १५ पीढ़ी बाद (प्रायः ६०० वर्ष बाद) हुए थे। यह वायु पुराण की काल गणना में १९वां त्रेता कहा गया है (वैवस्वत मनु १३९०२ ई.पू. के बाद २८ युगों में १९वां)। यदि रक्तदन्तिका अवतार मूल डायोनिसस आक्रमण के बाद का है तो यह उसी का निर्देश कर रहा है। किन्तु यशोदा पुत्री के बाद का है तो यह सम्भवतः परीक्षित के अन्त और उसके पुत्र जनमेजय काल का है। कलियुग आरम्भ से परीक्षित ने ६० वर्ष शासन किया था (कलि वर्ष ६०)। उसके २९ वर्ष बाद उसके पुत्र जनमेजय ने आक्रमणकारी नागों को निर्मूल कर दिया। नागों का राजा तक्षक कहा गया है जो तक्षशिला का था। उसे विप्रचित्ति दानव के वंशजों का सहयोग मिला होगा तभी वह भारतीय राजा की हत्या कर पाया। जनमेजय ने जहां प्रथम बार नाग सेना को पराजित किया उस स्थान पर गुरु गोविन्द सिंहजी ने एक राम मन्दिर बनवाया था जिस पर इस युद्ध का उल्लेख था। इस जीत के बाद जनमेजय ने २ नाग नगरों में व्यापक नरसंहार किया। उनके नाम हुये-हड़प्पा (हड्डियों का ढेर) तथा मोइन-जो-दरो (मुर्दों का स्थान या टीला)। यह कहानी बहुत दिनों से मालूम थी अतः अंग्रेजों ने यहां खुदायी कर इसे विदेशी आर्यों का आक्रमण दिखाने की चेष्टा की। इसके बाद भारत के ऋषियों ने जनमेजय को नरसंहार का प्रायश्चित्त करने का आदेश दिया। इसी अर्थ में कहा है कि दुर्गा जी शत्रुओं के प्रति भी दया रखती हैं-चित्ते कृपा समरनिष्ठुरता च दृष्टा (४/२२)। इसके बाद कलिवर्ष ८९ प्लवङ्ग सम्वत्सर (पितामह मान से) की पौष अमावास्या को जब सूर्यग्रहण (पुरी में) था तब व्यतीपात योग में २७-११-३०१४ ई.पू. में जनमेजय ने केदारनाथ, तुङ्गभद्रा तट पर राममन्दिर तथा अन्य कुछ स्थलों पर भूमिदान किया था। इनमें ५ पट्टे मैसूर पुरातत्त्व पत्रिका के १९०० जनवरी अंक में प्रकाशित हुये थे।
(३) शताक्षी और शाकम्भरी-१०० वर्ष की अनावृष्टि के समय जब लोग भूख से मरने लगे तो उन्होंने मुनियों की प्राणरक्षा के लिये शताक्षी अवतार लिया था। इसका उल्लेख जैन शास्त्रों में है कि उस काल में सभी प्राचीन जैन शास्त्र नष्ट हो गये। लोगों को अन्न देने के लिये शाकम्भरी अवतार हुआ। सम्भवतः भारत के अन्य भागों से अन्न पहुंचाया गया। यह पश्चिम एसिया के असुरों के लिये भारत पर आक्रमण करने के लिये स्वर्ण अवसर था। अतः उसी शाकम्भरी देवी ने दुर्ग नामक असुर का वध किया और भीमा नाम से हिमाचल में रहकर मुनियों की रक्षा की। कुछ मुनि अकाल और आक्रमण से बचने के लिये निकटवर्त्ती हिमाचल में गये होंगे। अभी सहारनपुर से देहरादून के रास्ते में शिवालिक पहाड़ी जहां आरम्भ होती है, वहां तिमली में शाकम्भरी मन्दिर है। स्वयं सहारनपुर नाम भी शाकम्भरी का अपभ्रंश हो सकता है। चौहान राजाओं