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शिवमई गंगा


शिवमई गंगा
hotcrassa
लहरा कर बोले शिवशंकर,
बांध लूँगा गंगा को इन्ही ज्टावों में,
तो हंस कर बोली गंगा,
जाउंगी पाताललोक,
शिवशंकर,
कमंडल ये साथ लेके.
हर-हर शिवशंकर,
हाहाकार गंगा,
शांत-अविचल शिवशंकर,
प्रलयंकारी गंगा.
उफनती,
गरजती,
जो चल दी धाराएं,
तो डोली ये धरती,
और,
कांपी दिशाएं,
थर्राने लगा,
जो कैलाश भी थर-थर,
तो योगी की,
टूटी गहरी निन्द्राएं.
तमक कर बोले शिवशंकर,
बांध लूँगा गंगा को इन्ही ज्टावों में,
तो हंस कर बोली गंगा,
जाउंगी पाताललोक,
शिवशंकर,
कमंडल ये साथ लेके.
निश्छल भोले शिवशंकर,
विध्वंशकारी गंगा,
परोपकारी शिवशंकर,
तेजमयी गंगा.
आगे-आगे भागीरथ,
पीछे विध्वंश,
धुल-धुश्रित भागीरथ,
मन में मचा एक द्वन्द.
क्या हो जायेगा सृष्टीका,
आज यहाँ अंत,
क्या मिट न सकेगा,
कुल से मेरे ये कलंक.
व्याकुल मन से,
पुकार उठे भागीरथ,
कहाँ हो बाबा शिवशंकर?
डम-डम शिवशंकर,
माहमई गंगा,
योगरुपी शिवशंकर,
योगमई गंगा.
धीरे-धीरे,
चारो और,
फैल गयी काली जटाएं,
सोंख लिया,
एक-एक बूंद,
ना रहीं धाराएँ.
विलुप्त हो गयीं,
धरती पे आकर,
विष्णुप्रिया गंगा.
धिरधारी शिवशंकर,
प्रचंद्कारी गंगा,
सर्प्धारी शिवशंकर,
विनाशकारी गंगा.
चीत्कार उठे भागीरथ,
अब कहाँ से लाऊं गंगा.
तो हंस कर बोले,
शिवशंकर,
लो प्रकट भयीं, परमित,
अब शिवमई गंगा,
ममतामई गंगा,
कल्याणकारी गंगा.

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होंठों पे सच्चाई रहती है, जहँ दिल में सफ़ाई रहती है


होंठों पे सच्चाई रहती है, जहँ दिल में सफ़ाई रहती है
हम उस देश के वासी हैं, जिस देश में गंगा बहती है
मेहमाँ जो हमारा होता है, वो जान से प्यारा होता है
ज़्यादा की नहीं लालच हमको, थोड़े में गुज़ारा होता है
बच्चों के लिए जो धरती माँ, सदियों से सभी कुछ सहती है
हम उस देश के वासी हैं, जिस देश में गंगा बहती है

कुछ लोग जो ज़्यादा जानते हैं, इन्सान को कम पहचानते हैं
ये पूरब है, पूरबवाले हर जान की क़ीमत जानते हैं
मिलजुल के रहो और प्यार करो, इक चीज़ यही जो रहती है
हम उस देश के वासी हैं, जिस देश में गंगा बहती है

जो जिससे मिला सीखा हमने, ग़ैरों को भी अपनाया हमने
मतलब के लिए अँधे होकर, रोटी को नहीं पूजा हमने
अब हम तो क्या, सारी दुनिया सारी दुनिया से कहती है
हम उस देश के वासी हैं, जिस देश में गंगा बहती है
होंठों पे सच्चाई रहती है…

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गंगा नदी


गंगा नदी

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गंगा
नदी
Ganges India.jpg
वाराणसी में गंगा
देश भारत, नेपाल, बांग्लादेश
उपनदियाँ
 – बाएँ महाकाली, करनाली, कोसी, गंडक, घाघरा
 – दाएँ यमुना, सोन, महानंदा
शहर हरिद्वार, मुरादाबाद, रामपुर, कानपुर,इलाहाबाद, वाराणसी, पटना, राजशाही
स्रोत गंगोत्री हिमनद
 – स्थान उत्तराखण्ड, भारत
 – ऊँचाई 3,892 मी. (12,769 फीट)
 – निर्देशांक 30°59′N 78°55′E
मुहाना सुंदरवन
 – स्थान बंगाल की खाड़ी, बांग्लादेश
 – ऊँचाई मी. (0 फीट)
 – निर्देशांक 22°05′N 90°50′E
लंबाई 2,510 कि.मी. (1,560 मील)
बेसिन 9,07,000 कि.मी.² (3,50,195 वर्ग मील)
प्रवाह for मुख
 – औसत 12,015 मी.³/से.(4,24,306 घन फीट/से.)
गंगा नदी के मार्ग एवं उसकी विभिन्न उपनदियाँ
गंगा नदी के मार्ग एवं उसकी विभिन्न उपनदियाँ

भारत की सबसे महत्त्वपूर्ण नदी गंगा (बांग्ला: গঙ্গা; संस्कृत: गङ्गा), जो भारत और बांग्लादेश में मिलाकर २,५१० किमी की दूरी तय करती हुईउत्तरांचल में हिमालय से लेकर बंगाल की खाड़ी के सुंदरवन तक विशाल भू भाग को सींचती है, देश की प्राकृतिक संपदा ही नहीं, जन जन की भावनात्मक आस्था का आधार भी है। २,०७१ कि.मी तक भारत तथा उसके बाद बांग्लादेश में अपनी लंबी यात्रा करते हुए यह सहायक नदियों के साथ दस लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल के अति विशाल उपजाऊ मैदान की रचना करती है। सामाजिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक और आर्थिक दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण गंगा का यह मैदान अपनी घनी जनसंख्या के कारण भी जाना जाता है। १०० फीट (३१ मी) की अधिकतम गहराई वाली यह नदी भारत में पवित्र मानी जाती है तथा इसकी उपासना माँ और देवी के रूप में की जाती है। भारतीय पुराण और साहित्य में अपने सौंदर्य और महत्व के कारण बार-बार आदर के साथ वंदित गंगा नदी के प्रति विदेशी साहित्य में भी प्रशंसा और भावुकतापूर्ण वर्णन किए गए हैं।

इस नदी में मछलियों तथा सर्पों की अनेक प्रजातियाँ तो पाई ही जाती हैं मीठे पानी वाले दुर्लभ डालफिन भी पाए जाते हैं। यह कृषि, पर्यटन, साहसिक खेलों तथा उद्योगों के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान देती है तथा अपने तट पर बसे शहरों की जलापूर्ति भी करती है। इसके तट पर विकसित धार्मिक स्थल और तीर्थ भारतीय सामाजिक व्यवस्था के विशेष अंग हैं। इसके ऊपर बने पुल, बाँध और नदी परियोजनाएँ भारत की बिजली, पानी और कृषि से संबंधित ज़रूरतों को पूरा करती हैं। वैज्ञानिक मानते हैं कि इस नदी के जल में बैक्टीरियोफेज नामक विषाणु होते हैं, जो जीवाणुओं व अन्य हानिकारक सूक्ष्मजीवों को जीवित नहीं रहने देते हैं। गंगा की इस असीमित शुद्धीकरण क्षमता और सामाजिक श्रद्धा के बावजूद इसका प्रदूषण रोका नहीं जा सका है। फिर भी इसके प्रयत्न जारी हैं और सफ़ाई की अनेक परियोजनाओं के क्रम में नवंबर,२००८ में भारत सरकार द्वारा इसे भारत की राष्ट्रीय नदी[1][2] तथा इलाहाबाद और हल्दिया के बीच (१६०० किलोमीटर) गंगा नदी जलमार्ग- को राष्ट्रीय जलमार्ग घोषित किया है।[3]

उद्गम[संपादित करें]

गंगा नदी की प्रधान शाखा भागीरथी है जो कुमायूँ में हिमालय के गोमुख नामक स्थान पर गंगोत्री हिमनद से निकलती है।[4] गंगा के इस उद्गम स्थल की ऊँचाई ३१४० मीटर है। यहाँ गंगा जी को समर्पित एक मंदिर भी है। गंगोत्री तीर्थ, शहर से १९ कि.मी. उत्तर की ओर ३८९२ मी.(१२,७७० फी.) की ऊँचाई पर इस हिमनद का मुख है। यह हिमनद २५ कि.मी. लंबा व ४ कि.मी. चौड़ा और लगभग ४० मी. ऊँचा है। इसी ग्लेशियर से भागीरथी एक छोटे से गुफानुमा मुख पर अवतरित होती है। इसका जल स्रोत ५००० मी. ऊँचाई पर स्थित एक बेसिन है। इस बेसिन का मूल पश्चिमी ढलान की संतोपंथ की चोटियों में है। गौमुख के रास्ते में ३६०० मी. ऊँचे चिरबासा ग्राम से विशाल गोमुख हिमनद के दर्शन होते हैं।[5] इस हिमनद में नंदा देवी, कामत पर्वत एवंत्रिशूल पर्वत का हिम पिघल कर आता है। यद्यपि गंगा के आकार लेने में अनेक छोटी धाराओं का योगदान है लेकिन ६ बड़ी और उनकी सहायक ५ छोटी धाराओं का भौगोलिक और सांस्कृतिक महत्त्व अधिक है। अलकनंदा की सहायक नदी धौली, विष्णु गंगा तथा मंदाकिनी है। धौली गंगाका अलकनंदा से विष्णु प्रयाग में संगम होता है। यह १३७२ मी. की ऊँचाई पर स्थित है। फिर २८०५ मी. ऊँचे नंद प्रयाग में अलकनन्दा कानंदाकिनी नदी से संगम होता है। इसके बाद कर्ण प्रयाग में अलकनन्दा का कर्ण गंगा या पिंडर नदी से संगम होता है। फिर ऋषिकेश से १३९ कि.मी. दूर स्थित रुद्र प्रयाग में अलकनंदा मंदाकिनी से मिलती है। इसके बाद भागीरथी व अलकनन्दा १५०० फीट पर स्थित देव प्रयाग में संगम करती हैं यहाँ से यह सम्मिलित जल-धारा गंगा नदी के नाम से आगे प्रवाहित होती है। इन पांच प्रयागों को सम्मिलित रूप से पंच प्रयाग कहा जाता है।[4] इस प्रकार २०० कि.मी. का संकरा पहाड़ी रास्ता तय करके गंगा नदी ऋषिकेश होते हुए प्रथम बार मैदानों का स्पर्श हरिद्वार में करती है।

गंगा का मैदान[संपादित करें]

हरिद्वार से लगभग ८०० कि.मी. मैदानी यात्रा करते हुए गढ़मुक्तेश्वर, सोरों, फर्रुखाबाद, कन्नौज, बिठूर, कानपुर होते हुए गंगा इलाहाबाद(प्रयाग) पहुँचती है। यहाँ इसका संगम यमुना नदी से होता है। यह संगम स्थल हिन्दुओं का एक महत्त्वपूर्ण तीर्थ है। इसे तीर्थराज प्रयाग कहा जाता है। इसके बाद हिन्दू धर्म की प्रमुख मोक्षदायिनी नगरी काशी (वाराणसी) में गंगा एक वक्र लेती है, जिससे यह यहाँ उत्तरवाहिनी कहलाती है। यहाँ से मीरजापुर, पटना, भागलपुर होते हुए पाकुर पहुँचती है। इस बीच इसमें बहुत-सी सहायक नदियाँ, जैसे सोन, गंडक, घाघरा, कोसी आदि मिल जाती हैं। भागलपुर में राजमहल की पहाड़ियों से यह दक्षिणवर्ती होती है। पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले के गिरिया स्थान के पास गंगा नदी दो शाखाओं में विभाजित हो जाती है-भागीरथी और पद्मा। भागीरथी नदी गिरिया से दक्षिण की ओर बहने लगती है जबकि पद्मा नदी दक्षिण-पूर्व की ओर बहती फरक्का बैराज (१९७४ निर्मित) से छनते हुई बंगला देश में प्रवेश करती है। यहाँ से गंगा का डेल्टाई भाग शुरू हो जाता है। मुर्शिदाबाद शहर से हुगली शहर तक गंगा का नाम भागीरथी नदी तथा हुगली शहर से मुहाने तक गंगा का नाम हुगली नदी है। गंगा का यह मैदान मूलत: एक भू-अभिनति गर्त है जिसका निर्माण मुख्य रूप से हिमालय पर्वतमाला निर्माण प्रक्रिया के तीसरे चरण में लगभग ६-४ करोड़ वर्ष पहले हुआ था। तब से इसे हिमालय और प्रायद्वीप से निकलने वाली नदियाँ अपने साथ लाए हुए अवसादों से पाट रही हैं। इन मैदानों में जलोढ़ की औसत गहराई १००० से २००० मीटर है। इस मैदान में नदी की प्रौढ़ावस्था में बनने वाली अपरदनी और निक्षेपण स्थलाकॄतियाँ, जैसे- बालू-रोधका, विसर्प, गोखुर झीलें और गुंफित नदियाँ पाई जाती हैं।[6]

