Posted in AAP, राजनीति भारत की - Rajniti Bharat ki

AAP


Ajay Gulati अरविंद केजरीवाल इतना इमानदार आदमी है कि , देश के टॉप 10 इमानदार लोग इसे समर्थन दे रहे है !
1) शाही इमाम ( पाकिस्तानी ISI एजेंट )
2) ममता बनर्जी ( शारदा चिट फण्ड घोटाला और बंगलादेशी अम्मी )

3) CPM पार्टी ( चेन सपोर्टर )
4) बब्बर खालसा ( अलग पंजाब वाले )
5) हुर्रियत नेता गिलानी ( अलग कश्मीर वाले )
6) JDU नेता नितीश कुमार ( मुसलमानों के अब्बू और हिन्दुत्व विरोधी )
7) PK वाला आमिर खान ( डरे हुये लोग मंदिर जाते है )
8) ABP News ( अरब ब्रदर्स प्राइवेट लि ),आजतक, रनडीटीवी
9) मोस्ट वांटेड हाफिज सइद ( पाकिस्तानी आतंकवादी )
10)सबसे बड़ी बात , पिछली बार बिना शर्त समर्थन दे रही इसकी इटैलियन मम्मी कि कांग्रेस पार्टी
11) अरब के शेख
12) पाकिस्तान और बंगलादेश
13) दाऊद और ISI
14) ओवैसी ( जो 15 मिनट में हिन्दुओ को खत्म करने की बात करता है
हिन्दुओं अब खुद ही सोच लो तुम समझदार हो

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

कैसे हुआ कौए का रंग काला


कैसे हुआ कौए का रंग काला–

कौवे के रंग के बारे में एक पुरानी किवदंती है। एक ऋषि ने कौए को अमृत खोजने भेजा, लेकिन उन्होंने यह निर्देश भी दिया कि सिर्फ अमृत की केवल जानकारी ही लानी है, उसे पीना नहीं है।

एक बरस के परिश्रम के पश्चात सफेद कौए को अमृत की जानकारी मिली, पीने की लालसा कौआ रोक नहीं पाया एवं अमृत पी लिया। ऋषि को आकर सारी जानकारी दी।

इस पर ऋषि आवेश में आ गए और श्राप दिया कि तुमने मेरे वचन को भंग कर अपवित्र चोंच द्वारा पवित्र अमृत को भ्रष्ट किया है। इसलिए प्राणी मात्र में तुम्हें घृणास्पद पक्षी माना जाएगा एवं अशुभ पक्षी की तरह मानव जाति हमेशा तुम्हारी निंदा करेगी, लेकिन चूंकि तुमने अमृत पान किया है, इसलिए तुम्हारी स्वाभाविक मृत्यु कभी नहीं होगी। कोई बीमारी भी नहीं होगी एवं वृद्धावस्था भी नहीं आएगी।

भाद्रपद के महीने के 16 दिन तुम्हें पितरों का प्रतीक समझ कर आदर दिया जाएगा एवं तुम्हारी मृत्यु आकस्मिक रूप से ही होगी।

इतना बोलकर ऋषि ने अपने कमंडल के काले पानी में उसे डूबो दिया। काले रंग का बनकर कौआ उड़ गया तभी से कौए काले हो गए।

कैसे हुआ कौए का रंग काला--

कौवे के रंग के बारे में एक पुरानी किवदंती है। एक ऋषि ने कौए को अमृत खोजने भेजा, लेकिन उन्होंने यह निर्देश भी दिया कि सिर्फ अमृत की केवल जानकारी ही लानी है, उसे पीना नहीं है।

एक बरस के परिश्रम के पश्चात सफेद कौए को अमृत की जानकारी मिली, पीने की लालसा कौआ रोक नहीं पाया एवं अमृत पी लिया। ऋषि को आकर सारी जानकारी दी।

इस पर ऋषि आवेश में आ गए और श्राप दिया कि तुमने मेरे वचन को भंग कर अपवित्र चोंच द्वारा पवित्र अमृत को भ्रष्ट किया है। इसलिए प्राणी मात्र में तुम्हें घृणास्पद पक्षी माना जाएगा एवं अशुभ पक्षी की तरह मानव जाति हमेशा तुम्हारी निंदा करेगी, लेकिन चूंकि तुमने अमृत पान किया है, इसलिए तुम्हारी स्वाभाविक मृत्यु कभी नहीं होगी। कोई बीमारी भी नहीं होगी एवं वृद्धावस्था भी नहीं आएगी।

भाद्रपद के महीने के 16 दिन तुम्हें पितरों का प्रतीक समझ कर आदर दिया जाएगा एवं तुम्हारी मृत्यु आकस्मिक रूप से ही होगी।