को शाकम्भरी का भक्त या शाकम्भरी का चौहान कहा गया है। एक शाकम्भरी राजस्थान में थी, निश्चित रूप से वहीं अकालपीड़ितों की सहायता और आक्रमण का प्रतीकार करना था। किन्तु हिमाचल तक प्रभाव रखे बिना तत्कालीन चौहान राजाओं के लिये यह सम्भव नहीं था। बाद में भी अजमेर के राजा पृथ्वीराज चौहान (११७१-११९२ ई.) के नाना दिल्ली के तोमरवंशी राजा ने गोद लिया था जिससे वे दिल्ली-अजमेर दोनों के राजा बने। उस समय पिथौरागढ दुर्ग तथा तिमली का मन्दिर पुनः बना होगा। राजस्थान तथा निकटवर्त्ती पश्चिमी भारत में १०० वर्ष तक अनावृष्टि होने पर उसके पूर्व भाग में अतिवृष्टि हुयी जिससे पारम्परिक पाण्डव राजधानी हस्तिनापुर गंगा की बाढ़ में पूरी तरह नष्ट हो गया। यह परीक्षित की ७वीं पीढ़ी में राजा निचक्षु के काल में कहा गया है।
विष्णु पुराण अंश ४, अध्याय -२१-
अतःपरं भविष्यानहं भूपालान्कीर्तयिष्यामि।१। यो‍ऽयंसाम्प्रतमवनीपतिः परीक्षित्तस्यापि जनमेजय-श्रुतसेनो-ग्रसेन-भीमसेनाश्चत्वारः पुत्राः भविष्यन्ति।२। जनमेजयस्यापि शतानीको भविष्यति।३। योऽ‍सौयाग्यवल्क्याद्वेदमधीत्यकृपादस्त्राण्यवाप्य विषमविषयविरक्तचित्तवृत्तिश्च शौनकोपदेशादात्मज्ञानप्रवीणः परं निर्वाणमवाप्स्यति।४। शतानीकादश्वमेधदत्तो भविता।५। तस्मादप्यधिसीमकृष्णः।६। अधिसीमकृष्णान्निचक्षुः।७। यो गङ्गायपहते हस्तिनापुरे कौशाम्ब्यां निवत्स्यति।८।
जब दिल्ली और उससे पश्चिम पूरा भारत आक्रान्त था तो केवल पूर्वी उत्तर प्रदेश बिहार आदि ही अन्न दे सकते थे, अतः बाद में मगध महत्त्वपूर्ण केन्द्र बना। अकाल के समय वाराणसी के राजा ही सहायता करने की स्थिति में थे। उन्होंने धर्म रक्षा के लिये अन्ततः सन्यास लेना उचित समझा होगा और पार्श्वनाथ नाम से २३वें जैन तीर्थंकर बने। उस समय से २६३४ ई.पू. में जैन-युधिष्ठिर शक आरम्भ हुआ। पार्श्वनाथ का ही सन्यास पूर्व का नाम युधिष्ठिर रहा होगा अथवा वे युधिष्ठिर जैसे धर्मात्मा थे। स्वयं युधिष्ठिर भी परीक्षित को राजा बनाने के बाद २५ वर्षों तक सन्यासी बन कर भारत घूमते रहे। सन्यासी रूप में केवल वही २२वें तीर्थंकर नेमिनाथ हो सकते हैं। नेमिनाथ को भगवान् कृष्ण का भाई कहा गया है। युधिष्ठिर के अतिरिक्त उनका कोई अन्य भाई (फुफेरा) राजा और सन्यासी नहीं हुआ था। यही समय सरस्वती के सूखने का है (२७००-२६०० ई.पू.) जो भूगर्भीय खोजों से भी ठीक लगता है। जिनविजय महाकाव्य का जैन युधिष्ठिर शक ५०४ युधिष्ठिर शक (२६३४ ई.पू.) में आरम्भ होता है। इसके अनुसार कुमारिल भट्ट का जन्म ५५७ ई.पू. (२०७७) क्रोधी सम्वत्सर (सौर मत) में तथा शंकराचार्य का निर्वाण ४७७ ई.पू. (२१५७) राक्षस सम्वत्सर में कहा है-
