Posted in भारतीय मंदिर - Bharatiya Mandir

सारे के सारे मंदिर सरकार के अधीन हैं और उनके ट्रस्ट के मैनेजर और उनके बोर्ड में सरकार के आदमी होते हैं जो दान के रूपये कहाँ खर्च किये जाने हैं उसका फैसला लेता हैं


सारे के सारे मंदिर सरकार के अधीन हैं और उनके ट्रस्ट के मैनेजर और उनके बोर्ड में सरकार के आदमी होते हैं जो दान के रूपये कहाँ खर्च किये जाने हैं उसका फैसला लेता हैं

ये कैसी सेकुलर सरकार?
हिन्दू मन्दिरों का पैसा मदरसों,हज, और चर्च में हो रहा खर्च।
सुप्रीम कोर्ट ने किया भण्डाफोड़
यदि आप सोचते हैं कि मन्दिरों में दान किया हुआ, भगवान को अर्पित किया हुआ पैसा, सनातन धर्म की बेहतरी के लिए, हिन्दू धर्म के उत्थान के लिए काम आ रहा है तो आप निश्चित ही बड़े भोले हैं। मन्दिरों की सम्पत्ति एवं चढ़ावे का क्या और कैसा उपयोग किया जाता है पहले इसका एक उदाहरण देख लीजिये, फ़िर आगे बढ़ेंगे-
कर्नाटक सरकार के मन्दिर एवं पर्यटन विभाग (राजस्व) द्वारा प्राप्त जानकारी के अनुसार 1997 से2002 तक पाँच साल में कर्नाटक सरकार को राज्य में स्थित मन्दिरों से सिर्फ़ चढ़ावे में” 391 करोड़ की रकम प्राप्त हुई, जिसे निम्न मदों में खर्च किया गया-
1) मन्दिर खर्च एवं रखरखाव – 84 करोड़ (यानी 21.4%)
2) मदरसा उत्थान एवं हज – 180 करोड़ (यानी 46%)
3) चर्च भूमि को अनुदान – 44 करोड़ (यानी 11.2%)
4) अन्य – 83 करोड़ (यानी 21.2%)
कुल 391 करोड़
जैसा कि इस हिसाब-किताब में दर्शाया गया है उसको देखते हुए सेकुलरोंकी नीयत बिलकुल साफ़ हो जाती है कि मन्दिर की आय से प्राप्त धन का (46+11) 57% हिस्सा हज एवं चर्च को अनुदान दिया जाता है (ताकि वे हमारे ही पैसों से जेहाद, धार्मिक सफ़ाए एवं धर्मान्तरण कर सकें)। जबकि मन्दिर खर्च के नाम पर जो 21% खर्च हो रहा है, वह ट्रस्ट में कुंडली जमाए बैठे नेताओं व अधिकारियों की लग्जरी कारों, मन्दिर दफ़्तरों में AC लगवाने तथा उनके रिश्तेदारों की खातिरदारी के भेंट चढ़ाया जाता है। उल्लेखनीय है कि यह आँकड़े सिर्फ़ एक राज्य (कर्नाटक) के हैं, जहाँ 1997 से2002 तक कांग्रेस सरकार ही थी
सुप्रीम कोर्ट ने इस खजाने की रक्षा एवं इसके उपयोग के बारे में सुझाव माँगे हैं। सेकुलरों एवं वामपंथियों के बेहूदा सुझाव एवं उसे काला धनबताकर सरकारी जमाखाने में देने सम्बन्धी सुझाव तो आ ही चुके हैं, ऐसे कई सुझाव माननीय सुप्रीम कोर्ट को दिये जा सकते हैं, जिससे हिन्दुओं द्वारा संचित धन का उपयोग हिन्दुओं के लिए ही हो, सनातन धर्म की उन्नति के लिए ही हो, न कि कोई सेकुलर या नास्तिक इसमें मुँह मारनेचला आए।
कभी कभी कोफ़्त होती हैं इस देश की जनता पर जो सच्चाई या तो जानना नहीं चाहती और जान कर भी अनजान बनी रहती हैं, वो सभी लोग जो ये सवाल उठा रहे हैं क्या वो मुझे बतायेंगे की भारत का कौन सा अमीर मंदिर सरकारी नियंत्रण के बाहर हैं? सारे मंदिर चाहे वह पद्मनाभ मंदिर हो या मुंबई का सिद्धि विनायक या तिरुपति या ओडिशा का श्री जगन्नाथ मंदिर सारे के सारे मंदिर सरकार के अधीन हैं और उनके ट्रस्ट के मैनेजर और उनके बोर्ड में सरकार के आदमी होते हैं जो दान के रूपये कहाँ खर्च किये जाने हैं उसका फैसला लेता हैं, अभी तुरंत का मामला विन्ध्वासिनी देवी विन्ध्याचल उत्तर प्रदेश का हैं जो 15 दिन पहले ही सरकारी नियंत्रण में लिया गया हैं| कुम्भ मेले से सरकार को अरबो रूपये की कमाई होती हैं|
अब आप मुझे बताइए की कैसे वो मंदिर दान कर सकते हैं? और आप सब ने यह न्यूज़ चैनेल में सुना होगा की बदरीनाथ में पंडो ने सभी के लिए लंगर चलाया आज की डेट में उनके पास खाने के लिए कुछ भी नहीं हैं उन्होंने हजारो लोगो को लगातार कई दिनों तक खाना खिलाया और उनकी सरकार भी कोई मदद नहीं कर रही हैं|
कुछ कमियां जरुर हो सकती हैं पर आपको सिर्फ नकारात्मकता ही क्यूँ दिखाई दे रही है ?
अखाड़ों के साधुओं ने इकठ्ठा करके एक करोड़ रुपया दिया है, कई गाँव गोद लेने की घोषणा की है
पतंजलि योगपीठ ,परमार्थ निकेतन ,आर्ट ऑफ लिविंग ,गुरुद्वारा कमिटी ,गायत्री परिवार,दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान,संघ परिवार,स्थानीय मंदिर समितियों और स्थानीय लोगों तथा और भी कई धार्मिक संस्थाओं के प्रयास की जानकारी तो आपको निरंतर दी ही जा रही है
इन बातो को मीडिया या ऐसे आरोप लगाने वाले लोग क्यूँ नहीं बताते है
क्यूँ आप ये मांग नहीं करते कि हिंदुओं के मंदिरों से सरकारी नियंत्रण हटाया जाए…
नहीं ये तो आपसे नहीं होगा , पर हिंदुओं और उनके मंदिरों साधुओं आस्था की आलोचना जरुर होगी..क्यूँकि ये सबसे सरल कार्य है

Author:

Hello, Harshad Ashodiya I have 12,000 Hindi, Gujarati ebooks

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