Posted in AAP, राजनीति भारत की - Rajniti Bharat ki

हे अन्ना एक और अनशन कर दो, अबकी मैं भी आऊंगा !!


हे अन्ना एक और अनशन कर दो, अबकी मैं
भी आऊंगा !!
चढ़ कंधे पर तेरे मैं भी, पार्टी नई बनाऊंगा !
खाँस – खाँस कर इस जनता से ढेरों वोटें पाउँगा !
दे गाली कांग्रेस – भाजपा को, सीएम मैं बन जाऊंगा !
साथ छोड़ते मेरे साथी, उनको सबसे ” भ्रष्ट ” बताऊंगा !
हे अन्ना एक और अनशन कर दो, अबकी मैं
भी आऊंगा !!
******************
खुद का तो मुझे पता नहीं, पर सब पर
ऊँगली उठाऊंगा !
झूठ बोलकर दिल्ली की जनता को, हर पल बुद्धू
बनाऊंगा !
कौन बेईमान – किसमें है इमां, यह सब मैं ही बताऊंगा !
आये शरण में जो भी मेरी, उसे ”
हरीशचंद्र ” बतलाऊंगा !
हे अन्ना एक और अनशन कर दो, अबकी मैं
भी आऊंगा !!
******************
नित्य करूँ कुछ ऐसा ” ड्रामा ” मैं ” नौटंकी ” कहलाऊंगा !
कभी सड़क – कभी सचिवालय, बिछा ”
दरी ” सो जाऊंगा !
संविधान की क्या ” मर्यादा ” मैं ” अराजकता ”
फैलाऊँगा !
कैसी शपथ और कैसा कानून, स्वयं ” चुनौती ” बन
जाऊंगा !
हे अन्ना एक और अनशन कर दो, अबकी मैं
भी आऊंगा !!
******************
नहीं पहननी मुझको ” खादी “, इमेज
गढूंगा सीधी – सादी !
पहन के स्वेटर – ओढ़ के ” मफलर “, आम – आदमी बन
जाऊंगा !
कभी झोंपड़ी – कभी गली में,
फोटो खूब खिचाऊंगा !
पब्लिसिटी मुझे चाहिए , नित नई कहानी सुनाऊंगा !
हे अन्ना एक और अनशन कर दो, अबकी मैं
भी आऊंगा !!
******************
ना कोई जादू – ना कोई जंत्री, नाम मिला मुझे ”
धरना मंत्री ” !
जलवा मेरा होगा ऐसा, घूमें पीछे मंत्री –
संत्री !
पूँछ पकड़ कर ” जन लोकपाल ” की, संसद मैं
भी जाऊंगा !
” अन्ना ” मेरी बात सुनो, धरना छोडो ” गद्दी ” चुनो !
” राजनीति ” की पहन
ली टोपी, अब सबको पहनाऊंगा !
हे अन्ना एक और अनशन कर दो, अबकी मैं
भी आऊंगा !!
******************
सर पर टोपी – हाथ में झाड़ू, नेता हूँ मैं सबसे ” ताड़ू ” !
ताड़ के मौका – सबसे पहले, तीसरे मोर्चे में जाऊंगा !
” ड्रामे ” की पटकथा भी सुन लो, जनता दरबार
लगाउँगा !
अगर जबाव न दे पाया, फिर भाग के ” छत ” चढ़
जाऊंगा !
हे अन्ना एक और अनशन कर दो, अबकी मैं
भी आऊंगा !!
******************
चप्पल – जूते – थप्पड़ – स्याही, कुछ मत फेंको मेरे भाई !
एक बार फिर दे दो ” मांफी “, अब ” कुर्सी ” गले
लगाउँगा !
विधानसभा को भंग कर दो, ये आरोप ” कमल ” पे धर दो !
” जनता ” तो ” मन ” बना चुकी है, ऐसा ” सर्वे ”
कराऊंगा !
हे अन्ना एक और अनशन कर दो, अबकी मैं
भी आऊंगा !!
******************
दिल्ली अब भी मुझको चाहती, रोज
हजारों मिलती ”
पाती ” !
” अफवाहें ” ऐसी फैला दो, ” 36 ” सीटें
दिल्ली में
पाउँगा !
चुनाव बाद कुछ कमी जो रह गई, ” कमल ” लहर में
जनता बह गई !
” बच्चों ” की मैं कसम हूँ खाता, फिर ” हाथ ” से ” हाथ
” मिलाऊंगा !
हे अन्ना एक और अनशन कर दो, अबकी मैं
भी आऊंगा f

— with Prem Sharma and 6 others.

