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भारत का बिकाऊ मीडिया


भारत का बिकाऊ मीडिया

"भारत का बिकाऊ मीडिया"
Posted in संस्कृत साहित्य

लारा एलिजाबेथ लिखती हैं ,


लारा एलिजाबेथ लिखती हैं ,

”विश्व के सारे साहित्य का मूल जानने के लिए संस्कृत भाषा की जानकारी, इस भाषा के महान योगदान का ज्ञान और आधुनिक ग्रंथों से उस भाषा सम्बन्ध में जानना आवश्यक है.सोलोमन के समय में और एलेक्जेंडर के समय में भी संस्कृत बोली जाती थी.”

अर्थात ईसा से १०१५ वर्ष पूर्व भी संसार में संस्कृत भाषा खूब प्रचलित थी. और एक हम हैं जो बौध ग्रंथों के उदहारण से सिद्ध करना चाहते हैं कि बुध और महावीर के काल में भारत में संस्कृत का प्रचलन समाप्त हो गया था.
आज के हज़ार साल के बाद भारत के पुरातत्वविदों को आज का अंग्रेजी साहित्य मिल जाये तो क्या उन्हें मान लेना चाहिए कि भारत में केवल अंग्रेजी ही प्रचलित थी. यह तर्क है या कुतर्क ? तब भी आजकल की तरह अनेक भाषाए प्रचलित रही होंगी पर शासन और विद्वानों की सुप्रतिष्ठित भाषा संस्कृत रही होगी. जैसे कि भारत में आज अंग्रेजी भाषा शासन की भाषा है (जिसे देश के ५ % लोग भी ठीक से नहीं जानते.( पर और अनेक भाषाएँ और बोलियाँ भी खूब प्रचलित है. साहित्य सृजन की भाषा मुख्यतः हिंदी बनी हुई है. अतः हज़ार साल बाद पुरातत्व खनन में केवल अंग्रेज़ी के साहित्य के मिल जाने से पुरातत्वविद घोषित कर दे कि भारत की भाषा अंग्रजी थी, तो कितना सही होगा ? अनेक मामलों में ऐसा हुआ है. अतः भारत में निश्चित रूप से स्वदेशी भाषा संस्कृत की तो ऐसी दशा कभी न रही होगी जो आज अंग्रेजी की भारत में है.
अर्थात केवल २% की भाषा.

Posted in श्री कृष्णा

!! MULTAAN , MISRA AND KRISHNA !!


"!! MULTAAN , MISRA AND KRISHNA !!

Multan was known by many other names such as Kashyappur, Haspur, Bhagpur, Sambhalpur, and Prahladpur. Kashyappur was established by Kashyap, father of Aditya ( Suryadev). 

Father of Prahlad, King Hirankashyap was from the dynasty of "Daitya", or devils. Shree Krishna, defeated the grandson of Hiranyakashyap, Banasur and gave the state of Sindh-Multan to his son, Samb.

 Prince Samb was suffering with leprosy due to a curse by Rishi Durvasa. Thus, he could not stay inside the palace of Multan, but stayed outside in a garden instead. 

Shree Krishna requested Garud to ask the Ayurvedists of Shakdweep to find a cure for Prince Samb. The Ayurvedists told Prince Samb to pray to Lord Suryadev in order to find a cure for his predicament. 

Prince Samb acknowledged the same and got cured. Thereafter, he made a marvelous temple for Suryadev in the city of Multan. This temple was known for offering prayers to Lord Suryadev and patients of leprosy from all corners used to come here and obtain the Lord's blessings.

Lord Shree Krishna's grandson and son of Pradhyumna, Prince Anirudh was married to daughter of King Banasur or Multan, Princess Usha. 
They had a son named Mrigketan. Yet another son of Banasur was Kou Bhand, who had a daughter named Ramaa. Thus, Usha was Ramaa's "bua". Once Ramaa had accompanied her bua Usha to Dwarika, Usha's sasural. Once arrived, Anirudh's Uncle, Sambh got attracted towards Ramaa and married her. They had a son named Ushneek or Ushaneer. 

Prince Kou Bhand became King after Banasur. But since he had no son, he called up Ushneek and make him the King of Sonitpur, the capital of MISTRA .

 Many centuries later, one of the generations of King Ushneek, Devendra lost the kingdom to Nabi Mohammad and as a result his son, Prince Ugrasen was forced to convert to Islam. Prince Ugrasen was also known as Asvapati.

 Devendra's second son, Prince Gajpati came to Surat and established his own state. Gajpati's generations were known as "Chudasiya Yadavs". Devendra's third son defeated Firozshah in Gazni and ruled thereafter. Devendra's fourth son ruled the states of Kutchh and Sindh."

!! MULTAAN , MISRA AND KRISHNA !!

Multan was known by many other names such as Kashyappur, Haspur, Bhagpur, Sambhalpur, and Prahladpur. Kashyappur was established by Kashyap, father of Aditya ( Suryadev).

Father of Prahlad, King Hirankashyap was from the dynasty of “Daitya”, or devils. Shree Krishna, defeated the grandson of Hiranyakashyap, Banasur and gave the state of Sindh-Multan to his son, Samb.

Prince Samb was suffering with leprosy due to a curse by Rishi Durvasa. Thus, he could not stay inside the palace of Multan, but stayed outside in a garden instead.

Shree Krishna requested Garud to ask the Ayurvedists of Shakdweep to find a cure for Prince Samb. The Ayurvedists told Prince Samb to pray to Lord Suryadev in order to find a cure for his predicament.

Prince Samb acknowledged the same and got cured. Thereafter, he made a marvelous temple for Suryadev in the city of Multan. This temple was known for offering prayers to Lord Suryadev and patients of leprosy from all corners used to come here and obtain the Lord’s blessings.

Lord Shree Krishna’s grandson and son of Pradhyumna, Prince Anirudh was married to daughter of King Banasur or Multan, Princess Usha.
They had a son named Mrigketan. Yet another son of Banasur was Kou Bhand, who had a daughter named Ramaa. Thus, Usha was Ramaa’s “bua”. Once Ramaa had accompanied her bua Usha to Dwarika, Usha’s sasural. Once arrived, Anirudh’s Uncle, Sambh got attracted towards Ramaa and married her. They had a son named Ushneek or Ushaneer.

Prince Kou Bhand became King after Banasur. But since he had no son, he called up Ushneek and make him the King of Sonitpur, the capital of MISTRA .