इतना बोलकर ऋषि ने अपने कमंडल के काले पानी में उसे डूबो दिया। काले रंग का बनकर कौआ उड़ गया तभी से कौए काले हो गए।
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क्या आप जानते है, पांडव किस तरह स्वर्ग गए


क्या आप जानते है, पांडव किस तरह स्वर्ग गए
श्री कृष्ण सहित पुरे यदुवंशियों के मारे जाने से दुखी पांडव भी परलोक जाने का निश्चय करते है और इस क्रम में पांचो पांडव और द्रोपदी स्वर्ग पहुंचते है। जहां द्रोपदी, भीम, अर्जुन, सहदेव और नकुल शरीर को त्याग कर स्वर्ग पहुंचते है वही युधिष्ठर सशरीर स्वर्ग पहुंचते है।
हालांकि उन्हें अपनी एक गलती के कारण कुछ समय नरक में भी बिताना पड़ता है। इस पुरे सफर में उनके साथ एक कुत्ता भी होता है। आइए अब विस्तार पूर्वक जानते है की वो कुत्ता कौन था तथा पांडवो को स्वर्ग पहुंचने में किन किन कठनाइयों का सामना करना पड़ा ?
नगर के बाहर निकलते ही जब द्वारिका समुद्र में डूब गई तो यह दृश्य देखकर सभी को आश्चर्य हुआ। अर्जुन यदुवंश की स्त्रियों व द्वारकावासियों को लेकर तेजी से हस्तिनापुर की ओर चलने लगे। रास्ते में पंचनद देश में अर्जुन ने पड़ाव डाला। वहां रहने वाले लुटेरों ने जब देखा कि अर्जुन अकेले ही इतने बड़े जनसमुदाय को लेकर जा रहे हैं तो धन के लालच में आकर उन्होंने उन पर हमला कर दिया। अर्जुन ने लुटेरों को चेतावनी दी, लेकिन फिर वे नहीं माने और लूट-पाट करने लगे।
तब अर्जुन ने अपने दिव्य अस्त्र-शस्त्रों का स्मरण किया, लेकिन उनकी स्मरण शक्ति लुप्त हो गई। अर्जुन ने देखा कि कुछ ही देर में उनकी तरकश के सभी बाण भी समाप्त हो गए। तब अर्जुन बिना शस्त्र से ही लुटेरों से युद्ध करने लगे, लेकिन देखते ही देखते लुटेरे बहुत सा धन और स्त्रियों को लेकर भाग गए। अस्त्रों का ज्ञान लुप्त हो गया, धनुष पर काबू नहीं चलता था, अक्षय बाण भी समाप्त हो गए। यह देखकर अर्जुन को बहुत दुख हुआ।
जैसे-तैसे अर्जुन यदुवंश की बची हुई स्त्रियों व बच्चों को लेकर कुरुक्षेत्र पहुंचे। यहां आकर अर्जुन ने वज्र (श्रीकृष्ण का पोता) को इंद्रप्रस्थ का राजा बना दिया। रुक्मिणी, शैब्या, हेमवती तथा जांबवंती आदि रानियां अग्नि में प्रवेश कर गईं शेष वन में तपस्या के लिए चली गईं। बूढ़ों, बालकों व अन्य स्त्रियों को अर्जुन ने इंद्रप्रस्थ में रहने के लिए कहा।
वज्र को इंद्रप्रस्थ का राजा बनाने के बाद अर्जुन महर्षि वेदव्यास के आश्रम पहुंचे। यहां आकर अर्जुन ने महर्षि वेदव्यास को बताया कि श्रीकृष्ण, बलराम सहित सारे यदुवंशी समाप्त हो चुके हैं। तब महर्षि ने कहा कि यह सब इसी प्रकार होना था। इसलिए इसके लिए शोक नहीं करना चाहिए। तब अर्जुन ने ये भी बताया कि किस प्रकार साधारण लुटेरे उनके सामने यदुवंश की स्त्रियों को हर कर ले गए और वे कुछ भी न कर सके।
अर्जुन की बात सुनकर महर्षि वेदव्यास ने कहा कि वे दिव्य अस्त्र जिस उद्देश्य से तुमने प्राप्त किए थे, वह पूरा हो गया। अत: वे पुन: अपने स्थानों पर चले गए हैं। महर्षि ने अर्जुन से यह भी कहा कि तुम लोगों ने अपना कर्तव्य पूर्ण कर लिया है। अत: अब तुम्हारे परलोक गमन का समय आ गया है और यही तुम्हारे लिए श्रेष्ठ भी है। महर्षि वेदव्यास की बात सुनकर अर्जुन उनकी आज्ञा से हस्तिनापुर आए और उन्होंने पूरी बात महाराज युधिष्ठिर को बता दी।
