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कुतुब मीनार का अनकहा सच


कुतुब मीनार का अनकहा सच
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कुतुब मीनार को पहले विष्णु स्तंभ कहा जाता था।
इससे पहले इसे सूर्य स्तंभ कहा जाता था।
इसके केंद्र में ध्रुव स्तंभ था जिसे आज कुतुब मीनार कहा जाता है।
इसके आसपास 27 नक्षत्र के आधार पर 27 मंडल थे। इसे वराहमिहिर की देखरेख में बनाया गया था ।

चंद्रगुप्त द्वितिय के आदेश से यह बना था।
ज्योतिष स्तंभों के अलावा भारत में कीर्ति स्तम्भ बनाने की परंपरा भी रही है।
खासकर जैन धर्म में इस तरह के स्तंभ बनाए जाते रहे हैं। आज भी देश में ऐसे कई स्तंभ है, लेकिन तथाकथित कुतुब मीनार से बड़े नहीं।
राजस्थान के चित्तौड़गढ़ में ऐसा ही एक स्तंभ स्थित है।
ऐसा भी कहते हैं कि समुद्रगुप्त ने दिल्ली में एक वेधशाला बनवाई थी, यह उसका सूर्य स्तंभ है।

कालान्तर में अनंगपाल तोमर और पृथ्वीराज चौहान के शासन के समय में उसके आसपास कई मंदिर और भवन बने, जिन्हें मुस्लिम हमलावरों ने दिल्ली में घुसते ही तोड़ दिया था।
कुतुबुद्दीन ने वहां ‘कुबत−उल−इस्लाम’ नाम की मस्जिद का निर्माण कराया और इल्तुतमिश ने उस सूर्य स्तंभ में तोड़-फोड़कर उसे मीनार का रूप दे दिया था।

माना जाता है कि गुलाम वंश के पहले शासक कुतुबुद्दीन ऐबक ने 1199 में कुतुब मीनार का निर्माण शुरू करवाया था और उसके दामाद एवं उत्तराधिकारी शमशुद्दीन इल्तुतमिश ने 1368 में इसे पूरा किया था ।

लेकिन क्या यह सच है?

मीनार में देवनागरी भाषा के शिलालेख के अनुसार यह मीनार 1326 में क्षतिग्रस्त हो गई थी और इसे मुहम्मद बिन तुगलक ने ठीक करवाया था ।
इसके बाद में 1368 में फिरोजशाह तुगलक ने इसकी ऊपरी मंजिल को हटाकर इसमें दो मंजिलें और जुड़वा दीं ।

इसके पास सुल्तान इल्तुतमिश, अलाउद्दीन खिलजी, बलबन व अकबर की धाय मां के पुत्र अधम खां के मकबरे स्थित हैं। उसी कुतुब मीनार की चारदीवारी में खड़ा हुआ है एक लौह स्तंभ ।

दिल्ली के कुतुब मीनार के परिसर में स्थित यह स्तंभ 7 मीटर ऊंचा है। इसका वजन लगभग 6 टन है।

इसे गुप्त साम्राज्य के चन्द्रगुप्त द्वितीय (जिन्हें चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य भी कहा जाता है) ने लगभग 1,600 वर्ष पूर्व बनवाया।
यह लौह स्तंभ प्रारंभ से यहां नहीं था। सवाल उठता है कि क्या यह लौह स्तंभ भी कुतुबुद्दीन ऐबक ने बनवाया था?