Many centuries later, one of the generations of King Ushneek, Devendra lost the kingdom to Nabi Mohammad and as a result his son, Prince Ugrasen was forced to convert to Islam. Prince Ugrasen was also known as Asvapati.

Devendra’s second son, Prince Gajpati came to Surat and established his own state. Gajpati’s generations were known as “Chudasiya Yadavs”. Devendra’s third son defeated Firozshah in Gazni and ruled thereafter. Devendra’s fourth son ruled the states of Kutchh and Sindh.

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कलियुग के देवी अवतार और असुर आक्रमण– अरुण कुमार उपाध्याय


कलियुग के देवी अवतार और असुर आक्रमण– अरुण कुमार उपाध्याय
कलियुग अर्थात् महाभारत के बाद के देवी अवतारों के विषय में दुर्गा-सप्तशती, अध्याय ११ में कहा है-
वैवस्वतेऽन्तरे प्राप्ते अष्टाविंशति तमे युगे। शुम्भो निशुम्भश्चैवान्यावुत्पत्स्येते महासुरौ॥४१॥
नन्दगोपगृहे जाता यशोदा गर्भ सम्भवा। ततस्तौ नाशयिष्यामि विन्ध्याचल निवासिनी॥४२॥
पुनरप्यतिरौद्रेण रूपेण पृथिवीतले। अवतीर्य हनिष्यामि वैप्रचित्तांस्तु दानवान्॥४३॥
भक्षयन्त्याश्च तानुग्रान् वैप्रचित्तान्महासुरान्। रक्ता दन्ता भविष्यन्ति दाडिमीकुसुमोपमाः॥४४॥
ततो मां देवताः स्वर्गे मर्त्यलोके च मानवाः। स्तुवन्तो व्याहरिष्यन्ति सततं रक्तदन्तिकाम्॥४५॥
भूयश्च शतवार्षिक्यामनावृष्ट्यामनम्भसि। मुनिभिः संस्तुता भूमौ सम्भविष्याम्ययोनिजा॥४६॥
ततः शतेन नेत्राणां निरीक्षिष्यामि यन्मुनीन्। कीर्तयिष्यन्ति मनुजाः शताक्षीमिति मां ततः॥४७॥
ततोऽहमखिलं लोकमात्मदेहसमुद्भवैः। भरिष्यामि सुराः शाकैरावृष्टेः प्राणधारकैः॥४८॥
शाकम्भरीति विख्यातिं तदा यास्याम्यहं भुवि। तत्रैव च वधिष्यामि दुर्गमाख्यं महासुरम्॥४९॥
दुर्गा देवीति विख्यातं तन्मे नाम भविष्यति। पुनश्चाहं यदा भीमं रूपं कृत्वा हिमाचले॥५०॥
रक्षांसि भक्षयिष्यामि मुनीनां त्राणकारणात्। तदा मां मुनयः सर्वे स्तोष्यन्त्यानम्रमूर्तयः॥५१॥
भीमा देवीति विख्यातं तन्मे नाम भविष्यति। यदारुणाख्यस्त्रैलोक्ये महाबाधां करिष्यति॥५२॥
तदाहं भ्रामरं रूपं कृत्वाऽसंख्येयषट्पदम्। त्रैलोक्यस्य हितार्थाय वधिष्यामि महासुरम्॥५३॥
भ्रामरीति च मां लोकास्तदा स्तोष्यन्ति सर्वतः। इत्थं यदा यदा बाधा दानवोत्था भविष्यति॥५४॥
तदा तदावतीर्याहं करिष्याम्यरिसंक्षयम्॥ॐ॥५५॥
(१) प्रथम अवतार-नन्द गोप के घर में कन्या रूप में जन्म हुआ। कंस के मथुरा के कारागार में वसुदेव-देवकी के पुत्र रूप में उत्पन्न भगवान् कृष्ण को वहां से हटा कर नन्द घर में ले गये तथा वहां उत्पन्न कन्या को मथुरा ले आये तथा उसे जब कंस ने मारा तो वह आकाश में चली गयी तथा देवी रूप में कहा कि वह विन्ध्य में देवी रूप में रहेगी। यह विन्ध्याचल में विन्ध्यवासिनी कही जाती हैं। इस नगर का आजकल मिर्जापुर नाम हो गया है। इसका जन्म २८वें युग में हुआ जो ३१०२ ई.पू. में कलियुग आरम्भ के साथ पूर्ण हो गया। इस युग व्यवस्था का वर्णन ब्रह्माण्ड और मत्स्य पुराणों में है। स्वायम्भुव मनु से कलि-आरम्भ तक (जब पुराणों का संकलन नैमिषारण्य के शौनक महाशाला में आरम्भ हुआ) २६,००० वर्ष बीते जिसे ऐतिहासिक मन्वन्तर कहा गया है। इसमें ७१ युग थे, अतः १ युग प्रायः ३६० वर्ष का होगा, जिसे दिव्य वर्ष या दिव्य युग भी कहा गया है। इनमें वैवस्वत मनु तक ४३ युग या प्रायः १६००० वर्ष तथा उसके बाद कलि आरम्भ तक २८ युग या प्रायः २८ युग हुये।
ब्रह्माण्ड पुराण (१/२/९)-
स वै स्वायम्भुवः पूर्वम् पुरुषो मनुरुच्यते॥३‌६॥ तस्यैक सप्तति युगं मन्वन्तरमिहोच्यते॥३७॥
ब्रह्माण्ड पुराण (१/२/२९)-
त्रीणि वर्ष शतान्येव षष्टिवर्षाणि यानि तु। दिव्यः संवत्सरो ह्येष मानुषेण प्रकीर्त्तितः॥१६॥
त्रीणि वर्ष सहस्राणि मानुषाणि प्रमाणतः। त्रिंशदन्यानि वर्षाणि मतः सप्तर्षिवत्सरः॥१७॥
