Posted in Rajiv Dixit

सौन्दर्य प्रतियोगिताओं का असर


सौन्दर्य प्रतियोगिताओं का असर ---
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मित्रो दस साल पहले भारत से कई विश्व सुंदरियां बनी इसके पीछे विदेशी कंपनियों की सोची समझी साजिश थी .

- कई प्रसाधन बनाने वाली कम्पनियां भारत में अपना मार्केट खोज रही थी . पर यहाँ अधिकतर महिलाएं ज़्यादा प्रसाधन का इस्तेमाल नहीं करती थी . इसलिए उन्होंने भारत से सुंदरियों को जीता कर लड़कियों के मन में ग्लेमर की चाह उत्पन्न की.
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 मिसेज़ इंडिया जैसी प्रतियोगिताओं से बड़ी उम्र की महिलाओं को भी टारगेट किया गया .
- इन सौन्दर्य प्रतियोगिताओं के बाद लडकियां सपने देखने लगी की वे भी मिस इंडिया , फिर मिस वर्ल्ड, फिर हीरोइन, फिर बहुत धनी बन सकती है .

- इसके लिए वे अपने आपको स्लिम करने के चक्कर में फिटनेस सेंटर में जाने लगी जहां क्रेश डाइटिंग , लाइपोसक्शन , गोलियां , प्लास्टिक सर्जरी जैसे महंगे और अनैसर्गिक तरीकेबताये जाते .

- सौन्दर्य प्रसाधन इस्तेमाल करना आम हो गया 

.- ब्यूटी पार्लर जाना आम हो गया .

- इस तरह हर महिला सौन्दर्य प्रसाधनों , ब्यूटी पार्लर , फिटनेस सेंटर आदि पर हर महीने हज़ारो रुपये खर्च करने लगी .

- पर सबसे ज़्यादा बुरा असर उन महिलाओं पर पड़ा जोइन मोड़ेल्स की तरह दिखने के लिए अपनी भूख को मार कुपोषण का शिकार हो गई .

- इसलिए आज देश में दो तरह के कुपोषण है 

- एक गरीबों का जो मुश्किल से एक वक्त की रोटी जुटा पाते है और दुसरा संपन्न वर्ग का जो जंक फ़ूड खाकर और डाइटिंग कर कुपोषण का शिकार हो रहाहै . 

- यहाँ तक की नई नई माँ बनी हुई बहनों को भी वजन कम करने की चिंता सताने लगती है . जब की यह वो समय है जब वजन की चिंता न कर पोषक खाना खाने पर , आराम पर ध्यान देना कर माँ का हक है . ये समय ज़िन्दगी में एक या दो बार आता है और इस समय स्वास्थ्य की देख भाल आगे की पूरी ज़िन्दगी को प्रभावित करती है . यह समय मातृत्व का आनंद लेने का है ना की कोई नुमाइश की चीज़ बनाने का . 

- ताज़ा उदाहरण है ऐश्वर्या राय . वह माँ बनाने की गरिमा और आनंद कोजी ही नहीं पाई . मीडिया ने उनके बढ़ते वजन पर ऐसे ताने कसे की वो अपने बच्ची की देखभाल और नए मातृत्व का आनंद लेना छोड़ वजन कम करने में जुट गई होंगी .

- अब जब इन कंपनियों का मार्केट भारत में स्थापित हो चुका है तो कोई विश्व सुंदरी भारत से नहीं बनेगी . अब इनकी दुसरे देशों पर नज़र है .! या कभी इनको लगे की मंदी आने लगी है तो दुबारा किसी को भारत मे से चुन ले !! क्यूंकि चीन के बाद भारत 121 करोड़ की आबादी वाला दुनिया का सबसे बढ़ा market है !!

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तो मित्रो ये सब कार्य बहुत ही गहरी साजिश बना कर अंजाम दिया जाता है ! जिसमे हमारा मीडिया विदेशी कंपनियो के साथ मिलकर बहुत  रोल अदा करता है ! 

मित्रो एक तरफ मीडिया देश मे बढ़ रहे बलात्कार पर छाती पीटता है ! और दूसरी तरफ खुद भी अश्लीलता को बढ़ावा देता है ! वो चाहे india today की मैगजीन के कवर हो ! या ये विदेशी  times of india अखबार ! ये times of india आप उठा लीजिये ! रोज times of india मे आपको पहले पेज पर या दूसरे पेज पर किसी ना किसी लड़की की आधे नंगी या लगभग पूरी नंगी तस्वीर मिलेगी ! जब की उसका खबर से कोई लेना देना नहीं ! जानबूझ कर आधी नंगी लड़कियों की तस्वीर छापना ही इनकी पत्रकारिता रह गया है !!