ऋषि(७)र्वार (७)स्तथा पूर्ण(०) मर्त्याक्षौ (२) वाममेलनात्. एकीकृत्य लभेताङ्कख् क्रोधीस्यात्तत्र वत्सरः॥
भट्टाचार्य कुमारस्य कर्मकाण्डैकवादिनः। ज्ञेयः प्रादुर्भवस्तस्मिन् वर्षे यौधिष्ठिरे शके॥
ऋषि(७)र्बाण(५) तथा भूमि(१)र्मर्त्याक्षौ (२) वाममेलनात्, एकत्वेन लभेताङ्कस्तम्राक्षास्तत्र वत्सरः॥ (शंकर निधन)
(४) भ्रामरी और अरुण असुर-इस समय टिड्डी दल की तरह असुरों का आक्रमण हुआ था। यह सबसे बड़ा आक्रमण असीरिया की रानी सेमिरामी (ग्रीक नाम) के द्वारा हुआ था। उसने भारत पर आक्रमण करने के लिये उत्तर अफ्रीका तथा मध्य और पश्चिम एसिया के सभी देशों से भारत लूटने में सहयोग मांगा था। इनकी संयुक्त सेना ३५ लाख भी कम लग रही थी अतः २ लाख ऊंटों को हाथी जैसी सूंढ़ लगा कर लाया गया था। सम्भवतः इसी आक्रमण का मुकाबला करने के लिये आबू पर्वत पर विष्णु अवतार बुद्ध (मगध में अजिन ब्राह्मण के पुत्र) द्वारा यज्ञ हुआ जिसमें ४ राजाओं का संघ बना। यही बुद्ध अवतार असुरों को मोहित करने के लिये था। सिद्धार्थ बुद्ध (१८८७-१८०७ ई.पू.) या गौतम बुद्ध (५६३ई.पू.) तथा सारनाथ स्तूप पर लिखित अन्य ३ बुद्ध केवल हिन्दुओं को मोहित कर रहे थे। जो राजा देश रक्षा में अग्रणी बने उनको अग्निवंशी कहा गया (अग्रि = अग्नि, शतपथ ब्राह्मण)। ४ अग्निवंशी राजा ४ वेदों के अनुसार थे-चपहानि या चाहमान (चौहान), शुक्ल (चालुक्य, सोलंकी, सालुंखे), प्रमर (परमार, पवार), प्रतिहार। इस संघ का अध्यक्ष होने के कारण मालवा के राजा इन्द्राणीगुप्त को सम्मान के लिये शूद्रक कहा गया (यहां शूद्र प्रशंसात्मक शब्द है)। इस समय ७५६ ई.पू. में शूद्रक शक आरम्भ हुआ तथा ४ अग्निवंशी राजाओं की वंशावली वहीं से चलती है। इसको भ्रमित करने के लिये कर्नल टाड ने ७५६ के बदले ७३० ई.पू. कर दिया।
काञ्चुयल्लार्य भट्ट-ज्योतिष दर्पण-पत्रक २२ (अनूप संस्कृत लाइब्रेरी, अजमेर एम्.एस नं ४६७७)
बाणाब्धि गुणदस्रोना (२३४५) शूद्रकाब्दा कलेर्गताः॥७१॥ गुणाब्धि व्योम रामोना(३०४३) विक्रमाब्दा कलेर्गताः॥
भविष्य पुराण, प्रतिसर्ग पर्व (१/६)-
एतस्मिन्नेवकाले तु कान्यकुब्जो द्विजोत्तमः। अर्बुदं शिखरं प्राप्य ब्रह्महोममथाकरोत्॥४५॥
वेदमन्त्रप्रभावाच्च जाताश्चत्वारि क्षत्रियाः। प्रमरस्सामवेदी च चपहानिर्यजुर्विदः॥४६॥
त्रिवेदी च तथा शुक्लोऽथर्वा स परिहारकः॥४७॥ अवन्ते प्रमरो भूपश्चतुर्योजन विस्तृता।।४९॥
प्रतिसर्ग (१/७)-चित्रकूटगिरिर्देशे परिहारो महीपतिः। कालिंजर पुरं रम्यमक्रोशायतनं स्मृतम्॥१॥
राजपुत्राख्यदेशे च चपहानिर्महीपतिः॥२॥ अजमेरपुरं रम्यं विधिशोभा समन्वितम्॥३॥
शुक्लो नाम महीपालो गत आनर्तमण्डले। द्वारकां नाम नगरीमध्यास्य सुखिनोऽभवत्॥४॥

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