यदुवंशियों के नाश की बात जानकर युधिष्ठिर को बहुत दुख हुआ। महर्षि वेदव्यास की बात मानकर द्रौपदी सहित पांडवों ने राज-पाठ त्याग कर परलोक जाने का निश्चय किया। युधिष्ठिर ने युयुत्सु को बुलाकर उसे संपूर्ण राज्य की देख-भाल का भार सौंप दिया और परीक्षित का राज्याभिषेक कर दिया। युधिष्ठिर ने सुभद्रा से कहा कि आज से परीक्षित हस्तिनापुर का तथा वज्र इंद्रप्रस्थ का राजा है। अत: तुम इन दोनों पर समान रूप से स्नेह रखना।
इसके बाद पांडवों ने अपने मामा वसुदेव व श्रीकृष्ण तथा बलराम आदि का विधिवत तर्पण व श्राद्ध किया। इसके बाद पांडवों व द्रौपदी ने साधुओं के वस्त्र धारण किए और स्वर्ग जाने के लिए निकल पड़े। पांडवों के साथ-साथ एक कुत्ता भी चलने लगा। अनेक तीर्थों, नदियों व समुद्रों की यात्रा करते-करते पांडव आगे बढऩे लगे। पांडव चलते-चलते लालसागर तक आ गए।
अर्जुन ने लोभ वश अपना गांडीव धनुष व अक्षय तरकशों का त्याग नहीं किया था। तभी वहां अग्निदेव उपस्थित हुए और उन्होंने अर्जुन से गांडीव धनुष और अक्षय तरकशों का त्याग करने के लिए कहा। अर्जुन ने ऐसा ही किया। पांडवों ने पृथ्वी की परिक्रमा पूरी करने की इच्छा से उत्तर दिशा की ओर यात्रा की।
यात्रा करते-करते पांडव हिमालय तक पहुंच गए। हिमालय लांघ कर पांडव आगे बढ़े तो उन्हें बालू का समुद्र दिखाई पड़ा। इसके बाद उन्होंने सुमेरु पर्वत के दर्शन किए। पांचों पांडव, द्रौपदी तथा वह कुत्ता तेजी से आगे चलने लगे। तभी द्रौपदी लडखड़़ाकर गिर पड़ी।
द्रौपदी को गिरा देख भीम ने युधिष्ठिर से कहा कि- द्रौपदी ने कभी कोई पाप नहीं किया। तो फिर क्या कारण है कि वह नीचे गिर पड़ी। युधिष्ठिर ने कहा कि- द्रौपदी हम सभी में अर्जुन को अधिक प्रेम करती थीं। इसलिए उसके साथ ऐसा हुआ है। ऐसा कहकर युधिष्ठिर द्रौपदी को देखे बिना ही आगे बढ़ गए। थोड़ी देर बाद सहदेव भी गिर पड़े।
भीमसेन ने सहदेव के गिरने का कारण पूछा तो युधिष्ठिर ने बताया कि सहदेव किसी को अपने जैसा विद्वान नहीं समझता था, इसी दोष के कारण इसे आज गिरना पड़ा है। कुछ देर बाद नकुल भी गिर पड़े। भीम के पूछने पर युधिष्ठिर ने बताया कि नकुल को अपने रूप पर बहुत अभिमान था। इसलिए आज इसकी यह गति हुई है।
थोड़ी देर बाद अर्जुन भी गिर पड़े। युधिष्ठिर ने भीमसेन को बताया कि अर्जुन को अपने पराक्रम पर अभिमान था। अर्जुन ने कहा था कि मैं एक ही दिन में शत्रुओं का नाश कर दूंगा, लेकिन ऐसा कर नहीं पाए। अपने अभिमान के कारण ही अर्जुन की आज यह हालत हुई है। ऐसा कहकर युधिष्ठिर आगे बढ़ गए।
थोड़ी आगे चलने पर भीम भी गिर गए। जब भीम ने युधिष्ठिर से इसका कारण तो उन्होंने बताया कि तुम खाते बहुत थे और अपने बल का झूठा प्रदर्शन करते थे। इसलिए तुम्हें आज भूमि पर गिरना पड़ा है। यह कहकर युधिष्ठिर आगे चल दिए। केवल वह कुत्ता ही उनके साथ चलता रहा।
युधिष्ठिर कुछ ही दूर चले थे कि उन्हें स्वर्ग ले जाने के लिए स्वयं देवराज इंद्र अपना रथ लेकर आ गए। तब युधिष्ठिर ने इंद्र से कहा कि- मेरे भाई और द्रौपदी मार्ग में ही गिर पड़े हैं। वे भी हमारे साथ चलें, ऐसी व्यवस्था कीजिए। तब इंद्र ने कहा कि वे सभी पहले ही स्वर्ग पहुंच चुके हैं। वे शरीर त्याग कर स्वर्ग पहुंचे हैं और आप सशरीर स्वर्ग में जाएंगे।
इंद्र की बात सुनकर युधिष्ठिर ने कहा कि यह कुत्ता मेरा परमभक्त है। इसलिए इसे भी मेरे साथ स्वर्ग जाने की आज्ञा दीजिए, लेकिन इंद्र ने ऐसा करने से मना कर दिया। काफी देर समझाने पर भी जब युधिष्ठिर बिना कुत्ते के स्वर्ग जाने के लिए नहीं माने तो कुत्ते के रूप में यमराज अपने वास्तविक स्वरूप में आ गए (वह कुत्ता वास्तव में यमराज ही थे)। युधिष्ठिर को अपने धर्म में स्थित देखकर यमराज बहुत प्रसन्न हुए। इसके बाद देवराज इंद्र युधिष्ठिर को अपने रथ में बैठाकर स्वर्ग ले गए।