और ये ही times of india है जो भारत की संस्कृति का नाश करने पर तुला है !!
इसी ने आज से 10 -15 वर्ष पूर्व miss india, miss femina आदि शुरू किए ! जो अब मिस वर्ड ,मिस यूनिवर्स पता नहीं ना जाने क्या क्या बन गया है !!

आज हमने इनके खिलाफ आवाज नहीं उठाई ,इनका बहिष्कार नहीं ! तो कल ये हमारी बची कूची संस्कृति को भी निकग  जाएगा !!

MUST CLICK 

LINK - https://www.youtube.com/watch?v=wI7foiSejO8

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सौन्दर्य प्रतियोगिताओं का असर —
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मित्रो दस साल पहले भारत से कई विश्व सुंदरियां बनी इसके पीछे विदेशी कंपनियों की सोची समझी साजिश थी .

– कई प्रसाधन बनाने वाली कम्पनियां भारत में अपना मार्केट खोज रही थी . पर यहाँ अधिकतर महिलाएं ज़्यादा प्रसाधन का इस्तेमाल नहीं करती थी . इसलिए उन्होंने भारत से सुंदरियों को जीता कर लड़कियों के मन में ग्लेमर की चाह उत्पन्न की.

मिसेज़ इंडिया जैसी प्रतियोगिताओं से बड़ी उम्र की महिलाओं को भी टारगेट किया गया .
– इन सौन्दर्य प्रतियोगिताओं के बाद लडकियां सपने देखने लगी की वे भी मिस इंडिया , फिर मिस वर्ल्ड, फिर हीरोइन, फिर बहुत धनी बन सकती है .

– इसके लिए वे अपने आपको स्लिम करने के चक्कर में फिटनेस सेंटर में जाने लगी जहां क्रेश डाइटिंग , लाइपोसक्शन , गोलियां , प्लास्टिक सर्जरी जैसे महंगे और अनैसर्गिक तरीकेबताये जाते .

– सौन्दर्य प्रसाधन इस्तेमाल करना आम हो गया

.- ब्यूटी पार्लर जाना आम हो गया .

– इस तरह हर महिला सौन्दर्य प्रसाधनों , ब्यूटी पार्लर , फिटनेस सेंटर आदि पर हर महीने हज़ारो रुपये खर्च करने लगी .

– पर सबसे ज़्यादा बुरा असर उन महिलाओं पर पड़ा जोइन मोड़ेल्स की तरह दिखने के लिए अपनी भूख को मार कुपोषण का शिकार हो गई .

– इसलिए आज देश में दो तरह के कुपोषण है

– एक गरीबों का जो मुश्किल से एक वक्त की रोटी जुटा पाते है और दुसरा संपन्न वर्ग का जो जंक फ़ूड खाकर और डाइटिंग कर कुपोषण का शिकार हो रहाहै .

– यहाँ तक की नई नई माँ बनी हुई बहनों को भी वजन कम करने की चिंता सताने लगती है . जब की यह वो समय है जब वजन की चिंता न कर पोषक खाना खाने पर , आराम पर ध्यान देना कर माँ का हक है . ये समय ज़िन्दगी में एक या दो बार आता है और इस समय स्वास्थ्य की देख भाल आगे की पूरी ज़िन्दगी को प्रभावित करती है . यह समय मातृत्व का आनंद लेने का है ना की कोई नुमाइश की चीज़ बनाने का .

– ताज़ा उदाहरण है ऐश्वर्या राय . वह माँ बनाने की गरिमा और आनंद कोजी ही नहीं पाई . मीडिया ने उनके बढ़ते वजन पर ऐसे ताने कसे की वो अपने बच्ची की देखभाल और नए मातृत्व का आनंद लेना छोड़ वजन कम करने में जुट गई होंगी .

– अब जब इन कंपनियों का मार्केट भारत में स्थापित हो चुका है तो कोई विश्व सुंदरी भारत से नहीं बनेगी . अब इनकी दुसरे देशों पर नज़र है .! या कभी इनको लगे की मंदी आने लगी है तो दुबारा किसी को भारत मे से चुन ले !! क्यूंकि चीन के बाद भारत 121 करोड़ की आबादी वाला दुनिया का सबसे बढ़ा market है !!

