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पंजाब केसरी


शार्ली एब्डो ने अपने कवर पेज पर फिर से मुहम्मद का कार्टून छापा ….
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पंजाब केसरी अख़बार की याद आ गयी ..जब पंजाब में आतंकवाद चरम पर था तब खालिस्तान आतंकियों ने सभी अखबारों से कहा था की उन्हें आतंकवादी नही बल्कि खडाकू लिखे … भारत के सारे फट्टू अखबारों ने डरकर खडाकू लिखना शुरू कर दिया था सिर्फ पंजाब केसरी अख़बार उन्हें आतंकवादी लिखता था .. खालिस्तानी आतंकियों ने पंजाब केसरी के मालिक लाला जगत नारायण की गोली मारकर हत्या कर दी … लेकिन उनके बेटे ने बिना डरे उन्हें आतंकवादी ही लिखना जारी रखे .. फिर आतंकियों ने उनकी भी हत्या कर दी … फिर लाला जगत नारायण ने पोते ने भी उन्हें आतंकवादी ही लिखना जारी रखा …..
आतंकी कलम की ताकत से डर गये लेकिन दो दो पीढियों को खोने के बाद भी अख़बार पंजाब केसरी नही डरा …

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आध्यात्मिक उन्नति में परिवार का महत्व


आध्यात्मिक उन्नति में परिवार का महत्व

परिवार परंपरा को प्रोत्साहित करने में ऋषियों का मंतव्य केवल इतना ही नहीं रहा कि व्यक्ति एक से अधिक होकर रहे, दुख, तकलीफ पड़ने पर उसका हाथ बांटने वाला उसके साथ हो, व्यक्ति व्यवस्थित रूप में स्थायी होकर रहे और परिजनों के साथ अधिक उल्लासपूर्ण जीवन-यापन करे। इस मंतव्य के साथ उनका इससे कहीं एक ऊंचा मंतव्य भी रहा है, वह यह कि परिवार के माध्यम से मनुष्य आत्म कल्याण की ओर भी अग्रसर हो। उसमें सामाजिकता, नागरिकता और सबसे बड़ी बात विश्व मानवता का कल्याणकारी भाव जागे। वह अपने जैसे मनुष्यों के लिये त्याग, सहानुभूति रख सके, उसकी सेवा सुश्रूषा तथा सहायता करने को तत्पर रहे, यही आत्म-उन्नति के लक्षण हैं। पारिवारिक जीवन में इन आध्यात्मिक गुणों के विकास का पूरा-पूरा अवसर रहता है।
गृहस्थाश्रम का मुख्य उद्देश्य
आज जब कोई अनेक बच्चों का पिता बन जाता है तो उसका सारा जीवन ही उसके परिवार का हो जाता है। उसका अपना कुछ नहीं रहा। कहने के लिये उसका अपना कुछ नहीं है सब कुछ उसके बच्चों का है। आज न वह पूर्ववत स्वार्थी है न संकीर्ण और अनुदार। यदि उसने पारिवारिक जीवन न अपनाया होता और उत्तरदायित्व न समझा होता तो न उसकी आत्मा का विस्तार पत्नी तक होता और न बच्चों तक फैलता। वह स्वार्थी एवं संकीर्ण बन हुआ पशुओं की तरह जड़ एवं अविकसित जीवन बिता रहा होता।
त्याग, सहानुभूति, संवेदना, स्ेह तथा अन्यों से आत्मीयता का क्या सुख होता है इस अनुभव से वह सदा अनभिज्ञ रहता। यह पवित्र पारिवारिक जीवन का ही प्रभाव है कि उसकी आत्मा के संकीर्ण बंधन शिथिल हुए और विस्तार हो सका। इसी प्रकार पत्नी से परिवार और परिजनों से पार्श्वजनों और पार्श्चजनों से पुरजनों में फैलती हुई उसकी आत्मीयता विश्व तक जा पहुंचे तो सहज ही कड़ी-कड़ी करके उसकी आत्मा के बंधन ढीले हो जायेंगे और वह मानव जीवन का अंतिम लक्ष्य मुक्ति अथवा मोक्ष की उपलब्धि प्राप्त कर ले।
पारिवारिक जीवन एवं गृहस्थ आश्रम की व्यवस्था देने में ऋषियों का मुख्य उद्देश्य यही था, सांसारिक सुख सुविधा तो स्वाभाविक एवं मौन थी। किन्तु खेद है कि पारिवारिक जीवन के इस महत्वपूर्ण एवं कल्याणकारी अनुपम उद्देश्य की ओर किसी का ध्यान ही नहीं जाता।
यही नहीं पारिवारिक व्यवस्था के सामान्य एवं स्वाभाविक सुख-शांति के उद्देश्य से भी हाथ धो डाले गये हैं। आज का गृहस्थ जीवन तो निरुद्देश्य की खींचतान एवं तनातनी से भरकर रह गया है। जिस व्यवस्था से इतने बड़े श्रेयपूर्ण आत्मोध्दार के उद्देश्य की पूर्ति की जा सकती है, वह आज पाप जैसे अभिशाप से भरा हुआ वर्तमान में तो नारकीय यातना ही दे रहा है, भविष्य के लिये भी नरक के द्वार खोल रहा है। यह कुछ कम दुर्भाग्य की बात नहीं है।
अनेक लोग परिवार को आत्मोन्नति के मार्ग के बाधक मानते हैं। उनका कहना होता है- परिवार पालन के दायित्व के कारण मनुष्य को दिन-रात सांसारिक उलझनों में फंसा रहना पड़ता है। उसे बाल बच्चों की चिंता से ही अवकाश नहीं मिलता, फिर भला वह आत्मोध्दार के लिये किस प्रकार प्रयत्न कर सकता है। इस प्रकार सोचने वाले गलत रूप से सोचते हैं। उलझनों का कारण परिवार नहीं बल्कि वह गलत व्यवस्था है जिसकी ओर लोग प्रमादवश, ध्यान नहीं देते और परिवार की गाड़ी उल्टी-सीधा खींचते चले जा रहे हैं। किसी भी वस्तु का गलत प्रयोग ही उसे हानिकारक बना देता है।
जो परिवार त्याग, उदारता, सहयोग एवं स्ेह के आधार पर मतैक्य की डोरी से मजबूती के साथ बंधे रहते हैं और जिनमें अनुशासन, शिष्टाचार, सदाचार, नियम एवं मर्यादाओं का यथोचित पालन किया जाता है, उनमें सभी सदस्य लौकिक सुख शांति के साथ आत्म-विकास अथवा आत्मोध्दार का आध्यात्मिक उद्देश्य भी पूरा कर सकने का अवसर पा सकते हैं। जिन परिवारों में दिन-रात कलह क्लेश और स्वार्थपूर्ण हाय-तोबा मची रहती है, वे स्वभावत: आत्म-पतन एवं आत्म बंधन के हेतु बनेंगे ही।
आत्मोंध्दार का सहायक
कौटुम्बिक जीवन आत्म विकास का एक सुअवसर है, किन्तु तब, जब इसका उपयोग उस दिशा में किया जाए। विस्तार करते हुए सार्वभौमिक आत्मीयता की अनुभूति प्राप्त की जाए। किन्तु होता यह है कि लोग अपने प्रिय एवं परिजनों तक ही आत्मा का विस्तार करके रूक जाया करते हैं। परिवार के प्रति उनकी सारी आत्मीयता के पीछे यह सब मेरे है का भाव ही सक्रिय रहा करता है। इसलिए उनके प्रति किया हुआ उनका सारा उपकार आध्यात्मिक दिशा में निष्फल चला जाता है। ममत्व के भाव के साथ किया हुआ शुभ कार्य भी परमार्थ की सूची में अंकित नहीं हो सकता, फिर चाहे वह नि:स्वार्थ अथवा निर्लोभ ही क्यों न हो? मेरे अपने के भाव से किसी के प्रति भी किया हुआ कोई भी उपकार घूम फिरकर अपने लिये ही किया हुआ माना जाएगा। अपने लिये अथवा अपने आत्म-संतोष के लिये किया हुआ बड़े से बड़ा परमार्थ भी स्वार्थ ही है।
पारिवारिक जीवन को आत्मोध्दार में सहायक बनाने के लिये मनुष्य को आध्यात्मिक दृष्टिकोण से ही परिवार बसाना चाहिये। बहुधा परिवार बसाने में लोगों का दृष्टिकोण महत्वपूर्ण नहीं होता है। उनके मस्तिष्क में एक ही यही बात रहती है कि समाज में वे एक घर-बार वाले व्यक्ति समझे जाएंगे। लोग उन पर विश्वास करेंगे और वे समाज में एक उत्तरदायी गौरव पाएंगे। पत्नी में उनके प्रणय और बच्चों में स्ेह को आश्रय मिलेगा।
अपने पेट को गौण मानकर बेटे के लिये आजीवन अनवरत श्रम करने का साहस कोई बाप ही कर सकता है। पाल-पोस कर बड़ा कर दिया। शिक्षा-दीक्षा पूरी कराई, विवाह-शादी करा दी, धंधा लग गया। पिता से पुत्र की कमाई बढ़ गयी। उसके अपने बेटे हो गये। उसके अपने शौक हो गये, स्त्री की आकांक्षाएं बढ़ीं, बेटे ने बाप के सारे उपकारों पर पानी फेर दिया। कोई न कोई बहाना बनाकर बाप से अलग हो गया। हाय री तृष्णा। तेरे लिये इतना सब कुछ किया और तू उसकी वृध्दावस्था की वैसाखी भी न बन सका। इससे बढ़कर इस संसार में कौन सा पाप हो सकता है। अपने स्वार्थ, भोग-लिप्सा, स्वेच्छाचारिता के लिये बाप को ठुकरा देने वालों को पामर न कहा जाए तो और कौन सा संबोधन उचित हो सकता है? परिवार में पिता को सम्मान मिलता है तो उनके दीर्घकालीन अनुभव योग्य संचालन, पथ-प्रदर्शन, भावी योजनाओं को नियंत्रित करने का लाभ भी परिवार को मिलता है। अपने प्रेम, वात्सल्य, करुणा, उदारता, संगठनात्मक बुध्दि से वह सब पर छाया किये रहता है। वह परिवार का पालन करता है।
माता-पिता की उचित सेवा-टहल एवं देखरेख करना परमात्मा की उपासना से कम फलदायक नहीं होता। इस युग में पिता और पुत्र के संबंधों में जो कड़वाहट आ गयी है वह मनुष्य के संकुचित दृष्टिकोण और स्वार्थपूर्ण प्रवृत्ति के परिणाम स्वरूप ही है। पिता पुत्र के लिये अपना सर्वस्व अर्पित कर दे और पुत्र व्यक्तिगत स्वतंत्रता के लिये अनुशासन की अवज्ञा करे तो उस बेटे को निंदनीय ही समझा जाना चाहिये।
माता-पिता का स्थान
मनुष्य का सबसे शुभचिंतक मित्र हितैषी, पथ प्रदर्शक उदार जीवन रक्षक पिता ही होता है। वह चाहता है कि पुत्र को किस रास्ते लगाया जाए कि सुखी हो, समुन्नत हो, क्योंकि उसकी त्रुटियों का ज्ञान पिता को ही होता है। जो इन विशेषताओं का लाभ नहीं उठाते उन्हें अंत में दु:ख और दैन्य का ही मुंह देखना पड़ता है। पिता और पुत्र, पिता और पुत्री के संबंध बड़े कोमल, मधुर और सात्विक होते हैं। इस आध्यात्मिक संबंध का सहृयतापूर्वक पालन करने वाले व्यक्ति देवश्रेणी में आते हैं। उनकी मान और प्रतिष्ठा होनी चाहिये। परिवार में माता का स्थान पिता के समतुल्य ही होता है। एक-दूसरे को बड़ा-छोटा नहीं कहा जा सकता। पिता कर्म है तो माता भावना, कर्म और भावना के सम्मिश्रण से जीवन की पूर्णता आती है। गृहस्थी की पूर्णत: तब है, जब उसमें पिता और माता दोनों को समान रूप से सम्मान मिले। माता का महत्व किसी भी अवस्था में कम नहीं हो सकता। व्यक्ति का भावनात्मक प्रशिक्षण माता करती है। उसी के रक्त, मांस और ओजस से बालक का निर्माण होता है। कितने कष्ट सहती है। वह बेटे के लिये। स्वयं गीले बिस्तर में सोकर बच्चे को सूखे में सुलाते रहने की कष्टदायक क्रिया पूरी करने की हिम्मत भला है किसी में? माता का हृदय दया और पवित्रता से ओतप्रोत होता है, उसे जलाओं तो भी दया की सुंगध निकलती है, पीसो तो दया का ही रस निकलता है। ऐसी दया और ममत्व की मूर्ति माता को जिसने पूज्यभाव से नहीं देखा, उसका सम्मान नहीं किया, आदर की भावनाएं व्यक्त नहीं कीं, वह मनुष्य नर पिशाच ही कहलाने योग्य हो सकता है।

