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भारतीय काल गणना


  • Arun Upadhyay भारतीय काल गणना और मेगास्थनीज आदि में कोई मतभेद नहीं है। मेगाथनीज ने भारतीय गणना के अनुसार ही कहा है कि डायोनिसस (बाक्कस) के ६४५१ वर्ष ३ मास बाद सिकन्दर का आक्रमण ३२६ ई.पू. में हुआ था। उसके १५ पीढ़ी बाद हरकुलस (विष्णु अवतार परशुराम) हुये जिनके देहान्त के बाद ६१७७ ई.पू. में कलम्ब (केरल का कोल्लम) सम्वत् आरम्भ हुआ। भारत में ऐतिहासिक युगों की गणना ब्रह्माब्द या अयनाब्द युग में की जाती है। १ अयनाब्द युग २४००० वर्ष का है, जो ऐतिहासिक जल प्रलय चक्र है। आधुनिक विज्ञान में इसे २१६०० वर्ष माना गया है दो विपरीत चक्रीय गतियों का मिलित प्रभाव है-२६००० वर्षों का अयन चक्र तथा १ लाख वर्ष का मन्दोच्च चक्र। २६००० वर्षों के अयन चक्र को ब्रह्माण्ड पुराण में ऐतिहासिक मन्वन्तर कहा गया है। यह स्वायम्भुव मनु से कलि आरम्भ (३१०२ ई.पू.) का काल कहा गया है। इसमें ३६० वर्ष के ७१ युग कहे गये हैं (मत्स्य पुराण २७३ अध्याय) जिसमें वैवस्वत मनु तक ४३ और उसके बाद कलि आरम्भ तक २८ युग होंगे। प्रति युग प्रायः ३६५ वर्ष का होगा जिसे स्थूल मान से ३६० वर्ष लिया गया है। इसी को वायु पुराण में युग खण्ड भी कहा गया है। वास्तविक जल प्रलय चक्र भारतीय अयनाब्द युग के अधिक निकट है जो २६००० वर्ष के अयन चक्र में मन्दोच्च के दीर्घकालिक चक्र ३१२००० वर्ष मिलाने से होता है। इसमें १२-१२ हजार वर्षों के २ खण्ड अवसर्पिणी और उत्सर्पिणी हैं। ब्रह्मगुप्त (विक्रमादित्य काल में ६२ ई.पू.) तथा भास्कर-२ ने इसी युग चक्र के अनुसार बीज संस्कार की गणना की है तथा आगम (पुराण) मत कहा है। अवसर्पिणी में सत्ययुग से आरम्भ होकर त्रेता, द्वापर कलि होते हैं जिनका मान ४८००, ३६००, २४००, १२०० वर्ष हैं। उत्सर्पिणी में विपरीत क्रम से युग होते हैं-कलि, द्वापर, त्रेता, सत्य युग। वैवस्वत मनु से तीसरा ब्रह्माब्द आरम्भ हुआ तथा २८ युग खण्डों की गणना ३१०२ ई.पू. तक हुयी। वैवस्वत मनु के बाद ४८०० वर्ष का सत्य ३६०० वर्ष का त्रेता तथा २४०० वर्ष का द्वापर ३१०२ ई.पू. में समाप्त हुआ। अतः वैवस्वत मनु का काल ३१०२ + २४०० + ३६०० + ४८०० = १३९०२ ई.पू. है। इसके त्रेता (९१०२-५५०२ ई.पू.) में ३६० वर्ष के १० युग हुये थे। उसके पूर्व भी ३६०० वर्षों के १० युग गुने गये हैं। १२०० वर्ष अधिक होते हैं जो प्रायः १०००० ई.पू. के जल प्रलय का काल है। ९१०२ में १०वां त्रेता या युग समाप्त हुआ (वायुपुराण अध्याय ९९) जिसमें दत्तात्रेय हुये थे। १५ वां त्रेता ९१०२-५ x ३६० = ७३०२ ई.पू. में हुआ जिसमें मान्धाता हुये थे। १९ वें त्रेता में परशुराम थे, यह ७३०२ – ३ x ३६० = ६२२२ ई.पू. से ५८६२ ई.