षड्विंशति सहस्राणि वर्षाणि मानुषाणि तु। वर्षाणां युगं ज्ञेयं दिव्यो ह्येष विधिः स्मृतः॥१९॥
मत्स्य पुराण अध्याय २७३-
अष्टाविंश समाख्याता गता वैवस्वतेऽन्तरे। एते देवगणैः सार्धं शिष्टा ये तान् निबोधत॥७६॥
चत्वारिंशत् त्रयश्चैव भविष्यास्ते महात्मनः। अवशिष्टा युगाख्यास्ते ततो वैवस्वतो ह्ययम्॥७७॥
भविष्य पुराण, प्रतिसर्ग पर्व १/४-षोडशाब्दसहस्रे च शेषे तद्द्वापरे युगे॥२६॥
द्विशताष्टसहस्रे द्वे शेषे तु द्वापरे युगे॥२८॥ तस्मादादमनामासौ पत्नी हव्यवतीस्मृता॥२९॥
यहां दिव्य वर्ष के २ अर्थ हैं- ३६० वर्ष जो ऊपर ब्रह्माण्ड पुराण (१/२/२९/१६) उद्धरण में दिया है। सप्तर्षि वर्ष की २ परिभाषाओं में सौर वर्ष (३६५.२५ दिन) को दिव्य वर्ष तथा चान्द्र परिक्रमा वर्ष (१२ चन्द्र परिक्रमा = ३२७ दिन) को मानुष वर्ष कहा गया है, क्योंकि चन्द्रमा मन से उत्पन्न है। चन्द्र की परिक्रमा २७.२ दिन में होती है, पर उसकी कलाओं का चक्र २९.५ दिन में होता है। कला के १२ चक्र में चन्द्र की प्रायः १३ परिक्रमा होती है जो ३५४ दिन का चान्द्र वर्ष कहा जाता है।
अतः १ सप्तर्षि वर्ष = ३०३० मानुष वर्ष = २७०० दिव्य वर्ष।
ब्रह्माण्ड पुराण मध्य भाग, (३) उपोद्धात पाद, अध्याय ७४-
सप्तविंशति पर्यन्ते कृत्स्ने नक्षत्रमण्डले। सप्तर्षयस्तु तिष्ठन्ते पर्यायेन शतं शतम्।२३१।
सप्तर्षीणां युगं त्वेतद्दिव्यया संख्यया स्मृतम्। मासा दिव्याः स्मृताः षट् च दिव्याब्दाश्चैव सप्त हि॥२३२॥
तेभ्यः प्रवर्तते कालो दिव्यः सप्तर्षिभिस्तु तैः। सप्तर्षीणां तु यौ पूर्वौ दृश्येते उत्तरा दिशि ॥२३३॥
तयोर्मध्ये च नक्षत्रं दृश्यते यत्समं निशि। तेन सप्तर्षयो युक्ता ज्ञेया व्योम्नि शतं समाः॥२३४॥
वायु पुराण, अध्याय ५७-
त्रीणि वर्ष सहस्राणि मानुषेण प्रमाणतः। त्रिंशद्यानि तु वर्षाणि मतः सप्तर्षिवत्सरः॥१७॥
वायुपुराण (अध्याय९८)-सप्तविंशतिपर्यन्तेकृत्स्नेनक्षत्रमण्डले।
सप्तर्षयस्तु तिष्ठन्ते पर्यायेण शतं शतम्॥ सप्तर्षीणां युगं ह्येत दिव्यया संख्यया स्मृतम्॥४१९॥
मासा दिव्या स्मृता षट् च दिव्याह्नाश्चैव सप्तभिः। तेभ्यः प्रवर्तते कालो दिव्यः सप्तर्षिभिस्तुतैः॥४२०॥
भगवान् कृष्ण ने १२५ वर्ष की आयु में जब इस लोक का त्याग किया तो ३१०२ ई. में कलियुग आरम्भ हुआ। अतः उनका जन्म उसके १२५ वर्ष पूर्व भाद्र शुक्ल अष्टमी = १९-७-३२२८ ई.पू. में हुआ था। प्रायः इसी दिन यशोदा की पुत्री रूप में देवी का जन्म हुआ था।
(२) रक्तदन्तिका द्वारा विप्रचित्ति दानव वध-निर्दोष को मारना हत्या है, पर आततायी को दण्ड रूप में मारना वध है। दानव आक्रमणकारी को मेगास्थनीज आदि ग्रीक लेखकों ने डायोनिसस कहा है जिसका आक्रमण सिकन्दर आक्रमण (३२६ ई.पू. जुलाई-वर्षा आरम्भ) से ६४५१ वर्ष ३ मास पूर्व अर्थात् प्रायः ६७७७ ई.पू. अप्रैल मास में हुआ था। यह ग्रीक लेखकों ने भारतीय गणना के अनुसार लिखा है क्योंकि किसी अन्य देश में इतनी लम्बी कालगणना नहीं थी। इस आक्रमण में पुराणों के अनुसार सूर्यवंशी राजा बाहु मारा गया था। उसके प्रायः २० वर्ष बाद उसके पुत्र सगर ने यवनों को भारत की पश्चिमी सीमा (अरब) से खदेड़ दिया था। वहां से भाग कर वे ग्रीस में बसे जिसका नाम यवनों के अनुसार यूनान (हेरोडोटस-इयोनिया) हो गया। बाहु से सिकन्दर आक्रमण या गुप्त काल के आरम्भ तक भारतीय राजाओं की १५४ पीढ़ी ने शासन किया था। इसमें २ काल गणतन्त्र के थे-१२० वर्ष में परशुराम के २१ गणतन्त्र जो २१ बार क्षत्रिय संहार कहा गया है। परशुराम के निधन के बाद ६१७७ ई.पू. में कलम्ब सम्वत् (केरल का कोल्लम) आरम्भ हुआ। परशुराम उसके प्रायः १५० वर्ष पूर्व (३० वर्ष में सहस्रबाहु वध + १२० वर्ष गणतन्त्र) हुये थे। मेगास्थनीज के अनुसार यह डायोनिसस की १५ पीढ़ी बाद (प्रायः ६०० वर्ष बाद) हुए थे। यह वायु पुराण की काल गणना में १९वां त्रेता कहा गया है (वैवस्वत मनु १३९०२ ई.