Posted in जीवन चरित्र

सभी दोस्तों से अनुरोध है कि वे एक बार इस पोस्ट को अवश्य पढ़े


सभी दोस्तों से अनुरोध है कि वे एक बार इस पोस्ट को अवश्य पढ़े

नेता जी सुबासचंद्र बोस के जन्मदिवस पर उनको सत-सत नमन।
दोस्तों आज नेता जी से संबंधित एक ऐसा पोस्ट दे रहे है जो हमारे दिमाग को झकझोर देने वाला होगा।
      "क्या हम अब भी गुलामी में रह रहे है?"
हाँ ये बात भले ही सत्य है कि सरकार अब भारतीयों के हाथ में  ही आ गई है लेकिन अब भी हम स्वतंत्र नहीं है अब भी हम ब्रिटिश सरकार की मानसिक गुलामी में पल रहे है।
वैसे तो देश में, सरकार में  और सेना में बहुत सारे बदलाव आ गए है पर अभी भी कुछ वैसी बातें है, जिसे सुन कर हमारा खून खौल जाए।
      हम तब तक कैसे स्वतंत्र कहलाएँगे जब तक हम उन गुलामी के प्रतिको को उखाड़ कर फेक न दे जो हमे रह-रह कर याद दिलाए तुम अभी भी हमारे गुलाम हो।©आलोक
       हाँ भाइयों हमारे देश में अभी भी ऐसी-ऐसी परंपराएँ चल रही है जो अंग्रेजों के लिए तो गर्व का बिषय हो सकती है परन्तु वह हर भारतीय के लिए एक अपमान की कड़वा घुट के समान है।
      दोस्तों आज भी आजाद हिंद फ़ौज और अंग्रेजो के बिच के हुए लड़ाई में अंग्रेजो की तरफ से लड़ते हुए सैनिकों को शहीद करार दिया गया है और उनका स्मारक बना कर हरेक साल सम्मान भी किया जाता है जबकि वही आजाद हिंद फ़ौज के सेनानियों को सम्मान तो दूर उनको आंतकवादी करार दे दिया गया है।©आलोक
.
1944 की लड़ाई में आजाद हिंद सेना भले ही हार गई हो लेकिन ब्रिटिशों की सेना को जबरजस्त नुकसान पहुँचा और 16000 से ज्यादा भारतीय सैनिक, नहीं नहीं अंग्रेजो के गुलाम या देशद्रोही भारतीय सैनिक अंग्रेजो की तरफ से लड़ते-लड़ते मारे गए। और उन देशद्रोहियों के याद में अंग्रेजो ने कोहिमा(नागालैंड) में एक भव्य शहीद स्मारक बनाया। आज भी उनका रखरखाव बड़े धूम-धाम से किया जाता है इसके लिए इंग्लैंड अपना पैसा खर्च करता है और जो भी भारतीय वहाँ जाता है उन देशद्रोहियों को आदरपूर्वक नमन करता है, लेकिन मैं केवल यहाँ आम भारतीयों की बात नहीं कर रहा हूँ अगर भारत के राष्ट्रपति एवं प्रधानमन्त्री भी वहाँ जाते है तो शहीदों(अंग्रेजो के लिए) उर्फ़ देशद्रोहियो को जरुर सलामी देते है क्योंकि हम तो हम तो अभी भी रानी विक्टोरिया के अधीन है और उनके सम्मान पर आँच आए ऐसा हम कैसे बर्दास्त कर सकते है।©आलोक
इस लिंक में पढ़िए कि किस प्रकार प्रणव मुखर्जी इन सैनिकों का गुणगान कर रहे है।
 www.samaylive.com/nation-news-in-hindi/241917/president-pranab-mukherjee-recalled-kohima-war-martyrs.html
यहाँ पर आम भारतीयों को भुलावे में रखने के इस युद्ध को भारत जापान युद्ध का नाम दे दिया जाता है। अब ये बताइए कि जब उस समय भारत आजाद ही नहीं था तो भारत और जापान के बिच युद्ध कैसा वो तो ब्रिटेन और जापान के बिच था, और जापान क्यों यह तो प्रत्यक्ष आजाद हिंद फ़ौज के साथ था जिसमें आजाद हिंद फ़ौज की मदद जापान कर रहा था।©alok
    या आप ऐसा भी कह सकते है क्या कि चूँकि सुबास चंद्र बोस जापान के मित्र थे इसलिए जापान-भारत युद्ध में वे जापान की मदद कर रहे थे। 
       अगर ऐसा ही होता तो आजाद हिंद सेना की हार के तुरंत बाद सुबास चन्द्र बोस भारत की आजादी के लिए जापान के उस समय के कट्टर शत्रु रूस से समर्थन या सहायता मांगने नहीं रूस नहीं जाते। और उसी समय रूस जाते समय उनका प्लेन दुर्घटना ग्रस्त हो गया जिससे उनकी मौत हो गई लेकिन कुछ लोग ये भी कहते है कि उस दिन कोई विमान दुर्घटना नहीं हुआ था बल्कि रूस ने उनको सहायता देने से इंकार कर दिया और बंदी बना लिया नहीं तो वे अगर जिंदा भारत में रहते तो ऐसे आदमी नहीं थे जो छुप कर रहते।©आलोक
     ये लिंक देखिए कि ब्रिटेन ने अपने पुरे सम्राज्य के इतिहास में नेता जी के साथ हुई जंग को ही सबसे बड़ी माना है।
http://archive.today/0bsqK 
    वही दूसरी तरफ उन गुलामों को तो आदर पूर्वक सम्मान दिया जाता है लेकिन आजादी के बाद भी उन आजादी के दीवानों "आजाद हिंद फ़ौज" के सैनिकों को सम्मान तो दूर "आंतकवादी" करार दे दिया गया।
नेहरु ने संसद मे आज़ाद हिंद फ़ौज को गद्दार कहते हुए आज़ाद हिंद फ़ौज के पूर्व फौजियो को सेना की तरह पेंशन और दूसरे सुविधाए देने से मना कर दिया था। जी हाँ मित्रों, आज की पीढ़ी ये सुनकर हिल जायेगी की कांग्रेस की नजर मे इस देश के लिए अपना बलिदान देने वाले मतवाले आज़ाद हिंद फ़ौज के फौजी गद्दार है। ये संसद के रिकार्ड मे दर्ज है। जब डॉ श्यामा प्रशाद मुखर्जी ने नेहरु से आजाद हिंद फ़ौज के पूर्व सैनिको को भारतीय सेना के मानदंड पर पेंशन और भारतीय सेना अपने सैनिको को रिटायर के बाद जो सुविधा देती है वो सब देने का प्रस्ताव रखा था। लेकिन नेहरु ने कहा की "मै आजाद हिंद फ़ौज
को मान्यता नही देता, ये एक आतंकवादी कृत्य था। मैं किसी निजी सेना बनाने के
खिलाफ हूँ भले ही उसका इस्तेमाल
देश के लिए हो, इसलिए मै ऐसे
किसी भी प्रस्ताव को स्वीकार
नही करूँगा।"
मित्रों, ये संसद के रिकार्ड में है।
लेकिन इतना ही क्यों दोस्तों यहाँ केवल एक ही कारनामे थोड़े है जिसके चलते मैं कह रहा हूँ कि हम अभी भी गुलाम है।
गोरखा रेजीमेंट की रानीखेत इकाई मे रानी लक्ष्मीबाई की शिकस्त एवं अंग्रेजो के झाँसी विजय के प्रमाणस्वरूप झाँसी का राजदंड अनुरक्षित और प्रदर्शित है क्या यह रानी लक्ष्मीबाई और समस्त क्रांतिकारियों का घोर अपमान नहीं है। हम कैसे मान ले कि हम पूरी तरह स्वतंत्र है जब तक कि हमारी सरकार या सेना रानी लक्ष्मीबाई को हराने में गर्व अनुभूति करती रहेगी।
तो क्या हमारे हीरो रानी लक्ष्मी बाई, तात्या टोपे, नाना साहब, सावरकर और सुबास न हो कर रानी विक्योरिया, कैप्टन नील, विलियम स्लिम, डलहौजी और हैवलॉक है।
निश्चित रूप से नहीं, फिर भी देशद्रोहियों को सम्मान एवं शहीदों एवं क्रांतिकारियों का अपमान क्यों।©आलोक
      ऐसी सरकार किस काम की जो देश के गौरव नहीं अंग्रेजो के गौरव को सम्भालने में लगी है।
    सरकार को तुरंत चाहिए कि उन सभी परंपराओ को बंद करे जो हमारे राष्ट्रिय अपमान का बिषय हो तथा राष्ट्रिय सम्मान से जुडी कुछ नई परंपरा स्थापित करें।
    दोस्तों इस मैसेज को इतना फैलाओ की ये बात सरकार तक पहुँचे और सरकार इस बिषय पर सोचने को मजबूर हो जाए।जय हिंद।जय भारत।©आलोक
।।नेताजी सुबासचन्द्र बोस की जय।।

