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गंगा प्राचीन काल से ही भारतीय जनमानस में अत्यंत पूज्य रही है


"गंगा प्राचीन काल से ही भारतीय जनमानस में अत्यंत पूज्य रही है, इसका धार्मिक महत्त्व जितना है, विश्व में शयद ही किसी नदी का होगा.. यह विश्व कि एकमात्र नदी है, जिसे श्रद्धा से माता कहकर पुकारा जाता है 

महाभारत में कहा गया है.. 
"जैसे अग्नि ईधन को जला देती है, उसी प्रकार सैंकड़ो निषिद्ध कर्म करके भी यदि गंगा स्नान किया जाये , तो उसका जल उन सब पापों को भस्म कर देता है, सत्ययुग में सभी तीर्थ पुण्यदायक होते थे.. त्रेता में पुष्कर और द्वापर में कुरुक्षेत्र तथा कलियुग में गंगा कि सबसे अधिक महिमा बताई गई है. नाम लेने मात्र से गंगा पापी को पवित्र कर देती है. देखने से सौभाग्य तथा स्नान या जल ग्रेहण करने से सात पीढियों तक कुल पवित्र हो जाता है (महाभारत/वनपर्व 85 /89 -90 -93 "

गंगाजल पर किये शोध कार्यो से स्पष्ट है कि यह वर्षो तक रखने पर भी खराब नहीं होता.... स्वास्थवर्धक तत्वों का बाहुल्य होने के कारण गंगा का जल अमृत के तुल्य, सर्व रोगनाशक, पाचक, मीठा, उत्तम, ह्रदय के लिए हितकर, पथ्य, आयु बढ़ाने वाला तथा त्रिदोष नाशक है, इसका जल अधिक संतृप्त माना गया है, इसमें पर्याप्त लवण जैसे कैल्शियम, पोटेशियम, सोडियम आदि पाए जाते है और 45 प्रतिशत क्लोरिन होता है , जो जल में कीटाणुओं को पनपने से रोकता है. इसी कि उपस्थिति के कारण पानी सड़ता नहीं और ना ही इसमें कीटाणु पैदा होते है, इसकी अम्लीयता एवं क्षारीयता लगभग समान होती है, गंगाजल में अत्यधिक शक्तिशाली कीटाणु-निरोधक तत्व क्लोराइड पाया जाता है. डा. कोहिमान के मत में जब किसी व्याक्ति कि जीवनी शक्ति जवाब देने लगे , उस समय यदि उसे गंगाजल पिला दिया जाये, तो आश्चर्यजनक ढंग से उसकी जीवनी शक्ति बढती है और रोगी को ऐसा लगता है कि उसके भीतर किसी सात्विक आनंद का स्त्रोत फुट रहा है

शास्त्रों के अनुसार इसी वजह से अंतिम समय में मृत्यु के निकट आये व्यक्ति के मुंह में गंगा जल डाला जाता है .गंगा स्नान से पुण्य प्राप्ति के लिए श्रद्धा आवश्यक है. इस सम्बन्ध में एक कथा है.

एक बार पार्वती जी ने शंकर भगवान से पूछा -"गंगा में स्नान करने वाले प्राणी पापो से छुट जाते है?" इस पर भगवान शंकर बोले -"जो भावनापूर्वक स्नान करता है, उसी को सदगति मिलती है, अधिकाँश लोग तो मेला देखने जाते है" पार्वती जी को इस जवाब से संतोष नहीं मिला. शंकर जी ने फिर कहा - "चलो तुम्हे इसका प्रत्यक्ष दर्शन कराते है" गंगा के निकट शंकर जी कोढ़ी का रूप धारण कर रस्ते में बैठ गये और साथ में पार्वती जी सुंदर स्त्री का रूप धारण कर बैठ गई. मेले के कारण भीड़ थी.. जो भी पुरष कोढ़ी के साथ सुंदर स्त्री को देखता , वह सुंदर स्त्री की और ही आकर्षित होता.. कुछ ने तो उस स्त्री को अपने साथ चलने का भी प्रस्ताव दिया. अंत में एक ऐसा व्यक्ति भी आया, जिसने स्त्री के पातिव्रत्य धर्म की सराहना की और कोढ़ी को गंगा स्नान कराने में मदद दी. शंकर भगवान प्रकट हुए और बोले. 'प्रिय! यही श्रद्धालु सदगति का सच्चा अधिकारी है...."

अब बोलिए जय गंगा मैया .... हर हर महादेव .....

नम्र निवेदन है की "हिंदुत्व" के अखंड और अनंत समुद्र की इन कुछ बूंदों को शेयर द्वारा अपने अन्य मित्रों तक भी गर्व से शेयर करें ... _/|\_

जय हिंदुत्व ...

