Posted in भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas

इतिहास के भूले बिसरे पन्नों से रानी कत्युरी की कहानी—– जरुर पढ़ें और शेयर करें


इतिहास के भूले बिसरे पन्नों से रानी कत्युरी की कहानी—– जरुर पढ़ें और शेयर करें

कुमायूं (उतराखण्ड) के कत्युरी राजवंश की वीर राजमाता वीरांगना जिया रानी(मौला देवी पुंडीर)----------
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जय राजपुताना----------
मित्रों इतिहास में कुछ ऐसे अनछुए व्यक्तित्व होते हैं जिनके बारे में ज्यादा लोग नहीं जानते मगर एक क्षेत्र विशेष में उनकी बड़ी मान्यता होती है और वे लोकदेवता के रूप में पूजे जाते हैं,
आज हम आपको एक ऐसी ही वीरांगना से परिचित कराएँगे जिनकी कुलदेवी के रूप में आज तक उतराखंड में पूजा की जाती है.
उस वीरांगना का नाम है राजमाता जिया रानी(मौला देवी पुंडीर) जिन्हें कुमायूं की रानी लक्ष्मीबाई कहा जाता है ----------------
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जिया रानी(मौला देवी पुंडीर) jiya rani pundir-------
जिया रानी का बचपन का नाम मौला देवी था,वो हरिद्वार(मायापुर) के राजा अमरदेव पुंडीर की पुत्री थी,ईस्वी 1192 में देश में तुर्कों का शासन स्थापित हो गया था,मगर उसके बाद भी किसी तरह दो शताब्दी तक हरिद्वार में पुंडीर राज्य बना रहा,मगर तुर्कों के हमले लगातार जारी रहे और न सिर्फ हरिद्वार बल्कि गढ़वाल और कुमायूं में भी तुर्कों के हमले होने लगे,ऐसे ही एक हमले में कुमायूं (पिथौरागढ़) के कत्युरी राजा प्रीतम देव ने हरिद्वार के राजा अमरदेव पुंडीर की सहायता के लिए अपने भतीजे ब्रह्मदेव को सेना के साथ सहायता के लिए भेजा,ज्सिके बाद राजा अमरदेव पुंडीर ने अपनी पुत्री मौला देवी का विवाह कुमायूं के कत्युरी राजवंश के राजा प्रीतमदेव उर्फ़ पृथ्वीपाल से कर दिया,मौला देवी प्रीतमपाल की दूसरी रानी थी,उनके धामदेव,दुला,ब्रह्मदेव पुत्र हुए जिनमे ब्रह्मदेव को कुछ लोग प्रीतम देव की पहली पत्नी से मानते हैं,मौला देवी को राजमाता का दर्जा मिला और उस क्षेत्र में माता को जिया कहा जाता था इस लिए उनका नाम जिया रानी पड़ गया,कुछ समय बाद जिया रानी की प्रीतम देव से अनबन हो गयी और वो अपने पुत्र के साथ गोलाघाट चली गयी जहां उन्होंने एक खूबसूरत रानी बाग़ बनवाया,यहाँ जिया रानी 12 साल तक रही.........
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तैमुर का हमला-------------
ईस्वी 1398 में मध्य एशिया के हमलावर तैमुर ने भारत पर हमला किया और दिल्ली मेरठ को रौंदता हुआ वो हरिद्वार पहुंचा जहाँ उस समय वत्सराजदेव पुंडीर(vatsraj deo pundir) शासन कर रहे थे,उन्होंने वीरता से तैमुर का सामना किया मगर शत्रु सेना की विशाल संख्या के आगे उन्हें हार का सामना करना पड़ा,पुरे हरिद्वार में भयानक नरसंहार हुआ,जबरन धर्मपरिवर्तन हुआ और राजपरिवार को भी उतराखण्ड के नकौट क्षेत्र में शरण लेनी पड़ी वहां उनके वंशज आज भी रहते हैं और मखलोगा पुंडीर के नाम से जाने जाते हैं,
तैमूर ने एक टुकड़ी आगे पहाड़ी राज्यों पर भी हमला करने भेजी,जब ये सूचना जिया रानी को मिली तो उन्होंने इसका सामना करने के लिए कुमायूं के राजपूतो की एक बड़ी सेना का गठन किया,तैमूर की सेना और जिया रानी के बीच रानीबाग़ क्षेत्र में युद्ध हुआ जिसमे मुस्लिम सेना की हार हुई,इस विजय के बाद जिया रानी के सैनिक कुछ निश्चिन्त हो गये,पर वहां दूसरी अतिरिक्त मुस्लिम सेना आ पहुंची जिससे जिया रानी की सेना की हार हुई,और सतीत्व की रक्षा के लिए एक गुफा में जाकर छिप गयी,
जब प्रीतम देव को इस हमले की सूचना मिली तो वो स्वयं सेना लेकर आये और मुस्लिम हमलावरों को मार भगाया,इसके बाद में वो जिया रानी को पिथौरागढ़ ले आये,प्रीतमदेव की मृत्यु के बाद मौला देवी ने बेटे धामदेव के संरक्षक के रूप में शासन भी किया था।वो स्वयं शासन के निर्णय लेती थी। माना जाता है कि राजमाता होने के चलते उसे जियारानी भी कहा जाता है। मां के लिए जिया शब्द का प्रयोग किया जाता था। रानीबाग में जियारानी की गुफा नाम से आज भी प्रचलित है। कत्यूरी वंशज प्रतिवर्ष उनकी स्मृति में यहां पहुंचते हैं।

यहाँ जिया रानी की गुफा के बारे में एक और किवदंती प्रचलित है---------------

"कहते हैं कत्यूरी राजा पृथवीपाल उर्फ़ प्रीतम देव की पत्नी रानी जिया यहाँ चित्रेश्वर महादेव के दर्शन करने आई थी। वह बहुत सुन्दर थी। जैसे ही रानी नहाने के लिए गौला नदी में पहुँची, वैसे ही मुस्लिम सेना ने घेरा डाल दिया। रानी जिया शिव भक्त और सती महिला थी।उसने अपने ईष्ट का स्मरण किया और गौला नदी के पत्थरों में ही समा गई। मुस्लिम सेना ने उन्हें बहुत ढूँढ़ा परन्तु वे कहीं नहीं मिली। कहते हैं, उन्होंने अपने आपको अपने घाघरे में छिपा लिया था। वे उस घाघरे के आकार में ही शिला बन गई थीं। गौला नदी के किनारे आज भी एक ऐसी शिला है, जिसका आकार कुमाऊँनी घाघरे के समान हैं। उस शिला पर रंग-विरंगे पत्थर ऐसे लगते हैं - मानो किसी ने रंगीन घाघरा बिछा दिया हो। वह रंगीन शिला जिया रानी के स्मृति चिन्ह माना जाता है। रानी जिया को यह स्थान बहुत प्यारा था। यहीं उसने अपना बाग लगाया था और यहीं उसने अपने जीवन की आखिरी सांस भी ली थी। वह सदा के लिए चली गई परन्तु उसने अपने सतीत्व की रक्षा की। तब से उस रानी की याद में यह स्थान रानीबाग के नाम से विख्यात है।कुमाऊं के प्रवेश द्वार काठगोदाम स्थित रानीबाग में जियारानी की गुफा का ऐतिहासिक महत्व है"""

कुमायूं के राजपूत आज भी वीरांगना जिया रानी पर बहुत गर्व करते हैं,
उनकी याद में दूर-दूर बसे उनके वंशज (कत्यूरी) प्रतिवर्ष यहां आते हैं। पूजा-अर्चना करते हैं। कड़ाके की ठंड में भी पूरी रात भक्तिमय रहता है।
महान वीरांगना सतीत्व की प्रतीक पुंडीर वंश की बेटी और कत्युरी वंश की राजमाता जिया रानी को शत शत नमन.....
जय राजपूताना..................

कुमायूं (उतराखण्ड) के कत्युरी राजवंश की वीर राजमाता वीरांगना जिया रानी(मौला देवी पुंडीर)———-
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जय राजपुताना———-
मित्रों इतिहास में कुछ ऐसे अनछुए व्यक्तित्व होते हैं जिनके बारे में ज्यादा लोग नहीं जानते मगर एक क्षेत्र विशेष में उनकी बड़ी मान्यता होती है और वे लोकदेवता के रूप में पूजे जाते हैं,
आज हम आपको एक ऐसी ही वीरांगना से परिचित कराएँगे जिनकी कुलदेवी के रूप में आज तक उतराखंड में पूजा की जाती है.
उस वीरांगना का नाम है राजमाता जिया रानी(मौला देवी पुंडीर) जिन्हें कुमायूं की रानी लक्ष्मीबाई कहा जाता है —————-
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जिया रानी(मौला देवी पुंडीर) jiya rani pundir——-
जिया रानी का बचपन का नाम मौला देवी था,वो हरिद्वार(मायापुर) के राजा अमरदेव पुंडीर की पुत्री थी,ईस्वी 1192 में देश में तुर्कों का शासन स्थापित हो गया था,मगर उसके बाद भी किसी तरह दो शताब्दी तक हरिद्वार में पुंडीर राज्य बना रहा,मगर तुर्कों के हमले लगातार जारी रहे और न सिर्फ हरिद्वार बल्कि गढ़वाल और कुमायूं में भी तुर्कों के हमले होने लगे,ऐसे ही एक हमले में कुमायूं (पिथौरागढ़) के कत्युरी राजा प्रीतम देव ने हरिद्वार के राजा अमरदेव पुंडीर की सहायता के लिए अपने भतीजे ब्रह्मदेव को सेना के साथ सहायता के लिए भेजा,ज्सिके बाद राजा अमरदेव पुंडीर ने अपनी पुत्री मौला देवी का विवाह कुमायूं के कत्युरी राजवंश के राजा प्रीतमदेव उर्फ़ पृथ्वीपाल से कर दिया,मौला देवी प्रीतमपाल की दूसरी रानी थी,उनके धामदेव,दुला,ब्रह्मदेव पुत्र हुए जिनमे ब्रह्मदेव को कुछ लोग प्रीतम देव की पहली पत्नी से मानते हैं,मौला देवी को राजमाता का दर्जा मिला और उस क्षेत्र में माता को जिया कहा जाता था इस लिए उनका नाम जिया रानी पड़ गया,कुछ समय बाद जिया रानी की प्रीतम देव से अनबन हो गयी और वो अपने पुत्र के साथ गोलाघाट चली गयी जहां उन्होंने एक खूबसूरत रानी बाग़ बनवाया,यहाँ जिया रानी 12 साल तक रही………
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तैमुर का हमला————-
ईस्वी 1398 में मध्य एशिया के हमलावर तैमुर ने भारत पर हमला किया और दिल्ली मेरठ को रौंदता हुआ वो हरिद्वार पहुंचा जहाँ उस समय वत्सराजदेव पुंडीर(vatsraj deo pundir) शासन कर रहे थे,उन्होंने वीरता से तैमुर का सामना किया मगर शत्रु सेना की विशाल संख्या के आगे उन्हें हार का सामना करना पड़ा,पुरे हरिद्वार में भयानक नरसंहार हुआ,जबरन धर्मपरिवर्तन हुआ और राजपरिवार को भी उतराखण्ड के नकौट क्षेत्र में शरण लेनी पड़ी वहां उनके वंशज आज भी रहते हैं और मखलोगा पुंडीर के नाम से जाने जाते हैं,
तैमूर ने एक टुकड़ी आगे पहाड़ी राज्यों पर भी हमला करने भेजी,जब ये सूचना जिया रानी को मिली तो उन्होंने इसका सामना करने के लिए कुमायूं के राजपूतो की एक बड़ी सेना का गठन किया,तैमूर की सेना और जिया रानी के बीच रानीबाग़ क्षेत्र में युद्ध हुआ जिसमे मुस्लिम सेना की हार हुई,इस विजय के बाद जिया रानी के सैनिक कुछ निश्चिन्त हो गये,पर वहां दूसरी अतिरिक्त मुस्लिम सेना आ पहुंची जिससे जिया रानी की सेना की हार हुई,और सतीत्व की रक्षा के लिए एक गुफा में जाकर छिप गयी,
जब प्रीतम देव को इस हमले की सूचना मिली तो वो स्वयं सेना लेकर आये और मुस्लिम हमलावरों को मार भगाया,इसके बाद में वो जिया रानी को पिथौरागढ़ ले आये,प्रीतमदेव की मृत्यु के बाद मौला देवी ने बेटे धामदेव के संरक्षक के रूप में शासन भी किया था।वो स्वयं शासन के निर्णय लेती थी। माना जाता है कि राजमाता होने के चलते उसे जियारानी भी कहा जाता है। मां के लिए जिया शब्द का प्रयोग किया जाता था। रानीबाग में जियारानी की गुफा नाम से आज भी प्रचलित है। कत्यूरी वंशज प्रतिवर्ष उनकी स्मृति में यहां पहुंचते हैं।