गंगा की इस घाटी में एक ऐसी सभ्यता का उद्भव और विकास हुआ जिसका प्राचीन इतिहास अत्यन्त गौरवमयी और वैभवशाली है। जहाँ ज्ञान, धर्म, अध्यात्म व सभ्यता-संस्कृति की ऐसी किरण प्रस्फुटित हुई जिससे न केवल भारत बल्कि समस्त संसार आलोकित हुआ। पाषाण या प्रस्तर युग का जन्म और विकास यहाँ होने के अनेक साक्ष्य मिले हैं। इसी घाटी में रामायण और महाभारतकालीन युग का उद्भव और विलय हुआ। शतपथ ब्राह्मण, पंचविश ब्राह्मण, गौपथ ब्राह्मण, ऐतरेय आरण्यक, कौशितकी आरण्यक, सांख्यायन आरण्यक, वाजसनेयी संहिता और महाभारत इत्यादि में वर्णित घटनाओं से उत्तर वैदिककालीन गंगा घाटी की जानकारी मिलती है। प्राचीन मगध महाजनपद का उद्भव गंगा घाटी में ही हुआ जहाँ से गणराज्यों की परंपरा विश्व में पहली बार प्रारंभ हुई। यहीं भारत का वह स्वर्ण युग विकसित हुआ जब मौर्य और गुप्त वंशीय राजाओं ने यहाँ शासन किया।[7]

सुंदरवन डेल्टा[संपादित करें]

सुंदरवन-विश्व का सबसे बड़ा डेल्टा-गंगा का मुहाना-बंगाल की खाड़ी में

हुगली नदी कोलकाता, हावड़ा होते हुए सुंदरवन के भारतीय भाग में सागर से संगम करती है। पद्मा में ब्रह्मपुत्र से निकली शाखा नदी जमुना नदीएवं मेघना नदी मिलती हैं। अंततः ये ३५० कि.मी. चौड़े सुंदरवन डेल्टा में जाकर बंगाल की खाड़ी में सागर-संगम करती है। यह डेल्टा गंगा एवं उसकी सहायक नदियों द्वारा लाई गई नवीन जलोढ़ से १,००० वर्षों में निर्मित समतल एवं निम्न मैदान है। यहां गंगा और बंगाल की खाड़ी के संगम पर एक प्रसिद्ध हिन्दू तीर्थ है जिसे गंगा-सागर-संगम कहते हैं।[8] विश्व का सबसे बड़ा डेल्टा (सुंदरवन) बहुत सी प्रसिद्ध वनस्पतियों और प्रसिद्ध बंगाल टाईगर का निवास स्थान है।[8] यह डेल्टा धीरे धीरे सागर की ओर बढ़ रहा है। कुछ समय पहले कोलकाता सागर तट पर ही स्थित था और सागर का विस्तार राजमहल तथा सिलहट तक था, परन्तु अब यह तट से १५-२० मील (२४-३२ किलोमीटर) दूर स्थित लगभग १,८०,००० वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैला हुआ है। जब डेल्टा का सागर की ओर निरन्तर विस्तार होता है तो उसे प्रगतिशील डेल्टा कहते हैं।[9] सुंदरवन डेल्टा में भूमि का ढाल अत्यन्त कम होने के कारण यहाँ गंगा अत्यन्त धीमी गति से बहती है और अपने साथ लाई गयी मिट्टी को मुहाने पर जमा कर देती है जिससे डेल्टा का आकार बढ़ता जाता है और नदी की कई धाराएँ एवं उपधाराएँ बन जाती हैं। इस प्रकार बनी हुई गंगा की प्रमुख शाखा नदियाँ जालंगी नदी, इच्छामती नदी, भैरव नदी, विद्याधरी नदी और कालिन्दी नदी हैं। नदियों के वक्र गति से बहने के कारण दक्षिणी भाग में कई धनुषाकार झीलें बन गयी हैं। ढाल उत्तर से दक्षिण है, अतः अधिकांश नदियाँ उत्तर से दक्षिण की ओर बहती हैं। ज्वार के समय इन नदियों में ज्वार का पानी भर जाने के कारण इन्हें ज्वारीय नदियाँ भी कहते हैं। डेल्टा के सुदूर दक्षिणी भाग में समुद्र का खारा पानी पहुँचने का कारण यह भाग नीचा, नमकीन एवं दलदली है तथा यहाँ आसानी से पनपने वाले मैंग्रोव जाति के वनों से भरा पड़ा है। यह डेल्टा चावल की कृषि के लिए अधिक विख्यात है। यहाँ विश्व में सबसे अधिक कच्चे जूटका उत्पादन होता है। कटका अभयारण्य सुंदरवन के उन इलाकों में से है जहाँ का रास्ता छोटी-छोटी नहरों से होकर गुज़रता है। यहाँ बड़ी तादाद में सुंदरी पेड़ मिलते हैं जिनके नाम पर ही इन वनों का नाम सुंदरवन पड़ा है। इसके अलावा यहाँ पर देवा, केवड़ा, तर्मजा, आमलोपी और गोरान वृक्षों की ऐसी प्रजातियाँ हैं, जो सुंदरवन में पाई जाती हैं। यहाँ के वनों की एक खास बात यह है कि यहाँ वही पेड़ पनपते या बच सकते हैं, जो मीठे और खारे पानी के मिश्रण में रह सकते हों।[10]

सहायक नदियाँ[संपादित करें]

देवप्रयाग में भागीरथी (बाएँ) एवं अलकनंदा (दाएँ) मिलकर गंगा का निर्माण करती हुईं

गंगा में उत्तर की ओर से आकर मिलने वाली प्रमुख सहायक नदियाँ यमुना, रामगंगा, करनाली (घाघरा), ताप्ती, गंडक, कोसी और काक्षी हैं तथा दक्षिण के पठार से आकर इसमें मिलने वाली प्रमुख नदियाँ चंबल, सोन, बेतवा, केन, दक्षिणी टोस आदि हैं। यमुना गंगा की सबसे प्रमुख सहायक नदी है जो हिमालय की बन्दरपूँछ चोटी के आधार पर यमुनोत्री हिमखण्ड से निकली है।[11][12] हिमालय के ऊपरी भाग में इसमें टोंस[13] तथा बाद में लघु हिमालय में आने पर इसमें गिरि और आसन नदियाँ मिलती हैं। चम्बल, बेतवा, शारदा और केन यमुना की सहायक नदियाँ हैं। चम्बल इटावा के पास तथा बेतवा हमीरपुर के पास यमुना में मिलती हैं। यमुना इलाहाबाद के निकट बायीं ओर से गंगा नदी में जा मिलती है। रामगंगा मुख्य हिमालय के दक्षिणी भाग नैनीताल के निकट से निकलकर बिजनौर जिले से बहती हुई कन्नौज के पास गंगा में मिलती है। करनाली नदी मप्सातुंग नामक हिमनद से निकलकर अयोध्या, फैजाबाद होती हुई बलिया जिले के सीमा के पास गंगा में मिल जाती है। इस नदी को पर्वतीय भाग में कौरियाला तथा मैदानी भाग में घाघरा कहा जाता है। गंडक हिमालय से निकलकर नेपाल में शालीग्राम नाम से बहती हुई मैदानी भाग में नारायणी नदी का नाम पाती है। यह काली गंडक और त्रिशूल नदियों का जल लेकर प्रवाहित होती हुई सोनपुर के पास गंगा में मिलती है। कोसीकी मुख्यधारा अरुण है जो गोसाई धाम के उत्तर से निकलती है। ब्रह्मपुत्र के बेसिन के दक्षिण से सर्पाकार रूप में अरुण नदी बहती है जहाँ यारू नामक नदी इससे मिलती है। इसके बाद एवरेस्ट के कंचनजंघा शिखरों के बीच से बहती हुई यह दक्षिण की ओर ९० किलोमीटर बहती है जहाँ पश्चिम से सूनकोसी तथा पूरब से तामूर कोसी नामक नदियाँ इसमें मिलती हैं। इसके बाद कोसी नदी के नाम से यह शिवालिक को पार करके मैदान में उतरती है तथा बिहार राज्य से बहती हुई गंगा में मिल जाती है। अमरकंटक पहाड़ी से निकलकर सोन नदी पटना के पास गंगा में मिलती है। मध्य-प्रदेश के मऊ के निकट जनायाब पर्वत से निकलकर चम्बल नदी इटावा से ३८ किलोमीटर की दूरी पर यमुना नदी में मिलती है। बेतवा नदी मध्य प्रदेश में भोपाल से निकलकर उत्तरहमीरपुर के निकट यमुना में मिलती है। भागीरथी नदी के दायें किनारे से मिलने वाली अनेक नदियों में बाँसलई, द्वारका, मयूराक्षी, रूपनारायण, कंसावती और रसूलपुर प्रमुख हैं। जलांगी और माथा भाँगा या चूनीं बायें किनारे से मिलती हैं जो अतीत काल में गंगा या पद्मा की शाखा नदियाँ थीं। किन्तु ये वर्तमान समय में गंगा से पृथक होकर वर्षाकालीन नदियाँ बन गई हैं।

जीव-जन्तु[संपादित करें]

गंगा नदी में पाए जाने वाले घड़ियाल

गंगा नदी में पाइ जाने वाली डालफिन मछली जिसे आम बोलचाल की भाषा में सोंस कहते हैं

ऐतिहासिक साक्ष्यों से यह ज्ञात होता है कि १६वीं तथा १७वीं शताब्दी तक गंगा-यमुना प्रदेश घने वनों से ढका हुआ था। इन वनों में जंगली हाथी,भैंस, गेंडा, शेर, बाघ तथा गवल का शिकार होता था। गंगा का तटवर्ती क्षेत्र अपने शांत व अनुकूल पर्यावरण के कारण रंग-बिरंगे पक्षियों का संसार अपने आंचल में संजोए हुए है। इसमें मछलियों की १४० प्रजातियाँ, ३५ सरीसृप तथा इसके तट पर ४२ स्तनधारी प्रजातियाँ पाई जाती हैं। यहाँ की उत्कृष्ट पारिस्थितिकी संरचना में कई प्रजाति के वन्य जीवों जैसे नीलगाय, सांभर, खरगोश, नेवला, चिंकारा के साथ सरीसृप-वर्ग के जीव-जन्तुओं को भी आश्रय मिला हुआ है। इस इलाके में ऐसे कई जीव-जन्तुओं की प्रजातियाँ हैं जो दुर्लभ होने के कारण संरक्षित घोषित की जा चुकी हैं। गंगा के पर्वतीय किनारों पर लंगूर, लाल बंदर, भूरे भालू, लोमड़ी, चीते, बर्फीले चीते, हिरण, भौंकने वाले हिरण, सांभर, कस्तूरी मृग, सेरो, बरड़ मृग, साही, तहर आदि काफ़ी संख्या में मिलते हैं। विभिन्न रंगों की तितलियां तथा कीट भी यहाँ पाए जाते हैं।[14] बढ़ती हुई जनसंख्या के दबाव में धीरे-धीरे वनों का लोप होने लगा है और गंगा की घाटी में सर्वत्र कृषि होती है फिर भी गंगा के मैदानी भाग में हिरण, जंगली सूअर, जंगली बिल्लियाँ, भेड़िया, गीदड़, लोमड़ी की अनेक प्रजातियाँ काफी संख्या में पाए जाते हैं। डालफिन की दो प्रजातियाँ गंगा में पाई जाती हैं। जिन्हें गंगा डालफिन और इरावदी डालफिन के नाम से जाना जाता है। इसके अलावा गंगा में पाई जाने वाले शार्क की वजह से भी गंगा की प्रसिद्धि है जिसमें बहते हुये पानी में पाई जानेवाली शार्क के कारण विश्व के वैज्ञानिकों की काफी रुचि है। इस नदी और बंगाल की खाड़ी के मिलन स्थल पर बनने वाले मुहाने को सुंदरवन के नाम से जाना जाता है जो विश्व की बहुत-सी प्रसिद्ध वनस्पतियों और प्रसिद्ध बंगाल टाईगर का गृहक्षेत्र है।