जय हिन्द ... वन्देमातरम ..."

गंगा प्राचीन काल से ही भारतीय जनमानस में अत्यंत पूज्य रही है, इसका धार्मिक महत्त्व जितना है, विश्व में शयद ही किसी नदी का होगा.. यह विश्व कि एकमात्र नदी है, जिसे श्रद्धा से माता कहकर पुकारा जाता है

महाभारत में कहा गया है..
“जैसे अग्नि ईधन को जला देती है, उसी प्रकार सैंकड़ो निषिद्ध कर्म करके भी यदि गंगा स्नान किया जाये , तो उसका जल उन सब पापों को भस्म कर देता है, सत्ययुग में सभी तीर्थ पुण्यदायक होते थे.. त्रेता में पुष्कर और द्वापर में कुरुक्षेत्र तथा कलियुग में गंगा कि सबसे अधिक महिमा बताई गई है. नाम लेने मात्र से गंगा पापी को पवित्र कर देती है. देखने से सौभाग्य तथा स्नान या जल ग्रेहण करने से सात पीढियों तक कुल पवित्र हो जाता है (महाभारत/वनपर्व 85 /89 -90 -93 ”

गंगाजल पर किये शोध कार्यो से स्पष्ट है कि यह वर्षो तक रखने पर भी खराब नहीं होता…. स्वास्थवर्धक तत्वों का बाहुल्य होने के कारण गंगा का जल अमृत के तुल्य, सर्व रोगनाशक, पाचक, मीठा, उत्तम, ह्रदय के लिए हितकर, पथ्य, आयु बढ़ाने वाला तथा त्रिदोष नाशक है, इसका जल अधिक संतृप्त माना गया है, इसमें पर्याप्त लवण जैसे कैल्शियम, पोटेशियम, सोडियम आदि पाए जाते है और 45 प्रतिशत क्लोरिन होता है , जो जल में कीटाणुओं को पनपने से रोकता है. इसी कि उपस्थिति के कारण पानी सड़ता नहीं और ना ही इसमें कीटाणु पैदा होते है, इसकी अम्लीयता एवं क्षारीयता लगभग समान होती है, गंगाजल में अत्यधिक शक्तिशाली कीटाणु-निरोधक तत्व क्लोराइड पाया जाता है. डा. कोहिमान के मत में जब किसी व्याक्ति कि जीवनी शक्ति जवाब देने लगे , उस समय यदि उसे गंगाजल पिला दिया जाये, तो आश्चर्यजनक ढंग से उसकी जीवनी शक्ति बढती है और रोगी को ऐसा लगता है कि उसके भीतर किसी सात्विक आनंद का स्त्रोत फुट रहा है

शास्त्रों के अनुसार इसी वजह से अंतिम समय में मृत्यु के निकट आये व्यक्ति के मुंह में गंगा जल डाला जाता है .गंगा स्नान से पुण्य प्राप्ति के लिए श्रद्धा आवश्यक है. इस सम्बन्ध में एक कथा है.

एक बार पार्वती जी ने शंकर भगवान से पूछा -“गंगा में स्नान करने वाले प्राणी पापो से छुट जाते है?” इस पर भगवान शंकर बोले -“जो भावनापूर्वक स्नान करता है, उसी को सदगति मिलती है, अधिकाँश लोग तो मेला देखने जाते है” पार्वती जी को इस जवाब से संतोष नहीं मिला. शंकर जी ने फिर कहा – “चलो तुम्हे इसका प्रत्यक्ष दर्शन कराते है” गंगा के निकट शंकर जी कोढ़ी का रूप धारण कर रस्ते में बैठ गये और साथ में पार्वती जी सुंदर स्त्री का रूप धारण कर बैठ गई. मेले के कारण भीड़ थी.. जो भी पुरष कोढ़ी के साथ सुंदर स्त्री को देखता , वह सुंदर स्त्री की और ही आकर्षित होता.. कुछ ने तो उस स्त्री को अपने साथ चलने का भी प्रस्ताव दिया. अंत में एक ऐसा व्यक्ति भी आया, जिसने स्त्री के पातिव्रत्य धर्म की सराहना की और कोढ़ी को गंगा स्नान कराने में मदद दी. शंकर भगवान प्रकट हुए और बोले. ‘प्रिय! यही श्रद्धालु सदगति का सच्चा अधिकारी है….”

अब बोलिए जय गंगा मैया …. हर हर महादेव …..

नम्र निवेदन है की “हिंदुत्व” के अखंड और अनंत समुद्र की इन कुछ बूंदों को शेयर द्वारा अपने अन्य मित्रों तक भी गर्व से शेयर करें … _/|\_

जय हिंदुत्व …

जय हिन्द … वन्देमातरम …

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!! धातु विज्ञान का चमत्कार !!