इ‍तनी बड़ी मीनार जब बनी होगी तो यदि यह स्तंभ पहले से यहां रहा होगा तो उसी समय में हट जाना चाहिए था।

गुप्त साम्राज्य के सोने के सिक्कों से यह प्रमाणित होता है कि यह स्तंभ विदिशा (विष्णुपदगिरि/उदयगिरि- मध्यप्रदेश) में स्थापित किया गया था।

कुतुबुद्दीन ऐबक ने जैन मंदिर परिसर के 27 मंदिर तोड़े तब यह स्तंभ भी उनमें से एक था।
दरअसल, मंदिर से तोड़े गए लोहे व अन्य पदार्थ से उसने मीनार में रिकंस्ट्रक्शन कार्य करवाया था।
उनके काल में यह स्तंभ समय बताने का भी कार्य करता था।

सम्राट अशोक ने भी कई स्तंभ बनवाए थे, उसी तरह चंद्रगुप्त द्वितीय ने भी कई स्तंभ बनवाए थे।
ऐसा माना जाता है कि तोमर साम्राज्य के राजा विग्रह ने यह स्तंभ कुतुब परिसर में लगवाया।

लौह स्तंभ पर लिखी हुई एक पंक्ति में सन् 1052 के तोमर राजा अनंगपाल (द्वितीय) का जिक्र है।

जाट इतिहास के अनुसार ऐबक को मीनार तो क्या, अपने लिए महल व किला बनाने तक का समय जाटों ने नहीं दिया।
उसने तो मात्र 4 वर्ष तक ही शासन किया।

इस मीनार को जाट सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य (विक्रमादित्य) के कुशल इंजीनियर वराहमिहिर के हाथों चौथी सदी के चौथे दशक में बनवाया गया था।

यह मीनार दिलेराज जाट दिल्ली के राज्यपाल की देखरेख में बनी थी। हरिदत्त शर्मा ने अपनी किताब ज्योतिष विश्‍व कोष में लिखा है कि कुतुब मीनार के दोनों ओर दो पहाड़ियों के मध्य में से ही उदय और अस्त होता है।

आचार्य प्रभाकर के अनुसार 27 नक्षत्रों का वेध लेने के लिए ही इसमें 27 भवन बनाए गए थे। 21 मार्च और 21 सितंबर को सूर्योदय तुगलकाबाद के स्थान पर और सूर्यास्त मलकपुर के स्थान पर होता देखा जा सकता है।

मीनार का प्रवेश द्वार उत्तर की ओर है न कि इस्लामिक मान्यता के अनुसार पश्‍चिम की ओर।

अंदर की ओर उत्कीर्ण अरबी के शब्द स्पष्ट ही बाद में अंकित किए हुए नजर आते हैं।
मुस्लिम विश्‍वविद्यालय, अलीगढ़ के संस्थापक ने यह स्वीकार किया है कि यह हिन्दू भवन है।

स्तंभ का घेरा 27 मोड़ों और ‍त्रिकोणों का है। बाद के लोगों ने कुतुब मीनार को कुतुबुद्दीन ऐबक से जोड़ दिया जबकि ‘कुतुब ‍मीनार’ का अर्थ अरबी में नक्षत्रीय और वेधशाला होता है। इसका पुराना नाम ‘ध्रुव स्तंभ’ और ‘विष्णु स्तंभ’था।

मुस्लिम शासकों ने इसका नाम बदला और इस पर से कुछ हिन्दू चिह्न मिटा दिए जिसके निशान आज भी देखे जा सकते हैं। राजा विक्रमादित्य के समय में उज्जैन और दिल्ली की कालजयी बस्ती के बीच का 252 फुट ऊंचा स्तंभ है।

वराह मिहिर के अनुसार 21 जून को सूर्य ठीक इसके ऊपर से गुजरता है। पड़ोस में जो बस्ती है उसे आजकल महरौली कहते हैं जबकि वह वास्तव में वह मिहिरावली थी।

इस म‍ीनार के आसपास 27 नक्षत्र मंडप थे जिसे ध्वस्त कर दिया गया। यह माना जाता है कि कुववत-उल-इस्लाम मस्जिद और कुतुब मीनार के परिसर में सत्ताइस हिन्दू मंदिरों के अवशेष आज भी मौजूद हैं।

महरौली स्थित लौह स्तम्भ जंग लगे बिना विभिन्न संघर्षों का मूक गवाह रहा है और हमारे गौरव और समृद्धि की कहानी को बयां करता है ।।