यहाँ जिया रानी की गुफा के बारे में एक और किवदंती प्रचलित है—————

“कहते हैं कत्यूरी राजा पृथवीपाल उर्फ़ प्रीतम देव की पत्नी रानी जिया यहाँ चित्रेश्वर महादेव के दर्शन करने आई थी। वह बहुत सुन्दर थी। जैसे ही रानी नहाने के लिए गौला नदी में पहुँची, वैसे ही मुस्लिम सेना ने घेरा डाल दिया। रानी जिया शिव भक्त और सती महिला थी।उसने अपने ईष्ट का स्मरण किया और गौला नदी के पत्थरों में ही समा गई। मुस्लिम सेना ने उन्हें बहुत ढूँढ़ा परन्तु वे कहीं नहीं मिली। कहते हैं, उन्होंने अपने आपको अपने घाघरे में छिपा लिया था। वे उस घाघरे के आकार में ही शिला बन गई थीं। गौला नदी के किनारे आज भी एक ऐसी शिला है, जिसका आकार कुमाऊँनी घाघरे के समान हैं। उस शिला पर रंग-विरंगे पत्थर ऐसे लगते हैं – मानो किसी ने रंगीन घाघरा बिछा दिया हो। वह रंगीन शिला जिया रानी के स्मृति चिन्ह माना जाता है। रानी जिया को यह स्थान बहुत प्यारा था। यहीं उसने अपना बाग लगाया था और यहीं उसने अपने जीवन की आखिरी सांस भी ली थी। वह सदा के लिए चली गई परन्तु उसने अपने सतीत्व की रक्षा की। तब से उस रानी की याद में यह स्थान रानीबाग के नाम से विख्यात है।कुमाऊं के प्रवेश द्वार काठगोदाम स्थित रानीबाग में जियारानी की गुफा का ऐतिहासिक महत्व है”””

कुमायूं के राजपूत आज भी वीरांगना जिया रानी पर बहुत गर्व करते हैं,
उनकी याद में दूर-दूर बसे उनके वंशज (कत्यूरी) प्रतिवर्ष यहां आते हैं। पूजा-अर्चना करते हैं। कड़ाके की ठंड में भी पूरी रात भक्तिमय रहता है।
महान वीरांगना सतीत्व की प्रतीक पुंडीर वंश की बेटी और कत्युरी वंश की राजमाता जिया रानी को शत शत नमन…..
जय राजपूताना……..

Posted in गौ माता - Gau maata

देसी गायीचे आजार


देसी गायीचे आजार
गलघोटू —
1) यह रोग याने मृत्यू की सूचना है I इससे गले मे सूजन हो जाती है और गोवंश का गला घुटने लगता है I यह रोग रक्तदोष से होता है I नाक, मुह से लार टपकती है I गोबर और गोमूत्र बंद हो जाता है I इस रोग पर निचे दिए गये उपाय करें I
2) दो सेर घी, एक सेर एप्सम साल्ट, एक पाव काली मिर्च, एक पाव काला जीरा मिलाकर पिला दें I
3) जमाल गोटे का तेल ३० बुंद, मिठा तेल ५ छटाक और अलसी का तेल ५ छटाक पिलावें तथा फिटकरी के पाणी से मुह धोयें I
4) गंधक का चूण २ तोले तथा सोंठ का चूर्ण १ तोला आधा सेर चावल के मांड के साथ मिलाकर खीलाना चाहीए I इससे दस्त होकर रोग मिट जायेगा I
पंचगव्य का उपयोग
1) देसी गाय के दूध में हल्दी उबालकर सेवन करने से खांसी कम होती है I
2) देसी गाय के गोबर में पटकी रोग के जंतू नष्ट करने की क्षमता है I
3) कुष्ठरोग होनेपर देसी गाय के दूध में घी डालकर पियें आराम मिलेगा I
4) वात और कफ के रोगी देसी गाय के गोमूत्र का उपयोग सिधा याने बिना पाणी मिलाए करें I
5) कंबर दुखी होनेपर ३ कप मिठ्ठी ताक में २-३ लहसुन का रस मिलाकर सेवन करें आराम मिलेगा I
आयुर्वेदिक घरगुती उपाय
1) मूळव्याध होनेपर कडूलिंब का तेल लगाने से आराम मिलता है I
2) पथरी होनेपर मूली के बीजो को शहद में मिलाकर चाटें आराम मिलेगा I
3) मूत्ररोग होनेपर हररोज दो चम्मच काले तील चबाकर खायें I
4) मूली की भाजी नीयमित खाने से मलावरोध का त्रास नहीं होता I
5) मिरगी आनेपर निंबू के रस में हिंग मिलाकर चटाने से आराम मिलता है I
भाई राजीव दिक्षीत
1) जहाँ महिलाओं की इज्जत होती है सम्मान होता है, देवता वहीं निवास करते है I
2) पुजा करने के लिए ऐसा वस्त्र होना चाहीए जो बिना सीलाया हुवा हो I इसलीए कोणसी भी पुजा धोती पहनकर ही की जाती है I
3) भारत में स्त्री का स्थान परीवार में सबसे उंचा है I
4) मनुष्य के जीवन में स्त्री आने के बाद ही मनुष्य पवीत्र होता है I
5) मोक्ष प्राप्ती स्त्री के माध्यम से ही होती है I
शेतीचे महत्त्व ::–
गांडूळ खताचे फायदे ::-
1) जमिनीची पाऊस आणी वा-यापासून होणारी धूप कमी होते.
2) जमिनीची पाणी धरुन ठेवण्याची आणी मुरण्याची क्षमता वाढते.
3) जमिनीचे आयुष्यमान वाढते व जमिनीचे प्रदुषण कमी होते.
4) यामुळे विपरीत हवामानामुळे होणारी जमिनीची आणी पिकाची हानी काही प्रमाणात टाळता येते.
5) शहर आणी औद्योगीक वसाहती, कृषी धारीत कारखाने यापासुन होणा-या प्रदुषणाला आळा बसण्यास मदत होते.
6) सर्वांचा संक्षीप्त म्हणजे जमिन पाणी आणी हवामान यांचा समतोल राखण्याच्या कामी यांचा महत्वााीचा सहभाग होऊ शकतो.
आपको कोई शारीरिक प्रोब्लेम हो तो Whats app पर कॉन्टॉक्ट करें 9922144444
www.krishnapriyagoshala.org

Krishnapriya Goshala's photo.
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Posted in जीवन चरित्र

कालिदास (375-445 ई.)


कालिदास (375-445 ई.)