Dashrath Varotariya's photo.
Dashrath Varotariya's photo.

!! धातु विज्ञान का चमत्कार !!

धातु विज्ञान का भारत में प्राचीन काल से व्यावहारिक जीवन में उपयोग होता रहा है। यजुर्वेद के एक मंत्र में निम्न उल्लेख आया है-

अश्मा च मे मृत्तिका च मे गिरयश्च में पर्वताश्च में सिकताश्च में वनस्पतयश्च मे हिरण्यं च मेऽयश्च में श्यामं च मे लोहं च मे सीस च में त्रपु च मे यज्ञेन कल्पन्ताम्‌ (कृ.यजु. ४-७-५)

मेरे पत्थर, मिट्टी, पर्वत, गिरि, बालू, वनस्पति, सुवर्ण, लोहा लाल लोहा, ताम्र, सीसा और टीन यज्ञ से बढ़ें।

रामायण, महाभारत, पुराणों, श्रुति ग्रंथों में भी सोना (सुवर्ण, हिरण्य), लोहा (स्याम), टिन (त्रपु), चांदी (रजत), सीसा, तांबा, (ताम्र), कांसा आदि का उल्लेख आता है।

धातु विज्ञान से सम्बंधित व्यवसाय करने वाले कुछ लोगों के नाम-
कर्मरा- कच्ची धातु गलाने वाले
धमत्र – भट्टी में अग्नि तीव्र करने वाले
हिरण्यक – स्वर्ण गलाने वाले
खनक – खुदाई कर धातु निकालने वाले।

चरक, सुश्रुत, नागार्जुन ने स्वर्ण, रजत, ताम्र, लौह, अभ्रक, पारा आदि से औषधियां बनाने की विधि का विस्तार से अपने ग्रंथों में वर्णन किया है। केवल प्राचीन ग्रंथों में ही विकसित धातु विज्ञान का उल्लेख नहीं मिलता, अपितु उसके अनेक प्रमाण आज भी उपलब्ध होते हैं।

कुछ उदाहरण-

(१) जस्ता –

धातु विज्ञान के क्षेत्र में जस्ते की खोज एक आश्चर्य है। आसवन प्रक्रिया के द्वारा कच्चे जस्ते से शुद्ध जस्ता निकालने की प्रक्रिया निश्चय ही भारतीयों के लिए गर्व का विषय है।

राजस्थान के ‘जवर‘ क्षेत्र में खुदाई के दौरान ईसा पूर्व चौथी शताब्दी में इसके निर्माण की प्रक्रिया के अवशेष मिले हैं। मात्र दस फीसदी जस्ते से पीतल सोने की तरह चमकने लगता है। जवर क्षेत्र की खुदाई में जो पीतल की वस्तुएं प्राप्त हुई हैं उनका रासायनिक विश्लेषण करने पर पाया गया कि इनमें जस्ते की मात्रा ३४ प्रतिशत से अधिक है, जबकि आज की ज्ञात विधियों के अनुसार सामान्य स्थिति में पीतल में २८ प्रतिशत से अधिक जस्ते का सम्मिश्रण नहीं हो पाता है।
जस्ते को पिघलाना भी एक जटिल प्रक्रिया है, क्योंकि सामान्य दबाव में यह ९१३०से. तापक्रम पर उबलने लगता है। जस्ते के आक्साइड या कच्चे जस्ते से शुद्ध जस्ता प्राप्त करने के लिए उसे १२०००से. तापक्रम आवश्यक है, लेकिन इतने तापक्रम पर जस्ता भाप बन जाता है। अत: उस समय पहले जस्ते का आक्साइट बनाने के लिए कच्चे जस्ते को भूंजते थे, फिर भुंजे जस्ते को कोयला व अपेक्षित प्रमाण में नमक मिलाकर मिट्टी के मटकों में तपाया जाता था तथा ताप १२०००से पर बनाए रखा जाता था। इस पर वह भाप बन जाता था, परन्तु भारतीयों ने उस समय विपरीत आसवनी नामक प्रक्रिया विकसित की थी। इसके प्रमाण जवर की खुदाई में मिले हैं। इसमें कार्बन मोनोआक्साइड के वातावरण में जस्ते के आक्साइड भरे पात्रों को उल्टे रखकर गर्म किया जाता था। जैसे ही जस्ता भाप बनता, ठीक नीचे रखे ठंडे स्थान पर पहुंच कर धातु रूप में आ जाता था और इस प्रकार शुद्ध जस्ते की प्राप्ति हो जाती थी।