पू. तक था। परशुराम का देहान्त ६१७७ ई.पू. में हुआ। उनके प्रायः ३५ वर्ष की अवस्था में गणतन्त्र युग आरम्भ हुआ, २१ गणतन्त्र १२० वर्ष तक थे। अतः उनका जन्म ६१७७ + (३५ + १२०) = ६३३२ ई.पू. में हुआ। उनका देहान्त १९ वें त्रेता में हुआ। डायोनिसस (६७७७ ई.पू. अप्रैल) की १५ पीढ़ी = ६०० वर्ष बाद ६१७७ ई.पू. परशुराम का काल है। प्रायः इसी काल का मंगलोर तट के पास समुद्र का नगर शूर्पारक था जिसकी ३० कि.मी. लम्बी दीवाल समुद्र में मिली है। परशुराम की ९ पीढ़ी बाद राम २४वें त्रेता में हुये थे जो ५८६२ – ५ x ३६० = ४०६२ ई.पू. में पूर्ण हुआ। इसका आरम्भ ४४२२ ई.पू. में हुआ, जिसके ११ वर्ष पूर्व ११-२-४४३३ ई.पू. रविवार प्रभव वर्ष (पितामह और सौर दोनों मतों से) में हुआ। अतः राम के जीवन का अधिकांश भाग २४वें त्रेता में था।
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  • Arun Upadhyay डायोनिसस आक्रमण (६७७७ ई.पू.) में सूर्यवंशी बाहु मारा गया था। उसके पुत्र सगर ने यवनों को भगाया। सगर की ७० पीढ़ी बाद बृहद्बल था जो महाभारत युद्ध में मारा गया ९३१३८ ई.पू.) उसके बाद ३० पीढ़ी तक सूर्यवंश राजा सुमित्र तक चला जिसका अन्त महापद्मनन्द ने १६३४ ई.पू. में किया। नन्द और उसके ८ पुत्रों (२ पीढ़ी) ने १०० वर्ष शासन किया। उसके बाद १२ मौर्य (३१६ वर्ष) + १० शुंग (३०० वर्ष) + ४ कण्व (८५ वर्ष) + ३० आन्ध्र राजा (२६पीढ़ी = ५०६ वर्ष) शासन किया। इन १५४ राजाओं के बाद गुप्तवंश का प्रथम राजा चन्द्रगुप्त-१ हुआ, जिसका उल्लेख मेगास्थनीज ने किया है। अतः कहीं कोई मतभेद नहीं है। केवल इतिहास नष्ट करने के लिये अंग्रेजों ने जालसाजी की है।
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  • Arun Upadhyay कलि के पञ्चाङ्ग-राम का जन्म ११-२-४४३३ ई.पू. में हुआ था पर उस काल के किसी पञ्चाङ्ग का उल्लेख नहीं है। परशुराम के ३००० वर्ष बाद कलियुग आरम्भ में ही नये पञ्चाङ्ग की आवश्यकता हुयी। युधिष्ठिर काल में ४ प्रकार के पञ्चाङ्ग हुये-(क) युधिष्ठिर शक-यह उनके राज्याभिषेक के दिन १७-१२-३१३९ ई.पू. से हुआ। उसके ५ दिन बाद उत्तरायण माघशुक्ल सप्तमी को हुआ। अतः अभिषेक प्रतिपदा या द्वितीया को था। (ख) कलि सम्वत्-शासन के ३६ वर्ष से कुछ अधिक बीतने पर १७-२-३१०२ ई.पू. उज्जैन मध्यरात्रि से कलियुग आरम्भ हुआ जब भगवान् कृष्ण का देहान्त हुआ। उसके २दिन २-२७-३० घं.मि.से. बाद २०-२-३१०२ ई.पू २-२७-३० घं.मि.से. से चैत्र शुक्ल प्रतिपदा आरम्भ हुआ। (ग) जयाभ्युदय शक-भगवान् कृष्ण के देहान्त के ६ मास ११ दिन बाद २२-८-३१०२ ई.