स्वर्ग जाकर युधिष्ठिर ने देखा कि वहां दुर्योधन एक दिव्य सिंहासन पर बैठा है, अन्य कोई वहां नहीं है। यह देखकर युधिष्ठिर ने देवताओं से कहा कि मेरे भाई तथा द्रौपदी जिस लोक में गए हैं, मैं भी उसी लोक में जाना चाहता हूं। मुझे उनसे अधिक उत्तम लोक की कामना नहीं है। तब देवताओं ने कहा कि यदि आपकी ऐसी ही इच्छा है तो आप इस देवदूत के साथ चले जाइए। यह आपको आपके भाइयों के पास पहुंचा देगा। युधिष्ठिर उस देवदूत के साथ चले गए। देवदूत युधिष्ठिर को ऐसे मार्ग पर ले गया, जो बहुत खराब था।
उस मार्ग पर घोर अंधकार था। उसके चारों ओर से बदबू आ रही थी, इधर-उधर मुर्दे दिखाई दे रहे थे। लोहे की चोंच वाले कौए और गीध मंडरा रहे थे। वह असिपत्र नामक नरक था। वहां की दुर्गंध से तंग आकर युधिष्ठिर ने देवदूत से पूछा कि हमें इस मार्ग पर और कितनी दूर चलना है और मेरे भाई कहां हैं? युधिष्ठिर की बात सुनकर देवदूत बोला कि देवताओं ने कहा था कि जब आप थक जाएं तो आपको लौटा लाऊ। यदि आप थक गए हों तो हम पुन: लौट चलते हैं। युधिष्ठिर ने ऐसा ही करने का निश्चय किया।
जब युधिष्ठिर वापस लौटने लगे तो उन्हें दुखी लोगों की आवाज सुनाई दी, वे युधिष्ठिर से कुछ देर वहीं रुकने के लिए कह रहे थे। युधिष्ठिर ने जब उनसे उनका परिचय पूछा तो उन्होंने कर्ण, भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव व द्रौपदी के रूप में अपना परिचय दिया। तब युधिष्ठिर ने उस देवदूत से कहा कि तुम पुन: देवताओं के पास लौट जाओ, मेरे यहां रहने से यदि मेरे भाइयों को सुख मिलता है तो मैं इस दुर्गम स्थान पर ही रहूंगा। देवदूत ने यह बात जाकर देवराज इंद्र को बता दी।
युधिष्ठिर को उस स्थान पर अभी कुछ ही समय बीता था कि सभी देवता वहां आ गए। देवताओं के आते ही वहां सुगंधित हवा चलने लगी, मार्ग पर प्रकाश छा गया। तब देवराज इंद्र ने युधिष्ठिर को बताया कि तुमने अश्वत्थामा के मरने की बात कहकर छल से द्रोणाचार्य को उनके पुत्र की मृत्यु का विश्वास दिलाया था। इसी के परिणाम स्वरूप तुम्हें भी छल से ही कुछ देर नरक के दर्शन पड़े। अब तुम मेरे साथ स्वर्ग चलो। वहां तुम्हारे भाई व अन्य वीर पहले ही पहुंच गए हैं।
देवराज इंद्र के कहने पर युधिष्ठिर ने देवनदी गंगा में स्नान किया। स्नान करते ही उन्होंने मानव शरीर त्याग करके दिव्य शरीर धारण कर लिया। इसके बाद बहुत से महर्षि उनकी स्तुति करते हुए उन्हें उस स्थान पर ले गए जहां उनके चारों भाई, कर्ण, भीष्म, धृतराष्ट्र, द्रौपदी आदि आनंदपूर्वक विराजमान थे (वह भगवान का परमधाम था)। युधिष्ठिर ने वहां भगवान श्रीकृष्ण के दर्शन किए। अर्जुन उनकी सेवा कर रहे थे। युधिष्ठिर को आया देख श्रीकृष्ण व अर्जुन ने उनका स्वागत किया।
युधिष्ठिर ने देखा कि भीम पहले की तरह शरीर धारण किए वायु देवता के पास बैठे थे। कर्ण को सूर्य के समान स्वरूप धारण किए बैठे देखा। नकुल व सहदेव अश्विनी कुमारों के साथ बैठे थे। देवराज इंद्र ने युधिष्ठिर को बताया कि ये जो साक्षात भगवती लक्ष्मी दिखाई दे रही हैं। इनके अंश से ही द्रौपदी का जन्म हुआ था। इसके बाद इंद्र ने महाभारत युद्ध में मारे गए सभी वीरों के बारे में युधिष्ठिर को विस्तार पूर्वक बताया। इस प्रकार युधिष्ठिर अपने भाइयों व अन्य संबंधियों को वहां देखकर बहुत प्रसन्न हुए।