जस्ते को प्राप्त करने की यह विद्या भारत में ईसा के जन्म से पूर्व से प्रचलित रही। यूरोप के लोग १७३५ तक यह मानते थे कि जस्ता एक तत्व के रूप में अलग से प्राप्त नहीं किया जा सकता। यूरोप में सर्वप्रथम विलियम चैम्पियन ने जस्ता प्राप्त करने की विधि व्रिस्टल विधि के नाम से पेटेंट करवाई और यह नकल उसने भारत से की, क्योंकि तेरहवीं सदी के ग्रंथ रसरत्नसमुच्चय में जस्ता बनाने की जो विधि दी है, व्रिस्टल विधि उसी प्रकार की है।

(२) लोहा –

इतिहास में भारतीय इस्पात की श्रेष्ठता के अनेक उल्लेख मिलते हैं। अरब और फारस में लोग भारतीय इस्पात की तलवार के लिए लालायित रहते थे। अंग्रेजों ने सर्वाधिक कार्बन युक्त इस्पात को बुट्ज नाम दिया।

प्रसिद्ध धातु वैज्ञानिक तथा बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के प्रो. अनंतरमन ने इस्पात बनाने की सम्पूर्ण विधि बताई है।

कच्चे लोहे, लकड़ी तथा कार्बन को मिट्टी की प्यालियों में १५३५०से. ताप पर गर्म कर धीरे-धीरे २४ घण्टे में ठण्डा करने पर उच्च कार्बन युक्त इस्पात प्राप्त होता है। इस इस्पात से बनी तलवार इतनी तेज तथा मजबूत होती है कि रेशम को भी सफाई से काट देती है।
१८वीं सदी में यूरोपीय धातु विज्ञानियों ने भारतीय इस्पात बनाने का प्रयत्न किया, परन्तु असफल रहे। माइकेल फैराडे ने भी प्रयत्न किया, पर असफल रहा। कुछ ने बनाया तो उसमें वह गुणवत्ता नहीं थी।

श्री धर्मपाल जी ने अपनी पुस्तक में यूरोपीय लोगों ने जो प्रगत लौह उद्योग के प्रमाण दिए हैं, उनका उल्लेख किया है।

सितम्बर, १७१५ को डा. बेंजामिन हायन ने जो रपट ईस्ट इण्डिया कम्पनी को भेजी, उसमें वह उल्लेख करता है कि रामनाथ पेठ (तत्कालीन मद्रास प्रान्त में बसा) एक सुन्दर गांव है। यहां आस-पास खदानें हैं तथा ४० इस्पात की भट्टियां हैं। इन भट्टियों में इस्पात निर्माण के बाद उसकी कीमत २ रु. मन पड़ती है। अत: कम्पनी को इस दिशा में सोचना चाहिए।

दूसरी रपट मेजर जेम्स फ्र्ैंकलिन की है जिसमें वह सेंट्रल इंडिया में इस्पात निर्माण के बारे में लिखता है। इसमें वह जबलपुर, पन्ना, सागर आदि स्थानों की लौह खदानों का वर्णन करता है तथा इस्पात बनाने की प्रक्रिया के बारे में वह कहता है चारकोल सारे हिन्दुस्तान में लोहा बनाने के काम में प्रयुक्त होता है। जिस भट्टी का उल्लेख करता है, उसका निर्माण किया गया है। उसमें सभी भाग बराबर औसत १९-२० क्द्वडत्द्य (क्द्वडत्द्य-लम्बाई मापने की प्राचीन इकाई, लगभग १८ इंच इसका माप था) के थे। और १६ छोटी क्द्वडत्द्य के थे।
वह इस फर्नेस को बनाने की विधि का वर्णन करता है। फर्नेस बनाने पर उसके आकार को वह नापता है तो पूरी भट्टी में वह पाता है कि एक ही प्रकार की नाप है। लम्बाई सवा ४ भाग तो चौड़ाई ३ भाग होगी और मोटाई डेढ़ भाग। आगे वह लिखता है (१) गुडारिया (२) पचर (३) गरेरी तथा (४) अकरिया-ये उपांग इसमें लगाए जाते हैं। बाद में जब भट्टी पूरी तरह सूख जाती है तो उसे काम में लाया जाता है। भट्टी के बाद धोंकनी उसका मुंह बनाने की विधि, उसके बाद भट्टी से जो कच्चा लोहा निकलेगा उसे शुद्ध करने की रिफायनरी का वर्णन करता है। फिर उससे इस्पात बनाने की प्रक्रिया तथा मात्रा का निरीक्षण उसने ३० अप्रैल, १८२७ से लेकर ६ जून, १८२७ तक किया। इस बीच ४ फरनेस से २२३५ मन इस्पात बना और इसकी विशेषता गुणवत्ता तथा विभिन्न तापमान एवं परिस्थिति में श्रेष्ठता की वह मुक्तकंठ से प्रशंसा करता है। उस समय एक मन की कीमत पौने बारह आना थी। सवा ३१ मन उ १ इंग्लिश टन। मेजर जेम्स फ्र्ैंकलिन सागरमिंट के कप्तान प्रेसग्रेव का हवाला देते हुए कहता है कि भारत का सरिया (लोहा) श्रेष्ठ स्तर का है। उस स्वीडन के लोहे को भी वह मात देता है जो यूरोप में उस समय सर्वश्रेष्ठ माना जाता था।