हे अन्ना एक और अनशन कर दो, अबकी मैं
भी आऊंगा !!
चढ़ कंधे पर तेरे मैं भी, पार्टी नई बनाऊंगा !
खाँस - खाँस कर इस जनता से ढेरों वोटें पाउँगा !
दे गाली कांग्रेस - भाजपा को, सीएम मैं बन जाऊंगा !
साथ छोड़ते मेरे साथी, उनको सबसे " भ्रष्ट " बताऊंगा !
हे अन्ना एक और अनशन कर दो, अबकी मैं
भी आऊंगा !!
******************
खुद का तो मुझे पता नहीं, पर सब पर
ऊँगली उठाऊंगा !
झूठ बोलकर दिल्ली की जनता को, हर पल बुद्धू
बनाऊंगा !
कौन बेईमान - किसमें है इमां, यह सब मैं ही बताऊंगा !
आये शरण में जो भी मेरी, उसे "
हरीशचंद्र " बतलाऊंगा !
हे अन्ना एक और अनशन कर दो, अबकी मैं
भी आऊंगा !!
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नित्य करूँ कुछ ऐसा " ड्रामा " मैं " नौटंकी " कहलाऊंगा !
कभी सड़क - कभी सचिवालय, बिछा "
दरी " सो जाऊंगा !
संविधान की क्या " मर्यादा " मैं " अराजकता "
फैलाऊँगा !
कैसी शपथ और कैसा कानून, स्वयं " चुनौती " बन
जाऊंगा !
हे अन्ना एक और अनशन कर दो, अबकी मैं
भी आऊंगा !!
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नहीं पहननी मुझको " खादी ", इमेज
गढूंगा सीधी – सादी !
पहन के स्वेटर - ओढ़ के " मफलर ", आम – आदमी बन
जाऊंगा !
कभी झोंपड़ी - कभी गली में,
फोटो खूब खिचाऊंगा !
पब्लिसिटी मुझे चाहिए , नित नई कहानी सुनाऊंगा !
हे अन्ना एक और अनशन कर दो, अबकी मैं
भी आऊंगा !!
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ना कोई जादू - ना कोई जंत्री, नाम मिला मुझे "
धरना मंत्री " !
जलवा मेरा होगा ऐसा, घूमें पीछे मंत्री -
संत्री !
पूँछ पकड़ कर " जन लोकपाल " की, संसद मैं
भी जाऊंगा !
" अन्ना " मेरी बात सुनो, धरना छोडो " गद्दी " चुनो !
" राजनीति " की पहन
ली टोपी, अब सबको पहनाऊंगा !
हे अन्ना एक और अनशन कर दो, अबकी मैं
भी आऊंगा !!
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सर पर टोपी - हाथ में झाड़ू, नेता हूँ मैं सबसे " ताड़ू " !
ताड़ के मौका - सबसे पहले, तीसरे मोर्चे में जाऊंगा !
" ड्रामे " की पटकथा भी सुन लो, जनता दरबार
लगाउँगा !
अगर जबाव न दे पाया, फिर भाग के " छत " चढ़
जाऊंगा !
हे अन्ना एक और अनशन कर दो, अबकी मैं
भी आऊंगा !!
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चप्पल - जूते - थप्पड़ – स्याही, कुछ मत फेंको मेरे भाई !
एक बार फिर दे दो " मांफी ", अब " कुर्सी " गले
लगाउँगा !
विधानसभा को भंग कर दो, ये आरोप " कमल " पे धर दो !
" जनता " तो " मन " बना चुकी है, ऐसा " सर्वे "
कराऊंगा !
हे अन्ना एक और अनशन कर दो, अबकी मैं
भी आऊंगा !!
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दिल्ली अब भी मुझको चाहती, रोज
हजारों मिलती "
पाती " !
" अफवाहें " ऐसी फैला दो, " 36 " सीटें
दिल्ली में
पाउँगा !
चुनाव बाद कुछ कमी जो रह गई, " कमल " लहर में
जनता बह गई !
" बच्चों " की मैं कसम हूँ खाता, फिर " हाथ " से " हाथ
" मिलाऊंगा !
हे अन्ना एक और अनशन कर दो, अबकी मैं
भी आऊंगा f
Posted in रामायण - Ramayan