पू. के बाद २८ युगों में १९वां)। यदि रक्तदन्तिका अवतार मूल डायोनिसस आक्रमण के बाद का है तो यह उसी का निर्देश कर रहा है। किन्तु यशोदा पुत्री के बाद का है तो यह सम्भवतः परीक्षित के अन्त और उसके पुत्र जनमेजय काल का है। कलियुग आरम्भ से परीक्षित ने ६० वर्ष शासन किया था (कलि वर्ष ६०)। उसके २९ वर्ष बाद उसके पुत्र जनमेजय ने आक्रमणकारी नागों को निर्मूल कर दिया। नागों का राजा तक्षक कहा गया है जो तक्षशिला का था। उसे विप्रचित्ति दानव के वंशजों का सहयोग मिला होगा तभी वह भारतीय राजा की हत्या कर पाया। जनमेजय ने जहां प्रथम बार नाग सेना को पराजित किया उस स्थान पर गुरु गोविन्द सिंहजी ने एक राम मन्दिर बनवाया था जिस पर इस युद्ध का उल्लेख था। इस जीत के बाद जनमेजय ने २ नाग नगरों में व्यापक नरसंहार किया। उनके नाम हुये-हड़प्पा (हड्डियों का ढेर) तथा मोइन-जो-दरो (मुर्दों का स्थान या टीला)। यह कहानी बहुत दिनों से मालूम थी अतः अंग्रेजों ने यहां खुदायी कर इसे विदेशी आर्यों का आक्रमण दिखाने की चेष्टा की। इसके बाद भारत के ऋषियों ने जनमेजय को नरसंहार का प्रायश्चित्त करने का आदेश दिया। इसी अर्थ में कहा है कि दुर्गा जी शत्रुओं के प्रति भी दया रखती हैं-चित्ते कृपा समरनिष्ठुरता च दृष्टा (४/२२)। इसके बाद कलिवर्ष ८९ प्लवङ्ग सम्वत्सर (पितामह मान से) की पौष अमावास्या को जब सूर्यग्रहण (पुरी में) था तब व्यतीपात योग में २७-११-३०१४ ई.पू. में जनमेजय ने केदारनाथ, तुङ्गभद्रा तट पर राममन्दिर तथा अन्य कुछ स्थलों पर भूमिदान किया था। इनमें ५ पट्टे मैसूर पुरातत्त्व पत्रिका के १९०० जनवरी अंक में प्रकाशित हुये थे।
(३) शताक्षी और शाकम्भरी-१०० वर्ष की अनावृष्टि के समय जब लोग भूख से मरने लगे तो उन्होंने मुनियों की प्राणरक्षा के लिये शताक्षी अवतार लिया था। इसका उल्लेख जैन शास्त्रों में है कि उस काल में सभी प्राचीन जैन शास्त्र नष्ट हो गये। लोगों को अन्न देने के लिये शाकम्भरी अवतार हुआ। सम्भवतः भारत के अन्य भागों से अन्न पहुंचाया गया। यह पश्चिम एसिया के असुरों के लिये भारत पर आक्रमण करने के लिये स्वर्ण अवसर था। अतः उसी शाकम्भरी देवी ने दुर्ग नामक असुर का वध किया और भीमा नाम से हिमाचल में रहकर मुनियों की रक्षा की। कुछ मुनि अकाल और आक्रमण से बचने के लिये निकटवर्त्ती हिमाचल में गये होंगे। अभी सहारनपुर से देहरादून के रास्ते में शिवालिक पहाड़ी जहां आरम्भ होती है, वहां तिमली में शाकम्भरी मन्दिर है। स्वयं सहारनपुर नाम भी शाकम्भरी का अपभ्रंश हो सकता है। चौहान राजाओं को शाकम्भरी का भक्त या शाकम्भरी का चौहान कहा गया है। एक शाकम्भरी राजस्थान में थी, निश्चित रूप से वहीं अकालपीड़ितों की सहायता और आक्रमण का प्रतीकार करना था। किन्तु हिमाचल तक प्रभाव रखे बिना तत्कालीन चौहान राजाओं के लिये यह सम्भव नहीं था। बाद में भी अजमेर के राजा पृथ्वीराज चौहान (११७१-११९२ ई.) के नाना दिल्ली के तोमरवंशी राजा ने गोद लिया था जिससे वे दिल्ली-अजमेर दोनों के राजा बने। उस समय पिथौरागढ दुर्ग तथा तिमली का मन्दिर पुनः बना होगा। राजस्थान तथा निकटवर्त्ती पश्चिमी भारत में १०० वर्ष तक अनावृष्टि होने पर उसके पूर्व भाग में अतिवृष्टि हुयी जिससे पारम्परिक पाण्डव राजधानी हस्तिनापुर गंगा की बाढ़ में पूरी तरह नष्ट हो गया। यह परीक्षित की ७वीं पीढ़ी में राजा निचक्षु के काल में कहा गया है।
विष्णु पुराण अंश ४, अध्याय -२१-
अतःपरं भविष्यानहं भूपालान्कीर्तयिष्यामि।१। यो‍ऽयंसाम्प्रतमवनीपतिः परीक्षित्तस्यापि जनमेजय-श्रुतसेनो-ग्रसेन-भीमसेनाश्चत्वारः पुत्राः भविष्यन्ति।२। जनमेजयस्यापि शतानीको भविष्यति।३। योऽ‍सौयाग्यवल्क्याद्वेदमधीत्यकृपादस्त्राण्यवाप्य विषमविषयविरक्तचित्तवृत्तिश्च शौनकोपदेशादात्मज्ञानप्रवीणः परं निर्वाणमवाप्स्यति।४। शतानीकादश्वमेधदत्तो भविता।५। तस्मादप्यधिसीमकृष्णः।६। अधिसीमकृष्णान्निचक्षुः।७। यो गङ्गायपहते हस्तिनापुरे कौशाम्ब्यां निवत्स्यति।८।