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तो मित्रो ये सब कार्य बहुत ही गहरी साजिश बना कर अंजाम दिया जाता है ! जिसमे हमारा मीडिया विदेशी कंपनियो के साथ मिलकर बहुत रोल अदा करता है !

मित्रो एक तरफ मीडिया देश मे बढ़ रहे बलात्कार पर छाती पीटता है ! और दूसरी तरफ खुद भी अश्लीलता को बढ़ावा देता है ! वो चाहे india today की मैगजीन के कवर हो ! या ये विदेशी times of india अखबार ! ये times of india आप उठा लीजिये ! रोज times of india मे आपको पहले पेज पर या दूसरे पेज पर किसी ना किसी लड़की की आधे नंगी या लगभग पूरी नंगी तस्वीर मिलेगी ! जब की उसका खबर से कोई लेना देना नहीं ! जानबूझ कर आधी नंगी लड़कियों की तस्वीर छापना ही इनकी पत्रकारिता रह गया है !!

और ये ही times of india है जो भारत की संस्कृति का नाश करने पर तुला है !!
इसी ने आज से 10 -15 वर्ष पूर्व miss india, miss femina आदि शुरू किए ! जो अब मिस वर्ड ,मिस यूनिवर्स पता नहीं ना जाने क्या क्या बन गया है !!

आज हमने इनके खिलाफ आवाज नहीं उठाई ,इनका बहिष्कार नहीं ! तो कल ये हमारी बची कूची संस्कृति को भी निकग जाएगा !!

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Posted in AAP, राजनीति भारत की - Rajniti Bharat ki

AAP


केजरीवाल सरकार ने अपनी पहली कैबिनेट मीटिंग में यह फैसला किया है कि दिल्ली से अवैध अतिक्रमण नहीं हटायें जाएंगे ….
मतलब अब दिल्ली में बांग्लादेशी घुसपैठियो की संख्या दोगुनी हो जाएगी,….
अभी देख लीजिए इन बांग्लादेशी घुसपैठियो ने दिल्ली में हजारों करोड़ों रुपए की सरकारी जमीन पर कब्जा करके सैकड़ों अवैध कालोनिया बना ली है, जिनमें बड़े पैमाने पर बिजली पानी की चोरी होती हैं जिससे अरबों रुपए के राजस्व का नुकसान होता हैं …..,
आज हाईवे, सडके, रेलवे ट्रैक के पास आपको हरा झंडा लगे कच्चे मकानों और बिना पलस्तर की मस्जिदों की भरमार दिख जाएगी …….पहले तो ये सब चोरी छिपे होता था, लेकिन अरविंद सर के राज में ये सब अब दुगनी रफ्तार से होगा ……अब दिल्ली में जगह जगह झुग्गियों, अवैध कब्जों और बांग्लादेशी घुसपैठियो की भरमार हो जाएगी ……
बधाई हो दिल्ली वालो !

Posted in भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas

अकबर ने प्रयाग को लूटा एवं मन्दिर ध्वस्त कर उसका नाम अल्लाहाबाद रख दिया।


अकबर ने प्रयाग को लूटा एवं मन्दिर ध्वस्त कर उसका नाम अल्लाहाबाद रख दिया।

जिसका अर्थ था कि अल्लाह ने उसे आबाद कर दिया।यह नाम अभी भी चल रहा हॆ। यह बतलाता हॆ कि मुस्लिम काल मे निर्माण. कॆसे किया जाता था।

अकबर को महान इसलिये कहा जाता हॆ कि उसने राजपूतों की लडकियों से निकाह किया था लेकिन एक भी मुस्लिम लडकी राजपूतों कॊ नही दिया ।यह राजपूतों का आत्मसमर्पण करने जॆसा था। अकबर किसी भी सेनिक अभियान मे सीधे भाग नही लेता था। राजपूतों को ही भेज देता था मरने कटने के लिये। महाराणा प्रताप से भी वह स्वयं कभी नही लडा। आमेर अर्थात जयपुर के राजा मानसिंह को भिडा दिया। इस प्रकार वह राजपूतों को युक्तिपूर्वक बेवकूफ बनाकर अपना राज्य विस्तार किया।
दीने इलाही इस्लाम का ही अकबरीकरन था जिसका अर्थ होता हॆ अल्लाह का धर्म। रहीम खान जो बॆरम खान. का बेटा ऒर दरबारी था तथा अन्य कुछ ऒर खुशामदी दरबारियों ने अकबर को खुश करने के लिये इसे अपनाया था लेकिन सामान्य मुस्लिमों ने इसे नकार दिया था। यही कारण हॆ कि बाद मे इसका कोई नाम लेनेवाला नही रहा।लेकिन वामपंथी इतिहासकारों ने दीने इलाही को हवा दे दिया हॆ।
यही कारण हॆ कि अकबर को महान कहा जाता हॆ।