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गृहस्थ आश्रम व्यवस्था


गृहस्थ आश्रम व्यवस्था

अनिरुद्ध जोशी ‘शतायु’

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*धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष।
*ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास।
*धर्म से मोक्ष और अर्थ से काम साध्‍य माना गया है। ब्रह्मचर्य और गृहस्थ जीवन में धर्म, अर्थ और काम का महत्व है। वानप्रस्थ और संन्यास में धर्म प्रचार तथा मोक्ष का महत्व माना गया है।

पुष्‍ट शरीर, बलिष्ठ मन, संस्कृत बुद्धि एवं प्रबुद्ध प्रज्ञा लेकर ही विद्यार्थी ग्रहस्थ जीवन में प्रवेश करता है। विवाह कर वह सामाजिक कर्तव्य निभाता है। संतानोत्पत्ति कर पितृऋण चुकता करता है। यही पितृ यज्ञ भी है। पाँच महायज्ञों का उपयुक्त आसन भी यही है।

में पूर्ण उम्र के सौ वर्ष माने हैं। इस मान से जीवन को चार भाग में विभक्त किया गया है। उम्र के प्रथम 25 वर्ष को शरीर, मन और ‍बुद्धि के विकास के लिए निर्धारित किया है। इस काल में ब्रह्मचर्य आश्रम में रहकर धर्म, अर्थ और काम की शिक्षा ली जाती है। दूसरा गृहस्थ आश्रम माना गया है। गृहस्थ काल में व्यक्ति सभी तरह के भोग को भोगकर परिपक्व हो जाता है।

गृहस्थ के कर्तव्य :
गृहस्थ आश्रम 25 से 50 वर्ष की आयु के लिए निर्धारित है, जिसमें धर्म, अर्थ और काम की शिक्षा के बाद विवाह कर पति-पत्नी धार्मिक जीवन व्यतीत करते हुए काम का सुख लेते हैं। परिवार के प्रति अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह करते हैं। उक्त उम्र में व्यवसाय या अन्य कार्य को करते हुए धर्म को कायम रखते हैं। धर्म को कायम रखने से ही गृहस्थ जीवन खुशहाल बनता है और जो धर्म को कायम नहीं रखकर उस पर तर्क-वितर्क करता है या उसकी मजाक उड़ाता है, तो दुख उसका साथ नहीं छोड़ते।

गृहस्थ को वेदों में उल्लेखित विवाह करने के पश्चात्य, संध्योपासन, व्रत, तीर्थ, उत्सव, दान, यज्ञ, श्राद्ध कर्म, पुत्री और पुत्र के संस्कार, धर्म और समाज के नियम व उनकी रक्षा का पालन करना चाहिए। सभी वैदिक कर्तव्य तथा नैतिकता के नियमों को मानना चाहिए। नहीं मानने के लिए भी वेद स्वतंत्रता देता है, क्योंकि वेद स्वयं जानते हैं कि स्वतंत्र वही होता है जो मोक्ष को प्राप्त है।

मनमाने नियमों को मानने वाला समाज बिखर जाता है। वेद विरुद्ध कर्म करने वाले के कुल का क्षय हो जाता है। कुल का क्षय होने से समाज में विकृतियाँ उत्पन्न होती है। ऐसा समाज कुछ काल के बाद अपना अस्तित्व खो देता है। भारत के ऐसे बहुत से समाज हैं जो अब अपना मूल स्वरूप खोकर अन्य धर्म और संस्कृति का हिस्सा बन गए हैं, जो अन्य धर्म और संस्कृति का हिस्सा बन गए हैं उनके पतन का भी समय तय है। ऐसा वेदज्ञ कहते हैं, क्योंकि वेदों में भूत, भविष्य और वर्तमान की बातों के अलावा विज्ञान जहाँ समाप्त होता है वेद वहाँ से शुरू होते हैं।

ब्रह्मचर्य और गृहस्थ आश्रम में रहकर धर्म, अर्थ और काम के बाद व्यक्ति को 50 वर्ष की उम्र के बाद वानप्रस्थ आश्रम में रहकर धर्म और ध्यान का कार्य करते हुए मोक्ष की अभिलाषा रखना चाहिए अर्थात उसे मुमुक्ष हो जाना चाहिए। यही वेद सम्मत नीति है। जो उक्त नीति से हटकर कार्य करता है वह भारतीय सनातन संस्कृति, दर्शन और धर्म की धारा का नहीं है। इस सनातन पथ पर जो नहीं है वह भटका हुआ है।

पुराणकारों अनुसार गृहस्थाश्रम के दो भेद किए गए हैं। गृहस्थाश्रम में रहने वाले व्यक्ति ‘साधक’ और ‘उदासीन’ कहलाते हैं। पहला वह व्यक्ति जो अपनी गृहस्थी एवं परिवार के भरण-पोषण में लगा रहता है, उसे ‘साधक गृहस्थ’ कहलाते हैं और दूसरा वह व्यक्ति जो देवगणों के ऋण, पितृगणों के ऋण तथा ऋषिगण के ऋण से मुक्त होकर निर्लिप्त भाव से अपनी पत्नी एवं सम्पत्ति का उपभोग करता है, उसे ‘उदासीन गृहस्थ’ कहते हैं।

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आश्रम


आश्रम

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प्राचीन काल में सामाजिक व्यवस्था के दो स्तंभ थे – वर्ण और आश्रम। मनुष्य की प्रकृति-गुण, कर्म और स्वभाव-के आधार पर मानवमात्र का वर्गीकरण चार वर्णो में हुआ था। व्यक्तिगत संस्कार के लिए उसके जीवन का विभाजन चार आश्रमों में किया गया था। ये चार आश्रम थे-

(१) ब्रह्मचर्य, (२) गार्हस्थ्य, (३) वानप्रस्थ और (४) संन्यास।

अमरकोश (७.४) पर टीका करते हुए भानु जी दीक्षित ने ‘आश्रम’ शब्द की व्याख्या इस प्रकार की है: आश्राम्यन्त्यत्र। अनेन वा। श्रमु तपसि। घञ््‌ा। यद्वा आ समंताछ्रमोऽत्र। स्वधर्मसाधनक्लेशात्‌। अर्थात्‌ जिसमें स्म्यक्‌ प्रकार से श्रम किया जाए वह आश्रम है अथवा आश्रम जीवन की वह स्थिति है जिसमें कर्तव्यपालन के लिए पूर्ण परिश्रम किया जाए। आश्रम का अर्थ ‘अवस्थाविशेष’ ‘विश्राम का स्थान’, ‘ऋषिमुनियों के रहने का पवित्र स्थान’ आदि भी किया गया है।

आश्रमसंस्था का प्रादुर्भाव वैदिक युग में हो चुका था, किंतु उसके विकसित और दृढ़ होने में काफी समय लगा। वैदिक साहित्य में ब्रह्मचर्य और गार्हस्थ्य अथवा गार्हपत्य का स्वतंत्र विकास का उल्लेख नहीं मिलता। इन दोनों का संयुक्त अस्तित्व बहुत दिनों तक बना रहा और इनको वैखानस, पर्व्राािट्, यति, मुनि, श्रमण आदि से अभिहित किया जाता था। वैदिक काल में कर्म तथा कर्मकांड की प्रधानता होने के कारण निवृत्तिमार्ग अथवा संन्यास को विशेष प्रोत्साहन नहीं था। वैदिक साहित्य के अंतिम चरण उपनिषदों में निवृत्ति और संन्यास पर जोर दिया जाने लगा और यह स्वीकार कर लिया गया था कि जिस समय जीवन में उत्कट वैराग्य उत्पन्न हो उस समय से वैराग्य से प्रेरित होकर संन्यास ग्रहण किया जा सकता है। फिर भी संन्यास अथवा श्रमण धर्म के प्रति उपेक्षा और अनास्था का भाव था।

सुत्रयुग में चार आश्रमों की परिगणना होने लगी थी, यद्यपि उनके नामक्रम में अब भी मतभेद था। आपस्तंब धर्मसूत्र (२.९.२१.१) के अनुसार गार्हस्थ्य, आचार्यकुल (=ब्रह्मचर्य), मौन तथा वानप्रस्थ चार आश्रम थे। गौतमधर्मसूत्र (३.२) में ब्रह्मचारी, गृहस्थ, भिक्षु और वैखानस चार आश्रम बतलाए गए हैं। वसिष्ठधर्मसूत्र (७.१.२) में गृहस्थ, ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ तथा पर्व्राािजक, इन चार आश्रमों का वर्णन किया है, किंतु आश्रम की उत्त्पति के संबंध में बतलाया है कि अंतिम दो आश्रमों का भेद प्रह्लाद के पुत्र कपिल नामक असुर ने इसलिए किया था कि देवताओं को यज्ञों का प्राप्य अंश न मिले और वे दुर्बल हो जाएँ (६.२९.३१)। इसका संभवत: यह अर्थ हो सकता है कि कायक्लेशप्रधान निवृत्तिमार्ग पहले असुरों में प्रचलित था और आर्यो ने उनसे इस मार्ग को अंशत: ग्रहण किया, परंतु फिर भी ये आश्रम उनको पूरे पंसद और ग्राह्य न थे।

बौद्ध तथा जैन सुधारणा ने आश्रम का विरोध नहीं किया, किंतु प्रथम दो आश्रमों-ब्रह्मचर्य और गार्हस्थ्य-की अनिवार्यता नहीं स्वीकार की। इसके फलस्वरूप मुनि अथवा यतिवृत्ति को बड़ा प्रोत्साहन मिला और समाज में भिक्षुओं की अगणित वृद्धि हुई। इससे समाज तो दुर्बल हुआ ही, अपरिपक्व संन्यास अथवा त्याग से भ्रष्टाचार भी बढ़ा। इसकी प्रतिक्रिया और प्रतिसुधारण ई. पू. दूसरी सदी अथवा शुंगवंश की स्थापना से हुई। मनु आदि स्मृतियों में आश्रमधर्म का पूर्ण आग्रह और संघटन दिखाई पड़ता है। पूरे आश्रमधर्म की प्रतिष्ठा और उनके क्रम की अनिवार्यता भी स्वीकार की गई। ‘आश्रमात्‌ आश्रमं गच्छेत्‌’ अर्थात्‌ एक आश्रम से दूसरे आश्रम को जाना चाहिए, इस सिद्धांत को मनु ने दृढ़ कर दिया।