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यह संसार क्या है?


यह संसार क्या है? एक दिन एक शिष्य ने गुरु से पूछा, ‘गुरुदेव,आपकी दृष्टि में यह संसार क्या है? ✅ इस पर गुरु ने एक कथा सुनाई। ‘एक नगर में एक शीशमहल था। महल की हरेक दीवार पर सैकड़ों शीशे जडे़ हुए थे। एक दिन एक गुस्सैल कुत्ता महल में घुस गया। महल के भीतर उसे सैकड़ों कुत्ते दिखे, जो नाराज और दुखी लग रहे थे। उन्हें देखकर वह उन पर भौंकने लगा। उसे सैकड़ों कुत्ते अपने ऊपर भौंकते दिखने लगे। वह डरकर वहां से भाग गया कुछ दूर जाकर उसने मन ही मन सोचा कि इससे बुरी कोई जगह नहीं हो सकती। कुछ दिनों बाद एक अन्य कुत्ता शीशमहल पहुंचा। वह खुशमिजाज और जिंदादिल था। महल में घुसते ही उसे वहां सैकड़ों कुत्ते दुम हिलाकर स्वागत करते दिखे। उसका आत्मविश्वास बढ़ा और उसने खुश होकर सामने देखा तो उसे सैकड़ों कुत्ते खुशी जताते हुए नजर आए। उसकी खुशी का ठिकाना न रहा। जब वह महल से बाहर आया तो उसने महल को दुनिया का सर्वश्रेष्ठ स्थान और वहां के अनुभव को अपने जीवन का सबसे बढ़िया अनुभव माना। वहां फिर से आने के संकल्प के साथ वह वहां से रवाना हुआ।’ कथा समाप्त कर गुरु ने शिष्य से कहा.. ‘संसार भी ऐसा ही शीशमहल है जिसमें व्यक्ति अपने विचारों के अनुरूप ही प्रतिक्रिया पाता है। जो लोग संसार को आनंद का बाजार मानते हैं, वे यहां से हर प्रकार के सुख और आनंद के अनुभव लेकर जाते हैं। जो लोग इसे दुखों का कारागार समझते हैं उनकी झोली में दुख और कटुता के सिवाय कुछ नहीं बचता।’

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तीन मछलियां–


तीन मछलियां—-

एक बड़ा जलाशय था। जलाशय में पानी गहरा होता है, इसलिए उसमें काई तथा मछलियों का प्रिय भोजन जलीय सूक्ष्म पौधे उगते हैं। ऐसे स्थान मछलियों को बहुत रास आते हैं। उस जलाशय में भी बहुत-सी मछलियां आकर रहती थी। अंडे देने के लिए तो सभी मछलियां उस जलाशय में आती थी। वह जलाशय आसानी से नजर नहीं आता था।
उसी में तीन मछलियों का झुंड रहता था। उनके स्वभाव भिन्न थे। पिया नामक मछली संकट आने के लक्षण मिलते ही संकट टालने का उपाय करने में विश्वास रखती थी। रिया कहती थी कि संकट आने पर ही उससे बचने का यत्न करो। चिया का सोचना था कि संकट को टालने या उससे बचने की बात बेकार हैं करने कराने से कुछ नहीं होता जो किस्मत में लिखा है, वह होकर रहेगा।

एक दिन शाम को मछुआरे नदी में मछलियां पकड़ कर घर जा रहे थे। बहुत कम मछलियां उनके जालों में फंसी थी। अतः उनके चेहरे उदास थे। तभी उन्हें झाडियों के ऊपर मछलीखोर पक्षियों का झुंड जाता दिखाई दिया। सबकी चोंच में मछलियां दबी थी। वे चौंके।

एक ने अनुमान लगाया दोस्तों! लगता हैं झाडियों के पीछे नदी से जुड़ा जलाशय हैं, जहां इतनी सारी मछलियां पल रही हैं।

मछुआरे पुलकित होकर झाडियों में से होकर जलाशय के तट पर आ निकले और ललचाई नजर से मछलियों को देखने लगे।