Posted in भारत गौरव - Mera Bharat Mahan

Harappa


Unfired steatite seal and sealing of a boat found at Mohenjo-daro, with a close and insightful reading by Ernest J.H. Mackay: "Seal 30 . . . was found in two pieces. It is rectangular in shape and incomplete motif on the back consists of roughly scratched lines that cross one another. . .. The face is nearly complete and it clearly bears a representation of a ship, the first of its kind to be found one a seal from Mohenjo-daro. . .. Why representations of boats and ships are so rare it is difficult to explain, as it is more than probable that the river Indus was largely used for traffic of all kinds, and river craft should have been perfectly familiar to the inhabitants of Mohenjo-daro.
The vessel portrayed on this seal is boldly but roughly cut, apparently with a triangular burin, and is apparently not the work of an experienced seal cutter; hence its interest, because, probably as a consequence of inexperience, the motif is not a stereotypical one. The boat has a sharply upturned prow and stern, a feature which is present in nearly all archaic representations of boats; for example, the same boat appears in early Minoan seals, on the Predynastic pottery of Egypt, and on the cylinder seals of Sumer. In the last mentioned country, this type of boat was used down to Assyrian times. On the ivory knife-handle of Gebel-el-'Arak in the Louvre are depicted ships which bear a very close resemblance to the one on our seal; these and the other scenes on this handle are, indeed, explained by Petrie as not Egyptian, but the product of an Oriental people inspired by Elam and the Tigris region.
It will be noticed that this boat is shown as lashed together at both bow and stern, indicating perhaps that it was made of reeds like the primitive boats of Egypt and the craft that were used in the swamps of southern Babylonia. The hut or shrine in its centre also appears to be made of reeds and fastened at each end of it is a standard bearing an emblem comparable, though not in actual shape, with the ensigns on the Gebel-el-'Ark handle. At one end of the boat on the seal from Mohenjo-daro a steersman whose head is unfortunately missing is seated at a rudder or steering-oar. The seal-cutter here was not at all sure of his figure and placed it well above the seal. 
The absence of a mast suggests that this boat was used only for river work, as are some of the wooden boats on the Indus at the present day; though the modern boats have a less acutely upturned prow and stern, they usually have a similar cabin-like erection in the middle, sometimes constructed of wood and sometimes of reeds. The boats of today are chiefly used for fishing and are either rowed or punted against the stream.
This seal is invaluable in indicating a type of vessel that was in use in ancient Sindh. Its owner was perhaps connected with shipping of some kind for in in engraving it most careful attention had been paid to detail. (E.J.H. Mackay, Further Excavations at Mohenjo-daro, 1938, p. 340-1).
Still, why do there seem to be so few depictions of boats in the ancient Indus tradition?