स्मृतियों में चारों आश्रमों के कर्तव्यों का विस्तृत वर्णन मिलता है। मनु ने मानव आयु सामान्यत: एक सौ वर्ष की मानकर उसको चार बराबर भागों में बांटा है। प्रथम चतुर्थांश ब्रह्मचर्य है। इस आश्रम में गुरुकुल में रहकर ब्रह्मचर्य का पालन करना कर्तव्य है। इसका मुख्य उद्देश्य विद्या का उपार्जन और ्व्रात का अनुष्ठान है। मनु ने ब्रह्मचारी के जीवन और उसके कर्तव्यों का वर्णन विस्तार के साथ किया (अध्याय २, श्लोक ४१-२४४)। ब्रह्मचर्य उपनयन संस्कार के साथ प्रारंभ और समावर्तन के साथ समाप्त होता है। इसके पश्चात्‌ विवाह करके मुनष्य दूसरे आश्रम गार्हस्थ्य में प्रवेश करता है। गार्हस्थ्य समाज का आधार स्तंभ है। जिस प्रकार वायु के आश्रम से सभी प्राणी जीते हैं उसी प्रकार गृहस्थ आश्रम के सहारे अन्य सभी आश्रम वर्तमान रहते हैं (मनु. ३७७)। इस आश्रम में मनुष्य ऋषिऋण से वेद से स्वाध्याय द्वारा, देवऋण से यज्ञ द्वारा और पितृऋण से संतानोत्पत्ति द्वारा मुक्त होता है। इसी प्रकार नित्य पंचमहायज्ञों-ब्रह्मयज्ञ, देवयज्ञ, अतिथियज्ञ तथा भूतयज्ञ-के अनुष्ठान द्वारा वह समाज एवं संसार के प्रति अपने कर्तव्यों का पालन करता है। मनुस्मृत्ति के चतुर्थ एवं पंचम अध्याय में गृहस्थ के कर्त्तव्यों का विवेचन पाया जाता है। आयु का दूसरा चतुर्थाश गार्हस्थ्य में बिताकर मनुष्य जब देखता है कि उसके सिर के बाल सफेद हो रहे हैं और उसके शरीर पर झुर्रियाँ पड़ रही हैं तब वह जीवन के तीसरे आश्रम-वानप्रस्थ-में प्रवेश करता है। (मनु. ५, १६९)। निवृत्ति मार्ग का यह प्रथम चरण है। इसमें त्याग का आंशिक पालन होता है। मनुष्य सक्रिय जीवन से दूर हो जाता है, किंतु उसके गार्हस्थ्य का मूल पत्नी उसके साथ रहती है और वह यज्ञादि गृहस्थधर्म का अंशत: पालन भी करता है। परंतु संसार का क्रमश: त्याग और यतिधर्म का प्रारंभ हो जाता है (मनु.६)। वानप्रस्थ के अनंतर शांतचित्त, परिपक्व वयवाले मनुष्य का पार्व्राािज्य (संन्यास) प्रारंभ होता है। (मनु.६,३३)। जैसा पहले लिखा गया है, प्रथम तीन आश्रमों ओर उनके कर्त्तव्यों के पालन के पश्चात्‌ ही मनु संन्यास की व्यवस्था करते हैं:एक आश्रम से दूसरे आश्रम में जाकर, जितेंद्रिय हो, भिक्षा (ब्रह्मचर्य), बलिवैश्वदेव (गार्हस्थ्य तथा वानप्रस्थ) आदि से विश्राम पाकर जो संन्यास ग्रहण करता है वह मृत्यु के उपरांत मोक्ष प्राप्त कर अपनी (पारमार्थिक) परम उन्नति करता है (मनु.६,३४)। जो सब प्राणियों को अभय देकर घर से प्र्व्राजित होता है उस ब्रह्मवादी के तेज से सब लोक आलोकित होते हैं (मनु. ६,३९)। एकाकी पुरुष को मुक्ति मिलती है, यह समझता हुआ संन्यासी सिद्धि की प्राप्ति के लिए नित्य बिना किसी सहायक के अकेला ही बिचरे; इस प्रकार न वह किसी को छोड़ता है और न किसी से छोड़ा जाता है (मनु. ६,४२)। कपाल (भग्न मिट्टी के बर्तन के टुकड़े) खाने के लिए, वृक्षमूल रहने के लिए तथा सभी प्राणियों में समता व्यवहार के लिए मुक्त पुरुष (संन्यासी) के लक्षण हैं (मनु. ६,४४)।

आश्रमव्यवस्था का जहाँ शारीरिक और सामाजिक आधार है, वहाँ उसका आध्यात्मिक अथवा दार्शनिक आधार भी है। भारतीय मनीषियों ने मानव जीवन को केवल प्रवाह न मानकर उसको सोद्देश्य माना था और उसका ध्येय तथा गंतव्य निश्चित किया था। जीवन को सार्थक बनाने के लिए उन्होंने चार पुरुषार्थों-धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष-की कल्पना की थी। प्रथम तीन पुरुषार्थ साधनरूप से तथा अंतिम साध्यरूप से व्यवस्थित था। मोक्ष परम पुरुषार्थ, अर्थात्‌ जीवन का अंतिम लक्ष्य था, किंतु वह अकस्मात्‌ अथवा कल्पनामात्र से नहीं प्राप्त हो सकता है। उसके लिए साधना द्वारा क्रमश: जीवन का विकास और परिपक्वता आवश्यक है। इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए भारतीय समाजशास्त्रियों ने आश्रम संस्था की व्यवस्था की। आश्रम वास्तव में जीव का शिक्षणालय अथवा विद्यालय है। ब्रह्मचर्य आश्रम में धर्म का एकांत पालन होता है। ब्रह्मचारी पुष्टशरीर, बलिष्ठबुद्धि, शांतमन, शील, श्रद्धा और विनय के साथ युगों से उपार्जित ज्ञान, शास्त्र, विद्या तथा अनुभव को प्राप्त करता है। सुविनीत और पवित्रात्मा ही मोक्षमार्ग का पथिक्‌ हो सकता है। गार्हस्थ्य में धर्म पूर्वक अर्थ का उपार्जन तथा काम का सेवन होता है। संसार में अर्थ तथा काम के अर्जन और उपभोग के अनुभव के पश्चात्‌ ही त्याग और संन्यास की भूमिका प्रस्तुत होती है। संयमपूर्वक ग्रहण के बिना त्याग का प्रश्न उठता ही नहीं। वानप्रस्थ तैयार होती है। संन्यास के सभी बंधनों का त्याग कर पूर्णत: मोक्षधर्म का पालन होता है। इस प्रकार आश्रम संस्था में जीवन का पूर्ण उदार, किंतु संयमित नियोजन था।

शास्त्रों में आश्रम के संबंध में कई दृष्टिकोण पाए जाते हैं जिनको तीन वर्गो में विभक्त किया जा सकता है। (१) समुच्चय, (२) विकल्प और बाध। समुच्चय का अर्थ है सभी आश्रमों का समुचित समाहार, अर्थात्‌ चारों आश्रमों का क्रमश: और समुचित पालन होना चाहिए। इसके अनुसार गृहस्थाश्रम में अर्थ और काम संबंधी नियमों का पालन उतना ही आवश्यक है जितना ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ एवं संन्यास में धर्म और मोक्षसंबंधी धर्मो का पालन। इस सिद्धांत के सबसे बड़े प्रवर्तक और समर्थक मनु (अ.४ तथा६) हैं। दूसरे सिद्धांत विकल्प का अर्थ यह है कि ब्रह्मचर्य आश्रम के पश्चात्‌ व्यक्ति को यह विकल्प करने की स्वतंत्रता है कि वह गार्हस्थ्य आश्रम में प्रवेश करे अथवा सीधे संन्यास ग्रहण करे। समावर्तन से संदर्भ में ब्रह्मचारी दो प्रकार के बताए गए हैं। (१) उपकुर्वाण, जो ब्रह्मचर्य समाप्त कर गृहस्थाश्रम में प्रवेश करना चाहता था और (२) नैष्ठिक, जो आजीवन गुरुकुल में रहकर ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहता था। इसी प्रकार स्त्रियों में ब्रह्मचर्य के पश्चात सद्योद्वाहा (तुरंत विवाहयोग्य) और ब्रह्मवादिनी (आजीवन ब्रह्मोपासना में लीन) होती थीं। यह सिद्धांत जाबालोपनिषद् तथा कई धर्मसूत्रों (वसिष्ठ तथा आपस्तंब) और कतिपय स्मृतियों (याज्ञ., लघु, हारीत) में प्रतिपादित किया गया है। बाध का अर्थ है सभी आश्रमों के स्वतंत्र अस्तित्व अथवा क्रम को न मानना अथवा आश्रम संस्था को ही न स्वीकार करना। गौतम तथा बौधायनधर्मसूत्रों में यह कहा गया है कि वास्तव में एक ही आश्रम गार्हस्थ्य है। ब्रहाचर्य उसकी भूमिका है:श्वानप्रस्थ और संन्यास महत्व में गौण (और प्राय: वैकल्पिक) हैं। मनु ने भी सबसे अधिक महत्व गार्हस्थ्य का ही स्वीकार किया गया है, जो सभी कर्मो और आश्रमों का उद्गम है। इस मत के समर्थक अपने पक्ष में शतपथ ब्राह्मण का वाक्य (एतद्वै जरामर्थसत्रं यदग्निहोत्रम = जीवनपर्यत अग्निहोत्र आदि यज्ञ करना चहिए। शत. १२, ४, १, १), ईशोपनिषद् का वाक्य (कुर्वत्रेवेहि कर्माणि जिजीविषेच्छंत समा:।-ईश-२) आदि उधृत करते हैं। गीता का कर्मयोग भी कर्म का संन्यास नहीं अपितु कर्म में संन्यास को ही श्रेष्ठ समझता है। आश्रम संस्था को सबसे बड़ी बाधा परंपराविरोधी बौद्ध एवं जैन मतों से हुई जो आश्रमव्यवस्था के समुच्चय और संतुलन को ही नहीं मानते और जीवन का अनुभव प्राप्त किए बिना अपरिपक्व संन्यास या यतिधर्त को अत्यधिक प्रश्रय देते हैं। मनु. (६, ३५) पर भाष्य करते हुए सर्वज्ञनारायण ने उपर्युक्त तीनों मतों में समन्वय करने की चेष्टा की है। सामान्यत: तो उनको समुच्चय का सिद्धांत मान्य है। विकल्प में वे अधिकारभेद मानते हैं। उनके विचार में बाध का सिद्धांत उन व्यक्तियों के लिए ही है जो अपने पूर्वसंस्कारों के कारण सांसारिक कर्मों में आजीवन आसक्त रहते हैं और जिनमें विवेक और वैराग्य का यथासमय उदय नहीं होता।

सुसंघटित आश्रम संस्था भारतवर्ष की अपनी विशेषता है। किंतु इसका एक बहुत बड़ा सार्वभौम और शास्त्रीय महत्व है। यद्यपि ऐतिहासिक कारणों से इसके आदर्श और व्यवहार में अंतर रहा है, जो मानव स्वभाव को देखते हुए स्वाभाविक है, तथापि इसकी कल्पना और आंशिक व्यवहार अपने आप में गुरुत्व रखते हैं। इस विषय पर डॉयसन (एनसाइक्लोपीडिया ऑव रेलिजन ऐंड एथिक्स-‘आश्रम’ शब्द) का निम्नांकित मत उल्लेखनीय है: मनु तथा अन्य धर्मशास्त्रों में प्रतिपादित आश्रम की प्रस्थापना से व्यवहार का कितना मेल था, यह कहना कठिन है; किंतु यह स्वीकार करने में हम स्वतंत्र हैं कि हमारे विचार में संसार के मानव इतिहास में अन्यत्र कोई ऐसा (तत्व या संस्था) नहीं है जो इस सिद्धांत की गरिमा की तुलना कर सके।

संदर्भ ग्रंथ[संपादित करें]

  • मनुस्मृति (अध्याय ३, ४, ५, तथा);
  • पी.वी.काणे: हिस्ट्री ऑव धर्मशास्त्र, भाग२, खंड १, पृ. ४१६-२६;
  • भगवानदास: सायंस ऑव सोशल आर्गेनाइज़ेशन, भाग१;
  • राजबली पांडेय: हिंदू संस्कार, धार्मिक तथा सामाजिक अध्ययन, चौखंभा भारती भवन, वाराणसी;
  • हेस्टिंग्ज़: एनसाइक्लोपिडिया ऑव रेलिजन ऐंड एथिक्‌स, ‘आश्रम’ शब्द।
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परिवार कैसे संगठित और सुखी रहे