नेता जी सुबासचंद्र बोस के जन्मदिवस पर उनको सत-सत नमन।
दोस्तों आज नेता जी से संबंधित एक ऐसा पोस्ट दे रहे है जो हमारे दिमाग को झकझोर देने वाला होगा।
“क्या हम अब भी गुलामी में रह रहे है?”
हाँ ये बात भले ही सत्य है कि सरकार अब भारतीयों के हाथ में ही आ गई है लेकिन अब भी हम स्वतंत्र नहीं है अब भी हम ब्रिटिश सरकार की मानसिक गुलामी में पल रहे है।
वैसे तो देश में, सरकार में और सेना में बहुत सारे बदलाव आ गए है पर अभी भी कुछ वैसी बातें है, जिसे सुन कर हमारा खून खौल जाए।
हम तब तक कैसे स्वतंत्र कहलाएँगे जब तक हम उन गुलामी के प्रतिको को उखाड़ कर फेक न दे जो हमे रह-रह कर याद दिलाए तुम अभी भी हमारे गुलाम हो।©आलोक
हाँ भाइयों हमारे देश में अभी भी ऐसी-ऐसी परंपराएँ चल रही है जो अंग्रेजों के लिए तो गर्व का बिषय हो सकती है परन्तु वह हर भारतीय के लिए एक अपमान की कड़वा घुट के समान है।
दोस्तों आज भी आजाद हिंद फ़ौज और अंग्रेजो के बिच के हुए लड़ाई में अंग्रेजो की तरफ से लड़ते हुए सैनिकों को शहीद करार दिया गया है और उनका स्मारक बना कर हरेक साल सम्मान भी किया जाता है जबकि वही आजाद हिंद फ़ौज के सेनानियों को सम्मान तो दूर उनको आंतकवादी करार दे दिया गया है।©आलोक
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1944 की लड़ाई में आजाद हिंद सेना भले ही हार गई हो लेकिन ब्रिटिशों की सेना को जबरजस्त नुकसान पहुँचा और 16000 से ज्यादा भारतीय सैनिक, नहीं नहीं अंग्रेजो के गुलाम या देशद्रोही भारतीय सैनिक अंग्रेजो की तरफ से लड़ते-लड़ते मारे गए। और उन देशद्रोहियों के याद में अंग्रेजो ने कोहिमा(नागालैंड) में एक भव्य शहीद स्मारक बनाया। आज भी उनका रखरखाव बड़े धूम-धाम से किया जाता है इसके लिए इंग्लैंड अपना पैसा खर्च करता है और जो भी भारतीय वहाँ जाता है उन देशद्रोहियों को आदरपूर्वक नमन करता है, लेकिन मैं केवल यहाँ आम भारतीयों की बात नहीं कर रहा हूँ अगर भारत के राष्ट्रपति एवं प्रधानमन्त्री भी वहाँ जाते है तो शहीदों(अंग्रेजो के लिए) उर्फ़ देशद्रोहियो को जरुर सलामी देते है क्योंकि हम तो हम तो अभी भी रानी विक्टोरिया के अधीन है और उनके सम्मान पर आँच आए ऐसा हम कैसे बर्दास्त कर सकते है।©आलोक
इस लिंक में पढ़िए कि किस प्रकार प्रणव मुखर्जी इन सैनिकों का गुणगान कर रहे है।
www.samaylive.com/…/president-pranab-mukherjee-recalled-koh…
यहाँ पर आम भारतीयों को भुलावे में रखने के इस युद्ध को भारत जापान युद्ध का नाम दे दिया जाता है। अब ये बताइए कि जब उस समय भारत आजाद ही नहीं था तो भारत और जापान के बिच युद्ध कैसा वो तो ब्रिटेन और जापान के बिच था, और जापान क्यों यह तो प्रत्यक्ष आजाद हिंद फ़ौज के साथ था जिसमें आजाद हिंद फ़ौज की मदद जापान कर रहा था।©alok
या आप ऐसा भी कह सकते है क्या कि चूँकि सुबास चंद्र बोस जापान के मित्र थे इसलिए जापान-भारत युद्ध में वे जापान की मदद कर रहे थे।
अगर ऐसा ही होता तो आजाद हिंद सेना की हार के तुरंत बाद सुबास चन्द्र बोस भारत की आजादी के लिए जापान के उस समय के कट्टर शत्रु रूस से समर्थन या सहायता मांगने नहीं रूस नहीं जाते। और उसी समय रूस जाते समय उनका प्लेन दुर्घटना ग्रस्त हो गया जिससे उनकी मौत हो गई लेकिन कुछ लोग ये भी कहते है कि उस दिन कोई विमान दुर्घटना नहीं हुआ था बल्कि रूस ने उनको सहायता देने से इंकार कर दिया और बंदी बना लिया नहीं तो वे अगर जिंदा भारत में रहते तो ऐसे आदमी नहीं थे जो छुप कर रहते।©आलोक
ये लिंक देखिए कि ब्रिटेन ने अपने पुरे सम्राज्य के इतिहास में नेता जी के साथ हुई जंग को ही सबसे बड़ी माना है।
http://archive.today/0bsqK
वही दूसरी तरफ उन गुलामों को तो आदर पूर्वक सम्मान दिया जाता है लेकिन आजादी के बाद भी उन आजादी के दीवानों “आजाद हिंद फ़ौज” के सैनिकों को सम्मान तो दूर “आंतकवादी” करार दे दिया गया।
नेहरु ने संसद मे आज़ाद हिंद फ़ौज को गद्दार कहते हुए आज़ाद हिंद फ़ौज के पूर्व फौजियो को सेना की तरह पेंशन और दूसरे सुविधाए देने से मना कर दिया था। जी हाँ मित्रों, आज की पीढ़ी ये सुनकर हिल जायेगी की कांग्रेस की नजर मे इस देश के लिए अपना बलिदान देने वाले मतवाले आज़ाद हिंद फ़ौज के फौजी गद्दार है। ये संसद के रिकार्ड मे दर्ज है। जब डॉ श्यामा प्रशाद मुखर्जी ने नेहरु से आजाद हिंद फ़ौज के पूर्व सैनिको को भारतीय सेना के मानदंड पर पेंशन और भारतीय सेना अपने सैनिको को रिटायर के बाद जो सुविधा देती है वो सब देने का प्रस्ताव रखा था। लेकिन नेहरु ने कहा की “मै आजाद हिंद फ़ौज
को मान्यता नही देता, ये एक आतंकवादी कृत्य था। मैं किसी निजी सेना बनाने के
खिलाफ हूँ भले ही उसका इस्तेमाल
देश के लिए हो, इसलिए मै ऐसे
किसी भी प्रस्ताव को स्वीकार
नही करूँगा।”
मित्रों, ये संसद के रिकार्ड में है।
लेकिन इतना ही क्यों दोस्तों यहाँ केवल एक ही कारनामे थोड़े है जिसके चलते मैं कह रहा हूँ कि हम अभी भी गुलाम है।
गोरखा रेजीमेंट की रानीखेत इकाई मे रानी लक्ष्मीबाई की शिकस्त एवं अंग्रेजो के झाँसी विजय के प्रमाणस्वरूप झाँसी का राजदंड अनुरक्षित और प्रदर्शित है क्या यह रानी लक्ष्मीबाई और समस्त क्रांतिकारियों का घोर अपमान नहीं है। हम कैसे मान ले कि हम पूरी तरह स्वतंत्र है जब तक कि हमारी सरकार या सेना रानी लक्ष्मीबाई को हराने में गर्व अनुभूति करती रहेगी।
तो क्या हमारे हीरो रानी लक्ष्मी बाई, तात्या टोपे, नाना साहब, सावरकर और सुबास न हो कर रानी विक्योरिया, कैप्टन नील, विलियम स्लिम, डलहौजी और हैवलॉक है।
निश्चित रूप से नहीं, फिर भी देशद्रोहियों को सम्मान एवं शहीदों एवं क्रांतिकारियों का अपमान क्यों।©आलोक
ऐसी सरकार किस काम की जो देश के गौरव नहीं अंग्रेजो के गौरव को सम्भालने में लगी है।
सरकार को तुरंत चाहिए कि उन सभी परंपराओ को बंद करे जो हमारे राष्ट्रिय अपमान का बिषय हो तथा राष्ट्रिय सम्मान से जुडी कुछ नई परंपरा स्थापित करें।
दोस्तों इस मैसेज को इतना फैलाओ की ये बात सरकार तक पहुँचे और सरकार इस बिषय पर सोचने को मजबूर हो जाए।जय हिंद।जय भारत।©आलोक
।।नेताजी सुबासचन्द्र बोस की जय।।

Posted in भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas

बैसवाडा(Baiswara) राज्य की स्थापना


(^) जय राजपूताना (^)
======बैसवाडा(Baiswara) राज्य की स्थापना ======

मित्रों गत सप्ताह हमने बैस क्षत्रिय राजपूत वंश पर तीन पोस्ट की थी जिनमे प्रथम पोस्ट के माध्यम से हमने बैस वंश की उत्पत्ति,गोत्र प्रवर,शाखाओं, प्राचीन इतिहास,बैस राजपूतों द्वारा शासितप्राचीन एवं वर्तमान राज्यों आदि की जानकारी दी थी,
दूसरी पोस्ट के माध्यम से हमने सम्राट हर्षवर्धन को सप्रमाण बैस राजपूत वंशी सिद्ध करते हुए उनके शासनकाल की विभिन्न घटनाओ पर प्रकाश डाला था,
बैस वंश से सम्बन्धित तीसरी पोस्ट में हमने महाराजा त्रिलोकचंद बैस प्रथम के दुसरेपुत्र बिडारदेव के वंशज महाराजा सुहेलदेव बैस(भाले सुल्तान) की वीरता का वर्णन किया था कि किस प्रकार उन्होंने बहराइच के युद्ध में 17 राजपूत राजाओं का संघ बनाकर तुर्क हमलावर सैय्यद सलार मसूद गाजी को उसकी सेना सहित नष्ट कर दिया था.
आज बैस राजपूत वंश से सम्बंधित इस चौथी पोस्ट के माध्यम से हम बैस राजपूत वंश के मध्यकालीन इतिहास और बैसवाडा राज्य की स्थापना पर प्रकाश डालेंगे.
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बैसवाडा—-
बैसवाडा की स्थापना महाराजा अभयचंद बैस द्वारा सन 1230 ईस्वी में की गई थी,बैसवाडा भौगोलिक क्षेत्र में आज प्रमुख रूप से उत्तर प्रदेश के रायबरेली,उन्नाव जिले आते हैं,समीपवर्ती जिलो सुल्तानपुर, बाराबंकी,लखनऊ,प्रतापगढ़,फतेहपुर आदि का कुछ हिस्सा भी बैसवाडा का हिस्सा माना जाता है.
बैसवाडा में आज भी बैस राजपूतो का प्रभुत्व है.इसकी अपनी विशिष्ट संस्कृति है जो इसे विशेस स्थान प्रदान करती है.