Unfired steatite seal and sealing of a boat found at Mohenjo-daro, with a close and insightful reading by Ernest J.H. Mackay: “Seal 30 . . . was found in two pieces. It is rectangular in shape and incomplete motif on the back consists of roughly scratched lines that cross one another. . .. The face is nearly complete and it clearly bears a representation of a ship, the first of its kind to be found one a seal from Mohenjo-daro. . .. Why representations of boats and ships are so rare it is difficult to explain, as it is more than probable that the river Indus was largely used for traffic of all kinds, and river craft should have been perfectly familiar to the inhabitants of Mohenjo-daro.
The vessel portrayed on this seal is boldly but roughly cut, apparently with a triangular burin, and is apparently not the work of an experienced seal cutter; hence its interest, because, probably as a consequence of inexperience, the motif is not a stereotypical one. The boat has a sharply upturned prow and stern, a feature which is present in nearly all archaic representations of boats; for example, the same boat appears in early Minoan seals, on the Predynastic pottery of Egypt, and on the cylinder seals of Sumer. In the last mentioned country, this type of boat was used down to Assyrian times. On the ivory knife-handle of Gebel-el-‘Arak in the Louvre are depicted ships which bear a very close resemblance to the one on our seal; these and the other scenes on this handle are, indeed, explained by Petrie as not Egyptian, but the product of an Oriental people inspired by Elam and the Tigris region.
It will be noticed that this boat is shown as lashed together at both bow and stern, indicating perhaps that it was made of reeds like the primitive boats of Egypt and the craft that were used in the swamps of southern Babylonia. The hut or shrine in its centre also appears to be made of reeds and fastened at each end of it is a standard bearing an emblem comparable, though not in actual shape, with the ensigns on the Gebel-el-‘Ark handle. At one end of the boat on the seal from Mohenjo-daro a steersman whose head is unfortunately missing is seated at a rudder or steering-oar. The seal-cutter here was not at all sure of his figure and placed it well above the seal.
The absence of a mast suggests that this boat was used only for river work, as are some of the wooden boats on the Indus at the present day; though the modern boats have a less acutely upturned prow and stern, they usually have a similar cabin-like erection in the middle, sometimes constructed of wood and sometimes of reeds. The boats of today are chiefly used for fishing and are either rowed or punted against the stream.
This seal is invaluable in indicating a type of vessel that was in use in ancient Sindh. Its owner was perhaps connected with shipping of some kind for in in engraving it most careful attention had been paid to detail. (E.J.H. Mackay, Further Excavations at Mohenjo-daro, 1938, p. 340-1).
Still, why do there seem to be so few depictions of boats in the ancient Indus tradition?

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દુર્ગતિને પણ પ્રગતિમાં બદલી શકે છે આ 8 ચમત્કારી ઉપાય, આજથી જ કરો શરૂ


દુર્ગતિને પણ પ્રગતિમાં બદલી શકે છે આ 8 ચમત્કારી ઉપાય, આજથી જ કરો શરૂ

KNOWLEDGE VALLEY FROM INTERNET

Measure For Degradation To Reach Progress

મંગળવાર અને શનિવારે સંકટનાશક હનુમાનજીના આ વિશેષ તાંત્રિક ઉપાય અપાવશે વિશેષ લાભ- જીવનમાં શકિત અને સિધ્ધિની કામનાને પૂર્ણ કરવા માટે શ્રીહનુમાન ઉપાસના અચૂક કરવી જોઈએ. શ્રીહનુમાન અને તેમના ચરિત્ર જીવનમાં સંકલ્પ, બળ, ઉર્જા, બુધ્ધિ, ચરિત્ર શુધ્ધિ, સમર્પણ, શોર્ય, પરાક્રમ, દઢતા સાથે જીવનમાં દરેક પડકાર અને કઠિનતાનો સામનો કરવા માટેની પ્રેરણા મળે છે.

ભગવાન શિવના રુદ્રાઅવતાર પવનપુત્ર હનુમાનને પ્રસન્ન કરવા માટે મંગળવાર અને શનિવારે વિશેષ ઉપાય કરવામાં આવે છે. તંત્રશાસ્ત્ર પ્રમાણે આ દિવસે હનુમાનજીને પ્રસન્ન કરવા માટે વિશેષ ઉપાય કરવામાં આવે તો થોડા જ સમયમાં કિસ્મત બદલાઈ જાય છે. આ ખાસ ઉપાય તમારી દરેક મનોકામના પૂરી કરી શકે છે.

જો તમે પણ આ ખાસ ઉપાયો વિશે જાણવા માગતા હોવ તો આગળ

મંગળવારે અને શનિવારેની સાંજે કોઈ હનુમાન મંદિરમાં જાઓ અને એક સરસિયાના તેલનો અને એક શુદ્ધ ઘીનો દીવો પ્રગટાવો. ત્યારબાદ ત્યાં જ બેસીને હનુમાન ચાલીસાનો પાઠ કરો. હનુમાનજીની કૃપા પ્રાપ્ત કરવા માટે આ અચૂક ઉપાય…

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તમારી સાથે બને આ ઘટના, તો સમજો લક્ષ્મીદેવી કરશે લખલૂટ ધનવર્ષા


તમારી સાથે બને આ ઘટના, તો સમજો લક્ષ્મીદેવી કરશે લખલૂટ ધનવર્ષા

KNOWLEDGE VALLEY FROM INTERNET

These Fifteen Sign Happens With You Then Know Goddess Laxmi Will Praised On You

કોઇપણ વ્યક્તિની ધનસંબંધી મનોકામના ક્યારે પૂર્ણ થશે, ક્યારે મહાલક્ષ્મીની કૃપા મળશે, તે જાણાવા માટે જ્યોતિષમાં થોડા સંકેતો જણાવવામાં આવ્યા છે. જાણો, લક્ષ્મી કૃપા સાથે જોડાયેલા 15 શુભ સંકેત એટલે શુકન…..