जब दिल्ली और उससे पश्चिम पूरा भारत आक्रान्त था तो केवल पूर्वी उत्तर प्रदेश बिहार आदि ही अन्न दे सकते थे, अतः बाद में मगध महत्त्वपूर्ण केन्द्र बना। अकाल के समय वाराणसी के राजा ही सहायता करने की स्थिति में थे। उन्होंने धर्म रक्षा के लिये अन्ततः सन्यास लेना उचित समझा होगा और पार्श्वनाथ नाम से २३वें जैन तीर्थंकर बने। उस समय से २६३४ ई.पू. में जैन-युधिष्ठिर शक आरम्भ हुआ। पार्श्वनाथ का ही सन्यास पूर्व का नाम युधिष्ठिर रहा होगा अथवा वे युधिष्ठिर जैसे धर्मात्मा थे। स्वयं युधिष्ठिर भी परीक्षित को राजा बनाने के बाद २५ वर्षों तक सन्यासी बन कर भारत घूमते रहे। सन्यासी रूप में केवल वही २२वें तीर्थंकर नेमिनाथ हो सकते हैं। नेमिनाथ को भगवान् कृष्ण का भाई कहा गया है। युधिष्ठिर के अतिरिक्त उनका कोई अन्य भाई (फुफेरा) राजा और सन्यासी नहीं हुआ था। यही समय सरस्वती के सूखने का है (२७००-२६०० ई.पू.) जो भूगर्भीय खोजों से भी ठीक लगता है। जिनविजय महाकाव्य का जैन युधिष्ठिर शक ५०४ युधिष्ठिर शक (२६३४ ई.पू.) में आरम्भ होता है। इसके अनुसार कुमारिल भट्ट का जन्म ५५७ ई.पू. (२०७७) क्रोधी सम्वत्सर (सौर मत) में तथा शंकराचार्य का निर्वाण ४७७ ई.पू. (२१५७) राक्षस सम्वत्सर में कहा है-
ऋषि(७)र्वार (७)स्तथा पूर्ण(०) मर्त्याक्षौ (२) वाममेलनात्. एकीकृत्य लभेताङ्कख् क्रोधीस्यात्तत्र वत्सरः॥
भट्टाचार्य कुमारस्य कर्मकाण्डैकवादिनः। ज्ञेयः प्रादुर्भवस्तस्मिन् वर्षे यौधिष्ठिरे शके॥
ऋषि(७)र्बाण(५) तथा भूमि(१)र्मर्त्याक्षौ (२) वाममेलनात्, एकत्वेन लभेताङ्कस्तम्राक्षास्तत्र वत्सरः॥ (शंकर निधन)
(४) भ्रामरी और अरुण असुर-इस समय टिड्डी दल की तरह असुरों का आक्रमण हुआ था। यह सबसे बड़ा आक्रमण असीरिया की रानी सेमिरामी (ग्रीक नाम) के द्वारा हुआ था। उसने भारत पर आक्रमण करने के लिये उत्तर अफ्रीका तथा मध्य और पश्चिम एसिया के सभी देशों से भारत लूटने में सहयोग मांगा था। इनकी संयुक्त सेना ३५ लाख भी कम लग रही थी अतः २ लाख ऊंटों को हाथी जैसी सूंढ़ लगा कर लाया गया था। सम्भवतः इसी आक्रमण का मुकाबला करने के लिये आबू पर्वत पर विष्णु अवतार बुद्ध (मगध में अजिन ब्राह्मण के पुत्र) द्वारा यज्ञ हुआ जिसमें ४ राजाओं का संघ बना। यही बुद्ध अवतार असुरों को मोहित करने के लिये था। सिद्धार्थ बुद्ध (१८८७-१८०७ ई.पू.) या गौतम बुद्ध (५६३ई.पू.) तथा सारनाथ स्तूप पर लिखित अन्य ३ बुद्ध केवल हिन्दुओं को मोहित कर रहे थे। जो राजा देश रक्षा में अग्रणी बने उनको अग्निवंशी कहा गया (अग्रि = अग्नि, शतपथ ब्राह्मण)। ४ अग्निवंशी राजा ४ वेदों के अनुसार थे-चपहानि या चाहमान (चौहान), शुक्ल (चालुक्य, सोलंकी, सालुंखे), प्रमर (परमार, पवार), प्रतिहार। इस संघ का अध्यक्ष होने के कारण मालवा के राजा इन्द्राणीगुप्त को सम्मान के लिये शूद्रक कहा गया (यहां शूद्र प्रशंसात्मक शब्द है)। इस समय ७५६ ई.पू. में शूद्रक शक आरम्भ हुआ तथा ४ अग्निवंशी राजाओं की वंशावली वहीं से चलती है। इसको भ्रमित करने के लिये कर्नल टाड ने ७५६ के बदले ७३० ई.पू. कर दिया।
काञ्चुयल्लार्य भट्ट-ज्योतिष दर्पण-पत्रक २२ (अनूप संस्कृत लाइब्रेरी, अजमेर एम्.एस नं ४६७७)
बाणाब्धि गुणदस्रोना (२३४५) शूद्रकाब्दा कलेर्गताः॥७१॥ गुणाब्धि व्योम रामोना(३०४३) विक्रमाब्दा कलेर्गताः॥
भविष्य पुराण, प्रतिसर्ग पर्व (१/६)-
एतस्मिन्नेवकाले तु कान्यकुब्जो द्विजोत्तमः। अर्बुदं शिखरं प्राप्य ब्रह्महोममथाकरोत्॥४५॥
वेदमन्त्रप्रभावाच्च जाताश्चत्वारि क्षत्रियाः। प्रमरस्सामवेदी च चपहानिर्यजुर्विदः॥४६॥
त्रिवेदी च तथा शुक्लोऽथर्वा स परिहारकः॥४७॥ अवन्ते प्रमरो भूपश्चतुर्योजन विस्तृता।।४९॥
प्रतिसर्ग (१/७)-चित्रकूटगिरिर्देशे परिहारो महीपतिः। कालिंजर पुरं रम्यमक्रोशायतनं स्मृतम्॥१॥
राजपुत्राख्यदेशे च चपहानिर्महीपतिः॥२॥ अजमेरपुरं रम्यं विधिशोभा समन्वितम्॥३॥
शुक्लो नाम महीपालो गत आनर्तमण्डले। द्वारकां नाम नगरीमध्यास्य सुखिनोऽभवत्॥४॥