पू. को जब विजय के बाद जय सम्वत्सर आरम्भ हुआ, तो युधिष्ठिर ने अभ्युदय के लिये सन्यास लिया। यह परीक्षित शासन से आरम्भ होता है तथा जनमेजय ने इसी का प्रयोग अपने दान-पत्रों में किया है। (घ) कलि के २५ वर्ष बीतने पर कश्मीर में युधिष्ठिर का देहान्त हुआ जब सप्तर्षि मघा से निकले। उस समय (३०७६ ई.पू. मेष संक्रान्ति) से लौकिक या सप्तर्षि सम्वत्सर आरम्भ हुआ जो कश्मीर में प्रचलित था तथा राजतरङ्गिणी में प्रयुक्त है। जैन युधिष्ठिर शक-जिनविजय महाकाव्य का जैन युधिष्ठिर शक ५०४ युधिष्ठिर शक (२६३४ ई.पू.) में आरम्भ होता है। इसके अनुसार कुमारिल भट्ट का जन्म ५५७ ई.पू. (२०७७) क्रोधी सम्वत्सर (सौर मत) में तथा शंकराचार्य का निर्वाण ४७७ ई.पू. (२१५७) राक्षस सम्वत्सर में कहा है-
    ऋषि(७)र्वार (७)स्तथा पूर्ण(०) मर्त्याक्षौ (२) वाममेलनात्. एकीकृत्य लभेताङ्कख् क्रोधीस्यात्तत्र वत्सरः॥
    भट्टाचार्य कुमारस्य कर्मकाण्डैकवादिनः। ज्ञेयः प्रादुर्भवस्तस्मिन् वर्षे यौधिष्ठिरे शके॥
    ऋषि(७)र्बाण(५) तथा भूमि(१)र्मर्त्याक्षौ (२) वाममेलनात्, एकत्वेन लभेताङ्कस्तम्राक्षास्तत्र वत्सरः॥ (शंकर निधन)
    यह पार्श्वनाथ का संन्यास या निधन काल है। उनका संन्यास पूर्व नाम युधिष्ठिर रहा होगा या वे वैसे ही धर्मराज या तीर्थङ्कर थे। भगवान् महावीर (जन्म ११-३-१९०२ ई.पू.) में पार्श्वनाथ का ही शक चल रहा था। युधिष्ठिर की ८ वीं पीढ़ी में निचक्षु के शासन में हस्तिनापुर डूब गया था- यह सरस्वती नदी के सूखने का परिणाम था। उस समय १०० वर्ष की अनावृष्टि कही गयी है जब दुर्भिक्ष रोकने के लिये शताक्षी या शाकम्भरी अवतार हुआ।
    दुर्गा-सप्तशती (११/४६-४९)-
    भूयश्च शतवार्षिक्यामनावृष्ट्यामनम्भसि। मुनिभिः संस्तुता भूमौ सम्भविष्याम्ययोनिजा॥४६॥
    ततः शतेन नेत्राणां निरीक्षिष्यामि यन्मुनीन्। कीर्तयिष्यन्ति मनुजाः शताक्षीमिति मां ततः॥४७॥
    ततोऽहमखिलं लोकमात्मदेहसमुद्भवैः। भरिष्यामि सुराः शाकैरावृष्टेः प्राणधारकैः॥४८॥
    शाकम्भरीति विख्यातिं तदा यास्याम्यहं भुवि। तत्रैव च वधिष्यामि दुर्गमाख्यं महासुरम्॥४९॥
    विष्णु पुराण (४/२१)-अतः परं भविष्यानहं भूपालान्कीर्तयिष्यामि॥१॥ योऽयं साम्प्रतमवनीपतिः परीक्षित्तस्यापि जनमेजय-श्रुतसेनो-ग्रसेन-भीमसेनश्चत्वारः पुत्राः भविष्यन्ति॥२॥ जनमेजयस्यापि शतानीको भविष्यति॥३॥ योऽसौ याज्ञवल्क्याद्वेदमधीत्य कृपादस्त्राण्यवाप्य विषम-विषय-विरक्त-चित्तवृत्तिश्च शौनकोपदेशादात्म-ज्ञान-प्रवीणः परं निर्वाणमवाप्स्यति॥४॥ शतानीकादश्वमेधदत्तो भविता॥५॥ तस्मादप्यधिसीमकृष्णः॥६॥ अधिसीमकृष्णान्निचक्षुः॥७॥ यो गङ्गयापहृते हस्तिनापुरे कौशाम्ब्यां निवत्स्यति॥८॥
    उसकी दो पीढ़ी बाद वाराणसी के राजपरिवार में पार्श्वनाथ जी का जन्म हुआ। दुर्भिक्ष में कई वैज्ञानिक तथा अन्य शास्त्र नष्ट हो गये।