परिवार कैसे संगठित और सुखी रहे

वेदों के आधार पर ऋषियों ने मानव जीवन को चार आश्रमों में (ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यास) बांटा है। वैदिक धर्म के अतिरिक्त अन्य किसी भी मत-मतान्तर में जीवन का यह वैज्ञानिक वर्गीकरण नहीं पाया जाता। यह वैदिक विचारधारा की महान् विशेषता है। यह जीवन मानो गणित का एक प्रश्न है, जिसमें इन आश्रमों के माध्यम से जोड़ व घटा, गुणा और भाग, चारों का समन्वय पाया जाता है। यदि परिवार के सदस्य इस प्रश्न को समझ लें तो ‘परिवार कैसे संगठित और सुखी रहे’ यह विषय सम्यक्तया समझ में आ सकता है। ऋग्वेद में एक मंत्र है :
इहैव स्तं मा वि यौष्टं विश्वमायर्ुव्यश्नुतम।
क्रीडन्तौ पुत्रैर्नभिर्मोदमानौ स्वे गृहे।
ऋ 10.85.42
वेद मंत्र पति और पत्नी को आशीष दे रहा है : ‘तुम दोनों यहीं रहो, तुम एक दूसरे से अलग न होवो, तुम दोनों सम्पूर्ण आयु को प्राप्त करो, अपने घर में पुत्र पौत्र और नातियों के साथ खेलते हुए आनंदपूर्ण (प्रसन्न) रहो।’
गृहस्थ में संचित शक्तियों का व्यय
ब्रह्मचर्य आश्रम में शारीरिक, मानसिक, बौध्दिक और आत्मिक शक्तियों को इकट्ठा किया जाता है। गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करके इन संचित शक्तियों को गृहस्थ के विभिन्न कामों में खर्च करना पड़ता है। वानप्रस्थ आश्रम में खर्च हुई शक्तियों को ब्रह्मचर्य (संयम से), स्वाध्याय, जप एवं तप द्वारा गुणीभूत करता है और संन्यास आश्रम में अपने संगृहीनत ज्ञान विज्ञान एवं अनुभव को समाज में वितरित करने के लिये कृत संकल्प होना ही वैदिक वर्णाश्रम व्यवस्था का संक्षिप्त सार है।
गृहस्थ को अपनाकर ही मनुष्य जीवन में सौंदर्य एवं निखार आता है। काम मनुष्य की एक प्रबल प्रवृत्ति है, जिसे आज के वैज्ञानिक साधनों टेलीविजन, वी.सी.आर., इन्टरनैट, सत्संग व वैदिक शिक्षा के अभाव, वैदिक दृष्टि वाले मनोरंजन के साधनों का अभाव आदि कारणों ने और अधिक प्रबलतर बना दिया है। किन्तु इस काम प्रवृत्ति का शोभन रूप गृहस्थ में ही प्रकट होता है। यदि गृहस्थ आश्रम का विधान न होता, तो काम अपना भयंकर एवं बीभत्य रूप धारण करके समाज के सुंदर एवं स्वस्थ रूप को कुरुप बना देता है। महर्षि दयानंद ने ‘सत्यार्थ प्रकाश’ में चतुर्थ समुल्लास केवल मात्र इसीलिये लिखा है ताकि इसे पढ़कर इस पर आचरण करके आर्य परिवार अपने गृहस्थ जीवन को सुखी बना सके।
पति पत्नी प्रसन्न रहें
‘सत्यार्थ प्रकाश’ के चतुर्थ समुल्लास में महर्षि दयानन्द ‘स्त्री पुरुष परस्पर प्रसन्न रहें’ इस विषय का वर्णन मनुस्मृति के ‘सन्तुष्टो भार्ययार् भत्ता, भत्र्रा भार्या तथैव च’ आदि कई श्लोकों द्वारा करते हुए कहते हैं : ‘जिस परिवार में पत्नी से पति और पति से पत्नी अच्छे प्रकार प्रसन्न रहते हैं। उसी परिवार में सब सौभाग्य और ऐश्वर्य निवास करते हैं। जहां कलह होता है वहां दौर्भाग्य और दारिद्रय स्थिर होता है।’
विवाह धार्मिक संस्कार
वैदिक दृष्टिकोण के अनुसार विवाह एक धार्मिक संस्कार है। जीवन पर्यन्त यह सम्बंध बना रहेगा। ‘इहैव स्तम्’ विवाह यज्ञ में विनियुक्त यह वेद मंत्र विवाह के सुखी परिवार के उच्च आदर्श को दर्शाता है। पति-पत्नी के संबंध विच्छेद का सर्वथा निषेध करता है। सभा मंडप में उपस्थित विद्वान् लोग इस संबंध में साक्षी हैं। हम दोनों स्वेच्छा से वृध्दावस्था तक एक दूसरे का साथ निभाने की प्रतिज्ञा करते हैं।
पाश्चात्य देशों में पत्नी और पति के होते हुए भी पुरुष अन्य स्त्रियों के साथ और स्त्री अन्य पुरुषों के साथ अपने संबंध स्थापित कर सकती है। वैदिक मान्यता के अनुसार यह निषिध्द है। पाश्चात्य जगत् के विचारक भी अब इन रीतियों से क्षुब्ध हैं। मनु महाराज ने इस उच्छृंखलता को रोकने के लिये यह प्रतिबंध रख दिया :
‘स्वदार निरत: सदा’ (मनु.3/50) मनुष्य को सदा ‘अपनी पत्नी में ही प्रसन्न रहना चाहिये।’
गृहस्थ त्याग सिखाता है
गृहस्थ आश्रम मनुष्य में त्याग की भावना लाता है। स्त्री के त्याग का तो कहना ही क्या है! वह तो त्याग की साक्षात् मूर्ति है। पत्नी गृहस्थ में प्रवेश करते समय अपने माता-पिता, भाइयों और बहिनों का त्याग करती है। साथ उस वातावरण का भी त्याग करती है, जिसमें उसका पालन पोषण हुआ है। गृहस्थ व्यक्ति यह ध्यान करता है कि परिवार में उसके साथ पत्नी भी है, बच्चे भी हैं। सन्तान के लिये दोनों त्याग करते हैं। बच्चों की आवश्यकताओं का पहले ध्यान रखते हैं। जिन भारतीय परिवारों में पाश्चात्य सभ्यता की हवाएं जहां तहां प्रवेश कर रही हैं, वहां भी इकट्ठे मिल बैठकर अभी तक खा रहे हैं। यह त्याग की भावना परिवार को संगठित और सुखी रखने का मूलमंत्र है।
वैदिक परिवार गृहस्थ आश्रम के माध्यम से संबंधों की स्थापना करता है। रिश्ते गृहस्थ आश्रम के ही परिणाम हैं। ये रिश्ते व्यक्ति के जीवन में किस प्रकार शक्ति प्रदान करते हैं। इनसे परिवार संगठित होता है सुखी रहता है। यज्ञोपवीत, मुंडन, विवाह आदि संस्कारों, किसी पर्व विशेष पर यज्ञ आदि के समय प्रसन्नता का वातावरण दर्शनीय होता है।
गाड़ी के दो पहिये
गृहस्थ की गाड़ी के पति और पत्नी दो पहिये हैं। जब दोनों पहिये सुचारु चलेंगे, तो गृहस्थ रूपी गाड़ी ठीक ढंग से चलेगी। दो शरीरों के मिलने का नाम गृहस्थ नहीं है, अपितु दो दिलों के मिलने का नाम गृहस्थ है।
दूसरे के दृष्टिकोण को समझें
एक दूसरे के दृष्टिकोण को समझना भी परिवार को संगठित रखने का अटूट साधन है। पति-पत्नी को, सास और बहू को एक दूसरे का आदर सम्मान करना चाहिये।
धन कमाना आवश्यक
परिवार सुख का एक महत्वपूर्ण आधार है- अर्थोपाजन के पवित्र साधन जुटाना। वैदिक धर्म के आश्रम मर्यादा के अनुसार केवल गृहस्थ ही धन कमाता है, शेष तीन आश्रम नहीं। धन कमाने के साधन निर्दोष हों। प्राय: सासों में पुत्र-वधुओं के प्रति प्रेम का अभाव होता है। वे अपनी बेटियों के प्रति जैसा स्नेह भाव दिखाती हैं, वैसा ही वे अपनी पुत्र-वधुओं के प्रति नहीं दिखातीं। तब पुत्र-वधुओं में सास के लिये श्रध्दाभाव कैसे उत्पन्न होगा? बुध्दिमान सास श्वसुर वहीं हैं, जो अपनी बेटियों से भी अधिक पुत्र वधुओं को सम्मान व प्रेमभाव प्रदान करते हैं।
टोका टाकी से बचें
माता-पिता और सास-श्वसुर के टोकने की आदत भी कलह का कारण है। छोटे त्रुटियां करते हैं और बड़े व्यक्ति टोकते हैं। इस टोकाटाकी से ही परिवार में झगड़े होते हैं। विवाहित बच्चों को कम से कम टोकें, अपने पुत्र व पुत्रवधु की कमियां दूसरों के सामने न कहें और सेवा की आशाएं कम रखें। नयी पीढ़ी को चाहिये कि माता-पिता के अनुभव से लाभ प्राप्त करे। माता-पिता की सेवा अवश्य करें। मनुष्य दु:खी क्यों होता है? इसका एक कारण तो यह है कि उसे जो कुछ जीवन में मिला है, उसकी नजर उस पर कम जाती है और जो नहीं मिला है उस पर उसकी दृष्टि बार-बार जाती है। संतुष्ट होना सबसे बड़ा सुख है। परिवार को संगठित रख सकें और सुखी बना सकें। इसके लिये परिवार में परम्परा डालें, ‘इदन मम’ भावना से परिवार में रहें। ‘संगच्छध्वं संवदध्वं संवो मनांसि जानताम्’ वेदोपदेश से परिवार में सौहार्द बने रहे।

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गृहस्थ आश्रम सबसे बड़ा और ज्येष्ठ आश्रम


गृहस्थ आश्रम सबसे बड़ा और ज्येष्ठ आश्रम

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कर्म का आनन्द अनुभूत कर अधिक सुखी 

सभी आश्रमों में गृहस्थ आश्रम सबसे बड़ा और ज्येष्ठ आश्रम है। तीनों आश्रमवासी — ब्रह्मचारी , वानप्रस्थी और संन्यासी सभी गृहस्थों से उपकृत होते हैं। इन्हीं गृहस्थियों के द्वारा पूजा -दान आदि धार्मिक कृत्य संपन्न होते हैं। यथा — ” गृहस्थेनैव धार्यन्ते तस्मात् ज्येष्ठाश्रमो गृही “। जैसे वायु का आश्रय पाकर सब प्राणी जीते हैं , वैसे ही सब आश्रम गृहस्थाश्रम का आश्रय लिए रहते हैं।

अक्षय स्वर्ग प्राप्त करने की जिसे इच्छा हो और इस संसार में भी जो सुख चाहता हो , वह यत्नपूर्वक इस भावना से गृहस्थाश्रम का पालन करे। गृहस्थाश्रम का पालन करना दुर्बल मन और इन्द्रियों से किसी भी रूप में सम्भव नहीं है। विवाह का अर्थ विशेष वहन करना ही होता है। विशेष जिम्मेदारियों को निभाना ही विवाह है। ऋषि – ब्राह्मण , पितर , देवता , जीव- जंतु और अतिथि , ये सभी गृहस्थों से कुछ पाने की आशा रखते हैं। धर्म-पारायण गृहस्थ इन्हें हर प्रकार से संतुष्ट करते हैं।

गृहस्थाश्रम में प्रवेश के समय ऋग्वेद का एक मंत्र आशीर्वाद के रूप में विशेषत: प्रयुक्त किया जाता है —” इहैवस्तं मा वि यौष्टं विश्वमायुर्व्य्श्नुतं। क्रीडन्तौ पुत्रैर्नप्तृभिमेदिमानौ स्वे गृहे ॥ “ अर्थात बिना किसी से विरोध किए गृहस्थाश्रम में रहो और पूर्ण आयु प्राप्त करो। पुत्र – पौत्रों के साथ खेलते हुवे तथा आनंद मनाते हुवे अपने ही घर में ही रहो और घर को आदर्श रूप बनाओ।

घर के विषय में कहा गया है कि पृथिवी पर सब घर स्थिर रहें और वे न गिरें तथा वे नष्ट भी न हों। गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने वाले को सब के प्रति प्रीति का भाव रखना चाहिए। वह सभी को मित्र – भाव से देखे — ‘ मित्रस्य चक्षुषा समीक्षामहे ‘ साथ ही वह आशावादी हो और वह स्वीकारात्मक – पोजिटिव विचार को रखे।