http://vimisahitya.wordpress.com/
साहित्य में कालजयी रचनाएं गहन-गंभीर मानवीय अनुभवों से जन्म लेती हैं। शताब्दियों के अंतराल के बाद, नितान्त भिन्न परिस्थितियों और अवस्थाओं में भी उनमें हमें अपने अनुभवों की गूंज सुनाई देती है। श्रेष्ठ कालजयी रचनाओं में देश-काल की सीमाओं से परे गुण होते हैं। कालिदास भारत की आत्मा, सौन्दर्य और प्रतिभा के महान् प्रतिनिधि हैं। भारतीय राष्ट्रीय चेतना के मूल से उनकी कृतियों का जन्म हुआ है। कालिदास ने भारतीय सांस्कृतिक विरासत को आत्मसात किया, समृद्ध किया और फिर उन्होंने उसे सार्वभौम परिवेश और महत्त्व प्रदान किया, इसकी आध्यात्मिक दिशाओं, इसकी प्रज्ञा के आयामों, इसकी कला की अभिव्यक्तियों, इसके राजनैतिक स्वरूपों और अर्थ प्रबंधों – सभी को सद्य, सार्थक और ज्वलंत उक्तियों में अभिव्यक्ति मिली है। उनकी रचनाओं में हमें भाषा की सरलता, उक्तियों की सटीकता, शास्त्रीय अभिरूचि, सायास, औचित्य, गहन कवित्व संवेदना और भाव तथा विचारों का प्रस्फुटन दृष्टिगोचर होता है। उनके नाटकों में हमें करुणा, शक्ति, सौन्दर्य, कथा के गठन और पात्रों के चरित्र-चित्रण में अनुपम कौशल के दर्शन होते हैं। उन्हें राजदरबार तथा पर्वत-श्रृंगों, सुखी परिवारों और वन-तपोवन सभी का ज्ञान है। उनका दृष्टिकोण संतुलित है जो उन्हें उच्चवर्ग तथा निम्नवर्ग, मछुआरे, राजदरबारी, नौकर सभी का वर्णन करने में सक्षम बनाता है। ये सभी गुण उनकी रचनाओं को विश्व-साहित्य में सम्मिलित करते हैं। यद्यपि उनकी विषय-वस्तु भारतीय है तथापि उसमें संपूर्ण मानवता की संवेदना है। भारत में कालिदास संस्कृत साहित्य के महान् कवि और नाटककार माने जाते हैं। जब हम कवियों की गणना करते हैं तो कालिदास प्रथम और अन्तिम हैं क्योंकि उन जैसा दूसरा कोई आज तक पैदा नहीं हुआ। परम्परा के अनुसार कालिदास उज्जयनी के उन राजा विक्रमादित्य के समकालीन हैं जिन्होंने ईसा से 57 वर्ष पूर्व विक्रम संवत् चलाया। विक्रमोर्वशीय के नायक पुरुरवा के नाम का विक्रम में परिवर्तन से इस तर्क को बल मिलता है कि कालिदास उज्जयनी के राजा विक्रमादित्य के राजदरबारी कवि थे। अग्निमित्र, जो मालविकाग्निमित्र नाटक का नायक है, कोई सुविख्यता राजा नहीं था, इसीलिए कालिदास ने उसे विशिष्टता प्रदान नहीं की। उनका काल ईसा से दो शताब्दी पूर्व का है और विदिशा उसकी राजधानी थी। कालिदास के द्वारा इस कथा के चुनाव और मेघदूत में एक प्रसिद्ध राजा की राजधानी के रूप में उसके उल्लेख से यह निष्कर्ष निकलता है कि कालिदास अग्निमित्र के समकालीन थे। यह स्पष्ट है कि कालिदास का उत्कर्ष अग्निमित्र के बाद (150 ई.पू.) और 634 ई. पूर्व तक रहा है, जो कि प्रसिद्ध ऐहोल के शिलालेख की तिथि है, जिसमें कालिदास का महान् कवि के रूप में उल्लेख है। यदि इस मान्यता को स्वीकार कर लिया जाए कि माण्डा की कविताओं या 473 ई. के शिलालेख में कालिदास के लेखन की जानकारी का उल्लेख है, तो उनका काल चौथी शताब्दी के अन्त के बाद का नहीं हो सकता। अश्वघोष के बुद्धचरित और कालिदास की कृतियों में समानताएं हैं। यदि अश्वघोष कालिदास के ऋणी हैं तो कालिदास का काल प्रथम शताब्दी ई. से पूर्व का है और यदि कालिदास अश्वघोष के ऋणी हैं तो कालिदास का काल ईसा की प्रथम शताब्दी के बाद ठहरेगा। ऐसी मान्यता है कि कालिदास गुप्त काल के थे और वे उन चन्द्रगुप्त द्वितीय के राज्य में थे जिन्हें विक्रमादित्य’ की पदवी प्राप्त थी, वे 345 ई. में सत्ता में आए और उन्होंने 414 ई. तक शासन किया। हम कोई भी तिथि स्वीकार करें, वह हमारा उचित अनुमान भर है और इससे अधिक कुछ नहीं। चूंकि कालिदास ने अपने बारे में बहुत कम कहा है अतः उन अनेक रचनाओं के बारे में जो उनकी मानी जाती हैं, निश्चय कुछ नहीं कहा जा सकता। फिर भी, निम्नलिखित रचनाओं के संबंध में आम सहमति यह है कि वे कालिदास की हैं :
1.अभिज्ञान – शांकुतल : सात अंकों का नाटक जिसमें दुष्यन्त और शकुन्तला के प्रेम और विवाह का वर्णन है।
2.विक्रमोर्वशीय : पांच अंकों का नाटक जिसमें पुरुरवा और उर्वशी के प्रेम और विवाह का वर्णन है।
3. मालविकाग्निमित्र : पांच अंकों का नाटक जिसमें मालिविका और अग्निमित्र के प्रेम का वर्णन है।
4.रघुवंश : उन्नीस सर्गों का महाकाव्य जिसमें सूर्यवंशी राजाओं के जीवन चरित्र हैं।
5.कुमारसंभव : सत्रह सर्गों का महाकाव्य जिसमें शिव और पार्वती के विवाह और कुमार के जन्म का वर्णन है जो युद्ध के देवता हैं।
6 मेघदूत : एक सौ ग्यारह छन्दों1 की कविता जिसमें यक्ष द्वारा अपनी पत्नी को मेघ द्वारा पहुंचाए गए संदेश का वर्णन है।
7.ऋतुसंहार : इसमें ऋतुओं का वर्णन है।
1.किसी-किसी पाण्डुलिपि में अधिक छन्द भी हैं। कालिदास अपनी विषय-वस्तु देश की सांस्कृतिक विरासत से लेते हैं और उसे वे अपने उद्देश्य की प्राप्ति के अनुरूप ढाल देते हैं। उदाहरणार्थ, अभिज्ञान शाकुन्तल की कथा में शकुन्तला चतुर, सांसारिक युवा नारी है और दुष्यन्त स्वार्थी प्रेमी है। इसमें कवि तपोवन की कन्या में प्रेमभावना के प्रथम प्रस्फुटन से लेकर वियोग, कुण्ठा आदि की अवस्थाओं में से होकर उसे उसकी समग्रता तक दिखाना चाहता है। उन्हीं के शब्दों में नाटक में जीवन की विविधता होनी चाहिए और उसमें विभिन्न रुचियों के व्यक्तियों के लिए सौंदर्य और माधुर्य होना चाहिए। त्रैगुण्योद्भवम् अत्र लोक-चरितम् नानृतम् दृश्यते। नाट्यम् भिन्न-रुचेर जनस्य बहुधापि एकम् समाराधनम्।। कालिदास के जीवन के बारे में हमें विशेष जानकारी नहीं है। उनके नाम के बारे में अनेक किवदन्तियां प्रचलित हैं जिनका कोई ऐतिहासिक मूल्य नहीं है। उनकी कृतियों से यह विदित होता है कि वे ऐसे युग में रहे जिसमें वैभव और सुख-सुविधाएं थीं। संगीत तथा नृत्य और चित्र-कला से उन्हें विशेष प्रेम था। तत्कालीन ज्ञान-विज्ञान, विधि और दर्शन-तंत्र तथा संस्कारों का उन्हें विशेष ज्ञान था। उन्होंने भारत की व्यापक यात्राएं कीं और वे हिमालय से कन्याकुमारी तक देश की भौगोलिक स्थिति से पूर्णतः परिचित प्रतीत होते हैं। हिमालय के अनेक चित्रांकन जैसे विवरण और केसर की क्यारियों के चित्रण (जो कश्मीर में पैदा होती है) ऐसे हैं जैसे उनसे उनका बहुत निकट का परिचय है। जो बात यह महान कलाकार अपनी लेखिनी के स्पर्श मात्र से कह जाता है। अन्य अपने विशद वर्णन के उपरांत भी नहीं कह पाते। कम शब्दों में अधिक भाव प्रकट कर देने और कथन की स्वाभाविकता के लिए कालिदास प्रसिद्ध हैं। उनकी उक्तियों में ध्वनि और अर्थ का तादात्मय मिलता है। उनके शब्द-चित्र सौन्दर्यमय और सर्वांगीण सम्पूर्ण हैं, जैसे – एक पूर्ण गतिमान राजसी रथ1, दौड़ते हुए मृग-शावक2, उर्वशी का फूट-फूटकर आंसू बहाना3, चलायमान कल्पवृक्ष की भांति अन्तरिक्ष में नारद का प्रकट होना4, उपमा और रूपकों के प्रयोग में वे सर्वोपरि हैं। सरसिजमनुविद्धं शैवालेनापि रम्यं मलिनमपि हिमांशोर्लक्ष्म लक्ष्मीं तनोति। इयमिधकमनोज्ञा वल्कलेनापि तन्वी किमिह मधुराणां मण्डनं नाकृतीनाम्।। ‘कमल यद्यपि शिवाल में लिपटा है, फिर भी सुन्दर है। चन्द्रमा का कलंक, यद्यपि काला है, किन्तु उसकी सुन्दरता बढ़ाता है। ये जो पतली कन्या है, इसने यद्यपि वल्कल-वस्त्र धारण किए हुए हैं तथापि वह और सुन्दर दिखाई दे रही है। 1. विक्रमोर्वशीय, 1.4 2. अभिज्ञान-शाकुन्तल, 1.7 3. विक्रमोर्वशीय, छन्द 15 4. वही, छन्द 19. क्योंकि सुन्दर रूपों को क्या सुशोभित नहीं कर सकता ?’1 कालिदास की रचनाओं में सीधी उपदेशात्मक शैली नहीं है अपितु प्रीतमा पत्नी के विनम्र निवेदन सा मनुहार है। मम्मट कहते हैं : ‘कान्तासम्मिततयोपदेशायुजे।’ उच्च आदर्शों के कलात्मक प्रस्तुतीकरण से कलाकार हमें उन्हें अपनाने को विवश करता है। हमारे समक्ष जो पात्र आते हैं हम उन्हीं के अनुरूप जीवन में आचरण करने लगते हैं और इससे हमें व्यापक रूप में मानवता को समझने में सहायता मिलती है। एक महान् सांस्कृतिक विरासत पर कालिदास के समृद्ध एवं उज्जवल व्यक्तित्व की छाप है और उन्होंने अपनी रचनाओं में मोक्ष, व्यवस्था और प्रेम के आदर्शों को अभिव्यक्ति दी है। उन्होंने व्यक्ति को संसार के दु:ख-दर्द और संघर्षों से अवगत कराने के लिए, प्रेम-वासना, इच्छा-आकांक्षा, आशा-स्वप्न, सफलता विफलता आदि को अभिव्यक्ति दी है। भारत ने जीवन को अपनी समग्रता में देखा है और उसमें किसी भी विखण्डन का विरोध किया है। कवि ने उन मानसिक द्वन्द्वों का वर्णन किया है जो आत्मा को विभक्त करते हैं और इस तरह उन्होंने इसे समग्रता में देखने में हमारी सहायता की है। कालिदास की रचनाओं में हमारे लिए सौंदर्य के क्षण, साहसिक घटनाएं, त्याग के दृश्य और मानव मन की नित-नित बदलती मनः स्थितियों के रूप संरक्षित हैं। उनकी कृतियां मानव प्रारब्ध के वर्णनातीत चित्रण के लिए सदैव पढ़ी जाती रहेंगी क्योंकि कोई महान् कवि ही ऐसी प्रस्तुतियां दे सकता है। उनकी अनेक पंक्तियां संस्कृत में सूक्तियां बन गई हैं। उनकी मान्यता है कि हिमालय क्षेत्र में विकसित संस्कृति विश्व की संस्कृतियों की मापदण्ड हो सकती है। यह संस्कृति मूलतः आध्यात्मिक है। हम सभी सामान्यतः समय-चक्र में कैद हैं और इसीलिए हम अपने अस्तित्व की संकीर्ण सीमाओं में घिरे हैं। अतः हमारा उद्देश्य अपने मोहजालों से मुक्त होकर चेतना के उस सत्य को पाने का होना चाहिए जो देश-काल से परे है जो अजन्मा, चरम और कालातीत है। हम इसका चिंतन नहीं कर सकते, इसे वर्गों, आकारों और शब्दों में विभाजित नहीं कर सकते। इस चरम सत्य की अनुभूति का ज्ञान ही मानव का उद्देश्य है। रघुवंश के इन शब्दों को देखिए – ‘ब्रह्माभूयम् गतिम् अजागम्।’ ज्ञानीपुरुष कालातीत परम सत्य के जीवन को प्राप्त होते हैं। वह जो चरम सत्य है सभी अज्ञान से परे है और वह आत्मा और पदार्थ के विभाजन से ऊपर है। वह सर्वज्ञ, सर्वव्यापक और सर्वशक्तिमान है। वह अपने को तीन रूपों में व्यक्त करता है (त्रिमूर्ति) ब्रह्मा, विष्णु और शिव – कर्त्ता, पालक तथा संहारक। ये देव समाज पद वाले हैं आम जीवन में कालिदास शिवतंत्र के उपासक हैं। तीनों 1.