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महाराजा अभयचंद बैस द्वारा बैसवाडा राज्य की स्थापना———
कन्नौज के बैसवंशी सम्राट हर्षवर्धन के बाद उनके वंशज कन्नौज के आस पास ही कई शक्तियों के अधीन सामन्तों के रूप में शाशन करते रहे।शम्भुनाथ मिश्र (बैस वंशावली 1752)के पृष्ठ संख्या 2 पर सम्राट हर्षवर्धन से लेकर 25 वी पीढ़ी में राव अभयचंद तक के वर्णन के अनुसार हर्षवर्धन से 24 वीं पीढ़ी में बैस सामंत केशव राय उर्फ़ गणेश राय ने मुहम्मद गोरी के विरुद्ध राजा जयचन्द की तरफ से चंदावर के युद्ध में भाग लिया। उनके पुत्र राव अभयचन्द ने उन्नाव,राय बरेली स्थित बैसवारा की स्थापना की। आज भी सबसे ज्यादा बैस राजपूत इसी बैसवारा क्षेत्र में निवास करते है। हर्षवर्धन से लेकर राव अभयचन्द तक 25 शासक/सामन्त हुए, जिनकी वंशावली इस प्रकार है-
1.हर्षवर्धन
2.यशकर्ण
3.रणशक्ति
4.धीरचंद
5.ब्रजकुमार
6.घोषचन्द
7.पूरनमल
8.जगनपति
9.परिमलदेव
10.मनिकचंद
11.कमलदेव
12.यशधरदेव
13.डोरिलदेव
14.कृपालशाह
15.रतनशाह
16.हिंदुपति
17.राजशाह
18.परतापशाह
19.रुद्रशाह
20.विक्रमादित्य
21-ताम्बेराय
22.क्षत्रपतिराव
23.जगतपति
24.गणेश राय उर्फ़ केशवराव
25.अभयचंद
इन्ही हर्षवर्धन के वंशज राव अभयचंद बैस ने सन 1230 के लगभग बैसवारा राज्य कि नीव रखी.
इस वंश को शालिवाहन के वंशज त्रिलोकचंद प्रथम का वंशज भी माना जाता है,जिन्होंने चौथी सदी के आसपास दिल्ली में भी राज्य स्थापित किया था,यह राज्य सन 640 के आसपास समाप्त हो गया था,हो सकता है थानेश्वरी बैस वंश का सम्बन्ध भी त्रिलोकचंद प्रथम से हो,क्योंकि दिल्ली और थानेश्वर में अधिक दूरी नही है.
हर्षवर्धन से 24 वीं पीढ़ी में लोहागंज के शासक केशव राय उर्फ़ गणेश राय ने मुहम्मद गोरी के विरुद्ध राजा जयचन्द की तरफ से चंदावर के युद्ध में भाग लिया और वीरगति को प्राप्त हुए,
इसके बाद उनके पुत्र निर्भयचंद और अभयचंद अपनी माता के साथ स्यालकोट पंजाब में
गुप्त रूप से रहने लगे,बड़े होने पर दोनों राजकुमार अपने प्राचीन प्रदेश में वापस आए,
सन 1230 के आसपास अर्गल के गौतमवंशी राजा पर कड़ा के मुसलमान सूबेदार ने हमला कर दिया,किन्तु गौतम राजा ने उसे परास्त कर दिया,कुछ समय बाद गौतम राजा की पत्नी गंगास्नान को गयी,वहां मुसलमान सूबेदार ने अपने सैनिको को रानी को पकड़ने भेजा,
यह देखकर रानी ने आवाज लगाई कि कोई क्षत्रिय है तो मेरी रक्षा करे,संयोग से दोनों बैस राजकुमार उस समय वहां उपस्थित थे,उन्होंने तुरंत वहां जाकर मुस्लिम सैनिको को मार भगाया.
रानी को बचाने के बाद निर्भयचंद तो अधिक घावो के कारण शीघ्र ही मृत्यु को प्राप्त हुए,किन्तु अभयचंद बच गया,
गौतम राजा ने अपनी पुत्री का विवाह अभयचन्द्र से कर दहेज़ में उसे गंगा से उत्तर दिशा में 1440 गाँव दिए,जहाँ अभयचंद ने बैस राज्य की नीव रखी,यही बैस राज्य आज बैसवाडा कहलाता है.
उस समय पूरा पूर्वी मध्य उत्तर प्रदेश कन्नौज नरेश जयचंद की प्रभुता को मानता था मगर उनकी हार के बाद इस क्षेत्र में अराजकता हो गई जिसका लाभ उठाकर भर जाति के सामंत स्वतंत्र हो गए,इन 1440 गाँव पर वास्तविक रूप से भर जाति का ही प्रभुत्व था जो गौतम राजा को कर नहीं देते थे,
अभयचंद और उनके वंशज कर्णराव,सिधराव(सेढूराव),पूर्णराव ने वीरता और चतुराई से भरो की शक्ति का दमन करके इस क्षेत्र में बड़ा राज्य कायम किया.और डोडियाखेडा को राजधानी बनाया.
पूर्णराव के बाद घाटमराव राजा बने जिन्होंने फिरोजशाह तुगलक के समय उसकी धर्मान्धता की नीति से ब्राह्मणों कि रक्षा की,
घाटमराव के बाद क्रमश: जाजनदेव,रणवीरदेव ,रोहिताश्व राजा हुए.
रोहिताश्व का शासनकाल 1404 से 1422 तक रहा,इनका शासन काल बैसवाडा में शौर्य युग के नाम से विख्यात है.इनके काल में खूब युद्ध हुए और शासन विस्तार हुआ,इन्होने मैनपुरी के चौहान राजा के निमन्त्रण पर वहां जाकर अहीर विद्रोहियों का दमन किया और मैनपुरी के आसपास भी गाँवो पर अधिकार कर लिया,उनका जौनपुर के शर्की सुल्तानों से भी संघर्ष हुआ,
रोहिताश्व पंजाब में एक युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए.
रोहिताश्व के बाद राव सातनदेव गद्दी पर बैठे,सन 1440 में जौनपुर के शर्की सुल्तान के हमले में ये काकोरी में वीरगति को प्राप्त हुए,उस समय उनकी पत्नी गर्भवती थी,डोडियाखेडा के रास्ते में उन्होंने एक पुत्र को जन्म दिया जो आगे चलकर महाराजा त्रिलोकचंद द्वित्य के नाम से प्रसिद्ध हुए.

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महाराजा त्रिलोकचंद द्वित्य—–
महाराजा त्रिलोकचंद की माता मैनपुरी के चौहान राजा की पुत्री थी,डोडियाखेडा पर शर्की सुल्तान के हमले के बाद उसने अपने पुत्र को गुमनाम अवस्था में मैनपुरी में पाला,बडे होकर त्रिलोकचंद ने अपने पिता की मौत का बदला लेने का प्रण लिया,
उसमे अदबुध संगठन क्षमता थी,कुछ सैन्य मदद उनके नाना मैनपुरी के चौहान राजा ने की और त्रिलोकचंद ने सेना तैयार कर बैसवाडा क्षेत्र पर धावा बोल दिया और रायबरेली,हैदरगढ़, बाराबंकी,डोडियाखेडा,डलमऊ आदि पर अधिकार कर लिया,दिल्ली सल्तनत ने भी उसे शर्की सुल्तानों के विरुद्ध मदद दी जिससे त्रिलोकचंद ने शर्की सुल्तान को हराकर भगा दिया और बिहार जाकर उसकी मृत्यु हो गयी.
दिल्ली के लोदी सुल्तानों ने त्रिलोकचंद की इस बड़े बैसवाडा भूभाग पर अधिपत्य को मान लिया,महाराजा त्रिलोकचंद को उनकी उपलब्धियों के कारण अवध केसरी भी कहा जाता है,उन्ही के वंशज त्रिलोकचंदी बैस कहलाते हैं,
आगे चलकर मुगल सम्राट अकबर ने भी इस इलाके में बैस राजपूतों की शक्ति को देखते हुए उन्हें स्वायत्तता दे दी और बाद के मुगल सम्राटो ने भी यही निति जारी रखी.
लम्बे समय तक इस वंश ने डोडियाखेडा को राजधानी बनाकर बैसवाडा पर राज्य किया,किन्तु सन 1857 के गदर में भाग लेने के कारण अंग्रेजो ने अंतिम शासक बाबू रामबख्श सिंह को फांसी दे दी और इनका राज्य जब्त कर लिया,अभी गत वर्ष डोडियाखेडा के किले में जो खजाने की खोज में खुदाई चल रही थी वो इन्ही बाबू राव रामबख्श सिंह और बैस वंश के प्राचीन खजाने की खोज थी जो अभी तक पूरी नहीं हो पाई है.
इतिहासकार कनिंघम के अनुसार बैसवाडा के बैस राजपूत अवध क्षेत्र के सबसे समृद्ध और सम्पन्न परिवार ,सर्वोत्तम आवासों के स्वामी,सर्वोत्तम वेशभूषा के और सर्वाधिक साहसी समुदाय से हैं.
बैसवाडा के ही ताल्लुकदार राणा बेनीमाधव सिंह से मालगुजारी लेने की हिम्मत किसी में नहीं थी,आगे चलकर इन्ही राणा बेनीमाधव सिंह ने सन 1857 ईस्वी में ग़दर के दौरान जिस वीरता का प्रदर्शन किया उसका विवरण हम अलग से करेंगे.इसके बाद भी बैस राजपूतो ने स्वतंरता आन्दोलन में बढ़ चढ़कर भाग लिया,
जमीदारी उन्मूलन के समय रायबरेली जिले में 18 बैस ताल्लुकादार थे,जिनका वहां के बड़े भूभाग पर अधिकार था.
बैसवाडा का नामकरण बैस राजपूत वंश के प्रभुत्व के कारण हुआ है.दिल्ली दरबार यहाँ से काफी दूर था,इस कारण उनका यहाँ नाम मात्र का शासन था,जौनपुर का शर्की राजवंश सिर्फ 80 साल चला,अवध का नवाबी राज्य भी सिर्फ 125 साल तक चला जिसके कारण ये शासक बैसवाडा के बैस राजपूतो के प्रभुत्व पर कोई प्रभाव डालने में असफल रहे.
वस्तुत:बैसवाडा के बैस राजपूतो ने अपनी वीरता और योग्यता से इस क्षेत्र को समस्त भारतवर्ष में विशिस्ट स्थान प्रदान किया है.