इसी भाव से वह कह सकता है कि — ‘सर्वा आशा मम मित्रं भवन्तु ‘। यह स्पष्ट है कि वैदिक गृहस्थ समानता के स्तर पर मिलजुल कर सुखी गृहस्थ जीवन व्यतीत करने को महत्त्व देते थे। वे गृहस्थ- जीवन को पूर्णता के साथ जीना चाहते थे। उन्होंने इसके लिए प्रेम , पारस्परिक सहयोग , मैत्री- भावना , कर्म- शीलता , उदारता पूर्ण व्यवहार आदि का ही सहारा लिया।

परिणामत: कहा जा सकता है कि गृहस्थाश्रम एक ज्येष्ठ ही नहीं श्रेष्ठ आश्रम है। इसमें उत्तरदायित्वों का निर्वाह अत्यधिक गंभीरता एवं कुशलता के साथ करना पड़ता है। इसमें सृजन का आनन्द तो ही पर कर्म का आनन्द अनुभूत कर अधिक सुखी रहा जा सकता है।******************************

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ताजमहल है शिव मंदिर… तेजोमहालय


ताजमहल है शिव मंदिर… तेजोमहालय

तेजोमहालय के कलश में लगा त्रिशूल जिसे लोग चाँद तारा समझते है

तेजोमहालय की दीवारों की कला कृतियों में फूल पत्तियों के बीच बना ॐ

ताजमहल में शिव का पाँचवा रूप अग्रेश्वर महादेव नागनाथेश्वर विराजित है
श्री पी.एन. ओक अपनी पुस्तक “Tajmahal is a Hindu Temple Palace” में 100 से भी अधिक प्रमाण और तर्को का हवाला देकर दावा करते हैं कि ताजमहल वास्तव में शिव मंदिर है जिसका असली नाम तेजोमहालय है। श्री पी.एन. ओक साहब को उस इतिहासकार के रूप मे जाना जाता है तो भारत के विकृत इतिहास को पुर्नोत्‍थान और सही दिशा में ले जाने का किया है। मुगलो और अग्रेजो के समय मे जिस प्रकार भारत के इतिहास के साथ जिस प्रकार छेड़छाड की गई और आज वर्तमान तक मे की जा रही है, उसका विरोध और सही प्रस्तुतिकारण करने वाले प्रमुख इतिहासकारो में पुरूषोत्तम नाथ ओक साहब का नाम लिया जाता है। ओक साहब ने ताजमहल की भूमिका, इतिहास और पृष्‍ठभूमि से लेकर सभी का अध्‍ययन किया और छायाचित्रों छाया चित्रो के द्वारा उसे प्रमाणित करने का सार्थक प्रयास किया। श्री ओक के इन तथ्‍यो पर आ सरकार और प्रमुख विश्वविद्यालय आदि मौन जबकि इस विषय पर शोध किया जाना चाहिये और सही इतिहास से हमे अवगत करना चाहिये। किन्‍तु दुःख की बात तो यह है कि आज तक उनकी किसी भी प्रकार से अधिकारिक जाँच नहीं हुई। यदि ताजमहल के शिव मंदिर होने में सच्चाई है तो भारतीयता के साथ बहुत बड़ा अन्याय है। आज भी हम जैसे विद्यार्थियों को झूठे इतिहास की शिक्षा देना स्वयं शिक्षा के लिये अपमान की बात है, क्‍योकि जिस इतिहास से हम सबक सीखने की बात कहते है यदि वह ही गलत हो, इससे बड़ा राष्‍ट्रीय शर्म और क्‍या हो सकता है ?
श्री पी.एन. ओक का दावा है कि ताजमहल शिव मंदिर है जिसका असली नाम तेजो महालय है। इस सम्बंध में उनके द्वारा दिये गये तर्कों में कुछ इस प्रकार हैं –

1. शाहज़हां और यहां तक कि औरंगज़ेब के शासनकाल तक में भी कभी भी किसी शाही दस्तावेज एवं अखबार आदि में ताजमहल शब्द का उल्लेख नहीं आया है। ताजमहल को ताज-ए-महल समझना हास्यास्पद है।

2. शब्द ताजमहल के अंत में आये ‘महल’ मुस्लिम शब्द है ही नहीं, अफगानिस्तान से लेकर अल्जीरिया तक किसी भी मुस्लिम देश में एक भी ऐसी इमारत नहीं है जिसे कि महल के नाम से पुकारा जाता हो।

3. साधारणतः समझा जाता है कि ताजमहल नाम मुमताजमहल, जो कि वहां पर दफनाई गई थी, के कारण पड़ा है। यह बात कम से कम दो कारणों से तर्कसम्मत नहीं है – पहला यह कि शाहजहां के बेगम का नाम मुमताजमहल था ही नहीं, उसका नाम मुमताज़-उल-ज़मानी था और दूसरा यह कि किसी इमारत का नाम रखने के लिय मुमताज़ नामक औरत के नाम से “मुम” को हटा देने का कुछ मतलब नहीं निकलता।

4. चूँकि महिला का नाम मुमताज़ था जो कि ज़ अक्षर मे समाप्त होता है न कि ज में (अंग्रेजी का Z न कि J), भवन का नाम में भी ताज के स्थान पर ताज़ होना चाहिये था (अर्थात् यदि अंग्रेजी में लिखें तो Taj के स्थान पर Taz होना था)।

5. शाहज़हां के समय यूरोपीय देशों से आने वाले कई लोगों ने भवन का उल्लेख ‘ताज-ए-महल’ के नाम से किया है जो कि उसके शिव मंदिर वाले परंपरागत संस्कृत नाम तेजोमहालय से मेल खाता है। इसके विरुद्ध शाहज़हां और औरंगज़ेब ने बड़ी सावधानी के साथ संस्कृत से मेल खाते इस शब्द का कहीं पर भी प्रयोग न करते हुये उसके स्थान पर पवित्र मकब़रा शब्द का ही प्रयोग किया है।

6. मकब़रे को कब्रगाह ही समझना चाहिये, न कि महल। इस प्रकार से समझने से यह सत्य अपने आप समझ में आ जायेगा कि कि हुमायुँ, अकबर, मुमताज़, एतमातुद्दौला और सफ़दरजंग जैसे सारे शाही और दरबारी लोगों को हिंदू महलों या मंदिरों में दफ़नाया गया है।

7. और यदि ताज का अर्थ कब्रिस्तान है तो उसके साथ महल शब्द जोड़ने का कोई तुक ही नहीं है।

8. चूँकि ताजमहल शब्द का प्रयोग मुग़ल दरबारों में कभी किया ही नहीं जाता था, ताजमहल के विषय में किसी प्रकार की मुग़ल व्याख्या ढूंढना ही असंगत है। ‘ताज’ और ‘महल’ दोनों ही संस्कृत मूल के शब्द हैं।

9. ताजमहल शिव मंदिर को इंगित करने वाले शब्द तेजोमहालय शब्द का अपभ्रंश है। तेजोमहालय मंदिर में अग्रेश्वर महादेव प्रतिष्ठित थे।10. संगमरमर की सीढ़ियाँ चढ़ने के पहले जूते उतारने की परंपरा शाहज़हां के समय से भी पहले की थी जब ताज शिव मंदिर था। यदि ताज का निर्माण मक़बरे के रूप में हुआ होता तो जूते उतारने की आवश्यकता ही नहीं होती क्योंकि किसी मक़बरे में जाने के लिये जूता उतारना अनिवार्य नहीं होता।
11. देखने वालों ने अवलोकन किया होगा कि तहखाने के अंदर कब्र वाले कमरे में केवल सफेद संगमरमर के पत्थर लगे हैं जबकि अटारी व कब्रों वाले कमरे में पुष्प लता आदि से चित्रित पच्चीकारी की गई है। इससे साफ जाहिर होता है कि मुमताज़ के मक़बरे वाला कमरा ही शिव मंदिर का गर्भगृह है।

12. संगमरमर की जाली में 108 कलश चित्रित उसके ऊपर 108 कलश आरूढ़ हैं, हिंदू मंदिर परंपरा में 108 की संख्या को पवित्र माना जाता है।

13. ताजमहल के रख-रखाव तथा मरम्मत करने वाले ऐसे लोग भी हैं जिन्होंने कि प्राचीन पवित्र शिव लिंग तथा अन्य मूर्तियों को चौड़ी दीवारों के बीच दबा हुआ और संगमरमर वाले तहखाने के नीचे की मंजिलों के लाल पत्थरों वाले गुप्त कक्षों, जिन्हें कि बंद (seal) कर दिया गया है, के भीतर देखा है।

14. भारतवर्ष में 12 ज्योतिर्लिंग है। ऐसा प्रतीत होता है कि तेजोमहालय उर्फ ताजमहल उनमें से एक है जिसे कि नागनाथेश्वर के नाम से जाना जाता था क्योंकि उसके जलहरी को नाग के द्वारा लपेटा हुआ जैसा बनाया गया था। जब से शाहज़हां ने उस पर कब्ज़ा किया, उसकी पवित्रता और हिंदुत्व समाप्त हो गई।

15. वास्तुकला की विश्वकर्मा वास्तुशास्त्र नामक प्रसिद्ध ग्रंथ में शिवलिंगों में ‘तेज-लिंग’ का वर्णन आता है। ताजमहल में ‘तेज-लिंग’ प्रतिष्ठित था इसीलिये उसका नाम तेजोमहालय पड़ा था।

16. आगरा नगर, जहां पर ताजमहल स्थित है, एक प्राचीन शिव पूजा केन्द्र है। यहां के धर्मावलम्बी निवासियों की सदियों से दिन में पाँच शिव मंदिरों में जाकर दर्शन व पूजन करने की परंपरा रही है विशेषकर श्रावन के महीने में। पिछले कुछ सदियों से यहां के भक्तजनों को बालकेश्वर, पृथ्वीनाथ, मनकामेश्वर और राजराजेश्वर नामक केवल चार ही शिव मंदिरों में दर्शन-पूजन उपलब्ध हो पा रही है। वे अपने पाँचवे शिव मंदिर को खो चुके हैं जहां जाकर उनके पूर्वज पूजा पाठ किया करते थे। स्पष्टतः वह पाँचवाँ शिवमंदिर आगरा के इष्टदेव नागराज अग्रेश्वर महादेव नागनाथेश्वर ही है जो कि तेजोमहालय मंदिर उर्फ ताजमहल में प्रतिष्ठित थे।

17. आगरा मुख्यतः जाटों की नगरी है। जाट लोग भगवान शिव को तेजाजी के नाम से जानते हैं। The Illustrated Weekly of India के जाट विशेषांक (28 जून, 1971) के अनुसार जाट लोगों के तेजा मंदिर हुआ करते थे। अनेक शिवलिंगों में एक तेजलिंग भी होता है जिसके जाट लोग उपासक थे। इस वर्णन से भी ऐसा प्रतीत होता है कि ताजमहल भगवान तेजाजी का निवासस्थल तेजोमहालय था।

18. बादशाहनामा, जो कि शाहज़हां के दरबार के लेखाजोखा की पुस्तक है, में स्वीकारोक्ति है (पृष्ठ 403 भाग 1) कि मुमताज को दफ़नाने के लिये जयपुर के महाराजा जयसिंह से एक चमकदार, बड़े गुम्बद वाला विशाल भवन (इमारत-ए-आलीशान व गुम्ब़ज) लिया गया जो कि राजा मानसिंह के भवन के नाम से जाना जाता था।

19. ताजमहल के बाहर पुरातत्व विभाग में रखे हुये शिलालेख में वर्णित है कि शाहज़हां ने अपनी बेग़म मुमताज़ महल को दफ़नाने के लिये एक विशाल इमारत बनवाया जिसे बनाने में सन् 1631 से लेकर 1653 तक 22 वर्ष लगे। यह शिलालेख ऐतिहासिक घपले का नमूना है। पहली बात तो यह है कि शिलालेख उचित व अधिकारिक स्थान पर नहीं है। दूसरी यह कि महिला का नाम मुमताज़-उल-ज़मानी था न कि मुमताज़ महल। तीसरी, इमारत के 22 वर्ष में बनने की बात सारे मुस्लिम वर्णनों को ताक में रख कर टॉवेर्नियर नामक एक फ्रांसीसी अभ्यागत के अविश्वसनीय रुक्के से येन केन प्रकारेण ले लिया गया है जो कि एक बेतुकी बात है।