आर्थिक महत्त्व[संपादित करें]

गंगा में रैफ्टिंग भी होती है।

गंगा अपनी उपत्यकाओं में भारत और बांग्लादेश के कृषि आधारित अर्थ में भारी सहयोग तो करती ही है, यह अपनी सहायक नदियों सहित बहुत बड़े क्षेत्र के लिए सिंचाई के बारहमासी स्रोत भी हैं। इन क्षेत्रों में उगाई जाने वाली प्रधान उपज में मुख्यतः धान, गन्ना, दाल, तिलहन, आलू एवंगेहूँ हैं। जो भारत की कृषि आज का महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं। गंगा के तटीय क्षेत्रों में दलदल एवं झीलों के कारण यहाँ लेग्यूम, मिर्च, सरसों, तिल, गन्ना और जूट की अच्छी फसल होती है। नदी में मत्स्य उद्योग भी बहुत जोरों पर चलता है। गंगा नदी प्रणाली भारत की सबसे बड़ी नदी प्रणाली है। इसमें लगभग ३७५ मत्स्य प्रजातियाँ उपलब्ध हैं। वैज्ञानिकों द्वारा उत्तर प्रदेशबिहार में १११ मत्स्य प्रजातियों की उपलब्धता बतायी गयी है।[15] फरक्का बांध बन जाने से गंगा नदी में हिल्सा मछली के बीजोत्पादन में सहायता मिली है।[16] गंगा का महत्त्व पर्यटन पर आधारित आय के कारण भी है। इसके तट पर ऐतिहासिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण तथा प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर कई पर्यटन स्थल है जो राष्ट्रीय आय का महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं। गंगा नदी पर रैफ्टिंग के शिविरों का आयोजन किया जाता है। जो साहसिक खेलों और पर्यावरण द्वारा भारत के आर्थिक सहयोग में सहयोग करते हैं। गंगा तट के तीन बड़े शहर हरिद्वार, इलाहाबाद एवं वाराणसी जो तीर्थ स्थलों में विशेष स्थान रखते हैं। इस कारण यहाँ श्रद्धालुओं की बड़ी संख्या निरंतर बनी रहती है और धार्मिक पर्यटन में महत्त्वपूर्ण योगदान करती है। गर्मी के मौसम में जब पहाड़ों से बर्फ पिघलती है, तब नदी में पानी की मात्रा व बहाव अच्छा होता है, इस समय उत्तराखंड में ऋषिकेश – बद्रीनाथ मार्ग पर कौडियाला से ऋषिकेश के मध्य रैफ्टिंग, क्याकिंग व कैनोइंग के शिविरों का आयोजन किया जाता है, जो साहसिक खोलों के शौकीनों और पर्यटकों को विशेष रूप से आकर्षित कर के भारत के आर्थिक सहयोग में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।[17]

बाँध एवं नदी परियोजनाएँ[संपादित करें]

गंगा नदी पर निर्मित अनेक बाँध भारतीय जन-जीवन तथा अर्थ व्यवस्था का महत्त्वपूर्ण अंग हैं। इनमें प्रमुख हैं फ़रक्का बाँध, टिहरी बाँध, तथा भीमगोडा बाँध। फ़रक्का बांध (बैराज) भारत के पश्चिम बंगाल प्रान्त में स्थित गंगा नदी पर बनाया गया है। इस बाँध का निर्माण कोलकाताबंदरगाह को गाद (सिल्ट) से मुक्त कराने के लिये किया गया था जो कि १९५० से १९६० तक इस बंदरगाह की प्रमुख समस्या थी। कोलकाताहुगली नदी पर स्थित एक प्रमुख बंदरगाह है। ग्रीष्म ऋतु में हुगली नदी के बहाव को निरंतर बनाये रखने के लिये गंगा नदी के जल के एक बड़े हिस्से को फ़रक्का बाँध के द्वारा हुगली नदी में मोड़ दिया जाता है। गंगा पर निर्मित दूसरा प्रमुख बाँध टिहरी बाँध टिहरी विकास परियोजना का एक प्राथमिक बाँध है जो उत्तराखंड प्रान्त के टिहरी जिले में स्थित है। यह बाँध गंगा नदी की प्रमुख सहयोगी नदी भागीरथी पर बनाया गया है। टिहरी बाँध की ऊँचाई २६१ मीटर है जो इसे विश्व का पाँचवाँ सबसे ऊँचा बाँध बनाती है। इस बाँध से २४०० मेगावाट विद्युत उत्पादन, २७०,००० हेक्टर क्षेत्र की सिंचाई और प्रतिदिन १०२.२० करोड़ लीटर पेयजल दिल्ली, उत्तर-प्रदेश एवं उत्तरांचल को उपलब्ध कराना प्रस्तावित है। तीसरा प्रमुख बाँध भीमगोडा बाँध हरिद्वार में स्थित है जिसको सन १८४० में अंग्रेजो ने गंगा नदी के पानी को विभाजित कर ऊपरी गंगा नहर में मोड़ने के लिये बनवाया था। यह नहर हरिद्वार के भीमगोडा नामक स्‍थान से गंगा नदी के दाहिने तट से निकलती है। प्रारम्‍भ में इस नहर में जलापूर्ति गंगा नदी में एक अस्‍थायी बाँध बनाकर की जाती थी। वर्षाकाल प्रारम्‍भ होते ही अस्‍थायी बाँध टूट जाया करता था तथा मानसून अवधि में नहर में पानी चलाया जाता था। इस प्रकार इस नहर से केवल रबी की फसलों की ही सिंचाई हो पाती थी। अस्‍थायी बाँध निर्माण स्‍थल के डाउनस्‍ट्रीम में वर्ष १९७८-१९८४ की अवधि में भीमगोडा बैराज का निर्माण करवाया गया। इसके बन जाने के बाद ऊपरी गंगा नहर प्रणाली से खरीफ की फसल में भी पानी दिया जाने लगा।[18]

प्रदूषण एवं पर्यावरण[संपादित करें]

गोमुख पर शुद्ध गंगा

गंगा नदी विश्व भर में अपनी शुद्धीकरण क्षमता के कारण जानी जाती है। लंबे समय से प्रचलित इसकी शुद्धीकरण की मान्यता का वैज्ञानिक आधार भी है। वैज्ञानिक मानते हैं कि इस नदी के जल में बैक्टीरियोफेज नामक विषाणु होते हैं, जो जीवाणुओं व अन्य हानिकारक सूक्ष्मजीवों को जीवित नहीं रहने देते हैं। नदी के जल में प्राणवायु (ऑक्सीजन) की मात्रा को बनाए रखने की असाधारण क्षमता है। किंतु इसका कारण अभी तक अज्ञात है। एक राष्ट्रीय सार्वजनिक रेडियो कार्यक्रम के अनुसार इस कारण हैजा और पेचिश जैसी बीमारियाँ होने का खतरा बहुत ही कम हो जाता है, जिससे महामारियाँ होने की संभावना बड़े स्तर पर टल जाती है।[19] लेकिन गंगा के तट पर घने बसे औद्योगिक नगरों के नालों की गंदगी सीधे गंगा नदी में मिलने से गंगा का प्रदूषण पिछले कई सालों से भारत सरकार और जनता की चिंता का विषय बना हुआ है। औद्योगिक कचरे के साथ-साथ प्लास्टिक कचरे की बहुतायत ने गंगा जल को भी बेहद प्रदूषित किया है। वैज्ञानिक जांच के अनुसार गंगा का बायोलाजिकल ऑक्सीजन स्तर ३ डिग्री (सामान्य) से बढ़कर ६ डिग्री हो चुका है। गंगा में २ करोड़ ९० लाख लीटर प्रदूषित कचरा प्रतिदिन गिर रहा है। विश्व बैंक रिपोर्ट के अनुसार उत्तर-प्रदेश की १२ प्रतिशत बीमारियों की वजह प्रदूषित गंगा जल है। यह घोर चिन्तनीय है कि गंगा-जल न स्नान के योग्य रहा, न पीने के योग्य रहा और न ही सिंचाई के योग्य। गंगा के पराभव का अर्थ होगा, हमारी समूची सभ्यता का अन्त।[20] गंगा में बढ़ते प्रदूषण पर नियंत्रण पाने के लिए घड़ियालों की मदद ली जा रही है।[21] शहर की गंदगी को साफ करने के लिए संयंत्रों को लगाया जा रहा है और उद्योगों के कचरों को इसमें गिरने से रोकने के लिए कानून बने हैं। इसी क्रम में गंगा को राष्ट्रीय धरोहर भी घोषित कर दिया गया है और गंगा एक्शन प्लान व राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना लागू की गई हैं। हांलांकि इसकी सफलता पर प्रश्नचिह्न भी लगाए जाते रहे हैं।[22] जनता भी इस विषय में जागृत हुई है। इसके साथ ही धार्मिक भावनाएँ आहत न हों इसके भी प्रयत्न किए जा रहे हैं।[23] इतना सबकुछ होने के बावजूद गंगा के अस्तित्व पर संकट के बादल छाए हुए हैं। २००७ की एक संयुक्त राष्ट्र रिपोर्ट के अनुसार हिमालय पर स्थित गंगा की जलापूर्ति करने वाले हिमनद की २०३० तक समाप्त होने की संभावना है। इसके बाद नदी का बहाव मानसून पर आश्रित होकर मौसमी ही रह जाएगा।[24]

धार्मिक महत्त्व[संपादित करें]

वाराणसी घाट पर गंगा की आरती

भारत की अनेक धार्मिक अवधारणाओं में गंगा नदी को देवी के रूप में निरुपित किया गया है। बहुत से पवित्र तीर्थस्थल गंगा नदी के किनारे पर बसे हुये हैं जिनमें वाराणसी और हरिद्वार सबसे प्रमुख हैं। गंगा नदी को भारत की पवित्र नदियों में सबसे पवित्र माना जाता है एवं यह मान्यता है कि गंगा में स्नान करने से मनुष्य के सारे पापों का नाश हो जाता है। मरने के बाद लोग गंगा में अपनी राख विसर्जित करना मोक्ष प्राप्ति के लिये आवश्यक समझते हैं, यहाँ तक कि कुछ लोग गंगा के किनारे ही प्राण विसर्जन या अंतिम संस्कार की इच्छा भी रखते हैं। इसके घाटों पर लोग पूजा अर्चना करते हैं और ध्यान लगाते हैं। गंगाजल को पवित्र समझा जाता है तथा समस्त संस्कारों में उसका होना आवश्यक है। पंचामृत में भी गंगाजल को एक अमृत माना गया है। अनेक पर्वों और उत्सवों का गंगा से सीधा संबंध है। उदाहरण के लिए मकर संक्रांति, कुंभ और गंगा दशहरा के समय गंगा में नहाना या केवल दर्शन ही कर लेना बहुत महत्त्वपूर्ण समझा जाता है। इसके तटों पर अनेक प्रसिद्ध मेलों का आयोजन किया जाता है और अनेक प्रसिद्ध मंदिर गंगा के तट पर ही बने हुए हैं। महाभारत के अनुसार मात्र प्रयाग में माघ मास में गंगा-यमुना के संगम पर तीन करोड़ दस हजार तीर्थों का संगम होता है। ये तीर्थ स्थल सम्पूर्ण भारत में सांस्कृतिक एकता स्थापित करते हैं।[25] गंगा को लक्ष्य करके अनेक भक्ति ग्रंथ लिखे गए हैं। जिनमें श्रीगंगासहस्रनामस्तोत्रम्[26] और आरती[27] सबसे लोकप्रिय हैं। अनेक लोग अपने दैनिक जीवन में श्रद्धा के साथ इनका प्रयोग करते हैं। गंगोत्री तथा अन्य स्थानों पर गंगा के मंदिर और मूर्तियाँ भी स्थापित हैं जिनके दर्शन कर श्रद्धालु स्वयं को कृतार्थ समझते हैं। उत्तराखंड के पंच प्रयाग तथाप्रयागराज जो इलाहाबाद में स्थित है गंगा के वे प्रसिद्ध संगम स्थल हैं जहाँ वह अन्य नदियों से मिलती हैं। ये सभी संगम धार्मिक दृष्टि से पूज्य माने गए हैं।