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दिल्ली का लाल किला शाहजहाँ निर्मित नहीं ,एक हिन्दू राजपूती निर्माण “लाल कोट” है


"लालकिला हिन्दू निर्माण---- चित्र ----5"
"लाल किला हिन्दू निर्माण ---चित्र ---1"
"लाल किला हिन्दू निर्माण ---चित्र --3"
"लालकिला हिन्दू निर्माण---- चित्र ---2"

दिल्ली का लाल किला शाहजहाँ निर्मित नहीं ,एक हिन्दू राजपूती निर्माण “लाल कोट” है
भारतीय इतिहास के मुग़ल काल का एक और झूठ ———————————–
“कि दिल्ली के लाल किला का निर्माण शाहजहाँ ने करवाया था”——— सफ़ेद झूठ है
वास्तव में यह “लाल किला” महाराजा प्रथ्वीराज चौहान काल में लिखित “प्रथ्वीराज रासो” नामक काव्य में वर्णित “लाल कोट” ही है
इसका निर्माण प्रथ्वीराज चौहान के नाना महाराजा अनंगपाल तोमर (द्वितीय) ने दिल्ली बसाने के क्रम में 1060 AD में करवाया था और महाराजा प्रथ्वीराज चौहान ने इसे पूरा कराया था
शाहजहाँ ने इसे बनवाना तो दूर इसे अपना निर्माण सिद्ध करने के लिए इसमे हिन्दू साक्ष्यों और प्रतीकों को नष्ट करने और मिटाने का ही कार्य ही किया था
इसके हिन्दू निर्माण होने के कुछ प्रमाण इस प्रकार हैं
1 – दिल्ली गेट पर दोनों ओर पूर्ण आकार के पत्थर के दो हाथी स्थापित थे (चित्र नं 1) इनका निर्माण गज प्रेमी राजपूत राजाओं ही संभव हो सकता है शाहजहाँ द्वारा इन्हें तोडा गया होगा और इसके टूटे टुकड़े किसी तहखाने मे फेंक दिए गए होंगे
2 – दीवाने खास / प्रमुख महल में द्वार (गेट) पर सामने की ओर दो तलवारें ऊपर को रखी हुयी ,उसके ऊपर फिर कलश , कमल और न्याय तुला (तराजू) सूर्य की परिधि में बनाए गए हैं तलवारों के सिरों पर दोनों ओर शंख कि आकृतियाँ बनी है (चित्र नं2);ये तलवारें और न्याय तुला तोमर राजाओं का राज्य चिन्ह रहा है ये सब चिन्ह मुसलमानों द्वारा स्वीकार नहीं किये जा सकते थे
3 – दीवाने खास / प्रमुख महल के द्वार (गेट) पर मेहराब में ऊपर की ओर सूर्य का चिन्ह बना है और उसके दोनों ओर ॐ कि आकृतियाँ बनी है (चित्र नं 3) ये भी हिन्दू धार्मिक चिन्ह हैं और मुसलमानों द्वारा निर्मित होने का खंडन करते है
4 – खास महल के प्रत्येक द्वार पर दरवाजों के कुंडों पर हाथी पर सवार महावत ढाले गए है (चित्र नं 4) ये भी मुस्लिम परम्परा विरोधी और हिन्दू निर्माण के समर्थक है
5 – चित्र नं 5 इस पेन्टिंग में मुग़ल बादशाह शाहजहाँ को 1628 ईसवी में गद्दी पर बैठे हुए पर्शियन राजदूत का,दिल्ली के लाल किले के दीवाने आम में स्वागत करते हुए दिखाया गया है
यह पेन्टिंग बोद्लियन Bodleian Library Oxford me सुरक्षित है और भारत में इलस्ट्रेटेड Illustrated weekly मार्च 14 ,1971 में page 32 पर छपी थी
मुग़ल बादशाह शाहजहाँ जिसे श्रेय दिया जाता है कि इन्होने 1638 ईसवी से 1648 ईसवी में लाल किला बनवाया था
वही पेन्टिंग के अनुसार 1628 ईसवीं में गद्दी पर बैठे पर्शियन राजदूत का स्वागत करता दिख रहा है इस प्रकार शाहजहाँ अपनी गद्दी पर बैठने के समय लाल किले में ही उपस्थित था अतः किला पहले से ही बना हुआ था और उसका लाल किला के निर्माण कर्ता होने का प्रश्न ही नहीं उठता
6 – किले में एक स्थल “केसर कुंड” नाम से है जिसके फर्श पर कमल पुष्प अंकित है केसर और कुंड दोनों शब्द हिन्दू शब्दावली से हैं हिन्दू राजा केसर व पुष्पों से भरे जल स्थान जिन्हें कुंड कहते थे स्नान के लिए प्रयोग मे लाते थे यह भी हिन्दू निर्माण का प्रमाण है
7 – लाल किले में पीछे यमुना नदी की ओर का स्थल “राज घाट” के नाम से है यदि यह मुसलमान निर्मित होता तो घाट का नाम “बादशाह घाट’ जैसा कुछ होता
8 – छतों से पानी गिराने के लिए जो ड्रेन पाईप के सिरे वराह (सुवर) के मुह से सजे है
“वराह” (सुवर) हिन्दुओ में भगवन विष्णु का अवतार माना जाता है और मुसलमानों में एक घ्रणित वस्तु जिसे वे कभी न बनने देते
9 – लाल किला कुछ दूरी पर सम सामयिक निर्मित एक जैन मंदिर जिसे लाल मंदिर कहते है और एक गौरी शंकर मंदिर है क्या किला बनाते समय शाहजहाँ ये मंदिर बनने देता ,यह भी सिद्ध करता है ये दोनों मंदिर और लाल किला शाहजहाँ से पूर्व निर्मित हैं
10 – तवारीखे फिरोज्शाही पेज 160 पर लिखा है कि अलाउद्दीन खिलजी 1296 AD में जब सेना के साथ दिल्ली पहुँछा तो कुश्क–ए-लाल यानि लाल महल में विश्राम किया तो वह लाल किला ही होगा जो कि 1296 AD से पहले ही मौजूद था
11 – लाल किले के अन्दर कोई ऐसा प्रमाण या शिला लेख नहीं मिला है जो यह प्रमाणित करे कि लाल किला शाहजहाँ का बनवाया था
इस प्रकार हम देखते है कि लालकिला में अनेको साक्ष्य और चिन्ह बचे हैं वे सब यही प्रमाणित करते है कि यह हिन्दू निर्माण है और वही यह भी प्रमाणित करते हैं कि यह मुसलमानी इस्लामिक निर्माण नहीं है
निश्चय ही यह ”लाल किला” शाहजहाँ से लगभग 500 वर्ष पूर्व महाराजा अनंगपाल तोमर द्वारा 1060 AD में बनवाया गया ” लाल कोट” ही है

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रामायण का अर्थ राम का यात्रा पथ


!! रामायण का अर्थ राम का यात्रा पथ !!

आदिकवि वाल्मीकि कृत रामायण न केवल इस अर्थ में अद्वितीय है कि यह देश-विदेश की अनेक भाषाओं के साहित्य की विभिन्न विधाओं में विरचित तीन सौ से भी अधिक मौलिक रचनाओं का उपजीव्य है, प्रत्युत इस संदर्भ में भी कि इसने भारत के अतिरिक्त अनेक देशों के नाट्य, संगीत, मूर्ति तथा चित्र कलाओं को प्रभावित किया है और कि भारतीय इतिहास के प्राचीन स्रोतों में इसके मूल को तलाशने के सारे प्रयासों की विफलता के बावजूद यह होमर कृत ‘इलियाड’ तथा ‘ओडिसी’, वर्जिल कृत ‘आइनाइड’ और दांते कृत ‘डिवाइन कॉमेडी’ की तरह संसार का एक श्रेष्ठ महाकाव्य है।