तीसरी रपट कैप्टन डे. कैम्पबेल की है जो १८४२ की है। इसमें दक्षिण भारत में लोहे के निर्माण का वर्णन है। ये सब रपट कहती हैं कि उस समय देश में हजारों छोटी-छोटी इस्पात निर्माण की भट्टियां थीं। एक भट्टी में ९ लोगों को रोजगार मिलता था तथा उत्कृष्ट प्रकार का सस्ता लोहा बनता था। वैसा दुनिया में अन्य किसी देश में संभव नहीं था।
कैम्पबेल ने रेलगाड़ी में लगाने के लिए बार आयरन की खोज करते समय बार-बार कहा, यहां का (भारत का) बार आरयन उत्कृष्ट है, सस्ता है। इंग्लैण्ड का बढ़िया लोहा भी भारत के घटिया लोहे का मुकाबला नहीं कर सकता। उस समय ९० हजार लोग इन भट्टियों में काम करते थे।

अंग्रेजों ने १८७४ में बंगाल आयरन कंपनी की स्थापना कर बड़े पैमाने पर उत्पादन चालू किया। परिणामस्वरूप धीरे-धीरे गांव-गांव में बनने वाले इस्पात की खपत कम होती गई और उन्नीसवीं सदी के अन्त तक स्वदेशी इस्पात बनना लगभग बंद हो गया। अंग्रेजों ने बड़े कारखाने लगाकर स्वदेशी प्रौद्योगिकी की कमर तोड़ दी। इसका दु:खद पक्ष यह है कि भारतीय धातु प्रौद्योगिकी लगभग लुप्त हो गई। आज झारखंड के कुछ वनवासी परिवारों में इस तकनीक के नमूने मात्र रह गए हैं।

दिल्ली स्थित लौह स्तंभ एक चमत्कार

नई दिल्ली में कुतुबमीनार के पास लौह स्तंभ विश्व के धातु विज्ञानियों के लिए आकर्षण का केन्द्र रहा है। लगभग १६०० से अधिक वर्षों से यह खुले आसमान के नीचे सदियों से सभी मौसमों में अविचल खड़ा है। इतने वर्षों में आज तक उसमें जंग नहीं लगी, यह बात दुनिया के लिए आश्चर्य का विषय है।

जहां तक इस स्तंभ के इतिहास का प्रश्न है, यह चौथी सदी में बना था। इस स्तम्भ पर संस्कृत में जो खुदा हुआ है, उसके अनुसार इसे ध्वज स्तंभ के रूप में खड़ा किया गया था। चन्द्रराज द्वारा मथुरा में विष्णु पहाड़ी पर निर्मित भगवान विष्णु के मंदिर के सामने इसे ध्वज स्तंभ के रूप में खड़ा किया गया था। इस पर गरुड़ स्थापित करने हेतु इसे बनाया गया होगा, अत: इसे गरुड़ स्तंभ भी कहते हैं।

१०५० में यह स्तंभ दिल्ली के संस्थापक अनंगपाल द्वारा लाया गया। इस स्तंभ की ऊंचाई ७३५.५ से.मी. है। इसमें से ५० सेमी. नीचे है। ४५ से.मी. चारों ओर पत्थर का प्लेटफार्म है। इस स्तंभ का घेरा ४१.६ से.मी. नीचे है तथा ३०.४ से.मी. ऊपर है। इसके ऊपर गरुड़ की मूर्ति पहले कभी होगी। स्तंभ का कुल वजन ६०९६ कि.ग्रा. है।

१९६१ में इसके रासायनिक परीक्षण से पता लगा कि यह स्तंभ आश्चर्यजनक रूप से शुद्ध इस्पात का बना है तथा आज के इस्पात की तुलना में इसमें कार्बन की मात्रा काफी कम है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के मुख्य रसायन शास्त्री डा. बी.बी. लाल इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि इस स्तंभ का निर्माण गर्म लोहे के २०-३० किलो को टुकड़ों को जोड़ने से हुआ है। माना जाता है कि १२० कारीगरों ने पन्द्रह दिनों के परिश्रम के बाद इस स्तम्भ का निर्माण किया।