पौराणिक प्रसंग[संपादित करें]

गंगा और शांतनु- राजा रवि वर्मा की कलाकृति

गंगा नदी के साथ अनेक पौराणिक कथाएँ जुड़ी हुई हैं। मिथकों के अनुसार ब्रह्मा ने विष्णु के पैर के पसीने की बूँदों से गंगा का निर्माण किया। त्रिमूर्तिके दो सदस्यों के स्पर्श के कारण यह पवित्र समझा गया। एक अन्य कथा के अनुसार राजा सगर ने जादुई रुप से साठ हजार पुत्रों की प्राप्ति की।[28]एक दिन राजा सगर ने देवलोक पर विजय प्राप्त करने के लिये एक यज्ञ किया। यज्ञ के लिये घोड़ा आवश्यक था जो ईर्ष्यालु इंद्र ने चुरा लिया था। सगर ने अपने सारे पुत्रों को घोड़े की खोज में भेज दिया अंत में उन्हें घोड़ा पाताल लोक में मिला जो एक ऋषि के समीप बँधा था। सगर के पुत्रों ने यह सोच कर कि ऋषि ही घोड़े के गायब होने की वजह हैं उन्होंने ऋषि का अपमान किया। तपस्या में लीन ऋषि ने हजारों वर्ष बाद अपनी आँखें खोली और उनके क्रोध से सगर के सभी साठ हजार पुत्र जल कर वहीं भस्म हो गये।[29] सगर के पुत्रों की आत्माएँ भूत बनकर विचरने लगीं क्योंकि उनका अंतिम संस्कार नहीं किया गया था। सगर के पुत्र अंशुमान ने आत्माओं की मुक्ति का असफल प्रयास किया और बाद में अंशुमान के पुत्र दिलीप ने भी।भगीरथ राजा दिलीप की दूसरी पत्नी के पुत्र थे। उन्होंने अपने पूर्वजों का अंतिम संस्कार किया। उन्होंने गंगा को पृथ्वी पर लाने का प्रण किया जिससे उनके अंतिम संस्कार कर, राख को गंगाजल में प्रवाहित किया जा सके और भटकती आत्माएं स्वर्ग में जा सकें। भगीरथ ने ब्रह्मा की घोर तपस्या की ताकि गंगा को पृथ्वी पर लाया जा सके। ब्रह्मा प्रसन्न हुये और गंगा को पृथ्वी पर भेजने के लिये तैयार हुये और गंगा को पृथ्वी पर और उसके बादपाताल में जाने का आदेश दिया ताकि सगर के पुत्रों की आत्माओं की मुक्ति संभव हो सके। तब गंगा ने कहा कि मैं इतनी ऊँचाई से जब पृथ्वी पर गिरूँगी, तो पृथ्वी इतना वेग कैसे सह पाएगी? तब भगीरथ ने भगवान शिव से निवेदन किया और उन्होंने अपनी खुली जटाओं में गंगा के वेग को रोक कर, एक लट खोल दी, जिससे गंगा की अविरल धारा पृथ्वी पर प्रवाहित हुई। वह धारा भगीरथ के पीछे-पीछे गंगा सागर संगम तक गई, जहाँ सगर-पुत्रों का उद्धार हुआ। शिव के स्पर्श से गंगा और भी पावन हो गयी और पृथ्वी वासियों के लिये बहुत ही श्रद्धा का केन्द्र बन गयीं। पुराणों के अनुसार स्वर्ग में गंगा को मन्दाकिनी और पाताल में भागीरथी कहते हैं। इसी प्रकार एक पौराणिक कथा राजा शांतनु और गंगा के विवाह तथा उनके सात पुत्रों के जन्म की है।

साहित्यिक उल्लेख[संपादित करें]

गंगा अवतरण एक लोकचित्र

भारत की राष्ट्र-नदी गंगा जल ही नहीं, अपितु भारत और हिंदी साहित्य की मानवीय चेतना को भी प्रवाहित करती है।[30] ऋग्वेद, महाभारत, रामायण एवं अनेक पुराणों में गंगा को पुण्य सलिला, पाप-नाशिनी, मोक्ष प्रदायिनी, सरित्श्रेष्ठा एवं महानदी कहा गया है। संस्कृत कवि जगन्नाथ राय ने गंगा की स्तुति में ‘श्रीगंगालहरी’ नामक काव्य की रचना की है। हिन्दी के आदि महाकाव्य पृथ्वीराज रासो[क] तथा वीसलदेव रास[ख] (नरपति नाल्ह) में गंगा का उल्लेख है। आदिकाल का सर्वाधिक लोक विश्रुत ग्रंथ जगनिक रचित आल्हखण्ड[ग] में गंगा, यमुना और सरस्वती का उल्लेख है। कवि ने प्रयागराज की इस त्रिवेणी को पापनाशक बतलाया है। शृंगारी कवि विद्यापति[घ], कबीर वाणी और जायसी के पद्मावत में भी गंगा का उल्लेख है, किन्तु सूरदास[ङ] और तुलसीदास ने भक्ति भावना से गंगा-माहात्म्य का वर्णन विस्तार से किया है। गोस्वामी तुलसीदास ने कवितावली केउत्तरकाण्ड में ‘श्री गंगा माहात्म्य’ का वर्णन तीन छन्दों में किया है- इन छन्दों में कवि ने गंगा दर्शन, गंगा स्नान, गंगा जल सेवन, गंगा तट पर बसने वालों के महत्त्व को वर्णित किया है।[च] रीतिकाल में सेनापति और पद्माकर का गंगा वर्णन श्लाघनीय है। पद्माकर ने गंगा की महिमा और कीर्ति का वर्णन करने के लिए गंगालहरी[31] नामक ग्रंथ की रचना की है। सेनापति[छ] कवित्त रत्नाकर में गंगा माहात्म्य का वर्णन करते हुए कहते हैं कि पाप की नाव को नष्ट करने के लिए गंगा की पुण्यधारा तलवार सी सुशोभित है। रसखान, रहीम[ज] आदि ने भी गंगा प्रभाव का सुन्दर वर्णन किया है। आधुनिक काल के कवियों में जगन्नाथदास रत्नाकर के ग्रंथ गंगावतरण में कपिल मुनि द्वारा शापित सगर के साठ हजार पुत्रों के उद्धार के लिएभगीरथ की ‘भगीरथ-तपस्या’ से गंगा के भूमि पर अवतरित होने की कथा है। सम्पूर्ण ग्रंथ तेरह सर्गों में विभक्त और रोला छन्द में निबद्ध है। अन्य कवियों में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, सुमित्रानन्दन पन्त और श्रीधर पाठक आदि ने भी यत्र-तत्र गंगा का वर्णन किया है।[25] छायावादी कवियों का प्रकृति वर्णन हिन्दी साहित्य में उल्लेखनीय है। सुमित्रानन्दन पन्त ने ‘नौका विहार’[32] में ग्रीष्म कालीन तापस बाला गंगा का जो चित्र उकेरा है, वह अति रमणीय है। उन्होंने गंगा[33] नामक कविता भी लिखी है। गंगा नदी के कई प्रतीकात्मक अर्थों का वर्णन जवाहर लाल नेहरू ने अपनी पुस्तक भारत एक खोज (डिस्कवरी ऑफ इंडिया) में किया है।[झ] गंगा की पौराणिक कहानियों को महेन्द्र मित्तल अपनी कृति माँ गंगा में संजोया है।[34]

चित्र दीर्घा[संपादित करें]

टीका टिप्पणी[संपादित करें]

क.    ^  इंदो किं अंदोलिया अमी ए चक्कीवं गंगा सिरे। ……………..एतने चरित्र ते गंग तीरे।
ख.    ^  कइ रे हिमालइ माहिं गिलउं। कइ तउ झंफघडं गंग-दुवारि।………………बहिन दिवाऊँ राइ की। थारा ब्याह कराबुं गंग नइ पारि।
ग.    ^ प्रागराज सो तीरथ ध्यावौं। जहँ पर गंग मातु लहराय।। / एक ओर से जमुना आई। दोनों मिलीं भुजा फैलाय।। / सरस्वती नीचे से निकली। तिरबेनी सो तीर्थ कहाय।।
घ.    ^ कज्जल रूप तुअ काली कहिअए, उज्जल रूप तुअ बानी। / रविमंडल परचण्डा कहिअए, गंगा कहिअए पानी।।
ङ.    ^ सुकदेव कह्यो सुनौ नरनाह। गंगा ज्यौं आई जगमाँह।। / कहौं सो कथा सुनौ चितलाइ। सुनै सो भवतरि हरि पुर जाइ।।
च.    ^ देवनदी कहँ जो जन जान किए मनसा कहुँ कोटि उधारे। / देखि चले झगरैं सुरनारि, सुरेस बनाइ विमान सवाँरे।
पूजा को साजु विरंचि रचैं तुलसी जे महातम जानि तिहारे। / ओक की लोक परी हरि लोक विलोकत गंग तरंग तिहारे।। (कवितावली-उत्तरकाण्ड १४५)
ब्रह्म जो व्यापक वेद कहैं, गमनाहिं गिरा गुन-ग्यान-गुनी को। / जो करता, भरता, हरता, सुर साहेबु, साहेबु दीन दुखी को।
सोइ भयो द्रव रूप सही, जो है नाथ विरंचि महेस मुनी को। / मानि प्रतीति सदा तुलसी, जगु काहे न सेवत देव धुनी को।। (कवितावली-उत्तरकाण्ड १४६)
बारि तिहारो निहारि मुरारि भएँ परसें पद पापु लहौंगो। / ईस ह्वै सीस धरौं पै डरौं, प्रभु की समताँ बड़े दोष दहौंगो।
बरु बारहिं बार सरीर धरौं, रघुबीर को ह्वै तव तीर रहौंगो। / भागीरथी बिनवौं कर जोरि, बहोरि न खोरि लगै सो कहौंगो।। (कवितावली-उत्तरकाण्ड १४७)[35]
छ.    ^ पावन अधिक सब तीरथ तैं जाकी धार, जहाँ मरि पापी होत सुरपुर पति है। / देखत ही जाकौ भलो घाट पहचानियत, एक रूप बानी जाके पानी की रहति है।
बड़ी रज राखै जाकौं महाधीर तरसत, सेनापति ठौर-ठौर नीकीयै बहति है। / पाप पतवारि के कतल करिबे को गंगा, पुण्य की असील तरवारि सी लसति है।।–सेनापति
ज.    ^ अच्युत चरण तरंगिणी, शिव सिर मालति माल। हरि न बनायो सुरसरी, कीजौ इंदव भाल।।–रहीम
झ.    ^ “The Ganga, especially, is the river of India, beloved of her people, round which are interwined her memories, her hopes and fears, her songs of triumph, her victories and her defeats. She has been a symbol of India’s age long culture and civilization, ever changing , ever flowing, and yet ever the same Ganga.” -जवाहरलाल नेहरू

संदर्भ[संपादित करें]

