Posted in संस्कृत साहित्य

परिवार कैसे संगठित और सुखी रहे


परिवार कैसे संगठित और सुखी रहे

वेदों के आधार पर ऋषियों ने मानव जीवन को चार आश्रमों में (ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यास) बांटा है। वैदिक धर्म के अतिरिक्त अन्य किसी भी मत-मतान्तर में जीवन का यह वैज्ञानिक वर्गीकरण नहीं पाया जाता। यह वैदिक विचारधारा की महान् विशेषता है। यह जीवन मानो गणित का एक प्रश्न है, जिसमें इन आश्रमों के माध्यम से जोड़ व घटा, गुणा और भाग, चारों का समन्वय पाया जाता है। यदि परिवार के सदस्य इस प्रश्न को समझ लें तो ‘परिवार कैसे संगठित और सुखी रहे’ यह विषय सम्यक्तया समझ में आ सकता है। ऋग्वेद में एक मंत्र है :
इहैव स्तं मा वि यौष्टं विश्वमायर्ुव्यश्नुतम।
क्रीडन्तौ पुत्रैर्नभिर्मोदमानौ स्वे गृहे।
ऋ 10.85.42
वेद मंत्र पति और पत्नी को आशीष दे रहा है : ‘तुम दोनों यहीं रहो, तुम एक दूसरे से अलग न होवो, तुम दोनों सम्पूर्ण आयु को प्राप्त करो, अपने घर में पुत्र पौत्र और नातियों के साथ खेलते हुए आनंदपूर्ण (प्रसन्न) रहो।’
गृहस्थ में संचित शक्तियों का व्यय
ब्रह्मचर्य आश्रम में शारीरिक, मानसिक, बौध्दिक और आत्मिक शक्तियों को इकट्ठा किया जाता है। गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करके इन संचित शक्तियों को गृहस्थ के विभिन्न कामों में खर्च करना पड़ता है। वानप्रस्थ आश्रम में खर्च हुई शक्तियों को ब्रह्मचर्य (संयम से), स्वाध्याय, जप एवं तप द्वारा गुणीभूत करता है और संन्यास आश्रम में अपने संगृहीनत ज्ञान विज्ञान एवं अनुभव को समाज में वितरित करने के लिये कृत संकल्प होना ही वैदिक वर्णाश्रम व्यवस्था का संक्षिप्त सार है।
गृहस्थ को अपनाकर ही मनुष्य जीवन में सौंदर्य एवं निखार आता है। काम मनुष्य की एक प्रबल प्रवृत्ति है, जिसे आज के वैज्ञानिक साधनों टेलीविजन, वी.सी.आर., इन्टरनैट, सत्संग व वैदिक शिक्षा के अभाव, वैदिक दृष्टि वाले मनोरंजन के साधनों का अभाव आदि कारणों ने और अधिक प्रबलतर बना दिया है। किन्तु इस काम प्रवृत्ति का शोभन रूप गृहस्थ में ही प्रकट होता है। यदि गृहस्थ आश्रम का विधान न होता, तो काम अपना भयंकर एवं बीभत्य रूप धारण करके समाज के सुंदर एवं स्वस्थ रूप को कुरुप बना देता है। महर्षि दयानंद ने ‘सत्यार्थ प्रकाश’ में चतुर्थ समुल्लास केवल मात्र इसीलिये लिखा है ताकि इसे पढ़कर इस पर आचरण करके आर्य परिवार अपने गृहस्थ जीवन को सुखी बना सके।
पति पत्नी प्रसन्न रहें
‘सत्यार्थ प्रकाश’ के चतुर्थ समुल्लास में महर्षि दयानन्द ‘स्त्री पुरुष परस्पर प्रसन्न रहें’ इस विषय का वर्णन मनुस्मृति के ‘सन्तुष्टो भार्ययार् भत्ता, भत्र्रा भार्या तथैव च’ आदि कई श्लोकों द्वारा करते हुए कहते हैं : ‘जिस परिवार में पत्नी से पति और पति से पत्नी अच्छे प्रकार प्रसन्न रहते हैं। उसी परिवार में सब सौभाग्य और ऐश्वर्य निवास करते हैं। जहां कलह होता है वहां दौर्भाग्य और दारिद्रय स्थिर होता है।’
विवाह धार्मिक संस्कार
वैदिक दृष्टिकोण के अनुसार विवाह एक धार्मिक संस्कार है। जीवन पर्यन्त यह सम्बंध बना रहेगा। ‘इहैव स्तम्’ विवाह यज्ञ में विनियुक्त यह वेद मंत्र विवाह के सुखी परिवार के उच्च आदर्श को दर्शाता है। पति-पत्नी के संबंध विच्छेद का सर्वथा निषेध करता है। सभा मंडप में उपस्थित विद्वान् लोग इस संबंध में साक्षी हैं। हम दोनों स्वेच्छा से वृध्दावस्था तक एक दूसरे का साथ निभाने की प्रतिज्ञा करते हैं।