अभिज्ञान शाकुन्तला, 1.17 नाटकों – अभिज्ञान शाकुन्तल, विक्रमोर्वशीय, मालविकाग्निमित्र – की आरम्भिक प्रार्थनाओं से प्रकट होता है कि कालिदास शिव-उपासक थे। देखिए रघुवंश के आरम्भिक श्लोक में : जगतः पितरौ वन्दे पार्वती-परमेश्वरौ। यद्यपि कालिदास परमात्मा के शिव रूप के उपासक हैं तथापि उनका दृष्टिकोण किसी भी प्रकार संकीर्ण नहीं है। परम्परागत हिन्दू धर्म के प्रति उनका दृष्टिकोण उदार है। दूसरों के विश्वासों को उन्होंने सम्मान की दृष्टि से देखा। कालिदास की सभी धर्मों के प्रति सहानुभूति है और वे दुराग्रह और धर्मान्धता से मुक्त हैं। कोई भी व्यक्ति वह मार्ग चुन सकता है जो अच्छा लगता है क्योंकि अन्ततः ईश्वर के विभिन्न रूप एक ही ईश्वर के विभिन्न रूप हैं जो सभी रूपों में निराकार है। कालिदास पुनर्जन्म के सिद्धान्त को मानते हैं। यह जीवन में पूर्णता के मार्ग की एक अवस्था है। जैसे हमारा वर्तमान जीवन पूर्व कर्मों का फल है वैसे ही हम इस जन्म में प्रयासों से अपना भविष्य सुधार सकते हैं। विश्व पर सदाचार का शासन है। विजय अन्ततः अच्छाई की होगी। यदि कालिदास की रचनाएं दुखान्त नहीं हैं तो उसका कारण यह कि वे सामंजस्य और शालीनता के अन्तिम सत्य को स्वीकारते हैं। इस मान्यता के अन्तर्गत वे अधिकांश स्त्री-पुरुषों के दुःख-दर्दों के प्रति हमारी सहानुभूति को मोड़ देते हैं। कालिदास की रचनाओं से इस गलत धारणा का निराकरण हो जाता है कि हिन्दू मस्तिष्क ने ज्ञान-ध्यान पर अधिक ध्यान दिया और सांसारिक दुःख-दर्दों की उन्होंने अवहेलना की। कालिदास के अनुभव का क्षेत्र व्यापक था। उन्होंने जीवन, लोक, चित्रों और फूलों में समान आनन्द लिया। उन्होंने मानव को सृष्टि (ब्रह्माण्ड) और धर्म की शक्तियों से अलग करके नहीं देखा। उन्हें मानव के सभी प्रकार के दुःखों, आकांक्षाओं, क्षणिक खुशियों और अन्तहीन आशाओं का ज्ञान था। वे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष – मानव जीवन के चार पुरुषार्थों में सामंजस्य के पोषक थे। अर्थ पर, जिसमें राजनीति और कला भी सम्मिलित है धर्म का शासन रहना चाहिए। साध्य और साधन में परस्पर सह-संबंध है। जीवन वैध (मान्य) संबंधों से ही जीने योग्य रहता है। इन संबंधों को स्वच्छ और उज्जवल बनाना ही कवि का उद्देश्य था। इतिहास प्राकृतिक तथ्य न होकर नैतिक सत्य है। यह काल-क्रम का लेखा-जोखा मात्र नहीं है। इसका सार अध्यात्म में निहित है जो आगे की पीढ़ियों को ज्ञान प्रदान करता है। इतिहासकारों को अज्ञान को भेद कर उस आन्तरिक नैतिक गतिशीलता को आत्मसात करना चाहिए। इतिहास मानव की नैतिक इच्छा का फल है जिसकी अभिव्यक्तियां स्वतंत्रता और सृजन हैं। रधुवंश के राजा जन्म से ही निष्कलंक थे। धरती से लेकर समुद्र तक (आसमुद्रक्षितिसानाम्) इनका व्यापक क्षेत्र में शासन था। इन्होंने धन का संग्रह दान के लिए किया, सत्य के लिए चुने हुए शब्द कहे, विजय की आकांक्षा यश के लिए की और गृहस्थ जीवन पुत्रेष्णा के लिए रखा। बचपन में शिक्षा, युवावस्था में जीवन के सुखभोग, वृद्धावस्था में आध्यात्मिक जीवन और अन्त में योग या ध्यान द्वारा शरीर का त्याग किया। राजाओं ने राजस्व की वसूली जन-कल्याण के लिए की, ‘प्रजानाम् एवं भूत्यार्थम्’ जैसे सूर्य जल लेता है और उसे सहस्रगुणा करके लौटा देता है। राजाओं का लक्ष्य धर्म और न्याय होना चाहिए। राजा ही प्रजा का सच्चा पिता है, वह उन्हें शिक्षा देता है, उनकी रक्षा करता है और उन्हें जीविका प्रदान करता है जबकि उनके माता-पिता केवल उनके भौतिक जन्म के हेतु हैं। राजा अज के राज्य में प्रत्येक व्यक्ति यही मानता था कि राजा उनका व्यक्तिगत मित्र है। शाकुन्तलं में तपस्वी राजा से कहता है : ‘आपके शस्त्र त्रस्त और पीड़ितों की रक्षा के लिए हैं न कि निर्दोषों पर प्रहार के लिए।’ ‘आर्त त्राणाय वाह शस्त्रम् न प्रहारतुम् अनगसि।’ दुष्यन्त एवं शकुन्तला का पुत्र भरत, जिसके नाम पर इस देश का नाम भारत पड़ा है, सर्वदमन भी कहलाता है – यह केवल इसलिए नहीं कि उसने केवल भयानक वन्य पशुओं पर विजयी पायी अपितु उसमें आत्मसंयम भी था। राजा के लिए आत्मसंयम भी अनिवार्य है। रघुवंश में अग्निवर्ण दुराचारी हो जाता है। उसके अन्तःपुर में इतनी अधिक नारियां हैं कि वह उनका सही नाम तक नहीं जान पाता। उसे क्षय हो जाता है और उस अवस्था में भी भोग का आनन्द नहीं छोड़ पाता और उसकी मृत्यु हो जाती है। शालीन मानव-जीवन के लिए संयम अनिवार्य है। कालिदास कहते है : ‘हे कल्याणी, खान से निकलने के उपरांत भी कोई भी रत्न स्वर्ण में नहीं जड़ा जाता, जब तक उसे तराशा नहीं जाता।’ यद्यपि कालिदास की कृतियों में तप को भव्यता प्रदान की गई है और साधु और तपस्वियों को पूजनीय रूप में प्रस्तुत किया गया है, तथापि कहीं भी भिक्षापात्र की सराहना नहीं की गई। धर्म के नियम जड़ एवं अपरिवर्तनीय नहीं हैं। परम्परा को अपनी अन्तर्दृष्टि और ज्ञान से सही अर्थ दिया जाना चाहिए। परम्परा और व्यक्तिगत अनुभव एक-दूसरे के पूरक हैं। जहां हमें एक ओर अतीत विरासत में मिला है वहीं हम दूसरी ओर भविष्य के न्यासधारी (ट्रस्टी) हैं। अपने अन्तिम विश्लेषण में प्रत्येक को सही आचरण के लिए अपने अन्तःकरण में झांकना चाहिए। भगवतगीता के आरम्भिक अध्याय में जब अर्जुन क्षत्रिय होने के नाते समाज द्वारा आरोपित युद्ध करने के अपने दायित्व से मना करते हैं और जब सुकरात कहते हैं, ‘एथेंसवासियों ! मैं ईश्वर की आज्ञा का पालन करूंगा, तुम्हारी आज्ञा का नहीं।’ तो वे ऐसा अपनी अर्न्तात्मा के निर्देश पर कहते हैं न कि किसी बंधे-बंधाए नियमों के अनुपालन के कारण। आरम्भिक वैदिक साहित्य में जड़-चेतन की एकरूपता का निरूपण है और अनेक वैदिक देवी-देवता प्रकृति के प्रमुख पक्षों का प्रतिनिधित्व करते हैं। आत्मज्ञान की खोज में प्रकृति की शरण में जाने, हिमश्रृंगों पर जाने या तपोवन में जाने का शिकार बहुत प्राचीन काल से हमारे यहां विद्यमान रहा है। मानव के रूप में हमारी जड़े प्रकृति में हैं और हम नाना रुपों में इसे जीवन में देखते हैं। रात और दिन, ऋतु-परिवर्तन – ये सब मानव-मन के परिवर्तन, विविधता और चंचलता के प्रतीक हैं। कालिदास के लिए प्रकृति यन्त्रवत और निर्जीव नहीं है। इसमें एक संगीत है। कालिदास के पात्र पेड़-पौधों, पर्वतों तथा नदियों के प्रति संवेदनशील हैं और पशुओं के प्रति उनमें भ्रात भावना है। हमें उनकी कृतियों में खिले हुए फूल, उड़ते पक्षी और उछलते-कूदते पशुओं के वर्मन दिखाई देते हैं। रघुवंश में हमें गाय के प्रेम का अनुपम वर्णन मिलता है। ऋतुसंहार में षट ऋतुओं का हृदयस्पर्शी विवरण है। ये विवरण केवल कालिदास के प्राकृतिक-सौन्दर्य के प्रति उनकी दृष्टि को नहीं अपितु मानव-मन के विविध रूपों और आकांक्षाओं की समझ को भी प्रकट करते हैं। कालिदास के लिए नदियों, पर्वतों, वन-वृक्षों में चेतन व्यक्तित्व है जैसा कि पशुओं और देवों में है। शाकुन्तला प्रकृति की कन्या है। जब उसे उसकी अमानुषी मां मेनका ने त्याग दिया तो आकाशगामी पक्षियों ने उसे उठाया और तब तक उसका पालन-पोषण किया जब तक कि कण्ठ ऋषि आश्रम में उसे नहीं ले गए। शकुन्तला ने पौधों को सींचा, उन्हें अपने साथ-साथ बढ़ते देखा और जब उनके ऊपर फल-फूल आए तो ऐसे अवसरों को उसने उत्सवों की भांति मनाया। शाकुन्तला के विवाह के अवसर पर वृक्षों ने उपहार दिए, वनदेवियों ने पुष्प-वर्षा की, कोयलों ने प्रसन्नता के गीत गाए। शकुंतला की विदाई के समय आश्रम दुःख से भर उठा। मृगों के मुख से चारा छूट कर गिर पड़ा, मयूरों का नृत्य रुक गया और लताओं ने अपने पत्रों के रूप में अश्रु गिराए। सीता के परित्याग के समय मयूरों ने अपना नृत्य एकदम बन्द कर दिया, वृक्षों ने अपने पुष्प झाड़ दिए और मृगियों ने आधे चबाए हुए दूर्वादलों को मुंह से गिरा दिया। कालिदास कोई विषय चुनते हैं और आँख में उसका एक सजीव चित्र उतार लेते हैं। मानस-चित्रों की रचना में वे बेजोड़ हैं। कालिदास का प्रकृति का ज्ञान यथार्थ ही नहीं था अपितु सहानुभूति भी था। उनकी दृष्टि कल्पना से संयुक्त है। कोई भी व्यक्ति तब तक पूर्णतः महिमामण्डित नहीं हो सकता जब तक कि वह मानव जीवन से इतर जीवन की महिमा और मूल्यों को नहीं जानता। हमें जीवन के समग्र रूपों के प्रति संवेदना विकसित करनी चाहिए। सृष्टि केवल मनुष्य के लिए नहीं रची गई है। पुरुष और नारी के प्रेम ने कालिदास को आकर्षित किया और प्रेम के विविध रूपों के चित्रण में उन्होंने अपनी समृद्ध कल्पना का खुलकर उपयोग किया है। इसमें उनकी कोई सीमाएं नहीं हैं। उनकी नारियों में पुरुषों की अपेक्षा अधिक आकर्षण है क्योंकि उनमें कालातीत और सार्वभौम गुण हैं जबकि पुरुष पात्र संवेदना शून्य और अस्थिर बुद्धि हैं। उनकी संवेदना सतही है जबकि नारी का दुःख-दर्द अन्तरतम का है। पुरुष में स्पर्धा की भावना और स्वाभिमान उसके कार्यालय, कारखाने या रणक्षेत्र में उपयोगी हो सकते हैं पर उनकी तुलना नारी के सुसंस्कार, सौन्दर्य और शालीनता के गुणों से नहीं हो सकती। अपने व्यवस्था और सामंजस्य के प्रेम के कारण नारी परम्परा (संस्कृति) को जीवित रखती है। जब कासिदास नारी के सौन्दर्य का वर्णन करते हैं तो वे शास्त्रीय शैली को अपनाते हैं और ऐसा करते समय वे अपने विवरणों के वासनाजन्य होने या अतिविस्तृत हो जाने का खतरा मोल लेते हैं। मेघदूत में ‘मेघ’ को ‘यक्ष’ अपनी पत्नी का विवरण (हुलिया) इस प्रकार देता है : ‘नारियों में वह ऐसी है मानो विधाता ने उसका रचना सर्वप्रथम की है, पतली और गोरी है, दांत पतले और सुन्दर हैं। नीचे के ओष्ठ पके बिम्ब फल (कुंदरू) की भांति लाल है। कमर पतली है। आँखें उसकी चकित हिरणी जैसी हैं। नाभि गहरी है तथा चाल उसकी नितम्बभार से मन्द और स्तनभार से आगे की ओर झुकी हुई है।’ कालिदास द्वारा प्रस्तुत की गई नारियों में हमें अनेक रोचक प्रकार दिखाई देते हैं। उनमें से अनेक को समाज के परम्परागत बहानों और सफाई की आवश्यकता नहीं है। उनके द्वन्द्व और तनावों को सामंजस्य की आवश्यकता थी। पुरुष संदेहमुक्त अनुभव करते थे और वे पूर्ण सुरक्षित थे। बहुविवाह उनके लिए आम बात थी, परन्तु कालिदास की नारियां कल्पनाशील और चतुर हैं अतः वे संदेह और अनिश्चय के घेरे में आ जाती हैं। वे सामान्यतः अस्थिर नहीं हैं परन्तु वे विश्वसनीय, निष्ठावान तथा प्रेममय हैं। प्रेम के लिए झेली गई कठिनाइयां और यातनाएं प्रेम को और गहन बनाती हैं। मेघदूत में अजविलाप और रतिविलाप में वियोग की करुणामय मार्मिक अभिव्यक्ति है। प्रेम का संयोग रूप विक्रमोर्वशीय में है। मालविकाग्निमित्र में रानी को धरिणी कहा गया है क्योंकि वह सब कुछ सहती है। उसमें गरिमा और सहिष्णुता है। इरावती कामुक, अविवेकी, शंकालु, अतृप्त और मनमानी करने वाली है। जब राजा ने उसे छोड़कर मालविका को अपनाया तो वह कठोर शब्दों में शिकायत करती है और कटु शब्दों में राजा को फटकारती है। मालविका के प्रति अग्निमित्र का प्रेम इन्द्रिपरक है। राजा दासी की सुन्दरता और लावण्य पर मोहित है। विक्रमोर्वशीय में पात्रों में दैवी और मानवीय गुणों का मिश्रण है। उर्वशी का चरित्र सामान्य जीवन से हटकर है। उसमें इतनी शक्ति है कि अदृश्य रूप से वह अपने प्रेमी को देख सकती है तथा उसकी बातें सुन सकती है। उसमें मातृप्रेम नहीं है क्योंकि वह अपने पति को खोने के स्थान पर अपने बच्चे का परित्याग कर देती है। उसका प्रेम स्वार्थजन्य है। पुरुरवा भावविह्वल होकर प्रेम के गीत गाता है जिसका भावार्थ यह है कि विश्व की सत्ता उतनी आनन्ददायक नहीं जितना प्रेम आनन्ददायक है। विफल प्रेमी के लिए संसार दुःख और निराशा से भरा है और सफल प्रेमी के लिए वह सुख और आनन्द से भरा है। इस नाटक में हम प्रेम को फलीभूत होते देखते हैं। इसमें भूमि और आकाश एक होते हैं। भौतिक आकर्षण पर आधारित वासना नैतिक सौन्दर्य और आध्यात्मिक ज्ञान में परिवर्तित होती है।