  1. ऊपर जायें “गंगा को भारत की राष्ट्रीय नदी” (एचटीएम). बिहार टुडे. अभिगमन तिथि: २००८.
  2. ऊपर जायें “गंगा -भारत की राष्ट्रीय नदी” (एचटीएम). वॉयस ऑफ अमेरिका. अभिगमन तिथि: २००८.
  3. ऊपर जायें समकालीन भारत. नई दिल्ली: राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद. अप्रैल २००३. प॰ २४७-२४८.
  4. इस तक ऊपर जायें: “उत्तरांचल-एक परिचय” (एचटीएम). टीडीआईएल. अभिगमन तिथि: 2008.
  5. ऊपर जायें “गंगोत्री” (एचटीएम). उत्तराखंड सरकार. अभिगमन तिथि: २००९.
  6. ऊपर जायें “भारत की भौतिक संरचना”. पर्यावरण के विभिन्न घटक. अभिगमन तिथि: २००९.
  7. ऊपर जायें “बिहार का इतिहास (प्राचीन बिहार)” (जेएसपी). मिथिलाविहार. अभिगमन तिथि: २००९.
  8. इस तक ऊपर जायें: “गंगा रिवर” (अंग्रेज़ी में) (एचटीएम). इण्डिया नेट ज़ोन. अभिगमन तिथि: २००९.
  9. ऊपर जायें सिहं, सविन्द्र (जुलाई २००२). भौतिक भूगोल. गोरखपुर: वसुन्धरा प्रकाशन. प॰ २४७-२४८.
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  12. ऊपर जायें “भारत की प्रमुख नदियाँ”. भारत भ्रमण. अभिगमन तिथि: २००९.
  13. ऊपर जायें “उत्तराखंड की प्रमुख नदियाँ”. इंडिया वाटर पोर्टल. अभिगमन तिथि: २००९.
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  15. ऊपर जायें “प्रशिक्षण एवं प्रसार संबंधी मैनुअल” (एचटीएम). मत्स्य विभाग, उत्तर प्रदेश. २००७.
  16. ऊपर जायें “हिल्सा ब्रीडिंग एण्ड हिल्साह हैचेरी” (अंग्रेज़ी में). सी.आई.एफ.आर.आई..
  17. ऊपर जायें “राफ्टिंग” (एचटीएमएल). उत्तराखंड पोर्टल. २००७. अभिगमन तिथि: २००९.
  18. ऊपर जायें “सिंचाई का इतिहास व प्रदेश की मुख्‍य नहर प्रणालियों का सिंहावलोकन”. उत्तर प्रदेश सिंचाई विभाग. अभिगमन तिथि: २००९.
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  20. ऊपर जायें “खतरे में गंगा का अस्तित्व” (एएसपीएक्स). पत्रिका. अभिगमन तिथि: २००९.
  21. ऊपर जायें “गंगा को प्रदूषण से बचाएंगे ७१ घड़ियाल”. नवभारत टाइम्स. अभिगमन तिथि: २००९.
  22. ऊपर जायें “अब गंगा प्रदूषण मामला राज्य सरकार जिम्मेवार”. लोकमंच. अभिगमन तिथि: २००९.
  23. ऊपर जायें “अब मूर्ति विसर्जन से नहीं होगी गंगा मैली”. जोश. अभिगमन तिथि: २००९.
  24. ऊपर जायें बोस्टन.कॉम पर देखें- वैश्विक ऊष्मीकरण का उ.प्र. की गंगा पर प्रभाव।
  25. इस तक ऊपर जायें: सिंह, डॉ॰ राजकुमार (जुलाई). विचार विमर्श. मथुरा: सागर प्रकाशन. प॰ १३-२३.
  26. ऊपर जायें “श्रीगंगासहस्त्रनामस्तोत्रम”. भारतीय साहित्य संग्रह. अभिगमन तिथि: २००९.
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  28. ऊपर जायें “गंगा – इंडिया वाटर पोर्टल”. इंडिया वाटर पोर्टल. अभिगमन तिथि: २००९.
  29. ऊपर जायें “भगीरथ और गंगा” (एचटीएमएल). स्पिरिचुअल इण्डिया. १४.
  30. ऊपर जायें “हिंदी काव्य में गंगा नदी”. अभिव्यक्ति. अभिगमन तिथि: २००९.
  31. ऊपर जायें “बुन्देली काव्य का ऐतिहासिक संदर्भ”. टीडीआईएल. अभिगमन तिथि: २००९.
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  33. ऊपर जायें “गंगा”. अनुभूति. अभिगमन तिथि: २००९.
  34. ऊपर जायें “माँ गंगा”. भारतीय साहित्य संग्रह. अभिगमन तिथि: २००९.
  35. ऊपर जायें तुलसीदास (संवत २०५८). कवितावली. गोरखपुर: गीताप्रेस. प॰ १३६ से १३७.

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भारत एक सनातन यात्रा— गंगा—एक जीवंत नदी है


भारत एक सनातन यात्रा— गंगा—एक जीवंत नदी है

गंगा एक जीवंत नदी हैगंगा के प्रतीक को भी समझने जैसा है। गंगा के साथ हिंदू मन बड़े गहरे में जुड़ा है। गंगा को हम भारत से हटा लें, तो भारत को भारत कहना मुशिकल हो जाए । सब बचा रहे, गंगा हट जाए, भारत को भारत कहना मुशिकल हो जाए। गंगा को हटा ले तो भारत का साहित्यह अधूरा पड़ जाए। गंगा को हम हटा ले तो हमारे तीर्थ ही खो जाए, हमारे सारे तीर्थ की भावना खो जाए।
गंगा के साथ भारत के प्राण बड़े पुराने दिनों से कमिटेड़ है। बड़े गहरे से जुडे है। गंगा जैसे हमारी आत्माो का प्रतीक हो गई है। मुल्के की भी अगर कोई आत्माह होती हो और उसके प्रतीक होते हो तो, गंगा ही हमारा प्रतीक है। पर क्या कारण होगा गंगा के इस गहरे प्रतीक बन जाने का कि हजारों-हजारों वर्ष पहले कृष्ण भी कहते है। नदियों में मैं गंगा हूं।
गंगा कोई नदियों में विशेष विशाल उस अर्थ में नहीं है। गंगा से बड़ी नदिया है। गंगा से लंबी नदिया है। गंगा से विशाल नदिया पृथ्वीर पर है। गंगा कोई लंबाई में, विशालता में, चौड़ाई में किसी दृष्टि् से बहुत बड़ी गंगा नहीं है। कोई बहुत बड़ी नदी नहीं है। ब्रह्मपुत्र है, और अमेजान है, और ह्व्गांीहो हो है। और सैकड़ों नदिया है। जिसके सामने गंगा फीकी पड़ जाए।
पर गंगा के पास कुछ और है, जो पृथ्वी पर किसी भी नदी के पास नहीं है। और उस कुछ के कारण भारतीय मन ने गंगा के साथ ताल-मेल बना लिया है। एक तो बहुत मजे की बात है। कि पूरी पृथ्वीं पर गंगा सबसे ज्याबदा जीवंत नदी है, अलाइव। सारी नदियों का पानी आप बोतल में भर कर रख दें, सभी नदियों का पानी सड़ जाएगा। गंगा भर का नहीं सड़ेगा। केमिकली गंगा बहुत विशिष्टो है। उसका पानी डिटरिओरेट नहीं होता, सड़ता नहीं, वर्षों रखा रहे। बंद बोतल में भी वह अपनी पवित्रता, अपनी स्व,च्छाता कायम रखता है।
ऐसा किसी नदी का पानी पूरी पृथ्वील पर नहीं है। सभी नदियों के पानी इस अर्थों में कमजोर है। गंगा का पानी इस अर्थ में विशेष मालूम पड़ता है। उसका विशेष केमिकल गुण मालूम पड़ता है।
गंगा में इतनी लाशें हम फेंकते है। गंगा में हमने हजारों-हजारों वर्षों से लाशें बहाई है। अकेले गंगा के पानी में, सब कुछ लीन हो जाता है, हड्डी भी। दुनिया की किसी नदी में वैसी क्षमता नहीं है। हड्डी भी पिघलकर लीन हो जाती है। और बह जाती है और गंगा को अपवित्र नहीं कर पाती। गंगा सभी को आत्मज सात कर लेती है। हड्डी को भी। कोई भी दूसरे पानी में लाश को हम डालेंगे, पानी सड़ेगा। पानी कमजोर और लाश मजबूत पड़ती है। गंगा में लाश को हम डालते है, लाश ही बिखर जाती है। मिल जाती है अपने तत्वोंो में। गंगा अछूती बहती रहती है। उस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
गंगा के पानी की बड़ी केमिकल परीक्षाएं हुई है वैज्ञानिक। और अब तो यह वैज्ञानिक रूप से सिद्ध हो गया है कि उसका पानी असाधारण है।
यह क्यों है असाधारण, यह भी थोड़ी हैरानी की बात है, क्योंिकि जहां से गंगा निकलती है वहां से बहुत नदियों निकलती है। गंगा जिन पहाड़ों से गुजरती है वहां से कई नदियों गुजरती है। तो गंगा में जो खनिज और जो तत्वा मिलते है वे और नदियों में भी मिलते है। फिर गंगा में कोई गंगा का ही पानी तो नहीं होता, गंगोत्री से तो बहुत छोटी-सी धारा निकलती है। फिर और तो सब दूसरी नदियों का पानी ही गंगा में आता है। विराट धारा तो दूसरी नदियों के पानी की ही होती है।
लेकिन यह बड़े मजे की बात है कि जो नदी गंगा में नहीं मिली, उस वक्त उसके पानी का गुणधर्म और होता है। और गंगा में मिल जाने के बाद उसी पानी का गुण धर्म और हो जाता है। क्याह होगा कारण? केमिकली तो कुछ पता नहीं चल पाता। वैज्ञानिक रूप से इतना तो पता चलाता है कि विशेषता है और उसके पानी में खनिज और कैमिकल्स का भेद है। विज्ञान इतना कहा सकता है। लेकिन एक और भेद है वह भेद विज्ञान के खयाल में आज नहीं तो कल आना शुरू हो जाएगा। और वह भेद है, गंगा के पास लाखों-लाखों लोगों का जीवन की परम अवस्थार को पाना।
यह मैं आपसे कहना चाहूंगा कि पानी जब भी कोई व्य क्तिा, अपवित्र व्य क्तिी पानी के पास बैठता है—अंदर जाने की तो बात अलग—पानी के पास भी बैठता है, तो पानी प्रभावित होता है। और पानी उस व्यनक्तिी की तरंगों से आच्छाीदित हो जाता है। और पानी उस व्यतक्तिल की तरंगों को अपने में ले लेता है।
इसलिए दुनिया के बहुत से धर्मों ने पानी का उपयोग किया है। ईसाइयत ने बप्तिसस्माे, बेप्टिाज्मग के लिए पानी का उपयोग किया है।
जीसस को जिस व्य क्तिे ने बप्तिास्माय दिया, जान दि बैपटिस्ट ने, उस आदमी का नाम ही पड़ गया थ जान बप्ति स्माब वाला। वह जॉर्डन नदी में—और जॉर्डन यहूदियों के लिए वैसी ही नदी रही, जैसी हिंदुओं के लिए गंगा। वह जॉर्डन नदी में गले तक आदमी को डूबा देता, खुद भी पानी में डुबकर खड़ा हो जाता, फिर उसके सिर पर हाथ रखता और प्रभु से प्रार्थना करता उसके इनीशिएशन की, उसकी दीक्षा की।
पानी में क्योंत खड़ा होता था जान? और पानी में दूसरे व्यसक्तिा को खड़ा करके क्याप कुछ एक व्यंक्तिो की तरंगें और एक व्यीक्तिे के प्रभाव ओ एक व्येक्तिा की आंतरिक दशा का आंदोलन दूसरे तक पहुंचना आसान है।
आसान है। पानी बहुत शीध्रता से चार्ड्र हो जाता है। पानी बहुत शीध्रता से व्य्क्तिित्वद से अनुप्राणित हो जाता है। पानी पर छाप बन जाती है।
लाखों-लाखों वर्ष से भारत के मनीषी गंगा के किनारे बैठकर प्रभु को पाने की चेष्टाक करते रहे है। और जब भी कोई एक व्यरक्ति् ने गंगा के किनारे प्रभु को पाया है, तो गंगा उस उपलब्धिै से वंचित नहीं रही है। गंगा भी आच्छा दित हो जाती है। गंगा का किनारा, गंगा की रेत के कण-कण, गंगा का पानी, सब, इन लाखों वर्षों से एक विशेष रूप से स्प्रि चुअली चार्ज्ड, आध्याित्मिगक रूप से तरंगायित हो गया है।
इसलिए हमने गंगा के किनारे तीर्थ बनाए।
गंगा साधारण नदी नहीं है। एक अध्यात्मिक यात्रा है और एक अध्याोत्मिवक प्रयोग। लाखों वर्षों तक लाखों लोगों को उसके निकट मुक्ति को पाना,परमात्मा‍ के दर्शन को उपलब्धक होना,आत्मल-साक्षात्कानर को पाना, लाखों का उसके किनारे आकर अंतिम घटना को उपलब्धध होना,वे सारे लोग अपनी जीवन-ऊर्जा को गंगा के पानी पर उसके किनारों पर छोड़ गए है।
ओशो—गीता दर्शन—भाग-5, (अध्यापय-10, प्रवचन-12)

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ये रोमिला थापर है, इतिहास लेखन का काम करती है.