‘रामायण’ का विश्लेषित रुप ‘राम का अयन’ है जिसका अर्थ है ‘राम का यात्रा पथ’, क्योंकि अयन यात्रापथवाची है। इसकी अर्थवत्ता इस तथ्य में भी अंतर्निहित है कि यह मूलत: राम की दो विजय यात्राओं पर आधारित है जिसमें प्रथम यात्रा यदि प्रेम-संयोग, हास-परिहास तथा आनंद-उल्लास से परिपूर्ण है, तो दूसरी क्लेश, क्लांति, वियोग, व्याकुलता, विवशता और वेदना से आवृत्त। विश्व के अधिकतर विद्वान दूसरी यात्रा को ही रामकथा का मूल आधार मानते हैं।

एक श्लोकी रामायण में राम वन गमन से रावण वध तक की कथा ही रुपायित हुई है।

अदौ राम तपोवनादि गमनं हत्वा मृगं कांचनम्। वैदेही हरणं जटायु मरणं सुग्रीव संभाषणम्। वालि निग्रहणं समुद्र तरणं लंका पुरी दास्हम्। पाश्चाद् रावण कुंभकर्ण हननं तद्धि रामायणम्।

जीवन के त्रासद यथार्थ को रुपायित करने वाली राम कथा में सीता का अपहरण और उनकी खोज अत्यधिक रोमांचक है। रामकथा की विदेश-यात्रा के संदर्भ में सीता की खोज-यात्रा का विशेष महत्व है।

वाल्मीकि रामायण के किष्किंधा कांड के चालीस से तेतालीस अध्यायों के बीच इसका विस्तृत वर्ण हुआ है जो ‘दिग्वर्णन’ के नाम से विख्यात है।

इसके अंतर्गत वानर राज बालि ने विभिन्न दिशाओं में जाने वाले दूतों को अलग-अलग दिशा निर्देश दिया जिससे एशिया के समकालीन भूगोल की जानकारी मिलती है।

इस दिशा में कई महत्वपूर्ण शोध हुए है जिससे वाल्मीकी द्वारा वर्णित स्थानों को विश्व के आधुनिक मानचित्र पर पहचानने का प्रयत्न किया गया है।

कपिराज सुग्रीव ने पूर्व दिशा में जाने वाले दूतों के सात राज्यों से सुशोभित यवद्वीप (जावा), सुवर्ण द्वीप (सुमात्रा) तथा रुप्यक द्वीप में यत्नपूर्वक जनकसुता को तलाशने का आदेश दिया था। इसी क्रम में यह भी कहा गया था कि यव द्वीप के आगे शिशिर नामक पर्वत है जिसका शिखर स्वर्ग को स्पर्श करता है और जिसके ऊपर देवता तथा दानव निवास करते हैं।

यनिवन्तों यव द्वीपं सप्तराज्योपशोभितम्। सुवर्ण रुप्यक द्वीपं सुवर्णाकर मंडितम्। जवद्वीप अतिक्रम्य शिशिरो नाम पर्वत:। दिवं स्पृशति श्रृंगं देवदानव सेवित:।१

दक्षिण-पूर्व एशिया के इतिहास का आरंभ इसी दस्तावेती सबूत से होता है। इंडोनेशिया के बोर्नियो द्वीप में तीसरी शताब्दी को उत्तरार्ध से ही भारतीय संस्कृति की विद्यमानता के पुख्ता सबूत मिलते हैं। बोर्नियों द्वीप के एक संस्कृत शिलालेख में मूलवर्मा की प्रशस्ति उत्कीर्ण है जो इस प्रकार है-

श्रीमत: श्री नरेन्द्रस्य कुंडगस्य महात्मन:। पुत्रोश्ववर्मा विख्यात: वंशकर्ता यथांशुमान्।। तस्य पुत्रा महात्मान: तपोबलदमान्वित:। तेषांत्रयानाम्प्रवर: तपोबलदमान्वित:।। श्री मूलवम्र्मा राजन्द्रोयष्ट्वा वहुसुवर्णकम्। तस्य यज्ञस्य यूपोयं द्विजेन्द्रस्सम्प्रकल्पित:।।२

इस शिला लेख में मूल वर्मा के पिता अश्ववर्मा तथा पितामह कुंडग का उल्लेख है।
बोर्नियों में भारतीय संस्कृति और संस्कृत भाषा के स्थापित होने में भी काफी समय लगा होगा। तात्पर्य यह कि भारतवासी मूल वर्मा के राजत्वकाल से बहुत पहले उस क्षेत्र में पहुँच गये थे।

जावा द्वीप और उसके निकटवर्ती क्षेत्र के वर्णन के बाद द्रुतगामी शोणनद तथा काले मेघ के समान दिलाई दिखाई देने वाले समुद्र का उल्लेख हुआ है जिसमें भारी गर्जना होती रहती है। इसी समुद्र के तट पर गरुड़ की निवास भूमि शल्मलीक द्वीप है जहाँ भयंकर मानदेह नामक राक्षस रहते हैं जो सुरा समुद्र के मध्यवर्ती शैल शिखरों पर लटके रहते है।

सुरा समुद्र के आगे घृत और दधि के समुद्र हैं। फिर, श्वेत आभावाले क्षीर समुद्र के दर्शन होते हैं। उस समुद्र के मध्य ॠषभ नामक श्वेत पर्वत है जिसके ऊपर सुदर्शन नामक सरोवर है। क्षीर समुद्र के बाद स्वादिष्ट जलवाला एक भयावह समुद्र है जिसके बीच एक विशाल घोड़े का मुख है जिससे आग निकलती रहती है।३

‘महाभारत’ में एक कथा है कि भृगुवंशी और्व ॠषि के क्रोध से जो अग्नि ज्वाला उत्पन्न हुई, उससे संसार के विनाश की संभावना थी। ऐसी स्थिति में उन्होंने उस अग्नि को समुद्र में डाल दिया। सागर में जहाँ वह अग्नि विसर्जित हुई, घोड़े की मुखाकृति (वड़वामुख) बन गयी और उससे लपटें निकलने लगीं। इसी कारण उसका नाम वड़वानल पड़ा।

आधुनिक समीक्षकों की मान्यता है कि इससे प्रशांत महासागर क्षेत्र की किसी ज्वालामुखी का संकेत मिलता है। वह स्थल मलस्क्का से फिलिप्पींस जाने वाले जलमार्ग के बीच हो सकता है।४

यथार्थ यह है कि इंडोनेशिया से फिलिप्पींस द्वीप समूहों के बीच अक्सर ज्वालामुखी के विस्फोट होते रहते हैं जिसके अनेक ऐतिहासिक प्रमाण हैं।

दधि, धृत और सुरा समुद्र का संबंध श्वेत आभा वाले क्षीर सागर की तरह जल के रंगों के संकेतक प्रतीत होते हैं।