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कालिदास की जन्मभुमी


कालिदास की जन्मभुमी

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कालिदास की जन्मभुमी तथा समय कॆ सम्बन्ध मॆ भी विद्वानॊ का बहुत बड़ा मतभॆद है | बंगदॆशीय विद्वान इन्हॆ बंगाली मानतॆ है और नवद्वीप कॊ इनकी जन्मभुमी बतलातॆ है | बहुत विद्वान कहतॆ है कि इनकी जन्म काश्मीर है क्यॊकी इन्हॊनॆ हिमालय का जैसा सुन्दर वर्णन किया है वैसा दुसरॆ का नही | कुछ लॊग इन्हॆ पंजाबी ,कुछ लॊग मालवीय मानतॆ है | किन्तु विशिष्ट विद्वान इन्हॆ उज्जयिनीनिवासी कहतॆ है ,क्यॊकी इन्हॊनॆ अपनॆ काव्यॊ मॆ उज्जयिनी कॆ लिए विशेष पक्षपात दिखलाया है जिससॆ इनकी जन्मभुमी उज्ज्यिनी मालुम पड़ती है | इनकॆ मॆधदुत मॆ कान्ताविरही यक्ष रामगिरि सॆ सीधॆ उत्तर अलकापुरी जानॆ वालॆ मॆघ कॆ लिए रास्ता टॆडा हॊनॆ पर भी सकलसम्पत् सम्पन्न उज्जयिनी कॊ दॆखनॆ कॆ लिए मॆघ आग्रह करतॆ हुए कहा है कि यदि तुम उज्जयिनी कॆ विशाल महलॊ और मूगाक्षी रमणियॊ कॆ कुटील कटाक्षॊ कॊ दॆखनॆ सॆ वच्चित रह गयॆ तॊ हमार जिवन ही निष्फल है |
मॆघदुत मॆ कालिदास नॆ उज्जयिनी प्रदॆश की भौगॊलिक स्थिति का जैसा सूक्ष्म करतॆ हुए छॊटी सॆ छॊटी नदियॊ का भी नाम निर्दॆश किया है और उनका जमकर वर्णन किया है | इस प्रकार उज्जयिनी कॆ प्रति विशॆष पक्षपात पूर्ण वर्णन तथा भौगॊलिक परिचय कॆ आघार पर यही कहा जा सकता है कि कालिदास उज्जयिनी कॆ ही निवासी थॆ | पर्वतॊ मॆ हिमालय , नगरियॊ मॆ उज्जयिनी ,दॆवाताऒ मॆ शिव ,अलंकारॊ मॆ उपमा और छन्दॊ मॆ मन्दाक्रान्ता , कालिदास कॊ परमप्रिय थॆ | जिसका पत्ता मॆघदुत ,रघुवंश मॆ रघु का दिग्विजय और इन्दुमती कॆ स्वयम्बर मॆ दॆश दॆश कॆ राजाऒ कॆ वर्णन सॆ स्पष्ट मालुम पड़ता है | कुमारसम्भव ,मॆघदुत और शकुन्तला कॆ वर्णन सॆ स्पष्ट है कि इन्हॆ हिमालय तथा उत्तर भारत जितना प्रिय था उतना विङ्ह्य तथा दक्षिण भारत नही | कालिदास सॆ संवधित कुछ पुरातत्व मिथिला कॆ उच्चैठ मॆं भी मिलॆ जिसकॆ आधार पर माना जाता है की कालिदास मिथिला कॆ थॆ | वैसॆ प्राचिन काल कॆ कुछ लॆखकॊ का मानना है की कालिदास एक नाम कॆ कई व्यक्ति थॆ |

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गोत्र


गोत्र —-

यह लेख उन लोगों के लिये है । जो गोत्र प्रणाली को बकवास कहते है । गोत्र शब्द का अर्थ होता है – वंश । कुल
गोत्र प्रणाली का मुख्य उद्देश्य किसी व्यक्ति को उसके मूल प्राचीनतम व्यक्ति से जोड़ना है । उदाहरण के लिए यदि कोई व्यक्ति कहे कि उसका गोत्र भारद्वाज है तो इसका अभिप्राय यह है कि उसकी पीडी वैदिक ऋषि भारद्वाज से प्रारंभ होती है या ऐसा समझ लीजिये कि वह व्यक्ति ऋषि भारद्वाज की पीढ़ी में जन्मा है । इस प्रकार गोत्र 1 व्यक्ति के पुरुष वंश में मूल प्राचीनतम व्यक्ति को दर्शाता है ।
ब्राह्मण स्वयं को निम्न 8 ऋषियों ( सप्त ऋषि + अगस्त्य ) का वंशज मानते हैं – जमदग्नि । अत्रि । गौतम । कश्यप । वशिष्ठ । विश्वामित्र । भारद्वाज । अगस्त्य ।
उपरोक्त 8 ऋषि मुख्य गोत्रदायक ऋषि कहलाते है । तथा इसके पश्चात जितने भी अन्य गोत्र अस्तित्व में आये हैं । वो इन्ही 8 में से 1 से फलित हुए हैं और स्वयं के नाम से गौत्र स्थापित किया । उदाहरण माने कि अंगिरा की 8वीं पीडी में कोई ऋषि क हुए तो परिस्थितियों के अनुसार उनके नाम से गोत्र चल पड़ा और इनके वंशज क गौत्र कहलाये । किन्तु क गौत्र स्वयं अंगिरा से उत्पन्न हुआ है ।
इस प्रकार अब तक कई गोत्र अस्तित्व में है । किन्तु सभी का मुख्य गोत्र 8 मुख्य गोत्रदायक ऋषियों में से ही है ।
गोत्र प्रणाली में पुत्र का महत्व – जैसा कि हम देख चुके हैं । गोत्र द्वारा पुत्र व उस वंश की पहचान होती है । यह गोत्र पिता से स्वतः ही पुत्र को प्राप्त होता है । परन्तु पिता का गोत्र पुत्री को प्राप्त नही होता । उदाहरण माने कि 1 व्यक्ति का गोत्र अंगिरा है और उसका 1 पुत्र है और यह पुत्र 1 कन्या से विवाह करता है । जिसका पिता कश्यप गोत्र से है । तब लड़की का गोत्र स्वतः ही गोत्र अंगिरा में परिवर्तित हो जायेगा । जबकि कन्या का पिता कश्यप गोत्र से था ।