जागो हिन्दुओं जागो
ज्यादा से ज्यादा शेयर करो और सबको बताओ ।।

जय श्री राम

कुतुब मीनार का अनकहा सच
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कुतुब मीनार को पहले विष्णु स्तंभ कहा जाता था।
इससे पहले इसे सूर्य स्तंभ कहा जाता था।
इसके केंद्र में ध्रुव स्तंभ था जिसे आज कुतुब मीनार कहा जाता है।
इसके आसपास 27 नक्षत्र के आधार पर 27 मंडल थे। इसे वराहमिहिर की देखरेख में बनाया गया था ।

चंद्रगुप्त द्वितिय के आदेश से यह बना था।
ज्योतिष स्तंभों के अलावा भारत में कीर्ति स्तम्भ बनाने की परंपरा भी रही है।
खासकर जैन धर्म में इस तरह के स्तंभ बनाए जाते रहे हैं। आज भी देश में ऐसे कई स्तंभ है, लेकिन तथाकथित कुतुब मीनार से बड़े नहीं।
राजस्थान के चित्तौड़गढ़ में ऐसा ही एक स्तंभ स्थित है।
ऐसा भी कहते हैं कि समुद्रगुप्त ने दिल्ली में एक वेधशाला बनवाई थी, यह उसका सूर्य स्तंभ है।

कालान्तर में अनंगपाल तोमर और पृथ्वीराज चौहान के शासन के समय में उसके आसपास कई मंदिर और भवन बने, जिन्हें मुस्लिम हमलावरों ने दिल्ली में घुसते ही तोड़ दिया था।
कुतुबुद्दीन ने वहां 'कुबत−उल−इस्लाम' नाम की मस्जिद का निर्माण कराया और इल्तुतमिश ने उस सूर्य स्तंभ में तोड़-फोड़कर उसे मीनार का रूप दे दिया था।

माना जाता है कि गुलाम वंश के पहले शासक कुतुबुद्दीन ऐबक ने 1199 में कुतुब मीनार का निर्माण शुरू करवाया था और उसके दामाद एवं उत्तराधिकारी शमशुद्दीन इल्तुतमिश ने 1368 में इसे पूरा किया था ।

लेकिन क्या यह सच है?

मीनार में देवनागरी भाषा के शिलालेख के अनुसार यह मीनार 1326 में क्षतिग्रस्त हो गई थी और इसे मुहम्मद बिन तुगलक ने ठीक करवाया था ।
इसके बाद में 1368 में फिरोजशाह तुगलक ने इसकी ऊपरी मंजिल को हटाकर इसमें दो मंजिलें और जुड़वा दीं ।

इसके पास सुल्तान इल्तुतमिश, अलाउद्दीन खिलजी, बलबन व अकबर की धाय मां के पुत्र अधम खां के मकबरे स्थित हैं। उसी कुतुब मीनार की चारदीवारी में खड़ा हुआ है एक लौह स्तंभ ।

दिल्ली के कुतुब मीनार के परिसर में स्थित यह स्तंभ 7 मीटर ऊंचा है। इसका वजन लगभग 6 टन है।

इसे गुप्त साम्राज्य के चन्द्रगुप्त द्वितीय (जिन्हें चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य भी कहा जाता है) ने लगभग 1,600 वर्ष पूर्व बनवाया।
यह लौह स्तंभ प्रारंभ से यहां नहीं था। सवाल उठता है कि क्या यह लौह स्तंभ भी कुतुबुद्दीन ऐबक ने बनवाया था?