आज से सोलह सौ वर्ष पूर्व गर्म लोहे के टुकड़ों को जोड़ने की उक्त तकनीक भी आश्चर्य का विषय है, क्योंकि पूरे लौह स्तम्भ में एक भी जोड़ कहीं भी दिखाई नहीं देता। सोलह शताब्दियों से खुले में रहने के बाद भी उसके वैसे के वैसे बने रहने (जंग न लगने) की स्थिति ने विशेषज्ञों को चकित किया है। इसमें फास्फोरस की अधिक मात्रा व सल्फर तथा मैंगनीज कम मात्रा में है। स्लग की अधिक मात्रा अकेले तथा सामूहिक रूप से जंग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ा देते हैं। इसके अतिरिक्त ५० से ६०० माइक्रोन मोटी (एक माइक्रोन याने १ मि.मी. का एक हजारवां हिस्सा) आक्साइड की परत भी स्तंभ को जंग से बचाती है।

(३) पारा –

यूरोप में १७वीं सदी तक पारा क्या है, यह वे जानते नहीं थे। अत: फ्र्ांस सरकार के दस्तावेजों में इसे दूसरी तरह की चांदी ‘क्विक सिल्वर‘ कहा गया, क्योंकि यह चमकदार तथा इधर-उधर घूमने वाला होता है।
वहां की सरकार ने यह कानून भी बनाया था कि भारत से आने वाली जिन औषधियों में पारे का उपयोग होता है उनका उपयोग विशेषज्ञ चिकित्सक ही करें।

भारतवर्ष में लोग हजारों वर्षों से पारे को जानते ही नहीं थे अपितु इसका उपयोग औषधि विज्ञान में बड़े पैमाने पर होता था।

विदेशी लेखकों में सर्वप्रथम अलबरूनी ने, जो ११वीं सदी में भारत में लम्बे समय तक रहा, अपने ग्रंथ में पारे को बनाने और उपयोग की विधि को विस्तार से लिखकर दुनिया को परिचित कराया।
पारे को शुद्ध कर उसे उपयोगी बनाने की विधि की आगे रसायनशास्त्र सम्बंधी विचार करते समय चर्चा करेंगे। परन्तु कहा जाता है कि सन्‌ १०० में हुए नागार्जुन पारे से सोना बनाना जानते थे। आश्चर्य की बात यह है कि स्वर्ण में परिवर्तन हेतु पारे को ही चुना, अन्य कोई धातु नहीं चुनी।

आज का विज्ञान कहता है कि धातुओं का निर्माण उनके परमाणु में स्थित प्रोटॉन की संख्या के आधार पर होता है और यह आश्चर्य की बात कि पारे में ८० प्रोटॉन-इलेक्ट्रान तथा सोने में ७९ प्रोटॉन-इलेक्ट्रान होते हैं।

(४) सोना-चांदी

ए.डेल्मर अपनी पुस्तक में उल्लेख करता है कि सिन्धु नदी के स्थल पर दो त्द्मथ्ठ्ठदड्ड है जहां स्वर्ण और रजत के कण वहां की सारी मिट्टी में प्राप्त होते हैं।

ऋग्वेद के छठे मंडल के ६१वें सूक्त का सातवां मंत्र सरस्वती और सिन्धु को हिरण्यवर्तनी कहता है।

रामायण, महाभारत, श्रीमद्‌ भागवद्‌, रघुवंश, कुमारसंभव आदि ग्रंथों में सोने व चांदी का उल्लेख मिलता है।

स्वर्ण की भस्म बनाकर उसके औषधीय उपयोग की परम्परा शताब्दियों से भारत में प्रचलित रही है। इसी प्रकार सोने, तांबे तथा शीशे के उपयोग के संदर्भ-अथर्ववेद, रसतरंगिणी, रसायनसार, शुक्रनीति, आश्वालायन गृह्यसूत्र, मनु स्मृति में मिलते हैं।

रसरत्न समुच्चय ग्रंथ में अनेक धातुओं को भस्म में बदलने की विधि तथा उनका रोगों के निदान में उपयोग विस्तार के साथ लिखा गया है। इससे ज्ञान होता है कि धातु विज्ञान भारत में प्राचीन काल से विकसित रहा और इसका मानव कल्याण के लिए उपयोग करने के लिए विचित्र विधियां भारत में विकसित की गएं।

केरल का धातु दर्पण डा. मुरली मनोहर जोशी केरल में पत्तनम तिट्टा जिले में आरनमुड़ा नामक स्थान पर गए तो वहां उन्होंने पाया कि वहां के परिवारों में हाथ से धातु के दर्पण बनाने की तकनीक है। इन हाथ के बने धातु दर्पणों को जब उन्होंने विज्ञान समिति के अपने मित्रों को दिखाया तो उन्हें विश्वास ही नहीं हुआ कि ये दर्पण मशीन से नहीं अपितु हाथ से बने हैं और सदियों से ये दर्पण भारत से निर्यात होते रहे हैं।