20. शाहजादा औरंगज़ेब के द्वारा अपने पिता को लिखी गई चिट्ठी को कम से कम तीन महत्वपूर्ण ऐतिहासिक वृतान्तों में दर्ज किया गया है, जिनके नाम ‘आदाब-ए-आलमगिरी’, ‘यादगारनामा’ और ‘मुरुक्का-ए-अकब़राबादी’ (1931 में सैद अहमद, आगरा द्वारा संपादित, पृष्ठ 43, टीका 2) हैं। उस चिट्ठी में सन् 1662 में औरंगज़ेब ने खुद लिखा है कि मुमताज़ के सातमंजिला लोकप्रिय दफ़न स्थान के प्रांगण में स्थित कई इमारतें इतनी पुरानी हो चुकी हैं कि उनमें पानी चू रहा है और गुम्बद के उत्तरी सिरे में दरार पैदा हो गई है। इसी कारण से औरंगज़ेब ने खुद के खर्च से इमारतों की तुरंत मरम्मत के लिये फरमान जारी किया और बादशाह से सिफ़ारिश की कि बाद में और भी विस्तारपूर्वक मरम्मत कार्य करवाया जाये। यह इस बात का साक्ष्य है कि शाहज़हाँ के समय में ही ताज प्रांगण इतना पुराना हो चुका था कि तुरंत मरम्मत करवाने की जरूरत थी।

21. जयपुर के भूतपूर्व महाराजा ने अपनी दैनंदिनी में 18 दिसंबर, 1633 को जारी किये गये शाहज़हां के ताज भवन समूह को मांगने के बाबत दो फ़रमानों (नये क्रमांक आर. 176 और 177) के विषय में लिख रखा है। यह बात जयपुर के उस समय के शासक के लिये घोर लज्जाजनक थी और इसे कभी भी आम नहीं किया गया।

22. राजस्थान प्रदेश के बीकानेर स्थित लेखागार में शाहज़हां के द्वारा (मुमताज़ के मकबरे तथा कुरान की आयतें खुदवाने के लिये) मरकाना के खदानों से संगमरमर पत्थर और उन पत्थरों को तराशने वाले शिल्पी भिजवाने बाबत जयपुर के शासक जयसिंह को जारी किये गये तीन फ़रमान संरक्षित हैं। स्पष्टतः शाहज़हां के ताजमहल पर जबरदस्ती कब्ज़ा कर लेने के कारण जयसिंह इतने कुपित थे कि उन्होंने शाहज़हां के फरमान को नकारते हुये संगमरमर पत्थर तथा (मुमताज़ के मकब़रे के ढोंग पर कुरान की आयतें खोदने का अपवित्र काम करने के लिये) शिल्पी देने के लिये इंकार कर दिया। जयसिंह ने शाहज़हां की मांगों को अपमानजनक और अत्याचारयुक्त समझा। और इसीलिये पत्थर देने के लिये मना कर दिया साथ ही शिल्पियों को सुरक्षित स्थानों में छुपा दिया।

23. शाहज़हां ने पत्थर और शिल्पियों की मांग वाले ये तीनों फ़रमान मुमताज़ की मौत के बाद के दो वर्षों में जारी किया था। यदि सचमुच में शाहज़हां ने ताजमहल को 22 साल की अवधि में बनवाया होता तो पत्थरों और शिल्पियों की आवश्यकता मुमताज़ की मृत्यु के 15-20 वर्ष बाद ही पड़ी होती।

24. और फिर किसी भी ऐतिहासिक वृतान्त में ताजमहल, मुमताज़ तथा दफ़न का कहीं भी जिक्र नहीं है। न ही पत्थरों के परिमाण और दाम का कहीं जिक्र है। इससे सिद्ध होता है कि पहले से ही निर्मित भवन को कपट रूप देने के लिये केवल थोड़े से पत्थरों की जरूरत थी। जयसिंह के सहयोग के अभाव में शाहज़हां संगमरमर पत्थर वाले विशाल ताजमहल बनवाने की उम्मीद ही नहीं कर सकता था।

25. टॉवेर्नियर, जो कि एक फ्रांसीसी जौहरी था, ने अपने यात्रा संस्मरण में उल्लेख किया है कि शाहज़हां ने जानबूझ कर मुमताज़ को ‘ताज-ए-मकान’, जहाँ पर विदेशी लोग आया करते थे जैसे कि आज भी आते हैं, के पास दफ़नाया था ताकि पूरे संसार में उसकी प्रशंसा हो। वह आगे और भी लिखता है कि केवल चबूतरा बनाने में पूरी इमारत बनाने से अधिक खर्च हुआ था। शाहज़हां ने केवल लूटे गये तेजोमहालय के केवल दो मंजिलों में स्थित शिवलिंगों तथा अन्य देवी देवता की मूर्तियों के तोड़फोड़ करने, उस स्थान को कब्र का रूप देने और वहाँ के महराबों तथा दीवारों पर कुरान की आयतें खुदवाने के लिये ही खर्च किया था। मंदिर को अपवित्र करने, मूर्तियों को तोड़फोड़ कर छुपाने और मकब़रे का कपट रूप देने में ही उसे 22 वर्ष लगे थे।

26. एक अंग्रेज अभ्यागत पीटर मुंडी ने सन् 1632 में (अर्थात् मुमताज की मौत को जब केवल एक ही साल हुआ था) आगरा तथा उसके आसपास के विशेष ध्यान देने वाले स्थानों के विषय में लिखा है जिसमें के ताज-ए-महल के गुम्बद, वाटिकाओं तथा बाजारों का जिक्र आया है। इस तरह से वे ताजमहल के स्मरणीय स्थान होने की पुष्टि करते हैं।

27. डी लॉएट नामक डच अफसर ने सूचीबद्ध किया है कि मानसिंह का भवन, जो कि आगरा से एक मील की दूरी पर स्थित है, शाहज़हां के समय से भी पहले का एक उत्कृष्ट भवन है। शाहज़हां के दरबार का लेखाजोखा रखने वाली पुस्तक, बादशाहनामा में किस मुमताज़ को उसी मानसिंह के भवन में दफ़नाना दर्ज है।

28. बेर्नियर नामक एक समकालीन फ्रांसीसी अभ्यागत ने टिप्पणी की है कि गैर मुस्लिम लोगों का (जब मानसिंह के भवन को शाहज़हां ने हथिया लिया था उस समय) चकाचौंध करने वाली प्रकाश वाले तहखानों के भीतर प्रवेश वर्जित था। उन्होंने चांदी के दरवाजों, सोने के खंभों, रत्नजटित जालियों और शिवलिंग के ऊपर लटकने वाली मोती के लड़ियों को स्पष्टतः संदर्भित किया है।

29. जॉन अल्बर्ट मान्डेल्सो ने (अपनी पुस्तक `Voyages and Travels to West-Indies’ जो कि John Starkey and John Basset, London के द्वारा प्रकाशित की गई है) में सन् 1638 में (मुमताज़ के मौत के केवल 7 साल बाद) आगरा के जन-जीवन का विस्तृत वर्णन किया है परंतु उसमें ताजमहल के निर्माण के बारे में कुछ भी नहीं लिखा है जबकि सामान्यतः दृढ़तापूर्वक यह कहा या माना जाता है कि सन् 1631 से 1653 तक ताज का निर्माण होता रहा है।

30. एक संस्कृत शिलालेख भी ताज के मूलतः शिव मंदिर होने का समर्थन करता है। इस शिलालेख में, जिसे कि गलती से बटेश्वर शिलालेख कहा जाता है (वर्तमान में यह शिलालेख लखनऊ अजायबघर के सबसे ऊपर मंजिल स्थित कक्ष में संरक्षित है) में संदर्भित है, “एक विशाल शुभ्र शिव मंदिर भगवान शिव को ऐसा मोहित किया कि उन्होंने वहाँ आने के बाद फिर कभी अपने मूल निवास स्थान कैलाश वापस न जाने का निश्चय कर लिया।” शाहज़हां के आदेशानुसार सन् 1155 के इस शिलालेख को ताजमहल के वाटिका से उखाड़ दिया गया। इस शिलालेख को ‘बटेश्वर शिलालेख’ नाम देकर इतिहासज्ञों और पुरातत्वविज्ञों ने बहुत बड़ी भूल की है क्योंकि क्योंकि कहीं भी कोई ऐसा अभिलेख नहीं है कि यह बटेश्वर में पाया गया था। वास्तविकता तो यह है कि इस शिलालेख का नाम ‘तेजोमहालय शिलालेख’ होना चाहिये क्योंकि यह ताज के वाटिका में जड़ा हुआ था और शाहज़हां के आदेश से इसे निकाल कर फेंक दिया गया था।

शाहज़हां के कपट का एक सूत्र Archealogiical Survey of India Reports (1874 में प्रकाशित) के पृष्ठ 216-217, खंड 4 में मिलता है जिसमें लिखा है, great square black balistic pillar which, with the base and capital of another pillar….now in the grounds of Agra,…it is well known, once stood in the garden of Tajmahal”.
क्रमश:

31. ताज के निर्माण के अनेक वर्षों बाद शाहज़हां ने इसके संस्कृत शिलालेखों व देवी-देवताओं की प्रतिमाओं तथा दो हाथियों की दो विशाल प्रस्तर प्रतिमाओं के साथ बुरी तरह तोड़फोड़ करके वहाँ कुरान की आयतों को लिखवा कर ताज को विकृत कर दिया, हाथियों की इन दो प्रतिमाओं के सूंड आपस में स्वागतद्वार के रूप में जुड़े हुये थे, जहाँ पर दर्शक आजकल प्रवेश की टिकट प्राप्त करते हैं वहीं ये प्रतिमाएँ स्थित थीं। थॉमस ट्विनिंग नामक एक अंग्रेज (अपनी पुस्तक “Travels in India A Hundred Years ago” के पृष्ठ 191 में) लिखता है, “सन् 1794 के नवम्बर माह में मैं ताज-ए-महल और उससे लगे हुये अन्य भवनों को घेरने वाली ऊँची दीवार के पास पहुँचा। वहाँ से मैंने पालकी ली और….. बीचोबीच बनी हुई एक सुंदर दरवाजे जिसे कि गजद्वार (‘COURT OF ELEPHANTS’) कहा जाता था की ओर जाने वाली छोटे कदमों वाली सीढ़ियों पर चढ़ा।”

32. ताजमहल में कुरान की 14 आयतों को काले अक्षरों में अस्पष्ट रूप में खुदवाया गया है किंतु इस इस्लाम के इस अधिलेखन में ताज पर शाहज़हां के मालिकाना ह़क होने के बाबत दूर दूर तक लेशमात्र भी कोई संकेत नहीं है। यदि शाहज़हां ही ताज का निर्माता होता तो कुरान की आयतों के आरंभ में ही उसके निर्माण के विषय में अवश्य ही जानकारी दिया होता।

33. शाहज़हां ने शुभ्र ताज के निर्माण के कई वर्षों बाद उस पर काले अक्षर बनवाकर केवल उसे विकृत ही किया है ऐसा उन अक्षरों को खोदने वाले अमानत ख़ान शिराज़ी ने खुद ही उसी इमारत के एक शिलालेख में लिखा है। कुरान के उन आयतों के अक्षरों को ध्यान से देखने से पता चलता है कि उन्हें एक प्राचीन शिव मंदिर के पत्थरों के टुकड़ों से बनाया गया है।

34. ताज के नदी के तरफ के दरवाजे के लकड़ी के एक टुकड़े के एक अमेरिकन प्रयोगशाला में किये गये कार्बन 14 जाँच से पता चला है कि लकड़ी का वो टुकड़ा शाहज़हां के काल से 300 वर्ष पहले का है, क्योंकि ताज के दरवाजों को 11वी सदी से ही मुस्लिम आक्रामकों के द्वारा कई बार तोड़कर खोला गया है और फिर से बंद करने के लिये दूसरे दरवाजे भी लगाये गये हैं, ताज और भी पुराना हो सकता है। असल में ताज को सन् 1115 में अर्थात् शाहज़हां के समय से लगभग 500 वर्ष पूर्व बनवाया गया था।