Various proposals for date of Rama Janma:


Various proposals for date of Rama Janma:
1- weber: 3-4’th cent a.d
2- gonda: 4’th cent BC
3- guruge:- before 3’rd cent BC
4- bulcke: end of 4’th cent BC
5- Jacobi, keith,mcdonnell: 500 BC
6- h.s.sankalia: between 1500-1000 BC
7- yardi: 1200 BC
8- peoples those who believe MB war happened in 3137 BC: 3800 BC
9- A Bhatnagar,S Bala: 10 jan 5114 BC
10- Dr P V Vartak: 4 dec 7323 BC
11- Dr S Sabharthnam,N Ramadurai,Sundaresh: 17 jan 10205 BC

Posted in भारत गौरव - Mera Bharat Mahan

!! नौका शास्त्र !!


!! नौका शास्त्र !!

समुद्र यात्रा भारतवर्ष में प्राचीन काल से प्रचलित रही है। महर्षि अगस्त्य समुद्री द्वीप-द्वीपान्तरों की यात्रा करने वाले महापुरुष थे। इसी कारण अगस्त्य ने समुद्र को पी डाला, यह कथा प्रचलित हुई होगी।
संस्कृति के प्रचार के निमित्त या नए स्थानों पर व्यापार के निमित्त दुनिया के देशों में भारतीयों का आना-जाना था।

कौण्डिन्य समुद्र पार कर दक्षिण पूर्व एशिया पहुंचे।
मैक्सिको के यूकाटान प्रांत में जवातुको नामक स्थान पर प्राप्त सूर्य मंदिर के शिलालेख में महानाविक वुसुलिन के शक संवत्‌ ८८५ में पहुंचने का उल्लेख मिलता है।

गुजरात के लोथल में हुई खुदाई में ध्यान में आता है कि ई. पूर्व २४५० के आस-पास बने बंदरगाह द्वारा इजिप्त के साथ सीधा सामुद्रिक व्यापार होता था। २४५० ई.पू. से २३५० ई.पू. तक छोटी नावें इस बंदरगाह पर आती थीं। बाद में बड़े जहाजों के लिए आवश्यक रचनाएं खड़ी की गएं तथा नगर रचना भी हुई।प्राचीन काल से अर्वाचीन काल तक के नौ निर्माण कला का उल्लेख प्रख्यात बौद्ध संशोधक भिक्षु चमनलाल ने अपनी पुस्तक ‘हिन्दू अमेरिका‘ में किया है। इसी प्रकार सन्‌ १९५० में कल्याण के हिन्दू संस्कृति अंक में गंगा शंकर मिश्र ने भी विस्तार से इस इतिहास को लिखा है।

भारतवर्ष के प्राचीन वाङ्गमय वेद, रामायण, महाभारत, पुराण आदि में जहाजों का उल्लेख आता है। जैसे बाल्मीकि रामायण के अयोध्या कांड में ऐसी बड़ी नावों का उल्लेख आता है जिसमें सैकड़ों योद्धा सवार रहते थे।

नावां शतानां पञ्चानांकैवर्तानां शतं शतम।सन्नद्धानां तथा यूनान्तिष्ठक्त्वत्यभ्यचोदयत्‌॥

अर्थात्‌-सैकड़ों सन्नद्ध जवानों से भरी पांच सौ नावों को सैकड़ों धीवर प्रेरित करते हैं।