इस प्रकार पुरुष का गोत्र अपने पिता का ही रहता है और स्त्री का पति के अनुसार होता है । न कि पिता के अनुसार । यह हम अपने दैनिक जीवन में देखते ही हैं । कोई नई बात नहीं !
परन्तु ऐसा क्यों ? पुत्र का गोत्र महत्वपूर्ण और पुत्री का नहीं । क्या ये कोई अन्याय है ? बिलकुल नहीं ।
देखें । कैसे – गुण सूत्र और जीन
गुण सूत्र का अर्थ है – वह सूत्र जैसी संरचना । जो सन्तति में माता पिता के गुण पहुँचाने का कार्य करती है ।
हमने 10वीं कक्षा में भी पढ़ा था कि मनुष्य में 2 3 जोड़े गुण सूत्र होते हैं । प्रत्येक जोड़े में 1 गुण सूत्र माता से । तथा 1 गुण सूत्र पिता से आता है । इस प्रकार प्रत्येक कोशिका में कुल 4 6 गुण सूत्र होते हैं । जिसमें 2 3 माता से व 2 3 पिता से आते हैं ।
जैसा कि कुल जोड़े 2 3 हैं । इन 2 3 में से 1 जोड़ा लिंग गुण सूत्र कहलाता है । यह होने वाली संतान का लिंग निर्धारण करता है अर्थात पुत्र होगा अथवा पुत्री ?
यदि इस 1 जोड़े में गुण सूत्र xx हो तो सन्तति पुत्री होगी और यदि xy हो । तो पुत्र होगा । परन्तु दोनों में x समान है । जो माता द्वारा मिलता है और शेष रहा । वो पिता से मिलता है । अब यदि पिता से प्राप्त गुणसूत्र x हो तो xx मिलकर स्त्री लिंग निर्धारित करेंगे और यदि पिता से प्राप्त y हो तो पुल्लिंग निर्धारित करेंगे । इस प्रकार x पुत्री के लिए व y पुत्र के लिए होता है । इस प्रकार पुत्र व पुत्री का उत्पन्न होना पूर्णतया पिता से प्राप्त होने वाले x अथवा y गुण सूत्र पर निर्भर होता है । माता पर नहीं ।
अब यहाँ में मुद्दे से हटकर 1 बात और बता दूँ कि जैसा कि हम जानते हैं कि पुत्र की चाह रखने वाले परिवार पुत्री उत्पन्न हो जाये तो दोष बेचारी स्त्री को देते हैं । जबकि अनुवांशिक विज्ञान के अनुसार पुत्र व पुत्री का उत्पन्न होना पूर्णतया पिता से प्राप्त होने वाले x अथवा y गुण सूत्र पर निर्भर होता है । न कि माता पर । फिर भी दोष का ठीकरा स्त्री के माथे मढ दिया जाता है । ये है मूर्खता ।
अब 1 बात ध्यान दें कि स्त्री में गुण सूत्र xx होते हैं और पुरुष में xy होते हैं । इनकी सन्तति में माना कि पुत्र हुआ ( xy गुण सूत्र ) इस पुत्र में y गुण सूत्र पिता से ही आया । यह तो निश्चित ही है क्योंकि माता में तो y गुण सूत्र होता ही नहीं और यदि पुत्री हुई तो ( xx गुण सूत्र ) यह गुण सूत्र पुत्री में माता व पिता दोनों से आते हैं ।
1 – xx गुण सूत्र – xx गुण सूत्र अर्थात पुत्री xx गुण सूत्र के जोड़े में 1 x गुण सूत्र पिता से तथा दूसरा x गुण सूत्र माता से आता है तथा इन दोनों गुण सूत्रों का संयोग 1 गांठ सी रचना बना लेता है जिसे Cross over कहा जाता है ।
2 – xy गुण सूत्र – xy गुण सूत्र अर्थात पुत्र । पुत्र में y गुण सूत्र केवल पिता से ही आना संभव है क्योंकि माता में y गुण सूत्र है ही नहीं । और दोनों गुण सूत्र असमान होने के कारण पूर्ण Crossover नहीं होता । केवल 5% तक ही होता है । और 95% y गुण सूत्र ज्यों का त्यों intact ही रहता है ।
तो महत्त्वपूर्ण y गुण सूत्र हुआ । क्योंकि y गुण सूत्र के विषय में हम निश्चित हैं कि यह पुत्र में केवल पिता से ही आया है ।
बस इसी y गुण सूत्र का पता लगाना ही गोत्र प्रणाली का एकमात्र उदेश्य है । जो हजारों लाखों वर्षों पूर्व हमारे ऋषियों ने जान लिया था ।
अब तक हम यह समझ चुके हैं कि वैदिक गोत्र प्रणाली य गुण सूत्र पर आधारित है । अथवा y गुण सूत्र को ट्रेस करने का 1 माध्यम है ।
उदाहरण के लिए यदि किसी व्यक्ति का गोत्र कश्यप है । तो उस व्यक्ति में विद्यमान y गुण सूत्र कश्यप ऋषि से आया है । या कश्यप ऋषि उस y गुण सूत्र के मूल हैं ।
चूँकि y गुण सूत्र स्त्रियों में नहीं होता । यही कारण है कि विवाह के पश्चात स्त्रियों को उसके पति के गोत्र से जोड़ दिया जाता है ।

वैदिक हिन्दू संस्कृति में 1 ही गोत्र में विवाह वर्जित होने का मुख्य कारण यह है कि 1 ही गोत्र से होने के कारण वह पुरुष व स्त्री भाई बहिन कहलाये । क्योंकि उनका पूर्वज 1 ही है ।
परन्तु ये थोड़ी अजीब बात नहीं कि जिन स्त्री व पुरुष ने एक दूसरे को कभी देखा तक नहीं । और दोनों अलग अलग देशों में परन्तु 1 ही गोत्र में जन्में । तो वे भाई बहिन हो गये ?
इसका 1 मुख्य कारण 1 ही गोत्र होने के कारण गुण सूत्रों में समानता का भी है । आज की आनुवंशिक विज्ञान के अनुसार यदि समान गुण सूत्रों वाले 2 व्यक्तियों में विवाह हो । तो उनकी सन्तति आनुवंशिक विकारों का साथ उत्पन्न होगी ।
ऐसे दंपत्तियों की संतान में 1 सी विचारधारा, पसंद, व्यवहार आदि में कोई नयापन नहीं होता । ऐसे बच्चों में रचनात्मकता का अभाव होता है । विज्ञान द्वारा भी इस संबंध में यही बात कही गई है कि सगौत्र शादी करने पर अधिकांश ऐसे दंपत्ति की संतानों में अनुवांशिक दोष अर्थात मानसिक विकलांगता, अपंगता, गंभीर रोग आदि जन्मजात ही पाए जाते हैं । शास्त्रों के अनुसार इन्हीं कारणों से सगौत्र विवाह पर प्रतिबंध लगाया था ।

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

यह एक डरावनी कहानी है, कमजोर दिल वाले इसे ना पढ़ें।


यह एक डरावनी कहानी है, कमजोर दिल वाले इसे ना पढ़ें।

बरसात की एक रात में एक बूढ़ा आदमी हाथ में एक किताब बेचने के लिए खड़ा था। एक आदमी आया और उसने वो किताब 3000 रूपए में खरीद ली।

बूढ़े आदमी ने किताब दे कर कहा, “जब तक कोई मुसीबत ना आए, किताब का आखिरी पन्ना मत देखना।”

आदमी ने किताब पूरी पढ़ ली। लेकिन डर के कारण आखिरी पन्ना नहीं खोला। एक दिन उससे रहा नहीं गया और आखिरी पन्ना खोल के देख ही लिया और सदमें से मर गया।



















पन्ने पर लिखा था ‘मूल्य सिर्फ 70 रूपए’!

Posted in गंगा माँ

Ganga safai


Inspiration
Conviction
Dedication
Progress
Success.....!!!
Sandeep Mukherjee added 5 new photos.

Dear Friends,
As it is known to you that Sunbeam Schools Group, Varanasi has adopted Assi Ghat and has taken a vow to bring the Ghat back to its original heritage status.
Keeping our vow, with cooperation of you all, in last 2.5 months we have removed all the soil and silt and other garbage that had become rock solid on the Ghat over last 20-25 years..!!!
With the help of machines and human effort, by strong conviction to the pious cause, we have been successful in our mission so far.
Tomorrow, 30th of November, 2014, by 11am, we wish to dedicate the renewed and renovated Ghat to the citizens of Kashi…!
Hundreds of students from all schools of Sunbeam will be reaching the Ghat for ‘kar seva’ to remove the last patch of silts from the last platform of the Ghat. We will place lots of dustbins, beutifully colored iron benches and some traditional chowkis at the Ghat for use of common public.
It is sure that all the thousands of foreign tourists and visitors from all over the country, who visit the Ghat throughout the year, will go back with a beutiful and clean impression of the Ghat now !
Your presence / participation in the event will certainly inspire others to keep Kashi clean forever !
Regards.

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गंगा मां आरती


गंगा मां आरती

देवि सुरेश्वरि भगति गंगे त्रिभुवनतारिणि तरलतरंगे ।
शंकरमौलिविहारिणि विमले मम मतिरास्तां तव पदकमले ।।1।।

भागीरथि सुखदायिनि मातस्तव जलमहिमा निगमे ख्यात: ।
नाहं जाने तव महिमानं पाहि कृपामयि मामज्ञानम ।।2।।

हरिपदपाद्यतरंगिणि गंगे हिमविधुमुक्ताधवलतरंगे ।
दूरीकुरू मम दुष्कृतिभारं कुरु कृपया भवसागरपारम ।।3।।

तव जलममलं येन निपीतं परमपदं खलु तेन गृहीतम ।
मातर्गंगे त्वयि यो भक्त: किल तं द्रष्टुं न यम: शक्त: ।।4।।

पतितोद्धारिणि जाह्रवि गंगे खण्डितगिरिवरमण्डितभंगे ।
भीष्मजननि हेमुनिवरकन्ये पतितनिवारिणि त्रिभुवनधन्ये ।।5।।

कल्पलतामिव फलदां लोके प्रणमति यस्त्वां न पतति शोके ।
पारावारविहारिणि गंगे विमुखयुवतिकृततरलापांगे ।।6।।

तव चेन्मात: स्रोत: स्नात: पुनरपि जठरे सोsपि न जात: ।
नरकनिवारिणि जाह्रवि गंगे कलुषविनाशिनि महिमोत्तुंगे ।।7।।

पुनरसदड़्गे पुण्यतरंगे जय जय जाह्रवि करूणापाड़्गे ।
इन्द्रमुकुट मणिराजितचरणे सुखदे शुभदे भृत्यशरण्ये ।।8।।

रोगं शोकं तापं पापं हर मे भगवति कुमतिकलापम ।
त्रिभुवनसारे वसुधाहारे त्वमसि गतिर्मम खलु संसारे ।।9।।

अलकानन्दे परमानन्दे कुरु करुणामयि कातरवन्द्ये ।
तव तटनिकटे यस्य निवास: खलु वैकुण्ठे तस्य निवास: ।।10।।

वरमिह: नीरे कमठो मीन: कि वा तीरे शरट: क्षीण: ।
अथवा श्वपचो मलिनो दीनस्तव न हि दूरे नृपतिकुलीन: ।।11।।

भो भुवनेश्वरि पुण्ये धन्ये देवि द्रवमयि मुनिवरकन्ये ।
गंगास्तवमिमममलं नित्यं पठति नरो य: सजयति सत्यम ।।12।।

येषां ह्रदये गंगाभक्तिस्तेषां भवति सदा सुख मुक्ति: ।
मधुराकान्तापंझटिकाभि: परमानन्द कलितललिताभि:

गंगास्तोत्रमिदं भवसारं वांछितफलदं विमलं सारम ।
शंकरसेवकशंकरचितं पठति सुखी स्तव इति च समाप्त: ।।

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गंगा


गंगा
डा सुधेश

उसे बहते हो गईं सैंकड़ों सदी है
बहे जिस में सभी पुण्य सारी बदी है
जीवनदायिनी जो है भारतभूमि हित
गंगा नदी का नाम न केवल नदी है ।
इस के किनारे पले कितने शहर ग़ाम
बसे कितने तीर्थ हैं कितने पुण्य धाम
चिता की राख पड़ती है गंगा घाट पर
आत्माएँ पहुँचती यहीं से स्वर्ग धाम ।
कोई धनी हो या रंक हो नंगा
गंगा में नहा कर मन हुआ चंगा
हम अभागे रख न पाए इसे शुद्ध
सब के पाप धोती जा रही गंगा ।
ग़रीबों के लिए कठौती में बसी गंगा
करोड़ों हित स्वर्ग की नसैनी यही गंगा
पुण्यजल में स्नान करने चले आते सदा
करोड़ों जनों की आस्था का केन्द गंगा ।

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गंगा का उद्गम


गंगा का उद्गम

भगवान राम के कुल में राजा हुए हैं, सगर, राम से बहुत पहले। वह बड़े वीर थे। बड़े साहसी थे। उनका दबदबा चारों ओर फैला हुआ था। राज जब बहुत दूर-दूर तक फैल गया तो राजा ने यज्ञ किया।

पुराने समय में अश्वमेध यज्ञ का रिवाज था। इस यज्ञ में होता यह था कि एक घोड़ा पूजा करके छोड़ दिया जाता। घोड़ा जिधर मरजी हो, जाता। उसके पीछे राजा की सेना रहती। अगर किसी ने उस घोड़े को पकड लिया तो सेना उसे छुड़ा लेती। जब घोड़ा चारों ओर घूमकर वापस आ जाता तो यज्ञ किया जाता और वह राजा चक्रवर्ती माना जाता।

राजा सगर इसी प्रकार का यज्ञ कर रहे थे। भारतवर्ष के सारे राजा सगर को चक्रवर्ती मानते थे, पर देवों के राजा इंद्र को सगर की बढ़ती देखकर बड़ी जलन होती थी। जब उसे मालूम हुआ कि सगर अश्वमेध यज्ञ करने जा रहे हैं तो वह चुपके से सगर के पूजा करके छोड़े हुए घोड़े को चुरा ले गया और बहुत दूर कपिल मुनि की गुफा में जाकर बांध दिया।