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सन्दर्भ—-
1-ठाकुर ईश्वर सिंह मढ़ाड कृत राजपूत वंशावली के प्रष्ठ संख्या 112-114
2-देवी सिंह मंडावा कृत राजपूत शाखाओं का इतिहास के पृष्ठ संख्या 67-74
3-महान इतिहासकार गौरिशंकर ओझा जी कृत राजपूताने का इतिहास के पृष्ठ संख्या154-162
4-श्री रघुनाथ सिंह कालीपहाड़ी कृत क्षत्रिय राजवंश के प्रष्ठ संख्या 78,79 एवं 368,369
5-डा देवीलाल पालीवाल कि कर्नल जेम्स तोड़ कृत राजपूत जातियों का इतिहास प्रष्ठ संख्या 182
6-ठाकुर बहादुर सिंह बीदासर कृत क्षत्रिय वंशावली एवं जाति भास्कर
7-http://kshatriyawiki.com/wiki/Bais
8-http://wakeuprajput.com/orgion_bais.php
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सलंग्न चित्र में बैसवाडा का नक्शा और डोडियाखेडा का किला जहाँ गत वर्ष राजा रावरामबख्श
के खजाने की खोज की गई थी.

Posted in भारतीय मंदिर - Bharatiya Mandir

Ramappa Temple


Ramappa Temple

 http://historicalplacesofwarangal.blogspot.com/2010/07/ramappa-temple.html





Ramappa Temple The city of Warangal is 157 km from Hyderabad. It was the ancient CAPITALcity of the Kakatiya kingdom. Warangal means “history”. Its massive fortress has withstood continuous attacks from the Delhi Sultans in the 13th and 14th centuries AD. In the 19th century AD, it was the hunting ground of the nobles. It is noted for its beautiful lakes, magnificent temples, mud-brick forts and wildlife sanctuaries. Warangal today is an important tourist destination.

Palampet is located at a distance of 77 km from Warangal, the ancient CAPITAL of the Kakatiyas. It is home to brilliant Kakatiya art as seen in the Ramappa temple. The Ramappa temple is near the ancient engineering marvel of the 13th century AD Ramappa tank. The ancient Ramappa tank can be dated back to the period of Kakatiyas. It is a well-conceived tank where a 2000 ft long earthen dam connects a semi circular chain of hills to form a lake.

The Ramalingeswara Temple is popularly known as the Ramappa temple because the chief sculptor was Ramappa. It is probably the only temple in India to be known by the name of the sculptor who builds it. It was built under the patronage of the King Kakati Ganapathi Deva by his Chief Commander Rudra Samani at Ranakude in the province of Atukuru. The temple has been described as the “brightest star in the galaxy of medieval temples in the Deccan”. The temple is approached thorough a royal garden, now just a lawn with tree lined path. The temple is situated in a valley and is built with bricks so light that they can float on water. Yet the temple is so strong that it is still intact after numerous wars, invasions and natural calamities.

The Ramappa temple stands on a 6 ft high platform on a cruciform plan. The sanctum is crowned with a shikhara and is surrounded by a pradakshinapatha. Rich and intricate carvings adorn the walls, pillars and ceilings of this wonderful building. The hall in front of the sanctum has numerous beautifully carved pillars that have been placed to create an effect that combines light and space wonderfully. There are many votive shrines within the temple. There are two subsidiary shrines on either side of the main temple, which are in a good condition.

The entire temple complex is enclosed with a compound wall. At the entrance to the temple is a ruined Nandi mandapam, with an imposing 9 ft high Nandi, which is still intact. The Shivalingam in the sanctum also rises to a height of 9 ft. The east-facing sanctum is surrounded with pilasters crowned with Dravidian and Nagara shikharas in an alternating fashion. There is an additional entrance from the north also leading to the Navaranga mandapam in front of the sanctum. The ceiling is divided into compartments by columns from the bottom and is carved with intricate patterns. There is a richness of carvings in this temple on dark rock with a smooth finish, portraying an amazing range of themes from the Puranas and various Indian mythological stories.Ramappa Temple

The temple signifies many facets of Shiva, his royal residence, the Himalaya Mountains and his inhabiting a sacred space beyond the mortal realm. The temple is built upon the classical pattern of being first raised upon a platform that separates its sacred functions from the taint of the everyday. This ‘sacred mountain’ mindset was CHARACTERISTICof the temple builders in all the cultures. It represented a powerful symbolic representation of a perfect building, an intersection in midair of the spheres of heaven and earth. The platform lifts it above the normal, transcends the profane, declaring with uncompromising firmness that it is a place for un-common activities dedicated to a god.

Maha Shiva Ratri is celebrated for a period of three days in this temple Many of the smaller structures are neglected and are in ruins in the Ramappa temple. There were even instances of people carrying away the bricks, to be proudly exhibited that they can float on water, before the Archeological Survey of India (ASI) took charge of it. The main entrance gate in the outer wall of the temple is ruined, so one can enter only through a small west gate.

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Sardar Hari Singh Nalua 1791Ad to 1837 Ad


Sardar Hari Singh Nalua 1791Ad to 1837 Ad

How the vast Afghani Empire on Punjabi soil disappeared in Kasur, Multan, Kashmir and Peshawar is a subject closely associated with the campaigns of Sardar Hari Singh Nalua, the Marshal of the Khalsa and terror for the Afghans. Being the ‘Murat of the Khalsa’ as he was appropriately called by Sir Henry Griffin, the famous British dignitary and a prominent writer of significant treatise on the Sikhs, his name figures among those patriots who participated bravely rather passionately in almost all battles fought constantly against the Afghans during the Sikh rule under Maharaja Ranjit Singh for a period of three decades from A.D. 1807 to A.D. 1837.
Sardar Hari Singh Nalua, the typical product of his age was born at Gujranwala now in the West Pakistan in A.D. 1791 in Uppal family in the house of Sardar Gurdial Singh to Dharam Kaur. He was the only son of his parents. The ancestors of Nalua Sardars were originally from Majitha town situated in the vicinity of Amritsar. His grandfather Sardar Hardas Singh engaged in the service of Sukarchakia Misl was killed in an expedition undertaken by the Misl in A.D. 1762. Gurdial Singh, the father of Sardar Hari Singh Nalua followed the profession of his father and took part in various campaigns of Sukarchakia Sardars – Charat Singh and Mahan Singh in the capacity of Deradar .

He expired in 1798 when Hari Singh was only seven years of age and was thus looked after with care and caution by his maternal uncle who took him to his house. In those days training in the feats of war was deemed necessary and physical education attracted much attention. Accordingly, Hari Singh who was physically quite stout and strong and impressive too in appearance when grew up, learnt the art of warfare. It is said that he was indefatigable and could sit on horse back for long hours. Hari Singh received his preliminary education in languages of Gurmukhi, Urdu, Persian. Baron Charles Hugel states that Hari Singh besides his general knowledge about the statistics of many of the European states, was well versed in Persian. He impressed him extremely with his overall achievements

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भारत में इस्लामी जिहाद-इतिहास के पन्नों से (Part -1)


भारत में इस्लामी जिहाद-इतिहास के पन्नों से (Part -1)
कराची का शील भंग, जिहाद, सोमनाथ की लूट, gajnavi, islamic jihad, jihad, jihad in india, muhhamad bin kasim, muhhamad gauri, somnath temple

मुहम्मद बिन कासिम (७१२-७१५)

मुहम्मद बिन कासिम द्वारा भारत के पश्चिमी भागों में चलाये गये जिहाद का विवरण, एक मुस्लिम इतिहासज्ञ अल क्रूफी द्वारा अरबी के ‘चच नामा’ इतिहास प्रलेख में लिखा गया है। इस प्रलेख का अंग्रेजी में अनुवाद एलियट और डाउसन ने किया था।

सिन्ध में जिहाद

सिन्ध के कुछ किलों को जीत लेने के बाद बिन कासिम ने ईराक के गर्वनर अपने चाचा हज्जाज को लिखा था- ‘सिवस्तान और सीसाम के किले पहले ही जीत लिये गये हैं। गैर-मुसलमानों का धर्मान्तरण कर दिया गया है या फिर उनका वध कर दिया गया है। मूर्ति वाले मन्दिरों के स्थान पर मस्जिदें खड़ी कर दी गई हैं, बना दी गई हैं।
(चच नामा अल कुफी : एलियट और डाउसन खण्ड १ पृष्ठ १६४)

जब बिन कासिम ने सिन्ध विजय की, वह जहाँ भी गया कैदियों को अपने साथ ले गया और बहुत से कैदियों को, विशेषकर महिला कैदियों को, उसने अपने देश भेज दिया। राजा दाहिर की दो पुत्रियाँ- परिमल देवी और सूरज देवी-जिन्हें खलीफा के हरम को सम्पन्न करने के लिए हज्जाज को भेजा गया था वे हिन्दू महिलाओं के उस समूह का भाग थीं, जो युद्ध के लूट के माल के पाँचवे भाग के रूप में इस्लामी शाही खजाने के भाग के रूप् में भेजा गया था। चच नामा का विवरण इस प्रकार है- हज्जाज की बिन कासिम को स्थाई आदेश थे कि हिन्दुओं के प्रति कोई कृपा नहीं की जाए, उनकी गर्दनें काट दी जाएँ और महिलाओं को और बच्चों को कैदी बना लिया जाए’

(उसी पुस्तक में पृष्ठ १७३)