इसी प्रकार महाभारत में यंत्र-चालित नाव का वर्णन मिलता है।

सर्ववातसहां नावं यंत्रयुक्तां पताकिनीम्‌।

अर्थात्‌-यंत्र पताका युक्त नाव, जो सभी प्रकार की हवाओं को सहने वाली है।

कौटिलीय अर्थशास्त्र में राज्य की ओर से नावों के पूरे प्रबंध के संदर्भ में जानकारी मिलती है।
५वीं सदी में हुए वारहमिहिर कृत ‘बृहत्‌ संहिता‘ तथा ११वीं सदी के राजा भोज कृत ‘युक्ति कल्पतरु‘ में जहाज निर्माण पर प्रकाश डाला गया है।नौका विशेषज्ञ भोज चेतावनी देते हैं कि नौका में लोहे का प्रयोग न किया जाए, क्योंकि संभव है समुद्री चट्टानों में कहीं चुम्बकीय शक्ति हो। तब वह उसे अपनी ओर खींचेगी, जिससे जहाज को खतरा हो सकता है।नौकाओं के प्रकार- ‘हिन्दू अमेरिका‘ (पृ.३५७) के अनुसार ‘युक्ति कल्पतरु‘ ग्रंथ में नौका शास्त्र का विस्तार से वर्णन है। नौकाओं के प्रकार, उनका आकार, नाम आदि का विश्लेषण किया गया है। (१) सामान्य-वे नौकाएं, जो साधारण नदियों में चल सकें।(२) विशेष-जिनके द्वारा समुद्र यात्रा की जा सके। उत्कृष्ट निर्माण-कल्याण (हिन्दू संस्कृति अंक-१९५०) में नौका की सजावट का सुंदर वर्णन आता है। चार श्रंृग (मस्तूल) वाली नौका सफेद, तीन श्रृग वाली लाल, दो श्रृंग वाली पीली तथा एक श्रं◌ृग वाली को नीला रंगना चाहिए।नौका मुख-नौका की आगे की आकृति यानी नौका का मुख सिंह, महिष, सर्प, हाथी, व्याघ्र, पक्षी, मेढ़क आदि विविध आकृतियों के आधार पर बनाने का वर्णन है।

भारत पर मुस्लिम आक्रमण ७वीं सदी में प्रारंभ हुआ। उस काल में भी भारत में बड़े-बड़े जहाज बनते थे। मार्क‌◌ोपोलो तेरहवीं सदी में भारत में आया। वह लिखता है ‘जहाजों में दोहरे तख्तों की जुड़ाई होती थी, लोहे की कीलों से उनको मजबूत बनाया जाता था और उनके सुराखों को एक प्रकार की गोंद में भरा जाता था। इतने बड़े जहाज होते थे कि उनमें तीन-तीन सौ मल्लाह लगते थे। एक-एक जहाज पर ३ से ४ हजार तक बोरे माल लादा जा सकता था। इनमें रहने के लिए ऊपर कई कोठरियां बनी रहती थीं, जिनमें सब तरह के आराम का प्रबंध रहता था। जब पेंदा खराब होने लगता तब उस पर लकड़ी की एक नयी तह को जड़ लिया जाता था। इस तरह कभी-कभी एक के ऊपर एक ६ तह तक लगायी जाती थी।‘

१५वीं सदी में निकोली कांटी नामक यात्री भारत आया। उसने लिखा कि ‘भारतीय जहाज हमारे जहाजों से बहुत बड़े होते हैं। इनका पेंदा तिहरे तख्तों का इस प्रकार बना होता है कि वह भयानक तूफानों का सामना कर सकता है। कुछ जहाज ऐसे बने होते हैं कि उनका एक भाग बेकार हो जाने पर बाकी से काम चल जाता है।‘

बर्थमा नामक यात्री लिखता है ‘लकड़ी के तख्तों की जुड़ाई ऐसी होती है कि उनमें जरा सा भी पानी नहीं आता। जहाजों में कभी दो पाल सूती कपड़े के लगाए जाते हैं, जिनमें हवा खूब भर सके। लंगर कभी-कभी पत्थर के होते थे। ईरान से कन्याकुमारी तक आने में आठ दिन का समय लग जाता था।‘ समुद्र के तटवर्ती राजाओं के पास जहाजों के बड़े-बड़े बेड़े रहते थे।