एक मछुआरा बोला अहा! इस जलाशय में तो मछलियां भरी पड़ी हैं। आज तक हमें इसका पता ही नहीं लगा।

यहां हमें ढेर सारी मछलियां मिलेंगी। दूसरा बोला।

तीसरे ने कहा आज तो शाम घिरने वाली हैं। कल सुबह ही आकर यहां जाल डालेंगे।

इस प्रकार मछुआरे दूसरे दिन का कार्यक्रम तय करके चले गए। तीनों मछलियों ने मछुआरे की बात सुन ली थी।

पिया मछली ने कहा साथियों! तुमने मछुआरे की बात सुन ली। अब हमारा यहां रहना खतरे से खाली नहीं हैं। खतरे की सूचना हमें मिल गई हैं। समय रहते अपनी जान बचाने का उपाय करना चाहिए। मैं तो अभी ही इस जलाशय को छोडकर नहर के रास्ते नदी में जा रही हूं। उसके बाद मछुआरे सुबह आएं, जाल फेंके, मेरी बला से। तब तक मैं तो बहुत दूर अठखेलियां कर रही होऊंगी।

रिया मछली बोली तुम्हें जाना हैं तो जाओ, मैं तो नहीं आ रही। अभी खतरा आया कहां हैं, जो इतना घबराने की जरुरत हैं। हो सकता है संकट आए ही न। उन मछुआरों का यहां आने का कार्यक्रम रद्द हो सकता है, हो सकता हैं रात को उनके जाल चूहे कुतर जाएं, हो सकता है, उनकी बस्ती में आग लग जाए। भूचाल आकर उनके गांव को नष्ट कर सकता हैं या रात को मूसलाधार वर्षा आ सकती हैं और बाढ़ में उनका गांव बह सकता है। इसलिए उनका आना निश्चित नहीं है। जब वह आएंगे, तब की तब सोचेंगे। हो सकता है मैं उनके जाल में ही न फंसूं।

चिया ने भाग्यवादी बात कही भागने से कुछ नहीं होने का। मछुआरों को आना है तो वह आएंगे। हमें जाल में फंसना है तो हम फंसेंगे। किस्मत में मरना ही लिखा है तो क्या किया जा सकता है?

इस प्रकार पिया तो उसी समय वहां से चली गई। रिया और चिया जलाशय में ही रही। भोर हुई तो मछुआरे अपने जाल को लेकर आए और लगे जलाशय में जाल फेंकने और मछलियां पकड़ने। रिया ने संकट को आए देखा तो लगी जान बचाने के उपाय सोचने। उसका दिमाग तेजी से काम करने लगा। आस-पास छिपने के लिए कोई खोखली जगह भी नहीं थी। तभी उसे याद आया कि उस जलाशय में काफी दिनों से एक मरे हुए ऊदबिलाव की लाश तैरती रही हैं। वह उसके बचाव के काम आ सकती है।

जल्दी ही उसे वह लाश मिल गई। लाश सड़ने लगी थी। रिया लाश के पेट में घुस गई और सड़ती लाश की सड़ाध अपने ऊपर लपेटकर बाहर निकली। कुछ ही देर में मछुआरे के जाल में रिया फंस गई। मछुआरे ने अपना जाल खींचा और मछलियों को किनारे पर जाल से उलट दिया। बाकी मछलियां तो तड़पने लगीं, परन्तु रिया दम साधकर मरी हुई मछली की तरह पड़ी रही। मछुआरे को सडांध का भभका लगा तो मछलियों को देखने लगा। उसने निर्जीव पड़ी रिया को उठाया और सूंघा आक! यह तो कई दिनों की मरी मछली हैं। सड़ चुकी है। ऐसे बड़बड़ाकर बुरा-सा मुंह बनाकर उस मछुआरे ने रिया को जलाशय में फेंक दिया।

रिया अपनी बुद्धि का प्रयोग कर संकट से बच निकलने में सफल हो गई थी। पानी में गिरते ही उसने गोता लगाया और सुरक्षित गहराई में पहुंचकर जान की खैर मनाई।

चिया भी दूसरे मछुआरे के जाल में फंस गई थी और एक टोकरे में डाल दी गई थी। भाग्य के भरोसे बैठी रहने वाली चिया ने उसी टोकरी में अन्य मछलियों की तरह तड़प-तड़पकर प्राण त्याग दिए।

सीखः भाग्य के भरोसे हाथ पर हाथ धरकर बैठे रहने वाले का विनाश निश्चित है। पिया की तरह संकट का संकेत मिलते ही उपाय सोचना सबसे उत्तम है, रिया की तरह संकट आने पर दिमाग लगाना भी उचित हो सकता है लेकिन चिया की तरह भाग्य के भरोसे रहना सबसे खतरनाक है।