हज्जाज की ये शर्तें और सूचनाएँ कुरान के आदेशों के पालन के लिए पूर्णतः अनुरूप ही थीं। इस विषय में कुरान का आदेश है-‘जब कभी तुम्हें मिलें, मूर्ति पूजकों का वध कर दो। उन्हें बन्दी बना (गिरफ्तार कर) लो, घेर लो, रोक लो, घात के हर स्थान पर उनकी प्रतीक्षा करो’ (सूरा ९ आयत ५) और ‘उनमें से जिस किसी को तुम्हारा हाथ पकड़ ले उन सब को अल्लाह ने तुम्हें लूट के माल के रूप दिया है।’
(सूरा ३३ आयत ५८)

रेवार की विजय के बाद कासिम वहाँ तीन दिन रुका। तब उसने छः हजार आदमियों का वध किया। उनके अनुयायी, आश्रित, महिलायें और बच्चे सभी गिरफ्तार कर लिये गये। जब कैदियों की गिनती की गई तो वे तीस हजार व्यक्ति निकले जिनमें तीस सरदारों की पुत्रियाँ थीं, उन्हें हज्जाज के पास भेज दिया गया।
(वही पुस्तक पृष्ठ १७२-१७३)

कराची का शील भंग, लूट पाट एवम्‌ विनाश

‘कासिम की सेनायें जैसे ही देवालयपुर (कराची) के किले में पहुँचीं, उन्होंने कत्लेआम, शील भंग, लूटपाट का मदनोत्सव मनाया। यह सब तीन दिन तक चला। सारा किला एक जेल खाना बन गया जहाँ शरण में आये सभी ‘काफिरों’ – सैनिकों और नागरिकों – का कत्ल और अंग भंग कर दिया गया। सभी काफिर महिलाओं को गिरफ्तार कर लिया गया और उन्हें मुस्लिम योद्धाओं के मध्य बाँट दिया गया। मुखय मन्दिर को मस्जिद बना दिया गया और उसी सुर्री पर जहाँ भगवा ध्वज फहराता था, वहाँ इस्लाम का हरा झंडा फहराने लगा। ‘काफिरों’ की तीस हजार औरतों को बग़दाद भेज दिया गया।’
(अल-बिदौरी की फुतुह-उल-बुल्दनः अनु. एलियट और डाउसन खण्ड १)

ब्राहम्नाबाद में कत्लेआम और लूट

‘मुहम्मद बिन कासिम ने सभी काफिर सैनिकों का वध कर दिया और उनके अनुयायियों और आश्रितों को बन्दी बना लिया। सभी बन्दियों को दास बना दिया और प्रत्येक के मूल्य तय कर दिये गये। एक लाख से भी अधिक ‘काफिरों’ को दास बनाया गया।’
(चचनामा अलकुफी : एलियट और डाउसन खण्ड १ पृष्ठ १७९)

सुबुक्तगीन (९७७-९९७)

काफिर द्वारा इस्लाम अस्वीकार देने, और अपवित्रता से पवित्र करने के लिए, जयपाल की राजधानी पर आक्रमण करने के उद्‌देश्य से, सुल्तान ने अपनी नीयत की तलवार तेज की। अमीर लम्घन नामक शहर, जो अपनी महान्‌ शक्ति और भरपूर दौलत के लिए विखयात था, की ओर अग्रसर हुआ। उसने उसे जीत लिया, और निकट के स्थानों, जिनमें काफ़िर बसते थे, में आग लगी दी, मूर्तिधारी मन्दिरों को ध्वंस कर दिया और उनमें इस्लाम स्थापित कर दिया। वह आगे की ओर बढ़ा और उसने दूसरे शहरों को जीता और नींच हिन्दुओं का वध किया; मूर्ति पूजकों का विध्वंस किया और मुसलमानों की महिमा बढ़ाई। समस्त सीमाओं का उल्लंघन कर हिन्दुओं को घायल करने और कत्ल करने के बाद लूटी हुई सम्पत्ति के मूल्य को गिनते गिनते उसके हाथ ठण्डे पड़ गये। अपनी बलात विजय को पूरा कर वह लौटा और इस्लाम के लिए प्राप्त विजयों के विवरण की उसने घोषणा की। हर किसी ने विजय के परिणामों के प्रति सहमति दिखाई और आनन्द मनाया और अल्लाह को धन्यवाद दिया।’
(तारीख-ई-यामिनीः महमूद का मंत्री अल-उत्बी अनु. एलियट और डाउसन खण्ड २ पृष्ठ २२, और तारीख-ई-सुबुक्त गीन स्वाजा बैहागी अनु. एलियट और डाउसन खण्ड २)

गज़नी का महमूद (९७७-१०३०)

भारत के विरुद्ध सुल्तान महमूद के जिहाद का वर्णन उसके प्रधानमंत्री अल-उत्बी द्वारा बड़ी सूक्ष्म सूचनाओं के साथ भी किया गया है और बाद में एलियट और डाउसन द्वारा अंग्रेजी में अनुवाद करके अपने ग्रन्थ, ‘दी स्टोरी ऑफ इण्डिया एज़ टोल्ड बाइ इट्‌स ओन हिस्टोरियन्स, के खण्ड २ में उपलब्ध कराया गया है।’

पुरुद्गापुर (पेशावर) में जिहाद

अल-उत्बी ने लिखा- ‘अभी मध्याह भी नहीं हुआ था कि मुसलमानों ने ‘अल्लाह के शत्रु’, हिन्दुओं के विरुद्ध बदला लिया और उनमें से पन्द्रह हजार को काट कर कालीन की भाँति भूमि पर बिछा दिया ताकि शिकारी जंगली जानवर और पक्षी उन्हें अपने भोजन के रूप् मेंखा सकें। अल्लाह ने कृपा कर हमें लूट का इतना माल दिलाया है कि वह गिनती की सभी सीमाओं से परे है यानि कि अनगिनत है जिसमें पाँच लाख दास, सुन्दर पुरुष और महिलायें हैं। यह ‘महान’ और ‘शोभनीय’ कार्य वृहस्पतिवार मुहर्रम की आठवी ३९२ हिजरी (२७.११.१००१) को हुआ’
(अल-उत्बी-की तारीख-ई-यामिनी, एलियट और डाउसन खण्ड पृष्ठ २७)

नन्दना की लूट

अल-उत्बी ने लिखा- ‘जब सुल्तान ने हिन्द को मूर्ति पूजा से मुक्त कर दिया था, और उनके स्थान पर मस्जिदें खड़ी कर दी थीं, उसके बाद उसने उन लोगों को, जिनके पास मूर्तियाँ थीं, दण्ड देने का निश्चय किया। असंखय, असीमित व अतुल लूट के माल और दासों के साथ सुल्तान लौटा। ये सब इतने अधिक थे कि इनका मूल्य बहुत घट गया और वे बहुत सस्ते हो गये; और अपने मूल निवास स्थान में इन अति सम्माननीय व्यक्तियों को, अपमानित किया गया कि वे मामूली दूकानदारों के दास बना दिये गये। किन्तु यह अल्लाह की कृपा ही है उसका उपकार ही है कि वह अपने पन्थ को सम्मान देता है और गैर-मुसलमानों को अपमान देता है।’
(उसी पुस्तक में पृष्ठ ३९)

थानेश्वर में (कत्लेआम) नरसंहार

अल-उत्बी लिपि बद्ध करता है- ‘इस कारण से थानेश्वर का सरदार अपने अविश्वास में-अल्लाह की अस्वीकृति में-उद्धत था। अतः सुल्तान उसके विरुद्ध अग्रसर हुआ ताकि वह इस्लाम की वास्तविकता का माप दण्ड स्थापित कर सके और मूर्ति पूजा का मूलोच्छेदन कर सके। गैर-मुसलमानों (हिन्दु बौद्ध आदि) का रक्त इस प्रचुरता, आधिक्य व बहुलता से बहा कि नदी के पानी का रंग परिवर्तित हो गया और लोग उसे पी न सके। यदि रात्रि न हुई होती और प्राण बचाकर भागने वाले हिन्दुओं के भागने के चिह्‌न भी गायब न हो गये होते तो न जाने कितने और शत्रुओं का वध हो गया होता। अल्लाह की कृपा से विजय प्राप्त हुई जिसने सर्वश्रेष्ठ पन्थ, इस्लाम, की सदैव के लिए स्थापना की
(उसी पुस्तक में पृष्ठ ४०-४१)
फरिश्ता के मतानुसार, ‘मुहम्मद की सेना, गजनी में, दो लाख बन्दी लाई थी जिसके कारण गजनी एक भारतीय शहर की भाँति लगता था क्योंकि हर एक सैनिक अपने साथ अनेकों दास व दासियाँ लाया था।
(फरिश्ता : एलियट और डाउसन – खण्ड I पृष्ठ २८)

सिरासवा में नर संहार

अल-उत्बी आगे लिखता है- ‘सुल्तान ने अपने सैनिकों को तुरन्त आक्रमण करने का आदेश् दिया। परिणामस्वरूप अनेकों गैर-मुसलमान बन्दी बना लिये गये और मुसलमानों ने लूट के मालकी तब तक कोई चिन्ता नहीं की जब तक उन्होंने अविश्वासियों, (हिन्दुओं) सूर्य व अग्नि के उपासकों का अनन्त वध करके अपनी भूख पूरी तरह न बुझा ली। लूट का माल खोजने के लिए अल्लाह के मित्रों ने पूरे तीन दिनों तक वध किये हुए अविश्वासियों (हिन्दुओं) के शवों की तलाशी ली…बन्दी बनाये गये व्यक्तियों की संखया का अनुमान इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि प्रत्येक दास दो से लेकर दस दिरहम तक में बिका था। बाद में इन्हें गजनी ले जाया गया और बड़ी दूर-दूर के शहरों से व्यापारी इन्हें खरीदने आये थे।…गोरे और काले, धनी और निर्धन, दासता के एक समान बन्धन में, सभी को मिश्रित कर दिया गया।’
(अल-उत्बी : एलियट और डाउसन – खण्ड ii पृष्ठ ४९-५०)