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  • Arun Upadhyay शिशुनाग काल-पाल बिगण्डेट की पुस्तक बर्मा की बौद्ध परम्परा में बुद्ध निर्वाण से अजातशत्रु काल में एक नये वर्ष का आरम्भ कहा गया है (बर्मी में इत्यान = निर्वाण)। इसके १४८ वर्ष पूर्व अन्य वर्ष आरम्भ हुआ था जिसे बर्मी में कौजाद (शिशुनाग?) कहा है। बुद्ध निर्वाण (२७-३-१८०७ ई.पू.) से १४८ वर्ष पूर्व १९५४ ई.पू. में शिशुनाग का शासन समाप्त हुआ। ) नन्द शक-महापद्मनन्द का अभिषेक सभी पुराणों का विख्यात कालमान है। यह परीक्षित जन्म के १५०० (१५०४) वर्ष बाद हुआ था। इसमें १५०० को पार्जिटर ने १०५० कर दिया जिससे कलि आरम्भ को बाद का किया जा सके।खारावेल शिलालेख में भी लिखा है कि नन्द अभिषेक के त्रिवसुशत (८०३) वर्ष के बाद उसके शासन के ४ वर्ष पूर्ण हुये जब उसने प्राची नहर की मरम्मत करायी। यह नन्द काल में बनी थी। यहां ’त्रिवसु शत’ को ’त्रिवर्ष शत’ कर इतिहासकारों ने १०३ या ३००वर्ष आदि मनमाने अर्थ किये हैं।
    यावत् परीक्षितो जन्म यावत् नन्दाभिषेचनम् । तावत् वर्ष सहस्रं च ज्ञेयं पञ्चशतोत्तरम् ॥ (विष्णु पुराण, ४/२४/१०४) यहां पञ्चशतोत्तरम् (१५००) को पञ्चाशतोत्तरम् कर दिया है।
    आर्यभटीय (१/५)-काहो मनवो ढ, मनुयुगाः श्ख, गतास्ते च, मनुयुगाः छ्ना च।
    कल्पादेर्युगपादा ग च, गुरु दिवसाच्च, भारतात् पूर्वम्॥
    धूसीकाल (३१७९)-युतः शाकः कल्यब्द इति कीर्तितः॥ (वाक्यकरण, १/२)
    गतवर्षान्त कोलम्बवर्षाः तरळगा (३९२६) स्थिताः।
    कल्यब्दा धीस्थकाला (३१७९) ढ्याः शकाब्दा वा भवन्ति ते॥ (पुतुमन सोमयाजी, करण पद्धति)
    भागवत पुराण (१२/२/३)-यस्मिन् कृष्णो दिवं यातस्तस्मिन्नेव तदाहनि। प्रतिपन्नं कलियुगमिति प्राहुः पुराविदः॥
    (१/१५/३७) यदा मुकुन्दो भगवानिमां महीं जहौ स्वतन्त्रा श्रवणीय सत्कथः।
    तदाहरे वा प्रतिबुद्धचेतसामधर्महेतुः कलिरन्ववर्तत॥
    लल्ल-शिष्यधीवृद्धिदतन्त्र(१/१२)-नवाद्रिचन्द्रानलसंयुतोभवेच्छकक्षितीशाब्दगणो गतः कलेः।
    दिवाकरघ्नो गतमाससंयुतः कुवह्निनिघ्नस्तिथिभिः समन्वितः॥
    भास्कर-२ (सिद्धान्त शिरोमणि १/२८)-याताः षण्मनवो युगानि भमितान्यन्यद्युगाङ्घ्रित्रयं,
    नन्दाद्रीन्दुगुणा (१३७९) स्तथा शकनृपस्यान्ते कलेर्वत्सराः।
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  • Arun Upadhyay शूद्रक शक-यह ७५६ ई.पू. में आरम्भ हुआ। जेम्स टाड ने सभी राजपूत राजाओं को विदेशी शक मूल का सिद्ध करने के लिये उनकी बहुत सी वंशावलियां तथा ताम्रपत्र आदि नष्ट किये तथा राजस्थान कथा (Annals of Rajsthan) में अग्निवंशी राजाओं का काल थोड़ा बदल कर प्रायः ७२५ ई.पू. कर दिया।
    काञ्चुयल्लार्य भट्ट-ज्योतिष दर्पण-पत्रक २२ (अनूप संस्कृत लाइब्रेरी, अजमेर एम्.एस नं ४६७७)-