विकास खुराना's photo.
विकास खुराना's photo.
Posted in भारत गौरव - Mera Bharat Mahan

ANCIENT HINDUS MEASURE TIME


JEWELS OF BHARATAM ….SERIES [TM]

Q. HOW DID ANCIENT HINDUS MEASURE TIME IN DAYS OF NO SUNLIGHT ?

A. GHATIKA YANTRA ……..Time Measurement Hindu Way !!!

How do u tell the time …..A stick in the ground and look a the ground other wise we can have a sun dial, But the point is the sunlight is on a sunny day , but completely use less on a cloudy day. What Indians decided to do is to try and make a different source of clock , that is a Water clock called as Ghatika Yantra.

The description of a water clock in astrologer Varahimira’s Pancasiddhantika (505) adds further detail to the account given in the Suryasiddhanta. The description given by mathematician Brahmaguptha in his work Brahmasphutasiddhanta matches with that given in the Suryasiddhanta. Astronomer Lallacharya describes this instrument in detail. In practice, the dimensions were determined by experiment.

During ancient and medieval times time was measured in India by a water clock called Ghatika. Indians had divided day and night into 60 parts, each of which is called a ghari. Moreover the night and day are each divided into four parts each of which is called pahar. In all important towns, a group of men called ghariyalis were appointed to measure time. To measure time a vessel with a hole at the bottom was place over another big vessel containing water. When the vessel with the hole was filled with water, they used to strike the ghariyal, a thick brass disc hung at a high place with a mallet. This indicated a certain period of time. I Tsing, the Chinese traveler who visited India during the 7th century A.D had given an account of how this clepsydra (water clock) worked at Nalanda. Commencing from the morning at the first immersion of the vessel, one stroke of a drum was sounded, at the 2nd immersion, two strokes, at the 3rd immersion, three strokes and at the 4th immersion, two blasts of a conch-shell and one more beat of a drum were added to the announcement. This period was called the first hour, when the sun was in the east between the zenith and the horizon. When the 2nd turn of the 4th immersion of the vessel was over, four strokes of the drum were struck, a conch blown and two more strokes sounded. This time known as the 2nd hour was previously the horse hour of the beginning of the noon. Similarly two hours were sounded in the afternoon and four in the course of the night also.

JEWELS OF BHARATAM ....SERIES [TM]

Q. HOW DID ANCIENT HINDUS MEASURE TIME IN DAYS OF NO SUNLIGHT ?

A. GHATIKA YANTRA ........Time Measurement Hindu Way !!!

How do u tell the time .....A  stick in the ground and look a the ground other wise we can have a sun dial, But the point is the sunlight is on a sunny day , but completely use less on a cloudy day. What Indians decided to do is to try and make a different source of clock , that is a Water clock called as Ghatika Yantra.

The description of a water clock in astrologer Varahimira’s Pancasiddhantika (505) adds further detail to the account given in the Suryasiddhanta. The description given by mathematician Brahmaguptha in his work Brahmasphutasiddhanta matches with that given in the Suryasiddhanta. Astronomer Lallacharya describes this instrument in detail. In practice, the dimensions were determined by experiment. 

During ancient and medieval times time was measured in India by a water clock called Ghatika. Indians had divided day and night into 60 parts, each of which is called a ghari. Moreover the night and day are each divided into four parts each of which is called pahar. In all important towns, a group of men called ghariyalis were appointed to measure time. To measure time a vessel with a hole at the bottom was place over another big vessel containing water. When the vessel with the hole was filled with water, they used to strike the ghariyal, a thick brass disc hung at a high place with a mallet. This indicated a certain period of time. I Tsing, the Chinese traveler who visited India during the 7th century A.D had given an account of how this clepsydra (water clock) worked at Nalanda. Commencing from the morning at the first immersion of the vessel, one stroke of a drum was sounded, at the 2nd immersion, two strokes, at the 3rd immersion, three strokes and at the 4th immersion, two blasts of a conch-shell and one more beat of a drum were added to the announcement. This period was called the first hour, when the sun was in the east between the zenith and the horizon. When the 2nd turn of the 4th immersion of the vessel was over, four strokes of the drum were struck, a conch blown and two more strokes sounded. This time known as the 2nd hour was previously the horse hour of the beginning of the noon. Similarly two hours were sounded in the afternoon and four in the course of the night also.

It works on very simple mechanism it consists of a copper cup with a small hole at its bottom in large water bowl/tank, and every time the cup sank a gong was sounded. When it sinks in and touches the bottom , that’s fixed time probably around 30 minutes( depends on the materials made and their sizes).
Posted in भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas

List of Indian warriors


List of Indian warriors

From Wikipedia, the free encyclopedia

This is a list of Indian warriors (both legendary and historical figures).