अल-बरूनी ने लिखा था- ‘महमूद ने भारती की सम्पन्नता को पूरी तरह विध्वस कर दिया। इतना आश्चर्यजनक शोषण व विध्वंस किया था कि हिन्दू धूल के कणों की भाँति चारों ओर बिखर गये थे। उनके बिखरे हुए अवशेष निश्चय ही मुसलमानों की चिरकालीन प्राणलेवा, अधिकतम घृणा को पोषित कर रहे थे।’
(अलबरूनी-तारीख-ई-हिन्द अनु. अल्बरुनीज़ इण्डिया, बाई ऐडवर्ड सचाउ, लन्दन, १९१०)

सोमनाथ की लूट

‘सुल्तान ने मन्दिर में विजयपूर्वक प्रवेश किया, शिवलिंग को टुकड़े-टुकड़े कर तोड़ दिया, जितने में समाधान हुआ उतनी सम्पत्ति को आधिपत्य में कर लिया। वह सम्पत्ति अनुमानतः दो करोड़ दिरहम थी। बाद में मन्दिर का पूर्ण विध्वंस कर, चूरा कर, भूमि में मिला दिया, शिवलिंग के टुकड़ों को गजनी ले गया, जिन्हें जामी मस्जिद की सीढ़ियों के लिए प्रयोग किया’
(तारीख-ई-जैम-उल-मासीर, दी स्ट्रगिल फौर ऐम्पायर-भारतीय विद्या भवन पृष्ठ २०-२१)

मुहम्मद गौरी (११७३-१२०६)

हसन निज़ामी ने अपने ऐतिहासिक लेख, ‘ताज-उल-मासीर’, में मुहम्मद गौरी के व्यक्तितव और उसके द्वारा भारत के बलात्‌ विजय का विस्तृत वर्णन किया है।

युद्धों की आवश्यकता और लाभ के वर्णन, जिसके बिना मुहम्मद का रेवड़ अधूरा रह जाता है अर्थात्‌ उसका अहंकार पूरा नहीं होता, के बाद हसन निज़ामी ने कहा ‘कि पन्थ के दायित्वों के निर्वाह के लिए जैसा वीर पुरुष चाहिए वह, सुल्तानों के सुल्तान, अविश्वासियों और बहु देवता पूजकों के विध्वंसक, मुहम्मद गौरी के शासन में उपलब्ध हुआ; और उसे अल्लाह ने उस समय के राजाओं और शहंशाहों में से छांटा था, ‘क्योंकि उसने अपने आपको पन्थ के शत्रुओं के मूलोच्छदन एवं सवंश् विनाश के लिए नियुक्त किया था। उनके हदयों के रक्त से भारत भूमि को इतना भर दिया था, कि कयामत के दिन तक यात्रियों को नाव में बैठकर उस गाढ़े खून की भरपूर नदी को पार करना पड़ेगा। उसने जिस किले पर आक्रमण किया उसे जीत लिया, मिट्‌टी में मिला दिया और उस (किले) की नींव व खम्मों को हाथियों के पैरों के नीचे रोंद कर भस्मसात कर दिया; और मूर्ति पूजकों के सारे विश्व को अपनी अच्छी धार वाली तलवार से काट कर नर्क की अग्नि में झोंक दिया; मन्दिरों, मूर्तियों व आकृतियों के स्थान पर मस्जिदें बना दी।’
(ताज-उल-मासीर : हसन निजामी, अनु. एलियट और डाउसन, खण्ड II पृष्ठ २०९)

अजमेर पर इस्लाम की बलात्‌ स्थापना

हसन निजामी ने लिखा था- ‘इस्लाम की सेना पूरी तरह विजयी हुई और एक लाख हिन्दू तेजी के साथ नरक की अग्नि में चले गये…इस विजय के बाद इस्लाम की सेना आगे अजमेर की ओर चल दी जहाँ हमें लूट में इतना माल व सम्पत्ति मिले कि समुद्र के रहस्यमयी कोषागार और पहाड़ एकाकार हो गये।
‘जब तक सुल्तान अजमेर में रहा उसने मन्दिरों का विध्वंस किया और उनके स्थानों पर मस्जिदें बनवाईं।’
(उसी पुस्तक में पृष्ठ २१५)

देहली में मन्दिरों का ध्वंस

हसन निजामी ने आगे लिखा-‘विजेता ने दिल्ली में प्रवेश किया जो धन सम्पत्ति का केन्द्र है और आशीर्वादों की नींव है। शहर और उसके आसपास के क्षेत्रों को मन्दिरों और मूर्तियों से तथा मूर्ति पूजकों से रहित वा मुक्त बना दिया यानि कि सभी का पूर्ण विध्वंस कर दिया। एक अल्लाह के पूजकों (मुसलमानों) ने मन्दिरों के स्थानों पर मस्जिदें खड़ी करवा दीं, बनवादीं।’
(वही पुस्तक पृष्ठ २२२)

वाराणसी का विध्वंस (शीलभंग)

‘उस स्थान से आगे शाही सेना बनारस की ओर चली जो भारत की आत्मा है और यहाँ उन्होंने एक हजार मन्दिरों का ध्वंस किया तथा उनकी नीवों के स्थानों पर मस्जिदें बनवा दीं; इस्लामी पंथ के केन्द्र की नींव रखी।’
(वही पुस्तक पृष्ठ २२३)

हिन्दुओं के सामूहिक वध के विषय में हसन निजामी आगे लिखता है, ‘तलवार की धार से हिन्दुओं को नर्क की आग में झोंक दिया गया। उनके सिरों से आसमान तक ऊंचे तीन बुर्ज बनाये गये, और उनके शवों को जंगली पशुओं और पक्षियों के भोजन के लिए छोड़ दिया गया।’
(वही पुस्तक पृष्ठ २९८)

इस सम्बन्ध में मिन्हाज़-उज़-सिराज़ ने लिखा था-‘दुर्गरक्षकों में से जो बुद्धिमान एवं कुशाग्र बुद्धि के थे, उन्हें धर्मान्तरण कर मुसलमान बना लिया किन्तु जो अपने पूर्व धर्म पर आरूढ़ रहे, उन्हें वध कर दिया गया।’
(तबाकत-ई-नसीरी-मिन्हाज़, अनु. एलियट और डाउसन, खण्ड II पृष्ठ २२८)

गुजरात में गाज़ी लोग (११९७)

गुज़रात की विजय के विषय में हसन निजामी ने लिखा- ‘अधिकांश हिन्दुओं को बन्दी बना लिया गया और लगभग पचास हजार को तलवार द्वारा वध कर नर्क भेज दिया गया, और कटे हुए शव इतने थे कि मैदान और पहाड़ियाँ एकाकार हो गईं। बीस हजार से अधिक हिन्दू, जिनमें अधिकांश महिलायें ही थीं, विजेताओं के हाथ दास बन गये।
(वही पुस्तक पृष्ठ २३०)

देहली का पवित्रीकरण वा इस्लामीकरण

‘तब सुल्तान देहली वापिस लौटा उसे हिन्दुओं ने अपनी हार के बाद पुनः जीत लिया था। उसके आगमन के बाद मूर्ति युक्त मन्दिर का कोई अवशेष व नाम न बचा। अविश्वास के अन्धकार के स्थान पर पंथ (इस्लाम) का प्रकाश जगमगाने लगा।’
(वही पुस्तक पृष्ठ २३८-३९)

कुतुबुद्दीन ऐबक (१२०६-१२१०)

हसन निजामी ने अपने ऐतिहासिक लेख ताज-उल-मासीर में लिखा था, ‘कुतुबुद्दीन इस्लाम का शीर्ष है और गैर-मुसलमानों का विध्वंसक है…उसने अपने आपको शत्रुओं-हिन्दुओं-के धर्म के मूलोच्छेदन यानी कि पूर्ण विनाश के लिए नियुक्त किया था, और उसने हिन्दुओं के रक्त से भारत भूमि को भर दिया…उसने मूर्ति पूजकों के सम्पूर्ण विश्व को नर्क की अग्नि में झोंक दिया था…और मन्दिरों और मूर्तियों के स्थान पर मस्जिदें बनवादी थीं।’
(ताज-उल-मासीर हसन निजामी अनु. एलियट और डाउसन, खण्ड २ पृष्ठ २०९)

कुतुबुद्दीन ने जामा मस्जिद देहली बनवाई और जिन मन्दिरों को हाथियों से तुड़वाया था, उनके सोने और पत्थरों को इस मस्जिद में लगाकर इसे सजा दिया।’
(वही पुस्तक पृष्ठ २२२)

इस्लाम का कालिंजर में प्रवेश

‘मन्दिरों को तोड़कर, भलाई के आगार, मस्जिदों में रूपान्तरित कर दिया गया और मूर्ति पूजा का नामो निशान मिटा दिया गया….पचार हजार व्यक्तियों को घेरकर बन्दी बना लिया गया और हिन्दुओं को तड़ातड़ मार (यन्त्रणा) के कारण मैदान काला हो गया।
(उसी पुस्तक में पृष्ठ २३१)
‘अपनी तलवार से हिन्दुओं का भीषण विध्वंस कर भारत भूमि को पवित्र इस्लामी बना दिया, और मूर्ति पूजा की गन्दगी और बुराई को समाप्त कर दिया, और सम्पूर्ण देश को बहुदेवतावाद और मूर्तिपूजा से मुक्त कर दिया, और अपने शाही उत्साह, निडरता और शक्ति द्वारा किसी भी मन्दिर को खड़ा नहीं रहने दिया।’
(वही पुस्तक पृष्ठ २१६-१७)

ग्वालियर में इस्लाम

ग्वालियर में कुतुबुद्दीन के जिहाद के विषय में मिन्हाज़ ने लिखा था- ‘पवित्र धर्म युद्ध के लिए अल्लाह के, दैवी, यानी कि कुरान के आदेशानुसार धर्म शत्रुओं-हिन्दुओं-के विरुद्ध उन्होंने रक्त की प्यासी तलवारें बाहर निकाल लीं।’
(टबाकत-ई-नासिरी, मिन्हाज़-उज़-सिराज, अनु. एलियट और डाउसन, खण्ड II पृष्ठ २२७)