1-જો કોઇ વ્યક્તિના સપનામાં સતત પાણી, હરિયાળી, લક્ષ્મીજીનું વાહન ઘુવડ જોવા મળે તો સમજી લેવું જોઇએ કે નજીકના ભવિષ્યમાં લક્ષ્મીકૃપાથી ધન સંબંધી બાધાઓ દૂર થઇ શકે છે.

2-જો તમે કોઇ જરૂરી કામ માટે જઇ રહ્યા છો અને રસ્તામાં લાલ સાડી પહેરેલી સોળ શ્રૃંગાર કરેલી કોઇ સ્ત્રી જોવા મળે તો આ સંકેત પણ મહાલક્ષ્મીની કૃપાનો જ ઇશારો છે. જો સંકેત જો તમને જોવા મળે તો સમજી જવું કે તમને તમારા કાર્યમાં સફળતા મળવાની સંભાવના ઘણી વધી જશે.

3-સવારે ઉઠીને શંખ, મંદિરનો ઘંટ વગેરેના અવાજો સંભળાય તો તે પણ શુભ સંકેત છે.

4-કોઇ-કોઇ વ્યક્તિને સવાર-સવારમાં શેરડી જોવા મળે તો નજીકના ભવિષ્યમાં તેને ધન સંબંધી કાર્યોમાં સફળતા પ્રાપ્ત થઇ…

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Tamil King Offered Tharpana The Dead In Mahabharata 3102 BC


Tamil King Offered Tharpana The Dead In Mahabharata 3102 BC

Ramani's blog

The Sanatana Dharma was an intruder into Tamil Culture, it was imposed by the Brahmins who crossed over th India through the Khyber Pass, say the Rationalists and The self-styled scholars of Tamil.

Yes , it was imposed to such an extent that the early Tamil literature Ahanaanuru records that the Chera King Udiyan Cheralaathan offered Tharpana to the people killed in the Mahabharata war.

Emblem of Chera Kings,jpg Emblem of Chera Kings, Tamil Nadu,Bow ad Arrow.

He also fed both the Kaurava and Pandava Army, as a Third Umpire.

  1. அலங்கு உளைப் புரவி ஐவரொடு சினைஇ
    நிலம் தலைக் கொண்ட பொலம்பூந் தும்பை
    ஈர் ஐம்பதின்மரும் பொருது களத்து ஒழியப்
    பெருஞ்சோற்று மிகுபதம் வரையாது கொடுத்தோய் – புறநானூறு 2.-Poet Maamoolar

    ‘Provided Unlimited Food for the Battle by The Kauravas’

    2.Performed Tharpana and Sraddha.

    ‘ “துறக்கம் எய்திய தொய்யா நல்லிசை முதியர்ப் பேணிய உதியஞ்சேரல்”

    Udiyan Cheral performed obsequies for the ancestors’-Ahanaaanuru 233

    His contribution in feeding the army was acknowledged so much appreciated that…

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वासुदेव बलवन्त फड़के


भारत डिस्कवरी प्रस्तुति
वासुदेव बलवन्त फड़के
वासुदेव बलवन्त फड़के
पूरा नाम वासुदेव बलवन्त फड़के
जन्म 4 नवम्बर, 1845 ई.
जन्म भूमि शिरढोणे गांव, कोल्हापुर ज़िला,महाराष्ट्र
मृत्यु 17 फ़रवरी, 1883 ई.
कर्म भूमि भारत
प्रसिद्धि स्वतंत्रता सेनानी
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी देश के लिए अपनी सेवाएँ देते हुए 1879 ई. में फड़के अंग्रेज़ों द्वारा पकड़ लिये गए और आजन्म कारावास की सज़ा देकर इन्हें अदन भेज दिया गया। यहाँ पर फड़के को कड़ी शारीरिक यातनाएँ दी गईं। इसी के फलस्वरूप 1883 ई. को इनकी मृत्यु हो गई।
अद्यतन‎