35. ई.बी. हॉवेल, श्रीमती केनोयर और सर डब्लू.डब्लू. हंटर जैसे पश्चिम के जाने माने वास्तुशास्त्री, जिन्हें कि अपने विषय पर पूर्ण अधिकार प्राप्त है, ने ताजमहल के अभिलेखों का अध्ययन करके यह राय दी है कि ताजमहल हिंदू मंदिरों जैसा भवन है। हॉवेल ने तर्क दिया है कि जावा देश के चांदी सेवा मंदिर का ground plan ताज के समान है।

36. चार छोटे छोटे सजावटी गुम्बदों के मध्य एक बड़ा मुख्य गुम्बद होना हिंदू मंदिरों की सार्वभौमिक विशेषता है।

37. चार कोणों में चार स्तम्भ बनाना हिंदू विशेषता रही है। इन चार स्तम्भों से दिन में चौकसी का कार्य होता था और रात्रि में प्रकाश स्तम्भ का कार्य लिया जाता था। ये स्तम्भ भवन के पवित्र अधिसीमाओं का निर्धारण का भी करती थीं। हिंदू विवाह वेदी और भगवान सत्यनारायण के पूजा वेदी में भी चारों कोणों में इसी प्रकार के चार खम्भे बनाये जाते हैं।

38. ताजमहल की अष्टकोणीय संरचना विशेष हिंदू अभिप्राय की अभिव्यक्ति है क्योंकि केवल हिंदुओं में ही आठ दिशाओं के विशेष नाम होते हैं और उनके लिये खगोलीय रक्षकों का निर्धारण किया जाता है। स्तम्भों के नींव तथा बुर्ज क्रमशः धरती और आकाश के प्रतीक होते हैं। हिंदू दुर्ग, नगर, भवन या तो अष्टकोणीय बनाये जाते हैं या फिर उनमें किसी न किसी प्रकार के अष्टकोणीय लक्षण बनाये जाते हैं तथा उनमें धरती और आकाश के प्रतीक स्तम्भ बनाये जाते हैं, इस प्रकार से आठों दिशाओं, धरती और आकाश सभी की अभिव्यक्ति हो जाती है जहाँ पर कि हिंदू विश्वास के अनुसार ईश्वर की सत्ता है।

39. ताजमहल के गुम्बद के बुर्ज पर एक त्रिशूल लगा हुआ है। इस त्रिशूल का का प्रतिरूप ताजमहल के पूर्व दिशा में लाल पत्थरों से बने प्रांगण में नक्काशा गया है। त्रिशूल के मध्य वाली डंडी एक कलश को प्रदर्शित करता है जिस पर आम की दो पत्तियाँ और एक नारियल रखा हुआ है। यह हिंदुओं का एक पवित्र रूपांकन है। इसी प्रकार के बुर्ज हिमालय में स्थित हिंदू तथा बौद्ध मंदिरों में भी देखे गये हैं। ताजमहल के चारों दशाओं में बहुमूल्य व उत्कृष्ट संगमरमर से बने दरवाजों के शीर्ष पर भी लाल कमल की पृष्ठभूमि वाले त्रिशूल बने हुये हैं। सदियों से लोग बड़े प्यार के साथ परंतु गलती से इन त्रिशूलों को इस्लाम का प्रतीक चांद-तारा मानते आ रहे हैं और यह भी समझा जाता है कि अंग्रेज शासकों ने इसे विद्युत चालित करके इसमें चमक पैदा कर दिया था। जबकि इस लोकप्रिय मानना के विरुद्ध यह हिंदू धातुविद्या का चमत्कार है क्योंकि यह जंगरहित मिश्रधातु का बना है और प्रकाश विक्षेपक भी है। त्रिशूल के प्रतिरूप का पूर्व दिशा में होना भी अर्थसूचक है क्योकि हिंदुओं में पूर्व दिशा को, उसी दिशा से सूर्योदय होने के कारण, विशेष महत्व दिया गया है. गुम्बद के बुर्ज अर्थात् (त्रिशूल) पर ताजमहल के अधिग्रहण के बाद ‘अल्लाह’ शब्द लिख दिया गया है जबकि लाल पत्थर वाले पूर्वी प्रांगण में बने प्रतिरूप में ‘अल्लाह’ शब्द कहीं भी नहीं है।

40. शुभ्र ताज के पूर्व तथा पश्चिम में बने दोनों भवनों के ढांचे, माप और आकृति में एक समान हैं और आज तक इस्लाम की परंपरानुसार पूर्वी भवन को सामुदायिक कक्ष (community hall) बताया जाता है जबकि पश्चिमी भवन पर मस्ज़िद होने का दावा किया जाता है। दो अलग-अलग उद्देश्य वाले भवन एक समान कैसे हो सकते हैं? इससे सिद्ध होता है कि ताज पर शाहज़हां के आधिपत्य हो जाने के बाद पश्चिमी भवन को मस्ज़िद के रूप में प्रयोग किया जाने लगा। आश्चर्य की बात है कि बिना मीनार के भवन को मस्ज़िद बताया जाने लगा। वास्तव में ये दोनों भवन तेजोमहालय के स्वागत भवन थे।

41. उसी किनारे में कुछ गज की दूरी पर नक्कारख़ाना है जो कि इस्लाम के लिये एक बहुत बड़ी असंगति है (क्योंकि शोरगुल वाला स्थान होने के कारण नक्कारख़ाने के पास मस्ज़िद नहीं बनाया जाता)। इससे इंगित होता है कि पश्चिमी भवन मूलतः मस्ज़िद नहीं था। इसके विरुद्ध हिंदू मंदिरों में सुबह शाम आरती में विजयघंट, घंटियों, नगाड़ों आदि का मधुर नाद अनिवार्य होने के कारण इन वस्तुओं के रखने का स्थान होना आवश्यक है।

42. ताजमहल में मुमताज़ महल के नकली कब्र वाले कमरे की दीवालों पर बनी पच्चीकारी में फूल-पत्ती, शंख, घोंघा तथा हिंदू अक्षर ॐ चित्रित है। कमरे में बनी संगमरमर की अष्टकोणीय जाली के ऊपरी कठघरे में गुलाबी रंग के कमल फूलों की खुदाई की गई है। कमल, शंख और ॐ के हिंदू देवी-देवताओं के साथ संयुक्त होने के कारण उनको हिंदू मंदिरों में मूलभाव के रूप में प्रयुक्त किया जाता है।

43. जहाँ पर आज मुमताज़ का कब्र बना हुआ है वहाँ पहले तेज लिंग हुआ करता था जो कि भगवान शिव का पवित्र प्रतीक है। इसके चारों ओर परिक्रमा करने के लिये पाँच गलियारे हैं। संगमरमर के अष्टकोणीय जाली के चारों ओर घूम कर या कमरे से लगे विभिन्न विशाल कक्षों में घूम कर और बाहरी चबूतरे में भी घूम कर परिक्रमा किया जा सकता है। हिंदू रिवाजों के अनुसार परिक्रमा गलियारों में देवता के दर्शन हेतु झरोखे बनाये जाते हैं। इसी प्रकार की व्यवस्था इन गलियारों में भी है।

44. ताज के इस पवित्र स्थान में चांदी के दरवाजे और सोने के कठघरे थे जैसा कि हिंदू मंदिरों में होता है। संगमरमर के अष्टकोणीय जाली में मोती और रत्नों की लड़ियाँ भी लटकती थीं। ये इन ही वस्तुओं की लालच थी जिसने शाहज़हां को अपने असहाय मातहत राजा जयसिंह से ताज को लूट लेने के लिये प्रेरित किया था।

45. पीटर मुंडी, जो कि एक अंग्रेज था, ने सन् में, मुमताज़ की मौत के एक वर्ष के भीतर ही चांदी के दरवाजे, सोने के कठघरे तथा मोती और रत्नों की लड़ियों को देखने का जिक्र किया है। यदि ताज का निर्माणकाल 22 वर्षों का होता तो पीटर मुंडी मुमताज़ की मौत के एक वर्ष के भीतर ही इन बहुमूल्य वस्तुओं को कदापि न देख पाया होता। ऐसी बहुमूल्य सजावट के सामान भवन के निर्माण के बाद और उसके उपयोग में आने के पूर्व ही लगाये जाते हैं। ये इस बात का इशारा है कि मुमताज़ का कब्र बहुमूल्य सजावट वाले शिव लिंग वाले स्थान पर कपट रूप से बनाया गया।

46. मुमताज़ के कब्र वाले कक्ष फर्श के संगमरमर के पत्थरों में छोटे छोटे रिक्त स्थान देखे जा सकते हैं। ये स्थान चुगली करते हैं कि बहुमूल्य सजावट के सामान के विलोप हो जाने के कारण वे रिक्त हो गये।

47. मुमताज़ की कब्र के ऊपर एक जंजीर लटकती है जिसमें अब एक कंदील लटका दिया है। ताज को शाहज़हां के द्वारा हथिया लेने के पहले वहाँ एक शिव लिंग पर बूंद बूंद पानी टपकाने वाला घड़ा लटका करता था।

48. ताज भवन में ऐसी व्यवस्था की गई थी कि हिंदू परंपरा के अनुसार शरदपूर्णिमा की रात्रि में अपने आप शिव लिंग पर जल की बूंद टपके। इस पानी के टपकने को इस्लाम धारणा का रूप दे कर शाहज़हां के प्रेमाश्रु बताया जाने लगा।

49. तथाकथित मस्ज़िद और नक्कारखाने के बीच एक अष्टकोणीय कुआँ है जिसमें पानी के तल तक सीढ़ियाँ बनी हुई हैं। यह हिंदू मंदिरों का परंपरागत खजाने वाला कुआँ है। खजाने के संदूक नीचे की मंजिलों में रखे जाते थे जबकि खजाने के कर्मचारियों के कार्यालय ऊपरी मंजिलों में हुआ करता था। सीढ़ियों के वृतीय संरचना के कारण घुसपैठिये या आक्रमणकारी न तो आसानी के साथ खजाने तक पहुँच सकते थे और न ही एक बार अंदर आने के बाद आसानी के साथ भाग सकते थे, और वे पहचान लिये जाते थे। यदि कभी घेरा डाले हुये शक्तिशाली शत्रु के सामने समर्पण की स्थिति आ भी जाती थी तो खजाने के संदूकों को पानी में धकेल दिया जाता था जिससे कि वह पुनर्विजय तक सुरक्षित रूप से छुपा रहे। एक मकब़रे में इतना परिश्रम करके बहुमंजिला कुआँ बनाना बेमानी है। इतना विशाल दीर्घाकार कुआँ किसी कब्र के लिये अनावश्यक भी है।

50. यदि शाहज़हां ने सचमुच ही ताजमहल जैसा आश्चर्यजनक मकब़रा होता तो उसके तामझाम का विवरण और मुमताज़ के दफ़न की तारीख इतिहास में अवश्य ही दर्ज हुई होती। परंतु दफ़न की तारीख कभी भी दर्ज नहीं की गई। इतिहास में इस तरह का ब्यौरा न होना ही ताजमहल की झूठी कहानी का पोल खोल देती है।

51. यहाँ तक कि मुमताज़ की मृत्यु किस वर्ष हुई यह भी अज्ञात है। विभिन्न लोगों ने सन् 1629,1630, 1631 या 1632 में मुमताज़ की मौत होने का अनुमान लगाया है। यदि मुमताज़ का इतना उत्कृष्ट दफ़न हुआ होता, जितना कि दावा किया जाता है, तो उसके मौत की तारीख अनुमान का विषय कदापि न होता। 5000 औरतों वाली हरम में किस औरत की मौत कब हुई इसका हिसाब रखना एक कठिन कार्य है। स्पष्टतः मुमताज़ की मौत की तारीख़ महत्वहीन थी इसीलिये उस पर ध्यान नहीं दिया गया। फिर उसके दफ़न के लिये ताज किसने बनवाय