मुहम्मद बखितयार खिलजी (१२०४-१२०६)

मुहम्मद बखितयार खिलजी को हिन्दू/बुद्ध शिक्षा केन्द्रों को खोजने और नष्ट करने की विशेष रुचि थी। नालन्दा की लूट के विषय में मिन्हाज़ ने लिखा था-
‘बखितयार बेहर किले के द्वार पर पहुँचा और हिन्दुओं के साथ युद्ध करने लगा। बड़े साहस और अहंकार के साथ द्वार की ओर झपटा और स्थान को अपने अधिकार में कर लिया। विजेताओं के हाथ लूट का अपार माल हाथ लगा। निवासियों में अधिकांश नंगे-मुड़े हुए सिर वाले ब्राहम्ण थे। उनका, सभी का, वध कर दिया गया। वहाँ असंखय पुस्तकें मिलीं और मुसलमानों ने उन्हें देखा और किसी को बुलाकर जानना चाहा कि उनमें क्या लिखा है तो पाया कि वहाँ तो सभी का वध हो चुका है। उनकी समझ में आया कि वह सारा, एक शिक्षा का स्थान है तो सारे स्थल को जलाकर भस्म कर दिया।
(तबाकत-ई-नासिरी, मिन्हाज़-उज़-सिराज, अनु. एलियट और डाउसन, खण्ड II पृष्ठ ३०६)

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Lucknow carries a name after Lakshman as Lakshmanpura


Lucknow carries a name after Lakshman as Lakshmanpura

The Lucknow city was named as Lakshmanpura after the younger brother of Rama. Till 11th century the area was known as Lakhanpur/Lakshmanpur. [1,2] The other names during the process of time were Lakhanvati, then Lakhauti and finally Lakhnau.[3] The legends states that Ramchandra of Ayodhya, the hero of the Ramayana, gifted the territory of Lucknow to his devoted brother Lakshman after he had conquered Lanka and completed his term of exile in the jungle. Therefore, the original name of Lucknow was Lakshmanpur, popularly known as Lakhanpur or Lachmanpur where Lakshman had a beautiful palace. Lakshman Tila, a place in lucknow still exist. So large was Ayodhya that the city of Lakshmanpur was described as its suburb. The area is among the most ancient Vedic cities. 

After 1350, Lucknow and other parts of Awadh region were ruled by the Delhi Sultanate, Sharqi Sultanate, Mughal Empire, Nawabs of Awadh, the British East India Company (EIC) and the British Raj.  The name of Awadh (Aoudh) is derived from Ayodhya. In ancient period, Ayodhya was the capital Kosal Province. [4] Dakshina (Southern) Kosala was stretched till current Odisha region. The Kosala Kingdom was ruled by the Ikshvaku kings, who were famous for their conquests and the protection of Dharma. The last important king of Kosala was Prasenjit. 
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References
[1] Veena Talwar Oldenburg (14 July 2014). The Making of Colonial Lucknow, 1856-1877. Princeton University Press. p. 6. ISBN 978-1-4008-5630-5
[2] P. Nas (1993). Urban Symbolism. BRILL. p. 329. 
[3] Philip Lutgendorf Professor of Hindi and Modern Indian Studies University of Iowa (13 December 2006). Hanuman's Tale : The Messages of a Divine Monkey: The Messages of a Divine Monkey. Oxford University Press. p. 245.
[4] HISTORY OF AWADH (Oudh) a princely State of India by Hameed Akhtar Siddiqui

Lucknow carries a name after Lakshman as Lakshmanpura

The Lucknow city was named as Lakshmanpura after the younger brother of Rama. Till 11th century the area was known as Lakhanpur/Lakshmanpur. [1,2] The other names during the process of time were Lakhanvati, then Lakhauti and finally Lakhnau.[3] The legends states that Ramchandra of Ayodhya, the hero of the Ramayana, gifted the territory of Lucknow to his devoted brother Lakshman after he had conquered Lanka and completed his term of exile in the jungle. Therefore, the original name of Lucknow was Lakshmanpur, popularly known as Lakhanpur or Lachmanpur where Lakshman had a beautiful palace. Lakshman Tila, a place in lucknow still exist. So large was Ayodhya that the city of Lakshmanpur was described as its suburb. The area is among the most ancient Vedic cities.

After 1350, Lucknow and other parts of Awadh region were ruled by the Delhi Sultanate, Sharqi Sultanate, Mughal Empire, Nawabs of Awadh, the British East India Company (EIC) and the British Raj. The name of Awadh (Aoudh) is derived from Ayodhya. In ancient period, Ayodhya was the capital Kosal Province. [4] Dakshina (Southern) Kosala was stretched till current Odisha region. The Kosala Kingdom was ruled by the Ikshvaku kings, who were famous for their conquests and the protection of Dharma. The last important king of Kosala was Prasenjit.
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References
[1] Veena Talwar Oldenburg (14 July 2014). The Making of Colonial Lucknow, 1856-1877. Princeton University Press. p. 6. ISBN 978-1-4008-5630-5
[2] P. Nas (1993). Urban Symbolism. BRILL. p. 329.
[3] Philip Lutgendorf Professor of Hindi and Modern Indian Studies University of Iowa (13 December 2006). Hanuman’s Tale : The Messages of a Divine Monkey: The Messages of a Divine Monkey. Oxford University Press. p. 245.
[4] HISTORY OF AWADH (Oudh) a princely State of India by Hameed Akhtar Siddiqui

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Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

एक सुनार था, उसकी दुकान से मिली हुई एक लोहार की दुकान थी।


एक सुनार था, उसकी दुकान से मिली हुई एक लोहार की दुकान थी।
सुनार जब काम करता तो उसकी दुकान से बहुत धीमी आवाज़ आती, किन्तु जब लोहार काम करता तो उसकी दुकान से कानों को फाड़ देने वाली आवाज़ सुनाई देती।

एक दिन एक सोने का कण छिटक कर लोहार की दुकान में आ गिरा। वहाँ उसकी भेंट लोहार के एक कण के साथ हुई।

सोने के कण ने लोहे के कण से पूछा- भाई हम दोनों का दुख एक समान है, हम दोनों को ही एक समान आग में तपाया जाता है और समान रूप ये हथौड़े की चोट सहनी पड़ती है। मैं ये सब यातना चुपचाप सहता हूँ, पर तुम बहुत चिल्लाते हो, क्यों?

लोहे के कण ने मन भारी करते हुऐ कहा- तुम्हारा कहना सही है, किन्तु तुम पर चोट करने वाला हथौड़ा तुम्हारा सगा भाई नहीं है। मुझ पर चोट करने वाला लोहे का हथौड़ा मेरा सगा भाई है।

परायों की अपेक्षा अपनों द्वारा दी गई चोट अधिक पीड़ा पहुचाँती है।

Posted in हिन्दू पतन

Remembering India’s Forgotten Holocaust


#WhiteManisNoble           #Imperialism       #Racism   

Remembering India’s Forgotten Holocaust
British policies killed nearly 4 million Indians in the 1943-44 Bengal Famine
.
/// It took Adolf Hitler and his Nazi cohorts 12 years to round up and murder 6 million Jews, but their Teutonic cousins, the British, managed to kill almost 4 million Indians in just over a year, with Prime Minister Winston Churchill cheering from the sidelines.
.
Author Madhusree Mukerjee tracked down some of the survivors and paints a chilling picture of the effects of hunger and deprivation. In Churchill’s Secret War, she writes: “Parents dumped their starving children into rivers and wells. Many took their lives by throwing themselves in front of trains. Starving people begged for the starchy water in which rice had been boiled. Children ate leaves and vines, yam stems and grass. People were too weak even to cremate their loved ones.”
.
“No one had the strength to perform rites,” a survivor tells Mukerjee. “Dogs and jackals feasted on piles of dead bodies in Bengal’s villages.” The ones who got away were men who migrated to Calcutta for jobs and women who turned to prostitution to feed their families. “Mothers had turned into murderers, village belles into whores, fathers into traffickers of daughters,” writes Mukerjee.
.
Mani Bhaumik, the first to get a PhD from the IITs and whose invention of excimer surgery enabled Lasik eye surgery, has the famine etched in his memory. His grandmother starved to death because she used to give him a portion of her food. ///

http://www.tehelka.com/remembering-indias-forgotten-holocaust/

‪#‎WhiteManisNoble‬ ‪#‎Imperialism‬ ‪#‎Racism‬

Remembering India’s Forgotten Holocaust
British policies killed nearly 4 million Indians in the 1943-44 Bengal Famine
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/// It took Adolf Hitler and his Nazi cohorts 12 years to round up and murder 6 million Jews, but their Teutonic cousins, the British, managed to kill almost 4 million Indians in just over a year, with Prime Minister Winston Churchill cheering from the sidelines.
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Author Madhusree Mukerjee tracked down some of the survivors and paints a chilling picture of the effects of hunger and deprivation. In Churchill’s Secret War, she writes: “Parents dumped their starving children into rivers and wells. Many took their lives by throwing themselves in front of trains. Starving people begged for the starchy water in which rice had been boiled. Children ate leaves and vines, yam stems and grass. People were too weak even to cremate their loved ones.”
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“No one had the strength to perform rites,” a survivor tells Mukerjee. “Dogs and jackals feasted on piles of dead bodies in Bengal’s villages.” The ones who got away were men who migrated to Calcutta for jobs and women who turned to prostitution to feed their families. “Mothers had turned into murderers, village belles into whores, fathers into traffickers of daughters,” writes Mukerjee.
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Mani Bhaumik, the first to get a PhD from the IITs and whose invention of excimer surgery enabled Lasik eye surgery, has the famine etched in his memory. His grandmother starved to death because she used to give him a portion of her food. ///

Posted in हिन्दू पतन

इतिहास गवाह है कि सेकुलर हिन्दुओं से बेशर्म कोई जाति नही.