    बाणाब्धि गुणदस्रोना (२३४५) शूद्रकाब्दा कलेर्गताः॥७१॥ गुणाब्धि व्योम रामोना (३०४३) विक्रमाब्दा कलेर्गताः॥
    इस समय असुर (असीरिया के नबोनासर आदि) आक्रमण को रोकने के लिये ४ प्रमुख राजवंशों का संघ आबू पर्वत पर विष्णु अवतार बुद्ध की प्रेरणा से बना। इन राजाओं को अग्रणी होने के कारण अग्निवंशी कहा गया-परमार, प्रतिहार, चालुक्य तथा चाहमान।
    भविष्य पुराण, प्रतिसर्ग पर्व (१/६)-
    एतस्मिन्नेवकाले तु कान्यकुब्जो द्विजोत्तमः। अर्बुदं शिखरं प्राप्य ब्रह्महोममथाकरोत्॥४५॥
    वेदमन्त्रप्रभावाच्च जाताश्चत्वारि क्षत्रियाः। प्रमरस्सामवेदी च चपहानिर्यजुर्विदः॥४६॥
    त्रिवेदी च तथा शुक्लोऽथर्वा स परिहारकः॥४७॥ अवन्ते प्रमरो भूपश्चतुर्योजन विस्तृता।।४९॥
    प्रतिसर्ग (१/७)-चित्रकूटगिरिर्देशे परिहारो महीपतिः। कालिंजर पुरं रम्यमक्रोशायतनं स्मृतम्॥१॥
    राजपुत्राख्यदेशे च चपहानिर्महीपतिः॥२॥ अजमेरपुरं रम्यं विधिशोभा समन्वितम्॥३॥
    शुक्लो नाम महीपालो गत आनर्तमण्डले। द्वारकां नाम नगरीमध्यास्य सुखिनोऽभवत्॥४॥
    ४ राजाओं का संघ होने के कारण यह कृत संवत् भी कहा जाता है तथा इन्द्राणीगुप्त को सम्मान के लिये शूद्रक कहा गया-शूद्र ४ जातियों का सेवक है।
  • Arun Upadhyay चाहमान शक-दिल्ली कॆ चाहमान राजा ने ६१२ ईसा पूर्व में असीरिया की राजधानी निनेवे को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया, जिसका उल्लेख बाइबिल में कई स्थानों पर है। इसके नष्टकर्त्ता को सिन्धु पूर्व के मधेस (मध्यदेश, विन्ध्य तथा हिमालय के बीच) का शासक कहा गया है।
    http://bible.tmtm.com/wiki/NINEVEH_%28Jewish_Encyclopedia%29
    The Aryan Medes, who had attained to organized power east and northeast of Nineveh, repeatedly invaded Assyria proper, and in 607 succeeded in destroying the city
    Media-From BibleWiki (Redirected from Medes)-They appear to have been a branch of the Aryans, who came from the east bank of the Indus, …
    इस समय जो शक आरम्भ हुआ उसका उल्लेख वराहमिहिर की बृहत् संहिता में है तथा कालिदास, ब्रह्मगुप्त ने भी इसी का पालन किया है। वराहमिहिर-बृहत् संहिता (१३/३)-
    आसन् मघासु मुनयः शासति पृथ्वीं युधिष्ठिरे नृपतौ। षड्-द्विक-पञ्च-द्वि (२५२६) युतः शककालस्तस्य राज्ञस्य॥
    श्रीहर्ष शक (४५६ ईसा पूर्व)-इसका उल्लेख अलबरूनि ने किया है। शूद्रक के बाद ३०० वर्ष तक मालवगण चला-जिसे मेगस्थनीज ने ३०० वर्षों का गणराज्य कहा है। लिच्छवी तथा गुप्त राजाओं ने इसका प्रयोग किया है पर इसे निरक्षर इतिहासकारों ने हर्षवर्धन (६०५-६४६ इस्वी) से जोड़ दिया है। विक्रम संवत्-५७ ईसा पूर्व में उज्जैन के परमार वंशी राजा विक्रमादित्य (८२ ईसा पूर्व-१९ ईस्वी) ने आरम्भ किया। उनका राज्य (परोक्षतः) अरब तक था तथा जुलिअस सीजर के राज्य में भी उनके संवत् के ही अनुसार सीजर के आदेश के ७ दिन बाद विक्रम वर्ष १० के पौष कृष्ण मास के साथ वर्ष का आरम्भ हुआ।