डा. राधा कुमुद मुकर्जी ने अपनी ‘इंडियन शिपिंग‘ नामक पुस्तक में भारतीय जहाजों का बड़ा रोचक एवं सप्रमाण इतिहास दिया है।

क्या वास्कोडिगामा ने भारत आने का मार्ग खोजा: अंग्रेजों ने एक भ्रम और व्याप्त किया कि वास्कोडिगामा ने समुद्र मार्ग से भारत आने का मार्ग खोजा। यह सत्य है कि वास्कोडिगामा भारत आया था, पर वह कैसे आया इसके यथार्थ को हम जानेंगे तो स्पष्ट होगा कि वास्तविकता क्या है? प्रसिद्ध पुरातत्ववेता पद्मश्री डा. विष्णु श्रीधर वाकणकर ने बताया कि मैं अभ्यास के लिए इंग्लैण्ड गया था। वहां एक संग्रहालय में मुझे वास्कोडिगामा की डायरी के संदर्भ में बताया गया। इस डायरी में◌े वास्कोडिगामा ने वह भारत कैसे आया, इसका वर्णन किया है। वह लिखता है, जब उसका जहाज अफ्र्ीका में जंजीबार के निकट आया तो मेरे से तीन गुना बड़ा जहाज मैंने देखा। तब एक अफ्र्ीकन दुभाषिया लेकर वह उस जहाज के मालिक से मिलने गया। जहाज का मालिक चंदन नाम का एक गुजराती व्यापारी था, जो भारतवर्ष से चीड़ व सागवान की लकड़ी तथा मसाले लेकर वहां गया था और उसके बदले में हीरे लेकर वह कोचीन के बंदरगाह आकार व्यापार करता था। वास्कोडिगामा जब उससे मिलने पहुंचा तब वह चंदन नाम का व्यापारी सामान्य वेष में एक खटिया पर बैठा था। उस व्यापारी ने वास्कोडिगामा से पूछा, कहां जा रहे हो? वास्कोडिगामा ने कहा- हिन्दुस्थान घूमने जा रहा हूं। तो व्यापारी ने कहा मैं कल जा रहा हूं, मेरे पीछे-पीछे आ जाओ।‘ इस प्रकार उस व्यापारी के जहाज का अनुगमन करते हुए वास्कोडिगामा भारत पहुंचा। स्वतंत्र देश में यह यथार्थ नयी पीढ़ी को बताया जाना चाहिए था परन्तु दुर्भाग्य से यह नहीं हुआ। (उदयन इंदुरकर-दृष्टकला साधक- पृ. ३२)