Ancient warriors[edit]

Surya Vanshi[edit]

Chandra Vanshi[edit]

Mahabharat War[edit]

dated to approximation by Archaeological Survey of India based on relics found at Kurukshetra

600 BC – 1 AD[edit]

Maurya Empire[edit]

Medieval warriors[edit]

Chalukya Dynasty[edit]

Chola Empire[edit]

Rashtrakuta Dynasty[edit]

Vijayanagara Empire[edit]

Brahmins(Tyagi and Bhumihaar)[edit]

Solanki Warriors[edit]

Rajput Warriors[edit]

  • Alha, A warrior from Chandela clan of Rajput
  • Udhal,Chandela warrior and younger brother of Alha.
  • Bappa Rawal led the army that defeated the Arabs in the Battle of Rajasthan
  • Prithviraj Chauhan, a Rajput king of medieval India. He conquered Rajasthan, Punjab, Delhi and parts of Gujarat. He was killed at ghor by his own friend Chand bardai as Prithvi didn’t want to die through anybody else’s weapon from Ghor.
  • Rao Jodha, a Rajput king of Mandore who defeated the Afghan forces in Rajasthan and built the city of Jodhpur proclaiming himself as the ruler of Marwar.
  • Gurdan Saini, a noted Rajput General and martyr of medieval India. Led the army of Rana Hamir.a Rajput warrior
  • Rana Sanga,a ruler from Sisodia clan of Rajput.He United the Rajputs and defeated sultans of Malwa, Gujarat and Delhi. He also led the Rajput armies against Babur in theBattle of Khanwa.
  • Rawat Chundawat
  • Jaimal and Patta, The Generals who defended Chittorgarh Fort against Akbar in the Siege of Chittorgarh. Patta was also known as the hero of Bijolia for defending the village against Afghan forces.
  • Rana Kumbha a Rajput King who never lost a war. He was respected by his enemies and is also known to have built 32 forts in Mewar.
  • Raj Rana Bahadur,Raj Rana Bahadur was Prominent Rajput warrior in Mewar history , he used to fight for cause of Mewar and been very victorious in each battle he fought . he was one of the bravest warrior and key soldier which every king might want to have. Rajrana Bahadur was also compared to Rana Sanga in Fighting and valour , even he got many scars and wounds from battles he fought but wounds never let him stop in defending Mewar.
  • Jhala Maansinh-: Jhala Maansinh is an outstanding dazzling example of extraordinary valour, bravery and sacrifice who shrouded with the glory of struggle for freedom. In the battle of Haldi Ghati in 1576, Jhala Maan decorated himself with the Crown and the royal emblem from Pratap and started fighting valiantly.He was killed by mughals who thought that he was Maharana Pratap.

Jhala Maan has set a unique example of bravery and courage by sacrificing his life to save the life of Pratap for his country.

Jhala Maan belongs to Bari Sadri, which also have Jhala Maan circle and bus stand on his name.

  • Raja Poonja-The Bhil warriors in the battle of Haldi Ghati, participated under the leadership of Rana Poonja. The enthusiastic Bhils worked as secret informers and running messengers In Mewar state the history of Guhil clan is full of daring deeds, the contribution of Bhil community is unforgettable. At the time of Ghuhaditya’s coronation the “Tilak ceremony was performed by the blood flowing from the thumb of Mandleek -a “Bhil” Sardar. “

Due of this, royal emblem of Mewar State carries a Victory Tower which is flanked by a Rajput warrior on one side and ” a bow -arrow-bearing Bhil”, on the other.

Maratha warriors[edit]

Muslim Warriors[edit]

  • Hyder Ali, Princly ruler of Mysore
  • Tipu Sultan,Known as Tiger of Mysore was Eldest son of Hyder Ali and biggest threat of British Empire. Famous for Invention of War Rocket first time in the world.
  • Ibrahim Khan Gardi-Commander of Maratha artillary units in 3rd battle of Panipat

He was one of the most skilled person in cannon fighting in 17th century.

  • Hakim Khan Sur-Commander of Maharana Pratap’s artillary unit against Mughals.Fought even in battle of Hadighati.
  • AkbarThe Mughal Emperor

Sikh warriors[edit]

Tamil warriors[edit]

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Lists of rulers of India


Lists of rulers of India

From Wikipedia, the free encyclopedia

This is a list of rulers and office-holders of India.

Heads of India[edit]

Heads of government[edit]

Heads of former states[edit]

The distinction between Empire and Kingdom here is arbitrary. Many of the kingdoms which began as such expanded to become empires or some empires broke down into smaller kingdoms. As an example, Maratha Empire grew from a small kingdom established by Shivaji into a powerful empire in eighteenth century while the later Mughal Emperors became powerless entities.

Empires[edit]

Kingdoms[edit]

Hellenistic India[edit]