Posted in हिन्दू पतन

खोया और सोया भारत!


ज्योतिष की दो शाखायें हैं !
(१) गणितीय (२) फलित ज्योतिष
और दोनों के प्रयोग अलग-अलग हैं !!!
लेखन अति रोचक व सुन्दर है ।

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खोया और सोया भारत!
जागो और वेदो की ओर लोटो!
-फरहाना ताज
कल बेटी की भूगोल की पुस्तक पढ़ रही थी, उसमें लिखा था कि उत्तरी ध्रुव की खोज रोबर्ट ने की थी और ज्वार भाटा के सिद्धांत का श्रेय वेवल को दिया गया है। हम कितने मूर्ख हैं अपने बच्चो को क्या पढाते हैं। यह क्यों नहीं बताते कि इन पाश्चात्य वैज्ञानिकों से पहले यह ज्ञान भारतीयो के पास था। आप रूस में छात्रों की पुस्तकें पढें तो पाएंगे कि वे हर खोज को बताते हैं कि यह तो रूस ने सदियो पहले कर ली थी। वे तो विमान को भी ऐसा ही बताते हैं और कभी भी यूरोप वालो को वैज्ञानिक ही नहीं मानते, लेकिन रेडियो हम बनाते है और आविष्कार मारकोनी हो जाते हैं। हम उत्तरी ध्रुव पर तपस्या तक करते हैं और खोजकर्ता रोबर्ट हो जाते हैं। अरे याद आया मैंने तो सुना है कि भारत भी किसी वास्कोडिगामा ने खोजा था, यह भी मैंने पढा है। हां खोजा ही होगा क्योंकि मेरा भारत आज भी कहीं खोया हुआ है सोया हुआ है।
वेदों में ध्रुव प्रदेश में होने वाले छह-छह मास के दिन-रात का वर्णन है। ध्रुवों में छह मास का दिन व छह मास की रात्रि मालूम करना ज्योतिष और भूगोल के महान सूक्ष्म ज्ञान पर ही अवलंबित है। पृथ्वी पर ऐसी कोई जगह न बची थी, जिससे आर्य अपरिचित हों। तभी तो आर्य साहित्य में लिखा है कि जिस समय लंका में सूर्य उदय होता है, उस समय यमकोटि नामक नगर में दोपहर, नीचे सिद्धपुरी में अस्तकाल और रोमक में दोपहर रात्रि रहती है।
लंकापुरेsर्कस्य यदोदयः स्यात्तदा दिनार्द्ध यमकोटिपुर्याम्।
अधस्तदा सिद्धपुरेsस्तकालः स्याद्रोमके रात्रिददलं तदैव।
अतः रोबर्ट को उत्तरी ध्रुव का खोजकर्ता कहना गलत है।
ज्वार भाटा की बात आर्यों को ज्ञात थी। हमारे लाखो साल पुराने साहित्य में लिखा है कि यथार्थ में ज्वार भाटे से समुद्र का जल कम और अधिक नहीं हो जाता। प्रत्युत अग्नि में थाली पर जल रखने से जिस प्रकार वह उमड़ पड़ता है उसी प्रकार चन्द्रमा के आकर्षण से ज्वार भाटा होता है।
स्थाली स्थमग्नि संयोगदादुद्रेकि सलिलं यथा।
तथेन्दुवृद्धौ सलिलमम्भौधौ मुनिसत्तमः।
अतः विलियम वेवल ज्वार भाटा सिद्धांत के जनक नहीं हैं।

Shri Krishan Jugnu वायु, मत्‍स्‍य आदि पुराणों में पूर्णिमा या पूर्णचन्‍द्र के दिन समुद्र के जल के ऊपर चढने का प्रसंग आया है, ये दोनों ही पूर्ण क्रमश चौथी से छठवीं सदी तक अपने वर्तमान रूप में आ चुके थे,,, मगर यह ज्ञान इससे भी भी था।

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