उपर्युक्त वर्णन पढ़कर मन में विचार आ सकता है कि नौका निर्माण में भारत इतना प्रगत देश था तो फिर आगे चलकर यह विद्या लुप्त क्यों हुई? इस दृष्टि से अंग्रेजों के भारत में आने और उनके राज्य काल में योजनापूर्वक भारतीय नौका उद्योग को नष्ट करने के इतिहास के बारे में जानना जरूरी है। उस इतिहास का वर्णन करते हुए श्री गंगा शंकर मिश्र कल्याण के हिन्दू संस्कृति अंक (१९५०) में लिखते हैं-‘पाश्चात्यों का जब भारत से सम्पर्क हुआ तब वे यहां के जहाजों को देखकर चकित रह गए। सत्रहवीं शताब्दी तक यूरोपीय जहाज अधिक से अधिक ६ सौ टन के थे, परन्तु भारत में उन्होंने ‘गोघा‘ नामक ऐसे बड़े-बड़े जहाज देखे जो १५ सौ टन से भी अधिक के होते थे। यूरोपीय कम्पनियां इन जहाजों को काम में लाने लगीं और हिन्दुस्थानी कारीगरों द्वारा जहाज बनवाने के लिए उन्होंने कई कारखाने खोल लिए। सन्‌ १८११ में लेफ्टिनेंट वाकर लिखता है कि ‘व्रिटिश जहाजी बेड़े के जहाजों की हर बारहवें वर्ष मरम्मत करानी पड़ती थी। परन्तु सागौन के बने हुए भारतीय जहाज पचास वर्षों से अधिक समय तक बिना किसी मरम्मत के काम देते थे।‘ ‘ईस्ट इण्डिया कम्पनी‘ के पास ‘दरिया दौलत‘ नामक एक जहाज था, जो ८७ वर्षों तक बिना किसी मरम्मत के काम देता रहा। जहाजों को बनाने में शीशम, साल और सागौन-तीनों लकड़ियां काम में लायी जाती थीं।सन्‌ १८११ में एक फ्र्ांसीसी यात्री वाल्टजर सालविन्स अपनी ‘ले हिन्दू‘ नामक पुस्तक में लिखता है कि ‘प्राचीन समय में नौ-निर्माण कला में हिन्दू सबसे आगे थे और आज भी वे इसमें यूरोप को पाठ पढ़ा सकते हैं। अंग्रेजों ने, जो कलाओं के सीखने में बड़े चतुर होते हैं, हिन्दुओं से जहाज बनाने की कई बातें सीखीं। भारतीय जहाजों में सुन्दरता तथा उपयोगिता का बड़ा अच्छा योग है और वे हिन्दुस्थानियों की कारीगरी और उनके धैर्य के नमूने हैं।‘ बम्बई के कारखाने में १७३६ से १८६३ तक ३०० जहाज तैयार हुए, जिनमें बहुत से इंग्लैण्ड के ‘शाही बेड़े‘ में शामिल कर लिए गए। इनमें ‘एशिया‘ नामक जहाज २२८९ टन का था और उसमें ८४ तोपें लगी थीं। बंगाल में हुगली, सिल्हट, चटगांव और ढाका आदि स्थानों पर जहाज बनाने के कारखाने थे। सन्‌ १७८१ से १८२१ तक १,२२,६९३ टन के २७२ जहाज केवल हुगली में तैयार हुए थे।अंग्रेजों की कुटिलता-व्रिटेन के जहाजी व्यापारी भारतीय नौ-निर्माण कला का यह उत्कर्ष सहन न कर सके और वे ‘ईस्ट इण्डिया कम्पनी‘ पर भारतीय जहाजों का उपयोग न करने के लिए दबाने बनाने लगे। सन्‌ १८११ में कर्नल वाकर ने आंकड़े देकर यह सिद्ध किया कि ‘भारतीय जहाजों‘ में बहुत कम खर्च पड़ता है और वे बड़े मजबूत होते हैं। यदि व्रिटिश बेड़े में केवल भारतीय जहाज ही रखे जाएं तो बहुत बचत हो सकती है।‘ जहाज बनाने वाले अंग्रेज कारीगरों तथा व्यापारियों को यह बात बहुत खटकी। डाक्टर टेलर लिखता है कि ‘जब हिन्दुस्थानी माल से लदा हुआ हिन्दुस्थानी जहाज लंदन के बंदरगाह पर पहुंचा, तब जहाजों के अंग्रेज व्यापारियों में ऐसी घबराहट मची जैसा कि आक्रमण करने के लिए टेम्स नदी में शत्रुपक्ष के जहाजी बेड़े को देखकर भी न मचती।‘लंदन बंदरगाह के कारीगरों ने सबसे पहले हो-हल्ला मचाया और कहा कि ‘हमारा सब काम चौपट हो जाएगा और हमारे कुटुम्ब भूखों मर जाएंगे।‘ ‘ईस्ट इण्डिया कम्पनी‘ के ‘बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स‘ (निदेशक-मण्डल) ने लिखा कि हिन्दुस्थानी खलासियों ने यहां आने पर जो हमारा सामाजिक जीवन देखा, उससे भारत में यूरोपीय आचरण के प्रति जो आदर और भय था, नष्ट हो गया। अपने देश लौटने पर हमारे सम्बंध में वे जो बुरी बातें फैलाएंगे, उसमें एशिया निवासियों में हमारे आचरण के प्रति जो आदर है तथा जिसके बल पर ही हम अपना प्रभुत्व जमाए बैठे हैं, नष्ट हो जाएगा और उसका प्रभाव बड़ा हानिकर होगा।‘ इस पर व्रिटिश संसद ने सर राबर्ट पील की अध्यक्षता में एक समिति नियुक्त की।काला कानून- समिति के सदस्यों में परस्पर मतभेद होने पर भी इस रपट के आधार पर सन्‌ १८१४ में एक कानून पास किया, जिसके अनुसार भारतीय खलासियों को व्रिटिश नाविक बनने का अधिकार नहीं रहा। व्रिटिश जहाजों पर भी कम-से कम तीन चौथाई अंग्रेज खलासी रखना अनिवार्य कर दिया गया। लंदन के बंदरगाह में किसी ऐसे जहाज को घुसने का अधिकार नहीं रहा, जिसका स्वामी कोई व्रिटिश न हो और यह नियम बना दिया गया कि इंग्लैण्ड में अंग्रेजों द्वारा बनाए हुए जहाजों में ही बाहर से माल इंग्लैण्ड आ सकेगा।‘ कई कारणों से इस कानून को कार्यान्वित करने में ढिलाई हुई, पर सन्‌ १८६३ से इसकी पूरी पाबंदी होने लगी। भारत में भी ऐसे कायदे-कानून बनाए गए जिससे यहां की प्राचीन नौ-निर्माण कला का अन्त हो जाए। भारतीय जहाजों पर लदे हुए माल की चुंगी बढ़ा दी गई और इस तरह उनको व्यापार से अलग करने का प्रयत्न किया गया। सर विलियम डिग्वी ने ठीक ही लिखा है कि ‘पाश्चात्य संसार की रानी ने इस तरह प्राप्च सागर की रानी का वध कर डाला।‘ संक्षेप में भारतीय नौ-निर्माण कला को नष्ट करने की यही कहानी है।