वासुदेव बलवन्त फड़के (जन्म- 4 नवम्बर, 1845 ई. ‘महाराष्ट्र‘ तथा मृत्यु- 17 फ़रवरी, 1883 ई. ‘अदन’) ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध सशस्त्र विद्रोह का संगठन करने वाले भारत के प्रथम क्रान्तिकारी थे। वासुदेव बलवन्त फड़के का जन्म महाराष्ट्र के कोल्हापुर ज़िले के ‘शिरढोणे’ नामक गांव में हुआ था। फड़के ने 1857 ई. की प्रथम संगठित महाक्रांति की विफलता के बाद आज़ादी के महासमर की पहली चिनगारी जलायी थी। देश के लिए अपनी सेवाएँ देते हुए 1879 ई. में फड़के अंग्रेज़ों द्वारा पकड़ लिये गए और आजन्म कारावास की सज़ा देकर इन्हें अदन भेज दिया गया। यहाँ पर फड़के को कड़ी शारीरिक यातनाएँ दी गईं। इसी के फलस्वरूप 1883 ई. को इनकी मृत्यु हो गई।

परिचय

वासुदेव बलवन्त फड़के बड़े तेजस्वी और स्वस्थ शरीर के बालक थे। उन्हें वनों और पर्वतों में घूमने का बड़ा शौक़ था। कल्याण और पूना में उनकी शिक्षा हुई। फड़के केपिता चाहते थे कि वह एक व्यापारी की दुकान पर दस रुपए मासिक वेतन की नौकरी कर लें और पढ़ाई छोड़ दें। लेकिन फड़के ने यह बात नहीं मानी और मुम्बई आ गए। वहाँ पर जी.आर.पी. में बीस रुपए मासिक की नौकरी करते हुए अपनी पढ़ाई जारी रखी। 28 वर्ष की आयु में फड़के की पहली पत्नी का निधन हो जाने के कारण इनका दूसरा विवाह किया गया।

व्यावसायिक जीवन

विद्यार्थी जीवन में ही वासुदेव बलवन्त फड़के 1857 ई. की विफल क्रान्ति के समाचारों से परिचित हो चुके थे। शिक्षा पूरी करके फड़के ने ‘ग्रेट इंडियन पेनिंसुला रेलवे’ और ‘मिलिट्री फ़ाइनेंस डिपार्टमेंट’, पूना में नौकरी की। उन्होंने जंगल में एक व्यायामशाला बनाई, जहाँ ज्योतिबा फुले भी उनके साथी थे। यहाँ लोगों को शस्त्र चलाने का भी अभ्यास कराया जाता था। लोकमान्य तिलक ने भी वहाँ शस्त्र चलाना सीखा था।

गोविन्द रानाडे का प्रभाव

1857 की क्रान्ति के दमन के बाद देश में धीरे-धीरे नई जागृति आई और विभिन्न क्षेत्रों में संगठन बनने लगे। इन्हीं में एक संस्था पूना की ‘सार्वजनिक सभा’ थी। इस सभा के तत्वावधान में हुई एक मीटिंग में 1870 ई. में महादेव गोविन्द रानाडे ने एक भाषण दिया। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि अंग्रेज़ किस प्रकार भारत की आर्थिक लूट कर रहे हैं। इसका फड़के पर बड़ा प्रभाव पड़ा। वे नौकरी करते हुए भी छुट्टी के दिनों में गांव-गांव घूमकर लोगों में इस लूट के विरोध में प्रचार करते रहे।

माता की मृत्यु

1871 ई. में एक दिन सायंकाल वासुदेव बलवन्त फड़के कुछ गंभीर विचार में बैठे थे। तभी उनकी माताजी की तीव्र अस्वस्थता का तार उनको मिला। इसमें लिखा था कि ‘वासु’ (वासुदेव बलवन्त फड़के) तुम शीघ्र ही घर आ जाओ, नहीं तो मां के दर्शन भी शायद न हो सकेंगे। इस वेदनापूर्ण तार को पढ़कर अतीत की स्मृतियाँ फ़ड़के के मानस पटल पर आ गयीं और तार लेकर वे अंग्रेज़ अधिकारी के पास अवकाश का प्रार्थना-पत्र देने के लिए गए। किन्तु अंग्रेज़ तो भारतीयों को अपमानित करने के लिए सतत प्रयासरत रहते थे। उस अंग्रेज़ अधिकारी ने अवकाश नहीं दिया, लेकिन वासुदेव बलवन्त फड़के दूसरे दिन अपने गांव चले आए। गांव आने पर वासुदेव पर वज्राघात हुआ। जब उन्होंने देखा कि उनका मुंह देखे बिना ही तड़पते हुए उनकी ममतामयी मां चल बसी हैं। उन्होंने पांव छूकर रोते हुए माता से क्षमा मांगी, किन्तु अंग्रेज़ी शासन के दुव्यर्वहार से उनका ह्रदय द्रवित हो उठा।