ये रोमिला थापर है, 
इतिहास लेखन का काम करती है. 
ये और इसके जैसे तमाम इतिहास लेखकों के ऊपर कोई सेंसर बोर्ड नहीं है, ये जो चाहे लिख सकते हैं, और हम तथा हमारे बच्चे इनके लिखे हुए विकृत और असत्य लेखों को दिमाग की बत्ती बंद करके पढते रहते हैं, जब हम इनको पढते रहते हैं, तब हमारा सरोकार सिर्फ इतना रहता है कि बस इसका रट्टा मारो और परीक्षा के दौरान कॉपी पर छाप दो जिससे अच्छे नम्बर आ जाएँ, 

लेकिन हम ये भूल जाते हैं, हम जो पढते हैं, उसको साथ साथ गढते भी हैं, उसकी छवियाँ और दृश्य साथ साथ दिमाग में घर बनाते रहते हैं, जिसका नतीजा ये होता है कि अगर इन्होने राम और महाभारत को काल्पनिक लिख दिया तो हम भी उसे काल्पनिक मानकर अपनी ही संस्कृति और परम्पराओं से घृणास्पद दूरी बना लेते हैं, 

और यही इन किराये के टट्टुओं का मकसद रहता है. 
इन विधर्मी और गद्दार लेखकों द्वारा देश के इतिहास के सम्बन्ध में जो विकृत लेख लिखे गए हैं, उसकी एक बानगी आपके अवलोकनार्थ प्रस्तुत है. 
------------------------------------------------------

वैदिक काल में विशिष्ट अतिथियों के लिए गोमांस का परोसा जाना सम्मान सूचक माना जाता था।
(कक्षा 6-प्राचीन भारत, पृष्ठ 35, लेखिका-रोमिला थापर)

महमूद गजनवी ने मूर्तियों को तोड़ा और इससे वह धार्मिक नेता बन गया।
(कक्षा 7-मध्यकालीन भारत, पृष्ठ 28)

1857 का स्वतंत्रता संग्राम एक सैनिक विद्रोह था।
(कक्षा 8-सामाजिक विज्ञान भाग-1, आधुनिक भारत, पृष्ठ 166, लेखक-अर्जुन देव, इन्दिरा अर्जुन देव)

महावीर 12 वर्षों तक जहां-तहां भटकते रहे। 12 वर्ष की लम्बी यात्रा के दौरान उन्होंने एक बार भी अपने वस्त्र नहीं बदले। 42 वर्ष की आयु में उन्होंने वस्त्र का एकदम त्याग कर दिया।
(कक्षा 11, प्राचीन भारत, पृष्ठ 101, लेखक-रामशरण शर्मा)

तीर्थंकर, जो अधिकतर मध्य गंगा के मैदान में उत्पन्न हुए और जिन्होंने बिहार में निर्वाण प्राप्त किया, की मिथक कथा जैन सम्प्रदाय की प्राचीनता सिद्ध करने के लिए गढ़ ली गई।
(कक्षा 11-प्राचीन भारत, पृष्ठ 101, लेखक-रामशरण शर्मा)

जाटों ने, गरीब हो या धनी, जागीरदार हो या किसान, हिन्दू हो या मुसलमान, सबको लूटा।
(कक्षा 12 - आधुनिक भारत, पृष्ठ 18-19, विपिन चन्द्र)

रणजीत सिंह अपने सिंहासन से उतरकर मुसलमान फकीरों के पैरों की धूल अपनी लम्बी सफेद दाढ़ी से झाड़ता था।
(कक्षा 12 -पृष्ठ 20, विपिन चन्द्र)

आर्य समाज ने हिन्दुओं, मुसलमानों, पारसियों, सिखों और ईसाइयों के बीच पनप रही राष्ट्रीय एकता को भंग करने का प्रयास किया।
(कक्षा 12-आधुनिक भारत, पृष्ठ 183, लेखक-विपिन चन्द्र)

तिलक, अरविन्द घोष, विपिनचन्द्र पाल और लाला लाजपतराय जैसे नेता उग्रवादी तथा आतंकवादी थे
(कक्षा 12-आधुनिक भारत-विपिन चन्द्र, पृष्ठ 208)

400 वर्ष ईसा पूर्व अयोध्या का कोई अस्तित्व नहीं था। महाभारत और रामायण कल्पित महाकाव्य हैं।
(कक्षा 11, पृष्ठ 107, मध्यकालीन इतिहास, आर.एस. शर्मा)

वीर पृथ्वीराज चौहान मैदान छोड़कर भाग गया और गद्दार जयचन्द गोरी के खिलाफ युद्धभूमि में लड़ते हुए मारा गया।

(कक्षा 11, मध्यकालीन भारत, प्रो. सतीश चन्द्र)
औरंगजेब जिन्दा पीर थे।

(मध्यकालीन भारत, पृष्ठ 316, लेखक-प्रो. सतीश चन्द्र)
राम और कृष्ण का कोई अस्तित्व ही नहीं था। वे केवल काल्पनिक कहानियां हैं।

(मध्यकालीन भारत, पृष्ठ 245, रोमिला थापर)

(ऐसी और भी बहुत सी आपत्तिजनक बाते आपको एन.सी.आर.टी. की किताबों में पढ़ने को मिल जायेंगी)

इन किताबों में जो छापा जा रहा हैं उनमें रोमिला थापर जैसी लेखको ने मुसलमानों द्वारा धर्म के नाम पर काफ़िर हिन्दुओं के ऊपर किये गये भयानक अत्याचारों को गायब कर दिया है. 

नकली धर्मनिरपेक्षतावादी नेताओं की शह पर झूठा इतिहास लिखकर एक समुदाय की हिंसक मानसिकता पर जानबूझकर पर्दा ड़ाला जा रहा है. इन भयानक अत्याचारों को सदियों से चली आ रही गंगा जमुनी संस्कृति, अनेकता में एकता और धार्मिक सहिष्णुता बताकर नौजवान पीढ़ी को धोखा दिया जा रहा है. 

उन्हें अंधकार में रखा जा रहा है. भविष्य में इसका परिणाम बहुत खतरनाक होगा क्योकि नयी पीढ़ी ऐसे मुसलमानों की मानसिकता न जानने के कारण उनसे असावधान रहेगी और खतरे में पड़ जायेगी.

सोचने का विषय है कि आखिर किसके दबाव में सत्य को छिपाया अथवा तोड़ मरोड़ कर पेश किया जा रहा है?????

ये रोमिला थापर है,
इतिहास लेखन का काम करती है.
ये और इसके जैसे तमाम इतिहास लेखकों के ऊपर कोई सेंसर बोर्ड नहीं है, ये जो चाहे लिख सकते हैं, और हम तथा हमारे बच्चे इनके लिखे हुए विकृत और असत्य लेखों को दिमाग की बत्ती बंद करके पढते रहते हैं, जब हम इनको पढते रहते हैं, तब हमारा सरोकार सिर्फ इतना रहता है कि बस इसका रट्टा मारो और परीक्षा के दौरान कॉपी पर छाप दो जिससे अच्छे नम्बर आ जाएँ,

लेकिन हम ये भूल जाते हैं, हम जो पढते हैं, उसको साथ साथ गढते भी हैं, उसकी छवियाँ और दृश्य साथ साथ दिमाग में घर बनाते रहते हैं, जिसका नतीजा ये होता है कि अगर इन्होने राम और महाभारत को काल्पनिक लिख दिया तो हम भी उसे काल्पनिक मानकर अपनी ही संस्कृति और परम्पराओं से घृणास्पद दूरी बना लेते हैं,

और यही इन किराये के टट्टुओं का मकसद रहता है.
इन विधर्मी और गद्दार लेखकों द्वारा देश के इतिहास के सम्बन्ध में जो विकृत लेख लिखे गए हैं, उसकी एक बानगी आपके अवलोकनार्थ प्रस्तुत है.
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वैदिक काल में विशिष्ट अतिथियों के लिए गोमांस का परोसा जाना सम्मान सूचक माना जाता था।
(कक्षा 6-प्राचीन भारत, पृष्ठ 35, लेखिका-रोमिला थापर)

महमूद गजनवी ने मूर्तियों को तोड़ा और इससे वह धार्मिक नेता बन गया।
(कक्षा 7-मध्यकालीन भारत, पृष्ठ 28)

1857 का स्वतंत्रता संग्राम एक सैनिक विद्रोह था।
(कक्षा 8-सामाजिक विज्ञान भाग-1, आधुनिक भारत, पृष्ठ 166, लेखक-अर्जुन देव, इन्दिरा अर्जुन देव)

महावीर 12 वर्षों तक जहां-तहां भटकते रहे। 12 वर्ष की लम्बी यात्रा के दौरान उन्होंने एक बार भी अपने वस्त्र नहीं बदले। 42 वर्ष की आयु में उन्होंने वस्त्र का एकदम त्याग कर दिया।
(कक्षा 11, प्राचीन भारत, पृष्ठ 101, लेखक-रामशरण शर्मा)

तीर्थंकर, जो अधिकतर मध्य गंगा के मैदान में उत्पन्न हुए और जिन्होंने बिहार में निर्वाण प्राप्त किया, की मिथक कथा जैन सम्प्रदाय की प्राचीनता सिद्ध करने के लिए गढ़ ली गई।
(कक्षा 11-प्राचीन भारत, पृष्ठ 101, लेखक-रामशरण शर्मा)

जाटों ने, गरीब हो या धनी, जागीरदार हो या किसान, हिन्दू हो या मुसलमान, सबको लूटा।
(कक्षा 12 – आधुनिक भारत, पृष्ठ 18-19, विपिन चन्द्र)

रणजीत सिंह अपने सिंहासन से उतरकर मुसलमान फकीरों के पैरों की धूल अपनी लम्बी सफेद दाढ़ी से झाड़ता था।
(कक्षा 12 -पृष्ठ 20, विपिन चन्द्र)

आर्य समाज ने हिन्दुओं, मुसलमानों, पारसियों, सिखों और ईसाइयों के बीच पनप रही राष्ट्रीय एकता को भंग करने का प्रयास किया।
(कक्षा 12-आधुनिक भारत, पृष्ठ 183, लेखक-विपिन चन्द्र)

तिलक, अरविन्द घोष, विपिनचन्द्र पाल और लाला लाजपतराय जैसे नेता उग्रवादी तथा आतंकवादी थे
(कक्षा 12-आधुनिक भारत-विपिन चन्द्र, पृष्ठ 208)

400 वर्ष ईसा पूर्व अयोध्या का कोई अस्तित्व नहीं था। महाभारत और रामायण कल्पित महाकाव्य हैं।
(कक्षा 11, पृष्ठ 107, मध्यकालीन इतिहास, आर.एस. शर्मा)

वीर पृथ्वीराज चौहान मैदान छोड़कर भाग गया और गद्दार जयचन्द गोरी के खिलाफ युद्धभूमि में लड़ते हुए मारा गया।

(कक्षा 11, मध्यकालीन भारत, प्रो. सतीश चन्द्र)
औरंगजेब जिन्दा पीर थे।

(मध्यकालीन भारत, पृष्ठ 316, लेखक-प्रो. सतीश चन्द्र)
राम और कृष्ण का कोई अस्तित्व ही नहीं था। वे केवल काल्पनिक कहानियां हैं।

(मध्यकालीन भारत, पृष्ठ 245, रोमिला थापर)

(ऐसी और भी बहुत सी आपत्तिजनक बाते आपको एन.सी.आर.टी. की किताबों में पढ़ने को मिल जायेंगी)

इन किताबों में जो छापा जा रहा हैं उनमें रोमिला थापर जैसी लेखको ने मुसलमानों द्वारा धर्म के नाम पर काफ़िर हिन्दुओं के ऊपर किये गये भयानक अत्याचारों को गायब कर दिया है.