दूसरे दिन जब घोड़े को छोड़ने की घड़ी पास आई तो पता चला कि अश्वशाला में घोड़ा नहीं है। सबके चेहरे उतर गये। यज्ञ-भूमि में शोक छा गया।

पहरेदारों ने खोजा, सिपाहियों ने खोजा, उनके अफसरों ने खोजा, पास खोजा और दूर खोजा पर घोड़ा न मिला तो महाराज के पास समाचार पहुंचा। महाराज ने सुना और सोच में पड़ गये। रातोंरात घोड़े को इतनी दूर निकाल ले जाना मामूली चोर का काम नहीं हो सकता था।

राजा सगर की बड़ी रानी का एक बेटा था। उनका नाम था असमंजस। असमंजस बालकों को दुखी करता था और उनको मार डालता था। सगर ने लोगों की की पुकार सुनी और अपने बेटे असमंजस को देश से निकाल दिया। असमंजस का पुत्र था अंशुमान।

राजा सगर की छोटी रानियों के बहुत से बेटे थे। कहा जाता है कि ये साठ हजार थे। सगर के ये पुत्र बहुत बलवान थे, बहुत चतुर थे और तरह-तरह की विद्याओं को जानने वाले थे। जो चाहते थे, कर सकते थे।

जब सिपाही घोड़े का पता लगाकार हार गये तो महाराज ने अपने साठ हजार पुत्रों को बुलाया और कहा, “पुत्रो चोर ने सूर्यवंश का अपमान किया है। तुम सब जाओ और घोड़े का पता लगाओ।”

राजकुमारों ने घोड़े को खोजना शुरु किया। उसे झोंपड़ियों में खोजा, महलों में खोजा, खेड़ों में खोजा, नगलों में खोजा, गांवों और कस्बों में खोजा, नगरों और राजधानियों में खोजा। साधुओं के आश्रमों में गये, तपोवनों में गये और योगियों की गुफाओं में पहुंचे। पर्वतों के बरफीले सफेद शिखरों पर पहुंचे और नीचे उतर आये। वन-वन घूमे, पर यज्ञ का घोड़ाउनको कहीं नहीं दिखाई दिया।

खोजते-खोजते वे धरती के छोर तक जा पहुंचे। अब आगे समुद्र था। पर राजकुमार घबराये नहीं। वे पानी में उतर गये। डुबकी लगाकर वे किनारे गुफाओं में देख आये। तैरकर वे दूर-दूर वे दूर-दूर तक की खबर ले आये। जहां उनको गुफा का संदेह हुआ वहां खोद-खोदकर देखा। पर घोड़ा वहां भी नहीं मिला। चूंकि सगर के पुत्रों ने समुद्र की इतनी खोजबीन की, इसलिए समुद्र ‘सागर’ भी कहलाने लगा।

घोड़ा नहीं मिला, फिर भी राजकुमार हारे नहीं। खोजने की धुन में लगे रहे। वे बंगाल के किनारे सागर से निकले और फिर थल पर खोजना शुरु किया।

वे आगे बढ़ रहे थे कि हवा चल पड़ी। एक लता हिली और वे ठिठक गये। लता के पीछे कुछ था, जिसने उनको रोक लिया। लता हटाई। एक शिला दिखाई पड़ी। शिला को परखा गया। मालूम हुआ कि उसे किसी ने ने वहां जमा दिया है। शिला हटाई जाने लगी। देखते-देखते शिला के पीछे एक गुफा का मुंह निकल आया। राजकुमार गुफा में घुस गये। थोड़ी दूर अंधेरे में चले और पिर उजाले में आ पहुंचे। यहां जो देखा तो चकित हो गये।

उन्होंने देखा कि एक बहुत पुराना पेड़ है। उसके नीचे एक दुबला-पतला ऋषि बैठा है। वह अपनी समाधि में लीन मालूम होता है। ऋषि के पीछे कुछ दूर पर एक और पेड़ है। उसके तने से एक घोड़ा बंधा है। कुछ राजकुमार दोड़कर घोड़े के पास गये। घोड़ा पहचान लिया गया। यह वही घोड़ा था। घोड़े को पाया, ऋषि को देखा, तो उनका क्रोध भड़क उठा।

राजकुमारों ने बहुत शोर मचाया। उनमें से एक ऋषि को खींच लेने के लिए आगे बढ़ गया। उसने अपना हाथ बढ़ाया। उसका हाथ ऋषि के शरीर पर पड़ा कि ऋषि की देह कांपी और वह समाधि से जागे।

उनकी आंखें खुलीं। उनकी आंखों में तेज भरा था। वह तेज राजकुमारों के ऊपर पड़ा तो गजब हो गया। महाबलवान राजकुमार भकभकाकर जल उठे। जब ऋषि की आंखें पूरी तरह से खुलीं तो उन्होंने अपने सामने बहुत सी राख की ढेरियां पड़ी पाई। ये राख की ढेरियां साठ हजार थी।

साठ हजार राजकुमारों को गये बहुत दिन हो गये। उनकी कोई खबर न मिली। राजा सगर की चिंता बढ़ने लगी। तभी एक दूत ने आकर बताया कि बंगाल से कुछ मछुवे आये हैं, उनसे मैंने अभी-अभी सुना है कि उन्होंने राजकुमारों को एक गुफा में घुसते देखा और वे अभी तक उस गुफा से निकलकर नहीं आये।

सगर सोच में पड़ गये। हो न हो, राजकुमार किसी बड़ी मुसीबत में फंस गये हैं। उनको विपत से उबारने का उपाय करना चाहिए। राजा ने ऊंच-नीच सोची, आगा-पीछा सोचा और अपने पोते अंशुमान को बुलाया।

अंशुमान के आने पर सगर ने उसका माथा चूमकर उसे छाती से लगा लिया और पिर कहा, “बेटा, तुम्हारे साठ हजार चाचा बंगाल में सागर के किनारे एक गुफा में घुसते हुए देखे गये हैं, पर उसमें से निकलते हुए उनको अभी तक किसी ने नहीं देखा है।”

अंशुमान का चेहरा खिल उठा। वह बोला, ” बस! यही समाचार है। यदि आप आज्ञा दें तो मैं जाऊं और पता लगाऊं।”

सगर बोले, “जा, अपने चाचाओं का पता लगा।”

जब अंशुमान जाने लगा तो बूढ़े राजा सगर ने उसे फिर छाती से लगाया, उसका माथा चूमा और आशीष देकर उसे विदा किया।

अंशुमान इधर-उधर नहीं घूमा। उसने पता लगाया और उसी गुफा के दरवाजे पर पहुंचा। गुफा के दरवाजे पर वह ठिठक गया। उसने कुल के देवता सूर्य को प्रणाम किया और गुफा के भीतर पैर रखा। अंधेरे से उजाले में पहुंचा तो अचानक रुककर खड़ा हो गया। उसने जो देखा, वह अदभुत था। दूर-दूर तक राख की ढेरियां फैली हुई थीं। ऐसी कि किसी ने सजाकर फैलद दी हों। इतनी ढेरियां किसने लगाई? क्यों लगाई? वह उन ढेरियों को बचाता आग बढ़ा। थोड़ा ही आगे गया था कि एक गम्भीर आवाज उसे सुनाई दी, “आओ, बेटा अंशुमान, यह घोड़ा बहुत दिनों से तुम्हारी राह देख रहा है।”

अंशुमान चौंका। उसने एक दुबले-पतले ऋषि हैं, जो एक घोड़े के निकट खड़े है। इनको मेरा नाम कैसे मालूम हो गया? यह जरुर बहुत पहुंचे हुए हैं। अंशुमान रुका। उसने धरती पर सिर टेककर ऋषि को नमस्कार किया

“आओ बेटा, अंशमान, यह घोड़ा तुम्हारी राह देख रहा है।”

ऋषि बोले, “बेटा अंशुमान, तुम भले कामों में लगो। आओ मैं कपिल मुनि तुमको आशीष देता हूं।”

अंशुमान ने उन महान कपिल को बारंबार प्रणाम किया।

कपिल बोले, “जो होना था, वह हो गया।”

अंशुमान ने हाथ जोड़कर पूछा, “क्या हो गया, ऋषिवर?”

ऋषि ने राख की ढेरियों की ओर इशारा करके कहा, “ये साठ हजार ढेरियां तुम्हारे चाचाओं की हैं, अंशुमान!”

अंशुमान के मुंह से चीख निकल गई। उसकी आंखों से आंसुओं की धारा बह चली।

ऋषि ने समझाया, “धीरज धरो बेटा, मैंने जब आंखें खोलीं तो तुम्हारी चाचाओं को फूस की तरह जलते पाया। उनका अहंकार उभर आया था। वे समझदारी से दूर हट गये थे। उन्होंने सोच-विचार छोड़ दिया था। वे अधर्म पर थे। अधर्म बुरी चीज है। पता नहीं, कब भड़क पड़े। उनका अधर्म भड़का और वे जल गये। मैं देखता रह गया। कुछ न कर सका।”

अंशुमान ने कहा, “ऋषिवर!”

कपिल बोले, “बेटा, दुखी मत होओ। घोड़े को ले जाओ और अपने बाबा को धीरज बंधाओ। महाप्रतापी राजा सगर से कहना कि आत्मा अमर है। देह के जल जाने से उसका कुछ नहीं बिगड़ता।”

अंशुमान ने कपिल के सामने सिर झुकाया और कहा, “ऋषिवर! मैं आपकी आज्ञा का पालन करुंगा। पर मेरे चाचाओं की मौत आग में जलने से हुई है। यह अकाल मौत है। उनको शांति कैसे मिलेगी?”

कपिल ने कुछ देर सोचा और बोले, “बेटा, शांति का उपाय तो है, पर काम बहुत कठिन है।”

अंशुमान ने सिर झुकाकर कहा, “ऋषिवर! सूर्यवंशी कामों की कठिनता से नहीं डरते।”

कपिल बोले, “गंगाजी धरती पर आयें और उनका जल इन राख की ढेरियों को छुए तो तुम्हारे चाचा तर जायंगे।”

अंशुमान ने पूछा, ” गंगाजी कौन हैं और कहां रहती है?”

कपिल ने बताया, “गंगाजी विष्णु के पैरों के नखों से निकली हैं और ब्रह्मा के कमण्डल में रहती हैं।”

अंशुमान ने पूछा, ” गंगाजी को धरती पर लाने के लिए मुझे क्या करना होगा?”

ऋषि ने कहा, ” तुमको ब्रह्मा की विनती करनी होगी। जब ब्रह्मा तप पर रीझ जायंगे तो प्रसन्न होकर गंगाजी को धरती पर भेज देंगे। उससे तुम्हारे चाचाओं का ही भला नहीं होगा, और भी करोंड़ों आदमी तरह-तरह के लाभ उठा सकेंगे।”

अंशुमान ने हाथ उठाकर वचन दिया कि जबतक गंगाजी को धरती पर नहीं उतार लेंगे, तब तक मेरे वंश के लोग चैन नहीं लेंगे।

कपिल मुनि ने अपना आशीष दिया।

अंशुमान सूरज के वंश के थे। इसी कुल के सत्यवादी राजा हरिश्चन्द्र को छोटे बड़े सब जानते हैं। अंशुमान ने ब्रह्माजी की विनती की। बहुत कड़ा तप किया। तप में अपना शरीर घुला दिया। अपनी जान दे दी, पर ब्रह्माजी प्रसन्न नहीं हुए।

अंशुमान के बेटे हुए राजा दिलीप। दिलीप ने पिता के वचन को अपना वचन समझा। वह भी तप करने में जुट गये। बड़ा भारी तप किया। ऐसा तप किया कि ऋषि और मुनि चकित हो गये। उनके सामने सिर झुका दिया। पर ब्रह्मा उनके तप पर भी नही रीझे।

दिलीप के बेटे थे भगीरथ। भगीरथ के सामने बाबा का वचन था, पिता का तप था। उन्होंने मन को चारों ओर से समेटा और तप में लगा दिया। वह थे और था उनका तप।

सभी देवताओं को खबर लगी। देवों ने सोचा, “गंगाजी हमारी हैं। जब वह उतरकर धरती पर चली जायेंगी तो हमें कौन पूछेगा?”