सेना का संगठन

इस घटना के वासुदेव फ़ड़के ने नौकरी छोड़ दी और विदेशियों के विरुद्ध क्रान्ति की तैयारी करने लगे। उन्हें देशी नरेशों से कोई सहायता नहीं मिली तो फड़के ने शिवाजी का मार्ग अपनाकर आदिवासियों की सेना संगठित करने की कोशिश प्रारम्भ कर दी। उन्होंने फ़रवरी 1879 में अंग्रेज़ों के विरुद्ध विद्रोह की घोषणा कर दी। धन-संग्रह के लिए धनिकों के यहाँ डाके भी डाले। उन्होंने पूरे महाराष्ट्र में घूम-घूमकर नवयुवकों से विचार-विमर्श किया, और उन्हें संगठित करने का प्रयास किया। किन्तु उन्हें नवयुवकों के व्यवहार से आशा की कोई किरण नहीं दिखायी पड़ी। कुछ दिनों बाद ‘गोविन्द राव दावरे’ तथा कुछ अन्य युवक उनके साथ खड़े हो गए। फिर भी कोई शक्तिशाली संगठन खड़ा होता नहीं दिखायी दिया। तब उन्होंने वनवासी जातियों की ओर नजर उठायी और सोचा आखिर भगवान श्रीराम ने भी तो वानरों और वनवासी समूहों को संगठित करके लंका पर विजय पायी थी। महाराणा प्रताप ने भी इन्हीं वनवासियों को ही संगठित करके अकबर को नाकों चने चबवा दिए थे। शिवाजी ने भी इन्हीं वनवासियों को स्वाभिमान की प्रेरणा देकर औरंगज़ेब को हिला दिया था।

ईनाम की घोषणा

महाराष्ट्र के सात ज़िलों में वासुदेव फड़के की सेना का ज़बर्दस्त प्रभाव फैल चुका था। अंग्रेज़ अफ़सर डर गए थे। इस कारण एक दिन मंत्रणा करने के लिए विश्राम बाग़ में इकट्ठा थे। वहाँ पर एक सरकारी भवन में बैठक चल रही थी। 13 मई, 1879 को रात 12 बजे वासुदेव बलवन्त फड़के अपने साथियों सहित वहाँ आ गए। अंग्रेज़ अफ़सरों को मारा तथा भवन को आग लगा दी। उसके बाद अंग्रेज़ सरकार ने उन्हें ज़िन्दा या मुर्दा पकड़ने पर पचास हज़ार रुपए का इनाम घोषित किया। किन्तु दूसरे ही दिन मुम्बई नगर में वासुदेव के हस्ताक्षर से इश्तहार लगा दिए गए कि जो अंग्रेज़ अफ़सर ‘रिचर्ड’ का सिर काटकर लाएगा, उसे 75 हज़ार रुपए का इनाम दिया जाएगा। अंग्रेज़ अफ़सर इससे और भी बौखला गए।

गिरफ़्तारी

1857 ई. में अंग्रेज़ों की सहायता करके जागीर पाने वाले बड़ौदा के गायकवाड़ के दीवान के पुत्र के घर पर हो रहे विवाह के उत्सव पर फड़के के साथी दौलतराम नाइक ने पचास हज़ार रुपयों का सामान लूट लिया। इस पर अंग्रेज़ सरकार फड़के के पीछे पड़ गई। वे बीमारी की हालत में एक मन्दिर में विश्राम कर रहे थे, तभी 20 जुलाई, 1879 को गिरफ़्तार कर लिये गए। राजद्रोह का मुकदमा चला और आजन्म कालापानी की सज़ा देकर फड़के को ‘अदन’ भेज दिया गया।

निधन

अदन पहुँचने पर फड़के भाग निकले, किन्तु वहाँ के मार्गों से परिचित न होने के कारण पकड़ लिये गए। जेल में उनको अनेक प्रकार की यातनाएँ दी गईं। वहाँ उन्हें क्षय रोग भी हो गया और इस महान देशभक्त ने 17 फ़रवरी, 1883 ई. को अदन की जेल के अन्दर ही प्राण त्याग दिए।