नकली धर्मनिरपेक्षतावादी नेताओं की शह पर झूठा इतिहास लिखकर एक समुदाय की हिंसक मानसिकता पर जानबूझकर पर्दा ड़ाला जा रहा है. इन भयानक अत्याचारों को सदियों से चली आ रही गंगा जमुनी संस्कृति, अनेकता में एकता और धार्मिक सहिष्णुता बताकर नौजवान पीढ़ी को धोखा दिया जा रहा है.

उन्हें अंधकार में रखा जा रहा है. भविष्य में इसका परिणाम बहुत खतरनाक होगा क्योकि नयी पीढ़ी ऐसे मुसलमानों की मानसिकता न जानने के कारण उनसे असावधान रहेगी और खतरे में पड़ जायेगी.

सोचने का विषय है कि आखिर किसके दबाव में सत्य को छिपाया अथवा तोड़ मरोड़ कर पेश किया जा रहा है?????

Posted in संस्कृत साहित्य

Learn about Vedas and associated scriptures


Learn about Vedas and associated scriptures:
By : Dasanapura Kumar

Learn about Vedas and associated scriptures:

 Smrtis are as follows:

 1. Manu Smrti
 2. Parasara Smrti
 3. Yagnavalkya Smrti
 4. Harita Smrti
 5. Apasthamba Smrti
 6. Atri Smrti
 7. Angirasa Smrti
 8. Yama Smrti
 9. Usana Smrti
 10. Gothama smrti
 11. Sanka Smrti
 12. Likhita Smrti
 13. Satapata Smrti
 14. Samvada Smrti
 15. Daksha Smrti
 16. Brhaspati Smrti
 17. Prachetas Smrti
 18. Vishnu Smrti

 Sutras are aphorisms the definition of it is "alpākṣaraṃ asandigdhaṃ sāravad viśvatomukham astobhaṃ anavadyaṃ ca sūtram sūtravido viduḥ".

Meaning it contains "minimal syllabary, unambiguous, pithy, comprehensive, continuous, and without flaw: who knows the sutra knows it to be thus".

 Many vast subjects were transformed into sutras for easy comprehension and retention: 

 They are Brahma sutra, Narada bakthi sutra, Nyaya sutra, Poorva meemamsa sutra, Snakya sutra, Siva sutra, Vaisheshika sutras, Yoga sutras, smartha sutras (Based on Smrti), Srautha sutras, Darma sutras, Gruhya sutras, Sulbha sutras,Kalpa sutra, Niruktha, sikksha, and Vyakarana sutras, Ashtadyayi related to grammar.

 Some of the above bear the names of Rishis who compiled them. For example Apasthamba sutra done by sage Apasthamba.

 To know more about the kind of work he authored, know little about him too.

 This maharishi must have existed before Panini (The great grammarian) and Pathanjali (The great Yoga exponent). Other Rishis like Jaimini,Yagyavalkya mention about this Rishi so he must be prior to them in time. Only this much we could learn about his time! But his works have survived to this day! He gets his name from an act that he performed! While conducting a ritual there were some transgressions so he ordained the water that was flowing down from the sprout of the vessel to stop and it stopped abruptly, that is why he is called “Apa sthamba”, one who stopped water! 

 He has written Srowtha Sutram, which explains the yagna methods of Yajur Veda, Grhya Sutram that explain the rules of various karmas (Works) to be performed by Brahmachari, and Grhasta (Married). They include all karmas right from the birth of a child upto the death of an individual!

 He has also written Sulba Sutra that explains the method of constructing the yagna salas (Altar) and is an excellent exposition of his mathematical skill! Even the western scientists agree that geometry spread through this work around the world. Von Schrader a famous German author declares that Pythagoras learn t geometry about 2550 years ago through these works!

 Apasthambha in his works he has addressed a very important question of a commoner that is ‘If one has to adhere to these codes of conduct expecting a benefit, after his death, which he is not aware of today, then what is the use of these rules?’
The Rishi gives both tangible and intangible benefits that accrue to those who follow these rules.

 He covers all classes of society. The codes cover politics, society, students, teaching community, the animal kingdom, labour issues, and social evils. It is a very comprehensive work encompassing every possible situation in dynamic society of modern day!

 to be continued.....

Learn about Vedas and associated scriptures:

Smrtis are as follows:

1. Manu Smrti
2. Parasara Smrti
3. Yagnavalkya Smrti
4. Harita Smrti
5. Apasthamba Smrti
6. Atri Smrti
7. Angirasa Smrti
8. Yama Smrti
9. Usana Smrti
10. Gothama smrti
11. Sanka Smrti
12. Likhita Smrti
13. Satapata Smrti
14. Samvada Smrti
15. Daksha Smrti
16. Brhaspati Smrti
17. Prachetas Smrti
18. Vishnu Smrti

Sutras are aphorisms the definition of it is “alpākṣaraṃ asandigdhaṃ sāravad viśvatomukham astobhaṃ anavadyaṃ ca sūtram sūtravido viduḥ”.

Meaning it contains “minimal syllabary, unambiguous, pithy, comprehensive, continuous, and without flaw: who knows the sutra knows it to be thus”.

Many vast subjects were transformed into sutras for easy comprehension and retention:

They are Brahma sutra, Narada bakthi sutra, Nyaya sutra, Poorva meemamsa sutra, Snakya sutra, Siva sutra, Vaisheshika sutras, Yoga sutras, smartha sutras (Based on Smrti), Srautha sutras, Darma sutras, Gruhya sutras, Sulbha sutras,Kalpa sutra, Niruktha, sikksha, and Vyakarana sutras, Ashtadyayi related to grammar.

Some of the above bear the names of Rishis who compiled them. For example Apasthamba sutra done by sage Apasthamba.

To know more about the kind of work he authored, know little about him too.

This maharishi must have existed before Panini (The great grammarian) and Pathanjali (The great Yoga exponent). Other Rishis like Jaimini,Yagyavalkya mention about this Rishi so he must be prior to them in time. Only this much we could learn about his time! But his works have survived to this day! He gets his name from an act that he performed! While conducting a ritual there were some transgressions so he ordained the water that was flowing down from the sprout of the vessel to stop and it stopped abruptly, that is why he is called “Apa sthamba”, one who stopped water!

He has written Srowtha Sutram, which explains the yagna methods of Yajur Veda, Grhya Sutram that explain the rules of various karmas (Works) to be performed by Brahmachari, and Grhasta (Married). They include all karmas right from the birth of a child upto the death of an individual!

He has also written Sulba Sutra that explains the method of constructing the yagna salas (Altar) and is an excellent exposition of his mathematical skill! Even the western scientists agree that geometry spread through this work around the world. Von Schrader a famous German author declares that Pythagoras learn t geometry about 2550 years ago through these works!

Apasthambha in his works he has addressed a very important question of a commoner that is ‘If one has to adhere to these codes of conduct expecting a benefit, after his death, which he is not aware of today, then what is the use of these rules?’
The Rishi gives both tangible and intangible benefits that accrue to those who follow these rules.

He covers all classes of society. The codes cover politics, society, students, teaching community, the animal kingdom, labour issues, and social evils. It is a very comprehensive work encompassing every possible situation in dynamic society of modern day!

to be continued…..

Posted in रामायण - Ramayan

AYODHI – RAMARAM –^–>X<–^–அயோத்தி – ராமராம


AYODHI – RAMARAM –^–>X<–^–அயோத்தி – ராமராம
——————————————————————
Ram Janmabhoomi -^–}–>ௐ <–{–^- ராம ஜென்மபூமி
—————————————————————–
The city of Ayodhya is regarded by Hindu literature to be the birthplace of Lord Ram. After the Mughal invasion, a mosque was built by Mughal general Mir Banki, who reportedly destroyed a pre-existing temple of Ram at the site, and named it after emperor Babur. Babri Masjid, as it is famously known, was built at Ayodhya in 1528.
———————————————————
The first of the lawsuits were filed in 1885 and
the British judge gave the following judgement!
———————————————————
I visited the land in dispute yesterday in the presence of all parties. I found that the Masjid built by Emperor Babur stands on the border of Ayodhya, that is to say, to the west and south it is clear of habitations. It is most unfortunate that a Masjid should have been built on land specially held sacred by the Hindus, but as that event occurred 356 years ago, it is too late now to agree with the grievances.
(Court verdict by Col. F.E.A. Chamier, District Judge, Faizabad (1886)
——————————————————————
Never Ending Story ? ( Ref : ‘The Hindu’, May 9, 2011.)
——————————————————————
The Supreme Court on Monday stayed the Allahabad High Court verdict that directed division of 2.77 acres of land of the disputed Ram Janmabhoomi-Babri Masjid site in Ayodhya into three parts among Hindus, Muslims and the Nirmohi Akhara…(cont’d)
——————————————————————
Now the full story cold be read by clicking on the ‘see more’…

Indian Temples - இந்தியக் கோவில்கள்'s photo.

AYODHI – RAMARAM –^–>X<–^–அயோத்தி – ராமராம
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Ram Janmabhoomi -^–}–>ௐ <–{–^- ராம ஜென்மபூமி
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அயோத்தியா கோவில்; உத்தர பிரதேசம், அயோத்தியில் உள்ளது. இந்த இடம் இந்து மதக் கடவுளான இராமர் பிறந்த இடம். விஷ்ணுவின் அவதாரமான ராமர், இந்த ஊரை தலை நகராக கொண்டு ஆட்சி செய்தார்.
இங்கு பதினாறாம் நூற்றாண்டு வரை அவருக்கு ஒரு கோவில் இருந்தது. இந்த இடத்தில் 1528ல் முகலாய மன்னர் பாபர் இந்த இடத்தில் மசூதி ஒன்றை கட்டுவித்தார். அது அவரது பெயரால் பாபர் மசூதி என்று வழங்கப்பட்டது.
2010ம் ஆண்டு இவ்வழக்கில் தீர்ப்பு வழங்கப்பட்டது!
சர்ச்சைக்குரிய இடம் ராமர் பிறந்த இடமே என்றும்
இடிபட்ட பாபர் மசூதியின் கும்மட்டம் இருந்த இடம் தான் ராமரின் பிறந்த இடம் என்றும் நீதிபதிகள் தீர்ப்பளித்தனர். சர்ச்சைக்குரிய நிலம் மூன்றாகப் பிரிக்கப்பட்டு ஒரு பகுதி ராம ஜன்ம் பூமி இயக்கத்துக்கும் (சங் பரிவார் அமைப்பு), ஒரு பகுதி சுன்னி வக்பு வாரியத்துக்கும், மீதமுள்ள பகுதி நிர்மோஹி அகோரா என்ற இந்து அமைப்பிற்கும் வழங்கப்பட்டன.அதை( Ref : த இந்து, மே 9, 2011.) உச்சநீதிமன்றம் நிலுவையில் வைத்துள்ளது !
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Never Ending Story ? ( Ref : ‘The Hindu’, May 9, 2011.)
The Supreme Court on Monday stayed the Allahabad High Court verdict that directed division of 2.77 acres of land of the disputed Ram Janmabhoomi-Babri Masjid site in Ayodhya into three parts among Hindus, Muslims and the Nirmohi Akhara…(cont’d)
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Ayodhya is believed to be a sacred land, birthplace of Rama. As the ancient epic ‘Ramayana’ tells, Rama was considered as one of the 10 ‘Avatars’ of lord Vishnu. It is also said that he travelled to Lanka (Shri Lanka) and defeated Raavana. Later he came back to Ayodhya and descended to the throne after his father, Raja Dashrath. So Ayodhya, which was also a home to a number of Ram Temples, had a special place in Hindu mythology and was often related with god.The city of Ayodhya is regarded by Hindu literature to be the birthplace of Lord Ram. After the Mughal invasion, a mosque was built by Mughal general Mir Banki, who reportedly destroyed a pre-existing temple of Ram at the site, and named it after emperor Babur. Babri Masjid, as it is famously known, was built at Ayodhya in 1528. For several years, the site was used for religious purposes by both Hindus and Muslims. After independence, several title suits were filed by opposing religious groups claiming possession of the site. While the educated classes view the destruction of the structure as criminal vandalism Hindu organizations claim that what happened in Mughal era with several of Hindu temples was the real vandalism.
The disputed building was a victory monument built by a foreign invader’s general who had wished to subdue and intimidate the Hindu inhabitants of the area. How Indian Muslims, the citizens of a free and independent India whose religious rights were protected, could place any value on such a structure? BUT<temples, once it is shown that a prana prathista puja has been performed to build it, is where God or deity resides, and belongs to God forever.”
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Summing up Hindus position here:
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Hindus have long believed with some conviction that plenty of great Hindu temples of north (Somnath, Varanasi, Mathura and Ayodhya) were demolished during the Islamic rule. In fact, Mathura and Somnath temples were rebuilt multiple times after sequence of raids destroyed them. During the excavation of Ayodhya by the Archaeological Survey of India, remains of an ancient structure (possibly Hindu/Buddhist) was proven with habitation dating back to 13th century BC. Given how the whole city is teeming with temples, Hindus have reasons to believe that this could have been the temple!
Hindus believe Ayodhya is the birthplace of Ram.For centuries Hindus have thought the Masjid premises was the one where Lord Ram was born and celebrated it as such. Given the fact that in other places of north India, large masjids were built over ancient temples, there is some circumstantial evidence to this, as courts have proclaimed.In Hinduism the exact places in which the supposed miracles happened are sacred.Lord Ram is a central part of Hindu mythology. Hindus thought that the dilapidated mosque that was in disuse was inconsequential to the core Islamic belief. Hindus pleas were ignored by both the British and Nehru’s government. Thus the disaffected parties took to surreptitious and underhanded ways to take back the place they believe it is theirs.
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The first of the lawsuits were filed in 1885 and
the British judge gave the following judgement !
———————————————————
I visited the land in dispute yesterday in the presence of all parties. I found that the Masjid built by Emperor Babur stands on the border of Ayodhya, that is to say, to the west and south it is clear of habitations. It is most unfortunate that a Masjid should have been built on land specially held sacred by the Hindus, but as that event occurred 356 years ago, it is too late now to agree with the grievances. (Court verdict by Col. F.E.A. Chamier, District Judge, Faizabad (1886)