इ‍तनी बड़ी मीनार जब बनी होगी तो यदि यह स्तंभ पहले से यहां रहा होगा तो उसी समय में हट जाना चाहिए था।

गुप्त साम्राज्य के सोने के सिक्कों से यह प्रमाणित होता है कि यह स्तंभ विदिशा (विष्णुपदगिरि/उदयगिरि- मध्यप्रदेश) में स्थापित किया गया था।

कुतुबुद्दीन ऐबक ने जैन मंदिर परिसर के 27 मंदिर तोड़े तब यह स्तंभ भी उनमें से एक था।
दरअसल, मंदिर से तोड़े गए लोहे व अन्य पदार्थ से उसने मीनार में रिकंस्ट्रक्शन कार्य करवाया था।
उनके काल में यह स्तंभ समय बताने का भी कार्य करता था।

सम्राट अशोक ने भी कई स्तंभ बनवाए थे, उसी तरह चंद्रगुप्त द्वितीय ने भी कई स्तंभ बनवाए थे।
ऐसा माना जाता है कि तोमर साम्राज्य के राजा विग्रह ने यह स्तंभ कुतुब परिसर में लगवाया।

लौह स्तंभ पर लिखी हुई एक पंक्ति में सन् 1052 के तोमर राजा अनंगपाल (द्वितीय) का जिक्र है।

जाट इतिहास के अनुसार ऐबक को मीनार तो क्या, अपने लिए महल व किला बनाने तक का समय जाटों ने नहीं दिया।
उसने तो मात्र 4 वर्ष तक ही शासन किया।

इस मीनार को जाट सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य (विक्रमादित्य) के कुशल इंजीनियर वराहमिहिर के हाथों चौथी सदी के चौथे दशक में बनवाया गया था।

यह मीनार दिलेराज जाट दिल्ली के राज्यपाल की देखरेख में बनी थी। हरिदत्त शर्मा ने अपनी किताब ज्योतिष विश्‍व कोष में लिखा है कि कुतुब मीनार के दोनों ओर दो पहाड़ियों के मध्य में से ही उदय और अस्त होता है।

आचार्य प्रभाकर के अनुसार 27 नक्षत्रों का वेध लेने के लिए ही इसमें 27 भवन बनाए गए थे। 21 मार्च और 21 सितंबर को सूर्योदय तुगलकाबाद के स्थान पर और सूर्यास्त मलकपुर के स्थान पर होता देखा जा सकता है।

मीनार का प्रवेश द्वार उत्तर की ओर है न कि इस्लामिक मान्यता के अनुसार पश्‍चिम की ओर।

अंदर की ओर उत्कीर्ण अरबी के शब्द स्पष्ट ही बाद में अंकित किए हुए नजर आते हैं।
मुस्लिम विश्‍वविद्यालय, अलीगढ़ के संस्थापक ने यह स्वीकार किया है कि यह हिन्दू भवन है।

स्तंभ का घेरा 27 मोड़ों और ‍त्रिकोणों का है। बाद के लोगों ने कुतुब मीनार को कुतुबुद्दीन ऐबक से जोड़ दिया जबकि 'कुतुब ‍मीनार' का अर्थ अरबी में नक्षत्रीय और वेधशाला होता है। इसका पुराना नाम 'ध्रुव स्तंभ' और 'विष्णु स्तंभ'था।

मुस्लिम शासकों ने इसका नाम बदला और इस पर से कुछ हिन्दू चिह्न मिटा दिए जिसके निशान आज भी देखे जा सकते हैं। राजा विक्रमादित्य के समय में उज्जैन और दिल्ली की कालजयी बस्ती के बीच का 252 फुट ऊंचा स्तंभ है।

वराह मिहिर के अनुसार 21 जून को सूर्य ठीक इसके ऊपर से गुजरता है। पड़ोस में जो बस्ती है उसे आजकल महरौली कहते हैं जबकि वह वास्तव में वह मिहिरावली थी।

इस म‍ीनार के आसपास 27 नक्षत्र मंडप थे जिसे ध्वस्त कर दिया गया। यह माना जाता है कि कुववत-उल-इस्लाम मस्जिद और कुतुब मीनार के परिसर में सत्ताइस हिन्दू मंदिरों के अवशेष आज भी मौजूद हैं।

महरौली स्थित लौह स्तम्भ जंग लगे बिना विभिन्न संघर्षों का मूक गवाह रहा है और हमारे गौरव और समृद्धि की कहानी को बयां करता है ।।

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जय श्री राम

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