बड़वामुख से तेरह योजना उत्तर जातरुप नामक सोने का पहाड़ है जहाँ पृथ्वी को धारण करने वाले शेष नाग बैठे दिखाई पड़ते हैं। उस पर्वत के ऊपर ताड़ के चिन्हों वाला सुवर्ण ध्वज फहराता रहता है। यही ताल ध्वज पूर्व दिशा की सीमा है। उसके बाद सुवर्णमय उदय पर्वत है जिसके शिखर का नाम सौमनस है।

सूर्य उत्तर से घूमकर जम्बू द्वीप की परिक्रमा करते हुए जब सैमनस पर स्थित होते हैं, तब इस क्षेत्र में स्पष्टता से उनके दर्शन होते हैं। सौमनस सूर्य के समान प्रकाशमान दृष्टिगत होते हैं। उस पर्वत के आगे का क्षेत्र अज्ञात है।५

जातरुप का अर्थ सोना होता है। ऐसा अनुमान किया जाता है कि जातरुप पर्वत का संबंध प्रशांत महासागर के पार मैक्सिको के स्वर्ण-उत्पादक पर्वतों से हो सकता है। मक्षिका का अर्थ सोना होता है। मैक्सिको शब्द मक्षिका से ही विकसित माना गया है। यह भी संभव है कि मैक्सिको की उत्पत्ति सोने के खान में काम करने वाली आदिम जाति मैक्सिका से हुई है।६

मैक्सिको में एशियाई संस्कृति के प्राचीन अवशेष मिलने से इस अवधारणा से पुष्टि होती है।

बालखिल्य ॠषियों का उल्लेख विष्णु-पुराण और रघुवंश में हुआ है जहाँ उनकी संख्या साठ हज़ार और आकृति अँगूठे से भी छोटी बतायी गयी है। कहा गया है कि वे सभी सूर्य के रथ के घोड़े हैं। इससे अनुमान किया जाता है कि यहाँ सूर्य की असंख्य किरणों का ही मानवीकरण हुआ है।७

उदय पर्वत का सौमनस नामक सुवर्णमय शिखर और प्रकाशपुंज के रुप में बालखिल्य ॠषियों के वर्णन से ऐसा प्रतीत होता है कि इस स्थल पर प्रशांत महासागर में सूर्योदय के भव्य दृश्य का ही भावमय एवं अतिरंजित चित्रण हुआ है।

वाल्मीकि रामायण में पूर्व दिशा में जाने वाले दूतों के दिशा निर्देशन की तरह दक्षिण, पश्चिम और उत्तर दिशा में जाने वाले दूतों को भी मार्ग का निर्देश दिया गया है।

इसी क्रम में उत्तर में ध्रुव प्रदेश, दक्षिण में लंका के दक्षिण के हिंद महासागरीय क्षेत्र और पश्चिम में अटलांटिक तक की भू-आकृतियों का काव्यमय चित्रण हुआ है जिससे समकालीन एशिया महादेश के भूगोल की जानकारी मिलती है।

इस संदर्भ में उत्तर-ध्रुव प्रदेश का एक मनोरंजक चित्र उल्लेखनीय है। बैखानस सरोवर के आगे न तो सूर्य तथा न चंद्रमा दिखाई पड़ते हैं और न नक्षत्र तथा मेघमाला ही। उस प्रदेश के बाद शैलोदा नामक नदी है जिसके तट पर वंशी की ध्वनि करने वाले कीचक नामक बाँस मिलते हैं। उन्हीं बाँसों का बेरा बनाकर लोग शैलोदा को पारकर उत्तर-कुरु जाते है जहाँ सिद्ध पुरुष निवास करते हैं।

उत्तर-कुरु के बाद समुद्र है जिसके मध्य भाग में सोमगिरि का सुवर्गमय शिखर दिखाई पड़ता है। वह क्षेत्र सूर्य से रहित है, फिर भी वह सोमगिरि के प्रभा से सदा प्रभावित होता रहता है।८

ऐसा मालूम पड़ता है कि यहाँ उत्तरीध्रुव प्रदेश का वर्णन हुआ है जहाँ छह महीनों तक सूर्य दिखाई नहीं पड़ता और छह महीनों तक क्षितिज के छोड़पर उसके दर्शन भी होते हैं, तो वह अल्पकाल के बाद ही आँखों से ओझल हो जाता है। ऐसी स्थिति में सूर्य की प्रभा से उद्भासित सोमगिरि के हिमशिखर निश्चय ही सुवर्णमय दीखते होंगे। अंतत: यह भी यथार्थ है कि सूर्य से रहित होने पर भी उत्तर-ध्रुव पूरी तरह अंधकारमय नहीं है।

सतु देशो विसूर्योऽपि तस्य मासा प्रकाशते। सूर्य लक्ष्याभिविज्ञेयस्तपतेव विवास्वता।९

राम कथा की विदेश-यात्रा के संदर्भ में वाल्मीकि रामायण का दिग्वर्णन इस अर्थ में प्रासंगिक है कि कालांतर में यह कथा उन स्थलों पर पहुँच ही नहीं गयी, बल्कि फलती-फूलती भी रही।

बर्मा, थाईलैंड, कंपूचिया, लाओस, वियतनाम, मलयेशिया, इंडोनेशिया, फिलिपींस, तिब्बत, चीन, जापान, मंगोलिया, तुर्किस्तान, श्रीलंका और नेपाल की प्राचीन भाषाओं में राम कथा पर आधारित बहुत सारी साहित्यिक कृतियाँ है।

अनेक देशों में यह कथा शिलाचित्रों की विशाल श्रृखलाओं में मौजूद हैं। इनके शिलालेखी प्रमाण भी मिलते है। अनेक देशों में प्राचीन काल से ही रामलीला का प्रचलन है। कुछ देशों में रामायण के घटना स्थलों का स्थानीकरण भी हुआ है।

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Damru – The Music Drum of Lord shiva holding during Dancing


Damru – The Music Drum of Lord shiva holding during Dancing

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Damru– In Hinduism, The damru is the Music Drum of Lord shiva holding during Dancing,  it is believed that beating of the Damaru by Shiva produced the very first sound (nada). This first sound was made in the void of nothingness. Shiva began his dance of creation to the rhythm of the Damaru. From his dance, the world came into being.

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Temples In India


Temples In India

Journal Edge

Lord Shiva – the powerful and fascinating deity of the Hindu Trinity, who represents death and dissolution.Indian temples by state have numerous gods and goddesses worshiped by peoples all over India.

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