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Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

बस से उतरकर जेब में हाथ डाला


बस से उतरकर जेब में हाथ डाला। मैं चौंक
पड़ा।
जेब कट चुकी थी।

जेब में था भी क्या?

कुल 90 रुपए और एक खत, जो मैंने
माँ को लिखा था कि—

मेरी नौकरी छूट गई है;

अभी पैसे नहीं भेज पाऊँगा।

तीन दिनों से वह पोस्टकार्ड जेब में
पड़ा था।

पोस्ट करने को मन ही नहीं कर रहा था।

90 रुपए जा चुके थे। यूँ 90 रुपए कोई
बड़ी रकम नहीं थी,

लेकिन जिसकी नौकरी छूट चुकी हो,
उसके लिए 90 रुपए ,, नौ सौ से कम
नहीं होते।

कुछ दिन गुजरे। माँ का खत मिला।
पढ़ने से पूर्व मैं सहम गया।

जरूर पैसे भेजने को लिखा होगा।….
लेकिन, खत पढ़कर मैं हैरान रह गया।

माँ ने लिखा था—“बेटा, तेरा 1000 रुपए
का भेजा हुआ मनीआर्डर मिल गया है।

तू कितना अच्छा है रे!…

पैसे भेजने में
कभी लापरवाही नहीं बरतता।


मैं इसी उधेड़- बुन में लग गया कि आखिर
माँ को मनीआर्डर किसने भेजा होगा?

कुछ दिन बाद, एक और पत्र मिला।
चंद लाइनें थीं— आड़ी तिरछी।
बड़ी मुश्किल से खत पढ़ पाया।

लिखा था—“भाई, 90 रुपए तुम्हारे और
910 रुपए अपनी ओर से मिलाकर मैंने
तुम्हारी माँ को मनीआर्डर भेज
दिया है। फिकर न करना।….

माँ तो सबकी एक-जैसी होती है न।

वह क्यों भूखी रहे?…

तुम्हारा—जेबकतरा👌👌..

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