Apart from the fact about the Event, the Place and the people It tells volumes about what India and Indians have gone through in the past .

इतिहास गवाह है कि सेकुलर हिन्दुओं से बेशर्म कोई जाति नही..... 

(हो सकता है मेरे शब्द लोगों को बुरे लगे पर गजनवी के बारे में पढ़कर खून जल रहा है कि हिन्दु कैसी कौम है जो कभी गलत का विरोध नही करती. क्यो भगवान और भाग्य के भरोसे बैठे रहते हैं हम. अगर कोई कहता है कि हिन्दुओं ने वीरता का कार्य किया था तो हम अपने यह शब्द वापिस लेकर क्षमा चाहते हैं.) 

एक दिन इंटरनेट पर मुझे एक ऐसी जानकारी प्राप्त हुई जिसे पढ मैं दंग रह गया जिसके अनुसार गजनी मे एक ऐसा स्थान है जहाँ हिन्दु औरतों की नीलामी हुई थी. उस स्थान पर मुसलमानों ने एक स्तम्भ बना रखा है. जिसमे लिखा है- 'दुख्तरे हिन्दोस्तान, नीलामे दो दीनार'. अर्थात इस जगह हिन्दुस्तानी औरतें दो-दो दीनार में नीलाम हुई. उस समय तो यह सब बाते समझ नही आई पर आज उस वाक्य के बारे में जानने की इच्छा हुई. खोजने पर पता चला कि - महमूद गजनवी ने हिन्दुओं को अपमानित करने के लिये अपने 17 हमलों में लगभग 4 लाख हिन्दु औरतें पकड़ कर गजनी उठा ले गया. महमूद गजनवी जब इन औरतों को गजनी ले जा रहा था तो वे अपने भाई, और पतियों से बुला-बुला कर बिलख-बिलख कर रो रही थी. और अपने को बचाने की गुहार लगा रही थी. लेकिन करोडो हिन्दुओं के बीच से मुठ्ठी भर मुसलमान सैनिकों द्वारा भेड़ बकरियों की तरह ले जाई गई. रोती बिलखती इन लाखों हिन्दु नारियों को बचाने न उनके पिता आये, न पति न भाई और न ही इस विशाल भारत के करोड़ो हिन्दु. उनकी रक्षा के लिये न तो कोई अवतार हुआ और न ही कोई देवी देवता आये. महमूद गजनवी ने इन हिन्दु लड़कियों और औरतों को ले जाकर गजनवी के बाजार में समान की तरह बेंच ड़ाला.

संसार की किसी कौम के साथ ऐसा अपमान नही हुआ. जैसा हिन्दु कौम के साथ हुआ. और ऐसा इसलिये हुआ क्योंकि वह सोचते हैं कि जब अत्याचार बढ़ेगा तब भगवान स्वयं उन्हें बचाने आयेंगे परन्तु इतिहास से सबक लेते हुये हिन्दुओं को समझ लेना चाहिये कि भगवान भी अव्यवहारिक अहिंसा व अतिसहिष्णुता को नपुसंकता करार देते हैं. क्योकि भगवान ने अपने सभी अवतारों में यही संदेश दिया है कि अपनी रक्षा स्वयं करों. तुम्हारी आँखे मैने आगे दी हैं गलत का विरोध करो. पीछे मै सदैव तुम्हारे साथ खड़ा हूँ. परन्तु अत्याचारियों का मुकाबला किये बिना, उनके द्वारा मर जाना, स्वर्ग का रास्ता न होकर नरक का रास्ता है. याद रखो-

यह गाल पिटे वह गाल बढ़ाओ, यह तो आर्यो की नीति नही

अन्यायी से प्रेम अहिंसा यह तो गीता की निति नही

हे राम बचाओ जो कहता है, वह कायर है खुद अपना हत्यारा है.

जो करे वीरता अति साहस वही राम का प्यारा है.
उपेन्द्र कुमार 'बागी' (भगवा क्रांतिकारी)
जय श्री राम

इतिहास गवाह है कि सेकुलर हिन्दुओं से बेशर्म कोई जाति नही…..

(हो सकता है मेरे शब्द लोगों को बुरे लगे पर गजनवी के बारे में पढ़कर खून जल रहा है कि हिन्दु कैसी कौम है जो कभी गलत का विरोध नही करती. क्यो भगवान और भाग्य के भरोसे बैठे रहते हैं हम. अगर कोई कहता है कि हिन्दुओं ने वीरता का कार्य किया था तो हम अपने यह शब्द वापिस लेकर क्षमा चाहते हैं.)

एक दिन इंटरनेट पर मुझे एक ऐसी जानकारी प्राप्त हुई जिसे पढ मैं दंग रह गया जिसके अनुसार गजनी मे एक ऐसा स्थान है जहाँ हिन्दु औरतों की नीलामी हुई थी. उस स्थान पर मुसलमानों ने एक स्तम्भ बना रखा है. जिसमे लिखा है- ‘दुख्तरे हिन्दोस्तान, नीलामे दो दीनार’. अर्थात इस जगह हिन्दुस्तानी औरतें दो-दो दीनार में नीलाम हुई. उस समय तो यह सब बाते समझ नही आई पर आज उस वाक्य के बारे में जानने की इच्छा हुई. खोजने पर पता चला कि – महमूद गजनवी ने हिन्दुओं को अपमानित करने के लिये अपने 17 हमलों में लगभग 4 लाख हिन्दु औरतें पकड़ कर गजनी उठा ले गया. महमूद गजनवी जब इन औरतों को गजनी ले जा रहा था तो वे अपने भाई, और पतियों से बुला-बुला कर बिलख-बिलख कर रो रही थी. और अपने को बचाने की गुहार लगा रही थी. लेकिन करोडो हिन्दुओं के बीच से मुठ्ठी भर मुसलमान सैनिकों द्वारा भेड़ बकरियों की तरह ले जाई गई. रोती बिलखती इन लाखों हिन्दु नारियों को बचाने न उनके पिता आये, न पति न भाई और न ही इस विशाल भारत के करोड़ो हिन्दु. उनकी रक्षा के लिये न तो कोई अवतार हुआ और न ही कोई देवी देवता आये. महमूद गजनवी ने इन हिन्दु लड़कियों और औरतों को ले जाकर गजनवी के बाजार में समान की तरह बेंच ड़ाला.

संसार की किसी कौम के साथ ऐसा अपमान नही हुआ. जैसा हिन्दु कौम के साथ हुआ. और ऐसा इसलिये हुआ क्योंकि वह सोचते हैं कि जब अत्याचार बढ़ेगा तब भगवान स्वयं उन्हें बचाने आयेंगे परन्तु इतिहास से सबक लेते हुये हिन्दुओं को समझ लेना चाहिये कि भगवान भी अव्यवहारिक अहिंसा व अतिसहिष्णुता को नपुसंकता करार देते हैं. क्योकि भगवान ने अपने सभी अवतारों में यही संदेश दिया है कि अपनी रक्षा स्वयं करों. तुम्हारी आँखे मैने आगे दी हैं गलत का विरोध करो. पीछे मै सदैव तुम्हारे साथ खड़ा हूँ. परन्तु अत्याचारियों का मुकाबला किये बिना, उनके द्वारा मर जाना, स्वर्ग का रास्ता न होकर नरक का रास्ता है. याद रखो-

यह गाल पिटे वह गाल बढ़ाओ, यह तो आर्यो की नीति नही

अन्यायी से प्रेम अहिंसा यह तो गीता की निति नही

हे राम बचाओ जो कहता है, वह कायर है खुद अपना हत्यारा है.

जो करे वीरता अति साहस वही राम का प्यारा है.
उपेन्द्र कुमार ‘बागी’ (भगवा क्रांतिकारी)
जय श्री राम

Posted in भारत गौरव - Mera Bharat Mahan

VIMANIKA SHATRA


The admin of this page flew back not too many just 50 years and gave a pen drive to Ccharles babbage , the renowned father of computer science saw the pen drive and rubbished it as a useless peice of junk .
In the same spirit of SCIENTIFIC ENQUIRY a Sanaskrit scholar studied the VIMANIKA SHATRA AND RUBBISHED the same.
Placing himself in the same league of great scientific minds !
It is no big deal that Ramayan and Mahabharat mention flying machines and Right wing hindus keep insisting them to be part of their 'itihaas' clearly stating that ONLY PURANAS qualify as mythology .....
But scientific inquiry has rubbished the claims of flying objects , that too by not making any prototypes or doing a long and well funded research on the the shastra , but a mere casual glance was enough to dismiss any claims of flying objects by the Indians !
NOTE : Right wing Hindus keep insisting that ancient science and technology were MORE ADVANCED and not equivalent to modern science . And go even further to claim that SHIVKAR BABPUJI TALPADE , read from the same book , made a flying craft and actualy flew it before the wright brothers .....

The admin of this page flew back not too many just 50 years and gave a pen drive to Ccharles babbage , the renowned father of computer science saw the pen drive and rubbished it as a useless peice of junk .
In the same spirit of SCIENTIFIC ENQUIRY a Sanaskrit scholar studied the VIMANIKA SHATRA AND RUBBISHED the same.
Placing himself in the same league of great scientific minds !
It is no big deal that Ramayan and Mahabharat mention flying machines and Right wing hindus keep insisting them to be part of their ‘itihaas’ clearly stating that ONLY PURANAS qualify as mythology …..
But scientific inquiry has rubbished the claims of flying objects , that too by not making any prototypes or doing a long and well funded research on the the shastra , but a mere casual glance was enough to dismiss any claims of flying objects by the Indians !
NOTE : Right wing Hindus keep insisting that ancient science and technology were MORE ADVANCED and not equivalent to modern science . And go even further to claim that SHIVKAR BABPUJI TALPADE , read from the same book , made a flying craft and actualy flew it before the wright brothers …..