    History of the Calendar, by M.N. Saha and N. C. Lahiri (part C of the Report of The Calendar Reforms Committee under Prof. M. N. Saha with Sri N.C. Lahiri as secretary in November 1952-Published by Council of Scientific & Industrial Research, Rafi Marg, New Delhi-110001, 1955, Second Edition 1992.
    Page, 168-last para-“Caesar wanted to start the new year on the 25th December, the winter solstice day. But people resisted that choice because a new moon was due on January 1, 45 BC. And some people considered that the new moon was lucky. Caesar had to go along with them in their desire to start the new reckoning on a traditional lunar landmark.”
    यहां बिना गणना के मान लिया गया है कि वर्ष आरम्भ के दिन शुक्ल पक्ष का आरम्भ था, पर वह विक्रम सम्वत् के पौष मास का आरम्भ था। केवल विक्रम वर्ष में ही चान्द्र मास का आरम्भ कृष्ण पक्ष से होता है. बाकी सभी शुक्ल पक्ष से आरम्भ होते हैं। इसी विक्रमादित्य के दरबार में कालिदास, वराहमिहिर आदि ९ रत्न विख्यात थे।
  • Arun Upadhyay शालिवाहन शक-विक्रमादित्य के देहान्त के बाद ५० वर्ष तक भारत विदेशी आक्रमणों का शिकार रहा। तब उनके पौत्र शालिवाहन ने उनको पराजित कर सिन्धु के पश्चिम भगा दिया। उनके काल में प्राकृत भाषाओं का प्रयोग राजकार्य में आरम्भ हुआ। इनके काल मॆ ईसा मसीह ने कश्मीर में शरण लिया (हजरत बाल) ।
    कलचुरि या चेदि शक (२४६ इसवी),
    वलभी भंग (३१९ ईस्वी)-गुप्त राजाओं की परवर्त्ती शाखा गुजरात के वलभी में शासन कर रही थी जिसका अन्त इस समय हुआ। निरक्षर इतिहासकार इसके १ वर्ष बाद गुप्त काल का आरम्भ कहते हैं।
  • Ajinkya Umbarkar Few points that i want to share: 1- precessional cycle equinox is of 25770 yrs. 2- great sage swami sri yukteshwar refers to precession cycle of equinox of around 24000 yrs. 3- there are more than 175+ observation about celestial events,seasons and geography which do not corroborate with any time before 3200 b.c in case of MB. 4- I agree with you Upadhaya sir on all points that you have mentioned but there are some specific observation in MB which do not matches with times earlier to 3200 b.c

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