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राजीव गांधी जब प्रधानमंत्री थे तो एक बार रोते-रोते अमेरिका पहुँच गये !


राजीव गांधी जब प्रधानमंत्री थे तो एक बार रोते-रोते अमेरिका पहुँच गये !

પ્રહલાદ પ્રજાપતિ

राजीव गांधी जब प्रधानमंत्री थे तो एक बार रोते-रोते अमेरिका पहुँच गये !

मित्रो एक तो हमारे देश मे भिखारियों की बहुत बड़ी समस्या है !

देश का प्रधानमंत्री भी भिख मंग्गे की तरह ही बात करता है 

तो कटोरा लेकर राजीव गांधी पहुँच गये अमेरिका के राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन के पास !
और कहने लगे हमे सुपर कम्पुटर दे दो ! इस देश के वैज्ञानिको ने बहुत समझाया था की मत जाइए बेइज्जती हो जाएगी लेकिन नहीं माने क्योंकि उनको धुन स्वार थी की हिंदुस्तान को 21 वीं सदी मे लेकर जाना है जैसे राजीव गांधी के चाहने पर ही देश 21 वीं सदी मे जाएगा अपने आप नहीं जाएगा !

पूरी पोस्ट नहीं पढ़ सकते तो यहाँ click करें !
LINK -http://goo.gl/oWvZlA

तो पहुँच गए भीख मांगने अमेरिका के पास की हमे सुपर कम्पुटर दे दो और क्रायोजेनिक इंजन(अन्तरिक्ष रॉकेट मे आता है ) दे दो !! तो रोनाल्ड रीगन ने कहा हम सोचेंगे ! तो कुछ महीनों बाद फिर राजीव गांधी पहुँच गए और पूछा क्या  सोचा आपने ?? ! 

तो रोनाल्ड रीगन ने कहा हमने सोचा है ना तो हम आपको सुपर कम्पुटर देंगे और न ही क्रायोजेनिक इंजन देंगे ! जबकि अमेरिका की कंपनी IBM के मन मे था की भारत सरकार से कुछ समझोता हो जाए और उसका सुपर कम्पुटर भारत मे बिक जाए ! लेकिन अमेरिका के राष्ट्रपति  रोनाल्ड रीगन ने साफ माना कर दिया की ये संभव नहीं है ! ना तो बनाने के technology देंगे और ना ही बना बनाया सुपर कम्पुटर देंगे !! तो बेचारे मुह लटकाये राजीव गांधी भारत वापिस लौट आए और जो वाशिंगटन मे बेइज्जती हुई वो अलग !!

फिर भारत वापिस आकार CSIR (Council of Scientific and Industrial Research ) के वैज्ञानिको की मीटिंग मे literally  रो पड़े ! और कहा मैं गया था सुपर कंपूटर और  क्रायोजेनिक इंजन मांगने लेकिन मुझे नहीं मिला !!

CSIR  तब SK जोशी डायरेक्टर हुआ करते थे तो उन्होने ने कहा हमने तो आपको पहले ही मना किया था आप क्यों ? गए थे बेइज़्ज़ती करवाने ? ! तो राजीव गांधी ने कहा अब कोई तो रास्ता होगा ? तो कुछ वैज्ञानिको ने कहा आप रूस से समझोता कर लीजिये ! तो भारत सरकार ने क्रायोजेनिक इंजन लेने का रूस के साथ एक समझोता कर लिया ! लेकिन जब डिलिवरी का समय आया तो अमेरिका ने फिर लंगड़ी मार दी ! अमेरिका ने रूस को ब्लैक लिस्टिड कर दिया !
रूस बेचारा घबरा गया और उसने इंजन देने से मना कर दिया !!

तो अंत एक दिन हमारे वैज्ञानिको ने कहा आप ये जो कटोरा लेकर भीख मांगते है क्यों ?नहीं भारतीय वैज्ञानिको को कहते की वो सुपर कम्पुटर  बनाये क्यों नहीं उन्हे कहते की वो क्रायोजेनिक इंजन बनाये ! तो राजीव गांधी को भरोसा ही नहीं था की भारतीय वैज्ञानिक ये बना सकते है ! तो CSIR  के लोगो ने उन्हे भरोसा दिलाया आप ये मत मानिए भारतीय वैज्ञानिक भी उतने ही प्रतिभाशाली है जितने अन्य देशो के !! बेशर्ते की उनको काम देने की जरूरत है और प्रोटेक्शन देने की !!

तो अंत राजीव गांधी ने डरते डरते कहा ठीक है भाई आप बना लीजिये ! तो CSIR  का एक सहयोगी है पुणा मे CDAC ! तो CDAC के वैज्ञानिको ने दिन रात मेहनत कर जितना पैसा दिया था और जितना समय दिया था दोनों की बचत करते हये पहला सुपर कम्पुटर बना दिया जिसका नाम था परम,10000 !! इसके अतिरिक्त भारत परम युवा 1 ! परम युवा 2 और अन्य कितने ही सुपर कम्पुटर बना चुका है !!

ऐसे ही DRDO ( Defence Research and Development Organisation  ) के वैज्ञानिको ने 
 क्रायोजेनिक इंजन भी बनाने मे सफल हो चुके है ! सेटेलाईट की technology भी हमे दूसरे देशो ने नहीं दी !

भारत ने अपने सैटेलाईट खुद बनाये है !और तो और सेटेलाईट बनाने और अन्तरिक्ष मे छोड़ने के मामले मे भारत इतना
आगे निकल चुका है 19 देशो के 40 से ज्यादा सेटेलाईट भारत आज अन्तरिक्ष मे छोड़ चुका है !
अभी कुछ दिन पहले आपने टीवी मे देखा होगा जब खुद प्रधानमंत्री मोदी श्रीहरिकोटा मे मौजूद थे 
जहां PSLV नमक उपग्रह छोड़ा गया और वो हमारा उपग्रह 5 अन्य देशों के उपग्रहो को भी साथ लेकर उड़ा था ! 
__________________________________________

भारत के अन्तरिक्ष वैज्ञानिको (ISRO ) ने चन्द्र और मंगल पर भेजे मिशन 
पर अमेरिका से कई गुना कम समय और खर्चे में कार्य पूरा किया !!

चाँद पर जाने का मिशन:

अमेरिका का Lunar Reconnaissance Orbiter

समय - 3 साल 

खर्च - $583 मिलियन 

(लगभग 3000 करोड़ रूपए, जब 1 डॉलर = 50 रूपए)

*******************

भारत का चन्द्रयान

बनाने में लगा समय - 18 महीने

कुल खर्च - $59 मिलियन 

(लगभग 300 करोड़ रूपए, जब 1 डॉलर = 50 रूपए) 

********************** 
___________________________________

मंगल मिशन:

अमेरिका का MAVEN

समय लगा: 5 साल 

कुल खर्च : $671 मिलियन 
(लगभग 4000 करोड़ रूपए, जब 1 डॉलर = 60 रूपए)

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भारत का मंगलयान:

समय - 18 महीने

खर्चा - $69 मिलियन
(लगभग 400 करोड़ रूपए, जब 1 डॉलर = 60 रूपए)
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मित्रो आज के जमाने मे technology सबसे बड़ा हथियार है ! तो कोई भी देश आपको अपनी latest technology नहीं देगा ! वो लोग वही technology देंगे जो उनके देश मे बेकार हो चुकी है ! technology खुद ही विकसित करनी पड़ती है !! भारत सरकार को भारतीय वैज्ञानिको पर भरोसा करना चाहिए !!

पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद !
LINK  
http://www.youtube.com/watch?v=tOqLmFgUUBE

वन्देमातरम ,!

राजीव गांधी जब प्रधानमंत्री थे तो एक बार रोते-रोते अमेरिका पहुँच गये !

मित्रो एक तो हमारे देश मे भिखारियों की बहुत बड़ी समस्या है !

देश का प्रधानमंत्री भी भिख मंग्गे की तरह ही बात करता है

तो कटोरा लेकर राजीव गांधी पहुँच गये अमेरिका के राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन के पास !
और कहने लगे हमे सुपर कम्पुटर दे दो ! इस देश के वैज्ञानिको ने बहुत समझाया था की मत जाइए बेइज्जती हो जाएगी लेकिन नहीं माने क्योंकि उनको धुन स्वार थी की हिंदुस्तान को 21 वीं सदी मे लेकर जाना है जैसे राजीव गांधी के चाहने पर ही देश 21 वीं सदी मे जाएगा अपने आप नहीं जाएगा !

पूरी पोस्ट नहीं पढ़ सकते तो यहाँ click करें !
LINK –http://goo.gl/oWvZlA

तो पहुँच गए भीख मांगने अमेरिका के…

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Lingaraj Temple


Lingaraj Temple

http://bharattemple.blogspot.com/2011/09/lingaraj-temple.html

Location: Bhubaneshwar, Orissa 
Built by: Jajati Keshari
Built in: 11th century
Dedicated to: Lord Shiva

 Lingaraj Temple is believed to be the oldest and largest temple of Bhubaneshwar. The temple of Lingaraja is highly revered by the followers of Hinduism. Located at Bhubaneshwar in Orissa, Lingraj Mandir is easily accessible from the city. The term ‘Lingaraj’ suggests ‘the king of Lingas’, where ‘linga’ is the phallic form of Lord Shiva. In the 11th century, Lingaraj Temple was built by the King Jajati Keshari, who belonged to Soma Vansh. It is thought that when the King shifted his capital from Jaipur to Bhubaneshwar, he started the construction of Lingaraj Temple.

This ancient temple has also been referred in the Brahma Purana, a Hindu scripture. Not less than 1000 years old, the present structure of the temple was built in the 11th century. However, there are many parts that are acknowledged to date back the 6th century. Lingaraj Temple is dedicated to Lord Shiva, who is considered as the destroyer as per the Hindu thoughts. It is said that when the construction of Lingaraj Temple was about to complete, the Jagannath cult started growing. This belief is further empowered with the fact that Lord Vishnu and Lord Shiva are worshipped here.

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Siem Reap, Cambodia: Texture in red sandstone


Siem Reap, Cambodia: Texture in red sandstone

Banteay Srei

SR_23

SR_25

Siem Reap, Cambodia: Texture in stone bas-reliefs

Angkor Wat

SR_20

Rajasthan – India: Texture in white marble

Jain Temple

RJ-25

Grand Palace in Bangkok: Texture in gold

TH-1