पाश्चात्य देशों में पत्नी और पति के होते हुए भी पुरुष अन्य स्त्रियों के साथ और स्त्री अन्य पुरुषों के साथ अपने संबंध स्थापित कर सकती है। वैदिक मान्यता के अनुसार यह निषिध्द है। पाश्चात्य जगत् के विचारक भी अब इन रीतियों से क्षुब्ध हैं। मनु महाराज ने इस उच्छृंखलता को रोकने के लिये यह प्रतिबंध रख दिया :
‘स्वदार निरत: सदा’ (मनु.3/50) मनुष्य को सदा ‘अपनी पत्नी में ही प्रसन्न रहना चाहिये।’
गृहस्थ त्याग सिखाता है
गृहस्थ आश्रम मनुष्य में त्याग की भावना लाता है। स्त्री के त्याग का तो कहना ही क्या है! वह तो त्याग की साक्षात् मूर्ति है। पत्नी गृहस्थ में प्रवेश करते समय अपने माता-पिता, भाइयों और बहिनों का त्याग करती है। साथ उस वातावरण का भी त्याग करती है, जिसमें उसका पालन पोषण हुआ है। गृहस्थ व्यक्ति यह ध्यान करता है कि परिवार में उसके साथ पत्नी भी है, बच्चे भी हैं। सन्तान के लिये दोनों त्याग करते हैं। बच्चों की आवश्यकताओं का पहले ध्यान रखते हैं। जिन भारतीय परिवारों में पाश्चात्य सभ्यता की हवाएं जहां तहां प्रवेश कर रही हैं, वहां भी इकट्ठे मिल बैठकर अभी तक खा रहे हैं। यह त्याग की भावना परिवार को संगठित और सुखी रखने का मूलमंत्र है।
वैदिक परिवार गृहस्थ आश्रम के माध्यम से संबंधों की स्थापना करता है। रिश्ते गृहस्थ आश्रम के ही परिणाम हैं। ये रिश्ते व्यक्ति के जीवन में किस प्रकार शक्ति प्रदान करते हैं। इनसे परिवार संगठित होता है सुखी रहता है। यज्ञोपवीत, मुंडन, विवाह आदि संस्कारों, किसी पर्व विशेष पर यज्ञ आदि के समय प्रसन्नता का वातावरण दर्शनीय होता है।
गाड़ी के दो पहिये
गृहस्थ की गाड़ी के पति और पत्नी दो पहिये हैं। जब दोनों पहिये सुचारु चलेंगे, तो गृहस्थ रूपी गाड़ी ठीक ढंग से चलेगी। दो शरीरों के मिलने का नाम गृहस्थ नहीं है, अपितु दो दिलों के मिलने का नाम गृहस्थ है।
दूसरे के दृष्टिकोण को समझें
एक दूसरे के दृष्टिकोण को समझना भी परिवार को संगठित रखने का अटूट साधन है। पति-पत्नी को, सास और बहू को एक दूसरे का आदर सम्मान करना चाहिये।
धन कमाना आवश्यक
परिवार सुख का एक महत्वपूर्ण आधार है- अर्थोपाजन के पवित्र साधन जुटाना। वैदिक धर्म के आश्रम मर्यादा के अनुसार केवल गृहस्थ ही धन कमाता है, शेष तीन आश्रम नहीं। धन कमाने के साधन निर्दोष हों। प्राय: सासों में पुत्र-वधुओं के प्रति प्रेम का अभाव होता है। वे अपनी बेटियों के प्रति जैसा स्नेह भाव दिखाती हैं, वैसा ही वे अपनी पुत्र-वधुओं के प्रति नहीं दिखातीं। तब पुत्र-वधुओं में सास के लिये श्रध्दाभाव कैसे उत्पन्न होगा? बुध्दिमान सास श्वसुर वहीं हैं, जो अपनी बेटियों से भी अधिक पुत्र वधुओं को सम्मान व प्रेमभाव प्रदान करते हैं।
टोका टाकी से बचें
माता-पिता और सास-श्वसुर के टोकने की आदत भी कलह का कारण है। छोटे त्रुटियां करते हैं और बड़े व्यक्ति टोकते हैं। इस टोकाटाकी से ही परिवार में झगड़े होते हैं। विवाहित बच्चों को कम से कम टोकें, अपने पुत्र व पुत्रवधु की कमियां दूसरों के सामने न कहें और सेवा की आशाएं कम रखें। नयी पीढ़ी को चाहिये कि माता-पिता के अनुभव से लाभ प्राप्त करे। माता-पिता की सेवा अवश्य करें। मनुष्य दु:खी क्यों होता है? इसका एक कारण तो यह है कि उसे जो कुछ जीवन में मिला है, उसकी नजर उस पर कम जाती है और जो नहीं मिला है उस पर उसकी दृष्टि बार-बार जाती है। संतुष्ट होना सबसे बड़ा सुख है। परिवार को संगठित रख सकें और सुखी बना सकें। इसके लिये परिवार में परम्परा डालें, ‘इदन मम’ भावना से परिवार में रहें। ‘संगच्छध्वं संवदध्वं संवो मनांसि जानताम्’ वेदोपदेश से परिवार में सौहार्द बने रहे।

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