देवताओं ने सलाह की। ऊंच-नीच सोची और फिर उर्वशी तथा अलका को बुलाया गया। उनसे कहा गया कि जाओ, राजा भगीरथ के पास जाओ और ऐसा यतन करो कि वह अपने तप से डगमगा जाय। अपनी राह से विचलित हो जाय और छोटे-मोटे सुखों के चंगुल में फंस जाय।

अलका और उर्वशी को देखा। उर्वशी ने भगीरथ को देखा। एक सादा सा आदमी अपनी धुन में डूबा हुआ था।

उन दोनों ने अपनी माया फैलाई। भगीरथ के चारों ओर बसंत बनाया। चिड़ियां चहकने लगीं। कलियां चटकने लगी। मंद पवन बहने लगा। लताएं झूमने लगीं। कुंजे मुस्कराने लगीं। दोनों अप्सराएं नाचीं। माया बखेरी। मोहिनी फैलाई और चाहा कि भगीरथ के मन को मोड़ दें। तप को तोड़ दें।

पर वह नहीं हुआ।

जब उर्वशी का लुभावबढ़ा तो भगीरथ के तप का तेज बढ़ा। दोनों हारीं और लौट गई।

उनके लौटते ही ब्रह्मा पसीज गये। वह सामने आये और बोले, “बेटा, वर मांगा! वर मांग!”
भागीरथ ने ब्रह्माजी को प्रणाम किया और बोले, “यदि आप मुझसे प्रसन्न हैं तो गंगाजी को धरती पर भेजिये।”

भागीरथ की बात सुनकर ब्रह्माजी ने क्षणभर सोचा, फिर बोले, “ऐसा ही होगा, भगीरथ।”

ब्रह्माजी के मुंह से यह वचन निकले कि उनके हाथ का कमण्डल बड़े जोर से कांपने लगा। ऐसा लगता था जैसे कि वह फटकर टुकड़े-टुकड़े हो जायगा।

थोड़ी देर बाद उसमें से एक स्वर सुनाई दिया, “ब्रह्मा, ये तुमने क्या किया? तुमने भागीरथ को क्या वर दे डाला?”

ब्रह्मा बोले, “मैंने ठीक ही किया है, गंगा!”

गंगा चौंकीं। बोलीं, “तुम मुझे धरती पर भेजना चाहते हो और कहते हो कि तुमने ठीक ही किया है!”

“हां, देवी!” ब्रह्मा ने कहा।

“कैसे?” गंगा ने पूछा।

ब्रह्मा ने बताया, “देवी, आप संसार का दु:ख दूर करने के लिए पैदा हुई हैं। आप अभी मेरे कमण्डल में बैठी हैं। अपना काम नहीं कर रही हैं।”

गंगा ने कहा, “ब्रह्मा, धरती पर पापी रहते है, पाखंडी रहते हैं, पतित रहते हैं। तुम मुझे उन सबके बीच भेजना चाहते हो! बताओ, मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है?”

ब्रह्मा बोले, “देवी, आप बुरे को भला बनाने के लिए बनी हैं। पापी को उबारने के लिए बनी हैं। पाखंड मिटाने के लिए बनी हैं। पतित को तारने के लिए बनी हैं। कमजोरों को सहारा देने के लिए बनी हैं और नीचों को उठाने के लिए बनी हैं।”

गंगा ने कहा, “ब्रह्मा!”

ब्रह्मा बोले, “देवी, बुरों की भलाई करने के लिए तुमकों बुरों के बीच रहना होगा। पापियों को उबारने के लिए पापियों के बीच रहना होगा। पाखंड को मिटाने के लिए पाखंड के बीच रहना होगा। पतितों को तारने के लिए पतितों के बीच रहना होगा। कमजोरों को सहारा देने के लिए कमजोरों के बीच रहना होगा और नीचों को उठाने के लिए नीचों के बीच निवास करना होगा। तुम अपने धरम को पहचानो, अपने करम को जानो।”

गंगा थोड़ी देर चुप रहीं। फिर बोलीं, “ब्रह्मा, तुमने मेरी आंखें खोल दी हैं। मैं धरती पर जाने को तैयार हूं। पर धरती पर मुझे संभालेगा कौन?”

ब्रह्मा ने भगीरथ की ओर देखा।

भगीरथ ने उनसे पूछा, “आप ही बताइये।”

ब्रह्मा बोले, “तुम भगवान शिव को प्रसन्न करो। यदि वह तैयार हो गये तो गंगा को संभाल लेंगे और गंगा धरती पर उतर आयंगी।”

ब्रह्मा उपाय बताकर चले गये। भगीरथ अब शिव को रिझाने के लिए तप करने लगे।

भगवान शिव को कौन नहीं जानता? गांव-गांव में उनके शिवाले हैं, वह भोले बाबा हैं। उनके हाथ में त्रिशूल है, सिर पर जटा है, माथे पर चांद है। गले में सांप हैं। शरीर पर भभूत है। वह शंकर हैं। महादेव हैं। औढर-दानी है। वह सदा देते रहते है। और सोचते रहते हैं कि लोग और मांगें तो और दें। भगीरथ ने बड़े भक्ति भाव वे विनती की। हिमालय के कैलास पर निवास करने वाले शंकर रीझ गये। भगीरथ के सामने आये और अपना डमरु खड़-खड़ाकर बोले, “मांग बेटा, क्या मांगता है?”

भगीरथ बोले, “भगवान, शंकर की जय हो! गंगा मैया धरती पर उतरना चाहती हैं, भगवन! कहती हैं…..”

शिव ने भगीरथ को आगे नहीं बोलने दिया। वह बोले, “भगीरथ, तुमने बहुत बड़ा काम किया है। मैं सब बातें जानता हूं। तुम गंगा से विनती करो कि वह धरती पर उतरें। मैं उनको अपने माथे पर धारण करुंगा।”

भगीरथ ने आंखें ऊपर उठाई, हाथ जोड़े और गंगाजी से कहने लगे, “मां, धरती पर आइये। मां, धरती पर आइये। भगवान शिव आपको संभाल लेंगे।”

भगीरथ गंगाजी की विनती में लगे और उधर भगवान शिव गंगा को संभालने की तैयार करने लगे।

गंगा ने ऊपर से देखा कि धरती पर शिव खड़े हैं। देखने में वह छोटे से लगते हैं। बहुत छोटे से। वह मुस्कराई। यह शिव और मुझे संभालेंगे? मेरे वेग को संभालेंगे? मेरे तेज को संभालेंगे? इनका इतना साहस? मैं इनको बता दूंगी कि गंगा को संभालना सरल काम नहीं है।

भगीरथ ने विनती की। शिव होशियार हुए और गंगा आकाश से टूट पड़ीं। गंगा उतरीं तो आकाश सफेदी से भर गया। पानी की फहारों से भर गया। रंग-बिरंग बादलों से भर गया। गंगा उतरीं तो आकाश में शोर हुआ। घनघोर हुआ, ऐसा कि लाखों-करोड़ों बादल एक साथ आ गये हों, लाखों-करोड़ों तूफान एक साथ गरज उठे हों। गंगा उतरीं तो ऐसी उतरीं कि जैसे आकाश से तारा गिरा हो, अंगारा गिरा हो, बिजली गिरी हो। उनकी कड़क से आसमान कांपने लगा। दिशाएं थरथराने लगी। पहाड़ हिलने लगे और धरती डगमगाने लगी। गंगा उतरीं तो देवता डर गये। काम थम गये। सबने नाक-कान बंद कर लिये और दांतों तले उंगली दबा ली। गंगा उतरीं तो भगीरथ की आंखें बंद हो गई। वह शांत रहे। भगवान का नाम जपते रहे। थोड़ी देर में धरती का हिलना बंद हो गया। कड़क शांत हो गई और आकाश की सफेदी गायब हो गई।

भगीरथ ने भोले भगवान की जटाओं में गंगाजी के लहराने का सुर सुना। भगीरथ को ज्ञान हुआ कि गंगाजी शिव की जटा में फंस गई हैं। वह उमड़ती हैं। उसमें से निकलने की राह खोजती हैं, पर राह मिलती नहीं है। गंगाजी घुमड़-घुमड़कर रह जाती हैं। बाहर नहीं निकल पातीं।

भगीरथ समझ गये। वह जान गये कि गंगाजी भोले बाबा की जटा में कैद हो गई है। भगीरथ ने भोले बाबा को देखा। वह शांत खड़े थे। भगीरथ ने उनके आगे घुटने टेके और हाथ जोड़कर बैठ गये और बोले, “हे कैलाश के वासी, आपकी जय हो! आपकी जय हो! आप मेरी विनती मानिये और गंगाजी को छोड़ दीजिये!”

भगीरथ ने बहुत विनती की तो शिव शंकर रीझ गये। उनकी आंखें चमक उठीं। हाथ से जटा को झटका दिया तो पानी की एक बूंद धरती पर गिर पड़ी।

बूंद धरती पर शिलाओं के बीच गिरी, फूली और धारा बन गई। वह उमड़ी और बह निकली। उसमें से कलकल का स्वर निकलने लगा। उसकी लहरें उमंग-उमंगकर किनारों को छूने लगीं। गंगा धरती पर आ गई। भगीरथ ने जोर से कहा, “गंगामाई की जय!”

गंगामाई ने कहा, “भगीरथ, रथ पर बैठो और मेरे आगे-आगे चलो।”

भगीरथ रथ पर बैठे। आगे-आगे उनका रथ चला, पीछे-पीछे गंगाजी बहती हुई चलीं। वे हिमालय की शिलाओं में होकर आगे बढ़े। घने वनों को पार किया और मैदान में उतर आये। ऋषिकेश पहुंचे और हरिद्वार आये। आगे बढ़े तो गढ़मुक्तेश्वर पहुंचे।

आगे चलकर गंगाजी ने पूछा, “क्यों भगीरथ, क्या मुझे तुम्हारी राजधानी के दरवाजे पर भी चलना होगा?”

भगीरथ ने हाथ जोड़कर कहा, “नहीं माता, हम आपको जगत की भलाई के लिए धरती पर लाये हैं। अपनी राजधानी की शोभा बढ़ाने के लिए नहीं।”

गंगा बहुत खुश हुई। बोलीं, “भगीरथ, मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हूं। आज से मैं अपना नाम भी भागीरथी रखे लेती हूं।”

भगीरथ ने गंगामाई की जय बोली और वह आगे बढ़े। सोरो, इलाहाबाद, बनारस, पटना होते हुए कपिल मुनि के आश्रम में पहुंचे। साठ हजार राख की ढेरियां उनके पवित्र जल में डूब गई। वह आगे बढ़ीं तो उनको सागर दिखाई दिया। सागर को देखते ही खिलखिलाकर हंस पड़ीं और बोलीं, “बेटा भगीरथ, अब तुम लौट जाओ। मैं यहीं सागर में विश्राम करुंगी।”

तबसे गंगा आकाश से हिमालय पर उतरती हैं। सत्रह सौ मील धरती सींचती हुई सागर में विश्राम करने चली जाती हैं। वह कभी थकमती नहीं, अटकती नहीं। वह तारती हैं, उबारती हैं और भलाई करती हैं। यही उनका काम है। वह इसमें सदा लगी रहती हैं।