Posted in PM Narendra Modi

अजब-गजब कानून


"अजब-गजब कानून :
200 साल पुराना यह कानून आज भी लागू है, जिसमें कहा गया है कि ब्रिटेन के राजा को भारत की सभी अदालतों के फैसलों की समीक्षा करने का अधिकार है।"

अजब-गजब कानून :
200 साल पुराना यह कानून आज भी लागू है, जिसमें कहा गया है कि ब्रिटेन के राजा को भारत की सभी अदालतों के फैसलों की समीक्षा करने का अधिकार है।

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TADIPATRI SRI BUGGA RAMA LINGESGHWARA TEMPLE


JEWELS OF BHARATAM SERIES [TM]

TADIPATRI SRI BUGGA RAMA LINGESGHWARA TEMPLE

Tataki, a demon lady who tried to kill Sreeram on his way to save the yaga of Viswamitra but was killed by Sreeram at this very place and hence the name.

Sri Bugga Rama Lingeswara Swamy temple: It is located on the northern end of the town, where the River Penna lies. Water oozes all the time from the pedestal of the Siva Lingam here and people treat this as holy water. Unlike other temples, this temple has main entrances on the south and west. In this temple there is a secret tunnel to Tirupathi, but the entrance of the tunnel is now sealed. At the river side of the temple there is a statue of goddess standing by steps. It is believed that when the water level of the river Penna reaches the navel point of that statue, the entire town Tadpatri will be sinking in the water and that leads to its end.

"JEWELS OF BHARATAM SERIES [TM]

TADIPATRI SRI BUGGA RAMA LINGESGHWARA TEMPLE 

Tataki, a demon lady who tried to kill Sreeram on his way to save the yaga of Viswamitra but was killed by Sreeram at this very place and hence the name.

Sri Bugga Rama Lingeswara Swamy temple: It is located on the northern end of the town, where the River Penna lies. Water oozes all the time from the pedestal of the Siva Lingam here and people treat this as holy water. Unlike other temples, this temple has main entrances on the south and west. In this temple there is a secret tunnel to Tirupathi, but the entrance of the tunnel is now sealed. At the river side of the temple there is a statue of goddess standing by steps. It is believed that when the water level of the river Penna reaches the navel point of that statue, the entire town Tadpatri will be sinking in the water and that leads to its end."
Posted in Love Jihad

लव जेहाद


"हिन्दू लडकियां मुस्लिम युवाओं के बदले हुए नाम के बहकावे में ना आयें, किसी लड़के से मिलने ऐ पहले उसके बारे में पूरी जांच पड़ताल कर लें अन्यथा आप लव जेहाद का शिकार हो सकती हैं।।
#जागोरे"

हिन्दू लडकियां मुस्लिम युवाओं के बदले हुए नाम के बहकावे में ना आयें, किसी लड़के से मिलने ऐ पहले उसके बारे में पूरी जांच पड़ताल कर लें अन्यथा आप लव जेहाद का शिकार हो सकती हैं।।
‪#‎जागोरे‬

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A. TIPU SULTAN DESTROYED SOUTH INDIAN TEMPLES AND CONVERTED MANY TO ISLAM ON SWORD!!!


DESCERATED JEWELS OF BHARATAM ….SERIES[TM]

Q.WAS TIPU SULTAN BENEFACTOR OF SOUTH INDIA AS SHOWN BY MEDIA ?

A. TIPU SULTAN DESTROYED SOUTH INDIAN TEMPLES AND CONVERTED MANY TO ISLAM ON SWORD!!!

North-west view of Narayanaperumal Temple, Talakolatur, Calicut taluk, Malabar district.

Archaeological Survey of India
Date: 1900

Photograph of the north-west view of Narayanaperumal Temple at Talakolatur, Calicut taluk, Malabar district, taken by a photographer of the Archaeological Survey of India around 1900-01.

In the second volume of his work ‘Malabar’ of 1887, William Logan wrote, “In Talakulattur amsam, 8 miles north of Calicut, there is an old temple with an illegible inscription on a stone.”

"DESCERATED JEWELS OF BHARATAM ....SERIES[TM]

Q.WAS TIPU SULTAN BENEFACTOR OF SOUTH INDIA AS SHOWN BY MEDIA ?

A. TIPU SULTAN DESTROYED SOUTH INDIAN TEMPLES AND  CONVERTED MANY TO ISLAM ON SWORD!!!

North-west view of Narayanaperumal Temple, Talakolatur, Calicut taluk, Malabar district.

Archaeological Survey of India
Date: 1900

Photograph of the north-west view of Narayanaperumal Temple at Talakolatur, Calicut taluk, Malabar district, taken by a photographer of the Archaeological Survey of India around 1900-01.