52. शाहज़हां और मुमताज़ के प्रेम की कहानियाँ मूर्खतापूर्ण तथा कपटजाल हैं। न तो इन कहानियों का कोई ऐतिहासिक आधार है न ही उनके कल्पित प्रेम प्रसंग पर कोई पुस्तक ही लिखी गई है। ताज के शाहज़हां के द्वारा अधिग्रहण के बाद उसके आधिपत्य दर्शाने के लिये ही इन कहानियों को गढ़ लिया गया।

53. शाहज़हां के शाही और दरबारी दस्तावेज़ों में ताज की कीमत का कहीं उल्लेख नहीं है क्योंकि शाहज़हां ने कभी ताजमहल को बनवाया ही नहीं। इसी कारण से नादान लेखकों के द्वारा ताज की कीमत 40 लाख से 9 करोड़ 17 लाख तक होने का काल्पनिक अनुमान लगाया जाता है।

54. इसी प्रकार से ताज का निर्माणकाल 10 से 22 वर्ष तक के होने का अनुमान लगाया जाता है। यदि शाहज़हां ने ताजमहल को बनवाया होता तो उसके निर्माणकाल के विषय में अनुमान लगाने की आवश्यकता ही नहीं होती क्योंकि उसकी प्रविष्टि शाही दस्तावेज़ों में अवश्य ही की गई होत

55. ताज भवन के भवननिर्माणशास्त्री (designer, architect) के विषय में भी अनेक नाम लिये जाते हैं जैसे कि ईसा इफेंडी जो कि एक तुर्क था, अहमद़ मेंहदी या एक फ्रांसीसी, आस्टीन डी बोरडीक्स या गेरोनिमो वेरेनियो जो कि एक इटालियन था, या शाहज़हां स्वयं।

56. ऐसा समझा जाता है कि शाहज़हां के काल में ताजमहल को बनाने के लिये 20 हजार लोगों ने 22 साल तक काम किया। यदि यह सच है तो ताजमहल का नक्शा (design drawings), मजदूरों की हाजिरी रजिस्टर (labour muster rolls), दैनिक खर्च (daily expenditure sheets), भवन निर्माण सामग्रियों के खरीदी के बिल और रसीद (bills and receipts of material ordered) आदि दस्तावेज़ शाही अभिलेखागार में उपलब्ध होते। वहाँ पर इस प्रकार के कागज का एक टुकड़ा भी नहीं है।

57. अतः ताजमहल को शाहज़हाँ ने बनवाया और उस पर उसका व्यक्तिगत तथा सांप्रदायिक अधिकार था जैसे ढोंग को समूचे संसार को मानने के लिये मजबूर करने की जिम्मेदारी चापलूस दरबारी, भयंकर भूल करने वाले इतिहासकार, अंधे भवननिर्माणशस्त्री, कल्पित कथा लेखक, मूर्ख कवि, लापरवाह पर्यटन अधिकारी और भटके हुये पथप्रदर्शकों (guides) पर है।

58. शाहज़हां के समय में ताज के वाटिकाओं के विषय में किये गये वर्णनों में केतकी, जै, जूही, चम्पा, मौलश्री, हारश्रिंगार और बेल का जिक्र आता है। ये वे ही पौधे हैं जिनके फूलों या पत्तियों का उपयोग हिंदू देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना में होता है। भगवान शिव की पूजा में बेल पत्तियों का विशेष प्रयोग होता है। किसी कब्रगाह में केवल छायादार वृक्ष लगाये जाते हैं क्योंकि श्मशान के पेड़ पौधों के फूल और फल का प्रयोग को वीभत्स मानते हुये मानव अंतरात्मा स्वीकार नहीं करती। ताज के वाटिकाओं में बेल तथा अन्य फूलों के पौधों की उपस्थिति सिद्ध करती है कि शाहज़हां के हथियाने के पहले ताज एक शिव मंदिर हुआ करता था।

59. हिंदू मंदिर प्रायः नदी या समुद्र तट पर बनाये जाते हैं। ताज भी यमुना नदी के तट पर बना है जो कि शिव मंदिर के लिये एक उपयुक्त स्थान है।

60. मोहम्मद पैगम्बर ने निर्देश दिये हैं कि कब्रगाह में केवल एक कब्र होना चाहिये और उसे कम से कम एक पत्थर से चिन्हित करना चाहिये। ताजमहल में एक कब्र तहखाने में और एक कब्र उसके ऊपर के मंज़िल के कक्ष में है तथा दोनों ही कब्रों को मुमताज़ का बताया जाता है, यह मोहम्मद पैगम्बर के निर्देश के निन्दनीय अवहेलना है। वास्तव में शाहज़हां को इन दोनों स्थानों के शिवलिंगों को दबाने के लिये दो कब्र बनवाने पड़े थे। शिव मंदिर में, एक मंजिल के ऊपर एक और मंजिल में, दो शिव लिंग स्थापित करने का हिंदुओं में रिवाज था जैसा कि उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर और सोमनाथ मंदिर, जो कि अहिल्याबाई के द्वारा बनवाये गये हैं, में देखा जा सकता है।

61. ताजमहल में चारों ओर चार एक समान प्रवेशद्वार हैं जो कि हिंदू भवन निर्माण का एक विलक्षण तरीका है जिसे कि चतुर्मुखी भवन कहा जाता है।

62. ताजमहल में ध्वनि को गुंजाने वाला गुम्बद है। ऐसा गुम्बज किसी कब्र के लिये होना एक विसंगति है क्योंकि कब्रगाह एक शांतिपूर्ण स्थान होता है। इसके विरुद्ध हिंदू मंदिरों के लिये गूंज उत्पन्न करने वाले गुम्बजों का होना अनिवार्य है क्योंकि वे देवी-देवता आरती के समय बजने वाले घंटियों, नगाड़ों आदि के ध्वनि के उल्लास और मधुरता को कई गुणा अधिक कर देते हैं।

63. ताजमहल का गुम्बज कमल की आकृति से अलंकृत है। इस्लाम के गुम्बज अनालंकृत होते हैं, दिल्ली के चाणक्यपुरी में स्थित पाकिस्तानी दूतावास और पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद के गुम्बज उनके उदाहरण हैं।

64. ताजमहल दक्षिणमुखी भवन है। यदि ताज क�

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मकर संक्रांति


मकर संक्रांति . . इस साल 2015 में 15 जनवरी को . चलिए . . .इस दिन ” गंगा ” में लगाते है .5 डूबकी . अगर पास में गंगा नही है – तो घर में जल में गंगाजल मिलाकर करिये स्नान . .करिये दान . . . घी . . कम्बल . . तिल . . वस्त्र . . आदि चीज़ों का . और पाइये. मानसिक . . शारीरिक कष्टों से मुक्ति . . . .
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= ” मकर संक्रान्ति ” प्रारंभ . . 14 जनवरी 2015 . 07-34 रात्रि से . .
= पुण्य काल प्रारंभ . . 15 जनवरी 2015 . .सुबह 07-19 से 12-30 दोपहर तक . .
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= ” मकर संक्रान्ति ” . . इस दिन भगवान् सूर्य . . अपने पुत्र शनि से मिलने उसके घर जाते है . . .
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= ” मकर संक्रांति ” का पर्व जीवन में संकल्प लेने का दिन भी कहा गया है . . इस दिन से सूर्य की कांति में परिवर्तन शुरू हो जाता है . वह दक्षिण से उत्तर दिशा की ओर अभिमुख हो जाता है . . उत्तरायण से रातें छोटी और दिन बड़े होने लगते हैं। . अंधकार घटने लगता है और प्रकाश में बढ़ोतरी शुरू हो जाती है . .
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= इस दिन ही ” गंगाजी ” भागीरथ के पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होकर सागर से मिली थी . . .
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= इस दिन ” भीष्म पितामह ” ने अपने शरीर का त्याग किया था . . .
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= इस दिन से ही ” सूर्यदेव ” उत्तरायण होते है . . .
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= इस दिन को पंजाब में ” लोहिणी ” . . तमिलनाडु में ” पोंगल ” . . . उत्तर प्रदेश में ” खिचड़ी ” . . और असाम में ” माघ – बिहू ” के नाम से उत्सव मनाते है . . .
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= इस दिन ” गंगासागर ” में विशाल मेला लगता है . . .
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= मकर संक्रांति के पर्व पर गुड़, घी, खिचड़ी बनाने के पीछे भी वैज्ञानिक आधार है . . मान्यता है कि तिल, घी, गुड़ और काली उड़द की खिचड़ी का दान और उसका सेवन करने से शीत का प्रकोप शांत होता है . दक्षिण भारत में बालकों के विद्याध्ययन का पहला दिन मकर संक्रांति से शुरू कराया जाता है . . प्राचीन रोम में इस दिन खजूर, अंजीर और शहद बांटने का उल्लेख मिलता है . . ग्रीक के लोग वर-वधू को संतान-वृद्धि के लिए तिल से बने पकवान बांटते है . .

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22 Reasons To Believe Hinduism Is Based On Science


22 Reasons To Believe Hinduism Is Based On Science

            वृक्ष
People are advised to worship Neem and Banyan tree in the morning. Inhaling the air near these trees, is good for health.

           योग
If you are trying to look ways for stress management, there can’t be anything other than Hindu Yoga aasan Pranayama (inhaling and exhaling air slowly using one of the nostrils).

          प्रतिष्ठान
Hindu temples are built scientifically. The place where an idol is placed in the temple is called ‘Moolasthanam’. This ‘Moolasthanam’ is where earth’s magnetic waves are found to be maximum, thus benefitting the worshipper.

           तुलसी
Every Hindu household has a Tulsi plant. Tulsi or Basil leaves when consumed, keeps our immune system strong to help prevent the H1N1 disease.

              मन्त्र
The rhythm of Vedic mantras, an ancient Hindu practice, when pronounced and heard are believed to cure so many disorders of the body like blood pressure.

           तिलक
Hindus keep the holy ash in their forehead after taking a bath, this removes excess water from your head.

          कुंकुम
Women keep kumkum bindi on their forehead that protects from being hypnotised.

           हस्त ग्रास
Eating with hands might be looked down upon in the west but it connects the body, mind and soul, when it comes to food.

           पत्तल
Hindu customs requires one to eat on a leaf plate. This is the most eco-friendly way as it does not require any chemical soap to clean it and it can be discarded without harming the environment.banana; palash leaves

           कर्णछेदन
Piercing of baby’s ears is actually part of acupuncture treatment. The point where the ear is pierced helps in curing Asthma.

           हल्दी
Sprinkling turmeric mixed water around the house before prayers and after. Its known that turmeric has antioxidant, antibacterial and anti-inflammatory qualities.

             गोबर
The old practice of pasting cow dung on walls and outside their house prevents various diseases/viruses as this cow dung is anti-biotic and rich in minerals.

                गोमूत्र
Hindus consider drinking cow urine to cure various illnesses. Apparently, it does balance bile, mucous and airs and a remover of heart diseases and effect of poison.

               शिक्षा
The age-old punishment of doing sit-ups while holding the ears actually makes the mind sharper and is helpful for those with Autism, Asperger’s Syndrome, learning difficulties and behavioural problems.

             दिया 
Lighting ‘diyas’ or oil or ghee lamps in temples and house fills the surroundings with positivity and recharges your senses.

              जनेऊ
Janeu, or the string on a Brahmin’s body, is also a part of Acupressure ‘Janeu’ and keeps the wearer safe from several diseases.

              तोरण
Decorating the main door with ‘Toran’- a string of mangoes leaves;neem leaves;ashoka leaves actually purifies the atmosphere.

            चरणस्पर्श
Touching your elder’s feet keeps your backbone in good shape.

             चिताग्नि
Cremation or burning the dead, is one of the cleanest form of disposing off the dead body.

                ॐ
Chanting the mantra ‘Om’ leads to significant reduction in heart rate which leads to a deep form of relaxation with increased alertness.

       हनुमान चालीसा
Hanuman Chalisa, according to NASA, has the exact calculation of the distance between Sun and the Earth.

              शंख
The ‘Shankh Dhwani’ creates the sound waves by which many harmful germs, insects are destroyed. The mosquito breeding is also affected by Shankh blowing and decreases the spread of malaria.

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