In the second volume of his work 'Malabar' of 1887, William Logan wrote, "In Talakulattur amsam, 8 miles north of Calicut, there is an old temple with an illegible inscription on a stone.""
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NAVA BHRAMHA TEMPLE GROUP …Destroyed by islamic invaders!!!


DESCECRATED JEWELS OF BHARATAM ……… SERIES [TM]

NAVA BHRAMHA TEMPLE GROUP …Destroyed by islamic invaders!!!

Alampur Navabrahma Temples are located at Alampur in Telangana.There are a total of nine temples in Alampur. All of them are dedicated to Shiva. These temples date back to the 7th century A.D and were built by the Badami Chalukyas rulers who were great patrons of art and architecture. Even after a time span of several hundred years, these grand temples still stand firm reflecting the rich architectural heritage of the country.

Brahmesvara and Papanatha are the 2 groups of temples on either side of Alampur. In 7th century AD Badami Chalukyas built these temples. The temples are not exactly in the Dravidian style but in Nagara style of architecture. The shikharas of all these temples have a curvilinear form and are adorned with the miniature architectural devices. The plans and decoration similar to that of the rock cut temples (found in Karnataka and Maharastra).

The Navabrahma temples are present on the left bank of the Tungabhadra River, enclosed in a courtyard. Taraka Brahma At Taraka Brahma temple, the 6th-7th century CE inscriptions present here.

Swarga Brahma

Swarga Brahma temple was built during 681-696 AD by Lokaditya Ela Arasa in honour of the queen of Vinayaditya, it is mentioned in an inscription found above the Dwarapalaka image. It is the finest example of Badami Chalukya Architecture and sculpture. This temple is the most elaborately ornamented temple. Temple with an imposing tower (Rekhanagara vimana) is the finest compared to other temples at Alampur.

Padma Brahma ~ Padma Brahma temple having polished stone sculpture of Shivalinga .

Bala Brahma ~ AS per the inscriptions, Bala Brahma temple dates back to 702 CE. It is the main shrine of worship, Shivaratri is celebrated.

Vishwa Brahma ~ Vishwa Brahma temple having sculptural scenes from the epics. It is one of the most artistic temple.

Garuda Brahma
Kumara Brahma
Arka Brahma
Vira Brahma

There are other temples like Suryanarayana temple dating back to 9th century. And Narasimha temple with inscriptions belongs to Sri Krishna Devaraya (Vijayanagar Empire). You are sure to be impressed by the Suryanarayana and the Narasimha temples that are also found in the same complex. The exquisite sculptures in the temple are very admirable.

"DESCECRATED JEWELS OF BHARATAM ......... SERIES [TM]

NAVA BHRAMHA TEMPLE GROUP ...Destroyed by islamic invaders!!!

Alampur Navabrahma Temples are located at Alampur in Telangana.There are a total of nine temples in Alampur. All of them are dedicated to Shiva. These temples date back to the 7th century A.D and were built by the Badami Chalukyas rulers who were great patrons of art and architecture. Even after a time span of several hundred years, these grand temples still stand firm reflecting the rich architectural heritage of the country.

Brahmesvara and Papanatha are the 2 groups of temples on either side of Alampur. In 7th century AD Badami Chalukyas built these temples. The temples are not exactly in the Dravidian style but in Nagara style of architecture. The shikharas of all these temples have a curvilinear form and are adorned with the miniature architectural devices. The plans and decoration similar to that of the rock cut temples (found in Karnataka and Maharastra).

The Navabrahma temples are present on the left bank of the Tungabhadra River, enclosed in a courtyard. Taraka Brahma At Taraka Brahma temple, the 6th-7th century CE inscriptions present here.

Swarga Brahma

Swarga Brahma temple was built during 681-696 AD by Lokaditya Ela Arasa in honour of the queen of Vinayaditya, it is mentioned in an inscription found above the Dwarapalaka image. It is the finest example of Badami Chalukya Architecture and sculpture. This temple is the most elaborately ornamented temple. Temple with an imposing tower (Rekhanagara vimana) is the finest compared to other temples at Alampur.

Padma Brahma ~  Padma Brahma temple having polished stone sculpture of Shivalinga .

Bala Brahma ~ AS per the inscriptions, Bala Brahma temple dates back to 702 CE. It is the main shrine of worship, Shivaratri is celebrated.

Vishwa Brahma ~ Vishwa Brahma temple having sculptural scenes from the epics. It is one of the most artistic temple.

    Garuda Brahma
    Kumara Brahma
    Arka Brahma
    Vira Brahma

There are other temples like Suryanarayana temple dating back to 9th century. And Narasimha temple with inscriptions belongs to Sri Krishna Devaraya (Vijayanagar Empire). You are sure to be impressed by the Suryanarayana and the Narasimha temples that are also found in the same complex. The exquisite sculptures in the temple are very admirable."